ज््् (बदचलन आदत) छुट नही रही मुझसे मेरी बदचलन आदत----- मंदिर-मस्जिद महज़ चंद दिवालो की इमारत, लोग लड़ रहे राम और अल्लाह कह--------------- इससे तो कही बेहतर है मेरी बदचलन आदत। ये गली-मुहल्ले के शोर फिर खामोशी, कोई मालिक--------- तो कोई बेरहमी से निकाल रहा आधी रात जो है पेट से औरत, जिंदगी के इस कसैलेपन से दुर----------- मुझे मैखाने लिये जा रही मेरी बदचलन आदत। मै अक्सर लड़खड़ाते गुजरा हूं नशे मे, और तका है मैने शहर का नंगापन, कमरे मे सोये हुये शौहर को छोड़, दबे पाँव पिछले दरवाज़े से जाते देखा है उजाले की शरीफ़ को, एै "रंग" इससे कही भली है------------ मेरी तवायफ़ के बाँहो मे सोने की बदचलन आदत। @@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी। जज कालोनी,मियाँपुर जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)। mo.no.-----7800824758