Wednesday, 30 September 2020

लघुकथा----(हे ! राम )

लघुकथा-----(हे ! राम )

शहर के चौराहे पर अलसुबह कुछ लोगों की भीड़ देखकर, मैं भी कौतूहलवश उस भीड़ की वजह जानने के प्रयास में ज्यों ही भीड़ के करीब गया, तो वहां पड़ी हुई एक लाश देखकर मै अवाक रह गया. 

क्योंकि जिस व्यक्ति की वह लाश वहां पड़ी हुई थी वे देखने मात्र से ही कोई मजदूर लग रहा था. जिसे कल रात किसी वक़्त काम से लौटते समय किसी ने बड़ी ही बेरहमी के साथ चाकुओं से गोदकर मार डाला था. या उसकी हत्या कर दी थी.

उस व्यक्ति या मजदूर की लाश के घावों पर बैठी भिनभिना रही मक्खियां, मुझे वहां इकट्ठी भीड़ से कहीं ज्यादा संवेदनशील लग रही थी. क्योंकि वे  मक्खियां अपनी मक्खी होने के धर्म का निर्वहन तो कर रही थी, जबकि यह मनुष्य अपने मनुष्य होने के धर्म का कतई निर्वहन नहीं कर रहे थे. जोकि दुर्भाग्यपूर्ण था. 

अगर यह मनुष्य होते और इनमें संवेदना नाम की कोई चीज होती तो उन्हें उस मजदूर की लाश, महज लाश नहीं दिखती. बल्कि इस लाश के पीछे कि वे हिंसा दिखती, जिसके कारण इसकी पत्नी ने अपना सुहाग और इसके दो छोटे-छोटे मासूम बच्चों ने अपना पिता खो दिया. 

मैं फिर ना जाने क्यों और अधिक देर तक उस भीड़ के बीच ना रुक सका ?  मुझे उस भीड़ से एक कोफ़्त सी हुई और मैं चौराहे से जल्द से जल्द काफी दुर निकल जाना चाहता था. लेकिन तभी चौराहे पर टंगी "महात्मा गाँधी" की फोटो पर मेरी नजर पड़ी,और  नजर पड़ते ही मुझे उस मजदूर की लाश व उसके आसपास बहकर सूखे हुए खून पर बैठी वे भिनभिनाति मक्खियां याद हो आई और इस हिंसा ने मुझे "महात्मा गाँधी" के वे आखिरी शब्द 'हे ! राम ' कहने को बाध्य कर दिया. 


यह लघुकथा मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है. 

लेखक--रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin.no. 222002 (U P)
Mo. no. 7800824758

Sunday, 27 September 2020

लघुकथा----(नीम का दरख़्त )

लघुकथा----( नीम का दरख़्त)

अमजद अपने अब्बू के इंतकाल के बाद, अपनी अम्मी ख़ालिदा को गांव में अकेले व तन्हा रहने के लिए छोड़कर अपनी बेगम और बच्चों के साथ रहने के लिए शहर चला गया. लेकिन खालिदा भला कैसे अपने जिंदा रहते उस गांव व घर को छोड़ सकती थी. जिसके जर्रे-जर्रे में उसके शौहर की यादें बसी थी. 

ख़ालिदा को ख़ासकर दरवाज़े पर लगे उस नीम के दरख़्त से बेइंतहा मोहब्बत थी. जिसे अमजद के अब्बू ने अपने हाथों से लगाया था. वे ज़ब भी कभी खुद को बहुत तन्हा व अकेली महसूस करती थी,  तो घंटो उस नीम के दरख़्त से  ऐसे  बाते करती थी, जैसे वे कोई नीम का दरख़्त नहीं बल्कि, उसके पास अमजद के अब्बू खड़े हो.

एक बार ख़ालिदा ने अमजद से कहा भी था,  कि अमजद मेरे बेटे तू बेशक अपनी इस अम्मी को हज मत कराना, लेकिन बेटे मेरे जिंदा रहते तू कभी भी किसी से अपने अब्बू की इस नीम के  दरख़्त का सौदा मत करना. लेकिन शायद अमजद को अपने अम्मी ख़ालिदा की परवाह कहा थी, अगर होती तो उस दिन वे हरगिज उस नीम की दरखत का सौदा ना करता. जिसके लिए उसकी अम्मी ख़ालिदा ने उसे मना किया था. 

उस दिन ख़ालिदा ने पहली बार अपने कलेज़े पर पत्थर रखकर ना सिर्फ अमजद से लड़ पड़ी, बल्कि उसने यहां तलक कह दिया, कि जा !  चला जा!  मेरी नजरो के सामने से और आइंदा मेरे जिंदा रहते कभी भी तू  गांव मत आना और गर मेरी मौत भी हो जाये तो, तू मेरी  मिट्टी को हाथ भी मत लगाना.इसके बाद अमजद तीन दिन और गांव रहा लेकिन इस दरमिया उसने अपनी अम्मी से बात भी नही की. चौथे दिन वे बिना अपनी अम्मी से बात व सलाम किये, शहर चला गया, ऐसा पहली बार हुआ . 

ख़ालिदा अमजद की इस हरकत पर बहुत रोई , उसकी आँख तो आँख वे पाक आँचल तलक भीग गया,  जिसके साये तले सोने के लिए फरिश्ते तलक तड़पते है. लेकिन ये अमजद ना समझ सका.


इसके बाद फिर अमजद तभी गांव लौटा ज़ब उसके गांव वालों ने उसे फोन से ये बताया कि अमजद आज सुबह तुम्हारी अम्मी ख़ालिदा का इंतकाल हो गया. ये सुनकर अमजद को एक शॉक सा लगा. वे तुरंत ही अपने गांव के लिए चल पड़ा और गांव पहुंचने पर  ज़ब अमजद की नजर अपनी अम्मी की लाश पर पड़ी,  तो उसने देखा की जैसे उसकी अम्मी ख़ालिदा आज नीम के  दरख़्त के  नीचे अब्बू के साथ बैठी कह रही हो, कि तू आ गया अमजद. 


यह लघुकथा मेरे द्वारा स्वलिखित व अप्रकाशित है.
 
लेखक--- रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर 222002 ( उत्तर प्रदेश)
Mo. no. 7800824758

Tuesday, 22 September 2020

(रेगमाल सी जिंदगी )

(रेगमाल सी जिंदगी)
कौन नही बुनता-----------
जुलाहे के कालीन सी जिंदगी!
तरह-तरह के धागे में पिरो,
कौन नही देखना चाहता मुकम्मल अपना शाहकार,
पर हो नही पाता ज्यो का त्यो चाहा,
फंस के खत्म हो जाती है मछली सी----
किसी मछेरे के जाल सी जिंदगी।
सारी ख्व़ाहिशे धरी रह जाती है,
एक-एक कर खत्म होती जाती है,
एै रंग------------------
यहां पे सबकी है रेगमाल सी जिंदगी।

Tuesday, 8 September 2020

कविता----(तेरे शहर में )

(तेरे शहर में)
तेरे शहर में--------------
हमारे मोहब्बत की एक शाम वसीयत है।
ले लेना तुम हमारी गज़ल का जर्रा-जर्रा,
कोई बंदिश नही----------
यहाँ जाफ़रान की खुशबू है हर शख्स़ की खातिर,
यहाँ न कोई कौम न मज़हब और----------
ना ही सरियत है।
तुम्हारें शहर में--------------
हमारे मोहब्बत की एक शाम वसीयत है।
आहिस्ता-आहिस्ता उतरेगा जे़हन मे तेरे,
इन लफ्ज़ो का गुलाबीपन,
मै याद आऊँगा तुम्हारें शहर को,
यहाँ से जाने के बाद भी,
क्योंकि मोहब्बत ही एै "रंग"--------
इस अदब के दिवान की नियत है।
तुम्हारें शहर में------------
हमारे मोहब्बत की एक शाम वसीयत है।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.------7800824758

Sunday, 6 September 2020

कविता---(मिट्टी से जुदा मत करना )

(मिट्टी से जुदा मत करना)
बेटे मै बुढ़ि हो गई हूँ-------------
मुझे इस उम्र में अपने अब्बु से जुदा मत करना।
ना बेचना किसी को-------------
दरवाज़े पे जो उन्होनें लगाया है दरख्त़,
मै उसी से बतियाती हूँ अक्सर,
मुझे दर्द होगा------------
जब कोई काटेगा टंगारे से तेरी अब्बु की याद को।
बेटा बेशक तु मुझे हज़ ना कराना,
पर लेने देना मुझे आखिरी साँस इस मकान में,
मर जाऊँ तो तेरा हक है इस पर,
पर जीते जी मेरे बेटे,
अपनी इस अम्मी को अपने अब्बु के-----
इस मुकद्दस मिट्टी से जुदा मत करना।

Saturday, 5 September 2020

कविता---(गुरु )

(गुरु)
होते है साधु,संत और फकीर के गुरु,
अमर हो जाते है-----------------
पा के शिष्य कबीर के गुरु।
कौन भुला है प्रेम दिवानी मीरा को,
रैदास थे--------------
अपनी शिष्या के पीर के गुरु।
कर्ण का चरित्र और धनुर्विद्या,
स्वयं केशव कह उठे थे कुरुक्षेत्र में
वाह!कर्ण वाह!--------------
परशुराम थे एैसे बीर के गुरु।
जब खाली लग रहा था--------
ओलंपिक के मेडल से अपना देश,
तभी जीती एक लड़की
और दुनिया जान गई!
कि एै,रंग-------------
पुलेला है अपनी शिष्या सिंधु जैसी तीर के गुरु।

@@@आप सभी को शिक्षक दिवस की ढ़ेरो बधाई।

Tuesday, 1 September 2020

लेख----(खो रहे देश की हम अद्वितीय परंपरा )

श्राद्ध-विशेष चिंतन---(खो रहे हम देश की अद्वितीय परंपरा)

आज हमसे हमारी बहुत सारी पारिवारिक व वैदिक संवेदनाएं काफी जर्जर हो चुकी है,या अगर जर्जर नही हुई है तो नष्ट होने की कगार पर है.उन्हीं उत्कृष्ट परंपरा या संवेदना मे से एक प्रमुख है,अपने वृद्धों का आदर पूर्वक किया गया उनका श्राद्घ चूँँकिं श्राद्ध का आशय श्रद्धा से है,अगर ये श्रद्धा मर जाये तो हमारे देश की समृद्ध वैदिक परंपरा भी मर जायेगी. तब केवल और केवल मनुष्य हाड़-मांस का बना यंत्र भर रह जायेगा, जिसमें सब कुछ रहेगा बस संवेदना नही रहेगी.

आज पूरी दुनिया में संवेदना मे आ रही लगातार गिरावट का ये भयंकर दौर है,जिसकी भयंकरता का मापन हम दुनिया के किसी भी वैज्ञानिक रिएक्टर पैमाने पे नही कर सकते.इसका स्पष्ट असर अब हमारे देश में  भी केवल श्राद्ध के महीने मे ही नही अपितू अपने वृद्ध माँ-बाप की उपेक्षा मे भी हमे स्पष्ट दिख रहा है.जबकि हम सभी भारतीय कभी इस दौलत की खान थे. पूरी दुनिया हमारी संवेदना और यहां की समृद वैदिक परंपरा को बड़ी श्रद्धा से देखती थी.लेकिन हमीं अब अपनी इस संवेदना की समृद्ध व गौरवशाली परंपरा को खुद जर्जर व नष्ट कर रहे.

"हमें विदेशों की अतिशय नकल परंपरा के इस ओलंपिक से बाहर निकलना होगा". और हमें जिन बुढ़े माँ-बाप ने पाला-पोशा अपने सारे सुख-सुविधाओं को त्यागकर अपना वात्सल्य दिया.उन्हें हम कही उपेक्षा तो नही दे रहे,हमारा बागबान कही हमारी उपेक्षा से आहत या पीड़ित हो अकेले में रोतो नही रहा, गर ऐसा है तो फिर ये देश भी "विदेशी मूल के कुत्तों के मार्निंग वाक और इवनिंग वाक का देश होने जा रहा". बुढ़े माँ-बाप का श्रवण कुमार वाला देश अब मिस्टर कुमार होने जा रहा.यानि हमारी समृद्ध परंपरा का देश उन्हें अपनों से अलग रखने वाले वृद्धाश्रम का देश होने जा रहा.

हम सभी अपनी समृद्ध वैदिक परंपरा को जर्जर करने का दोषारोपण अब किसी विदेशी के सर नही मढ़ सकते.क्योंकि इसको जर्जर व नष्ट हम स्वयं कर रहे न कि कोई विदेशी वाह्य आक्रांता. अगर हम सभी समय रहते अपनी इन परंपराओं को न बचा पायेंगे तो फिर हम उस दरिद्र की तरह होंगें जिसके पास सबकुछ वैभव होगा लेकिन वे उस वैभव से अपने दो घड़ी चैन की नींद भी नही ले पायेगा.आईये हम अपनी उस वैदिक, सामाजिक व समृद्ध परंपरा को सहेजे. "जहां मनुष्य तो मनुष्य सुना है, कि देव भी पैदा होने को तरसते है".

आज भगवान राम,कृष्ण, बुद्ध, गाँधी की वैदिक परंपरा का देश हमें कुछ आहत व पीड़ित लग रहा शायद ये लेख उसी पीड़ा के कुछ आँसू है. और हो भी क्यों न जिस देश मे इतना तक कहा गया हो की "माँ पुरी दुनिया का एकलौता पूर्ण शब्द है ,"माँ ऊँ है."माँ कहने वालो के लिये गीता या कुरान से भी ज्यादा शबाब उसे केवल माँ कहने में है". "पिता हिमालय की तरह है."माँ और पिता केवल एक रिश्ते का औपचारिक या मशीनी नाम नही अपितू हमारा संम्पूर्ण जीवन है.

"हम अपने वृद्धो की संस्कारों से पुष्पित व पल्लवित एक बोधि वृक्ष है" .यही कारण है कि- "हमारा ये देश मानसिक पीड़ितो की विश्व दवा है". ये देश कबीर के प्रेम के ढा़ई आखर का देश है और हमारे बुढ़े माँ-बाप उस ढा़ई आखर के प्राण तत्व. बम,बारुद, मिसाइल के ढ़ेर पे बैठी दुनिया भी ये कहने से गुरेज नही करती कि, माँ के छुवन या स्पर्श की थिरैपी मेडिकल थिरैपी से कही ज्यादा कार-आमद है.ये थिरैपी हमारी समृद्ध वैदिक परंपरा की ही देन है. यशोदा माँ व नंद बाबा के प्यार की थिरैपी में पले भगवान कृष्ण की "गीता का उपदेश" जीवन-मृत्यु-युद्ध को इतना स्पष्ट परिभाषित करता है, जितना की दुनिया की कोई अन्य किताब नही.आईये हम सभी इस श्राद्ध के पवित्र महीने में,अपनी इस वैदिक अनमोल धरोहर की संवेदना  व उसकी समृद्ध परंपरा को जर्जर व नष्ट होने से बचाये.


यह लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.

लेखक--रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758

(एक जिंदा दिया हूं )

(एक जिंदा दिया हूँ)
ताउम्र अपनी मै जल-जल के जिया हूं,
मै आदमी नही-----------
एक जिंदा दिया हूँ।
तमाम खराशे है,है तमाम सिलवटे
उधड़ा रहा मै----------
किसी मुफ़लिस के बिछौने सा,
हर जख्म जिंदगी का-------
मै खुद से सिया हूं।
मै आदमी नही--------
एक जिंदा दिया हूँ।
हु मै एक एैसा सजायाफ्ता,
जो रो नही सकता!
खौलते है आँसू मेरे दिल के अंदर,
मै कभी बहार में नही-------
खिजा़ में जिया हूं।
मै आदमी नही------
एक जिंदा दिया हूँ।