Wednesday, 29 November 2023

(आईना तोड़ देती हैं)

(आईना तोड देती है)
पटकती है बेरहमी से-
सिसकता छोड देती है,
ऐ रंग-
वे हुश्न-ऐ-बेगैरत,हर महिने 
एक आईना तोड देती है।

(रिश्वत)

(नंगे शरीर की रिश्वत)
कालेधन का तो नहीं पता लेकिन,
कल एक मज़लूम औरत---------
सरकारी अस्पताल में अपने बीमार पती का इलाज कराने गई,
तो उसे डाॅक्टर व स्टाप ने नीचे से उपर तलक देखा,
शायद ये उम्मीद थी कि कुछ लाई होगी देगी,
लेकिन ये भापते ही--------------
कि वे कुछ दे नही पायेगी,
सभी उसे दुत्कारने लगे!
तभी उसने सबसे बड़े डाॅक्टर का पाँव पकड़,
गिड़गिड़ाई कि साहब ये मर जायेंगे,
उस नकली सहानुभूति के मसीहा ने कहा ठिक है,
अच्छा ये बताओ क्या तुम अपने पती के इलाज के नाम पे हमें कुछ दे सकती हो,
ये कहते समय डाॅक्टर की नज़र उस महिला की घबराहट में फिसले हुये आँचल,
के बीच ब्लाउज़ में कसे हुये उन्नत उरोज पर थी,
अचानक से उसने स्त्रीयोचित लज्जा से अपना आँचल झेप अपने सीने पे रखा,
लेकिन क्या करती----------
तब तलक एक अघोषित पिड़ा के लिये उस डाॅक्टर ने एक अश्लील थपकी दे,
ये कह की अगर पती की जान बचानी हो तो तुम समझ रही हो न,
डाॅक्टर अपने कामन रुम के दरवाजे की तरफ जा उसे जानबुझकर अधखुला छोड़ शायद अपने होठ पे सिगरेट सुलगा अपने शरीर की सुलगन को---------
सिगरेट बुझाने वाले मर्तबान में बिल्कुल सिगरेट के बचे भाग को-------
बुरी तरह मसल कर बुझाने की तरह ही अपनी कामुकता का सिगरेट भी उस अंग-विशेष में मसलकर बुझाने की खातिर उसने,
जिस दरवाजे को अधखुला छोड़ा है,
आज उस तरफ पती के जीवन के लिये सिटकनी चढ़नी है------------
सिटकनी चढ़ी और डाॅक्टर उस तरफ उसके शरीर से अपनी रिश्वत लेता रहा,
वे ज्यो रिश्वत दे बाहर आई----------
तो देखा की बड़ी तेजी से उसके पती का इलाज चालु था।
वे अपने शरीर की रिश्वत को अब तलक टटोल रही थी,
वे डाॅक्टर अब भी अपनी कनखियो से तक रहा था,
उसे लगा कि जैसे वे थूक लगा अब भी उसके शरीर के उन अंगो से चिपके कुछ फस गये नोटो की तरह,
दो-तीन मर्तबा रगड़ अपनी रिश्वत गिन रहा हो।

@@@रिश्वत की एक भयावह तस्बीर।

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

(काबुली वाला)

(काबुली वाला)
मै रोज देखती हूँ--------
खुली खिड़की से घंटो सड़क की तरफ,
ऐ,रंग----इस उम्मीद मे कि शायद--
कभी दिख जाये--------
वे मेरी बचपन का काबुली वाला।
आज,मध्य प्रदेश से प्रकाशित मासिक पत्रिका "कलम हस्ताक्षर" की दो लेखकीय प्रति मुझे कोरियर से प्राप्त हुई ये लेखकीय प्रति मुझे प्राप्त कराने का सारा श्रेय देश की सर्वश्रेष्ठ कहानीकार,व्यंग्यकार,साहित्यकार डॉक्टर रंजना जायसवाल जी को जाता हैं जिनकी वजह से मुझे लेखकीय प्रति मिल पाना संभव हुआ उनके इस स्नेह और सहयोग के लिए मेरा सादर प्रणाम ✍️✍️🙏🙏

वैसे इस पत्रिका के सारे पृष्ठ अपनी बेहतरीन प्रिंटिंग व छपाई के लिहाज से इतने बेहतरीन है कि इन्हें आप सुचारू रूप से आजीवन अपनी संग्रह में रख सकते है.

मैं इस सशक्त और बेहतरीन मासिक पत्रिका की संपादक रुचि वाजपेई शर्मा जी को कोटि कोटि धन्यवाद प्रेषित करता हू कि उन्होंने ना केवल मेरे लेख को शामिल किया बल्कि मेरी लेखकीय प्रति के खो जाने पर पुनः उन्होंने मुझे कोरियर से भेज कर कृतार्थ किया ✍️✍️🙏🙏

Tuesday, 28 November 2023

(मौत की सुरंग से निकले हैं)

(मौत की सुरंग से निकले हैं)

हम जिंदगी की जद्दोजहद
और जंग से निकले हैं
सांस आई गई,कमजोर हुई
लेकिन टूटी नहीं .
हमे उम्मीद थी जीने की 
और,जीतने की.
इसीलिए तो हम 
एक नए जीवन की 
गर्भ से निकले हैं.

उल्लास हैं,खुशी हैं,जश्न हैं
लेकिन शुक्रिया उनका,
सलाम उनको
जिनके हौसले लड़ते रहें
हर घड़ी , हर क्षण
हमारी सांस के लिए.
आज उन्ही की देन हैं
कि हम उसी मस्ती
और उसी उमंग से निकले हैं.

शुक्रिया धामी,
आपके हौसले का 
जो हमारी मुश्किलों में काम आए 
नही तो यही सुरंग 
हमारी कब्रगाह होती
लेकिन नही
हम जीत गए और मौत हार गई.

हे!उत्तरकाशी 
शायद !
तेरे कण–कण को प्रणाम,
करने की खातिर
हम सारे मजदूर 
मौत की सुरंग से निकले हैं.

✍️✍️आखिर ज़िंदगी जीत गई🌹🌹

रचना--रंगनाथ द्विवेदी
जिला--जौनपुर (U P)
आज, दिनांक 28/11/21 के दैनिक अमर-उजाला के साप्ताहिक "हास्यरंजनी " में प्रकाशित मेरा हास्य व्यंग्य जिसकी कटिंग मुझे देश के वरिष्ठ व चर्चित व्यंग्यकार सिंघई सुभाष चंद जैन सर,और देश के सर्वाधिक युवा व चर्चित लेखक मेरे प्रिय भाई पुष्पेंद दीक्षित जी ने भेजा जिसके लिए मैं उन्हें सादर प्रणाम करता हूं.

" मैंने अपने इस व्यंग्य में सर्वाधिक हास्य का प्रयोग किया है ,अतः मेरे द्वारा लिखें गए इस व्यंग्य को बिना किसी भी प्रकार का दिमाग लगाए बस केवल आप अपनी महीनों से रूठी हुई पत्नी को किसी रेस्टोरेंट में प्यार से एक प्लेट गोलगप्पा खिलाएं मेरा दावा है कि आप इसके परिणाम से चौक जाएंगे "😀😀😀😀

Monday, 27 November 2023

(मां भूख से मर गई)

(माँ भूख से मर गई)
बेशक तेरी तिजोरी दौलत से भर गई--
पर माँ की------
चुपड़ी रोटी के नमक हराम,
शायद तुम्हे पता नही,,,,,
कि गाँव मे--------
तेरी माँ भूख से मर गई।

(इतवार केवल दिन नही मोहब्बत है)

(इतवार केवल दिन नहीं मोहब्बत है)
कभी किसी शनिवार वे आते है,
कभी किसी शनिवार मै जाती हू।
ये भागमभाग,ये नौकरी,ये भीड़ 
कि उबन से दुर------------
कभी किसी इतवार वे मुझे पाते है,
कभी किसी इतवार मै उन्हें पाती हू।
फिर अगली सुबह लौटना होता है,
कभी दरवाजे़ पे वे मुझे छोड़ने आते है,
और कभी दरवाजे पे मै उन्हें छोड़ने जाती हू।
इसलिये एै,रंग---अब हमारी जिंदगी मे इतवार महज़ दिन नही,
मोहब्बत है जो हम एक दुसरे से कर पाते है।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

नौकरीपेशा लोगो का वे इतवार जिसका इंतज़ार वे बड़ी शिद्दत से एक दुसरे के लिये अलग-अलग शहरो में पुरे हफ्ते ट्रेन पे न बैठ पाने तलक करते है।

(रेशमा)

"रेशमा" महज़ एक लड़की नही बल्कि वे मुझ जैसे किसी शायर की मुहब्बत थी---------------
                                       (रेशमा)
तेरे शहर में-----------
आज रात मै फिर गा रहा हूँ रेशमा।
देख तुझसे किये अहद को---------
मै कितनी शिद्दत से निभा रहा हूँ रेशमा।
आज भी ये नज़र तलाश रही है,
वे किनारे कि महबूब कुर्सी,
जिसपे तुम बैठ कभी हमें सुना करती थी,
तेरी खातिर अब तलक मै खुद को-----
कितना तड़पा रहा हूँ रेशमा।
मेरी गज़लो के हर्फ महज़ हर्फ नही,
तेरे सहलाये भरे जख्म़ है,
लेकिन फिर वे ताजे हो टिस रहे है,
मान नही रहे न जाने क्यू आज़,
जबकि इन्हें मै-----------
तेरी खातिर न जाने कितनी देर से मना रहा हूँ रेशमा।
लोग कहते है कि मेरी गज़ल को वे सिरहाने रख के सोते है,
शायद उन्हें पता नही,
कि हम एक गज़ल को लिख फिर सारी रात रोते है,
ये दिवान मेरे है लेकिन-----------------
इस दिवान की कबर पे तुम्ही छपी हो रेशमा।
सच तुम हमारी मुहब्बत थी,मुहब्बत हो बेशक-----
तुम्हारे शहर से मै जा रहा हूँ रेशमा।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.------7800824758

(तुम हो और तुम हो)

(तुम हो और तुम हो)

तुम ठंड के मौसम में,
पहाड़ों पर खिली हो,
लेकिन,
मेरे दिल में भी 
एक जाड़े का मौसम है.

जहां तुम हो और 
तुम्हारी खूबसूरती,है
आओ--
मैं तुम्हें भी दिखाऊ
वे अल्हड़ सी  
शर्माइ सकुचाई सी
फूलों के दुपट्टे से
बतियाती,
पहाड़ों की लड़की से
जो कोई और नहीं
बल्कि तुम हो
और तुम हो.

रंगनाथ द्विवेदी
जिला--जौनपुर, mo. no.7800824758

Saturday, 25 November 2023

(राम कहेंगे)

(राम कहेंगे)

ये चुनावी सीजन है,
सावधान हो जाओ!
क्योंकि---
अब खद्दर पहने लोग--
आयेंगे "अयोध्या".

फिर सहम उठेगा सरयू का पानी,
एै "रंग"---
ये मुस्लिम बस्तियो में अल्लाह हू!
और हिन्दू बस्तियो में राम कहेंगे।

(राँची के सफ़र में)

(राँची के सफर मे)

तुम यूँ ही नही उतर आयी
मेरी गजल मे।
हमने तुम्हे देखा था,
राँची के सफर मे।
वे सादगी,वे हया
वे दिलकश मुस्कुराहट,
हाय!लुट गया था,मै
राँची के सफर मे।
मै अब भी तलाशता हूँ,
ऐ रंग,-तुम्हे अपने,
राँची के सफर मे।

Thursday, 23 November 2023

(कांच का ताजमहल था)

(काँच का ताज़महल था)
उस बेवफ़ा के हाथ से-----
गिरा और गिरके टुट गया,,,,,,,
ऐ,रंग----वे मेरा तोहफ़ा नही----
काँच का ताज़महल था।

(औरत के अंग)

(औरत के अंग)
हा मै औरत हू-----------
इसलिए तो तुम्हारे उन अंग विशेष,
को मै तकने भर से जान जाती हू,
कि तुम्हारी मंशा मेरे उन अंगो के-----
बस नोचने-खसोटने और मसलने से है।
जबकि एक औरत के वही अंग विशेष,
अपने पती के प्यार पाने के वक़्त भी,
शर्म ओढ़े रहते है,
क्योंकि उसमें किसी तरह की नोच-खसोट नही,
बल्कि एक-दुसरे के परम विश्वास का देव श्पर्श है।
हा!शायद तुम्हारा पुरुषपन अंदर से सध नही पाता,
किसी एक समर्पित अंग से बध नही पाता,
वरना तकते तो तुम्हें भी अपनी पत्नी का वे अंग,
उतना ही आकर्षित करता------------
जीतना की पर स्त्री या औरत का।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

Monday, 20 November 2023

(चिनार की शाखो पे)

(चिनार की शाखों पे)
बैठता है,आज भी
यादो का परिंदा 
चिनार की शाखो पे।
लगता है,आज भी हमे
कि,वे चुपके से 
मेरे पीछे खड़ी हो,
ऐ रंग,-रख देगी अपनी
नर्म अगुँलियाँ,
मेरी आँखो पे।
बैठता है,आज भी 
यादो का परिंदा 
चिनार की शाखो पे।

चिनार-एक पहाड़ी वृक्ष।

(एक दर्द कानपुर के नाम)

(एक दर्द कानपुर के नाम)
एै कानपुर------------
तेरे शहर में ये आँसुओ वाली ट्रेन,
हमे याद रहेगी।
ना भुलुंगा क्योकि---------
इस हादसे की मरसिया नीरज की तरह,
अब हमारे पास रहेगी।
मै जानता हु कि---------
तेरी फाइलो में गुम हो जायेगा ये दर्द,
तु सरकारी महकमा है!
पर जीना है उन घरो को ये हादसा,
उनके दिलो में आँसू रहेगा और-----
ता-उम्र ये चेहल्लुम की रात रहेगी।
एै कानपुर-----------
तेरी पटरियो से होके फिर गुजरेगी ट्रेन,
फिर उतरेंगे चढ़ेंगे मुसाफ़िर,
तेरी कानो मे---------
हर रोज एक नई आवाज़ रहेगी।
एै कानपुर----------
तेरे शहर में ये आँसुओ वाली ट्रेन,
हमें याद रहेगी।

@@@कानपुर ट्रेन हादसे पे लिखी एक गमज़दा रचना।

रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

(ठंड की रात)

(ठंड की रात)
तुमसे दुर-------------
ये तन्हा गुलाबी ठंड की रात।
और तेरे बुने हुये मफ़लर का श्पर्ष,
एक तेरे प्रेम सुगंध की तरह,
कट जाती है,बीना तेरे रहे भी-----
अपने रिश्तो के संम्बंध की रात।

Sunday, 19 November 2023

(मरुस्थल हो गया)

(मरुस्थल हो गया)
जाने कब--------------
मेरी संवेदनाये मर गई,,,
दिल मे---------
नागफ़नी और कैक्टस उग आये!
ऐ,रंग---------
मै आदमी से मरुस्थल हो गया।

(कुरान सी लगती हैं)

(कुर्आऩ सी लगती है)
हाँ!ये काफ़िरी है,मै कुब़ूल करता हूँ,,,,,,,,
कि ऐ,रंग---------मुझे-------
गरीब की बिटियाँ कुर्आन सी लगती है।

Saturday, 18 November 2023

(तब्बसूम चली गई)

(तब्बसुम चली गई)

तुम्हें विदा करे उर्दू
या फिर विदा करे हिंदी
लेकिन---
तेरे जाने से
तहज़ीब के होठों से 
"तब्बसुम" चली गई 😥😥😥

रचनाकार--रंगनाथ द्विवेदी 
जनपद--जौनपुर (उत्तर प्रदेश)

"अलविदा तब्बसुम"💐💐💐

Friday, 17 November 2023

(ताजमहल)

(ताज़ महल)
ताज़ महल----------
मूहब्ब़त की पाकीज़गी है,
यहाँ मूमताज़ लेटी है।
मत करो इन पत्थरो पे,तुम सियासी वार-
ये आबरु-ए-हिन्द है-------
ना कि मूसलमान।
ऐ,रंग----यहाँ मोहब्ब़त------
आज भी साँस लेती है।

Monday, 13 November 2023

(औरत नही देखी)

(औरत नही देखी)
माथे पे चुहचुहाता पसीना-----
कमर पे खुशी साड़ी-----
और सर पे सीमेंट की भदेली,,,,,,,,,,
श्रम की मादक चाल------
ऐ,रंग----मेरी कविता ने कभी----
इतनी खूबसुरत औरत नही देखी।

(बाल दिवस)

(बाल दिवस है)
चाय की दुकान पे----------
सुट-बूट वाले साहब के,
अधरो पे सुलगते सिगरेट का कश है,
उस फैले धुँऐ में तेरह साल का बच्चा,
जूठे कप-प्लेट उठाता है,
जरा सा उसके मैले हाथो का श्पर्श
और माँ की गाली!
मासूम गालो पर------
बाल पकड़कर चंद चाटे,
देख रोटी-------
इतनी कम उम्र में इस बच्चे की भूख,
तेरी खातिर कितना विवश है!
इस मासूम को---------
अपनी पिड़ाओ की दुनिया से बाहर,
ये भी पता नही कि---------
कल तमाम देश के बच्चो के चाचा नेहरु का जन्मदिन,
यानी की बाल दिवस है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.7800824758

(ओढ़नी)

(ओढ़नी)
याद है बचपन---------
मैं पहले कहाँ ओढ़ती थी ओढ़नी।
वे तो जब मैं तेरह की हुई,
तो अचानक-माँ ने डाँटना शुरु किया,
और कहने लगी-----------
अब अपने सीने पे तुम रंखा करो ओढ़नी।
मैं चौंकी-----------------
कि ये अचानक माँ को क्या हुआ?
फिर लगा नही कुछ तो है,
यूँही नही माँ रखवाना चाहती होगी----
सीने पे ओढ़नी।
फिर कमरे में बंद कर,
खुद को शीशे में टटोलने लगी,
तो अचानक कुछ शर्म सी आई,
कुछ बदला सा था,
जहाँ माँ ने कहा था-रखने को ओढ़नी।
मै बाहर निकली----------
तो देखा बचपन को खिसकते,
लगा माँ कि कितना सच कह रही थी,
कि तु सयानी हो रही है,
क्योंकि कुछ लोग तक रहे थे,
एै,रंग------वही जहां माँ ने कहा था,
रख लो तुम ओढ़नी।

####एक सयानी होती हुई लड़की के वे तमाम चित्र इस रचना में है!गर सच लिखु तो इस कविता की ओढ़नी वाली वे तेरह साल की लड़की बन मैने--इस कविता को जिवंत लिखने की कोशिश की है,इसपे मै कितना खरा उतरा ये तो आप सभी सुधीजन पाठको पे है।
13/11/22 को बधाई प्रिय मित्र आज राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित हुई आपकी मार्मिक कहानी

Thursday, 9 November 2023

(मंटो भूखा है)

(मन्टो भूखा है)
उसका सारा सौन्दर्य बोध
फिका है।
वे "काली सलवार","सरकन्डो के पीछे"
की मजबुरी,
उसकी वेश्या-
दो दिनो से भुखी है,
और खुद हफ्तो से-
सदाअत-हसन-मन्टो भुखा है।
ऐ रंग,-आज रायल्टी लाखो मिलती है
उसकी किताबो के
पर हमे लगता है कि आज भी
सदाअत-हसन-मंटो भुखा है।

विशेष-पाकिस्तान का बहु-चर्चित कलमकार,जो अपने जिन्दा रहते बदनाम रहा,मुकदमे लड़ता रहा,भुखा रहा,उसकी कहानियो को अश्लील कहा।पर इसी दुनिया ने उसके मरणोपरान्त उसे विश्व साहित्यकार कहा।

(राम वनवास में थे)

न्यायलय में भगवान श्री राम मंदिर के पक्ष में फैसला आने से कुछ पहले लिखी मेरी एक रचना 🌹🌹🙏🙏

(राम वनवास मे थे)

राम अपनी ही अयोध्या में-
जैसे कैदियों की लिबास मे थे.

लंका फतह करके लौटे,
तो फिर सियासत की--
"आजीवन कारावास" में थे.

उफ! मेज दर मेज फाइले उलझी,
कचहरी मे "रावण की आत्मा" अट्हास करती लगी,
सच वे हमारे आस्था की पेशी थी,
जिसे कानून तारीख कहता है,
वरना हमारे राम---
टेंट मे नज़रबंद
और एक असह्य पीडा़ की
संत्रास मे थे.

ये दर्द ,ये तड़प,
ये सरयू के विलाप के आँसू
अब शायद थम जाये,
कुछ घंटे मे बदल जाये ये दृश्य,
क्योंकि आज न्याय के मीलार्ड गगोई,
के हाथो ए "रंग"
निर्णय की घड़ी है,
इस घड़ी के लिये हम,
न जाने कितने वर्षो से
इंतजार मे थे,

आईये हम शपथ ले उस राम की,
और ईट रखे फैसले की----
चाहे वे मस्जिद हो,
या फिर मंदिर हमारे राम की
क्योंकि राम-----
अपने भाई के लिये ही चौदह वर्ष,
वनवास में थे.

रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी
जिला-जौनपुर.
Mo.no.7800824758

Wednesday, 8 November 2023

(पति पत्नी कहा होते हैं)

(पति पत्नी कहां होते है)
हम कमरे में----------------
अब पति पत्नी कहां होते है?
बिस्तर तो वही है,
पर एैसा लगता है जैसे--------
अब उसपे दो अज़नबी सोते है।
टटोलना मुमकिन नही भीतर का सन्नाटा,
बस काम से लौटते थके कदम,
ही अब हमारे भीतर होते है।
फिर खिड़की से बाहर महानगर के,
न थमने वाली चुभती चिखती आवजे,
और हमारी शादी की सालगिरह पे,
वे गमले में लगाई,
बिल्कुल अपने जीवन की तरह,
कि नागफनी को एकटक देखते है,
फिर उदास टावल को उठा,
हम हाथ मुँह धोते है।
अब तो ये भी याद नही,
कि कब हम एक साथ बैठकर चाय पिये थे,
और किस बात पर हम साथ खिलखिलाये थे,
अब तो सामने है बस एक तन्हा खालि कप,
जिससे अब केवल होंठ भिगोते है,
और लेते है एक थकी साँस,
अब तो रिश्ते को जीते नही बस ढ़ोते है।
हम कमरे में------------
अब पति पत्नी कहां होते है?।
## # एक जिवंत रिश्ते के निरस हो जाने का आधुनिक दर्द।

(दंगा याद है)

(दंगा याद है)
हमें पुराना शहर याद है,
एक-एक गली मुहल्ला याद है।
वे कुर्आनखानी का खुरमा,
मुँह पोछती अपने दुपट्टे से,
अब्दुल की अम्मा याद है।
हमें पुराना शहर याद है!
राखी सुनि थी एक ब्राह्मन के घर,
आँख मे खुशियो के आँसू---------
मेरी इस कलाई को सलमा याद है।
हमें पुराना शहर याद है!
इतने सालों बाद देखा जब जला घर,
पुछा कहां गये ये सब,
तो नये शहर के बाशिंदो ने बताया,
तो अफसोस हुआ,रंग---------------
कि अब नये शहर को,
पुराने शहर की मोहब्बत नही,
नफरत,लाशे और दंगा याद है।
हमें पुराना शहर याद है।

(आखिरी सेल्फी)

(आखिरी सेल्फी)
तुम्हे-------------
कहा था कई मर्तबा,
पर तुम माने कहां,
रोज खिचते रहे-------
हमारी और अपनी निजी पलो की सेल्फी।
आज वे सभी शहर में वायरल हो गये,
मै नंगी गुजर रही हूँ सड़क से,
हर भूखी आँख देख रही है जैसे,
तुम्हारे द्वारा ली गई-------------
सहवास के पलो की वे सारी सेल्फी।
काश तुम मान गये होते!
तो आज ख़ुदकुशी न करती,
और न छोड़ती अपने सिरहाने,
तुम्हारे लिये मै-----------
अपनी आखिरी सेल्फी।
देखना ता उम्र-----------
अपनी डबडबाई आँखो से,
मै तुम्हारे बहुत पास रहुँगी,
कभी डिलिट नही होगी तुम्हारी जेहन से,
ये हमारी आखिरी सेल्फी।
## # आधुनिकता नितांत आवश्यक है पर आजकल कुछ घटनाये रोंगटे खड़ी कर दे रही है सेल्फी के द्वारा हमने एक भाव व्यक्त किया है,मेरा उद्देश्य किसी का समर्थन या विरोध नही है,धन्यवाद।

(कैंडल नाइट)

बहुत उदास है—————
आज हमारे तुम्हारे मोहब्बत की,
कैंडिल नाईट।
मै वही बैठी हूँ ठिक सामने,
बस वे जगह खाली है-
जहां तुम बैठते थे,
आज बहुत उदास है मेरे अंदर जिंदगी,
मै टुट रही हूँ!
मेरे संग बीत रही है,
बस तुम्हारे खूबसूरत यादो की—–
कैंडिल नाईट।
शायद कही चुक गये हम,
इसी से हमारे रिश्ते में गलतफ़हमी बढ़ती गई!
तुम अलग हो गये मै अलग हो गई,
अब तो अक्सर————–
डिनर मेज पे ही रह जाता है,
और मै कुर्सी पे बैठी यु ही,
गुजार देती हू————-
अपनी कैंडिल नाईट।
गर गुंजाइश हो तो लौट आओ,
एक मर्तबा ही सही मुआफ करने,
क्योंकि ऐ,रंग—–कही ऐसा न हो,
कि तेरा इंतजार करते-करते,
हमेशा के लिये बुझ जाये,
मेरी ये कैंडिल नाईट।

(बांसुरी का बचपन)

(बाँसुरी का बचपन)
तलाश रही हूं-----------
वे गुब्बारे और बाँसुरी का बचपन।
तलाश रही हूं----------
उड़ती तितलियाँ इस फूल से उस फूल,
और उन फूलो की पाँखुरी का बचपन।
बहुत पिछे छुट गया उम्र के साथ------
माँ की बाधि चुटिया और फ्राक पहने स्कूल जाना,
वे रास्ते में बुढ़ि दाई की अमरुद,
और जुम्मन चाचा के चुरन!
कुछ सिक्के हथेली के कितने ज्यादा थे,
अब यादो में है जैसे---------
एक परी का बचपन।
तलाश रही हूं---------
आज फिर मायके से ससुराल जाते,
अचानक नजर थम गई कुछ पल उस मोड़ पे-----------
जहां से कभी खरीदा करती थी गुब्बारे और बाँसुरी,
आज वे फेरीवाला नही दिखा,
एक हूक उठी---------
और मेरे अंदर यादो की आँख भर आई,
अब ता उम्र कचोटेगा मेरी यादो में------
वे गुब्बारे और बाँसुरी का बचपन।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.7800824758

(पांव रिक्शा)

चेहरे पे एक थकन————–
होंठो पे सुलगती बीड़ी,
पेट भरने की खातिर——–
सिने से खिचने को पाँव रिक्शा,
बाबू यही है अपना किस्सा।
तपती डामर की सड़क पे,
हम रोज लिखते है अपनी भूख,
बाबू यही है हमारी जिंदगी,
और सिने से खिचने को पाँव रिक्शा,
बाबू यही है अपना किस्सा।
कभी किसी पुलिसिये की बेजा गाली,
बीन किराये के उतरना,
चेहरे पे चंद थप्पड़,
और पसीने से भीगे तर-बतर चेहरे को,
मैले गमछे से पोछना,
फिर आगे बढ़ जाना पिके गुस्सा,
पेट की खातिर———–
सीने से खिचने को पाँव रिक्शा,
बाबू यही है अपना किस्सा।
छोटे बच्चे बीमार बीबी,टपकती छत,
अपनी घर से दुर खुले आसमान तले,
सुलगती बीड़ी फूटपाथ,
और अपने दाहिने हाथ से,
लोहे की सिकडी से बांध,लगा ताला
ठिक सिरहाने सारी रात खड़ा,
मेरी जिंदगी की तरह पाँव रिक्शा।

(माँ )

(माँ)

माँ-
    मै ढ़ेरो खाता हूँ,पर तेरी 
चुपड़ी रोटी की भूख-
रह जाती है.

आज सबकुछ है,
स्लीपवेल के गद्दे,एसी कमरे
पर नींद-
घण्टो नही आती है.

ऐ रंग यादो मे सिर्फ--
माँ की गोद,
और लोरी रह जाती है.

रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी.

Tuesday, 7 November 2023

(कश्मीरी पंडित)

(कश्मीरी पंडित)
वे बांगा दी बुलबुल-------
वे डलझील वे शीकारे--------
हमारी मिट्टी-ए-मोहब्बत कश्म़ीर,,
हमे ख्वाबो मे पुकारे।
ये सियासत-ए-साजिश-ए-अलगाव,
कि हम कश्म़ीरी पंडित पड़े है-------
खानाबदोशो से बदतर ऐ दिल्ली,
तेरी सड़को के किनारे।
वे गुल,वे केशर,वे सेब के बगीचे,
उफ!नही आती वे खूशबु ना आती है--
वैसी यहाँ तक हवा रे।
ये लाशे मईयत,ये रुह-ए-तड़प है,
ऐ,रंग---हम कैसे होगे जन्नतनशी----
ऐ कश्म़ीर तेरी पाक-ए-मिट्टी के बीना रे।
🤓😀व्यंग्य के व्याकरण पर रिसर्च करते हुए मुझे अचानक पता चला कि नेता शब्द "गिरगिट और सांप का ही एक पर्यायवाची नाम हैं "🤓😀

Monday, 6 November 2023

(दर्द के सीने में जलूंगी)

(दर्द के सीने मे जलुंगी)
ऐ दिवाली के दिये-----------
मै भी तेरे संग जलुंगी।
बस फर्क ये होगा कि------
तुम प्रीत की तीलि से जलोगे,,,
और मै विरह के तीलि से जलुंगी।
तुम मुँडेर,घर और दहलिज़ पे जलोगे--
रौशनी के लिये,
मै तो घुटुंगी,क्योकि मै वे दिया हूँ----
जो अपने ही दर्द के सीने मे जलुंगी।

(यही धारावी)

(यही धारावी)
मै रोज थकी मांदी,
काम से लौटती हूं जीने------
यही धारावी।
वे चारपाई पे लेटा है,धुत्त कच्ची पिये
गंदी गालियाँ दे रहा,
अभी जबरदस्ती खीचेगा,
मै अपनी ऊबकाईयां रोके,
बर्दाश्त करुंगी एक बलात्कार,
फिर उठुंगी वे सो जायेगा,
थका मांदा!
मै उल्टीयां कर,
पुरे बदन से अपने एै,रंग-------
छुड़ाऊँगी सारी रात मै यही धारवी।

Sunday, 5 November 2023

(पूजा का वक्त था या अजान का)

(पूजा का वक्त था या अजान का)
मंदिर और मस्जिद के बीच,
सड़क के किनारे झाड़ियो मे-------
हमने एक औरत की नग्न लाश देखी।
और उसके दोनो स्तनो पे
खुरचने के निशान देखे!
और वे दोनो स्तन----------
मंदिर और मस्जिद की तरफ लटके हुये थे,
कितने असहाय थे बताने में,
उस नग्न औरत के दोनो स्तन ऐ,रंग-----
कि वे पूजा का वक्त था या अजान का।
## # मेरी इस रचना को वलगेरेटी के लिहाज से न पढ़े,इस तरह की एक लाश शायद डेढ़ वर्ष पहले देखी थी ये उसी से प्रेरित है,फिर भी गर कही से भूलवश कोई आहत होता हो तो हम उससे माफी मागते है-----धन्यवाद।

(शहनाज का मेकप नही करती)

(शहनाज़ का मेकप नही करती)
हमारी गज़ल वे खूबसूरत औरत है,
जो कभी शहनाज़ का मेकप नही करती।
वे सादगी और सलिके की रस्म़ है,
वे जिधर से गुजरती है निगाहे पाकिज़ा,
अपने सर से दुपट्टे को ओझल नही करती।
हमारी गज़ल--------------------
ये जीनत है ज़मी की आयत है,
ये ज़न्नत से घर को कभी दोज़ख नही करती।
हमारी गज़ल-----------------------
ऐ,रंग----इसकी दुनिया फकत शौहर है,
ये हवस के मारो की तरह कभी ब्रेकप नही करती।

(ठंड की रात)

(ठंड की रात)
तुमसे दुर-------------
ये तन्हा गुलाबी ठंड की रात।
और तेरे बुने हुये मफ़लर का श्पर्ष,
एक तेरे प्रेम सुगंध की तरह,
कट जाती है,बीना तेरे रहे भी-----
अपने रिश्तो के संम्बंध की रात।

(मैं भी कुम्हार हूं)

(मै भी कुम्हार हूँ)
हा मै भी----------------
अपने गीतो की चाकी पे,
शब्दो की मिट्टी रख,
कुछ गीत------------
उसके दिवाली के दीये की तरह बनाता हूँ।
वे भी कुम्हार है मिट्टी के दियले का,
और मै भी कुम्हार हूँ-------
अपने गीतो का।
वे उपले की आँच में,
पकाता है दियलो को और मै--------
अपने हृदय के उपलो की आँच में,
गीतो के शब्द पकाता हूँ।

(पहली सी दिवाली ना रही)

( पहली सी दिवाली न रही )
वे पोखर न रहा, वे चाकी न रही
अब मेरे गाँव मे--------
पहली सी दिवाली न रही.
वे अगले जन्म घर के मासूम बच्चो को छछुंदर होने से, 
बचाने के लिये,
घर मे एक बड़े से दियले मे--------
काजल पालने वाली काकी न रही.
वे उल्लास, वे पटाखे, थोड़े मे खुश हो जाना,
कितना सोंधापन था,
आज चाईनीज़ टिमटिमाते झालर जल रहे,
लेकिन उनमें---------
वे प्यार व छुअन कही बाकी न रही.
अब तो बस पथरायापन ही खुरचना है,
क्योंकि माँ के साथ बैठ,
कमरे मे एक-एक दिये मे तेल रखती,
हमारें गाँव की-----
रुपाली न रही.
वे पोखर न रहा,वे चाकी न रही
अब मेरे गाँव मे------
पहली सी दिवाली न रही.

@@@रचनाकार----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला---जौनपुर पिन नं.222002 (उत्तर-प्रदेश)
Mo.no.7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

Thursday, 2 November 2023

कल पारिवारिक और व्यक्तिगत यात्रा पर अमेरिका गए,,, साहित्य की समस्त विधाओं में एक समान पकड़ रखने वाले या वर्तमान हिन्दी साहित्य को समृद्ध करने का श्रेय जिन-साहित्यिक पुरोधाओ को सर्वाधिक जाता है उनमें से एक प्रमुख नाम "अरुण अर्णब खरे" सर का है,,, कल उनसे साहित्य की विभिन्न विधाओं पर ना सिर्फ मेरी वार्ता हुई बल्कि वर्तमान के तमाम कुछ बड़े नामो की चर्चा उनसे सुनना खासकर उनका "व्यंग्य लेखन तो हमारे समय की किसी साहित्यिक वसीयत की तरह है" उनका यह प्यार, स्नेह और आशीर्वाद मेरी छोटी सी लेखनीय के लिए एक हस्ताक्षर की तरह है ✍️✍️🙏🙏

(पटना से मोतिहारी)

(पटना से मोतीहारी)
जब भी मै-------------
जाता हूँ पटना से मोतीहारी।
बार-बार मेरी नजर------
उस ताम्बई लड़की को तलाशती है,
जो ऐसे ही एक सफर मे--------
सामने बैठी थी,
पटना से मोतीहारी।
अब भी एक हूक सी उठती है,
दिल मे---------
जब बीना उसके बैठे,
चल पड़ती है--------
अगले स्टेशन के लिये गाड़ी,
पटना से मोतीहारी।
ऐ,रंग-------------
ये सफर एक किताब है मेरी,
पटना से मोतीहारी।

(मिट्टी से जुदा मत करना)

(मिट्टी से जुदा मत करना)
बेटे मै बुढ़ि हो गई हूँ-------------
मुझे इस उम्र में अपने अब्बु से जुदा मत करना।
ना बेचना किसी को-------------
दरवाज़े पे जो उन्होनें लगाया है दरख्त़,
मै उसी से बतियाती हूँ अक्सर,
मुझे दर्द होगा------------
जब कोई काटेगा टंगारे से तेरी अब्बु की याद को।
बेटा बेशक तु मुझे हज़ ना कराना,
पर लेने देना मुझे आखिरी साँस इस मकान में,
मर जाऊँ तो तेरा हक है इस पर,
पर जीते जी मेरे बेटे,
अपनी इस अम्मी को अपने अब्बु के-----
इस मुकद्दस मिट्टी से जुदा मत करना।

Wednesday, 1 November 2023

(मदिरा की गली में)

(मदिरा की गली मे)
हमने देखा है,ये प्रेम बस-------
मदिरा की गली मे।
कि राम चुस्कियाँ लेते है,
भूल कौम,मज़हब---------
और खुद डालते है मदिरा,
गिलास-ए-अली मे।
ऐ,रंग----हमने देखा है,ये प्रेम बस----
मदिरा की गली मे।

(इनकाउंटर)

(आतंकियो का-----इनकाउंटर)
क्या है?
उन आतंकियो और तुममें कोई अंतर,
तमाम इंसानी जानो से खेलने वाले---
ये आततायी सही हलाक हुये,
भले सही या गलत था इनका इनकाउंटर।
पर सियासत तेरा स्तर----------
जिस्मानी तवायफ़ो से गया बीता है,
वे जिस्म देती है!
और तुम नामुराद उतार देते हो------
अपने मादरे वतन के पीठ खंजर।
सच एैसे दोगलो तुमपे उबकाई आती है,
तुम एक जहरीले----------
आस्तीनी साँप हो अपने ही घर के अंदर।

@@@कल के आतंकी इनकाउंटर का एक छोटा सा समर्थन।

(शहर के लोग)

(शहर के लोग)
मुझे नंगी सुला गये शहर के लोग!
एै खिज़ा के पत्तो--------
तुम कभी मेरी कब्र पे गिरना।
कितनी मोहब्बत थी गुसलखाने से,
रहने नहीं दिये एक इंतकाले सब-----
बड़े बेमुरौवत निकले शहर के लोग।
मुझे नंगी सुला गये शहर के लोग।
एै मौसमें सावन--------
तुम कभी मेरी दफ़न-ऐ-बदन पे गिरना!
कभी शफ़क चाँदनी में टहलती थी,
घंटो जिस छत पे,
ले चले उसी छत वाली गली से-----
मेरा जनाज़ा मेरी शहर के लोग।
मुझे नंगी सुला गये शहर के लोग।
एै चाँद वैसे ही शफ़क रातो की तरह,
मेरी इस रुहे बदन पे पड़ना,
मेरी तड़प है कि अब भुले से नही आते,
शहर तो शहर मेरे अपने घर के लोग।
मुझे नंगी सुला गये मेरे शहर के लोग।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758