Thursday, 27 June 2019

(ओ ! कनेर के फूल)

(ओ ! कनेर के फूल)

क्यों ? तुम्हें कोई चाहता नही,

गुलाब की तरह-------

ओ ! कनेर के फूल.

क्यों ? कोई रुपसी तुम्हें

अपने जुड़े मे जगह नही देती,

ओ ? कनेर के फूल.

क्यों ? किसी कब्र पे लोग,

तुम्हें चढ़ाते नही,

क्या ? उन मुर्दों को भी,

कुबूल नही तु-------

ओ ! कनेर के फूल.

क्यों ? कोई महसूस नही करता,

तेरा दर्द

क्यों ? तुम्हें सहलाने,प्यार देने

आता कोई माली------

ओ ! कनेर के फूल.

लिखते है शायर और कवि

सभी फूलो पे,

क्यो ? कोई शेर कोई कविता

तुमपे नही लिखता------

ओ ! कनेर के फूल.

क्यों ? तुम्हें कोई चाहता नही,

गुलाब की तरह-----

ओ ! कनेर के फूल.

@@@रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी.

जज कालोनी,मियांपुर

जिला--जौनपुर 222002 (U.P.)

Mo.no.7800824758

Monday, 3 June 2019

रविवार लिखा

(रविवार लिखा)

तुमने ही तो---------
मेरी दिल की डायरी में रविवार लिखा.
तुमने ही इसे फाड़ा,इसे ठुकराया
और--------
किसी गैर की डायरी में रविवार लिखा.
मेरे ख्वाब की आँख में रेत भर आई,
मै किसी------
मछली सा तड़पता हूं,
ये छुट्टी नही,
मेरी दर्द का दिन है,
फाड़ देता हूं इस दिन मै,
अपने घर का कैलेंडर भी----
जहां पढ़ता हूं रविवार लिखा.
अब तो इतनी सी दुआ है रब,
कि मेरी तरह ना तड़पे कोई,
और किसी की जिंदगी में न आये,
फिर इस तरह------
डायरी में रविवार लिखा.

@@@रचयिता--रंगनाथ द्विवेदी.
Mo.no.7800824758

अखबार लिखता था

(अखबार लिखता था)
वे कलम की रोशनाई से अपने,
एक आग लिखता था।
कल कत्ल हो गया उसका तिराहे पे,
जो अपने अखबार में इंकलाब लिखता था।
वे खुद को बेच न सका कभी,
सियासत के तवायफे महफ़िल मे,
वे मज़लूम की सिसकी को,
फकत आँसू नही तेजाब लिखता था।
अब तो ये लाश जलेगी बेशक,
इसमें सफेदपोश कातील भी सरिक होगा,
ये घड़ियाली आँसू सुख जायेंगे,
ऐ,रंग------कल फिर पैदा होगा
जो स्याह अँधेरे में जलायेगा चराग,
और सारी रात उकेरेगा सच का हौसला,
सुबह फिर लोग कहेंगे,
कि बहुत पहले हमारे शहर में-------
ऐसे ही एक शख्श़ अखबार लिखता था।

@@@पत्रकारिता दिवस के अवसर पर मै सभी पत्रकारो को बधाई देता हूँ जो विसंगतियो के बावजूद मज़लूम और सच की लड़ाई लड रहे है।व दैनिक हिन्दुस्तान के उस पत्रकार को मेरी ढ़ेरो श्रद्धांजलि जिनकी अभी प्रतापगढ़ में हत्या हुई है।

रंडी--एक विभत्स और भयावह यथार्थ

(रंडी---एक विभत्स और भयावह यथार्थ)
"अँधेरी रात मे-------
वे शहर की स्ट्रिट लाइट से टेक लगा,
अपना आधे से अधिक वक्षस्थल खोले,
किसी ग्राहक को रिझाने और लुभाने का प्रयास करती है,
किसी रात जब काफी प्रयासो के इतर,
कोई ग्राहक आता और रिझता नही दिखता,
तो अपनी निदाई आँखो की निद दुर करने को,
वे गाढ़ी और सुर्ख लिपस्टिक के उस तरफ,
अक्सर बीड़ी पीने से सँवलाये होंठो के बीच,
एक बीड़ी दबा--------------
बड़ी अश्लीलता और निर्लज्जता से वे अपने हाथो को,
अपने अधखुले वक्षस्थल मे डाल,
चारो तरफ जलाने को दियासलाई टटोलती है,
उस टटोलने मे स्त्रियोचित कोई संवेदना नही,
बल्कि बेरहमी से दियासलाई निकाल बीड़ी जला-----
कुछ तगड़े-तगड़े सुट्टे ले जब अपने नथुनो से धुआँ निकालती है,
तो उस धुँये की धुँध उसे अपनी एकलौती जीवन सखी लगती है,
कभी-कभी जब एकाध कस की शुरुआत मे ही किसी ग्राहक को आता देखती है,
तो उसे रोज अपनी तरह जली बीना बुझाये फेक,
कुछ इस तरह झुकती है,
कि उसके अधखुले वक्षस्थल थोड़ा और गहरे खुल,
ग्राहक को यौन मदांध कर बाबले और उतावले कर देते है,
उसकी इस झुकन की कलात्मकता ने ही उसे अब तक,
ज्यादा ग्राहक दिये है!
वे हर रात अपने ग्राहक को शिशे मे उतार,
इस स्ट्रिट लाइट की कुछ दुरी पे बने अपने उस दो कमरे की सिलन की बदबू से रचे बसे कोठरी मे ले जाती है,
और उसी कमरे की एक जर्जर तखत पे सो जाती है,
कभी इसी तखत पे दुल्हन की तरह सोने आई थी,
और इसी तखत पे सोने के लिये,
माँ-बाप का घर छोड़----------
प्रेमी के साथ भाग आई थी ये शायद उन्हिं की पीड़ा का श्राप है,
कि सुहाग तखत पे रंडी बन रह गई।
फिर समय के साथ मैने ख़ुदकुशी न की,
हाँ उस शरीर और अंग से बदला जरुर लेती हूँ,
जिसे अगर कुछ दिन और संभाल लेती तो एक औरत होने का,
संम्पुर्ण ऐहसास करती,
मै बलात भागी थी उसी बलात भागने ने जीवन नर्क कर दिया।
हर रात उसका ग्राहक तृप्त हो जब ये जुमले कहता है कि-----
तेरे अर्धखुले वक्षस्थल ब्लाउज मे तो सुंदर थे ही,
और आजाद हुये तो और कयामत व सुंदर हो गये,
ये सुन उसने हमेशा की तरह अपने ग्राहक को मन ही मन मादरजात गाली दे,
फिर अपने उस ब्लाउज को उठा एक रुटीन की तरह,
बीना किसी कोमलता के जबरदस्ती इधर-उधर ठुस,
और उस ठुसने की रगड़ को,
वे राड़ कह खूब हँसती है वे हँसी अपने को और पीड़ित करने की होती है,
फिर उसी तखत पे अस्त-ब्यस्त लेट,
एक रंडी की तरह पुरा दिन बीता उठती है,
नहा धुलकर,गाढ़ी लिपस्टिक लगा चल पड़ती है,
एक बीड़ी होठ पे लगाये उसी स्ट्रिट लाइट की तरफ,
वैसे ही खड़ी हो फिर किसी ग्राहक को,
अपने अधखुले ब्लाउज से रोज की तरह दिखाने अपना,
अाधे से अधिक खुला वक्षस्थल।

@@@एक अलग और दुसरे नेचर की वे रचना जो शायद हर बड़े-छोटे शहर की किसी स्ट्रिट लाइट की रौशनी मे ये पात्रा दिख जाये।

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.------7800824758