Wednesday, 28 February 2024

(बिटिया की आजादी)

(बिटियाँ की आजादी अच्छि नही लगती)
बचपन की आजाद चिड़ियाँ को,
बंदिशो मे बांध रहे है!
ऐ,रंग-----आज भी दुनियाँ को देखो----
बिटियाँ की आजादी अच्छि नही लगती।

(मुल्क जिंदाबाद)

(मूल्क़ जिंदाबाद)
आने वाली सदियाँ,करेंगी उसको याद,
उसने ख़ून के कतरे से लिखा----
मूल्क़ जिंदाबाद।
ऐ हूस्ऩ आज इतनी कागज़ पे जगह छोड
लिखने दे हमे,रंग---
उसके कनपटी की आखिरी गोली----
और मूल्क़ जिंदाबाद।

चंन्द्रशेषर आजाद की याद मे,मेरी भावनाओ के चंद फूल---वंदे मातरम,,,इंकलाब जिंदाबाद।

Tuesday, 27 February 2024

(भजन की बात)

(भजन की बात)
अखिलेश कह रहे------------
मोदी की नोटबंदी और कालेधन की बात!
राहुल कह रहे-------------
ढकोसला और नौटंकी है,
प्रधानमंत्री के रेडियो पे मन की बात।
बंद कमरे की तवायफ़-------------
जब थिरकेगी नंगे बदन,
तो उससे बेमानी है एै"रंग" करना-----
कंठी,माला और भजन की बात।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758
धन्यवाद!आपका दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और मेरे चुनावी कटाक्ष का।

(फटे दुपट्टे को रोज सिलती है)

(फटे दुपट्टे को रोज सिलती है)

जहां से रईस की बिटिया ने
हटा रखा है 
दुपट्टा अपना

ऐ,रंग--
वही पर गरीब की बिटिया,
बदन ढ़कने के लिये,
अपने फटे दुपट्टे को रोज सिलती है.

Sunday, 25 February 2024

(उर्दू घुट घुट के परदे में रही)

(उर्दू घुट-घुट के परदे मे रही)
मरदे तहज़ीब कत्ल करता रहा,
इसी से ऐ,रंग---सालो-साल,
हिन्दी अपनी पिड़ाओ के घुँघट मे,
और उर्दू----------
घुट-घुट के परदे मे रही।

(श्रीदेवी मर गई)

अलविदा हम और हमारे दौर के कला की बेमिसाल मुरत यानी श्रीदेवी को।
                         (श्रीदेवी मर गई)
श्रीदेवी आज तु----------
लाइट,ऐक्सन,कैमरा यानी सबको तन्हा और,
विरान कर गई।
देखो हमारी भीगी नम आँखे------
हम कोई ऐक्टिंग नही करते,
इसमे आज तेरे निभाये हर किरदार की वे----
हर एक सुरत उतर गई।
तु क्या जाने कि तेरे जाने से,
हमारी मुहब्बत के दरख्त़ो के सारे महबूब पत्तो को,
तु दर-बदर-कर गई।
हो सकता है कि इन दरख़्तो पे लगे फिर नये पत्ते,
फिर पहले सी बहार आये,
लेकिन तु क्या जाने कि किस तरह तेरे जाने से,
हमारे दौरे शाख की बुलबुल,
हमेशा कि खातिर हमारे मुहब्बत के शाख से उड़ गई।
शायद आसमां पे भी खुदा को,
अपनी सिनेमा की खातिर तेरे जैसे किरदार की जरुरत थी,
शायद आज इसी से---------
तु हमसे और हमारे जैसे तमाम चाहने वालो से बिछड़ गई।
सच यकीन नही हो रहा एै "रंग" आज-----
की हमारे दिल और हमारे सिनेमा की श्रीदेवी मर गई।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर---222002(u p)।
mo.no.-----7800824758

(दो घाव हो गए)

( दो घाव हो गए )

जिन उरोजों को ढ़क,
वे मासूम देखती थी,
कभी वात्सल्य का सपना.

ए "रंग "
उसके वही दोनों उरोंज,
गरीबी के चलते-
"दो घाव हो गए".

Saturday, 24 February 2024

(बसंत हूं)

( बसंत हूं )

मै रोज लद उठती हूँ"
आम के बौर सी,

गुलाबी शर्म ओढ़े!
ऐ,रंग--
मै अपने पिया के कमरे की
"बसंत हूं "

(ईश्क सल्फास की गोली है)

(इश्क़ सल्फ़ास की गोली है)

इश्क़ मे कहा मिलन,
कहा डोली है.

करने वाले पहले से जानते है,
ऐ,'रंग"
कि इश्क़----
सल्फ़ास की गोली है.

(उम्र की किताब)

(उम्र की किताब)

पुरे बदन में--
झुरझुरी सी उठ रही,

हे सखी!
बसंत पढ़े छेड़-छेड़,
मेरे उम्र की किताब.

Friday, 23 February 2024

(कसाब की बात)

(कसाब की बात)
गर्त में शिक्षा और किताब की बात,
चरित्रहीन भी करने लगे अब नकाब की बात!
पुरे साल फूकते रहे जो बागे गुलिस्ताँ-----
वे भी कर रहे अब गुलाब की बात।
थू कितनी गिर गयी है राजनीति,
कि चुनाव जितने के लिये एै"रंग",
करनी पड़ रही अमित शाह को भरे मंच से-
अब बरोजगारो के लिये जाब नही-------
बल्कि अर्थ बदल के एक आतंकी कसाब की बात।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और मेरे चुनावी कटाक्ष।

Thursday, 22 February 2024

(अबकी चुनाव में)

(अब की चुनाव)
कब्र,श्मशान,गधे से--------
कंम्परिजन है अब की चुनाव!
यानी कि किसी भी स्तर से---------
जितने का मिशन है अब की चुनाव!
किसको दोष दे-------------
सभी तो होड़ में है एै"रंग",
लग रहा कि जैसे-------------
नीचता का कंम्पटिशन है अब की चुनाव।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी!
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और मेरे चुनावी कटाक्ष का।

(आवारा किस्सों में याद रहूंगा)

(आवारा किस्सो मे याद रहुंगा)
एै दुनिया--------------------
मै अपने आवारा किस्सो मे याद रहुंगा।
किसी तवायफ के कोठे की वे बदनाम रौशनी,
जहां की सिढ़ियो पे पड़े थे मेरे पाँव,
मै उन अनगिनत-----------
कोठे की सिढ़ियो पे याद रहुंगा।
एै दुनिया------------
मै अपने आवारा किस्सो मे याद रहुंगा।
जब कही-------------
पीने-पिलाने वालो की बोतले खुलेंगी,
कहकहे और गम छलकेंगे,
मै एैसी हर जगह----------
की बदनाम चुस्कियो मे याद रहुंगा।
एै दुनिया-------------
मै अपने आवारा किस्सो मे याद रहुंगा।
बहुत कुछ लिखा है मेरी कलम ने------
मंदिर,मस्जिद,गुरुद्वारे पे,
लेकिन वे कुछ अलहदा नही आम सा लेखन है,
हाँ! एक किताब है जिसमे मैने---------
एक औरत को मुकम्मल नग्न कामुक,
शारिरीक संबंधो की तपती आँच पे लिखा है,
जो शायद मुझे अपने वक़्त का मंटो बना देगी,
लोग आहे भर पढ़ेगे!
तमाम अदब की मज़लिसो में आलिम-फाज़िल लोग मुझे उधेड़ेंगे,
मै उनकी उन्ही जलिल करते हुये----
हर्फो मे याद रहुंगा।
एै दुनिया----------
मै अपने आवारा किस्सो मे याद रहुंगा।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758
धन्यवाद!जोधपुर राजस्थान से प्रकाशित दैनिक नवज्योति के साप्ताहिक कालम नव ऐक्सप्रेस का जिसमें मेरी कविता"आवारा किस्सो में याद रहुंगा"प्रकाशित हुई इसके लिये मै बड़े भाई नरेन्द्र चुअरा व संपादक बड़े भाई प्रविण दवे का हृदय से धन्यवाद व्यक्त करता हूं।

(रविवार पत्रिका)

पिछले वर्ष दिल्ली से प्रकाशित मासिक पत्रिका "रविवार " की लेखकीय प्रति मुझे डाक से भेजनें के लिए संपादक बड़े भैया प्रमोद शर्मा का बहुत-बहुत धन्यवाद जिसमे मेरा एक लेख किसान आंदोलन से संबंधित प्रकाशित हुआ था🌹🌹🙏🙏

(हर साल खिलती है)

(हर साल खिलती है)

जो लगाई थी तुमने ,
कह के अपनी मोहब्बत की निशानी,
वे गुलदाउदी 
तुम्हारी तरह 
हर साल खिलती है.✍️✍️

Wednesday, 21 February 2024

(दैहिक रसखान हो)

(दैहिक रसखान हो)
हे गायत्री प्रजापति-----------
तुम सच मे महान हो,
इस चुनाव के तुम श्रेष्ठ आइकॉन हो!
मोदी क्या? कहेंगे तुम्हे कुछ,
उन्हे मालूम नही कि तुम---------
उस रेप वाली महिला के दैहिक रसखान हो।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और मेरे चुनावी कटाक्ष का।

(एक आवारा शाम हूं)

(एक आवारा शाम हूं )
धुँधला जाते है एै "रंग"----------
मेरी आगोश मे चेहरे,
मै शरीफ़ो के शहर की----
एक आवारा शाम हूं ।

हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श

"हिंदी साहित्य में--
स्त्री विमर्श के नाम पर,
मेरी साहित्यिक देह के साथ,
पुरुष साहित्यकारों से,
कही ज्यादा,
महिला साहित्यकारो ने----
मेरी साहित्यिक देह का,
शाब्दिक बलात्कार किया है " 😢😢

Tuesday, 20 February 2024

(राम बोला जाए)

(राम बोला जाये)
आओ अमन के लिये इस शहर मे------
एक मदरसा खोला जाये!
ऐ,रंग-------------
जहां हिन्दू लबो से अल्लाह हो अक़बर,
और मुस्ल़िम लबो से राम बोला जाये।

(दो गोद लिए बेटे)

(दो गोद लिये बेटे)
एै सत्ता तेरी खातिर-----------
किसी ने अपनाया तो किसी ने छोड़ दिये बेटे!
देख लो दशरथ और कैकेयी के इस प्रदेश को,
कि एै"रंग" कह रहे है कि बदल देंगे,
खुशहाली से इसकी शक्लो-सुरत--------
गुजरात से दो गोद लिये बेटे।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और आज के हमारे चुनावी कटाक्ष का।

(जुड़े में गुलाब)

(जूड़े का गुलाब)👌👌💐
अब भी रखा है,हमनें अपने कमरे में,
उनके जूड़े का गुलाब।
वही ख़ुशबू, वही सुगंध, वही चाहत,
ऐ"रंग"हमसे गुफ़्तगू करता है,-------
उनके जूड़े का ग़ुलाब।।👸👨😍😍💟🌹🌹🌹🌹

(हर साल खिलती है)

(हर साल खिलती है।)💐💐
जो लगाई थी तुमने ------
कह के अपने मोहब्बत की निशानी,
वे गुलदावदी---------
तुम्हारी तरह हर साल खिलती है।।।🌺🌻💐🌸😍😍💟💟

(औरत दर्द की मीना कुमारी है)

(औरत दर्द की मीना कुमारी है)

औरत प्यार मे
इस कदर डुब जाती है,
कि वार देती है खुद को,
फरेब की बाँहो मे।
फिर रोती बहुत है--
तन्हाई-घुटन जीती है,
बनके सुलगती है गीली लकड़ी,
ऐ,रंग--
औरत दर्द की मीना कुमारी है।

(चुड़ीहार हो जाऊं)

(चूड़ीहार हो जाऊं)

तुम्हारी चाहत में ,
सारी हदो से पार हो जाऊं 
तुम्हे देखने की ख़ातिर,
टहलूं तेरी गली,,
बेशक ऐ"रंग"-----
मैं,
ब्राह्मण से चुड़िहार हो जाऊं.

Monday, 19 February 2024

(पेट्रोल सी लागे है)

(पेट्रोल सी लागे है )

वे धीरे-धीरे मुझको कब्जाती जा रही है,
अपने रूप के जादू से,
ए "रंग" मुझे अब वे 
अच्छे दिन के धोखे में--
पेट्रोल सी लागे है.

(ब्राह्मण काफिर हो गया है)

(ब्राह्मण काफ़िर हो गया है)

मंदिर की गली से गुज़र जाता है,
तुम्हारी गली की तरफ!
तुम्हारी मोहब्बत मे---
एक ब्राह्मण काफ़िर हो गया है.

Sunday, 18 February 2024

(औरत के अंग)

(औरत के अंग)

हा मै औरत हू-----------
इसलिए तो तुम्हारे उन अंग विशेष,
को मै तकने भर से जान जाती हू,
कि तुम्हारी मंशा मेरे उन अंगो के-----
बस नोचने-खसोटने और मसलने से है।
जबकि एक औरत के वही अंग विशेष,
अपने पती के प्यार पाने के वक़्त भी,
शर्म ओढ़े रहते है,
क्योंकि उसमें किसी तरह की नोच-खसोट नही,
बल्कि एक-दुसरे के परम विश्वास का देव श्पर्श है।
हा!शायद तुम्हारा पुरुषपन अंदर से सध नही पाता,
किसी एक समर्पित अंग से बध नही पाता,
वरना तकते तो तुम्हें भी अपनी पत्नी का वे अंग,
उतना ही आकर्षित करता------------
जीतना की पर स्त्री या औरत का।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

(ओढनी)

ओढ़नी
याद है बचपन---------
मैं पहले कहाँ ओढ़ती थी ओढ़नी।
वे तो जब मैं तेरह की हुई,
तो अचानक-माँ ने डाँटना शुरु किया,
और कहने लगी-----------
अब अपने सीने पे तुम रंखा करो ओढ़नी।
मैं चौंकी-----------------
कि ये अचानक माँ को क्या हुआ?
फिर लगा नही कुछ तो है,
यूँही नही माँ रखवाना चाहती होगी----
सीने पे ओढ़नी।
फिर कमरे में बंद कर,
खुद को शीशे में टटोलने लगी,
तो अचानक कुछ शर्म सी आई,
कुछ बदला सा था,
जहाँ माँ ने कहा था-रखने को ओढ़नी।
मै बाहर निकली----------
तो देखा बचपन को खिसकते,
लगा माँ कि कितना सच कह रही थी,
कि तु सयानी हो रही है,
क्योंकि कुछ लोग तक रहे थे,
एै,रंग------वही जहां माँ ने कहा था,
रख लो तुम ओढ़नी।
### # एक सयानी होती हुई लड़की के वे तमाम चित्र इस रचना में है!गर सच लिखु तो इस कविता की ओढ़नी वाली वे तेरह साल की लड़की बन मैने--इस कविता को जिवंत लिखने की कोशिश की है,इसपे मै कितना खरा उतरा ये तो आप सभी सुधीजन पाठको पे।

(कैंदिल नाइट)

बहुत उदास है—————
आज हमारे तुम्हारे मोहब्बत की,
कैंडिल नाईट।
मै वही बैठी हूँ ठिक सामने,
बस वे जगह खाली है-
जहां तुम बैठते थे,
आज बहुत उदास है मेरे अंदर जिंदगी,
मै टुट रही हूँ!
मेरे संग बीत रही है,
बस तुम्हारे खूबसूरत यादो की—–
कैंडिल नाईट।
शायद कही चुक गये हम,
इसी से हमारे रिश्ते में गलतफ़हमी बढ़ती गई!
तुम अलग हो गये मै अलग हो गई,
अब तो अक्सर————–
डिनर मेज पे ही रह जाता है,
और मै कुर्सी पे बैठी यु ही,
गुजार देती हू————-
अपनी कैंडिल नाईट।
गर गुंजाइश हो तो लौट आओ,
एक मर्तबा ही सही मुआफ करने,
क्योंकि ऐ,रंग—–कही ऐसा न हो,
कि तेरा इंतजार करते-करते,
हमेशा के लिये बुझ जाये,
मेरी ये कैंडिल नाईट।

(सुलगती सिगरेट)

लगाये बैठा है—————-
होंठो पे अपनी वे सुलगती सिगरेट!
बगल में अनगिनत टुकड़े गिरे है,
धुआँ है!
उस कमरे में जिस कमरे में कभी तुम,
छिन के फेक दिया करती थी,
उसकी अधजली सिगरेट।
अब होंठ पे लगा भुल जाता है,
वे तो सुलगते-सुलगते,
जब होंठ के आखिरी सिरे पे पहुँचती है,
तो वे चौकता है!
फिर जला होंठो पे रख लेता है,
वे अपने एक नई सिगरेट।
और तकने लगता है दरवाजे की तरफ,
कि शायद तुम लौट के आओ,
छिन के फेकने इसके होंठो से,
अधजली सिगरेट।
एक सुबह———-
दरवाज़ा खुला था लोगो की भिड़ थी,
शायद कुछ देर पहले ही मरा है,
क्योंकि—————-
अभी भी उसकी होंठो पे एै,रंग
धीरे-धीरे आगे बढ़ रही बुझने के लिये,
बिल्कुल इसके जीवन की तरह——-
ये सुलगती सिगरेट।

(पूजा या अजान से ढकती है)

(पूजा या अजा़न से ढ़कती है)
मुझे उस मजबूर औरत की----------
टूटी चुड़ियो की आवाज़ ईधन की लगती है,
वे अपने ग्राहक की गर्म साँसो पे,
अपनी मजबूरीयो का-------------
कई दिनो से पड़ा हुआ ठंडा तवा रखती है।
उसकी चीख और पीड़ा में,
उसके भूखे बच्चो के खाली पेट भरने वाली रोटी-----------------
की खुशी दिखती है।
वे अपने कपड़े समेट ब्लाउज पहन,
जब अपनी उरोजो में ये रुपये रखती है,
तभी उसकी नज़र उसी कमरे मे--------
टंगे हुये एक माँ के नंंगे उरोज वाले,
कैलेंडर पर पड़ती है,
जो अपने मासूम बच्चे का पेट इसी उरोज से भरती है।
वे एक मर्तबा फिर-------------
इस कमरे मे से निकलने से पहले,
अपने बंद ब्लाउज में--------------
रंखे पैसो को अपने जख्मी उरोजो के बीच टटोलती है।
न जाने क्यू उसके वे दोनो उरोज,
हमारे दो किरदार से लगते है!
एै,रंग-----मुआफ करना
मैले हो जाते है फिर भी कभी-कभी ,
कुछ औरतो के यही उरोज,
चाहे वे इसे पूजा के आँचल या-------
किसी मस्जिद के अजान से ढ़कती है।

(सपेरे की बिटिया)

(सपेरे की बिटिया)
कभी पढ़ने आती थी हमारे स्कूल में,
सपेरो की बस्ती से---------------
एक सपेरे की बिटिया।
वे तमाम किस्से सुनाती थी साँपो के अक्सर,
वे खुद भी साँपो से खेलना जानती थी,
पर वे मासुम नही जानती थी,
इंसानी साँपो का जहर,
एक दिन-----------
उसी मासूम की नग्न लाश,
उसकी बस्ती से पहले--------
पड़ने वाले एक झुरमुट में पाई गई,
मै सिहर गया!
उस नग्न मासूम की लाश देख,
मै अब भी इतने सालो बाद भी-----
अपनी उस मासूम छात्रा को भूल नही पाता,
हर नाग पंचमी को वे मेरी जेहन मे
उभर आती है,
और पुछती है मुझसे कि बताईये न सर,
कि कैसे चुक गई,
अपने पुरे बदन पे रेंगे हुये नाखूनि साँपो से,
एक सपेरे की बिटिया।
@@@आप सभी को नाग पंचमी की बधाई।
## # रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
एडवोकेट कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।

(सावधान सामने चुनाव है)

(सावधान!सामने चुनाव है)
सावधान!
सामने चुनाव है।
आपको अपना बताना------
इनका राजनीतिक दाव है!
सावधान !
सामने चुनाव है।
इतने दिन याद नही आये,
अब कहते है----------
ये इनके पुरखो का गाँव है!
सावधान!
सामने चुनाव है।
मुसहर बस्ती की दशा ज्यो की त्यो,
भूखो मरा बुनकर,
उसकी बेवा के सामने घड़ियाली आँसू,
कुछ करने के वादे--------
चेहरे पे ताव है!
सावधान!
सामने चुनाव है।
झोपड़ी की रोटी-चटनी छक रहे,
खाट पे बैठे हँस रहे-------
बढ़ा काका और काकी से इनका लगाव है!
सावधान!
सामने चुनाव है।
इनका चरित्र समझ से परे,
एै,रंग----ये लोकतंत्र की आड़ है,
वरना कोयल की कुक में-----
ये कौवो की काँव है!
सावधान!
सामने चुनाव है।
@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर----222002
mo.no.7800824758

धन्यवाद!दैनिक भारत संवाद के संपादक बड़े भईया अशोक सत्यवीर जी का जिन्होने आज के साहित्यिक परिशिष्ट मे मेरी कविता"सावधान!सामने चुनाव है"को अपना बहुमूल्य स्नेह दिया।

(मुसलमान में बांटकर)

(मुसलमान मे बांटकर)
मडरा रहे है------------
हमारी खुशियो के आसमान पर,
देखो गिद्ध से चुनावी हेलिकॉप्टर!
ये जितेंगे,हारेंगे तभी एै"रंग"------
जब ये हमारे शहर से उड़ेंगे,
हमें हिन्दू और आपको मुसलमान में बांटकर।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और आज के मेरे चुनावी कटाक्ष का।

(रोटियों के से जलने के निशान मिलते है)

(रोटियो के से जलने के निशान मिलते है)
अँधेरी रात वे औरत है--------
जो सिसकती है फूटपाथ पे होंठ कुचलकर!
इसे पति की छुअन नही मिलती,
इसके पुरे बदन पे ऐ,रंग---------
बस रोटियो के से जलने के निशान मिलते है।

(याद के हर बुर्ज पर बैठी हो)

(याद के हर एक बूर्ज़ पे बैठी हो)
जुदा कर लोगी हमसे ये हुस्ऩे बदन लेकिन,
तुम उड़ न सकोगी,मेरी मौत से पहले!
क्यूँकि तुम हमारी----------
याद के हर एक बूर्ज़ पे बैठी हो।

(तेरे रूप की मदिरा)

(तेरे रुप की मदिरा)
तेरे रुप की मदिरा-----
मै बैठ के पीता रहा,अपनी आँख के चुल्लु से।
तेरे रुप की मदिरा-----
पढ़ने लगा कशीदा,ज्यो-ज्यो नशा हुआ,
ऐ,रंग--दिल शायर था,शब्द थे चीखने मे।
तेरे रुप की मदिरा----
मै बैठ के पीता रहा,अपनी आँख के चुल्लु से।

Saturday, 17 February 2024

(अपनी प्रीत के साथ)

आज मेरी श्रीमती जी के जन्मदिन का 41वाँ वर्ष है और ऐसे में उनके नाम मेरी एक प्रेम पाती ✍️✍️

(अपनी प्रीत के साथ)

हमारे भाव
हमारी गीत के साथ
मै जीता हूं
तुम्हारी प्रीत के साथ.

एक जन्म
और सात जन्म कम है
प्रिए ––
इस कायनात और श्रृष्टि 
के आखिरी क्षण तक 
तुम्ही मिलो 
उसी रस्म
और उसी रीत के साथ.

खिले फूल
गुलमुहर के फरवरी में
तुम सरसों सी शर्माओ
मेरी दिल के खेत में
मै तुम्हारे जन्मदिन की 
पगडंडियों पर चलूं 
और तुम्हें पढूं 
पहली चिट्ठी की तरह
और तुम लद जाओ
शर्म से ––
जैसे लदी थी कभी
तुम मेरी पहनाई हुई
सिंदूर और उसकी शीत के साथ.

🌹🌹🌹🌹♥️♥️♥️♥️♥️

(सरकार करती है)

(सरकार करती है)
जो सिनेमा में-------------
पैसे लेकर हर व्यभिचार करती है,
वही नायिका-----------
हमारे शहर में चुनाव प्रचार करती है!
शायद किरदार-किरदार का फरक है,
वरना एै"रंग"-----------
वही काम हमारे यहाँ सरकार करती है।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758
धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और मेरे चुनावी कटाक्ष का।

(जींस और टी शर्ट वाली औरतें)

(जींस और टी-शर्ट वालि औरते)
मुझे ये जींस और टी-शर्ट पहनी औरतो से,
ज्यादा खूबसूरत लगती है--------------
घर की गृहस्थ साड़ी पहनी औरते।
जिम्मेदारियो की इनके लोच और खम की रोमांटिकता,
मेरे अंदर एक सिहरन भर देती है,
उसके बालो का इधर-उधर का बिखरापन,
फिर उसकन लिये,
जूठे पड़े घर के बरतनो का माजना,
और उसपे हल्की-हल्की चुड़ियो की आवाज का संगीत,
ये संगीत क्या जाने?
क्लब मे भौंडे म्यूजिक पे थिरकती------
ये जींस और टी-शर्ट वाली औरते।
सेक्स अपील की विद्रुपता और अश्लील फिगर से,
कही ज्यादा खूबसूरत लगती है,
अपनी साड़ी खोसे,
उस गृहस्थ औरत का थकी-मादी उठ,
टाॅवल ले बाथरुम में,
शाॅवर के नीचे नहाना,
उसके नहाने की शालिनता का ये शास्त्रियपन,
को क्या जाने?
स्विमिंग-पुलो मे अर्धनग्न नहाती-------
ये जींस और टी-शर्ट वाली औरते।

@@@इस रचना का आशय किसी माडर्न या आधुनिक औरत को आहत करना कतई नही है ये महज़ एक रचना मात्र है।

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

(पल पल दिल के पास)

नमस्ते. 
प्रतीक्षा की घड़ियां समाप्त हुई, बड़े हर्ष के साथ हम सूचित करते हैं कि "पल पल दिल के पास " यानी कि 51 रचनाकारों का बहुप्रतीक्षित काव्य संग्रह अब हमारे हाथ में है. आप सभी सहयोगियों का बहुत-बहुत आभार. पुस्तक की एक लेखकीय प्रति रजिस्टर्ड डाक से बहुत जल्द ही आप सभी को भेजी जायेगी. इस बार 25 पुस्तकालयों को ही पुस्तक भेजेंगे. आप सभी जानते हैं कि यहाँ के साझा संग्रह में सिर्फ रचनाओं का स्तर ही पहचान है. कोई शुल्क या शर्त नहीं है. लेखकीय प्रति दी जाती है. 5 पुस्तकें "अवली", "इन्नर", "बारहबाना", "प्रभाती" और ये "पल पल दिल के पास" आ चुकीं. लगभग 300 रचनाकारों की रचनाएँ छप चुकीं. 

इसमें 51 रचनाकारों की रचनाओं के कारण पुस्तक थोड़ी मोटी अवश्य है लेकिन अच्छी प्रिंटिंग और अच्छी रचनाओं से युक्त है.

'इस बेहतरीन संकलन में शामिल होना मेरे लिए गर्व की बात है, सभी शामिल साथी रचनाकारों को हमारी हार्दिक बधाई "🌹🌹🌹🌹🙏🙏

“पल पल दिल के पास” के 51 रचनाकार–

श्री/सुश्री/ श्रीमती

1. रोहित ठाकुर- पटना-
2. निमिषा सिंघल- आगरा
3. डॉ. विनय कुमार श्रीवास्तव-प्रतापगढ़
4. कृष्ण सुकुमार- रुड़की
5. रंगनाथ दूबे- जौनपुर
6. डॉ रंजना जायसवाल- मिर्ज़ापुर
7. लक्ष्मीकांत मुकुल- बक्सर
8. ज्योति मिश्रा- पटना
9. गुड़िया कुमारी-पूर्णियाँ
10. किशोर दिवसे- पुणे
11. यामिनी नयन गुप्ता- रामपुर
12. डॉ गीता द्विवेदी- कानपुर
13. अनीता तिवारी – सिलीगुड़ी
14. डॉ लता अग्रवाल- भोपाल
15. कृति सिंह- हुगली, पश्चिम बंगाल
16. डॉ जया आनंद- नवी मुम्बई
17. रंजना फत्तेपुरकर- इंदौर
18. नीलोत्पल रमेश- हजारीबाग
19. तारकेश्वरी सुधि- जयपुर
20. सुनीता डी प्रसाद- झाँसी
21. भारती शर्मा- मथुरा
22. मधुकर वनमाली- मुजफ्फरपुर
23. अरविन्द यादव- इटावा
24. संजय शाण्डिल्य- वैशाली
25. अजय कुमार मिश्रा- लखनऊ
26. मृणाल आशुतोष- समस्तीपुर
27. सतीश कुमार सरदाना- गुड़गाँव
28. अनीता सिंह -पुदुच्चेरी
29. कान्ता घिल्डियाल- देहरादून
30. ज्योत्स्ना जोशी- देहरादून
31. विजयानंद विजय- बक्सर
32. नूतन कुमारी नव्या- पूर्णियाँ
33. मिथिलेश तिवारी मीत- लखनऊ
34. अनिल श्रीवास्तव अयान- सतना
35. कुणाल सिंह- प्रयागराज
36. नज़्म सुभाष- लखनऊ
37. सीमा शर्मा ‘सृजिता’- हाथरस
38. हेमा नौटियाल सागरिका- लखनऊ
39. वाचस्पति सौरभ रेणु- मोहाली
40. राजेश ओझा- वाराणसी
41. श्रीनारायण झा – गुड़गाँव
42. सोनल ओमर- कानपुर
43. डॉ भारती वर्मा बौड़ाई- देहरादून
44. श्रीमती दिलशाद सैफी – रायपुर
45. बबीता अग्रवाल कँवल- सिलीगुड़ी
46. फैयाज़ हुसैन- झाँसी
47. शीला तिवारी- बोकारो
48. राघवेन्द्र जी राघव- पूर्णिया
49. श्रीमती आदर्श मिश्रा- पुणे
50. श्रीहरि वाणी- कानपुर
51. बिन्दु प्रसाद कर्ण- राँची
धन्यवाद.

Friday, 16 February 2024

(एक्सीडेंट वाला फुटपाथ दिया है)

(एैक्सीडेंट वाला फुटपाथ दिया है)
अखिलेश कह रहे है कि हमने-----------
सौ,एक सौ दो और एक सौ आठ दिया है,
यानि की विकास मे सबका साथ दिया है!
देख लिजिये यमुना ऐक्सप्रेस वे,
लेकिन जनता तो ये भी पुछेगी मेरे सीयम(CM),
कि आपके चचा ने पुरे प्रदेश को हर कही खुदी सड़क---------
और ऐक्सीडेंट वाला फुटपाथ दिया है।
@@@रचयिता-------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और आज के मेरे चुनावी कटाक्ष का।

(आवारा मुसाफिर हूं)

(आवारा मुसाफ़िर हूँ)
किसी के गेसुओ के तले---------
मै जीवन गुजारु ये मुमकीन नही!
क्यूँकि ऐ,रंग----मै शौहर नही-----
खुद की जिंदगी का,
आवारा मुसाफ़िर हूँ।

(कलम तवायफ हो गई)

(कलम तवायफ़ हो गई)
पुरस्कार की खातिर----------
उसके सीने से दुपट्टा गिर गया,
उफ! अदब को ये दिन भी देखना था,
की दो-कौड़ी की सियासत की खातिर----
सच लिखने वाली कलम तवायफ़ हो गई।
थू मै गुमनाम मर जाऊ कुबूल लेकिन,
मुझे मेरे मालिक बचाये रखना,
वरना किसी गरीब की दहलीज़ का सच कौन लिखेगा?
गर औरो की तरह------------
मेरी कलम भी तवायफ़ हो गई।
इमारत,महफ़िले,रौशनी के उस तरफ
कुछ लाशे है जो दिख नही रही,
ये कुछ एैसे शख्स है,
जो ईधन है इनकी सियासत के,
मै इनकी झूठी तारीफ़ो मे थिरकू भरी बज्म़,
एै "रंग" इसका मतलब है कि हालातो के मद्दे-नज़र----
मेरी कलम भी तवायफ़ हो गई।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर (उत्तर-प्रदेश)
पीन नं-----222002 ।
mo.no.-----7800824758

Thursday, 15 February 2024

(हिंदी और उर्दू नही आती)

(हिन्दी और उर्दू नही आती)
चिलचिलाती धूप मे-------------
माथे से पसीना टपकता है साहब,
हम गरीबो के बदन से कभी-------
परफ्यूम की खुशबू नही आती।
हम इमारते मंदिर--मस्जिद सब बनाते है,
हमारे छाले फूटते है,भरते है,फिर फूटते है
साहब! हम गरीबो को रोटी के लाले रहते है,
आपके कुत्ते तलक केक खाते है,
हमारे झोपड़े तलक एक दिन की भी खातिर----
कभी ये अय्यासी नही आती।
हम अखबार,गीता--कुरान,मजहब का क्या करे?
हम गरीबो को तुम्हारे जाती-मजहब और दंगे की----
ठीक से हिन्दी और उर्दू नही आती।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.----7800824758

डॉक्टर अनुभूति गुप्ता

खीरी, उत्तर प्रदेश की अकेली महिला रेखा चित्रकार जिसके बनाए तमाम रेखा चित्र हंस,साहित्य अमृत,पाखी, हरिगंधा जैसी साहित्य जगत की उत्कृष्ट पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रहे हैं बल्कि उन्हें कई सरकारी व गैर सरकारी संस्थाओं ने भी इन्हें इनकी इस विधा के लिए सम्मानित व पुरस्कृत कर चुकी हैं ये कला की दुनिया की हमारी साहित्य मित्रो में "लियोनार्डो दी विंची" हैं इसके अलावा यह विभिन्न संकलनों की कुशल संपादक होने के साथ ही खुद एक उत्कृष्ट लेखिका हैं जो बेहतरीन कविताओं के साथ ही बेहतरीन लघुकथा भी लिखती हैं जो विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं.

एक तरह से एक नाम में इतने सारे रंग हैं मेरी दोस्त या मित्र में की मेरे खुद के नाम की भी सारी रंगत फिकी हो जाती हैं.

ऐसे में मेरी इस दोस्त ने अपनी मां की साहित्यिक यादों की स्मृतियों को इस साहित्य वार्षिकी "अनुवीणा" के द्वारा एक श्रद्धांजलि भी दी है ,पत्रिका की सम्पादक, कवयित्री एवं सुप्रसिद्ध रेखा चित्रकार डॉक्टर अनुभूति गुप्ता जी ने इसे अपनी माँ स्व. डॉ. बीना रानी गुप्ता जी की स्मृति को समर्पित किया है.

बेहतरीन लेखकों की कहानियों, लघुकथाओं और कविताओ से परिपूर्ण यह वार्षिकी सफेद मजबूत पन्नो और सुंदर छपाई के कारण भी अद्भुत बन पड़ा है, इस वार्षिकी को कई वर्ष तक भी अगर आप अपनी किताबों और पत्रिकाओं के डायर में रखेंगे तब भी यह कभी खराब होनें का नाम नही लेगी.

"निश्चित ही अनुविणा महज़ एक वार्षिकी ही नहीं, बल्कि एक बिटिया के द्वारा साकार की गई मां के यादों की एक पूरी पुष्पांजलि भी है."जिसमें मेरी भी लघुकथा शामिल हैं.

 एक बार पुनः मां को प्रणाम 🌹🌹🙏🙏

साथ ही मेरी तरफ से ढेर सारी बधाई व शुभकामना आपकों इन ढेर सारी उपलब्धियों के लिए दोस्त
डॉक्टर अनुभूति गुप्ता ✍️✍️✍️✍️

Wednesday, 14 February 2024

(मोहब्बत भगत सिंह की)

(मोहब्बत--भगत सिंह की)
पगला चुम रहा था,बार-बार पढ़के---
मौत की चिट्ठी।
ऐ,रंग--अग्रेंज भी हैरा थे--
देख मोहब्बत------
                  भगत सिंह की।

आज ही के दिन मौत की चिट्ठी भगत सिह को भेजी गयी थी---आज ही के दिन उस शहीद का भी वेलेनटाईन-डे है जिसे मै विश करता हूँ।

(चांदी का आकाश देंगे)

(चाँदी का आकाश देंगे)
हर गरीब को-----------------
एक नल,एक आवास देंगे!
विधवा को पेंशन,नंगे को लिबास देंगे,
गाँव मे बुनकर के फिर अच्छे दिन आयेंगे,
ये एैसा विश्वास देंगे।
यही तो नेता कि खूबी है एै"रंग"
कि ये चुनाव तलक अपने मुँह से-----
सबको सोने की धरती और चाँदी का आकाश देंगे।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758
धन्यवाद!निर्मेश के त्यागी भईया,दैनिक वर्तमान अंकुर और हमेशा की तरह मेरे चुनावी कटाक्ष का।

(मेरे जुड़े में गुलाब)

(मेरे जुड़े मे गुलाब)
मै आज भी----------
पहले छुवन सी सिहर उठती हूं!
जब आप टांकते हो मेरे जुड़े मे गुलाब।
सच मेरी इस खुशकिस्मती का अंदाज़ा,
शायद आप न करते हो,
पर मै अपनी शर्मिली आँख मुँदे,
जुड़े मे लगाते हुये इस गुलाब के फूल सी,
आपको अपने पुरे बदन पे महसुस करती हूं!
ये रोमानियत ही---------
हमारे और आपके प्यार के बीच,
कि वे घूँघट है----------
जिसे मै आधे निकले हुये चाँद की तरह,
अपने चेहरे पे डाले रखना चाहती हूं,
और नहाना चाहती हू----------
आपके मेरे जुड़े में लगाये हुये या टांके हुये,
इस गुलाब की तरह हर मौसम,
कि उस गुलाबी बूँद से,
जिससे निखर के खिलती है ये गुलाब------
और इस गुलाब की एक-एक पंखुड़ी।
बस यही इच्छा है कि-----------
मुझे एैसे ही चाहना ता-उम्र,
और एैसे ही टांकना मेरे जुड़े में गुलाब।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर-------उत्तर-प्रदेश।
धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर निर्मेश के त्यागी भईया इस रचना को अपना बेशकिमती स्@
@@आप सभी को वेलेनटाईन डे की ढ़ेर सारी बधाई।

(कारगिल रह गया)

(करगिल रह गया)

सरहद से नही लौटा,
एक नई दुल्हन का वही दिल रह गया.
सीने पर थे, गोलियो के निशान,
उसकी खुली आँखो मे,
लहराता तिरंगा और करगिल रह गया.

माँ भुलती नही जार-जार रोती है,
उसे गम नही,
अपने एकलौते बेटे की शहादत का,
उसे गम है कि सरहद के उस तरफ,
तमाम साँप--
और उन साँपो का बील रह गया.

राखी के दिन बहन उसकी---
बंद कमरे मे सुनती है राष्ट्रगान,
और फक्र करती है 
अपने उस भाई पर 
ऐ "रंग"----
जिसकी वजह से 
हिंद के नक्शे में करगिल रह गया.

यह रचना मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित हैं.

रचनाकार--- रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियापुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
mo.no.7800824758
rangnathdubey90@gmail.com

Monday, 12 February 2024

(मेरी दुनिया लूटी जा रही)

(मेरी दुनिया लुटी जा रही)
कुछ जली जा रही,कुछ बुझी जा रही,
मै चुप हूं-----------
मेरी दुनिया लुटी जा रही।
वे मेहंदी लगाये,शादी के जोड़े मे खुद को छिपाये----------
मेरी बेबसी पे हँसी जा रही।
कुछ जली...................
है उसकी विदाई अपने बाबुल के घर से,
वे नया घर बसाने-------------
मेरा घर जला के चली जा रही।
कुछ जली...................
रोको कोई दो वास्ता उसको मेरी वफा का,
हाय!ठुकराके मेरे अश्को की मेहर---------
वे बेवफ़ा क्यू चली जा रही।
कुछ जली.....................
मै जिऊँगा भला अब किसके सहारे,
मेरी साँस थमने लगी है ये देखो------
वे मेरी लाश छोड़े चली जा रही।
कुछ जली..................
एै"रंग" लिख दे तु अब गज़ल मे कफ़न,
क्योंकि वे कफ़न भी संगदिल लिये जा रही।
कुछ जली जा रही,कुछ बुझी जा रही,
मै चुप हूं-----------
मेरी दुनिया लुटी जा रही।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-------7800824758

शुक्रिया!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया एक अलहदा किस्म की रचना को स्नेह देने के लिये।

(मुसलमान लड़की)

(मुसलमां लड़की)

हम रेत पर घरौंदे नहीं,
अगल-बगल दो कब्र बनाते है.

और उसपे लिखते है,मोहब्बत.

ऐ रंग---
एक दिन हमारी रुह मिलेगी यही,
तब मै ना हिंदू रहूंगा
ना वे मुसलमां लड़की.

रंगनाथ द्विवेदी

Sunday, 11 February 2024

(घृणित अतीत रहे है)

(घिनौने और घृणित अतीत रहे है)
मथुरा के----------------
एक प्रत्याशी महिला को पीट रहे है!
निर्लज्जता उसपे भी-----------
कि वे चुनाव अत्यधिक मतो से जीत रहे है।
वाह!रे पार्टियो के चरित्र-----------
कि तुम्हारी पार्टियो से अब टिकट भी वही पा रहे,
जिनके जितने घिनौने और घृणित अतीत रहे है।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

धन्यवाद!डेली वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और मेरे चुनावी कटाक्ष का।

(तारे जमीं पर)

(तारे ज़मी पर)
ना समझना कभी बोझ-इनको अपने पापा-मम्मी पर,
ना हँसना कभी दोस्त इनकी कमी पर।
हासिल करेंगे ये भी सारी सफलता------------
जब चमकेंगे एक दिन ये तारे ज़मी पर।

 @@विकलाँग(दिव्यांग) बच्चो के प्यार व स्नेह को समर्पित एक रचना।

(लोकतंत्र)

(लोकतंत्र)
आम आदमी को दिल मे पैबस्त करती है,
ये झुठ के सारे मुल्लमे ध्वस्त करती है।
ऐ,रंग----लोकतंत्र मे लोक इसकी आत्मा है।
ये वोट दे खुद को स्पष्ट करती है।
महिलाओं की बहुचर्चित मासिक पत्रिका गृहलक्ष्मी के जनवरी-23 के अंक में प्रकाशित मेरी कहानी के लिए फरवरी अंक की गृहलक्ष्मी में एक पाठकीय प्रतिक्रिया ✍️✍️✍️✍️

Saturday, 10 February 2024

(ड्यूटी देंगे)

(ड्यूटी देंगे)
न जाने कैसे-कैसे वादो की ये बूटी देंगे,
किसी जनसभा मे लैपटॉप तो किसी जनसभा में स्कूटी देंगे!
सब चुनावी फरेब की ये महज़ लिफाफेबाजी है,
इतने सालो से दिया नही अब कह रहे है कि एै"रंग"----
हम हर बेरोजगार को प्रदेश मे कोई न कोई काम,
या कोई न कोई ड्यूटी देंगे।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और आज के मेरे चुनावी कटाक्ष का।

(डेयरी मिल्क का रैपर)

(डेयरी मिल्क का रैपर)
मै तेरी चाहत की यादो से------
सिहर उठती हूँ आज भी!
जब तुम फाड़ते हो मेरे लिये------
उसी अपनी पुरानी अदा से--डेयरी मिल्क का रैपर।

@@@आप सभी मोहब्बत करने वालो को चाॅकलेट डे की ढ़ेर सारी बधाई।

Friday, 9 February 2024

(मेरे जुड़े में गुलाब)

(मेरे जुड़े मे गुलाब)

मै आज भी----
आपके उस पहली छुवन सी,
सिहर उठती हूं!
जब आप टांकते हो मेरे जुड़े मे गुलाब.
उस समय आपको 
शायद मेरी इस खुशनसीबी का अंदाज़ा,
ना होता हो,
पर मै अपनी शर्मिली आँख मुँदे,
जुड़े मे टांकते हुए गुलाब की
तरह मै,
आपकी अंगुलियों के स्पर्श को
अपने पुरे बदन पे महसुस करती हूं!
ये रोमानियत ही----
हमारे और आपके प्यार के बीच,
कि वे घूँघट है,
जिसे मै आधे निकले हुये चाँद की तरह,
अपने चेहरे पे डाले रखना चाहती हूं,
और नहाना चाहती हू--
आपके मेरे जुड़े में टांके हुये,
इस गुलाब की तरह हर मौसम,
कि उस गुलाबी बूँद से,
जिससे निखर के खिलती है ये गुलाब--
और इस गुलाब की एक-एक पंखुड़ी।
बस यही इच्छा है कि----
मुझे एैसे ही चाहना ता-उम्र,
और एैसे ही टांकना
आप मेरे जुड़े में गुलाब.

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर-222002 (उत्तर-प्रदेश)
Mo.no-7800824758

(बेवकूफ मुसलमान नही)

(बेवकूफ मुसलमान नहीं है)

किसी की भी राह आसान नहीं हैं 
अपनी जीत पक्की बताओ 
लेकिन गौर करो---
तो तुम्हारी चीख में वे जान नहीं है !

बस मुसलमान-मुसलमान तुम सब रट रहे 
शायद अबकी उत्तर-प्रदेश,
तुम्हारी नज़र मे हिन्दुस्तान नही है!

ए"रंग" सारा मुलम्मा 
तेरे धोखे का उतर जायेगा--
क्योंकि इतना भी बेवकूफ 
मुसलमान नही है.

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर
mo.no.----7800824758

Monday, 5 February 2024

(उन्मुक्त होना चाहती हूं)

(उन्मुक्त होना चाहती हू)
मै फिर से बचपन की तरह-------
स्वछंद और उन्मुक्त होना चाहती हू।
जीना चाहती हु मखमली पल,
भरना चाहती हू फिर----------
हिरनी के मेमनें की तरह कुलांचे,
और पियराई सरसो के बीच,
फिर खड़ी होने की चाह,
वे बासंती हवा का श्पर्श,
फिर शर्म की सिहरन से शर्माई आँखे,
अपनी थरथराती--------------
हथेली से ढकना चाहती हू।
मै फिर से बचपन की तरह-------
स्वछंद और उन्मुक्त होना चाहती हू।
इधर-उधर लापरवाह से वे खुले बाल,
वे बीना ओढ़नी----------
खेतो की मेड़ो पे चलना,
बीना किसी डाट,बीना किसी डर के,
एै जिंदगी------------
मै फिर से अपनी साँसो में,
वही बचपन बोना चाहती हू।
मै फिर से बचपन की तरह-------
स्वछंद और उन्मुक्त होना चाहती हू।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

कथन

✍️✍️भारतीय महिलाओं की मांग का सिंदूर उन्हें विश्व दुनियां की अन्य खूबसूरत महिलाओं से अलग करता हैं 🌹🌹

Sunday, 4 February 2024

(आपके सीने से लग)

(आपके सीने से लग)
मै बहुत संम्भाल के रखती हूँ,
अपने सुहागरात की नथ।
ये वही गहना है--------
जिसे आप अब भी,उतारते है पहले की तरह!
मै इतने सालो के बाद भी-----
शर्मा जाती हुँ आपके सीने से लग।

(आवारा किस्सों में याद रहूंगा)

(आवारा किस्सो मे याद रहुंगा)
एै दुनिया--------------------
मै अपने आवारा किस्सो मे याद रहुंगा।
किसी तवायफ के कोठे की वे बदनाम रौशनी,
जहां की सिढ़ियो पे पड़े थे मेरे पाँव,
मै उन अनगिनत-----------
कोठे की सिढ़ियो पे याद रहुंगा।
एै दुनिया------------
मै अपने आवारा किस्सो मे याद रहुंगा।
जब कही-------------
पीने-पिलाने वालो की बोतले खुलेंगी,
कहकहे और गम छलकेंगे,
मै एैसी हर जगह----------
की बदनाम चुस्कियो मे याद रहुंगा।
एै दुनिया-------------
मै अपने आवारा किस्सो मे याद रहुंगा।
बहुत कुछ लिखा है मेरी कलम ने------
मंदिर,मस्जिद,गुरुद्वारे पे,
लेकिन वे कुछ अलहदा नही आम सा लेखन है,
हाँ! एक किताब है जिसमे मैने---------
एक औरत को मुकम्मल नग्न कामुक,
शारिरीक संबंधो की तपती आँच पे लिखा है,
जो शायद मुझे अपने वक़्त का मंटो बना देगी,
लोग आहे भर पढ़ेगे!
तमाम अदब की मज़लिसो में आलिम-फाज़िल लोग मुझे उधेड़ेंगे,
मै उनकी उन्ही जलिल करते हुये----
हर्फो मे याद रहुंगा।
एै दुनिया----------
मै अपने आवारा किस्सो मे याद रहुंगा।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

धन्यवाद!दैनिक वर्तमान-अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया इस नवाज़िश के लिये।

जोक

हंसने और जबरदस्ती खीस निपोरने में बहुत अंतर है🥸हंसने से आप लंबे समय तक स्वस्थ्य रह सकती हैं और जबरदस्ती खीस निपोरने से आपके खूबसूरत गालों की मांसपेशियों में खिंचाव आ सकता है♥️✍️

Thursday, 1 February 2024

(चूल्हा नही जलता)

(चूल्हा नही जलता)
तुम तो बात-बात मे शहर जलाना जानते हो,
तुम्हारे पास तो कौमो को जलाने का ईधन है।
पर यहां फाँकाकशी सोने नही देती,
पेट तो जलता है,रंग--------
पर इस बस्ती में अक्सर चूल्हा नही जलता।

(बीसो बसंत जिलू)

( बीसों बसंत जिलूं )

बीसों बसंत मै सजी---
पोर-पोर गदराई, खुद को देख-देख,
बीसों बसंत मै सजी.

कोयल हुई बाँवरी-
बागो में कूक-कूक कर,
भँवरा हुआ पागल, महुवे को चुमकर,
मेरे अधर कुँवारे,
मै कुँवारी अंग-अंग---
बीसों बसंत मै सजी.

यौवन कलश छलके बूँद-बूँद कर,
आँखे हुई बाँवरी,
मेरी पिया दरस को,
हे!बसंत सखी अब तुम----
कोई ऐसी बान मारो
कि आये बाबुल के गाँव,
मेरे पिया की डोली
और मै बैठ चलूं उसमे, अपने पिया के गाँव,
बीसों बसंत मै सजी.

वे घूँघट उलट के देखे मै शर्म से गडु,
और उनके छुवन की सिहरन,
से कांपे अधर मेरे,
और उस कंपकपी की रात को,
मैं अब तलक सहेजे,
अपने बीसों बसंत जिलूं.

यह रचना मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है.

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर 222002 (U P)
mo.no.7800824758
rangnathdubey90@gmail.com

मादक बसंत।