Saturday, 28 March 2026

कैंडल नाइट

(कैंडिल नाइट)
बहुत उदास है—————
आज हमारे तुम्हारे मोहब्बत की,
कैंडिल नाईट।
मै वही बैठी हूँ ठिक सामने,
बस वे जगह खाली है-
जहां तुम बैठते थे,
आज बहुत उदास है मेरे अंदर जिंदगी,
मै टुट रही हूँ!
मेरे संग बीत रही है,
बस तुम्हारे खूबसूरत यादो की—–
कैंडिल नाईट।
शायद कही चुक गये हम,
इसी से हमारे रिश्ते में गलतफ़हमी बढ़ती गई!
तुम अलग हो गये मै अलग हो गई,
अब तो अक्सर————–
डिनर मेज पे ही रह जाता है,
और मै कुर्सी पे बैठी यु ही,
गुजार देती हू————-
अपनी कैंडिल नाईट।
गर गुंजाइश हो तो लौट आओ,
एक मर्तबा ही सही मुआफ करने,
क्योंकि ऐ,रंग—–कही ऐसा न हो,
कि तेरा इंतजार करते-करते,
हमेशा के लिये बुझ जाये,
मेरी ये कैंडिल नाईट।

यही धारावी

(यही धारावी)
मै रोज थकी मांदी,
काम से लौटती हूं जीने------
यही धारावी।
वे चारपाई पे लेटा है,धुत्त कच्ची पिये
गंदी गालियाँ दे रहा,
अभी जबरदस्ती खीचेगा,
मै अपनी ऊबकाईयां रोके,
बर्दाश्त करुंगी एक बलात्कार,
फिर उठुंगी वे सो जायेगा,
थका मांदा!
मै उल्टीयां कर,
पुरे बदन से अपने एै,रंग-------
छुड़ाऊँगी सारी रात मै यही धारवी।

बेजा तलाक

(बेजा तलाक न दो)
ख्वा़हिशो को खाक न दो!
एै मेरे शौहर-----------
सरिया के नाम पे,
मुझे बेजा तलाक न दो।
बख्श दो---------
कहा जाऊँगी ले मासुम बच्चे,
मुझ बेगुनाह को-------
इतना भी शाॅक न दो,
बेजा तलाक न दो।
न उड़ेलो कान में पिघले हुये शीशे,
मुझ बांदी को सजा तुम--------
इतनी खौफ़नाक न दो,
बेजा तलाक न दो।
न छिनो छत,न लिबास
खुदा के वास्ते रहने दो,
मेरी बेगुनाही झुलस जाये-------
मुझे वे तेजाब न दो,
बेजा तलाक न दो।
सी लुंगी लब,रह लुंगी लाशे जिंदा,
लाके रहना तुम दु जी निकाहे औरत,
मै उफ न करुंगी!
बस मेरे बच्चो की खुशीयो को कोई बेजा,
इस्लामी हलाक न दो-------
बेजा तलाक न दो।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.7800824758
____तलाक एक दर्द है जो इसे भुगत रही कोई औरत ही समझ सकती है!अगर संभव है तो मेरी इस रचना के पढ़ने वालो से मेरी कलम अनुरोध करती है प्लीज कभी किसी भी औरत से बेजा तलाक न ले,शुक्रिया।

सुलगती सिगरेट

लगाये बैठा है—————-
होंठो पे अपनी वे सुलगती सिगरेट!
बगल में अनगिनत टुकड़े गिरे है,
धुआँ है!
उस कमरे में जिस कमरे में कभी तुम,
छिन के फेक दिया करती थी,
उसकी अधजली सिगरेट।
अब होंठ पे लगा भुल जाता है,
वे तो सुलगते-सुलगते,
जब होंठ के आखिरी सिरे पे पहुँचती है,
तो वे चौकता है!
फिर जला होंठो पे रख लेता है,
वे अपने एक नई सिगरेट।
और तकने लगता है दरवाजे की तरफ,
कि शायद तुम लौट के आओ,
छिन के फेकने इसके होंठो से,
अधजली सिगरेट।
एक सुबह———-
दरवाज़ा खुला था लोगो की भिड़ थी,
शायद कुछ देर पहले ही मरा है,
क्योंकि—————-
अभी भी उसकी होंठो पे एै,रंग
धीरे-धीरे आगे बढ़ रही बुझने के लिये,
बिल्कुल इसके जीवन की तरह——-
ये सुलगती सिगरेट।

ओढ़नी

(ओढ़नी)
याद है बचपन---------
मैं पहले कहाँ ओढ़ती थी ओढ़नी।
वे तो जब मैं तेरह की हुई,
तो अचानक-माँ ने डाँटना शुरु किया,
और कहने लगी-----------
अब अपने सीने पे तुम रंखा करो ओढ़नी।
मैं चौंकी-----------------
कि ये अचानक माँ को क्या हुआ?
फिर लगा नही कुछ तो है,
यूँही नही माँ रखवाना चाहती होगी----
सीने पे ओढ़नी।
फिर कमरे में बंद कर,
खुद को शीशे में टटोलने लगी,
तो अचानक कुछ शर्म सी आई,
कुछ बदला सा था,
जहाँ माँ ने कहा था-रखने को ओढ़नी।
मै बाहर निकली----------
तो देखा बचपन को खिसकते,
लगा माँ कि कितना सच कह रही थी,
कि तु सयानी हो रही है,
क्योंकि कुछ लोग तक रहे थे,
एै,रंग------वही जहां माँ ने कहा था,
रख लो तुम ओढ़नी।

सेब द चाइल्ड

(सेब द चाइल्ड लिखवा रही है)
किसी कन्या भ्रूण को कोई क्या मारेगा?
माँ खुद मरवा रही है।
हँसी-खुशी के साथ हजार दो हजार दे,
हर शहर के पैथालाॅजी मे रिपोर्ट ले,
किसी डाक्टर के टंगे नीले परदे के उस तरफ,
अपना एबार्शन करवा रही है।
आँख इसलिये भर आती है कि-------
इन तथाकथित माँओ ने कालेज मे पढ़ा है,
"इनके पथराये हृदयो ने--------
माँ शब्द की कोमलता खो दी है",
वही निरक्षर माँ----------
चार बेटिया जन पाप-पुण्य से डरती है,
सच तो ये है कि अपनी बेटियो के लिये-----
"उन पढ़ी-लिखि ढोंगी माँओ से ज्यादा,
अपनी इन बेटियो के लिये लड़ती है"।
सरकारी अमले की कारस्तानी तो और है,
जो महिला डाक्टर पैसे ले,
एबार्शन करवाने के लिये चर्चित है,
सुना है कि वही,
पुरे शहर की दिवालो पे-------------
"सेब द चाइल्ड लिखवा रही है"।

@@@भ्रूण हत्या को इंगित करती एक कविता।

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर----222002 (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

चूल्हा नहीं जलता

(चुल्हा नही जलता)

तुम तो
बात-बात मे शहर जलाना जानते हो,
तुम्हारे पास तो
कौमो को जलाने का ईधन है!
पर यहाँ फाँकाकशी सोने नही देती,
पेट तो जलता है
ऐ रंग---------
पर इस बस्ती मे अक्सर
चुल्हा नही जलता.

Thursday, 19 March 2026

तिलिस्म में होशरुबा

(तिलिस्म़-ऐ-होशरुबा)
कई रात जगा हूँ,नींद टुटी है,,,,
हर बार------
बार-बार तेरा चेहरा नुमाया हुआ है।
ऐ,रंग--कह दो-----
अब उतर आये मेरी कागज़ पे,,,,
मेरे ख्वाहिशो की-----
तिलिस्म़-ऐ-होशरुब़ा।

कुछ छोटी रचनाएं

(कुछ छोटी रचनाये)
               (1)
फुटपाथ पे अधनंगा--------
वे मासुम सुबह से ही बेच रहा,
आजादी का तिरंगा!
एै"रंग" उसके पेट का पिचकापन ही----
शायद उसके हिस्से का भारत है।

                  (2)
मै रोज देखती हूँ---------
खुली खिड़की से घंटो सड़क की तरफ,
एै"रंग" इस उम्मीद मे की शायद,
कभी दिख जाये--------------
वे मेरी बचपन का काबुलीवाला।

               (3)
कहाँ उसकी माँ ने उसके बाल सँवारे,
कहाँ उसकी माँ ने बनाई उसकी चुटिया!
वे स्कूल के सामने की सड़क पे-------
टिन बजा के करतब दिखाती रही,
फिर कटोरे के चंद सिक्के,
अपनी फटी झोली मे भर आगे बढ़ गई,
करतब दिखाने नट की बिटिया।

                (4)
आओ बाँटे तोहफे यतीमो में हम-------
किसी अपाहिज़ की बैशाखी,
या किसी गूँगे की मीठी जुबान हो जाये,
एै"रंग" आओ एक रात ही सही--------
हम सेंटा क्लाज हो जाये।

               (5)
मै घंटो बतियाता हूँ माँ की कब्र से,
एै"रंग" एैसा मुझे लगता है कि,
जैसे इस कब्र से भी---------
मेरी माँ की दुआ आती है।

                (6)
मै आज भी खाता हूँ---------
रेस्टोरेन्ट और बीबी का पकाया,
पर एै"रंग" भूख नही मिटती,
शायद वे मिला नही पाती खाने में-----
मेरी माँ के प्यार की रेसिपी।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

मकान से अच्छा

(मकान से अच्छा)
वे अपनी तोतली जुबान से बोलता है----
किसी भी हिन्दू या मुसलमान से अच्छा।
मुझे बहुत खूबसूरत लगता है----------
वे गली मे नंगा खेलता बच्चा ।
क्या?करुंगा जा के मै मंदिर या मस्जिद में,
मुझे पता है कि---------
तुम बांध दोगे बंदिशो मे एक दिन इसे भी,
ये भी समझ जायेगा जाती और मज़हब,
और बन जायेगा ये खो के अपना बचपना,
हमारी गीता और तुम्हारे कुरान का बच्चा।
तब तलक तो तक लु इस मासुम से बच्चे को,
जो खुद मे खो बना रहा मिट्टी से एै"रंग"----
एक घर इस शहर मे हर मकान से अच्छा।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

Wednesday, 18 March 2026

तवायफ की कब्र है

(तवायफ़ की कब्र है)
यहाँ चराग नही जलते,
कोई चादर नही चढ़ती!
ये शहर की मशह़ूर तवायफ़ की कब्र है।
आज भी करती है,ये रुहें मूज़रा,
फिर फूट के रोती है!
ऐ,रंग---बस आ जाते है खिज़ा में,
दरख्त़ो के चंद पत्ते------
आवारगी करने।
ये शहर की मशह़ूर तवायफ़ की कब्र है।

नित नया अग्निपथ है

(नित नया अग्निपथ है)
एै बीजेपी----------------
उत्तराखंड में तुम्हारी विजय का,
कल जो शपथ है!
वे महज शपथ ही नही,
बल्कि पहाड़ो की कठिनाईयो से भरी,
हर सड़क का------------
तुम्हारे लिये नित नया अग्निपथ है।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और मेरे चुनावी कटाक्ष।

मुसलमान है साहब

(मुसलमान है, साहब)

ना ही , पूजा 
ना ही , किसी मस्जिद की ,
अजान है , साहब.

ये लड़की ,
इस दौर-ए-ग़ालिब की,
दीवान है , साहब.

बड़़े सलीके और 
तमीज़ से ,
लिखा है , कई रात ,
ये एक रात , हिन्दू
तो एक रात मेरी ,
गज़लों की , ----
मुसलमान है , साहब.

@ रंगनाथ द्विवेदी

Tuesday, 17 March 2026

मजहब होकर रह गई

(मज़हब हो के रह गई)
हर रात लहू-लूहान सेज़ पे सोती है,,,
इसका शौहर----
इसकी ख्व़ाहिशो का कत्ल़ करता है।
ये मोहब्ब़त तलाशती है कतरा-कतरा,,,
वे मोहब्ब़त के लम्हो मे तकरिर करता है।
ऐ,रंग--वे यहाँ आई थी औरत होने-----
मज़हब होके रह गई।

तकरिर--धार्मिक भाषण।

आईना रो दे

(आईना रो दे)
मेरी आरज़ू का ऐ खूँ करने वाली,
खुदा करे!कल तेरे हाथो कि हिना रो दे।
तु जब सँवरने के लिये हो आईने के रुबरु,
मेरी वफ़ा का अक्स़ उभरे-----------
और तेरी कमीनगी पे आईना रो दे।

कालेधन वाले कैश की तरह

(कालेधन वाले कैश की तरह)
क्यू नही पकड़े गये मुज़रिम प्रदेश मे-----
आजम खाँ के भैंस की तरह।
क्यू नहीं किया कुछ आखिर--------
मोदी के उज्वला गैस की तरह।
मुआफ करना अब जनता देख रही है,
एै"रंग" सभी के करतूत---------
कालेधन वाले कैश की तरह।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

धन्यवाद!आपका निर्मेश के त्यागी भईया,दैनिक वर्तमान अंकुर और मेरे चुनावी कटाक्ष।

इश्क़

(ईश्क़ सल्फ़ास की गोली है)
ईश्क़ मे कहाँ मिलन,कहाँ डोली है।
करने वाले पहले से जानते है,
ऐ,रंग--ईश्क़----
सल्फ़ास की गोली है।

खूबसूरत औरत नहीं देखी

(खूबसूरत औरत नही देखी)

माथे से टपकता पसीना,
कमर में खोसी हुई साड़ी!
सर पर सीमेंट की भदेली,
और उस पर
श्रम की मादक चाल!
ऐ रंग---
मेरी कविता ने कभी--
इतनी खूबसूरत औरत नही देखी.

Monday, 16 March 2026

कलम तोड़ दी है

(कलम तोड़ दी है)
मोहब्बत के---
ताजिराते हिंद की दफा से,,
वे बचती रही है।
हमने पहली दफा ये,वहम तोड़ दी है,,
ऐ,रंग--उन्हे बेवफा लिखके कलम तोड़ दी है।

लोरियां होती

(लोरियाँ होती)
बचपन होता---------
बचपन की चोरियाँ होती!
माँ!मै शुकून से सोता,
इस पत्थर के शहर मे!
अगर तु होती--------
और तेरी लोरियाँ होती।

लिख दूं बनारस

(लिख दूं बनारस)

तेरी यह खूबसूरत आंखे है 
या की "भेलूपुर".

उस पर यह शर्म तेरी
जैसे "गिलट बाजार".

उफ! यह दिल की इंतहा है
या की पागलपन 
बता ए मेरी मोहब्बत
कि मैं तुम्हें 

"कचौड़ी गली" लिखूं 
या लिख दूं
बनारस.



✍️✍️ रंगनाथ द्विवेदी
जौनपुर,(उत्तर-प्रदेश)

Sunday, 15 March 2026

छापा था

(छापा था)
कल की होली में------------
कही गम तो कही सियापा था!
एक नेता रो रहे थे-----------
तक के अपनी तनहा कुर्सी,
जिसके आस-पास भीड़ थी,
पर हाय!रे चुनाव-----------
तुने बख्श़ा नही,जबकि घोषणापत्र में हमने
एै"रंग"--------------
सब कुछ कर डालेंगे एैसा छापा था।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

धन्यवाद!आपका निर्मेश के त्यागी भईया,दैनिक वर्तमान अंकुर और मेरे चुनावी कटाक्ष का।

घुंघरू बांधती थी

(घुँघरु बांधती थी)
रईसो के दरमियां वे सलिके से जाती थी,
कभी ठुमरी,कभी दादरा गाती थी।
ऐ,रंग--वे पाक थी कोठे पे सुना है-----
कि केवल!वे पाँव मे घुँघरु बांधती थी।

बंजारन

(बंजारन)

मेरी जिंदगी मे आई थी कभी--
एक खानाबदोश बंजारन.

उसकी कत्थई आँखो को यादकर,
मै लिखता गया,लिखता गया,
न जाने कब--
एक मुकम्मल किताब बन गई!
ऐ,रंग--
वे खानाबदोश बंजारन.

अपनी लटो को

(अपनी लटो को)

अपनी लटो को--
चेहरे पर आने ना दिया करो.
बड़ी जलन होती है,
जब यह तुम्हे चुमते है.

Saturday, 14 March 2026

सनी लियोन हुई

(सनी लियोन हुई )

मेरी ग़ज़ल,मेरी कविता मौन हुई,,
ऐ,रंग-
देखते-देखते 
हमारे साहित्य की शकुंतला--
सनी लियोन हुई.

Tuesday, 10 March 2026

गठबंधन

(गठबंधन का अहम रोल है)
सच्चाई साबित है याकि गोल है,
एक मर्तबा फिर से तिलिस्मी अपने प्रदेश का------------
ऐग्जिट पोल है।
सभी कह रहे अपनी रंगीन होली,
जबकि फाग वाले नेता जीत को आश्वस्त नही,
क्योंकि मिड़िया में लंगड़ी सरकार बनेगी,
यानि कि इस मर्तबा एै"रंग"-----------
गठबंधन का अहम रोल है।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और मेरे चुनावी कटाक्ष का।

Sunday, 8 March 2026

बच्चा पाल रही हूं मैं

(बच्चा पाल रही हूँ मै)
इस सुंदरतम सृष्टि को आहूति----
डाल रही हूँ मै,,
दोज़ख मे अपने नन्हा सा-----
एक बच्चा पाल रही हूँ मै।
देगा मुझको अपना ही कोई गाली,,
ये नाज़ायज फिर भी ,रंग----
कुम्हार की मिट्टी सा-----
इसको ढ़ाल रही हूँ मै।
इस सुंदरतम,सृष्टि को आहूति डाल रही हूँ मै----
दोज़ख मे अपने नन्हा सा----
एक बच्चा पाल रही हूँ मै।

महिला दिवस पे मेरी लंबी कविता की शुरुआती लाईने।

पति के हाथ से जली

(पती के हाथ से जली)
कभी मिट्टी के तेल तो कभी तेज़ाब से जली,
औरत सीता भी हुई तो आग से जली।
ये दुनिया मर्दें शहर है आज भी,
गर मासुम सजी-सँवरी भी तो ऐ,रंग-----
अपने पती के हाथ से जली।

महिला दिवस हूं

(महिला दिवस हूँ)
ना मज़लूम ना ही किसी से विवश हूँ,
मै खुद मे हू सक्षम,
और खुद मे जीवट हूँ।
मै भी खड़ी हूं------------
अब सदन से सड़क तक,
एै"रंग"बुथ पर मैं मतदान करती--------
इस लोकतंत्र की महिला दिवस हूँ।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

Saturday, 7 March 2026

नीलकंठ हूँ

(नीलकंठ हूँ)
छक के पिया है-------
हमने भी तमाम हालातो का ज़हर!
ऐ,रंग------------
मै भी अपने दौर का नीलकंठ हूँ।

@@@@हर हर महादेव।

वोट में रहा

(वोट में रहअ)
चाहे धोती-कुर्ता चाहे कोट मे रहअ,
ई बनारस हौ तनी लंगोट मे रहअ।
हमन त रोजै दंड पेली ला अखाड़े मे,
न ललकार हमन के ताव आई जाई,
तु नेता हऊव चुनाव लड़,
अऊर खाली अपने औकात------
अऊर वोट में रहअ।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और मेरे चुनावी कटाक्ष।

टूटी चुड़ी

(टुटी चुड़ी)
तेरे पहले छुअन से टुटी चुड़ी को,
मैने अब तलक संभाल रंखा है----
जब तु नही आता कई राते---
तो मै उसी से बात करती हूँ।

मैं महिला दिवस हूं

(मैं महिला दिवस हूँ।)
संसद से सड़क तक,
मैं अब भी विवश हूँ,
कहने को केवल------
मैं महिला दिवस हूँ।
अब भी हालात बदले नहीं हैं,
वहीं चुभते नाखून और चुभती आँखें,
 ऐसी ही पीड़ा की------
ऐ "रंग"मैं एक कशमकश हूँ।

खूबसूरत औरत नहीं देखी

(खूबसुरत औरत नही देखी)

माथे पे चुह-चुहाता पसीना,
कमर पे खुशी साड़ी!

और सर पे सीमेंट की भदेली,
श्रम की मादक चाल!

ऐ,रंग---
मेरी कविता ने कभी--
इतनी खूबसुरत औरत नही देखी।

Thursday, 5 March 2026

मेरी गज़ल

(तबसरा करती है)
मेरी गज़ल अक्सर तबसरा करती है,
किसी गरीब की भूख से मशवरा करती है।
सुना है एक हयात और एक जन्नत है शहर,
लेकिन इसी शहर में कुछ जन्नत,
माँ की कोख में मरा करती है--------
मेरी गज़ल अक्सर तबसरा करती है।
मजबूरियाँ बिकती है,खरिदो-फरोख्त़ होता है,
कुरआन पढ़ने वालो जरा सोचो,
किसी गली में हर रात अपने जख्म़-----
न चाह के भी कोई अमीना हरा करती है।
एै"रंग" इसी से न चाह के भी---------
मेरी गज़ल अक्सर तबसरा करती है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

Wednesday, 4 March 2026

आओ जिहाद करे

(आओ जिहाद करे)
बेटे और बेटियाँ-----
माँ-बाप की मोहब्ब़त को याद करे।
ना कत्ल हो,ना शहर जले,
ऐ,रंग--हम जिस्मानी हवस के खिलाफ--
आओ जिहाद करे।

शबे महफिल

(शबे भहफ़िल)
बेशक लौट जाना तुम सहर से पहले,
ऐ मेरे कातिल!
पर मै टुट के गाऊँगा कल के मुशायरे में,
है दिली ख्व़ाहिश कि तुम सामने रहना,
तुम नही मिली तो गम नही--
बस बीना आँसुओ के रोना चाहता हूँ,
कल मै शबे महफ़िल।

राम को अल्लाह कहता हूं

(राम को अल्लाह कहता हूँ)
फकिरी तबियत है--------
मै मस्ज़िद में नमाज पढ़ता हूँ!
बस फर्क ये है ऐ,रंग---------
मै राम को अल्लाह कहता हूँ।

जलील चुने जाएंगे

(जलील चुने जायेंगे)
कहाँ गरीब मुसहर,कौल या भील चुने जायेंगे,
ये विचित्र चुनाव है---------------
इसमें कौवे,गिद्ध और चील चुने जायेंगे।
एै"रंग" शरीफ़ और शराफ़त गई तेल लेने,
यहाँ तो बिहार के मंत्री की तरह------
कुछ हमारे भी प्रदेश से जलील चुने जायेंगे।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

धन्यवाद!आपका दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और मेरे चुनावी कटाक्ष का।

व्यंग्य

✍️✍️इस व्यंग्य को दिल से ना ले
कभी किसी बड़े माफिया या बड़े नेता के पीछे बंदूक लेकर चलने वाले व्यक्ति के चेहरे को आप देखिए,,तो ऐसा लगता है कि जैसे कोई स्वामी भक्त कुत्ता जहरीले रसमलाई की हिफाजत कर रहा हो 😃😄😃😄

Monday, 2 March 2026

प्यार को खतरा है

(प्यार को खतरा है)
ईद,होली त्योहार को खतरा है,
मंदिर-मस्जिद की मीनार को खतरा है!
लड़ जायेंगे------------
शहर के शहर गर इनकी चली तो,
एै"रंग" यहाँ मुसलमान की मोहब्बत और---
हम हिन्दूओ के प्यार को खतरा है।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

धन्यवाद!आपका दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और मेरे चुनावी कटाक्ष का।

बैजू बावरा

(बैजू बावरा)

ऐ शोहरते तानसेन,–
ये तेरा ऐंठना कैसा?

देखना! फिर हरा देगा तुम्हे,
किसी महफिल में 

ऐ रंग-
किसी छोटे से शहर का 
बैजू बावरा.

Sunday, 1 March 2026

सरकार भली नहीं आती

(सरकार भली नही आती)
धोखा है फोरलेन---------
हमारे शहर में तो बिना गंड्ढे के,
कोई गली नही आती।
गाँव तकता है आज भी पूछो किसान से---
सिंचाई के वक़्त उसके बिजली नही आती!
क्या अखिलेश?क्या मोदी?,
सब हमाम के नंगे है एै"रंग" वरना,
हमारी क़िस्मत मे सालो से अब------
कोई भी सरकार भली नही आती।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758
धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और मेरे चुनावी कटाक्ष का।

उम्र की किताब

(उम्र की किताब)
पूरे बदन में--झुरझुरी सी उठ रही,
हे सखी!बसंत पढ़े छेड़-छेड़,
मेरे उम्र की किताब.