Wednesday, 30 November 2022

(खनकती ये महबूब चुडियां)
मै अक्सर नमाज़ के वक़्त भी घुम जाता हूं,
मस्जिद के बगल से जो गुजरती है------
चंद चुडिहारो की गली!
तकता हु तमाम दुकानो की तरफ,
कि शायद किसी दुकान पे--------
फिर अपनी नर्म नाज़ुक सी कलाई में,
पहनती किसी चुडिहार से चुड़िया--वे दिख जाये,
जैसे दिखी थी अगले जुमें को!
नही दिखी,
शायद वे किसी और शहर से थी,
मै ज्यो घुमा------------
तो नज़र पड़ी वे आ रही थी कुछ सहेलियो के संग,
तभी उसकी चुड़ियो की खनक ने,
जैसे हमें आदाब कर कहा हो,
जनाब मै इसी शहर की हूं!
और इसी शहर की है मेरी कलाईयो मे-----
खनकती ये महबूब चुड़िया।

Sunday, 27 November 2022

(आसमानी किताब हो)
खुद को जरा सलिके से रंखो----
ऐ पारा-ऐ-हूश्ऩ,,
तुम कोई मामूली शख्स़ियत नही---
मेरी ख्व़ाहिशो की आसमानी किताब हो।
(इतवार केवल दिन नहीं मोहब्बत है)
कभी किसी शनिवार वे आते है,
कभी किसी शनिवार मै जाती हू।
ये भागमभाग,ये नौकरी,ये भीड़ 
कि उबन से दुर------------
कभी किसी इतवार वे मुझे पाते है,
कभी किसी इतवार मै उन्हें पाती हू।
फिर अगली सुबह लौटना होता है,
कभी दरवाजे़ पे वे मुझे छोड़ने आते है,
और कभी दरवाजे पे मै उन्हें छोड़ने जाती हू।
इसलिये एै,रंग---अब हमारी जिंदगी मे इतवार महज़ दिन नही,
मोहब्बत है जो हम एक दुसरे से कर पाते है।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

नौकरीपेशा लोगो का वे इतवार जिसका इंतज़ार वे बड़ी शिद्दत से एक दुसरे के लिये अलग-अलग शहरो में पुरे हफ्ते ट्रेन पे न बैठ पाने तलक करते है।

Wednesday, 23 November 2022

(काँच का ताज़महल था)
उस बेवफ़ा के हाथ से-----
गिरा और गिरके टुट गया,,,,,,,
ऐ,रंग----वे मेरा तोहफ़ा नही----
काँच का ताज़महल था।
(औरत के अंग)
हा मै औरत हू-----------
इसलिए तो तुम्हारे उन अंग विशेष,
को मै तकने भर से जान जाती हू,
कि तुम्हारी मंशा मेरे उन अंगो के-----
बस नोचने-खसोटने और मसलने से है।
जबकि एक औरत के वही अंग विशेष,
अपने पती के प्यार पाने के वक़्त भी,
शर्म ओढ़े रहते है,
क्योंकि उसमें किसी तरह की नोच-खसोट नही,
बल्कि एक-दुसरे के परम विश्वास का देव श्पर्श है।
हा!शायद तुम्हारा पुरुषपन अंदर से सध नही पाता,
किसी एक समर्पित अंग से बध नही पाता,
वरना तकते तो तुम्हें भी अपनी पत्नी का वे अंग,
उतना ही आकर्षित करता------------
जीतना की पर स्त्री या औरत का।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758
कानपुर में हुए ट्रेन हादसे की बरसी पर लिखा हुआ मेरी पीड़ाओं का एक मरसिया.

(एक दर्द कानपुर के नाम)

एै कानपुर------------
तेरे शहर में ये आँसुओ वाली ट्रेन,
हमे याद रहेगी।
ना भुलुंगा क्योकि---------
इस हादसे की मरसिया नीरज की तरह,
अब हमारे पास रहेगी।
मै जानता हु कि---------
तेरी फाइलो में गुम हो जायेगा ये दर्द,
तु सरकारी महकमा है!
पर जीना है उन घरो को ये हादसा,
उनके दिलो में आँसू रहेगा और-----
ता-उम्र ये चेहल्लुम की रात रहेगी।
एै कानपुर-----------
तेरी पटरियो से होके फिर गुजरेगी ट्रेन,
फिर उतरेंगे चढ़ेंगे मुसाफ़िर,
तेरी कानो मे---------
हर रोज एक नई आवाज़ रहेगी।
एै कानपुर----------
तेरे शहर में ये आँसुओ वाली ट्रेन,
हमें याद रहेगी।

@@@कानपुर ट्रेन हादसे पे लिखी एक गमज़दा रचना।

रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758
(बिटिया खुले मे शौच जाती है)

आखिर बाप और भाई की ये कैसी छाती है?
जो उसकी जवान बहु-बेटी----
खुले में शौच जाती है.

रास्ते भर फबत्ती और----
किसी की छेड़खानी का डर क्या होता है?
कभी देखना हो,
तो उसका वे चेहरा देखना
कि किस तरह वे चंद लम्बी साँसे लेती है,
जब सकुशल अपने घर लौट आती है.

अक्सर हम अखबार और टी.बी. मे ये पढ़ते व सुनते है,
कि अधिसंख्य----
खुले मे शौच गई महिला की,
रेप या बलात्कार के साथ नृशंस हत्या,
सारे रोंगटे खड़े हो जाते है,
जब सबसे ज्यादा----
एैसे ही बलात्कार की रिपोर्ट आती है.

आओ हम बदले अपनी बहु और बिटिया के लिये,
ये ना समझो कि पहले कौन?
तन्हा लड़ो क्योंकि हर अच्छे के लिये---
फिर फौज आती है.

एै "रंग" ये महज़ कविता नही एक दर्द है,
कि आजादी के इतने सालो बाद भी,
हमारे देश की बिटिया-----
खुले में शौच जाती है।

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Monday, 21 November 2022

(पत्थर तोड़ती है)
रोटी के लिये---------
वे सारा दिन खुद को निचोड़ती है,,,,,,,
ऐ,रंग----हमारी गज़ल--------
फूटपाथ पे पत्थर तोड़ती है।
(मै यहां रोने आता हूं)
तुम्हे पाने और खोने आता हूं,
अब हर शाम मै यहां रोने आता हु।
बनाता हु घरौदा फिर तोड़ देता हु,
मै यहां समंदर की लहरो मे,
खुद को हर शाम----------
डुबते सूरज की तरह डुबोने आता हु।
तु गई तेरी याद रह गई,
उसी याद की लाश को हर शाम-----
मै यहां धोने आता हु।
नींद और सुकून भी मेरी आँखो मे अब नही,
मै यहां कुछ लम्हे रेतीली कब्र पे--------
तेरी निशानियो के सिरहानें सोने आता हु।
मै तब भी पागल था और अब भी पागल हु,
तभी तो तेरी जुदाई के इतने सालो बाद भी,
मै यहां तेरा होने आता हु।
तुम्हें पाने और खोने आता हूं-------
अब हर शाम मै यहां रोने आता हु।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.--7800824758
हाय रे!टमाटर यानी की 80 रूपए किलो 😀😀😀😀

व्यंग्य-कविता------

(अनार से महंगा टमाटर खा रहा हूं )

आ गये अच्छे दिन---------
मै इलू-इलू गा रहा हूं,
अनार से महंगा टमाटर खा रहा हूं.

मार्केट से सभी सब्ज़ियाँ तो ले ली,
पर टमाटर को लेने मे लग गये घंटो,
क्योंकि सभी एक से भाव मे बेच रहे थे,
यहाँ तलक कि टमाटर को 
बीना मतलब छुने से रोक रहे थे,
थक-हार एक ठेले वाले को पटा रहा हूं------
बड़ी मुश्किल से घर टमाटर ला रहा हूं,
अनार से महंगा टमाटर खा रहा हूं.

बीबी भी सबसे पहले सब्ज़ियो के झोले से,
टमाटर टटोल कर निकालती है,
और पुछती है क्या भाव पाये,
कैसे कहु कि हे!भाग्यवान
 तुम अपने टमाटर खाने का शौक,
काश सस्ते होने तलक टाल पाती,
लेकिन नही,तुम नही टाल पाओगी,
तुम्हारे इसी न टालने के नाते,
अपनी एक महिने की सेलरी का
 तीस पर्सेंट खर्च कर,
बस मै तुम्हारे लिये टमाटर ला रहा हूं.

आ गये अच्छे दिन-----
मै इलू-इलू गा रहा हूं,
अनार से महंगा टमाटर खा रहा हूं।

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no,----7800824758

Sunday, 20 November 2022

(चिनार की शाखों पे)
बैठता है,आज भी
यादो का परिंदा 
चिनार की शाखो पे।
लगता है,आज भी हमे
कि,वे चुपके से 
मेरे पीछे खड़ी हो,
ऐ रंग,-रख देगी अपनी
नर्म अगुँलियाँ,
मेरी आँखो पे।
बैठता है,आज भी 
यादो का परिंदा 
चिनार की शाखो पे।

चिनार-एक पहाड़ी वृक्ष।
(लिव इन रिलेशन शीप)
ऐ दुनिया---------------
अब हम भी तरक्की कर रहे है,,,,,,,
एक घृणित सेक्स के साथ हम----
लिव इन रिलेशन शीप मे रह रहे है।
(एक दर्द कानपुर के नाम)
एै कानपुर------------
तेरे शहर में ये आँसुओ वाली ट्रेन,
हमे याद रहेगी।
ना भुलुंगा क्योकि---------
इस हादसे की मरसिया नीरज की तरह,
अब हमारे पास रहेगी।
मै जानता हु कि---------
तेरी फाइलो में गुम हो जायेगा ये दर्द,
तु सरकारी महकमा है!
पर जीना है उन घरो को ये हादसा,
उनके दिलो में आँसू रहेगा और-----
ता-उम्र ये चेहल्लुम की रात रहेगी।
एै कानपुर-----------
तेरी पटरियो से होके फिर गुजरेगी ट्रेन,
फिर उतरेंगे चढ़ेंगे मुसाफ़िर,
तेरी कानो मे---------
हर रोज एक नई आवाज़ रहेगी।
एै कानपुर----------
तेरे शहर में ये आँसुओ वाली ट्रेन,
हमें याद रहेगी।

@@@कानपुर ट्रेन हादसे पे लिखी एक गमज़दा रचना।

रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758
(ठंड की रात)
तुमसे दुर-------------
ये तन्हा गुलाबी ठंड की रात।
और तेरे बुने हुये मफ़लर का श्पर्ष,
एक तेरे प्रेम सुगंध की तरह,
कट जाती है,बीना तेरे रहे भी-----
अपने रिश्तो के संम्बंध की रात।

Saturday, 19 November 2022

(मरुस्थल हो गया)
जाने कब--------------
मेरी संवेदनाये मर गई,,,
दिल मे---------
नागफ़नी और कैक्टस उग आये!
ऐ,रंग---------
मै आदमी से मरुस्थल हो गया।

Tuesday, 15 November 2022

धन्यवाद! नयी दिल्ली से प्रकाशित राष्ट्रीय मासिक पत्रिका "प्रखर गूँज साहित्यनामा" व धन्यवाद प्रमुख संपादक नीलू सिन्हा और ब्यूरो चीफ लालचंद्र यादव जी का नवंबर अंक मे "मेरी कविता की बुढ़िया" को स्थान देने के लिये.

(मेरी कविता की बुढ़िया)

मेरी कविता की बुढ़िया उदास है,
विदेश मे रहते है इसके बेटे और बहु,
इसका पुरा मकान खाली है।
वे देखो आँगन और सुखी तुलसी,
और किनारे खड़ी----------------
बिल्कुल बुढ़िया के दिल की तरह,
टुटी चारपाई,
जिसपे वे ठंड के दिनो मे,
गुनगुनी धूप मे सरसो के तेल की,
घंटो बेटे की किया करती थी मालिश,
आज उसी तेल की कटोरी में,
उसके वात्सल्य का अरमान खाली है।
वे देख रही है एकटक------------
दिवाल पे टंगी अपने बेटे के बापु की,
वे धूल भरी फोटो!
फिर बुदबुदा के लौटती है बीना रोये,
जैसे पढ़ लेगे फोटो से ही,उसके बापु
उसका दर्द उसकी पिड़ा!
आँखो में उसके अब तुफान खाली है।
अभी पिछले ही दिनो,
मेरी कविता की ये बुढ़िया बिमार हुई है,
अब न बचेगी!
इसकी हिचकियाँ और बार-बार
दरवाजे की तरफ तकना,
वही हुआ बुढ़िया मर गई,
मेरी कविता तो पुरी हो गई,
पर उसके विदेशी बेटे और बहु नही आये,
जहाज़े आती और जाती रही,
एै,रंग------फिर भी हर ऐयरपोर्ट पे,
मेरी कविता की बुढ़िया उदास खड़ी है।

@@@रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर पिन नं.222002 (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.---7800824758

विदेशी मे रह रहे बेटे का इंतजार करती माँ की बुढ़ि आँखे।

Monday, 14 November 2022

पहली बार मैंने अपनी किसी लघुकथा में अपने जनपद जौनपुर का जिक्र किया है जो की दिनांक 14/11/21 यानी की "बाल दिवस" के दिन उत्तर-प्रदेश के चर्चित दैनिक समाचार पत्र जनवाणी के साप्ताहिक पृष्ठ "रविवाणी " और अजीत समाचारपत्र जालंधर के साप्ताहिक पृष्ठ में प्रकाशित है.

इसकी pdf भेजनें के लिए दैनिक जागरण के ऊर्जा कालम व साथ ही बिभिन्न हिंदी साहित्य विधा के चर्चित हस्ताक्षर प्रिय भाई पुष्पेंद्र दीक्षित का बहुत-बहुत धन्यवाद 🌹🌹🌹🌹

बाल दिवस लघुकथा----( गलती क्या थी? )

मुझे ट्रेन में बैठकर , जौनपुर से फैजाबाद जाना था, लेकिन प्लेटफार्म के लगे माइक से लगातार यह अनाउंस हो रहा था कि, आज जौनपुर से फैजाबाद जाने वाली ट्रेन अपने निर्धारित समय से एक घंटे लेट से आएगी. 

यह जानकर मैं प्लेटफार्म से बाहर निकल आया और यूं ही चाय पीने की नियत से एक चाय की दुकान पर जा बैठा, तभी उस दुकान में बैठे सात-आठ लोगों के बीच से एक आवाज आई कि - "ए चवन्नी तीन चाय लाना तो."

उनके बुलाने के तरीके से यह स्पष्ट लग रहा था कि, वे यहीं कहीं आसपास के रहने वाले थे. फिर तीनों सिगरेट जला कर आपस में बातें कर खूब खिलखिला कर हंसने लगे. तभी उन लोगों के हंसने के बीच एक 13 साल के लड़के जो कि मैले-कुचैले निक्कर के साथ एक दो जगह से फटी गंजी पहने था आया. 

उन लोगों के सिगरेट के धुंए की वजह से या कहीं पांव में ठोकर लग जाने की वजह से उस चवन्नी के हाथ से चाय की पकड़ी हुई गिलास छूटकर उन लोगों के साफ-सुथरे कपड़े पर गिर जाता है. जिसकी वजह से उस मासूम से दिखने वाले चवन्नी नाम के लड़के को ना सिर्फ ये मां बहन की गाली देते हैं, बल्कि उसके गाल पर तीन-चार तमाचे भी जड़ देते हैं. 

क्योंकि मैं भी उसी चाय की दुकान पर बैठा चाय पी रहा था. अतः मैंने साफ व स्पष्ट उस चवन्नी की आँखों में भर आये आँसुओं को देखा और मेरा मन खिन्न हो उठा, फिर मै चाय के पैसे दे, स्टेशन के प्लेटफार्म की तरफ चल पड़ा जहां मेरे जाने वाली ट्रेन के प्लेटफार्म नंबर 4 पर लगने का अनाउंस हो रहा था. लेकिन एक सवाल जो ट्रेन से मेरे गंतव्य तलक पहुंचने के बावजुद भी अनुत्तरित रह गया. वह था कि, -- "आखिर उस चवन्नी नाम के लड़के की गलती क्या थी?"

लेखक---रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758

Sunday, 13 November 2022

(औरत नही देखी)
माथे पे चुहचुहाता पसीना-----
कमर पे खुशी साड़ी-----
और सर पे सीमेंट की भदेली,,,,,,,,,,
श्रम की मादक चाल------
ऐ,रंग----मेरी कविता ने कभी----
इतनी खूबसुरत औरत नही देखी।
छत्तीसगढ़, से प्रकाशित साहित्य की सर्वोत्कृष्ट त्रैमासिक पत्रिका "बहुमत" के 101 अंक में मेरी लघुकथाओ को स्थान देने के लिए संपादक बड़े भैया विनोद मिश्रा जी के इस आशीर्वाद व स्नेह के लिए मेरा कोटिशः प्रणाम🙏🙏. 

■"बहुमत " का 101 वां अंक ■
================================
● लुइस ग्लक की 9 कविताएं ।। अनुवाद--मंगलेश डबराल, लीलाधर मंडलोई, विनोद दास, तिथि दानी,प्रभात रंजन,श्री बिलास सिंह ।।
■ 75वें वर्ष में कवि -राजेश जोशी की तीन कविताएं
● रचना की जरूरत:निर्मल वर्मा
■ कविता का प्रयोजन: राजाराम भादू
●महात्मा गांधी के छत्तीसगढ़ प्रवास की शताब्दी स्मृति: राहुल सिंह का विशेष लेख
■रामनगीना मौर्य और आलोक रंजन की कहानियां
●रोअल्ड डाहल की अंग्रेजी कहानी:खाल (अनुवाद-सुशांत सुप्रिय )
■शानी की कहानी:कफ़न चाहिए

● कविताएं:: लीलाधर जगूड़ी, वेणु गोपाल,रूपम मिश्र, जोशना बैनर्जी आडवाणी, संदीप निर्भय,रवि प्रकाश, सुलोचना वर्मा,विनय सौरभ, हर्ष भारद्वाज,रजत कृष्ण, योगेश ध्यानी,शिवम चौबे, फिरोज खान, उल्लास पाण्डे, अंकिता आनंद,विधान,निधि अग्रवाल, अंकिता शाम्भवी, कुबेर कुमावत, अनामिका चक्रवर्ती,कुंदन सिद्धार्थ, पल्लवी मुखर्जी, वन्दना गुप्ता,अनु चक्रवर्ती,सोनी पाण्डेय,ज्योति रीता,अमृता सिन्हा ।।।।

■लघुकथाएं: सुशांत सुप्रिय, रंगनाथ द्विवेदी
● गज़लें: अनिता सिंह,देववंश दुबे, फूलचंद गुप्ता ।
■पुस्तकें मिली-महेन्द्र मिश्र, अशोक शाह,उषा दशोरा, सुभाष चन्द्र कुशवाहा,राम नगीना मौर्य, रामकुमार तिवारी,गौरव गुप्ता,नीरज नीर, कुबेर सिंह साहू, अरविंद श्रीवास्तव, वन्दना गुप्ता, अजित कुमार राय, राजेश झरपुरे, कुबेर कुमावत ।।

#आवरण: अनिल वशिष्ठ
#रेखांकन: अनुभूति श्रीवास्तव

•संपादक: विनोद मिश्र
•प्रबंध संपादक: अरुण श्रीवास्तव
•परामर्श: राजीव चौबे
               : दिनेश वाजपेयी
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श्री चतुर्भुज मेमोरियल फाउंडेशन, भिलाई-दुर्ग(छत्तीसगढ़) एवं जनसंपर्क विभाग छत्तीसगढ़ शासन के सहयोग से प्रकाशित
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Friday, 11 November 2022

गुजरात, से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका "नया साहित्य निबंध " के जनवरी-जून 2021 के संयुक्तांक में मेरी भी लघुकथा प्रकाशित है, इसकी जानकारी मुझे देश की बहुचर्चित कहानीकार डॉ रंजना जायसवाल जी ने कल दी. साथ ही मेरी इस लघुकथा को पत्रिका में स्थान देने के लिए संपादक बड़े भाई रजत सान्याल जी का बहुत-बहुत धन्यवाद.

Tuesday, 8 November 2022

(पति पत्नी कहां होते है)
हम कमरे में----------------
अब पति पत्नी कहां होते है?
बिस्तर तो वही है,
पर एैसा लगता है जैसे--------
अब उसपे दो अज़नबी सोते है।
टटोलना मुमकिन नही भीतर का सन्नाटा,
बस काम से लौटते थके कदम,
ही अब हमारे भीतर होते है।
फिर खिड़की से बाहर महानगर के,
न थमने वाली चुभती चिखती आवजे,
और हमारी शादी की सालगिरह पे,
वे गमले में लगाई,
बिल्कुल अपने जीवन की तरह,
कि नागफनी को एकटक देखते है,
फिर उदास टावल को उठा,
हम हाथ मुँह धोते है।
अब तो ये भी याद नही,
कि कब हम एक साथ बैठकर चाय पिये थे,
और किस बात पर हम साथ खिलखिलाये थे,
अब तो सामने है बस एक तन्हा खालि कप,
जिससे अब केवल होंठ भिगोते है,
और लेते है एक थकी साँस,
अब तो रिश्ते को जीते नही बस ढ़ोते है।
हम कमरे में------------
अब पति पत्नी कहां होते है?।
## # एक जिवंत रिश्ते के निरस हो जाने का आधुनिक दर्द।
(दंगा याद है)
हमें पुराना शहर याद है,
एक-एक गली मुहल्ला याद है।
वे कुर्आनखानी का खुरमा,
मुँह पोछती अपने दुपट्टे से,
अब्दुल की अम्मा याद है।
हमें पुराना शहर याद है!
राखी सुनि थी एक ब्राह्मन के घर,
आँख मे खुशियो के आँसू---------
मेरी इस कलाई को सलमा याद है।
हमें पुराना शहर याद है!
इतने सालों बाद देखा जब जला घर,
पुछा कहां गये ये सब,
तो नये शहर के बाशिंदो ने बताया,
तो अफसोस हुआ,रंग---------------
कि अब नये शहर को,
पुराने शहर की मोहब्बत नही,
नफरत,लाशे और दंगा याद है।
हमें पुराना शहर याद है।
बहुत उदास है—————
आज हमारे तुम्हारे मोहब्बत की,
कैंडिल नाईट।
मै वही बैठी हूँ ठिक सामने,
बस वे जगह खाली है-
जहां तुम बैठते थे,
आज बहुत उदास है मेरे अंदर जिंदगी,
मै टुट रही हूँ!
मेरे संग बीत रही है,
बस तुम्हारे खूबसूरत यादो की—–
कैंडिल नाईट।
शायद कही चुक गये हम,
इसी से हमारे रिश्ते में गलतफ़हमी बढ़ती गई!
तुम अलग हो गये मै अलग हो गई,
अब तो अक्सर————–
डिनर मेज पे ही रह जाता है,
और मै कुर्सी पे बैठी यु ही,
गुजार देती हू————-
अपनी कैंडिल नाईट।
गर गुंजाइश हो तो लौट आओ,
एक मर्तबा ही सही मुआफ करने,
क्योंकि ऐ,रंग—–कही ऐसा न हो,
कि तेरा इंतजार करते-करते,
हमेशा के लिये बुझ जाये,
मेरी ये कैंडिल नाईट।
(बाँसुरी का बचपन)
तलाश रही हूं-----------
वे गुब्बारे और बाँसुरी का बचपन।
तलाश रही हूं----------
उड़ती तितलियाँ इस फूल से उस फूल,
और उन फूलो की पाँखुरी का बचपन।
बहुत पिछे छुट गया उम्र के साथ------
माँ की बाधि चुटिया और फ्राक पहने स्कूल जाना,
वे रास्ते में बुढ़ि दाई की अमरुद,
और जुम्मन चाचा के चुरन!
कुछ सिक्के हथेली के कितने ज्यादा थे,
अब यादो में है जैसे---------
एक परी का बचपन।
तलाश रही हूं---------
आज फिर मायके से ससुराल जाते,
अचानक नजर थम गई कुछ पल उस मोड़ पे-----------
जहां से कभी खरीदा करती थी गुब्बारे और बाँसुरी,
आज वे फेरीवाला नही दिखा,
एक हूक उठी---------
और मेरे अंदर यादो की आँख भर आई,
अब ता उम्र कचोटेगा मेरी यादो में------
वे गुब्बारे और बाँसुरी का बचपन।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.7800824758
नगरपालिका चुनाव की घोषणा होते ही हमारे शहर की सरगर्मी बढ़ गई है और इस बार के चुनाव मे खुले तौर पे रजिस्टर्ड पार्टियो ने प्रत्याशियो को अपना सिंबल दिया है!यानी इस बार तथाकथित पार्टियो की अपनी मर्यादा भी फसी है इस चुनाव को आगामी लोकसभा का रिहर्सल भी कहाँ जा रहा है।
फिलहाल मैने एक चुनावी चक्कलस के माध्यम से अपने शहर की मशहूर अटाला मस्जिद की अड़ी को इंगित करते हुये इसकी शुरूआत कर दी है उसपे चार चाँद ये है कि हमारे जिले जौनपुर मे महिला सामान्य सीट है यानी पतियो को अपनी करवा चौथ,तीज और डाला छठ जो अभी ताजे-ताजे बीता है उसे अगली मर्तबा और खुशगवार बनाने के लिये बड़ी मेहनत करनी है।
फिलहाल पेश है एक चक्कलस--------------
   (अटाला मस्जिद राजनैतिक पतियो की सीतामढ़ी है)
अटाले पे सज गई एक बार फिर चुनाव की अड़ी-------
बहस-मुबाहसे में जात-कुजात गीने जा रहे,
कोई कह रहा कि पुराने वोटर मे कुछ नये जुड़ गये है,
इसी से फला-फला के होश उड़ गये है,
इस बार हर पार्टी ने सिंबल दिया है,
महिला सीट है,
इसी से अब लोकसभा भी सधना है,
जुम्मन चचा दुबारा बीड़ी दगा चाय की कुल्हड़ फेक,
गंभीर मुख-मुद्रा बना कहते है,
हम बेवकूफ है जगह-जगह लड़ते है और ये पार्टीवाले,
महज़ हमारी उसी उन्मादी आँच पे--------
हर पाँच साल बाद चुनाव लड़ते है,
देखना चुनाव तक मुसलमान नेता मंदिर पे,
मस्जिद की तरह अपना सिर नवायेंगे,
अपने आपको वहाँ हिन्दू बतायेंगे,
और हिन्दू प्रत्याशी--------------
अपनी पत्नियो के चुनाव प्रचार मे कहेगा,
क्या मंदिर? क्या मस्जिद सब एक है,
यानि बेटा चुनाव तक-----------
ये अटाला मस्जिद नही बल्कि सीतामढ़ी है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758
(माँ)

माँ-
    मै ढ़ेरो खाता हूँ,पर तेरी 
चुपड़ी रोटी की भूख-
रह जाती है.

आज सबकुछ है,
स्लीपवेल के गद्दे,एसी कमरे
पर नींद-
घण्टो नही आती है.

ऐ रंग यादो मे सिर्फ--
माँ की गोद,
और लोरी रह जाती है.

रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी.
(आखिरी सेल्फी)
तुम्हे-------------
कहा था कई मर्तबा,
पर तुम माने कहां,
रोज खिचते रहे-------
हमारी और अपनी निजी पलो की सेल्फी।
आज वे सभी शहर में वायरल हो गये,
मै नंगी गुजर रही हूँ सड़क से,
हर भूखी आँख देख रही है जैसे,
तुम्हारे द्वारा ली गई-------------
सहवास के पलो की वे सारी सेल्फी।
काश तुम मान गये होते!
तो आज ख़ुदकुशी न करती,
और न छोड़ती अपने सिरहाने,
तुम्हारे लिये मै-----------
अपनी आखिरी सेल्फी।
देखना ता उम्र-----------
अपनी डबडबाई आँखो से,
मै तुम्हारे बहुत पास रहुँगी,
कभी डिलिट नही होगी तुम्हारी जेहन से,
ये हमारी आखिरी सेल्फी।
## # आधुनिकता नितांत आवश्यक है पर आजकल कुछ घटनाये रोंगटे खड़ी कर दे रही है सेल्फी के द्वारा हमने एक भाव व्यक्त किया है,मेरा उद्देश्य किसी का समर्थन या विरोध नही है,धन्यवाद।

Monday, 7 November 2022

(कश्मीरी पंडित)
वे बांगा दी बुलबुल-------
वे डलझील वे शीकारे--------
हमारी मिट्टी-ए-मोहब्बत कश्म़ीर,,
हमे ख्वाबो मे पुकारे।
ये सियासत-ए-साजिश-ए-अलगाव,
कि हम कश्म़ीरी पंडित पड़े है-------
खानाबदोशो से बदतर ऐ दिल्ली,
तेरी सड़को के किनारे।
वे गुल,वे केशर,वे सेब के बगीचे,
उफ!नही आती वे खूशबु ना आती है--
वैसी यहाँ तक हवा रे।
ये लाशे मईयत,ये रुह-ए-तड़प है,
ऐ,रंग---हम कैसे होगे जन्नतनशी----
ऐ कश्म़ीर तेरी पाक-ए-मिट्टी के बीना रे।

Sunday, 6 November 2022

(गंगा)
कहाँ बता पायी-
कौन हिन्दू,कौन मुसलमान गंगा।
कहीं हर-हर गंगे,
तो कही-
नमाजे वजू का पानी,
आज हमसे मैली हो रही
सुबह-शाम गंगा।
हे!गंगा पुत्र मोदी तुमपे-
कर्ज-ए-बनारस है,
चुकता करो आके,
अपनी कौल,अपनी कसम
ताकि-ऐ रंग,-
अपने ही पानी से
खुद करे स्नान गंगा।

मोदी के द्वारा खुद को गंगा पुत्र कहने पर।
(यही धारावी)
मै रोज थकी मांदी,
काम से लौटती हूं जीने------
यही धारावी।
वे चारपाई पे लेटा है,धुत्त कच्ची पिये
गंदी गालियाँ दे रहा,
अभी जबरदस्ती खीचेगा,
मै अपनी ऊबकाईयां रोके,
बर्दाश्त करुंगी एक बलात्कार,
फिर उठुंगी वे सो जायेगा,
थका मांदा!
मै उल्टीयां कर,
पुरे बदन से अपने एै,रंग-------
छुड़ाऊँगी सारी रात मै यही धारवी।

Saturday, 5 November 2022

(ईश्क़)
ईश्क़ एक रुह़-ए-वफ़ा है------
इसका न कोई जिस्म़ न कोई बदन है।
ऐ,रंग-------------
ये एक मौत-ए-जश्ऩ है।
(पूजा का वक्त था या अजान का)
मंदिर और मस्जिद के बीच,
सड़क के किनारे झाड़ियो मे-------
हमने एक औरत की नग्न लाश देखी।
और उसके दोनो स्तनो पे
खुरचने के निशान देखे!
और वे दोनो स्तन----------
मंदिर और मस्जिद की तरफ लटके हुये थे,
कितने असहाय थे बताने में,
उस नग्न औरत के दोनो स्तन ऐ,रंग-----
कि वे पूजा का वक्त था या अजान का।
## # मेरी इस रचना को वलगेरेटी के लिहाज से न पढ़े,इस तरह की एक लाश शायद डेढ़ वर्ष पहले देखी थी ये उसी से प्रेरित है,फिर भी गर कही से भूलवश कोई आहत होता हो तो हम उससे माफी मागते है-----धन्यवाद।
(मै भी कुम्हार हूँ)
हा मै भी----------------
अपने गीतो की चाकी पे,
शब्दो की मिट्टी रख,
कुछ गीत------------
उसके दिवाली के दीये की तरह बनाता हूँ।
वे भी कुम्हार है मिट्टी के दियले का,
और मै भी कुम्हार हूँ-------
अपने गीतो का।
वे उपले की आँच में,
पकाता है दियलो को और मै--------
अपने हृदय के उपलो की आँच में,
गीतो के शब्द पकाता हूँ।
(शहनाज़ का मेकप नही करती)
हमारी गज़ल वे खूबसूरत औरत है,
जो कभी शहनाज़ का मेकप नही करती।
वे सादगी और सलिके की रस्म़ है,
वे जिधर से गुजरती है निगाहे पाकिज़ा,
अपने सर से दुपट्टे को ओझल नही करती।
हमारी गज़ल--------------------
ये जीनत है ज़मी की आयत है,
ये ज़न्नत से घर को कभी दोज़ख नही करती।
हमारी गज़ल-----------------------
ऐ,रंग----इसकी दुनिया फकत शौहर है,
ये हवस के मारो की तरह कभी ब्रेकप नही करती।
(ठंड की रात)
तुमसे दुर-------------
ये तन्हा गुलाबी ठंड की रात।
और तेरे बुने हुये मफ़लर का श्पर्ष,
एक तेरे प्रेम सुगंध की तरह,
कट जाती है,बीना तेरे रहे भी-----
अपने रिश्तो के संम्बंध की रात।

Friday, 4 November 2022

(प्रेम कस्तुरी)
उससे दुर हूँ-----------
फिर भी नही है उससे कोई दुरी।
मेरे कानो मे सुनाई देती है-----
उसकी वे संगीतमय चुड़ि।
मेरी प्रेयसी बस कहने को प्रेयसी है,,
वरना ऐ,रंग----वे है मेरे हृदय की----
प्रेम कस्तुरी।

Thursday, 3 November 2022

(गाँव के दिन)
यादो मे है,-
मेरे गाँव के दिन।
वे अल-सुबह किसानो का,
अपनी खेतो की तरफ जाना
क्या खुब थे?
वे उनके हल-बैल के दिन।
ऐ रंग,-साँसो मे
मिट्टी की सोंधी गंध,
वे मीठी नींद
और खपरैल के दिन।
यादो मे है,-
गाँव के दिन।

Wednesday, 2 November 2022

(पटना से मोतीहारी)
जब भी मै-------------
जाता हूँ पटना से मोतीहारी।
बार-बार मेरी नजर------
उस ताम्बई लड़की को तलाशती है,
जो ऐसे ही एक सफर मे--------
सामने बैठी थी,
पटना से मोतीहारी।
अब भी एक हूक सी उठती है,
दिल मे---------
जब बीना उसके बैठे,
चल पड़ती है--------
अगले स्टेशन के लिये गाड़ी,
पटना से मोतीहारी।
ऐ,रंग-------------
ये सफर एक किताब है मेरी,
पटना से मोतीहारी।
(शहर के लोग)

मुझे नंगी सुला गये मेरी शहर के लोग!
एै खिज़ा के पत्तो--------
तुम कभी मेरी कब्र पे गिरना.
कितनी मोहब्बत थी गुसलखाने से,
रहने नहीं दिये एक इंतकाले सब-----
बड़े बेमुरौवत निकले मेरी शहर के लोग.

मुझे नंगी सुला गये मेरी शहर के लोग.

एै मौसमें सावन--------
तुम कभी मेरी दफ़न-ऐ-बदन पे गिरना!
कभी शफ़क चाँदनी में टहलती थी,
घंटो जिस छत पे,
ले चले उसी छत वाली गली से-----
मेरा जनाज़ा मेरी शहर के लोग.

मुझे नंगी सुला गये मेरी शहर के लोग.

एै चाँद वैसे ही शफ़क रातो की तरह,
मेरी इस रुहे बदन पे पड़ना,
मेरी तड़प है कि अब भुले से नही आते,
शहर तो शहर मेरे अपने घर के लोग.

मुझे नंगी सुला गये मेरी शहर के लोग.

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758
(मिट्टी से जुदा मत करना)
बेटे मै बुढ़ि हो गई हूँ-------------
मुझे इस उम्र में अपने अब्बु से जुदा मत करना।
ना बेचना किसी को-------------
दरवाज़े पे जो उन्होनें लगाया है दरख्त़,
मै उसी से बतियाती हूँ अक्सर,
मुझे दर्द होगा------------
जब कोई काटेगा टंगारे से तेरी अब्बु की याद को।
बेटा बेशक तु मुझे हज़ ना कराना,
पर लेने देना मुझे आखिरी साँस इस मकान में,
मर जाऊँ तो तेरा हक है इस पर,
पर जीते जी मेरे बेटे,
अपनी इस अम्मी को अपने अब्बु के-----
इस मुकद्दस मिट्टी से जुदा मत करना।