Tuesday, 30 March 2021

(घर की पैंजनी रोती है)
बद्चलन-------------
रातो की आगोश मे सो तो लिया!
पर कभी सोचना ऐ,रंग-------
कि तुम्हारे इंतज़ार मे सारी रात,
घर की पैंजनी रोती है।
@Rangnath dubey
(रजिस्टर्ड अप्रैल फूल हूँ)
शादी के बाद से------
किचन और बच्चे संम्भालने मे मशगूल हूँ,,,,,
महारत हासिल कर ली है,,पैर दबाने में,,,,,,,,
वे अक्सर लाल-पीली होती है-------
मै कुल हूँ।
ऐ,रंग--मै अपनी लुगाई का--------
रजिस्टर्ड अप्रैल फूल हूँ।

आप सभी संम्मानित पतीयो व होने वाले पतीयो को मूर्ख दिवस की ढेर सारी बधाई।

Sunday, 28 March 2021

(शबरी के है राम)

सबकी भक्ति-------
सबकी श्रद्धा के है राम!

कौन कहता है कि केवल-----
अयोध्या के है राम.

ऐ,रंग--जुठे बेर जाती की छोटी,,,,,,
शबरी जैसी वृद्धा के है राम.

कविता---(सेब द चाइल्ड लिखवा रही है )

(सेब द चाइल्ड लिखवा रही है)
किसी कन्या भ्रूण को कोई क्या मारेगा?
माँ खुद मरवा रही है।
हँसी-खुशी के साथ हजार दो हजार दे,
हर शहर के पैथालाॅजी मे रिपोर्ट ले,
किसी डाक्टर के टंगे नीले परदे के उस तरफ,
अपना एबार्शन करवा रही है।
आँख इसलिये भर आती है कि-------
इन तथाकथित माँओ ने कालेज मे पढ़ा है,
"इनके पथराये हृदयो ने--------
माँ शब्द की कोमलता खो दी है",
वही निरक्षर माँ----------
चार बेटिया जन पाप-पुण्य से डरती है,
सच तो ये है कि अपनी बेटियो के लिये-----
"उन पढ़ी-लिखि ढोंगी माँओ से ज्यादा,
अपनी इन बेटियो के लिये लड़ती है"।
सरकारी अमले की कारस्तानी तो और है,
जो महिला डाक्टर पैसे ले,
एबार्शन करवाने के लिये चर्चित है,
सुना है कि वही,
पुरे शहर की दिवालो पे-------------
"सेब द चाइल्ड लिखवा रही है"।

@@@भ्रूण हत्या को इंगित करती एक कविता।

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर----222002 (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

Friday, 26 March 2021

संस्मरण---( जेबुन्निसा की कब्र )

लघुकथा---( जेबुन्निसा की कब्र )

मैंने अपनी नौकरी और अपनी उम्र का एक लम्बा अरसा, लखनऊ में गुजारा है.और मैं उस आधार पर यह बात पुरी दावे के साथ कह सकता हूं कि आप बेशक लखनऊ कि सुबह भूल जाएं लेकिन वहां की खूबसूरत शाम आप कभी नहीं भूल सकते जैसे कि मैं अपनी नौकरी के रिटायरमेंट के बाद भी नहीं भूला, अक्सर मेरे जेहन में लखनऊ की खूबसूरत शाम के साथ ही,लखनऊ की उस मशहूर तवायफ जेबुन्निसा की कब्र की याद भी हो आती है.

जिसके बारे में मैंने वहां के स्थानीय लोगों से जाना था कि, कभी जेबुन्निसा इस लखनऊ की जान हुआ करती थी, जिसके कोठे की दहलीज पर लखनऊ का शायद ही कोई ऐसा रईस या नवाब होगा,जिसके कि पांव जेबुन्निसा के मशहूर कोठे पर न पड़े हो, आज भी उस समय के बचे हुए कुछ पुराने लोग उसकी खूबसूरती और ठुमरी की दाद ऐसे देते है कि जैसे वे अपनी बूढ़ी आंखों से उस खूबसूरत और मशहूर तवायफ जेबुन्निसा को ना सिर्फ देख रहे हो बल्कि उसकी  ठुमरी भी उसकी कोठे पर बैठे सुन रहे हो.


जब मैंने जेबुन्निसा के बारे में यह सब सुना तो खुद को  मैं वहां जाने से नहीं रोक पाया जहां कि जेबुन्निसा को उसके मरने के बाद दफनाया गया था, लेकिन उसकि खूबसूरती और मशहुरियत के मुकाबले जब उसकी कब्र को देखा तो मुझे एक असीम पीड़ा हुई.


क्योंकि जेबुन्निसा की कब्र से यह साफ लग रहा था कि कभी लखनऊ के कोठे कि ये रौशन चराग जीनत जब से यहां दफन हुई तबसे उसके सिरहाने कभी किसी चाहने वाले ने एक अदत चराग भी जलाना गवारा ना समझा.इतना ही नहीं बल्कि जेबुन्निसा की कब्र वहां दफनाए गए सभी लोगों से अलग और काफी दूर बनाया गया था, और यह सब शायद इसलिए किया गया था की कही जेबुन्निसा की कब्र कि मिट्टी उनके दफन वालिदो की मिट्टी को नापाक ना कर दे.

 
फिर भी ना जाने क्यों मुझे उस लखनऊ की मशहूर तवायफ जेबुन्निसा की कब्र से एक अंजानी सी मोहब्बत हो गई और मैं अक्सर जब बहुत तनाव में होता था तो जाकर यूं ही घंटों मैं उसकी कब्र  के पास बैठा करता था, मुझे उसकि कब्र के पास बैठने से एक अजीब सा सुकून मिलता था.

इतना ही नही कभी-कभी तो मैं जेबुन्निसा की कब्र से बात करने की कोशिश भी किया करता था,लेकिन वह खामोश रहा करती थी हां मुझे एकाध बार ऐसा जरूर लगता था कि जैसे जेबुन्निसा अपनी टूटी-फूटी कब्र के पास बैठी  सिसक रही हो उसका यह सिसकना तब तलक जारी रहता था जब तलक कि उसकी कब्र की  झाड़-झंखाड़ के पास कुछ सुखें पत्ते हवा से उड़ कर आ नही जाते थे.

वे सुखें पत्ते ही जैसे अब जेबुन्निसा के,दर्द कि आखिरी ठुमरी सुनने के लिए आते थे.फिर इसके बाद मेरा तबादला मेरी  नौकरी के बचे कुछ वर्षो के लिए मेरे अपने शहर में हो गया.फिर मेरी यादों में लखनऊ की शाम और जेबुन्निसा की कब्र रह गई.


यह लघुकथा मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.
दिनांक--27/3/2021

लेखक--- रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P )
mo. no.7800824758.

Sunday, 21 March 2021

लघुकथा---(रोटियों की चोरी )

लघुकथा----(रोटियों की चोरी)

चोर-चोर कहते हुए कुछ लोग एक छोटे से मैले-कुचैले नीक़्कर पहने लड़के को दौड़ाए हुए थे, और वह लड़का बेतहाशा भाग रहा था तभी सामने से आती हुई एक तेज रफ्तार कार से उस बेतहाशा भागते हुए चोर लड़के का एक्सीडेंट हो गया.

इस एक्सीडेंट के होते ही उस कार के ड्राइवर ने घबराहट में अपनी कार को और रफ्तार देदी जिसकी वजह से एक बार फिर उसकी कार उस चोर लड़के  के ऊपर चढ़ गई और ड्राइवर अपनी कार के साथ भाग खड़ा हुआ. उस लड़के के पीछे चोर-चोर कह कर जो लोग दौड़ाए हुए थे उन्होंने भी जब इस हादसे को होता हुआ देखा तो जैसे उन सभी के पाँवो को सांप सुंघ गया हो वे सभी थमकर रुक गए और उनके चोर-चोर कहने वाले होंठ तो जैसे काठ के हो गए हो सभी सर झुकाए उस चोर लड़के की लाश को बड़ी ही आत्मग्लानि से देख रहे थे.

और इतना ही बल्कि इस घटना के तुरंत बाद ही वहां देखते ही देखते एक अच्छी खासी भीड़ इकट्ठी हो गई, और मैं भी उस लड़के को तब से देख रहा था जब से उसे चोर-चोर कह कर कुछ लोग दौड़ाए हुए थे, अतः मैं भी उस भीड़ में जाकर यह देखना चाहता था कि आखिर उस लड़के ने ऐसी क्या चीज चुराई हुई थी जिसकी वजह से, आज उसे अपनी जान से हाथ धोना पड़ा.


जब मैं उस लड़के की लाश के पास पहुंचा तो मैंने देखा कि, एक अखबार में लिपटी हुई कुछ रोटियां उस लड़के की लाश के इधर-उधर बिखरी हुई पड़ी थी, मैं समझ गया कि क्यों बाजार के कुछ लोगों ने इस लड़के को पकड़ने के लिए दौड़ाया हुआ था, क्योंकि इस लड़के ने अपने पेट को भरने के लिए एक बहुत बड़ी चोरी की थी " रोटियों की चोरी ".


यह लघुकथा मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है.

लेखक--रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P )
mo. no.7800824758

कविता---( कविता बोलती है)

विश्व कविता दिवस पे आधारित एक कविता------------
                (कविता बोलती है)
जब दौर-----------
किसी मजलूम का क़त्ल करता है,
तब और तब--------
गूँगे शहर मे कविता बोलती है।
महिला दिवस के दिन रेप होता है,
और आकड़े-------
जब जख्म की खिल्ली उड़ाते है,
तब और तब----------
गूँगे शहर मे कविता बोलती है।
जब सियासत बंद कमरे मे,
मंदिर-मस्जिद और हिन्दू और मुसलमान,
को दंगे मे जलाने की बात करती है,
तब और तब,
इनके इस ईंधन के खिलाफ एै "रंग"-------
गूँगे शहर मे कविता बोलती है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर---222002 (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.---7800824758
(ट्रेन हादसे)
हाई स्पीड़-बुलेट ट्रेन-अच्छे दिन,,,,,
सब ख्व़ाब से,,,,,
मै कैसे गुफ्त़गु करु हर लाश से,,,,,,
छुट गई कलम भी कंप-कपाके मेरे हाथ से।
आखिर कब तलक होते रहेगे,ऐ,रंग----
इस मूल्क़ मे ऐसे ट्रेन हादसे।

ट्रेन हादसे मे मरे हुये लोगो को मेरी श्रद्धांजली।

Saturday, 20 March 2021

(गीत)
गीत----------
केवल उर्वशी या शकुंतला नही!
ऐ,रंग----ये उस गरीब की पतीली भी है,
जिसमें कई रोज से-चावल पके नही।

कविता---( केदारनाथ सिंह- एक श्रद्धांजलि )

(केदारनाथ सिंह-एक श्रद्धांजलि)
केदारनाथ------------
के साहित्य से यहां की मिट्टी बोलती थी,
शब्द-दर-शब्द का खाटीपन था,
पन्ने-दर-पन्ने उनकी किताबभर नही,
दोस्तो को लिखि उस दौर की-------
उनकी हर चिट्ठी बोलती थी।
लेकिन एक-एककर सब जाते गये,
और टुटता गया ये सिलसिला,
गाँव की उबड़-खाबड़ सड़के,
और उनके साथियो की तरह बिछड़े,
किनारे पड़े छिटके आँख नम किये-------
उस सड़क के यादो की गिट्टी बोलती थी।
लेकिन आज वे भी चले गये,
उनके जाने का रुंधापन और नम आँखे,
कह रही कि---------
उनके साहित्य का ये रितापन,
शायद फिर न भर सके।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर--222002 (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Monday, 15 March 2021

(घुँघरु बांधती थी)
रईसो के दरमियां वे सलिके से जाती थी,
कभी ठुमरी,कभी दादरा गाती थी।
ऐ,रंग--वे पाक थी कोठे पे सुना है-----
कि केवल!वे पाँव मे घुँघरु बांधती थी।

Saturday, 13 March 2021

व्यंग्य--(हिंदी में आप कब हंसे )



व्यंग्य----( आइए हिंदी में हंसे )

हमारे देश में बहुत सारे ऐसे लोग हैं,  जिन्हें कायदे से
हिंदी में हंसे एक जमाना हो गया. अब यह तथाकथित लोग चाहकर भी स्वादिष्ट तरीके से हिंदी में हंस नहीं सकते. क्योंकि यह सभी लोग प्रकृतिक रूप से अपने हंसने की ऐसी तैसी कर चुके हैं. इनके चेहरे और होठों को देख कर कोई अदना सा हिंदी का जानकार भी यह दावे से कह सकता है कि-- यह हिंदी में न हंस पाने के एक ऐसे रेगिस्तान में बदल चुके हैं जो अगर हसेंगे भी तो इनका चेहरा, किसी महानगर के फ्लैट के गमले में लगाए गए नागफनी की तरह दिखेगा. 

मुझे तो लगता है कि देश की पूरी जनसंख्या में ऐसे हिंदी में ना हंस पाने वालों की कुल संख्या का अगर सरकारी या गैर सरकारी सर्वे कराया जाए तो मेरा दावा है,  कि ऐसे होनहारो की संख्या हमारे देश की कुल जनसंख्या के 20% तक होगी. यह 20% हिंदी में ना हंस पाने "कुपोषण ग्रस्त हंसी के ऐसे पेशेंट" जिनकी प्रतिवर्ष हिंदी में हंसने वालों से बकायदा काउंसलिंग कराई जाए और इस संख्या में से कुछ ऐसे हिंदी में ना हंस पाने वाले डैमेज व्यक्तियों का चयन कर, इन्हें अलग से प्रत्येक आने वाले हिंदी दिवस से पूर्व किसी हंसने हंसाने की डिग्री देने वाले विश्वविद्यालय का छायांकन इनको हिंदी में हंसने की डिग्री क्लास लेकर कराई जाए. अगर संभव ना हो,  तो कम से कम इन्हें "हिंदी में हंसने का डिप्लोमा कोर्स" करा दिया जाए. 

अगर समय रहते इस विषम मुद्दे पर ध्यान न दिया गया तो यह निश्चित है,  कि --"हमारी हिंदी में हंसने की अद्भुत और जादुई कला धीरे धीरे विलुप्त हो जाएगी." यह एक ऐसी छती होगी जिसकी पूर्ति या भरपाई शायद "हड़प्पा या मोहनजोदड़ो के पढ़ाई जाने वाले ऐतिहासिक साक्ष्यों से भी ना हो सके." इसलिए आइए हम और आप सभी मिलकर आज और अभी से अंग्रेजी रीमिक्स या हिंदी के बनावटी ई-वर्जन की हंसी का परित्याग कर अपने होठों पर "लहलहाती व बलखाती" हुई हंसी को धारण करें. 


दिनांक--14/3/21 के अमर-उजाला "हास्यरंजनी" में प्रकाशित.

यह व्यंग्य मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है. 

लेखक--रंगनाथ द्विवेदी 
जज कालोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin. no. 222002 (U P)
Mo. no. 7800824758

कविता--(नेताओं का घर )

(नेताओ का घर)
मुझे नेताओ का घर---------
अब चकलेवालियो के घर से ज्यादा,
नापाक लगने लगा है।
कोई चरित्र नही इनके बिकने और गिरने का,
मुखौटे-दर-मुखौटे लपेटे,
मुझे नेता अपने जिस्मानी गलिज़गी का,
किसी चकलेवालि के ग्राहक फासने वाले दल्ले-----
से ज्यादा घिनौना दलाल लगने लगा है।
सच अब बड़ी पिड़ा होती है वोट देते,
क्योंकि एै "रंग"-------
अब हमारे सदन की सिढ़ियो की तरफ बढ़ता नेता,
उन पवित्र सिढ़ियो का बद्नुमा दाग लगने लगा है।
मुझे नेताओ का घर--------
अब चकलेवालियो के घर से ज्यादा,
नापाक लगने लगा है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर----222002(उत्तर--प्रदेश)।
mo.no.----7800824758
(माँ के प्यार की रेसिपी)
मै आज भी खाता हूँ रेस्टोरेंट और---
बीबी का पकाया,,
पर ऐ,रंग--भूख नही मिटती।
शायद वे मिला नही पाती खाने मे----
माँ के प्यार की रेसिपी।

Friday, 5 March 2021

कविता--(तबसरा करती है )

(तबसरा करती है)
मेरी गज़ल अक्सर तबसरा करती है,
किसी गरीब की भूख से मशवरा करती है।
सुना है एक हयात और एक जन्नत है शहर,
लेकिन इसी शहर में कुछ जन्नत,
माँ की कोख में मरा करती है--------
मेरी गज़ल अक्सर तबसरा करती है।
मजबूरियाँ बिकती है,खरिदो-फरोख्त़ होता है,
कुरआन पढ़ने वालो जरा सोचो,
किसी गली में हर रात अपने जख्म़-----
न चाह के भी कोई अमीना हरा करती है।
एै"रंग" इसी से न चाह के भी---------
मेरी गज़ल अक्सर तबसरा करती है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

Monday, 1 March 2021

(छोटे शहर का बैजु बाँवरा)
ऐ शोहरते तानसेन,ये तेरा ऐंठना कैसा?
देख लेना फिर हरा देगा तुम्हे--
किसी महफिल मे ऐ,रंग----
किसी छोटे शहर का बैजु बाँवरा।