Friday, 30 April 2021

वरिष्ठ! कहानीकार बड़े भाई राम नगीना मौर्य, जनपद कुशीनगर (उत्तर-प्रदेश) का प्रकाशित कहानी संग्रह " सॉफ्ट कॉर्नर" डाक से प्राप्त हुआ, इसके लिए बड़े भैया को हमारा प्रणाम. 

रचना व पुरस्कार---इनके कहानी संग्रह "आखिरी गेंद" के लिए एक लाख रूपये का "डॉ विद्या निवास मिश्र " पुरस्कार व इसी  कहानी संग्रह के लिए "यशपाल पुरस्कार " उत्तर-प्रदेश साहित्य संस्थान से प्राप्त है. 

साथ ही विभिन्न राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित व पुरस्कृत.

Wednesday, 28 April 2021

कविता--( बचपन की महुवा )

(बचपन की महुवा )

यही--
पहली बार मुझसे मिली थी,
मेंरे बचपन की "महुवा."

इसलिए ये केवल
"महुए" के फुल का मौसम ही नहीं,
बल्कि ये मेरी मोहब्बत और
चाहत का मौसम भी है.

इसलिए,
तो मैं अक्सर आता हूं गाँव 
ताकि उसकी यादें,
फिर मुझसे उसी बचपन की तरह मिलें.

और मैं,
तन्हाई में उसकी यादों से
ये पुछ सकु 
कि बताओ?
तुम फिर कब मिलोगी,
मुझसे,
इसी दरख़्त के नीचे
मेंरे बचपन की "महुवा."

रचयिता--रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P )
Mo. no.7800824758
(एक अलहदा जूबां है)
भरी बज़्म में बीना बोले,
दोनो ने बात कर ली।
ऐ,रंग----खामोंशी भी------
मोहब्बत की एक अलहदा ज़ूबा है।

Friday, 23 April 2021

लेख---(माफ करना आशिफा बिटिया )

कभी हमने मासुम बच्चियों के साथ हो रहे जघन्य व पाशविक बलात्कार पे अपने आँसु रुपी शब्द उकेरे थे।

(माफ करना आशिफ़ा बिटिया)
आशिफ़ा जैसी मासुम बच्चियो के बलात्कार की लाश;महज़ इस देश के किसी भी लहू-लुहान हिस्से मे नही पाई जाती;बल्कि हमारे पशुता और विभत्सता की पराकाष्ठा के जेरेसाया हमारे देश के उस हिस्से के---संगीन के बीचो-बीच "अपने टपकते लहू से ये प्रश्न लिखती है;हिन्दुस्तान के नक्शे से ये सवाल पुछती है कि मुझे किस जुर्म की सजा दी गई? ----मेरे वे कौन से अंग विकसित हुये जिसे तक इस हद तक बलात्कार की इच्छा बलवती हुई की मुझ मासुम का बलात्कार कर मार दिया गया?".
मेरे तो वे यौवनांग भी न दिखे थे;ना ब्रा पहने थी न बड़े व खूबसुरत सुस्पष्ट यौवन उभार थे;मुझ मासुम को फिर क्यूँ इस तरह बेरहमी से नोचा व मारा गया. मै एक मासुम सी बच्ची थी मुझे गोद व वात्सल्य चाहिये था लेकिन मुझे क्या मिला बताओ कि आखिर मुझ जैसी मासुम सी बच्ची का दोष क्या था?.
शायद इन प्रश्नो का उत्तर न ये देश दे पायेगा;न यहा की सियासत और न ही यहॉ की जम्हुरियत दे पायेगी. क्योकि आशिफ़ा जैसी मासुम बच्चियो की लाशे भी इन सियासत दा लोगो को-----" अपने सदन की वे सिढ़ियाँ लगती है जिसे लॉघ इस देश के तमाम घिनौने और घृणित नेता सत्ता सुख की तवायफ़ के अजीमोशान मुज़रे का पुरे पाँच साल तक लुत्फ़ और मज़े लेते है सदन की नम आँखे आशिफ़ा सी तमाम सवालात के साथ खामोश व मौन रहती है".
ये हमारे देश के वे खुशनसीब लोग है जो मंचो और मजलिसो मे चिंघाड-चिंघाड बेटियो को बचाने और उनके पढ़ाने की बात करते है.लेकिन इन्हि की बिरादरी और बस्ती का कोई भी विधायक;नेता;मंत्री सांसद, उन्नाव सा इस देश को एक दर्द दे अपनी पुरी विश्वसनिय निर्लज्जता का परिचय देता है.ये वे चुनिंदा शैतान है दिनकी आवाभगत थानेदार,यस.पी.,डि.यम. सभी करते है. "ये दोयम दरज़े की कमिनगी मैने कईयो कई खाकी और खद्दर वाले मे देखी है". खासकर इनकी हनक मैने मजलूमो और कमजोरो पर ही अधिक देखि है.सच पुछियो तो इनकी दबंगई किसी-किसी मामले मे अपराधी से भी ज्यादा खतरनाक है.अगर अपराध के एक पहलु का नंगा जायज़ा लिया जाय तो आप पायेंगे---" कि आशिफ़ा और उन्नाव जैसी घचना के एक अघोषित पात्र ये भी है ये वे सरकारी कलाकार है जिनकी मदत से कभी-कभी सियासत अपने खून के छिटे भी साफ करवाती है".
            कई अपराधी राष्ट्रिय,अंतराष्ट्रिय जेलो मे बंद हो हत्या पे हत्या करवाये जा रहे है,पर किसी--"उन्नाव सी घटना का फरियादी पिता रो वही पवित्र थाने और जेल मे मार दिया जाता है और उसकी थाने पे ऐफ.आई.आर तक नही लिखि जाती".सच तो ये है कि बच्ची कोई हो चाहे हिन्दु या मुसलमान की वे आशिफ़ा, गीता हो पशु को महज़ पशु कहा जाये न कि किसी आठ साल की मासुम सी बच्ची के बलात्कार की लाश --"राजनीति के कडाहे मे पका उसे अपनी राजनीति की मदांधता के नानवेज का लेग पीस".
हा!जबसे मैने आशिफ़ा की वे नग्न जिस्मानी-हवस के नाखुनी निशानो से भरी उसकी वे पीठ देखी है तबसे मुझे जाने क्यूँ लग रहा है कि ये--"आठ साल की मासुम आशिफ़ा ज़मीन पर नही अपितु हमारे और आपके उस गीता के श्लोक और कुरआन की मुकद्दस आयत पे पड़ी है दिसे हम रोज चुमते व पढ़ते है". अब तो मै बस यही लिख सकता हूं----"कि उफ! आशिफ़ा बिटिया दोबारा तुम किसी एैसे मुल्क मे जन्मो जहा तुम्हारे मासुम और कोमल से बदन पे ये निशान न हो".

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर-----222002 (उत्तर--प्रदेश).
no.no.----7800824758.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

धन्यवाद दैनिक वर्तमान अंकुर और निर्मेश के त्यागी भईया मेरे इस लेख को अपना प्यार व स्नेह देने के लिये.
(तु मेरी आवारा लत है)
तड़प-तड़प के मर जाऊँगा,,बे-शक मै----
पर नही छोड़ पाऊँगा तुझको--------
तु मेरी आवारा लत है।

(मुमताज़ की आँखें )

(मुमताज़ की आँखे)
है सबसे खुबसुरत मेरी मुमताज़ की आँखे,
कितना कशीश,कितना नशा लिये है-----
मेरी मुमताज़ की आँखे!
कभी यहाॅ उठे,कभी वहाँ उठे,
है कैमरे से कही अच्छि--------
मेरी मुमताज़ की आँखे।
है मेरा दिले परिंदा परवाज़ को बेचैन,
ऐ,रंग---आसमाँ है मेरी मुमताज़ की आँखे।

Saturday, 17 April 2021

कविता--(योग ना हमारे राम ना तुम्हारें रहीम का है )

(योग--न हमारे राम और न तुम्हारे रहिम का है)
योग----------
न हमारे राम और न तुम्हारे रहिम का है।
रुग्ण मन,रुग्ण काया किस काम का बोलो,
शरीर,शरीर पहले है ये कहां--------
किसी हिन्दू या मुसलमान का है।
योग----------
न हमारे राम और न तुम्हारे रहिम का है।
आओ इसके आसन मे प्रेम है अपना ले,
स्वस्थ रहेगे ये मन सभी बना ले,
आखिर घर-घर है दवाखाना नही------
किसी वैद्य या हकिम का है।
योग----------
न हमारे राम और न तुम्हारे रहिम का है।
इसे घूँघट या पर्दानश़ी औरत मे हरगिज़ न बाँटिये,
क्योंकि योग---------
हर शख्स़ और तंजीम का है।
योग-------
न हमारे राम और न तुम्हारे रहिम का है।
पुरी दुनिया हो उठी है कायल,
इसका फक्र है हमें,
क्योंकि हमारा योग एै"रंग"-------
न किसी रसिया न किसी चीन का है।
योग--------
न हमारे राम और न तुम्हारें रहिम का है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
mo.no.-----7800824758

Tuesday, 6 April 2021

(आधा शहर कत्ल हो जाये)
उनके निगाहो की है,,,तासीर कुछ ऐसी,,,,
गर तबीयत से देख ले तो,,,,,,,,,,,
दावा है,ऐ,रंग--------
कि आधा शहर कत्ल हो जाये।
(मकान बेच आये)
नीम बेच आये,उसकी छाँव बेच आये!
जीस कमरे मे हमें माँ की लोरी सुलाती थी,
ऐ शहर तेरी ज़वा आगोश की खातीर,
हम वे मकान बेच आये।

कविता--(शाम आवारा भटकना चाहता हूं )

(शाम आवारा भटकना चाहता हूँ)
देवताओ से उबन होने लगी है---------
मै कुछ शाम आवारा भटकना चाहता हूँ।
हर एक के ख्व़ाहिश के फूल की तरह,
मै किसी मंदिर-मस्जिद या कब्र पे चढू----
ये गवारा नही,
हाँ मै किसी तवायफ़ के गजरे से लग-----
एक रात ही सही महकना चाहता हूँ।
ये दावते रईशी के निवाले बहुत हुये,
मै किसी फुटपाथ पे-------------
उस हरामी बच्चे की तरह,
अखबार पे सुखी रोटियां रख,
मै भी शहर के नाले की बजबजाती बू के पास,
उस सरकारी नल के पानी से----------
कुछ कौर निगलना चाहता हूँ।
देवताओ से उबन होने लगी है"रंग"-------
मै कुछ शाम आवारा भटकना चाहता हूँ।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

Saturday, 3 April 2021

कविता---(बेजा तलाक ना दो )

(बेजा तलाक न दो)
ख्वा़हिशो को खाक न दो!
एै मेरे शौहर-----------
सरिया के नाम पे,
मुझे बेजा तलाक न दो।
बख्श दो---------
कहा जाऊँगी ले मासुम बच्चे,
मुझ बेगुनाह को-------
इतना भी शाॅक न दो,
बेजा तलाक न दो।
न उड़ेलो कान में पिघले हुये शीशे,
मुझ बांदी को सजा तुम--------
इतनी खौफ़नाक न दो,
बेजा तलाक न दो।
न छिनो छत,न लिबास
खुदा के वास्ते रहने दो,
मेरी बेगुनाही झुलस जाये-------
मुझे वे तेजाब न दो,
बेजा तलाक न दो।
सी लुंगी लब,रह लुंगी लाशे जिंदा,
लाके रहना तुम दु जी निकाहे औरत,
मै उफ न करुंगी!
बस मेरे बच्चो की खुशीयो को कोई बेजा,
इस्लामी हलाक न दो-------
बेजा तलाक न दो।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.7800824758
____तलाक एक दर्द है जो इसे भुगत रही कोई औरत ही समझ सकती है!अगर संभव है तो मेरी इस रचना के पढ़ने वालो से मेरी कलम अनुरोध करती है प्लीज कभी किसी भी औरत से बेजा तलाक न ले,शुक्रिया।