Sunday, 31 December 2023

(कैलेंडर की विदाई)

(कलेन्डर की विदाई)
कभी पहली तारीख थी-----
आज़ आखिरी तारीख हूँ,
लाओ टाँगो एक और कलेन्डर---
मै उफ!न करुँगी,बस ये ख्व़ाहिश है कि,
मुझे अपने घर की दिवाल से,
ऐ,रंग----उसी प्यार से उतारो------
जैसे कभी टाँगा था।

(कैनवास पर नया साल)

(कैनवास पे नया साल)
मेरा वजुद क्या है?मैने पुछा है नया साल,
क्या शिला यही है कि दर्द ही मिले,
मैने तो दिल के अपने कैनवस पे तुमको,
खिचा है नया साल------------
मेरा वजुद क्या है?मैने पुछा है नया साल।
मैने ख्वा़बो के घरौंदे को कितना सजाया,
पर वे भुले नही भुला,हमे जिनको भुलना था,
उन्ही की याद मे तो शायद,
अपनी अश्को से हमने यारो सिचा है नया साल----------
मेरा वजुद क्या है?मैने पुछा है नया साल।
मुझे मिली है दुरियाँ तोहफ़े मे इंतज़ार,
मै खड़ा हुं अजनबी सा हर कही,
मै जाऊं किधर,क्या पता,मंज़िल कहां,
लो नाम लेके उनका मैने चिखा है नया साल------
मेरा वजुद क्या है? मैने पुछा है नया साल।
पर गिला नही एै दुर के साथी,
मै तो कोसता हूं बस अपनी मुकद्दर को,
बस तुमको खुशी मिले एै शरिके हयात मेरी-----
और मुबारक हो नया साल।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

@@@धन्यवाद आपका सतिश जोशी भईया जो मध्य प्रदेश से प्रकाशित 6pmसांध्य दैनिक मे आपने मेरी कविता(कैनवास पे नया साल) को अपना प्यार और स्नेह दिया।

Friday, 29 December 2023

(मूंह दिखाई दी हैं)

(मूँह दिखाई दी है)
तु चाहे--------
जितना सज ले ऐ शहर-ए-दूल्हन,
मैने तो अपनी पुरानी दूल्हन को,
ऐ,रंग----ताज़िदगी-------
नये सुबह की मूँह दिखाई दी है।

@@@नये साल की कडी मे एक और रचना।

Thursday, 28 December 2023

(पूस की रात)

(पुस की रात)
कहाँ कटती है-
फटे कंम्बल से,ऐ शहर गाँव मे,
पुस की रात।
हाँड़ कंप-कपाती ठंड मे,
कहाँ देख पाता है-शहर
खेत के किनारे पडे किसी-
किसान की लाश।
अखबार की बे-शरमी है,रंग-
वरना गाँव मे आज भी है,वही ठंड
और वही प्रेमचंद के-
               पुस की रात।

(दिसंबर की आखिरी रात)

(दिसंम्बर की आखिरी रात)
शकीना कलेन्डर मे लपेट के लाई है रोटी,
ऐ,रंग----इसके भूखे पेट का पागलपन देख-----
और देख हवस के खरोचो ने इसके पुरे बदन पे लिखा है------
दिसंम्बर की आखिरी रात।

(दिसंबर बनके हमारे)

जनवरी से लेकर दिसंबर तक के रोमांटिक प्यार की काब्य गाथा।
(दिसंबर बनके हमारे प्यार की ऐनवर्सरी आई थी)
कभी बन सँवर के दुल्हन सी---------
मेरे कमरे मे जनवरी आई थी।
सच वे गुलाब ही तो पकड़ा था तुमने,
जो इतने सालो से बेनुर था,
मेरी जिंदगी में-----------
वेलेनटाइन डे की रोमानियत लिये,
वे पहली फरवरी आई थी।
मार्च के महिने मे-----------
पहली बार खिले थे मेरी अरमान के गुलमुहर,
हमारे प्यार की डालियो पे कोयल कूकी थी,
वे मार्च ही था-----------
जब आम और महुवे पे मंजरी आई थी।
अप्रैल याद है---------
जब तुम मायके गई थी,
मै कितना उदास था-------
कई राते हमे नींद कहां आई थी।
फिर मई महिने ने ही उबारा था,
हमे तेरी विरह से!
इसी महिने इंतज़ार करते हुये मेरे कमरे मे---
कमरे की परी आई थी।
फिर जून की तपिस में--------
हम घंटो टहलने निकलते थे एक दुजे का हाथ पकड़े,
नदी के तट की तरफ,
वे शामे शरारत याद है और याद है वे कंपकपाते होंठ,
जब हमने अपनी अँगुलियो से छुआ था,
और तुम्हारी झील सी आँखो मे शर्म उतर आई थी।
फिर जुलाई की---------
वे घिरी बदलियां,
वे बारिश मे पहली बार तुम्हे छत पे भीगा देखना एकटक,
फिर बिजली की गरज सुन,
तुम एक हिरनी सी दौड़ी मेरी बाँहो मे चली आई थी,
मुझे भी तुम्हे छेड़ने की---------
इस बरसात मे मसखरी आई थी।
फिर पुरा अगस्त-----------
तुम्हारी बहन की चुहलबाजियो में गुजरा,
मौके कम मिले,
तब पहली बार तुम्हे चिढ़ाते आँखो से मुस्कुराते कनखियो से देखा,
मै मन ही मन कुढ़ता रहा क्या करता?
मेरे हारने और तेरी शरारतो के जितने की घड़ी आई थी।
फिर सितम्बर ने दिये मौके,
वे मौके जो मै भुलता नही,क्योंकि इसी महिने
तेरी कलाई की तमाम चुड़ियाँ टूटी,
और इसी महिने तेरे लिये,
मैने दर्जनो की तादात मे खरिदे,
तुम्हारी साड़ी से मैच करती तमाम चुड़ियाँ,
उन चुड़ियो मे तुमने कहा था---------
कि तुम्हे पसंद दिल से चुड़ी हरि आई थी।
फिर अक्टुबर के महिने मे,
हमने-तुमने अपनी जिंदगी के इस हनीमून को,
फिर टटोला!
लगा कि अभी भी तुम सुहागरात सी हो----
जैसे घूँघट किये आई थी।
फिर नवंबर---------
हमारी-तुम्हारी जिंदगी मे महिना नही था,
हम माँ-बाप बन गये थे,
हमारे आँगन में-----------
हँसने-खेलने एक गुड़िया चली आई थी।
इस दिसम्बर----------
जो हमारे कमरे मे कैलेंडर टंगा है,
उसमे एक छोटी सी बिटिया को,
छोटे-छोटे नन्हे पाँवो मे----------
घूँघरुओ की पायल पहने चलते दिखाया है,
हमारी बिटिया केवल बिटिया नही,
इस दिसम्बर बनके--------------
हमारे प्यार की ऐनवर्सरी आई थी।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

###अखबार मे छपी रचना को न पढ़ पाने वाले परम स्नेही लोगो की शिकायत को दुर करने का एक प्रयास।

Tuesday, 26 December 2023

(साधना कट)

अपने समय की मशहूर अदाकारा साधना की मौत आज ही के दिन हुई थी और उस दिन मैने चंद लाईन मरहूम साधना के लिये लिखि थी।
खासकर आज भी महिलाओ के हेयर कट की बात अगर आती है तो सबसे पहले एक कट का नाम आता है और वे कट है साधना कट।

(साधना कट)
सिसक उठे मोहब्ब़त के सभी खत,
उफ!खत्म हो गया-------
हमारी दौर का आखिरी चित्रपट।
वे सिटियां,वे तालियां याद आ रही,
हाय!आज कितनी तन्हा जा रही है-----
ऐ,रंग---हम लोगो की साधना कट।

Monday, 25 December 2023

(सदन है!लेकिन अटल कोई नही)

(सदन है! लेकिन अटल कोई नही)

सदन है---
लेकिन अटल कोई नही.

वे घंटो अपनी रौ मे बोलते,
कभी अपनी
तो कभी सब के मन की गाँठ खोलते,
कहकहे , ठहाको के बीच 
वे उनका चुटिलापन,
कितना खाली हो गया है,सदन--
शायद!
अब भी उनका हल कोई नही.
सदन है----
लेकिन अटल कोई नही.

ना झुका,
ना रुका पोखरण तक,
शायद! 
राष्ट्रभक्ति थी उनके अंतःकरण तक
लेकिन वे पड़ोस को चाहते भी थे,
तभी तो बस ले लाहौर तक,
लेकिन छल किया मुशर्रफ़ ने
और अटल के मन मे था महज़ प्यार,
ऐ "रंग" छल कोई नही.
सदन है----
लेकिन अटल कोई नही.

वे स्वर्ग में हो ये कामना है,
सच सियासत मे उनके बाद 
बस टाट ही आये,
उनके जैसा--
रेशमी मखमल कोई नही.
सदन है---
लेकिन अटल कोई नही.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित हैं.

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
mo.no.-----7800824758
rangnathdubey90@gmail.com

(सेंटा क्लॉज हो जाए)

(सेंटा क्लॉज हो जाएं)

आओ बांटे तोहफे यतीमो में हम,
किसी अपाहिज की बैसाखी,
या किसी गूंगे की मीठी जुबान हो जाएं,

ऐ"रंग"----
आओ एक रात ही सही,
हम सेंटा क्लॉज हो जाए 

रंगनाथ द्विवेदी,.
जौनपुर, mo. no.7800824758.

Sunday, 24 December 2023

(मुल्क की याद आती हैं)

(मुल्क की याद आती है)
इस गैरे मुल्क में-----------------
बड़ी शिद्दत से मुझे अपने मुल्क की याद आती है।
खोल देता हूं खिड़कियाँ,
और घंटो टहलता हूं कमरे मे-------
जब रात आती है!
अपने मुल्क की याद आती है।
तकता हूं चाँद तो बीबी का चेहरा नुमाया होता है,
याद फिर उसकी हर बात आती है!
अपने मुल्क की याद आती है।
तारे जैसे हो मेरे मासूम बेटे,
उन तारो से गुफ्तगू करता हूं,
लेकिन उन्हे जब प्यार करने को बढ़ाता हूं हाथ,
तो बस खाली हाथ रहता है,
मेरे हिस्से यही इतनी सी सौगात आती है!
अपने मुल्क की याद आती है।
फिर खिड़की से---------------
अंदर आती है एक झीनी सी रौशनी,
जैसे मेरे अब्बु की दुआ!
फिर हवा की एक ठंडी छुवन मे अम्मी की मोहब्बत,
उफ!ये रोटी,ये दोज़ख की बेबसी
कि सहर होने तलक-------------
अपने घर के हर शख्स की जरुरत,
और बहन के निकाह की-----------
याद बस इमदाद आती है!
इस गैरे मुल्क मे------------
बड़ी शिद्दत से मुझे अपने मुल्क की याद आती है।
## # मुल्क से बाहर कमा रहे एक शख्स के अंतरमन की व्यथा।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

###धन्यवाद आपका हृदय से निर्मेश के त्यागी भईया जो आप मुझ छोटे अनुज पे अपना प्यार और दुलार बनाये हुये है,वर्तमान अंकुर दैनिक मे प्रकाशन के स्नेह से अभिभूत करने का जो आशीर्वाद आपसे मिला उसका सुख शब्द बया भी नही कर सकते!धन्यवाद।

(तवायफ की कब्र हैं)

(तवायफ़ की कब्र हैं)

यहां चराग नही जलते,
कोई चादर नही चढ़ती,
ये शहर की---
मशह़ूर तवायफ़ की कब्र है.

आज भी करती है ये रुह़े मुज़रा,
फिर फूट के रोती है,
ए,रंग--
बस आ जाते है खिज़ा में--
दरख्त़ो के चंद पत्ते 
आवारगी करने
ये शहर की---
मशह़ूर तवायफ़ की कब्र है.

✍️✍️यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित हैं इसका बिना मेरी अनुमति के कहीं अन्य या अपने नाम से ना पोस्ट करें💐💐

रचनाकार---रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी,मियापुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
mo.no.7800824758
rangnathdubey90@gmail.com

Friday, 22 December 2023

(नेपाल जाना चाहता हूं)

(नेपाल जाना चाहता हूँ)
मै खुबसुरती देखने,मणिपुर-
इम्फाल जाना चाहता हूँ।
काली खुली जुल्फें,काली बडी आँखे
और काला जादु,ऐ दिल-
मैं बंगाल जाना चाहता हूँ।
कागज के कैनवस पे रफ्ता-रफ्ता-
उतरती एक अल्हड पहाड़ी लडकी,
और ढलती शाम।
ऐ,रंग-मै इसी सफर मे-
नेपाल जाना चाहता हूँ।

(हिंदू बस्तियों में राम कहेंगे)

(हिन्दू बस्तियो में राम कहेंगे)
ये चुनावी सीजन है,सावधान हो जाओ-
क्युकि अब खद्दर पहने लोग-----
आयेगे अयोध्या।
फिर सहम उठेगा सरयू का पानी,
ऐ,रंग--ये मुस्लिम बस्तियो मे अल्लाह हू,
और हिन्दू बस्तियो में राम कहेंगे।

Tuesday, 19 December 2023

(सिद्धांत सारे खोखले निकले)

(सिध्दांत सारे खोखले नीकले)
कैसे नयी पौध,नयी कोपले नीकले
मेरे अपने ही आस-पास कुछ दोगले नीकले।
क्या खुब सियासत है हँसते शख्श की,
ऐ ,रंग-
सिध्दांत बडे ऊँचे पर खोखले नीकले।

(मेरी रूह बोलेगी)

(मेरी रुह बोलेगी)
मेरा कत्ल इतना आसान नही,
मै सच का मुहाफिज़ हूँ ,
ऐ,रंग----गर दफ्ऩ भी हुआ-----
तो मेरी रुह बोलेगी।

(मौलवी के होंठ)

(मौलवी के होंठ )

लेते है--
चाय की,चुस्कियां 
हमारे शहर में,
"कबीर" और "दादू" के होंठ.

और चाय भी
बड़े फक्र से लगती है,
अलसुबह 
हमारे शहर में---
हिंदी और उर्दू के होंठ..

तहजीब और सलीका 
हमारी रवायत हैं
तभी तो
पंडित को "राम राम"
कहने को खुलते हैं
यहां सबसे पहले "मौलवी के होंठ".

✍️✍️"यह रचना मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित हैं,अतः बिना किसी भी प्रकार के अनुमति के इसका कहीं अन्यंत्र इस्तेमाल ना करें"🙏🙏

रंगनाथ द्विवेदी,
जौनपुर, उत्तर प्रदेश
mo.no.-7800824758

Monday, 18 December 2023

(इवियम से छेड़खानी)

(इवीयम से छेड़खानी)
जहाँ जिते वहाँ चाँनी--------------
और जहाँ हारे वहाँ इवीयम से छेड़खानी।
वाह रे! काग्रेंस
और पप्पु से अध्यक्ष हुये राहुल,
फड़फड़ाहट बता रही,
कि गुजरात चुनाव के बाद,
फिर याद आनी है-----------
आपको इटली और अपनी नानी।
आप राजनीति के अपरिपक्व है,
इसे आप स्वीकार नही पा रहे,
अपनी डफली अपना राग गा रहे,
जब तलक गुणवत्ता नही होगी,
याद रखिये आपकी ये सत्ता नही होगी,
बस रोते रहेंगे आप-----------
और हँसते रहेंगे आप पे मोदी,शाह,अडानी।
वापसी गर करनी है,
तो खानदानी शार्टकट से कुछ न मिलेगा,
ये लोकतंत्र है आपको सिखनी पड़ेगी,
दिन रात एक कर,
कि किसके साथ कहाँ राम-राम कहना है----
और कहाँ खाना है लंगर घंटो सुन गुरबानी।
गर न सिख पाओगे तो याद रखना,
तो काग्रेंस के हाथ सत्ता नही आनी,
और ये कह आप ज्यादा रो भी नही सकते,
क्योंकि जनता बेवकूफ नही,
कि आपकी हर हार को समझे-------
एै "रंग" महज़ इवीयम से हुई छेड़खानी।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

आज की मतगणना का परिणाम चाहे जो हो पर अगर मिडिया का सर्वे सच हुआ तो इतना जरुर कहुँगा कि "राहुल जी आपके लिये बड़ी कठिन डगर है इस राजनीति के पनघट की"।

(चुनाव)

(चुनाव)
कही बंगाल तो कही आसाम जा रहा है,
कोई तड़प रहा है कि------------------
उसका निज़ाम जा रहा है।
ये जम्हूरियत है ऐ,दोस्त------
अब न चलेगी मज़हबी अईय्यारी,
क्योंकि कि वोट देने--------------
ना अब कोई हिन्दू ,ना मूसलमान जा रहा है।

(इंतजार करके रोई)

(इंतज़ार करके रोयी)
खुद को बाँहो में भरके रोयी,
वे तवायफ थी-------
हर रात सजके रोयी।
थिरके पाँव,टुटे घुँघरु ऐ,रंग-------
वे कितना इंतजार करके रोयी।

Sunday, 17 December 2023

(कुत्ता होने से बच जा)

(कुत्ता होने से बच जा)

ऐ तरक्की झूठ मत बोल
मैंने
महंगे कुत्तों को घरों में
बूढ़े मां बाप से ज्यादा 
प्यार पाते देखा हैं
उन कुत्तों को भी 
ऐसे घरों के
कुत्तेपन पर मुस्कुराते देखा है .

गौर कर तो 
वे तेरे बेडरुम में
तुझसे भी ज्यादा करीब 
तेरी पत्नी के सोया है,
तू कभी उसकी जगह
सो के देख 
वे तुझे घुरेगा,
अपने दुश्मन कुत्ते की तरह

आंख खोल
उठ पगले
गैराज में खासती मां 
और ढाढस बंधाते बाप के 
सीने से लिपट जा
और
एक कुत्ता होने से बच जा.

यह रचना मेरी स्वरचित और अप्रकाशित है.

रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी,मियांपुर 
जौनपुर (उत्तर-प्रदेश)

(मैं सयाना नही हुआ)

(मै सयाना नही हुआ)
माँ बुढ़ि हो गई------------
मै सयाना नही हुआ।
चाहे जितना जहां से भी खाके लौटु,
फिर भी जब तलक अपने हाथ के,
दो निवाले न खिला ले---------
कहती है तब तलक माँ कि बेटा झूठ न बोल,
अभी तलक तेरा खाना नही हुआ।
माँ बुढ़ि हो गई----------
मै सयाना नही हुआ।
बीबी मेरी दरवाज़े पे खड़ी हो,
तकती है माँ का प्यार!
उसने गिली आँखो से कई मर्तबा कहां,
मै कितनी खुशनसीब हूं,आप सा पती पा
जिसका कभी कमरे में,
बीना माँ से मिले अपने------
कभी आना नही हुआ।
माँ बुढ़ि हो गई--------
मै सयाना नही हुआ।
सच मुझे भी लगता है उतनी देर,
माँ के पास-------
जब बाल सहला वे बचपन सा,
मुझे घंटो,अच्छा-बुरा समझाती है,
तो लगता है बस कुछ वक्त सरका है----
मै सयाना नही हुआ।
माँ बुढ़ि हो गई--------
मै सयाना नही हुआ।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

(बॉलीवुड एक बेवा बिखराव है)

(बाॅलीवुड----एक बेवा बिखराव है)
बाॅलीवुड----------
नरगिस और राज कपुर का अलगाव है,
गुरुदत्त की ख़ुदकुशी है,
तो घुट-घुट के दुनिया से विदा हुई------
मीना कुमारी के सीने का घाव है।
बाॅलीवुड----------
आँसू और ड्रामा है नही,
ये उस काका के आनंद का किरदार है,
जो बाबु मोशाय के बाद--------
एक तन्हा कोठरी में तड़पता और घुटता,
एक शराबी---------
की पिड़ाओ का गैंग्रीनी पाँव है।
बाॅलीवुड----------
वे परवीन बाॅबी है जिसे कई महेश भट्ट ने चाहा जरुर,
पर तन्हा छोड़ दिया!
वे डिप्रेस्ड बंद कमरे में छ दिनो तलक,
मरी पड़ी रही बीना किसी वारिस के,
सच तो ये है कि बाॅलीवुड-------
एक औरत की अधुरी ख्वा़हिशो का,
वही परवीन बाॅबी वाली सडी लाश की तरह,
अपने बिस्तर पर पड़ी----------
एक बेवा बिखराव है।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

(दो घड़ी की रात)

(दो घड़ी की रात)
जिंदगी है बस दो घड़ी की रात,
आओ गुज़ार ले लिहाफ में हम,
एक दुजे के संग---
दो घड़ी की रात।
आयेगी धूप कमरे में कल किसी और के लिये,
खुली खिड़की से फिर बाल सँवारेगी कोई दुल्हन,
फिर अँधेरा होगा!
वे भी गुजारेगी इसी तरह अपनी जिंदगी की-------------
ये दो घड़ी की रात।
भुल जायेंगे सभी एक दिन रफ्ता-रफ्ता,
जैसे हम भुले है औरो के जिंदगी की---
दो घड़ी की रात।
एै,रंग-----यहाँ से हमी फना होगे,
बाकी यही रह जायेगी औरो के लिये---
ये दो घड़ी की रात

(लड़कियों के ब्वायफ्रेंड हो गए)

(लड़कियो के ब्वायफ्रेंन्ड हो गये)
स्कूल के बस्ते----------------
बढ़ते-बढ़ते बैग हो गये!
खत लिखने वाले देश की संवेदना मर गई,
दिल में रहने वाले लोग------------
सब मोबाइल में टैग हो गये।
माँ यशोदा का आँचल बदला,
वे जिंस और टाप पहन के माम हो गई,
और जितने भी पिता थे वे रफ्ता-रफ्ता डैड हो गये।
दूध-घी खाने-पीने वाले देश ने गिलास रख दिया,
अब उन्ही गिलासो में---------------
बार बालाओ के ढ़ाले पैग हो गये।
अर्द्धनग्न सड़को पे--------------
यौवन उछालती कुछ माडर्न लड़कियाे
के अश्लील और भौड़े कपड़े,
शर्म आती है लिखते,
कि जिस देश में भाई होते थे,
एै,रंग-------आज उसी देश में लड़के,
होटलो के बंद कमरो में--------------
इन लड़कियो के ब्वायफ्रेंन्ड हो गये।

(अपने पापा की गुड़िया)

(अपने पापा की गुड़िया)
दो चुटिया बांधे और फ्रॉक पहने,
दरवाजे पे-खड़ी रहती थी---------
घंटो कभी अपने पापा की गुड़िया।
फिर समय खिसकता गया,
मै बड़ी होती गई!
मेरे ब्याह को जाने लगे वे देखने लड़के,
फिर ब्याह हुआ,
मै विदा हुई पापा रोये नही,
पर मैने उनके अंदर----------
के आँसूओ का गीलापन महसूस किया,
पीछे छोड़ आई सब कुछ
अपने पापा की गुड़िया।
सुना था बहुत दिनो तक,
पापा तकते रहे वे दरवाज़ा,
शायद ये सोच----------------
कि यही खड़ी रहती थी कभी,
उनके इंतज़ार में घंटो,
फ्रॉक पहने दो चुटिया बांधे
इस पापा की अपने गुड़िया।
फिर आखिरी मर्तबा उन्हे बीमारी मे देखा,
वे चल बसे!
अब यादो में है-------------------
कुछ फ्रॉक दो चुटिया
और तन्हा खड़ी-----------------
दरवाजे के उस तरफ,
आँखो में आँसू लिये----------------
अपने पापा की गुड़िया।

(पत्थर की हो गई)

(पत्थर की हो गई)
मै जबसे---------------
उस बेवफ़ा सितमगर की हो गई,
सूख गये अरमान मैं पत्थर की हो गई।
क्या-क्या नही छोड़ा खातिर उसके,
वालिद का दिल तोड़ा!
बसने आई थी मैं बेघर की हो गई।
मै जबसे---------------
सुर्ख जोड़े,हिना,आईना सिसके
ये अज़ीब निकाह है देखो,
कुबूल कर भी ऐ,रंग----------
मै बीना शौहर की हो गई।
मै जबसे--------------
उस बेवफ़ा सितमगर की हो गई,
सूख गये अरमान मैं पत्थर की हो गई।

(भूख जिंदा है)

(भूख जिंदा है)
पेट तो भर गया लेकिन भूख जिंदा है,
ऐ तरक्की---------------------
तेरी आड़ में हर झूठ जिंदा है।
हरिया की लाश आज भी है लहूलुहान,
कातिलो के हाथ में बंदूक जिंदा है।
लुट रही है आबरु हर एक स्याह रात,
पुरे बदन पे अबला के ये जूठ जिंदा है।
ख़ुदकुशी कर ली कल किसान ने,
ऐ,रंग-----आज अखबार में
उसकी कर्ज माफी और छुट जिंदा है।
पेट तो भर गया लेकिन भूख जिंदा है।
## # इस रचना को पुरा पढ़े ये अनुरोध है।

(दंगा याद है)

(दंगा याद है)
हमें पुराना शहर याद है,
एक-एक गली मुहल्ला याद है।
वे कुर्आनखानी का खुरमा,
मुँह पोछती अपने दुपट्टे से,
अब्दुल की अम्मा याद है।
हमें पुराना शहर याद है!
राखी सुनि थी एक ब्राह्मन के घर,
आँख मे खुशियो के आँसू---------
मेरी इस कलाई को सलमा याद है।
हमें पुराना शहर याद है!
इतने सालों बाद देखा जब जला घर,
पुछा कहां गये ये सब,
तो नये शहर के बाशिंदो ने बताया,
तो अफसोस हुआ,रंग---------------
कि अब नये शहर को,
पुराने शहर की मोहब्बत नही,
नफरत,लाशे और दंगा याद है।
हमें पुराना शहर याद है।

Saturday, 16 December 2023

(पेशावर में मासुमो का कत्ल)

(पेशावर मे मासुमो का कत्ल)
मासुम बच्चो की लाशो पे-
मरसिया लिख रहा हुँ।
अभी कल बीता है लम्हे चेहल्लुम,
सीना फट गया हिन्दु का
कलम सदमे में है।
खैरात,ज़कात,नमाज़,रोजा,हज
सब हराम है मुसलमानो,
आखिर इतना कत्ल, ऐ रंग-
कूर्आन के किस पन्ने में है।

मरसिया-शोक गीत को कहते है।

Friday, 15 December 2023

(अपने मुल्क से बिछड़ी हूं)

(अपने मुल्क से बिछडी हूँ)
मुझे ना बताओ------------
मै तुमसे भी ज्यादा,दर्द से गुजरी हूँ।
तुमने तो कमाने के लिये,
बस घर छोड़ा है ऐ,रंग------
मै तो अपने मुल्क से बिछड़ी हूँ।

(मुझे टूट के चाहने वाले)

(मुझे टूट के चाहने वाले)
मुझे भुलना मत-----------
एै मुझे टूट के चाहने वाले।
मै फ़ना हो जाऊंगा तेरी लहरो मे शौक से,
बस मुझे अपने से अलग मत करना-------
एै मुझे टूट के चाहने वाले।
जलने देना मेरा मासूम चरागे दिल किसी कोने मे,
बेसक बुझ जाऊंगा सहर होने तक,
पर तु बेरुख़ी से ना बुझाना----------
एै मुझे टूट के चाहने वाले।
बेशक मेरी ख्व़ाहिशे मईयत गुजरे तेरे कुचे से,
पर आँख मे आँसू लिये ना आना अपनी छत पे,
मै तड़प उठुंगा मर के भी ,
क्योंकि तुम्हें इस हाल मे देखु एैसी हिम्मत नही मुझमें------------
एै मुझे टूट के चाहने वाले।
@@@एक बेहद उम्दा मोहब्बत करने वालो के नाम नज्म़।
सहर----सुबह।
रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

@@@धन्यवाद डेली वर्तमान अंकुर और निर्मेश के त्यागी भईया मेरी नज्म़ को अपना बेशकिमती प्यार देने के लिये।

(गुजराती नीच से हारे)

(गुजराती नीच से हारे)
ना आधे और नाही बीच से हारे-----------
राहुल तो बस और बस गुजरात मे,
अपनी पार्टी के मणिशंकर अय्यर के कहे---
उस गुजराती नीच से हारे।
बड़ी मेहनत की मंदिर गये रैलियां की,
बताया भी की विकास पगला गया है,
लेकिन फिर भी वे--------
अपनी किस्मत के मोहर्रम का क्या करते?,
उफ!एक बार फिर,
राहुल गुजरात मे वहाँ के तीन बेटो के साथ---
अपनी इद से हारे।
यानी मणिशंकर अय्यर के--------
गुजराती नीच से हारे।
जीयसटी,नोटबंदी,विकास दर,बेरोजगारी
सारे बारुद थे फिर फटे क्यू नही,
आखिर क्या चूक रही ये बड़े समझे,
लेकिन मेरा दावा है कि------
काग्रेंस के राहुल किसी मुद्दे से नही,
बल्कि वे सिर्फ और सिर्फ पुरा चुनाव,
मणिशंकर अय्यर के कहे एक जुमले----
गुजराती नीच से हारे।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Thursday, 14 December 2023

(हाशिए पर छोड़ दिया)

(हासिये पे छोड दिया)
मै---------
मूकम्मल हो जाता ऐ ज़िदगी,
पर उस बेवफ़ा ने मुझको-----
लाके हासिये पे छोड दिया।

(आह! मेरी सूफी)

(आह!मेरी सुफी)
मुझे याद है वे शाम-------
जब मेरे पास से उदास जा रही थी,
फिर ना आने के लिये कभी मेरी जिंदगी मे,
मेरी सुफी।
मै इस खिज़ा का गुनाहगार था अपने,
वे तो निकल आई थी मेरे लिये बहुत दुर,
आज तड़प के जा रही मुझ बेवफ़ा से----
बेगुनाह!मेरी सुफी।
दो कौम थे हम हिन्दू और मुसलमान,
उसने पहले भी कहां था,
हम चले कुछ दुर फूलो तलक,
खार पे चलना हुआ तो तन्हा रह गई------
आह!मेरी सुफी।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

@@@शायद हर शहर में तड़प रही होगी कही न कही किसी न किसी की बेगुनाह सुफी।

Wednesday, 13 December 2023

(जीवित कामायानी)

(जीवित कामायनी)

इंतजार करती है,
अपने कोठे पर बैठ हर शाम कोई ग्राहक!

न आने पर फिर वहीं से खोलती है,
जहा से उसने मोड़ रखा था--
जय शंकर प्रसाद की "कामायनी" की
किताब को.

डबडबाई आँख मे 'मनू'
और 'इडा' से ज्यादा,
भर आते है "आँसू" !

ये अथाह पिड़ा के फफोले का फूटना
हर रोज सहती है,
इसी कोठे पर---
जब कोई आता दिखता है,
तो टुटी कुंडी वाले दरवाज़े की तरफ
बढ़ चलती है,
ग्राहक की जल्दबाजी में,
बंद करते दरवाज़े की टुटी कुंडी की आवाज़,
का मतलब वे समझ-
अपने एक-एक कपड़े को उतारती है,
और चारपाई पर--
उसका ग्राहक पैसे सुलता है!
फिर थकी मादी उठती है,
मरहूम जय शंकर प्रसाद की
ये "जीवित कामायनी"!

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर (उत्तर प्रदेश)
mo.no.----7800824758

Tuesday, 12 December 2023

(एक खूबसूरत एहसास है)

(एक खूबसूरत ऐहसास है)
गुनगुनी धूप में------------------
खुले बाल तेरा छत पे टहलना,
एक खूबसूरत ऐहसास है।
मै तकता हू एकटक तुम्हे चोर नज़र,
पता ही नही चलता कि-------------
तेरे पाँव तले छत की ज़मी है,
याकि मखमली घास है।
गुनगुनी धूप में------------
खुले बाल तेरा छत पे टहलना,
एक खूबसूरत ऐहसास है।
ये उजले से दाँत,गुलाबी से होठ,आँखो मे शर्म
और हवा से बिखरे बालो का,
अपनी नर्म-नाज़ुक सी अँगुलियो से हटाना,
ये महज चेहरा नही----------
एक खूबसूरत चाँद है।
गुनगुनी धूप में---------
खुले बाल तेरा छत पे टहलना,
एक खूबसूरत ऐहसास है।
हर्फ-दर-हर्फ मेरे अंदर समा रही,
ये तेरी उजली ओढ़नी और सफेद सलवार,
महज तेरे बदन से लिपटी,
शरारत करती कोई सहेली नही,
बलकि मेरी गज़ल और उसके बहर की----
एक खूबसूरत लिबास है।
गुनगुनी धूप में-------------
खुले बाल तेरा छत पे टहलना,
एक खूबसूरत ऐहसास है।

@@@कलके रोमांटिक धूप की रोमांटिक याद जो शायद आप सबो को अच्छि लगे।

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

Monday, 11 December 2023

(पंडित ना रहा)

(पंडित ना रहा)
तेरे रुप मे,इतना आकंठ डुबा
कि मै पंडित ना रहा।
तोड दी माला, त्याग दिया चंदन,
हाय! री उम्र की अल्हड नदी
तुझमे स्नान कर
मै पंडित न रहा।
तु सदियो पुरानी सुरा, सुन्दरी
तेरे आचमन की क्रिपा ये रही,
कि पंडित के घर का पला आदमी
ऐ रंग-पंडित ना रहा।

Sunday, 10 December 2023

(मुझे टूट के चाहने वाले)

(मुझे टूट के चाहने वाले)
मुझे भुलना मत-----------
एै मुझे टूट के चाहने वाले।
मै फ़ना हो जाऊंगा तेरी लहरो मे शौक से,
बस मुझे अपने से अलग मत करना-------
एै मुझे टूट के चाहने वाले।
जलने देना मेरा मासूम चरागे दिल किसी कोने मे,
बेसक बुझ जाऊंगा सहर होने तक,
पर तु बेरुख़ी से ना बुझाना----------
एै मुझे टूट के चाहने वाले।
बेशक मेरी ख्व़ाहिशे मईयत गुजरे तेरे कुचे से,
पर आँख मे आँसू लिये ना आना अपनी छत पे,
मै तड़प उठुंगा मर के भी ,
क्योंकि तुम्हें इस हाल मे देखु एैसी हिम्मत नही मुझमें------------
एै मुझे टूट के चाहने वाले।

@@@एक बेहद उम्दा मोहब्बत करने वालो के नाम नज्म़।
सहर----सुबह।
रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

(खुदा से गज़ल मांगा)

(खुदा से गज़ल मांगा)
जब ज़मी पे------------
बिमारे दिल की तादात बढ़ने लगी,
तब ऐ,रंग-----------
हम मुहब्बत के फकिरो ने,
खुदा से गज़ल मांगा।

(फेकी गई सीता)

(फेकी गयी सीता)
रावण के यहाँ-
कितनी सुरक्षित थी सीता।
यहाँ लक्ष्मण के हाथो पुरी रात,
नोची-खसोटी गयी सीता।
ऐ रंग-
कैसा बदलाव है देखो,
कि बलात्कार करके-
राम के पिछवारे फेकी गयी सीता।

दिल्ली में हुऐ बलात्कार पर।

Saturday, 9 December 2023

(पगली बना दो)

(पगली बना दो)
नन्हे-नन्हे पाँव----------
छोटी-छोटी अँगूली बना दो,
ऐ,खुदा----------
मुझे फिर से बचपन की तितली बना दो।
मै तैरु गाँव के पोखर,
और तोडू फिर बाग से अंम्बिया,
मुझे माँ की डाँट-------
और बापू के दुलार की पगली बना दो।

(मां की दुआ आती हैं)

(माँ की दुआ आती है)
मै घंटो बतियाता हूं माँ की कब्र से,
मुझे एैसा लगता है कि जैसे-------
इस कब्र से भी मेरी माँ की दुआ आती है।
नही करती मेरी सरिके हयात भी ये यकिने मोहब्बत,
कि इस बेटे से मोहब्बत के लिये,
कब्र से बाहर निकल----------
मेरे माँ की रुह यहां आती है।
जब कभी थकन भरे ये सर मै रखता हू,
कुछ पल को आ जाती है नींद,
किसी को क्या पता?-----------
कि मेरी माँ की कब्र से जन्नत की हवा आती है।
एै,रंग----ये महज एक कब्र भर नही मेरी माँ है,
जिससे इस बेटे के लिये अब भी दुआ आती है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

####माँ पे लिखी एक बेहतरीन नज्म़ आप सबो के हवाले।
🤓😀 सुना है कि जेल में बंद आसाराम बापू को महिला वैद्य की जरूरत थी,,,,,
सो भारत सरकार से मेरा विनम्र अनुरोध हैं की J N U के इस डिस्टर्ब विद्वान को आसाराम बापू की सेवा में लगा दे,,, ताकि आसाराम बापू इसके इस रूप और लावण्य का इस्तेमाल एमरजेंसी में महिला और पुरुष दोनों ही रूपों में कर सकें 🤓😀🤓😀

🤓😀 वैसे ये J N U की "फ्री सेक्स परंपरा" की "न्यू ब्रांड जर्सी" खेप है,,,,,J N U के "सड़क" के कोठे की ये नई महारानी "ब्राह्मणों से देश छुड़ाने के चक्कर में हैं 😀😀🤓🤓

✍️✍️✍️"जो ब्राह्मण मुस्लिम आक्रांताओं से नही डरे जो देश के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेजी हुकूमत से दो-दो हाथ करते रहें जबकि "सर्वाधिक आक्रमण हमारे धर्म अर्थात ब्राह्मण और हमारे देश के पौरुष राजपूतों पे किया गया" लेकिन ऐसी महान परंपरा को "J N U का एक हिजड़ा चैलेंज कर रहा",,,, वैसे अकेला चना भाड़ तो नही फोड़ सकता लेकिन भांड गिरी करके नाच और गा जरुर सकता हैं "🤓😀🤓😀

Friday, 8 December 2023

(दूध की खातिर)

(माँ)
दिन भर भूख से बच्चा बिल-बिलाता है,
वे-कोशीश करके हार जाती है,
अँधेरी रात मे वही माँ-
एक कटोरे दूध की खातिर
ऐ रंग-
अपने सारे कपड़े खोल देती है।

(बेटी के ब्याह का लिबास)

(बेटी के ब्याह का लिबास दिखाऊ)
आओ अय्याशियो मे डुबे हुये चौथे स्तंभ,
तुम्हे इस मुल्क मे रेप से इतर,
खेत के मेड़ पे पड़ी बीना कफ़न--------
किसान की लाश दिखाऊ।
बंद कमरे मे बरसता सावन,
तीतर-बीतर कपड़े पैमाने से छलकी शराब,
किसान की आँखो मे सुखा,
उसकी दुपट्टे के फंदे से मरी बेटी,
रुदाली सी बीबी,लंबा सन्नाटा
उसकी जंग खाई पेटी में,
एै,रंग------------
बेटी के ब्याह का लिबास दिखाऊ।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758
कोरोना, काल में लघुकथा प्रतियोगिता में चनियत "प्रखर गुंज " प्रकाशन दिल्ली के लघुकथा संग्रह में, मेरी लघुकथा " कोरोना और सिमरन" का भी चयन, धन्यवाद सभी संपादकीय टीम का.

Thursday, 7 December 2023

(शहीद)

(शहीद)
इस गाँव की औरत कभी बेवा नही होती।
इस गाँव मे कभी भी लाशे नही आती,
तिरंगे मे लिपटे शहीद आते है।
यहाँ की कोई भी बुढी माँ-
काशी या काबे नही जाती।
ऐ रंग-
वे फिर से शहीद बेटे की वर्दी का
धुल साफ कर
सरहद की हिफाजत के लिये-
पोते पालती है।

(ये रात गुजरने दो)

(ये रात गुजरने दो)
तुम संभलो मुझे गिरने दो-----------
मुझे शराबी लत है,कुछ गहरे उतरने दो।
तुम बधे हो,बधे रहो----------
अपने वक्ते नमाज़ और पूजा से!
मेरे रास्ते मे मंदिर-मस्जिद नही मैकदा पड़ता है,
हाथ धोने दो और मुझे शराब से वजू़ करने दो।
ये महज बोतल नहीं गंगा का पानी आबे जमजम है,
ये हमारी शरिकेहयात़ बीबी का बदन है,
तुम दुर रहो हम काफ़िरो से
और नशे में हम इश्क़े शौहरो की,
एै,रंग-------ये रात गुजरने दो।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

(कंगन भई सौतन)

(कंगन भई सौतन)
तुम्हरे न आये--------
हाय! कंगन भई सौतन।
रही-रही के हियरा मे हुक उठे हमरे,
हाय! तुम्हरे न आये---------
यौवन भई सौतन।
इ कजरा,इ बिंदिया,इ सेन्हुर,महावर
कैसे सजु और सँवरु,
हाय! चुभे अँगुरी मे बिछुवा,
तुम्हरे न आये---------
मोरे बैरी बलम कि पऊवाँ क हमरे पायल भई सौतन।
तुम्हरें न आये--------
हाय! कंगन भई सौतन।
हे पियवा तु आवअ छोड़ आपन नोकरिया,
तड़पत हौ दिल सेजिया पे पनिया से निकालल मछरी नियन,
हाय! बीना तोहरे रहले--------
कमरा के हमरे पलंग भई सौतन।
तुम्हरें न आये------
हाय! कंगन भई सौतन।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

(दिसंबर लिखता हूं)

(दिसंबर लिखता हूं)

तुम्हें---
धुंधली और गुनगुनी,,,
धूप का,अंबर लिखता हूं.
तुम्हे--
अपनी गीतो में 
मैं,,दिसंबर लिखता हूं.

अब भी तुम 
वैसे ही आती हो
छत पे
अपने गीले बालों को सुखाने

तुम्हारे होंठो पे 
पानी की,बूंदों के चंद कतरे 
जो तेरी इन
गीले बालो से होके 
तेरी इन खूबसूरत
होंठो पे गिरे हैं 
यूं लगे रहे हैं कि,,जैसे 
ओस से भीगे हो, 
तुम्हारी होंठो के ये 
 "गुलाब" सारी रात

उसपे ये ,ठंड की हवा 
जब चूमती है तेरा बदन 
और 
तुम सिहर उठती हो
तो जी करता हैं
कि मैं चला आऊं 
तेरी छत पे 
और हौले से थाम लूं
तुम्हारी वे कलाई
जिस कलाई को तेरे
मैं अपनी गीतों में
दिसंबर लिखता हूं.
 
मेरे गीतों की जब किताब 
पूरी होगी 
तो उसकी कवर पे
तुम ऐसे ही छपोगी
ताकि
ये शहर जान ले 
कि तू वही लड़की हैं 
जिसे मैं अपनी गीतों में 
दिसंबर लिखता हूं.

"क्या आप भी किसी को दिसंबर लिखते हैं अगर नही लिखते हैं तो लिखिए"

रचनाकार--रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियापुर
जौनपुर--222002 (U P)

Wednesday, 6 December 2023

(उत्तर रेलवे)

( उत्तर-रेलवे )
उत्तर-रेलवे----------
के एक मुसाफ़िर खाने मे बैठी, 
एक चौबीस-पच्चीस साला पगली,
अपने गंदे बाल खुजला रही थी,
मैने देखा---------
उसके आसपास आठ-नौ आवारा बद्चलन,
पुरुष खड़े--------
अश्लील फब्तियां कस रहे थे,
वे इस सबसे बेखबर-----
अपने गंदे बाल खुजलाये जा रही थी,
तो अचानक मेरी नजर भी,
उनका अनुसरण कर,
पगली की गदराई हुई देहयष्टि से चिपक सी गई.
फिर वे सभी मेरी तरफ मुड़े--------
और खिलखिला के हँस पड़े.
मै झेपा---------
और सोचने लगा कि क्या ?
मेरा चरित्र भी अब गिरने लगा है,
शायद नही,
अगर ये सच है तो फिर.
न जाने कल आने वाली पीढ़ी का---
चरित्र क्या होगा.

@@@रचयिता---रंगनाथ द्वीवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर pin no.222002 (उत्तर-प्रदेश)

Mo.no.7800824758

यह कविता मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

(गुनगुनी धूप)

( गुनगुनी धूप )
मै टैरेस पे---------
कुर्सी निकाल गुनगुनी धूप मे घंटों बैठी,
वे तुम्हारी चाहत के एहसेसात को-----
अपने भीतर कही हौले-हौले टटोल रही.
लेकिन उस टटोलने मे न जाने कहां,
तुम्हारा श्पर्ष मुझे मिला नही,
सच अब तुम्हारे--------
चाहत का बासीपन अब टीस रहा.
याद है मुझे अच्छे से-------
ठंड की ये गुनगुनी धूप,
जब तुम्हारा छुना और श्पर्श करना,
मेरे प्यार के अंतरतक को गुनगुना जाता,
वे शायद युवापन था------
लेकिन आज जैसे टैरेस की गुनगुनी धूप,
एक सखी सी-------
मेरी युवावस्था से कह रही,
नही ऐसा कुछ नही,
ये जीवन के पलछिन की करवट भर है,
फिर यही टैरेस और कुर्सी के बगल-----
दोनों का गुनगुनी धूप मे बैठे,
काफी पीना होगा.
तभी एक झोका सा हवा का आता है,
और उन्हें मै थका मांदा,
आफिस से बैग लटकाये,
टैरेस पे पड़ी हुई एक खाली सी कुर्सी,
निढ़ाल सा पाती हूं,
तब मै-------
उनकी मजबूरियों की गुनगुनी धूप को,
अपने अंतर मे एक बार फिर महसूस कर पाती हूं.

@@@रचयिता---रंगनाथ द्वीवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला---जौनपुर pin no.222002
Mo.no.7800824758

यह कविता मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

(कितनी भीड़ हैं अम्मा)

पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता की मौत पर हमने उन्हें अपने साहित्य शब्दों से श्रद्धांजलि दी थी,आज उनकी पुण्य तिथि है ऐसे में एक बार फिर उनकी याद हो आई💐💐

(कितनी भीड़ है अम्मा)

तमिलनाडु का सारा आलम रो रहा,
उन आँसूओ के कतरे मे 
तेरी तस्वीर है अम्मा.

सच!तु बड़ी खुशनसीब 
और अमीर है अम्मा.
तुझे हर शख्स का कांधा नसीब हो रहा
ये पूजा मे तेरी उम्र 
और अजान मे तेरी साँस मांग रहे थे,
सच तु इस दौर की "जहाँगीर" है अम्मा.

फिर लोग आयेंगे-जायेंगे,
जारी रहेगा ये ज़मी का फ़नापन,
लेकिन तेरा जाना एक सदमा 
एक पीर है अम्मा.

उठ!हाथ हिला,बात कर,गरीब मुफ़लिसो से
अब भी इन्हे यकीन नही तेरी मौत का,
देख तुझे सुनने को आज--
"तमिलनाडु" मे कितनी भीड़ है अम्मा.

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर (उत्तर-प्रदेश )
mo.no.-----7800824758

(पानी)

(पानी)
नही होने देता कभी हिन्दू-मुसलमान
हमे शराब का पानी।
वही छीन लेता है एक हसीन चेहरा,
जब कोई चाहने वाला-फेकता है----
चेहरे पे तेज़ाब का पानी।
हम भटकते गिरते चले जाते है,
जब उतरता है हमारे चेहरे से------
हमारी किरदार का पानी।
हमे जोड़ता है,धर्म और मज़हब से,
कभी दोआब---------
तो कभी हरिद्वार का पानी।
हमे फ़ना भी करता है,
चेन्नई की तरह,रंग--------
देख लो वहाँ तमाम लाशे,
और सैलाब का पानी।

Tuesday, 5 December 2023

(घुंघरू बांधती थी)

(घूँघरु बांधती थी)
रईसो के दरमियाँ वे सलिके से आती थी,
कभी ठुमरी,कभी दादरा गाती थी।
ऐ,रंग-----------
वे पाक थी कोठे पे सुना है,
कि वे केवल पाँव मे घूँघरु बांधती थी।

(जीवित कामायानी)

(जीवित कामायनी)
इंतजार करती है-----------
अपने कोठे पे बैठ हर शाम कोई ग्राहक।
न आने पे फिर वहीं से खोलती है,
जहा से उसने मोड़ रखा था--------
जय शंकर प्रसाद की कामायनी।
डबडबाई आँख मे मनू और इडा से ज्यादा,
भर आते है आँसू !
ये अथाह पिड़ा के फफोले का फूटना रोज सहती है,
इसी कोठे पे-----------
जब कोई आता दिखता है,
तो टुटी कुंडी वाले दरवाज़े की तरफ बढ़ चलती है,
ग्राहक की जल्दबाजी में------------
बंद करते दरवाज़े की टुटी कुंडी की आवाज़,
का मतलब वे समझ----------------
अपने एक-एक कपड़े को उतारती है,
और चारपाई पे--------------
उसका ग्राहक पैसे सुलता है!
फिर थकी मादी उठती है----------
मरहूम जय शंकर प्रसाद की ये जीवित कामायनी।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

(शशी कपूर के पास उसकी मां हैं)

हिन्दी सिनेमा के महान सपुत शशी कपुर को मेरी अश्रुपूरित श्रद्धांजलि
          (शशी कपूर के पास उसकी माँ है)
एै हिन्दी सिनेमा------------
तु भी आँख नम कर शायद तुझे पता नही,
कि तेरे पर्दे पे----------
इस फानी दुनिया को छोड़े जा रहे,
शशी कपूर की माँ है।
इसके रुबरु दौलत और शोहरत सब बेजा है,
क्योंकि सबसे बड़ी दौलत--------
आज भी सिर्फ और सिर्फ माँ है।
हर बेटा शशी कपूर की तरह ये---
फख्र से कह सकता है कि,
देख एै दीवार के अमिताभ बच्चन
आज भी सब कुछ रहके भी तु हार गया,
क्योंकि सिनेमा में तु चाहे जितनी ऊँचाई पे खड़ा है,
पर एेक्टिंग मे सच है कि------
आज भी शशी कपूर के पास उसकी माँ है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियापुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

(इतवार केवल दिन नही)

(इतवार केवल दिन नहीं)

कभी किसी शनिवार वे आते है,
कभी किसी शनिवार मै जाती हूं!

ये भागमभाग,
ये नौकरी,ये भीड़ 
कि उबन से दुर--
कभी किसी इतवार वे मुझे पाते है,
कभी किसी इतवार मै उन्हें पाती हूं!

फिर अगली सुबह-लौटना होता है,
कभी दरवाजे़ पे वे मुझे छोड़ने आते है,
और कभी दरवाजे पे मै उन्हें छोड़ने जाती हूं!

इसलिये ए ,"रंग"----
अब हमारी जिंदगी मे इतवार केवल दिन नही,
मोहब्बत है,
जो हम एक दुसरे से कर पाते है!

रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

नौकरीपेशा लोगो का वे इतवार जिसका इंतज़ार वे बड़ी शिद्दत से एक दुसरे के लिये अलग-अलग शहरो में पुरे हफ्ते ट्रेन पे न बैठनें तलक करते है "!
✍️✍️वैसे इस समय पूरे देश में चवनप्राश का मौसम चल रहा है💐अगर किसी कंपनी को भारत में सर्वाधिक चवनप्राश बेचना है💘💘तो वे अपने चवनप्राश का विज्ञापन राधे मां,हनिप्रित या फिर आसाराम बापू से कराए 🤓😀🤓😀

Monday, 4 December 2023

(राम)

(राम)
जब तलक सियासी हाथो से
स्थापित होगे राम
तब तलक टेंट मे यु ही
बि-स्थापित होगे राम।
सरयु के पानी का रंग-
जब तलक उन्मादी बदलेगे
तब तलक इस मुल्क मे
शापित रहेगे राम।

(तस्वीर बनती रही)

(तस्वीर बनती रही )
मै रोता रहा---------
मेरे आँसुओं से भी तेरी तस्वीर बनती रही.
जलती रही शमां,
लड़खड़ा-लड़खड़ा के रात भर,
मै करवटो को तड़पा-------
और तु मेरी हीर बनती रही.
तेरी यादे थी जो बहला देती थी कुछ पल,
वरना मै ऊब गया था इस शहर से,
खिड़कियां खुली रहने दी हमने,
कि शायद कही से,
लाये हवा तेरा संदेशा,
पर हाय री! बेबसी,
कुछ बनने की,
कि तुमसे दूर रहके-----
मेरी तकदीर बनती रही.
मै रोता रहा---------
मेरी आँसुओं से भी तेरी तस्वीर बनती रही.

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेद्वी.
जज कालोनी, मियाँपुर
जिला--जौनपुर pin no.222002 (उत्तर-प्रदेश)
Mo.no.7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

(ये रात गुजरने दे)

(ये रात गुजरने दो)
तुम संभलो मुझे गिरने दो-----------
मुझे शराबी लत है,कुछ गहरे उतरने दो।
तुम बधे हो,बधे रहो----------
अपने वक्ते नमाज़ और पूजा से!
मेरे रास्ते मे मंदिर-मस्जिद नही मैकदा पड़ता है,
हाथ धोने दो और मुझे शराब से वजू़ करने दो।
ये महज बोतल नहीं गंगा का पानी आबे जमजम है,
ये हमारी शरिकेहयात़ बीबी का बदन है,
तुम दुर रहो हम काफ़िरो से
और नशे में हम इश्क़े शौहरो की,
एै,रंग-------ये रात गुजरने दो।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

Sunday, 3 December 2023

पीली मंद उदास साँझ

द्वारा : अरविन्द कुमारसंभव 
विधा : लघुकथा संग्रह 

सबलपुर प्रकाशन जयपुर द्वारा प्रकाशित 
मूल्य : 150.00 
प्रथम संस्करण : 2023 

समीक्षा क्रमांक 104 

प्रस्तुत लघुकथा संग्रह की समीक्षा एवं अन्य पुस्तकों की समीक्षाएं , आप मेरे ब्लॉग पर भी पढ़ सकते हैं , दिए गए लिंक पर क्लिक कर के 

https://atulyakhare.blogspot.com/2023/12/Peeli-Mand-Udas-Saanjh-by-Arvind-Kumar-Sambhav%20.html

     ख्यातिलब्ध साहित्यकार अरविन्द कुमारसंभव जी हिन्दी साहित्य जगत में , सुपरिचित नाम है , साहित्य जगत का, अथवा साहित्य से किसी भी प्रकार से सरोकार रखने वाला कोई विरला ही होगा जो उनके नाम से परिचित न हो। साहित्य जगत में उनके उल्लेखनीय योगदान हेतु साहित्य जगत के पुरोधाओं के बीच एवं साहित्य से सम्बद्ध नामचीन मंचों द्वारा भी उनका नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है, एवं वे स्वयम ही विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं से सक्रिय रूप से जुड़े हुए रहकर निरंतर साहित्य जगत को अपना अमूल्य योगदान प्रदान कर रहे हैं।   
     साहित्य में अपने उल्लेखनीय योगदान के फलस्वरूप आज उन्होंने जो मुकाम हासिल किया है उस के पश्चात वे किसी भी परिचय के मोहताज नहीं हैं उनका नाम स्वयम ही उच्च कोटी के साहित्य की मिसाल बन चुका है , आज वे उस मुकाम पर हैं जहां उनका नाम ही श्रेष्टता की मिसाल बन गया है एवं सहज ही उनके काम की पहचान बन चुका है, या कह सकते हैं कि उनका काम ही उनकी पहचान हो गया है। 
साहित्य को उनके योगदान में से एक “शब्द घोष” ( त्रैमासिक पत्रिका ) जिसके वे मुख्य संपादक हैं अवश्य ही मील का पत्थर साबित होगी , वहीं विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं यथा जयपुर साहित्य संगीति भी उनके नेतृत्व में उत्तरोत्तर प्रगति के पथ पर अग्रसर हैं। वे हर संभव तरीके द्वारा साहित्य से जुड़े रहकर निरंतर अपना बहुमूल्य योगदान साहित्य जगत को प्रदान कर रहे हैं । 
     समस्त व्यस्तताओं के मध्य भी अरविन्द जी का साहित्य सृजन निरंतर जारी है एवं हाल ही में उनके द्वारा रचित पुस्तक “पीली मंद उदास साँझ ” पढ़ने का सुअवसर मुझे प्राप्त हुआ , यह पुस्तिका 21 लघुकथाओं का संग्रह है एवं अरविन्द जी के ही शब्दों में बहुरंगी तृष्णा , वितृष्णा आभास ,तपन ,तड़प, स्वप्न, विषाद , खुशी को समेटती सहेजती कथाओं का छोटा सा संग्रह है । कह सकते हैं की जीवन के अमूमन सभी रंगों को उन्होंने अपनी इन लघुकथाओं में समाविष्ट कर लिया है।  
     इस संग्रह में अरविन्द जी का एहसासों को शब्द रूप में ढाल देने का हुनर , बड़ी से बड़ी बात को लघुकथा में कह जाने की कला , कथा की विषयवस्तु के प्रति गंभीर एवं गहन सोच , विषय का गंभीर विचारण , एवं सामाजिक विषमताओं पर तीखे प्रहार स्पष्ट दृष्टिगोचर हुये है । 
     वाक्य विन्यास आसान व सुगम है वहीं शब्द संयोजन अत्यंत सरल है तथा कथानक को किसी विशिष्ट रूप में ढालने हेतु किसी भी तरह का अतिरिक्त प्रयास लक्षित नहीं है। 
आज पद्य रूप में लिखी जा रही कविता ने लघु कथा को एक वृहद स्तर तक सीमित कर दिया है, संभवतः यही कारण भी है कि लघुकथा वर्तमान में प्रचलन में कुछ कम ही देखने में आती है किन्तु आज भी कई श्रेष्ठ साहित्यकारों द्वारा अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति हेतु इस विधा को माध्यम बनाया जाता है ।  
     स्वयम में ही एक अनूठी विधा है लघुकथा, एवं जैसा की नाम से ही स्पष्ट है , एक ऐसी कथा जो संक्षिप्त हो, बिना किसी भूमिका के प्रारंभ हो व जिसमें कम से कम शब्दों में भाव एवं विचार स्पष्ट कर दिए गए हों एवं जिसमें पात्रों की संख्या भी सीमित हो तो उसे लघुकथा की श्रेणी में रखा जा सकता है 
     क्यूंकी लघुकथा को बहुत अधिक विस्तारित नहीं किया जाता अतः उसकी प्रस्तुति कुछ इस तरह से दी जाती है की वह प्रारंभ में ही पाठक को बांधने में सक्षम हो तथा अंत भी ऐसा जो पाठक को कुछ विचारण के संग छोड़ दे अथवा विचारण हेतु विवश कर दे, हालांकि इस हेतु कोई विशेष शैली तो निर्धारित नहीं है किन्तु फिर भी देखा जाता है की लघुकथा का अंत अमूमन हतप्रभ करने वाला चकित कर देने वाला, चौंकाने वाला होता है फिर वह सुखांत हो अथवा दुखांत एवं कथा में उल्लिखित किसी कारण विशेष का निष्कर्ष युक्त होना अथवा न होना भी अनिवार्य नहीं है।   
     उपरोक्त समस्त कसौटियों पर अरविन्द जी की लघुकथाएं खरी उतरती हैं उनकी कहानियां बेहद सादगी भरी होती है तथा अमूमन हर कथा मानवीय मूल्यों व इंसानियत के ज़ज़्बे को दर्शाती है. अरविन्द जी की कहानियां पारिवारिक संबंधों के बीच पसरते हुए तनाव , मानवीय संवेदनाओं की उपेक्षा एवं हृदय की कोमल भावनाओं की सशक्त अभिव्यक्ति है। 
     लगभग एक ही प्रकार की गूढ भावना में अंतर्निहित कहानी है “साझी साँझ” एवं “बेटा बहू” ,जहां बुजुर्ग अवस्था के मातापिता के एकाकीपन एवं भावनात्मक टूटन को दर्शाया गया है तथा अत्यंत अल्प शब्दों में बहुत गंभीर संदेश देने में सफल हुए हैं। 
     “नीम का पेड़” भी मन के खालीपन को दर्शाती है जो की बड़े शहरों की आपाधापी से परिपूर्ण ज़िंदगी व व्यस्तता के बावजूद भीतर कहीं अकेला ही है और बुजुर्ग अवस्था की मुश्किलात कैसे विकराल हो जाती हैं जब बेटा जिसके लिए माँ बाप ने अपना सर्वस्व होम किया वही उनको दो पल का समय न दे , उनका यही दर्द दर्शाती है “कैसी विवशता”।  
     विधा के अंतर्गत बेशक उनकी रचनाओं को लघुकथा कह दिया जाए लेकिन वास्तविकता तो यही है की यह सभी कथाएं उनके तजुर्बे एवं सूक्ष्म अवलोकन से उपजे कुछ ऐसे पल होते है जिन्हें वे शब्दों में पिरो कर प्रस्तुत कर देते है। बेहद मामूली सी बातों पर भी अरविन्द जी की पैनी दृष्टि एवं लेखकीय सोच पहुँच जाती है। उनकी प्रस्तुति कहीं भी चौंकाती नहीं है अपितु सहज ही कथानक में पाठक को समाविष्ट कर लेती है।  
     लघु कथाओं को पढ़ कर प्रतीत होता है की वे कहानी के लिए किसी विषय विशेष का इंतज़ार नहीं करते, वे किसी भी अनुभव को या छोटी सी बात को भी कहानी में बदलने का हुनर रखते हैं एवं पात्र तथा स्थान के लिए उपयुक्त भाव एवं भाषा का प्रयोग सहजता एवं खूबसूरती से करते हैं जैसा की उन्होंने कहानी “क्यों नहीं आया आज” में किया है। तो आगंतुक कैसे खुशियों की सौगात दे जाते हैं जब दिल से दिल जुड़े हुए हो साथ ही रिश्तों की सुंदरता एवं जटिलता को सहज ही बयान करती है “भाई दूज”।   
     उनके कथानक लघुकथाओं हेतु पूर्णतः उपयुक्त हैं .उनकी लघुकथाएं बेहद सीमित शब्द सीमा लिए हुए हैं , व कथानक विषय पर सटीक वार करता है एवं सभी कहानियां मानवीय संवेदनाओं के ताने-बाने में बुनी गई है, मर्मस्पर्शी कहानियां है। 
     बहुत ही सरल व काम शब्दों में पहाड़ों के वाशिंदों के जीवन की कठिनाइयाँ और बेरोजगारी व गरीबी जैसे मुद्दे दर्शाती है कहानी “पहाड़”। कहानी “कटी पतंग” इस कथा संग्रह की श्रेष्ट रचनाओं के बीच सर्वश्रेष्ट का दर्ज़ा पाती है। एक महिला की कटी हुई पतंग से इतने काम शब्दों में इतनी सुंदर तुलना , निश्चय ही अरविन्द जी की कलम का कमाल ही है। कितने भाव समेटे हुए हैं ये चार शब्द कि “लड़की तू ज्यादा हवा में मत उड़ “। कुछ ऐसे ही भाव दर्शाती व जीवन का सूनापन एवं घर और मकान का अंतर बतलाती है । 
      “खाली हाथ”, जिसमें दाम्पत्य जीवन में पैर पसारती कड़वाहटों व बढ़ती दूरियों को भी प्रमुखता से स्थान दिया गया है। पुस्तक की अन्य सुंदर रचना जो कहीं भीतर तक सोचने पर मजबूर करती हुई विचारों के भंवर में छोड़ जाती है व पाठक कथानक को चलचित्र की भांति महसूस करते है वह है “अगरबत्ती” एवं “सब्जी का ठेला” जहां भाव की समानता है किन्तु संदेश भिन्न एवं अत्यंत प्रभावी। 
     संग्रह की शीर्षक कहानी “पीली मंद उदास साँझ” मन के खालीपन को बहुत गंभीरता से अवलोकित करती एवं प्रकृति के रंगों के बीच खुद की तलाश करती हुई ज़िंदगी की कहानी है जो अक्सर एक आम इंसान अपने जीवन में किसी न किसी मोड़ पर अनुभव करता ही है। 
“गागर में सागर”, मुहावरे को, मुहावरे से जुदा वास्तविक रूप में देखा इस लघुकथाओं के संग्रह में, एवं यह कहना कदापि अतिशयोक्ति नहीं होगी की हर लघुकथा ने बगैर बहुत ज्यादा कुछ कहे अल्प शब्दों में ही गंभीर संदेश दिए एवं अमूमन प्रत्येक कथा कुछ सोचने को विवश करती हुई विचारों के अथाह झंझावात में ले जाती है।

शुभकामनाओं सहित,
अतुल्य

Saturday, 2 December 2023

(मासूम लड़की)

(मासुम लड़की)
तुम जीसे कहते हो गुँगी------
वे अक्सर मेरी गज़लो मे ढ़लती है,
वे थिरकती है------
जब पाँवो में बाँध के घूँघरु,
तो कितना बोलती है,
ऐ,रंग----वे गुँगी नही-------
एक मासुम लड़की है।

विश्व विकलांग दिवस पे।

(बातूनी लड़की)

(बातुनी लड़की)
मुस्लिम हो गई-----------
मुझ ब्राह्मण के गोद की वे बातुनी लड़की।
एक वालिद सा मेरा ख़याल रखती थी,
आज आई तो----------
पर दहलीज़ पे कुछ पल रुक,
फिर अपनी आँख में आँसू लिये लौट गई,
शायद वे समझ गई---------
कि अब वे पहले की तरह गले से नही लग सकती,
क्योंकि मुस्लिम हो गई समय के साथ--------
मुझ ब्राह्मण वालिद की वे बातुनी लड़की।
सर से पाँव तलक--------
बुरके से ढकी मुझे न जाने क्यू ,
आज एक मज़हब की कैद मे लगी एै "रंग"---
इस वालिदे ब्राह्मण की वे बातुनी लड़की।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

(पोलियों ग्रस्त लड़की)

विश्व दिव्यांग दिवस पे लिखी कविता---------
         
             (पोलियो ग्रस्त लड़की )
वे लंगड़ी--------
पोलियो ग्रस्त लड़की,
तुम्हारी कुछ नही शायद,
पर मेरी बहुत कुछ है,
वे फूल है, कविता है मेरी
उसे छूता हूं, प्यार देता हूं
भावनाओं के कोरे कागज़ पे,
मेरे कही कोई रुपसी नही,
वही है----------
जिसे मै हुबहू उतार देता हूं.
कहा-अनकहा कुछ नही है तो बस,
उसकी मजबूरियों से नहाई आँखे,
मै उसके आँसुओं को------
शबनमी बूँदों की तरह पीता हूं,
उसे मै--------
अपना पहला और आखिरी,
प्यार देता हूँ.
मै अपने अंदर के कवि को उसपे---
और उसकी भावनाओं पे वार देता हूँ.

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर
जिला--जौनपुर पिन नं.222002 (उत्तर-प्रदेश).
Mo.no.---7800824758.

यह कविता मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

(कुंभ अलौकिक विश्व आस्था)

(कुंभ--अलौकिक विश्वआस्था )
प्रयाग के कुंभ का स्नान, महज स्नान ही नही अपितु--"ये एक विश्वआस्था है जो पुरी दुनिया मे अन्यंत्र दुर्लभ है ऐसा तीन महान नदियों का संगम केवल और केवल अनादि और अनंत काल से प्रयाग मे होता आया है और शायद इस धरती के रहते कायनात तक होता रहेगा".
ऐसा सदियों से धार्मिक व आध्यात्मिक मान्यता है कि--"यहाँ पे स्नान करने के लिये तमाम देवी-देवता बड़ी तल्लीनता के साथ इस सुअवसर का पुरे वर्ष इंतजार करते है".
ये प्रयाग के कुंभ का स्नान धीरे-धीरे और ज्यादा वृहद व समृद्ध होता गया,आज हालत ये है कि प्रयाग जैसे जिले मे इन तीन महान नदियों के यानी--गंगा,यमुना, सरस्वती के संगम तट पर--"लगभग-लगभग कुछ बड़े देशो की कुल संख्या को छोड़कर उसके बाद की कुल जनसंख्या वाले देश के इतनी संख्या महज संगम तट पे ठहरती है".
इस स्नान मे भारत की तमाम बहुरंगी और बहुआयामी धार्मिक संस्कृति का एक वृहद दृश्यावलोकन होता है,तमाम तरह के अखाड़े का ढोल-ताशे के साथ स्नान को आना एक अद्भुत और एक अलौकिक छवि का दर्शन कराते है.
इनके दर्शन की बड़ी ही समुचित व उच्च स्तर की व्यवस्था रहती है, अगर कहे तो इसे सकुशल संपन्न होने तक---"हमारे इस उत्तर-प्रदेश जैसे राज्य के मुख्यमंत्री तक को चैन की नीद नही आती".
संगम तट की धूनी,अलाव,संतो,महंतो और तमाम-तमाम मठो और गृहस्थो का एक महिने का कल्पवास इस संगम नगरी को एक दैवीय स्वर्ग सी धरती मे परिवर्तित कर हमे हमारे अंदर के मोह,माया,दंभ,द्वेश को मानो नष्ट कर देते है अर्थात " ये महज तीन नदियों के संगम का स्नान भर नही, बल्कि ये हमारी आत्म सिद्धि का त्रिलोक भी है".
  
आप सभी आईये----"हमारी आस्था संगम पे स्नान करती है".

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर
जिला--जौनपुर पिन नं.222002 (उत्तर-प्रदेश).
Mo.no.7800824758

यह लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.

(कमरे की चूड़ियां)

( कमरे की चूड़ियां )

मै हर रोज,
बहाने बनाकर घूम जाता हूं 
नमाज़ के वक़्त
मस्जिद के बगल से,
जो गुजरती है--
चंद चूड़ीहारो की गली की तरफ से!

मैं-
उसे एक बार फिर से देखने की चाह में, 
तमाम चूड़ियों के,
दुकानो की तरफ देखता हूं,
कि शायद वे किसी दुकान पे,
दिख जाए मुझे,
अपनी नाजुक सी कलाई में,
पहनती हुई 
किसी चूड़िहार से चूड़ियां.

वे मुझे,अगले जुमें तक!
नही दिखी,
शायद वे किसी और शहर से थी,
मै ज्यों घुमा,उदास होकर 

तभी मेरी अचनाक नज़र पड़ी,
और मैं अपने होशो हवास खो बैठा 
क्योंकि-
वे आ रही थी सामने से,
अपनी सहेलियो के संग,
चूड़ीहारों की गली की तरफ,
मुझे यूं लग रहा था,
कि जैसे,
बज रही हो उस पूरी गली में,
चूड़ीहारों की,
मेरी महबूबा के हाथों में पहनी,
मेरे मोहब्बत की---
महबूब चूड़ियां!

सच आज---
वे मेरी शरीके हयात है,
जिसकी कलाई को चूमता हूं मैं 
एक-एक आयत की तरह,
सच किसी मस्जिद से कम नहीं,
पाकीजा,
मेरे घर और मेरे कमरे की चूड़ियां.

🌹🌹सर्वाधिकार सुरक्षित 🌹🌹

Wednesday, 29 November 2023

(आईना तोड़ देती हैं)

(आईना तोड देती है)
पटकती है बेरहमी से-
सिसकता छोड देती है,
ऐ रंग-
वे हुश्न-ऐ-बेगैरत,हर महिने 
एक आईना तोड देती है।

(रिश्वत)

(नंगे शरीर की रिश्वत)
कालेधन का तो नहीं पता लेकिन,
कल एक मज़लूम औरत---------
सरकारी अस्पताल में अपने बीमार पती का इलाज कराने गई,
तो उसे डाॅक्टर व स्टाप ने नीचे से उपर तलक देखा,
शायद ये उम्मीद थी कि कुछ लाई होगी देगी,
लेकिन ये भापते ही--------------
कि वे कुछ दे नही पायेगी,
सभी उसे दुत्कारने लगे!
तभी उसने सबसे बड़े डाॅक्टर का पाँव पकड़,
गिड़गिड़ाई कि साहब ये मर जायेंगे,
उस नकली सहानुभूति के मसीहा ने कहा ठिक है,
अच्छा ये बताओ क्या तुम अपने पती के इलाज के नाम पे हमें कुछ दे सकती हो,
ये कहते समय डाॅक्टर की नज़र उस महिला की घबराहट में फिसले हुये आँचल,
के बीच ब्लाउज़ में कसे हुये उन्नत उरोज पर थी,
अचानक से उसने स्त्रीयोचित लज्जा से अपना आँचल झेप अपने सीने पे रखा,
लेकिन क्या करती----------
तब तलक एक अघोषित पिड़ा के लिये उस डाॅक्टर ने एक अश्लील थपकी दे,
ये कह की अगर पती की जान बचानी हो तो तुम समझ रही हो न,
डाॅक्टर अपने कामन रुम के दरवाजे की तरफ जा उसे जानबुझकर अधखुला छोड़ शायद अपने होठ पे सिगरेट सुलगा अपने शरीर की सुलगन को---------
सिगरेट बुझाने वाले मर्तबान में बिल्कुल सिगरेट के बचे भाग को-------
बुरी तरह मसल कर बुझाने की तरह ही अपनी कामुकता का सिगरेट भी उस अंग-विशेष में मसलकर बुझाने की खातिर उसने,
जिस दरवाजे को अधखुला छोड़ा है,
आज उस तरफ पती के जीवन के लिये सिटकनी चढ़नी है------------
सिटकनी चढ़ी और डाॅक्टर उस तरफ उसके शरीर से अपनी रिश्वत लेता रहा,
वे ज्यो रिश्वत दे बाहर आई----------
तो देखा की बड़ी तेजी से उसके पती का इलाज चालु था।
वे अपने शरीर की रिश्वत को अब तलक टटोल रही थी,
वे डाॅक्टर अब भी अपनी कनखियो से तक रहा था,
उसे लगा कि जैसे वे थूक लगा अब भी उसके शरीर के उन अंगो से चिपके कुछ फस गये नोटो की तरह,
दो-तीन मर्तबा रगड़ अपनी रिश्वत गिन रहा हो।

@@@रिश्वत की एक भयावह तस्बीर।

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

(काबुली वाला)

(काबुली वाला)
मै रोज देखती हूँ--------
खुली खिड़की से घंटो सड़क की तरफ,
ऐ,रंग----इस उम्मीद मे कि शायद--
कभी दिख जाये--------
वे मेरी बचपन का काबुली वाला।
आज,मध्य प्रदेश से प्रकाशित मासिक पत्रिका "कलम हस्ताक्षर" की दो लेखकीय प्रति मुझे कोरियर से प्राप्त हुई ये लेखकीय प्रति मुझे प्राप्त कराने का सारा श्रेय देश की सर्वश्रेष्ठ कहानीकार,व्यंग्यकार,साहित्यकार डॉक्टर रंजना जायसवाल जी को जाता हैं जिनकी वजह से मुझे लेखकीय प्रति मिल पाना संभव हुआ उनके इस स्नेह और सहयोग के लिए मेरा सादर प्रणाम ✍️✍️🙏🙏

वैसे इस पत्रिका के सारे पृष्ठ अपनी बेहतरीन प्रिंटिंग व छपाई के लिहाज से इतने बेहतरीन है कि इन्हें आप सुचारू रूप से आजीवन अपनी संग्रह में रख सकते है.

मैं इस सशक्त और बेहतरीन मासिक पत्रिका की संपादक रुचि वाजपेई शर्मा जी को कोटि कोटि धन्यवाद प्रेषित करता हू कि उन्होंने ना केवल मेरे लेख को शामिल किया बल्कि मेरी लेखकीय प्रति के खो जाने पर पुनः उन्होंने मुझे कोरियर से भेज कर कृतार्थ किया ✍️✍️🙏🙏

Tuesday, 28 November 2023

(मौत की सुरंग से निकले हैं)

(मौत की सुरंग से निकले हैं)

हम जिंदगी की जद्दोजहद
और जंग से निकले हैं
सांस आई गई,कमजोर हुई
लेकिन टूटी नहीं .
हमे उम्मीद थी जीने की 
और,जीतने की.
इसीलिए तो हम 
एक नए जीवन की 
गर्भ से निकले हैं.

उल्लास हैं,खुशी हैं,जश्न हैं
लेकिन शुक्रिया उनका,
सलाम उनको
जिनके हौसले लड़ते रहें
हर घड़ी , हर क्षण
हमारी सांस के लिए.
आज उन्ही की देन हैं
कि हम उसी मस्ती
और उसी उमंग से निकले हैं.

शुक्रिया धामी,
आपके हौसले का 
जो हमारी मुश्किलों में काम आए 
नही तो यही सुरंग 
हमारी कब्रगाह होती
लेकिन नही
हम जीत गए और मौत हार गई.

हे!उत्तरकाशी 
शायद !
तेरे कण–कण को प्रणाम,
करने की खातिर
हम सारे मजदूर 
मौत की सुरंग से निकले हैं.

✍️✍️आखिर ज़िंदगी जीत गई🌹🌹

रचना--रंगनाथ द्विवेदी
जिला--जौनपुर (U P)
आज, दिनांक 28/11/21 के दैनिक अमर-उजाला के साप्ताहिक "हास्यरंजनी " में प्रकाशित मेरा हास्य व्यंग्य जिसकी कटिंग मुझे देश के वरिष्ठ व चर्चित व्यंग्यकार सिंघई सुभाष चंद जैन सर,और देश के सर्वाधिक युवा व चर्चित लेखक मेरे प्रिय भाई पुष्पेंद दीक्षित जी ने भेजा जिसके लिए मैं उन्हें सादर प्रणाम करता हूं.

" मैंने अपने इस व्यंग्य में सर्वाधिक हास्य का प्रयोग किया है ,अतः मेरे द्वारा लिखें गए इस व्यंग्य को बिना किसी भी प्रकार का दिमाग लगाए बस केवल आप अपनी महीनों से रूठी हुई पत्नी को किसी रेस्टोरेंट में प्यार से एक प्लेट गोलगप्पा खिलाएं मेरा दावा है कि आप इसके परिणाम से चौक जाएंगे "😀😀😀😀

Monday, 27 November 2023

(मां भूख से मर गई)

(माँ भूख से मर गई)
बेशक तेरी तिजोरी दौलत से भर गई--
पर माँ की------
चुपड़ी रोटी के नमक हराम,
शायद तुम्हे पता नही,,,,,
कि गाँव मे--------
तेरी माँ भूख से मर गई।

(इतवार केवल दिन नही मोहब्बत है)

(इतवार केवल दिन नहीं मोहब्बत है)
कभी किसी शनिवार वे आते है,
कभी किसी शनिवार मै जाती हू।
ये भागमभाग,ये नौकरी,ये भीड़ 
कि उबन से दुर------------
कभी किसी इतवार वे मुझे पाते है,
कभी किसी इतवार मै उन्हें पाती हू।
फिर अगली सुबह लौटना होता है,
कभी दरवाजे़ पे वे मुझे छोड़ने आते है,
और कभी दरवाजे पे मै उन्हें छोड़ने जाती हू।
इसलिये एै,रंग---अब हमारी जिंदगी मे इतवार महज़ दिन नही,
मोहब्बत है जो हम एक दुसरे से कर पाते है।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

नौकरीपेशा लोगो का वे इतवार जिसका इंतज़ार वे बड़ी शिद्दत से एक दुसरे के लिये अलग-अलग शहरो में पुरे हफ्ते ट्रेन पे न बैठ पाने तलक करते है।

(रेशमा)

"रेशमा" महज़ एक लड़की नही बल्कि वे मुझ जैसे किसी शायर की मुहब्बत थी---------------
                                       (रेशमा)
तेरे शहर में-----------
आज रात मै फिर गा रहा हूँ रेशमा।
देख तुझसे किये अहद को---------
मै कितनी शिद्दत से निभा रहा हूँ रेशमा।
आज भी ये नज़र तलाश रही है,
वे किनारे कि महबूब कुर्सी,
जिसपे तुम बैठ कभी हमें सुना करती थी,
तेरी खातिर अब तलक मै खुद को-----
कितना तड़पा रहा हूँ रेशमा।
मेरी गज़लो के हर्फ महज़ हर्फ नही,
तेरे सहलाये भरे जख्म़ है,
लेकिन फिर वे ताजे हो टिस रहे है,
मान नही रहे न जाने क्यू आज़,
जबकि इन्हें मै-----------
तेरी खातिर न जाने कितनी देर से मना रहा हूँ रेशमा।
लोग कहते है कि मेरी गज़ल को वे सिरहाने रख के सोते है,
शायद उन्हें पता नही,
कि हम एक गज़ल को लिख फिर सारी रात रोते है,
ये दिवान मेरे है लेकिन-----------------
इस दिवान की कबर पे तुम्ही छपी हो रेशमा।
सच तुम हमारी मुहब्बत थी,मुहब्बत हो बेशक-----
तुम्हारे शहर से मै जा रहा हूँ रेशमा।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.------7800824758

(तुम हो और तुम हो)

(तुम हो और तुम हो)

तुम ठंड के मौसम में,
पहाड़ों पर खिली हो,
लेकिन,
मेरे दिल में भी 
एक जाड़े का मौसम है.

जहां तुम हो और 
तुम्हारी खूबसूरती,है
आओ--
मैं तुम्हें भी दिखाऊ
वे अल्हड़ सी  
शर्माइ सकुचाई सी
फूलों के दुपट्टे से
बतियाती,
पहाड़ों की लड़की से
जो कोई और नहीं
बल्कि तुम हो
और तुम हो.

रंगनाथ द्विवेदी
जिला--जौनपुर, mo. no.7800824758

Saturday, 25 November 2023

(राम कहेंगे)

(राम कहेंगे)

ये चुनावी सीजन है,
सावधान हो जाओ!
क्योंकि---
अब खद्दर पहने लोग--
आयेंगे "अयोध्या".

फिर सहम उठेगा सरयू का पानी,
एै "रंग"---
ये मुस्लिम बस्तियो में अल्लाह हू!
और हिन्दू बस्तियो में राम कहेंगे।

(राँची के सफ़र में)

(राँची के सफर मे)

तुम यूँ ही नही उतर आयी
मेरी गजल मे।
हमने तुम्हे देखा था,
राँची के सफर मे।
वे सादगी,वे हया
वे दिलकश मुस्कुराहट,
हाय!लुट गया था,मै
राँची के सफर मे।
मै अब भी तलाशता हूँ,
ऐ रंग,-तुम्हे अपने,
राँची के सफर मे।

Thursday, 23 November 2023

(कांच का ताजमहल था)

(काँच का ताज़महल था)
उस बेवफ़ा के हाथ से-----
गिरा और गिरके टुट गया,,,,,,,
ऐ,रंग----वे मेरा तोहफ़ा नही----
काँच का ताज़महल था।

(औरत के अंग)

(औरत के अंग)
हा मै औरत हू-----------
इसलिए तो तुम्हारे उन अंग विशेष,
को मै तकने भर से जान जाती हू,
कि तुम्हारी मंशा मेरे उन अंगो के-----
बस नोचने-खसोटने और मसलने से है।
जबकि एक औरत के वही अंग विशेष,
अपने पती के प्यार पाने के वक़्त भी,
शर्म ओढ़े रहते है,
क्योंकि उसमें किसी तरह की नोच-खसोट नही,
बल्कि एक-दुसरे के परम विश्वास का देव श्पर्श है।
हा!शायद तुम्हारा पुरुषपन अंदर से सध नही पाता,
किसी एक समर्पित अंग से बध नही पाता,
वरना तकते तो तुम्हें भी अपनी पत्नी का वे अंग,
उतना ही आकर्षित करता------------
जीतना की पर स्त्री या औरत का।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

Monday, 20 November 2023

(चिनार की शाखो पे)

(चिनार की शाखों पे)
बैठता है,आज भी
यादो का परिंदा 
चिनार की शाखो पे।
लगता है,आज भी हमे
कि,वे चुपके से 
मेरे पीछे खड़ी हो,
ऐ रंग,-रख देगी अपनी
नर्म अगुँलियाँ,
मेरी आँखो पे।
बैठता है,आज भी 
यादो का परिंदा 
चिनार की शाखो पे।

चिनार-एक पहाड़ी वृक्ष।

(एक दर्द कानपुर के नाम)

(एक दर्द कानपुर के नाम)
एै कानपुर------------
तेरे शहर में ये आँसुओ वाली ट्रेन,
हमे याद रहेगी।
ना भुलुंगा क्योकि---------
इस हादसे की मरसिया नीरज की तरह,
अब हमारे पास रहेगी।
मै जानता हु कि---------
तेरी फाइलो में गुम हो जायेगा ये दर्द,
तु सरकारी महकमा है!
पर जीना है उन घरो को ये हादसा,
उनके दिलो में आँसू रहेगा और-----
ता-उम्र ये चेहल्लुम की रात रहेगी।
एै कानपुर-----------
तेरी पटरियो से होके फिर गुजरेगी ट्रेन,
फिर उतरेंगे चढ़ेंगे मुसाफ़िर,
तेरी कानो मे---------
हर रोज एक नई आवाज़ रहेगी।
एै कानपुर----------
तेरे शहर में ये आँसुओ वाली ट्रेन,
हमें याद रहेगी।

@@@कानपुर ट्रेन हादसे पे लिखी एक गमज़दा रचना।

रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

(ठंड की रात)

(ठंड की रात)
तुमसे दुर-------------
ये तन्हा गुलाबी ठंड की रात।
और तेरे बुने हुये मफ़लर का श्पर्ष,
एक तेरे प्रेम सुगंध की तरह,
कट जाती है,बीना तेरे रहे भी-----
अपने रिश्तो के संम्बंध की रात।

Sunday, 19 November 2023

(मरुस्थल हो गया)

(मरुस्थल हो गया)
जाने कब--------------
मेरी संवेदनाये मर गई,,,
दिल मे---------
नागफ़नी और कैक्टस उग आये!
ऐ,रंग---------
मै आदमी से मरुस्थल हो गया।

(कुरान सी लगती हैं)

(कुर्आऩ सी लगती है)
हाँ!ये काफ़िरी है,मै कुब़ूल करता हूँ,,,,,,,,
कि ऐ,रंग---------मुझे-------
गरीब की बिटियाँ कुर्आन सी लगती है।

Saturday, 18 November 2023

(तब्बसूम चली गई)

(तब्बसुम चली गई)

तुम्हें विदा करे उर्दू
या फिर विदा करे हिंदी
लेकिन---
तेरे जाने से
तहज़ीब के होठों से 
"तब्बसुम" चली गई 😥😥😥

रचनाकार--रंगनाथ द्विवेदी 
जनपद--जौनपुर (उत्तर प्रदेश)

"अलविदा तब्बसुम"💐💐💐

Friday, 17 November 2023

(ताजमहल)

(ताज़ महल)
ताज़ महल----------
मूहब्ब़त की पाकीज़गी है,
यहाँ मूमताज़ लेटी है।
मत करो इन पत्थरो पे,तुम सियासी वार-
ये आबरु-ए-हिन्द है-------
ना कि मूसलमान।
ऐ,रंग----यहाँ मोहब्ब़त------
आज भी साँस लेती है।

Monday, 13 November 2023

(औरत नही देखी)

(औरत नही देखी)
माथे पे चुहचुहाता पसीना-----
कमर पे खुशी साड़ी-----
और सर पे सीमेंट की भदेली,,,,,,,,,,
श्रम की मादक चाल------
ऐ,रंग----मेरी कविता ने कभी----
इतनी खूबसुरत औरत नही देखी।

(बाल दिवस)

(बाल दिवस है)
चाय की दुकान पे----------
सुट-बूट वाले साहब के,
अधरो पे सुलगते सिगरेट का कश है,
उस फैले धुँऐ में तेरह साल का बच्चा,
जूठे कप-प्लेट उठाता है,
जरा सा उसके मैले हाथो का श्पर्श
और माँ की गाली!
मासूम गालो पर------
बाल पकड़कर चंद चाटे,
देख रोटी-------
इतनी कम उम्र में इस बच्चे की भूख,
तेरी खातिर कितना विवश है!
इस मासूम को---------
अपनी पिड़ाओ की दुनिया से बाहर,
ये भी पता नही कि---------
कल तमाम देश के बच्चो के चाचा नेहरु का जन्मदिन,
यानी की बाल दिवस है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.7800824758

(ओढ़नी)

(ओढ़नी)
याद है बचपन---------
मैं पहले कहाँ ओढ़ती थी ओढ़नी।
वे तो जब मैं तेरह की हुई,
तो अचानक-माँ ने डाँटना शुरु किया,
और कहने लगी-----------
अब अपने सीने पे तुम रंखा करो ओढ़नी।
मैं चौंकी-----------------
कि ये अचानक माँ को क्या हुआ?
फिर लगा नही कुछ तो है,
यूँही नही माँ रखवाना चाहती होगी----
सीने पे ओढ़नी।
फिर कमरे में बंद कर,
खुद को शीशे में टटोलने लगी,
तो अचानक कुछ शर्म सी आई,
कुछ बदला सा था,
जहाँ माँ ने कहा था-रखने को ओढ़नी।
मै बाहर निकली----------
तो देखा बचपन को खिसकते,
लगा माँ कि कितना सच कह रही थी,
कि तु सयानी हो रही है,
क्योंकि कुछ लोग तक रहे थे,
एै,रंग------वही जहां माँ ने कहा था,
रख लो तुम ओढ़नी।

####एक सयानी होती हुई लड़की के वे तमाम चित्र इस रचना में है!गर सच लिखु तो इस कविता की ओढ़नी वाली वे तेरह साल की लड़की बन मैने--इस कविता को जिवंत लिखने की कोशिश की है,इसपे मै कितना खरा उतरा ये तो आप सभी सुधीजन पाठको पे है।
13/11/22 को बधाई प्रिय मित्र आज राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित हुई आपकी मार्मिक कहानी

Thursday, 9 November 2023

(मंटो भूखा है)

(मन्टो भूखा है)
उसका सारा सौन्दर्य बोध
फिका है।
वे "काली सलवार","सरकन्डो के पीछे"
की मजबुरी,
उसकी वेश्या-
दो दिनो से भुखी है,
और खुद हफ्तो से-
सदाअत-हसन-मन्टो भुखा है।
ऐ रंग,-आज रायल्टी लाखो मिलती है
उसकी किताबो के
पर हमे लगता है कि आज भी
सदाअत-हसन-मंटो भुखा है।

विशेष-पाकिस्तान का बहु-चर्चित कलमकार,जो अपने जिन्दा रहते बदनाम रहा,मुकदमे लड़ता रहा,भुखा रहा,उसकी कहानियो को अश्लील कहा।पर इसी दुनिया ने उसके मरणोपरान्त उसे विश्व साहित्यकार कहा।

(राम वनवास में थे)

न्यायलय में भगवान श्री राम मंदिर के पक्ष में फैसला आने से कुछ पहले लिखी मेरी एक रचना 🌹🌹🙏🙏

(राम वनवास मे थे)

राम अपनी ही अयोध्या में-
जैसे कैदियों की लिबास मे थे.

लंका फतह करके लौटे,
तो फिर सियासत की--
"आजीवन कारावास" में थे.

उफ! मेज दर मेज फाइले उलझी,
कचहरी मे "रावण की आत्मा" अट्हास करती लगी,
सच वे हमारे आस्था की पेशी थी,
जिसे कानून तारीख कहता है,
वरना हमारे राम---
टेंट मे नज़रबंद
और एक असह्य पीडा़ की
संत्रास मे थे.

ये दर्द ,ये तड़प,
ये सरयू के विलाप के आँसू
अब शायद थम जाये,
कुछ घंटे मे बदल जाये ये दृश्य,
क्योंकि आज न्याय के मीलार्ड गगोई,
के हाथो ए "रंग"
निर्णय की घड़ी है,
इस घड़ी के लिये हम,
न जाने कितने वर्षो से
इंतजार मे थे,

आईये हम शपथ ले उस राम की,
और ईट रखे फैसले की----
चाहे वे मस्जिद हो,
या फिर मंदिर हमारे राम की
क्योंकि राम-----
अपने भाई के लिये ही चौदह वर्ष,
वनवास में थे.

रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी
जिला-जौनपुर.
Mo.no.7800824758

Wednesday, 8 November 2023

(पति पत्नी कहा होते हैं)

(पति पत्नी कहां होते है)
हम कमरे में----------------
अब पति पत्नी कहां होते है?
बिस्तर तो वही है,
पर एैसा लगता है जैसे--------
अब उसपे दो अज़नबी सोते है।
टटोलना मुमकिन नही भीतर का सन्नाटा,
बस काम से लौटते थके कदम,
ही अब हमारे भीतर होते है।
फिर खिड़की से बाहर महानगर के,
न थमने वाली चुभती चिखती आवजे,
और हमारी शादी की सालगिरह पे,
वे गमले में लगाई,
बिल्कुल अपने जीवन की तरह,
कि नागफनी को एकटक देखते है,
फिर उदास टावल को उठा,
हम हाथ मुँह धोते है।
अब तो ये भी याद नही,
कि कब हम एक साथ बैठकर चाय पिये थे,
और किस बात पर हम साथ खिलखिलाये थे,
अब तो सामने है बस एक तन्हा खालि कप,
जिससे अब केवल होंठ भिगोते है,
और लेते है एक थकी साँस,
अब तो रिश्ते को जीते नही बस ढ़ोते है।
हम कमरे में------------
अब पति पत्नी कहां होते है?।
## # एक जिवंत रिश्ते के निरस हो जाने का आधुनिक दर्द।

(दंगा याद है)

(दंगा याद है)
हमें पुराना शहर याद है,
एक-एक गली मुहल्ला याद है।
वे कुर्आनखानी का खुरमा,
मुँह पोछती अपने दुपट्टे से,
अब्दुल की अम्मा याद है।
हमें पुराना शहर याद है!
राखी सुनि थी एक ब्राह्मन के घर,
आँख मे खुशियो के आँसू---------
मेरी इस कलाई को सलमा याद है।
हमें पुराना शहर याद है!
इतने सालों बाद देखा जब जला घर,
पुछा कहां गये ये सब,
तो नये शहर के बाशिंदो ने बताया,
तो अफसोस हुआ,रंग---------------
कि अब नये शहर को,
पुराने शहर की मोहब्बत नही,
नफरत,लाशे और दंगा याद है।
हमें पुराना शहर याद है।

(आखिरी सेल्फी)

(आखिरी सेल्फी)
तुम्हे-------------
कहा था कई मर्तबा,
पर तुम माने कहां,
रोज खिचते रहे-------
हमारी और अपनी निजी पलो की सेल्फी।
आज वे सभी शहर में वायरल हो गये,
मै नंगी गुजर रही हूँ सड़क से,
हर भूखी आँख देख रही है जैसे,
तुम्हारे द्वारा ली गई-------------
सहवास के पलो की वे सारी सेल्फी।
काश तुम मान गये होते!
तो आज ख़ुदकुशी न करती,
और न छोड़ती अपने सिरहाने,
तुम्हारे लिये मै-----------
अपनी आखिरी सेल्फी।
देखना ता उम्र-----------
अपनी डबडबाई आँखो से,
मै तुम्हारे बहुत पास रहुँगी,
कभी डिलिट नही होगी तुम्हारी जेहन से,
ये हमारी आखिरी सेल्फी।
## # आधुनिकता नितांत आवश्यक है पर आजकल कुछ घटनाये रोंगटे खड़ी कर दे रही है सेल्फी के द्वारा हमने एक भाव व्यक्त किया है,मेरा उद्देश्य किसी का समर्थन या विरोध नही है,धन्यवाद।

(कैंडल नाइट)

बहुत उदास है—————
आज हमारे तुम्हारे मोहब्बत की,
कैंडिल नाईट।
मै वही बैठी हूँ ठिक सामने,
बस वे जगह खाली है-
जहां तुम बैठते थे,
आज बहुत उदास है मेरे अंदर जिंदगी,
मै टुट रही हूँ!
मेरे संग बीत रही है,
बस तुम्हारे खूबसूरत यादो की—–
कैंडिल नाईट।
शायद कही चुक गये हम,
इसी से हमारे रिश्ते में गलतफ़हमी बढ़ती गई!
तुम अलग हो गये मै अलग हो गई,
अब तो अक्सर————–
डिनर मेज पे ही रह जाता है,
और मै कुर्सी पे बैठी यु ही,
गुजार देती हू————-
अपनी कैंडिल नाईट।
गर गुंजाइश हो तो लौट आओ,
एक मर्तबा ही सही मुआफ करने,
क्योंकि ऐ,रंग—–कही ऐसा न हो,
कि तेरा इंतजार करते-करते,
हमेशा के लिये बुझ जाये,
मेरी ये कैंडिल नाईट।

(बांसुरी का बचपन)

(बाँसुरी का बचपन)
तलाश रही हूं-----------
वे गुब्बारे और बाँसुरी का बचपन।
तलाश रही हूं----------
उड़ती तितलियाँ इस फूल से उस फूल,
और उन फूलो की पाँखुरी का बचपन।
बहुत पिछे छुट गया उम्र के साथ------
माँ की बाधि चुटिया और फ्राक पहने स्कूल जाना,
वे रास्ते में बुढ़ि दाई की अमरुद,
और जुम्मन चाचा के चुरन!
कुछ सिक्के हथेली के कितने ज्यादा थे,
अब यादो में है जैसे---------
एक परी का बचपन।
तलाश रही हूं---------
आज फिर मायके से ससुराल जाते,
अचानक नजर थम गई कुछ पल उस मोड़ पे-----------
जहां से कभी खरीदा करती थी गुब्बारे और बाँसुरी,
आज वे फेरीवाला नही दिखा,
एक हूक उठी---------
और मेरे अंदर यादो की आँख भर आई,
अब ता उम्र कचोटेगा मेरी यादो में------
वे गुब्बारे और बाँसुरी का बचपन।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.7800824758

(पांव रिक्शा)

चेहरे पे एक थकन————–
होंठो पे सुलगती बीड़ी,
पेट भरने की खातिर——–
सिने से खिचने को पाँव रिक्शा,
बाबू यही है अपना किस्सा।
तपती डामर की सड़क पे,
हम रोज लिखते है अपनी भूख,
बाबू यही है हमारी जिंदगी,
और सिने से खिचने को पाँव रिक्शा,
बाबू यही है अपना किस्सा।
कभी किसी पुलिसिये की बेजा गाली,
बीन किराये के उतरना,
चेहरे पे चंद थप्पड़,
और पसीने से भीगे तर-बतर चेहरे को,
मैले गमछे से पोछना,
फिर आगे बढ़ जाना पिके गुस्सा,
पेट की खातिर———–
सीने से खिचने को पाँव रिक्शा,
बाबू यही है अपना किस्सा।
छोटे बच्चे बीमार बीबी,टपकती छत,
अपनी घर से दुर खुले आसमान तले,
सुलगती बीड़ी फूटपाथ,
और अपने दाहिने हाथ से,
लोहे की सिकडी से बांध,लगा ताला
ठिक सिरहाने सारी रात खड़ा,
मेरी जिंदगी की तरह पाँव रिक्शा।

(माँ )

(माँ)

माँ-
    मै ढ़ेरो खाता हूँ,पर तेरी 
चुपड़ी रोटी की भूख-
रह जाती है.

आज सबकुछ है,
स्लीपवेल के गद्दे,एसी कमरे
पर नींद-
घण्टो नही आती है.

ऐ रंग यादो मे सिर्फ--
माँ की गोद,
और लोरी रह जाती है.

रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी.

Tuesday, 7 November 2023

(कश्मीरी पंडित)

(कश्मीरी पंडित)
वे बांगा दी बुलबुल-------
वे डलझील वे शीकारे--------
हमारी मिट्टी-ए-मोहब्बत कश्म़ीर,,
हमे ख्वाबो मे पुकारे।
ये सियासत-ए-साजिश-ए-अलगाव,
कि हम कश्म़ीरी पंडित पड़े है-------
खानाबदोशो से बदतर ऐ दिल्ली,
तेरी सड़को के किनारे।
वे गुल,वे केशर,वे सेब के बगीचे,
उफ!नही आती वे खूशबु ना आती है--
वैसी यहाँ तक हवा रे।
ये लाशे मईयत,ये रुह-ए-तड़प है,
ऐ,रंग---हम कैसे होगे जन्नतनशी----
ऐ कश्म़ीर तेरी पाक-ए-मिट्टी के बीना रे।
🤓😀व्यंग्य के व्याकरण पर रिसर्च करते हुए मुझे अचानक पता चला कि नेता शब्द "गिरगिट और सांप का ही एक पर्यायवाची नाम हैं "🤓😀

Monday, 6 November 2023

(दर्द के सीने में जलूंगी)

(दर्द के सीने मे जलुंगी)
ऐ दिवाली के दिये-----------
मै भी तेरे संग जलुंगी।
बस फर्क ये होगा कि------
तुम प्रीत की तीलि से जलोगे,,,
और मै विरह के तीलि से जलुंगी।
तुम मुँडेर,घर और दहलिज़ पे जलोगे--
रौशनी के लिये,
मै तो घुटुंगी,क्योकि मै वे दिया हूँ----
जो अपने ही दर्द के सीने मे जलुंगी।

(यही धारावी)

(यही धारावी)
मै रोज थकी मांदी,
काम से लौटती हूं जीने------
यही धारावी।
वे चारपाई पे लेटा है,धुत्त कच्ची पिये
गंदी गालियाँ दे रहा,
अभी जबरदस्ती खीचेगा,
मै अपनी ऊबकाईयां रोके,
बर्दाश्त करुंगी एक बलात्कार,
फिर उठुंगी वे सो जायेगा,
थका मांदा!
मै उल्टीयां कर,
पुरे बदन से अपने एै,रंग-------
छुड़ाऊँगी सारी रात मै यही धारवी।

Sunday, 5 November 2023

(पूजा का वक्त था या अजान का)

(पूजा का वक्त था या अजान का)
मंदिर और मस्जिद के बीच,
सड़क के किनारे झाड़ियो मे-------
हमने एक औरत की नग्न लाश देखी।
और उसके दोनो स्तनो पे
खुरचने के निशान देखे!
और वे दोनो स्तन----------
मंदिर और मस्जिद की तरफ लटके हुये थे,
कितने असहाय थे बताने में,
उस नग्न औरत के दोनो स्तन ऐ,रंग-----
कि वे पूजा का वक्त था या अजान का।
## # मेरी इस रचना को वलगेरेटी के लिहाज से न पढ़े,इस तरह की एक लाश शायद डेढ़ वर्ष पहले देखी थी ये उसी से प्रेरित है,फिर भी गर कही से भूलवश कोई आहत होता हो तो हम उससे माफी मागते है-----धन्यवाद।

(शहनाज का मेकप नही करती)

(शहनाज़ का मेकप नही करती)
हमारी गज़ल वे खूबसूरत औरत है,
जो कभी शहनाज़ का मेकप नही करती।
वे सादगी और सलिके की रस्म़ है,
वे जिधर से गुजरती है निगाहे पाकिज़ा,
अपने सर से दुपट्टे को ओझल नही करती।
हमारी गज़ल--------------------
ये जीनत है ज़मी की आयत है,
ये ज़न्नत से घर को कभी दोज़ख नही करती।
हमारी गज़ल-----------------------
ऐ,रंग----इसकी दुनिया फकत शौहर है,
ये हवस के मारो की तरह कभी ब्रेकप नही करती।

(ठंड की रात)

(ठंड की रात)
तुमसे दुर-------------
ये तन्हा गुलाबी ठंड की रात।
और तेरे बुने हुये मफ़लर का श्पर्ष,
एक तेरे प्रेम सुगंध की तरह,
कट जाती है,बीना तेरे रहे भी-----
अपने रिश्तो के संम्बंध की रात।

(मैं भी कुम्हार हूं)

(मै भी कुम्हार हूँ)
हा मै भी----------------
अपने गीतो की चाकी पे,
शब्दो की मिट्टी रख,
कुछ गीत------------
उसके दिवाली के दीये की तरह बनाता हूँ।
वे भी कुम्हार है मिट्टी के दियले का,
और मै भी कुम्हार हूँ-------
अपने गीतो का।
वे उपले की आँच में,
पकाता है दियलो को और मै--------
अपने हृदय के उपलो की आँच में,
गीतो के शब्द पकाता हूँ।

(पहली सी दिवाली ना रही)

( पहली सी दिवाली न रही )
वे पोखर न रहा, वे चाकी न रही
अब मेरे गाँव मे--------
पहली सी दिवाली न रही.
वे अगले जन्म घर के मासूम बच्चो को छछुंदर होने से, 
बचाने के लिये,
घर मे एक बड़े से दियले मे--------
काजल पालने वाली काकी न रही.
वे उल्लास, वे पटाखे, थोड़े मे खुश हो जाना,
कितना सोंधापन था,
आज चाईनीज़ टिमटिमाते झालर जल रहे,
लेकिन उनमें---------
वे प्यार व छुअन कही बाकी न रही.
अब तो बस पथरायापन ही खुरचना है,
क्योंकि माँ के साथ बैठ,
कमरे मे एक-एक दिये मे तेल रखती,
हमारें गाँव की-----
रुपाली न रही.
वे पोखर न रहा,वे चाकी न रही
अब मेरे गाँव मे------
पहली सी दिवाली न रही.

@@@रचनाकार----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला---जौनपुर पिन नं.222002 (उत्तर-प्रदेश)
Mo.no.7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

Thursday, 2 November 2023

कल पारिवारिक और व्यक्तिगत यात्रा पर अमेरिका गए,,, साहित्य की समस्त विधाओं में एक समान पकड़ रखने वाले या वर्तमान हिन्दी साहित्य को समृद्ध करने का श्रेय जिन-साहित्यिक पुरोधाओ को सर्वाधिक जाता है उनमें से एक प्रमुख नाम "अरुण अर्णब खरे" सर का है,,, कल उनसे साहित्य की विभिन्न विधाओं पर ना सिर्फ मेरी वार्ता हुई बल्कि वर्तमान के तमाम कुछ बड़े नामो की चर्चा उनसे सुनना खासकर उनका "व्यंग्य लेखन तो हमारे समय की किसी साहित्यिक वसीयत की तरह है" उनका यह प्यार, स्नेह और आशीर्वाद मेरी छोटी सी लेखनीय के लिए एक हस्ताक्षर की तरह है ✍️✍️🙏🙏

(पटना से मोतिहारी)

(पटना से मोतीहारी)
जब भी मै-------------
जाता हूँ पटना से मोतीहारी।
बार-बार मेरी नजर------
उस ताम्बई लड़की को तलाशती है,
जो ऐसे ही एक सफर मे--------
सामने बैठी थी,
पटना से मोतीहारी।
अब भी एक हूक सी उठती है,
दिल मे---------
जब बीना उसके बैठे,
चल पड़ती है--------
अगले स्टेशन के लिये गाड़ी,
पटना से मोतीहारी।
ऐ,रंग-------------
ये सफर एक किताब है मेरी,
पटना से मोतीहारी।

(मिट्टी से जुदा मत करना)

(मिट्टी से जुदा मत करना)
बेटे मै बुढ़ि हो गई हूँ-------------
मुझे इस उम्र में अपने अब्बु से जुदा मत करना।
ना बेचना किसी को-------------
दरवाज़े पे जो उन्होनें लगाया है दरख्त़,
मै उसी से बतियाती हूँ अक्सर,
मुझे दर्द होगा------------
जब कोई काटेगा टंगारे से तेरी अब्बु की याद को।
बेटा बेशक तु मुझे हज़ ना कराना,
पर लेने देना मुझे आखिरी साँस इस मकान में,
मर जाऊँ तो तेरा हक है इस पर,
पर जीते जी मेरे बेटे,
अपनी इस अम्मी को अपने अब्बु के-----
इस मुकद्दस मिट्टी से जुदा मत करना।

Wednesday, 1 November 2023

(मदिरा की गली में)

(मदिरा की गली मे)
हमने देखा है,ये प्रेम बस-------
मदिरा की गली मे।
कि राम चुस्कियाँ लेते है,
भूल कौम,मज़हब---------
और खुद डालते है मदिरा,
गिलास-ए-अली मे।
ऐ,रंग----हमने देखा है,ये प्रेम बस----
मदिरा की गली मे।

(इनकाउंटर)

(आतंकियो का-----इनकाउंटर)
क्या है?
उन आतंकियो और तुममें कोई अंतर,
तमाम इंसानी जानो से खेलने वाले---
ये आततायी सही हलाक हुये,
भले सही या गलत था इनका इनकाउंटर।
पर सियासत तेरा स्तर----------
जिस्मानी तवायफ़ो से गया बीता है,
वे जिस्म देती है!
और तुम नामुराद उतार देते हो------
अपने मादरे वतन के पीठ खंजर।
सच एैसे दोगलो तुमपे उबकाई आती है,
तुम एक जहरीले----------
आस्तीनी साँप हो अपने ही घर के अंदर।

@@@कल के आतंकी इनकाउंटर का एक छोटा सा समर्थन।

(शहर के लोग)

(शहर के लोग)
मुझे नंगी सुला गये शहर के लोग!
एै खिज़ा के पत्तो--------
तुम कभी मेरी कब्र पे गिरना।
कितनी मोहब्बत थी गुसलखाने से,
रहने नहीं दिये एक इंतकाले सब-----
बड़े बेमुरौवत निकले शहर के लोग।
मुझे नंगी सुला गये शहर के लोग।
एै मौसमें सावन--------
तुम कभी मेरी दफ़न-ऐ-बदन पे गिरना!
कभी शफ़क चाँदनी में टहलती थी,
घंटो जिस छत पे,
ले चले उसी छत वाली गली से-----
मेरा जनाज़ा मेरी शहर के लोग।
मुझे नंगी सुला गये शहर के लोग।
एै चाँद वैसे ही शफ़क रातो की तरह,
मेरी इस रुहे बदन पे पड़ना,
मेरी तड़प है कि अब भुले से नही आते,
शहर तो शहर मेरे अपने घर के लोग।
मुझे नंगी सुला गये मेरे शहर के लोग।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

Tuesday, 31 October 2023

(अधूरा इमरोज)

अमृता प्रीतम की पुण्यतिथि पर मेरी श्रद्धांजलि 🌹🌹

( अमृता-प्रीतम और उसका अधूरा इमरोज )

मेरे इमरोज़---
मै तुम्हारे लिये छोड़े जा रही,
"एक तकिया तेरे नाम"।
काश ये गिलाफ-----
मै तुमपे चढ़ा पाती,
और बिछा पाती अपनी युवावस्था में---
एक बिस्तर तेरे नाम।

तुम मिले भी तो यु मुझसे,
कि जब जीवन की शाम--
के चंद धुंधलके ही मेरे पास बचे थे!
माफ!करना क्या करु?
बहुत जलाना चाहती हूँ---
तेरे अंदर रौशनी के लिये,
पर बुझ जाऊँगी-
मै बनके दिया एक शाम।

मेरे इमरोज़---
तुम मेरे और पास आओ,
टटोलो मुझको मैने बहुत कुछ लिखा है,
लेकिन---
इस अमृता प्रीतम का अधुरापन पढ़ो,
पढ़ पाये नही न!
जानती थी नही पढ़ पाओगे,
लो मेरी आखिरी साँस,
और आखिरी हिचकी,
खुद लिखे जा रही एक आखिरी किताब----
अमृता प्रितम और उसका
अधुरा इमरोज़।

रचयिता------रंगनाथ द्वीवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर pin no.222002 ( उत्तर-प्रदेेश)
mo.no-----7800824758

Sunday, 29 October 2023

(आइना तोड़ देती हैं)

(आईना तोड़ देती है)
पटकती है,बे-रहमी से
सिसकता-
छोड़ देती है।
ऐ रंग,-वे हुस्न-ए-बे-गैरत
हर महीने-
एक आईना तोड़ देती है।

(बदचलन आदत)

(बदचलन आदत)

छुट नही रही मुझसे मेरी बदचलन आदत---
मंदिर-मस्जिद महज़ चंद दिवालो की इमारत,
लोग लड़ रहे राम और अल्लाह कह-------
इससे तो कही बेहतर है मेरी बदचलन आदत.

ये गली-मुहल्ले के शोर फिर खामोशी,
कोई मालिक---------
तो कोई बेरहमी से निकाल रहा,
 आधी रात जो है पेट से औरत,
जिंदगी के इस कसैलेपन से दुर-----------
मुझे मैखाने लिये जा रही--
 मेरी बदचलन आदत.

मै अक्सर लड़खड़ाते गुजरा हूं नशे मे,
और तका है मैने शहर का नंगापन,
कमरे मे सोये हुये शौहर को छोड़,
दबे पाँव पिछले दरवाज़े से जाते,
 देखा है उजाले की शरीफ़ को,
एै "रंग" इससे कही भली है----
मेरी तवायफ़ के बाँहो मे---
 सोने की बदचलन आदत।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Saturday, 28 October 2023

(माँ)
माँ-
    मै ढ़ेरो खाता हूँ,पर तेरी 
चुपड़ी रोटी की भूख-
रह जाती है।
आज सबकुछ है,
स्लीपवेल के गद्दे,एसी कमरे
पर नींद-
घण्टो नही आती है।
ऐ रंग यादो मे-
माँ की गोद,
और लोरी रह जाती है।

(गोवर्धन पूजते है)

(गोवर्धन पुजते है)
हम अपनी जड़ो को
कहाँ भुलते है।
आज भी लाखो कृष्ण
यही खेलते,
कुदते है।
ऐ रंग,-
हम प्रकृति प्रेमी है,
इसलिए,-
गोवर्धन पुजते है।
गोवर्धन पुजा की ढ़ेर सारी बधाई।

Thursday, 26 October 2023

(हे! सूरज देव)

(हे!सुरुज देव)
क्या आरा,क्या छपरा,क्या बिहार हे!सुरुज देव, सबपे लुटाना अपना प्यार हे!सुरुज देव। नदिया के पानी में जब माँग भरे दुल्हन, अँजुली से अरघ दे-----------
तो सुनियेगा सबकी पुकार हे!सुरुज देव! क्या आरा,क्या छपरा,क्या बिहार हे!सुरुज देव। गुँजे किलकारी घर और आँगन में------ हर आँचल में भरना ये दुलार हे!सुरुज देव। भले पुरे साल नही लौटते है गाँव, पर तेरी खातिर आते है लेके परदेश से----- अपना पुरा का पुरा परिवार हे!सुरुज देव। मांगते है कविता और गीत की नदी में हम, दे शब्द अरघ आपसे-----------
कि रहे खुशहाल ये संसार हे!सुरुज देव, और अमर रहे धरती पे--------
डाला छठ का ये त्यौहार हे सुरुज देव।

 @@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी जज कालोनी,मियाँपुर जौनपुर।
mo.no.7800824758
----सभी को डाला छठ पर्व की ढ़ेरो बधाई।

(इतवार का गम)

(इतवार का गम)
ऐ दुनिया-
तु इसपे बैन लगा देना,
जब छपे मेरी किताब-
इतवार का गम।
ये पता है-
बढ़ जायेंगे खुदकुशी वाले,
ऐ रंग,-
उन्हे भी ले डुबेगा
किसी बेवफा के-
इन्कार का गम।

ये रचना उन लोगो के साथ शेयर है,जिनके पास है,अपने-
इतवार का गम।

(हिचकियों में याद आऊंगा)

(हिचकियो मे याद आऊँगा)
जाओ चाहे जितनी दूर तुम हमसे,,,,,,,,
ऐ मेरी मोहब्बत-------
मै तेरी हिचकियो मे याद आऊँगा।

(ठुमरी)

ठुमरी समाज्ञ्री गिरजा देवी को मेरी भावभिनी श्रद्धांजलि।
                 (ठुमरी को उदास छोड़े जा रही)
मै तो बस अपनी ये साँस तोड़े जा रही---------
एै बनारस मै फिर आऊँगी तेरी घाटो पे लौट रियाज़ करने,
मै इसलिये---------------
एक आखिरी ठुमरी छोड़े जा रही।
अनगिनत साज़-आवाज़ की महफिले,
और दिवान मे गिरजा का जिक्र होगा-------
मै अपनी गायकी का एक रंग छोड़े जा रही।
ना रो मुझे जाने दे एै मेरी सदके मोहब्बत,
तु तो मेरे बचपन की सहेली है,
वे देख कब से खड़ी है ले जाने को आज़,
जाने दे ना रोक सहेली,
देख तेरे नाते वे फरिश्त़े औरत भी गमज़दा है,
उसे भी पता है कि वे गिरज़ा की साँस के साथ------
हमेशा के लिये ठुमरी को उदास छोड़े जा रही।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Tuesday, 24 October 2023

(कर्ण को)

(कर्ण को)
फिर किसी कुन्ती ने-
छोड़ा कर्ण को।
क्यूँ?नही मिल रहा
वात्सल्य थोड़ा कर्ण को।
कब तलक मानती रहेगी,
ये दुनिया-
रोड़ा कर्ण को।
ऐ रंग,-कब मिलेगा?
न्याय आखिर कर्ण को।

आज की कुन्ती ने फिर
खेत मे छोड़ा कर्ण को।

(लोरिया चांद की)

(लोरियाँ चाँद की)
दूध-रोटी से--------
खाली हो गई कटोरियाँ आज की,,,,,,,,,,
ऐ,रंग------अब माँ को भी-----
कहाँ याद है वे लोरियाँ चाँद की।

(लखनऊ--कलयुग की अयोध्या)

(लखनऊ--कलयुग की अयोध्या)
सियासत---------
हर युग में बुढ़े पिता को दशरथ बना देती है।
अचानक मांग बैठती है साधना सी कैकेई,
मुलायम जैसे असहाय दशरथ से पिता से लिया कोई वचन,
और लखनऊ जैसी वर्तमान अयोध्या से,
छिन अखिलेश से राम को!
अपने पुत्र मोह की खातिर,
वे प्रतिक को--------
अमर सी मंथरा के कारण,
कलयुग का भरत बना देती है।
सियासत--------
हर युग में बुढ़े पिता को दशरथ बना देती है।
लेकिन समय की रामायण का ये कलयुगी कालखंड़ है,
अब सियासत की अयोध्या लखनऊ की गद्दी पे----------
आसीन होता है वही राम,
जिसकी यहां की जनता-----
अपने वोटो से बहुमत बना देती है।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758
उत्तर-प्रदेश के वर्तमान राजनैतिक हालात पर।

(वंदे मातरम् कहना दिए)

( वंदेमातरम कहना दिये )
 इस दिवाली तु शहीद के घर,
फक्र से जलना दिये.
ना रोना उसकी शहादत पे कसम है तुम्हें,
गर हो सके तो हर छत के दिये से------
जन-गण-मन और वंदेमातरम कहना दिये.

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर
जिला--जौनपुर पिन नं.222002 (उत्तर-प्रदेश)
Mo.no.---7800824758.

यह मेरे स्वयं का लिखा व अप्रकाशित है.

(प्याज)

(प्याज़ )

प्याज़ ठेले की सभी सब्जियों में----
करीना कपूर और 
ऐश्वर्या राय लगने लगी है, 

अदा---
प्रियंका चौपड़ा की तरह, 
ठसक--
कंगना राणावत की तरह, 

हाय रे ! ठेले की किस्मत, 
कि प्याज़, सभी सब्जियों में
बिपाशा बसु
और कैटरीना कैफ लगने लगी है.

😀😀😀😀😄😄😄😄

रंगनाथ द्विवेदी. 
जौनपुर ( उत्तर-प्रदेश)

(अवैध संबंध)

(अवैध संम्बंध है)
हा!मुझे कुबूल है,तेरे इल्ज़ाम से पहले---
ऐ खूबसुरती-------
कि मेरा तेरी तारीफो से---------
अवैध संम्बंध है।

Monday, 23 October 2023

(खपरैल के घर)

(खपरैल के घर)

मिट्टी की सोंधी गंध,
वे तितलियो के पर,,
वे खुला आसमान,
वे पीपल की हवा---
सब कुछ टिसता है मेरी यादो मे
ऐ,रंग--
इस फ्लैट की घुटन से कही अच्छे थे
मेरी गाँव मे खपरैल के घर.

@@@रंगनाथ द्विवेदी. 
जौनपुर (उत्तर-प्रदेश )

Saturday, 21 October 2023

(बाल दिवस है)

(बाल दिवस है)
चाय की दुकान पे----------
सुट-बूट वाले साहब के,
अधरो पे सुलगते सिगरेट का कश है,
उस फैले धुँऐ में तेरह साल का बच्चा,
जूठे कप-प्लेट उठाता है,
जरा सा उसके मैले हाथो का श्पर्श
और माँ की गाली!
मासूम गालो पर------
बाल पकड़कर चंद चाटे,
देख रोटी-------
इतनी कम उम्र में इस बच्चे की भूख,
तेरी खातिर कितना विवश है!
इस मासूम को---------
अपनी पिड़ाओ की दुनिया से बाहर,
ये भी पता नही कि---------
कल तमाम देश के बच्चो के चाचा नेहरु का जन्मदिन,
यानी की बाल दिवस है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.7800824758

(बॉलीवुड--एक बेवा बिखराव है)

(बाॅलीवुड----एक बेवा बिखराव है)
बाॅलीवुड----------
नरगिस और राज कपुर का अलगाव है,
गुरुदत्त की ख़ुदकुशी है,
तो घुट-घुट के दुनिया से विदा हुई------
मीना कुमारी के सीने का घाव है।
बाॅलीवुड----------
आँसू और ड्रामा है ,
ये उस काका के आनंद का किरदार है,
जो बाबु मोशाय के बाद--------
एक तन्हा कोठरी में तड़पता और घुटता है,
सच बॉलीवुड-----------
एक शराबी
की पिड़ाओ का गैंग्रीनी पाँव है।
बाॅलीवुड----------
वे परवीन बाॅबी है जिसे कई महेश भट्ट ने चाहा मगर,
उसे तन्हा छोड़ दिया!
वे डिप्रेस्ड बंद कमरे में छ दिनो तलक,
मरी पड़ी रही बीना किसी वारिस के,
सच तो ये है कि बाॅलीवुड-------
 औरत की अधुरी ख्वा़हिशो की घुटन,
और एक बेवा बिखराव है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर पिन नं--222002 (उत्तर-प्रदेश).
mo.no.----7800824758.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

(चुनाव आ गया)

( चुनाव आ गया )
ठंडे नेताओं को-----------
चार साल बाद ताव आ गया,
इसका मतलब है चुनाव आ गया.

ये कांंइयाँ--------
फिर इतने वादे दिल-दिमाग मे झोक देगा,
कि हम कल्पनाओं मे खो जायेंगे,
और हमें लगेगा की जैसे हमारे यहाँ------
बहुत जल्द एक अमेरिकन गाँव आ गया,
इसका मतलब है चुनाव आ गया.

बाते चिकनी और चुपडी कर,
दिल और दिमाग मे उतर जायेगा,
लगेगा इसी का कहा ही सच,
कि अब तलक इस गाँव मे केवल चोर-डाकु आये थे,
ये पहली बार है कि उसके रुप मे-----
हमारे यहाँ भी कुछ करने भगवान के भेजे,
एक साव आ गया--------
इसका मतलब है चुनाव आ गया.

ठंडे नेताओं को--------
चार साल बाद ताव आ गया,
इसका मतलब है चुनाव आ गया.

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर
जिला--जौनपुर पिन नं.222002 (उत्तर-प्रदेश).
Mo.no.--7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

Tuesday, 17 October 2023

(नई संसद)

(नई संसद)

तुम पर गर्व है,फक्र है
ऐ नई संसद!

बहुत कुछ बदला समय के साथ
आखिर कब तलक पहनती
तू किसी और की दी हुई 
भीख में,मिर्जई संसद.

उतार दे!
आ चल! अब नए चोले में 
क्योंकि,ये कुनबा तेरा है,
संस्कार तेरे है
तू भारत है
और तेरी आत्मा है 
यह नई संसद. 

राजनीति 
और नेताओं के चरित्र का क्या है?
हम सभी जानते हैं 
कि ये सभी
अपनी शब्दो के 
चारित्रिक दुशाशन है 
ना जानें कब खीच दे 
तेरी मर्यादा के सीने से आंचल
और तू शर्म से सिसकने लगे
ऐ नई संसद.

फिर चुनाव में इन्हें अपनी 
राजनीतिक रोटियां भी सेकनी है 
इसलिए,
एक सुर,एक लय, एक ताल
में कह नही सकते 
कि तेरी जरूरत थी
इस देश को
ऐ नई संसद.


यह रचना मेरी स्वरचित और अप्रकाशित है.

रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी,मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
mo.no.7800824758

(शीरी और फरहाद है दोस्त)

(शीरी और फरहाद है दोस्त)
कहाँ मिले है मोहब्बत करने वाले---
ऐसा कोई वाकया,,,,,,,,,
तुम्हे याद है दोस्त।
मोहब्बत तो रेल की पटरियो पे कटी---
दो लाश है दोस्त।
सच तो ये है कि मोहब्बत आज भी----
शीरी और फरहाद है दोस्त।

(गुलेल नीलोफर)

(गुलेल नीलोफर)
छुट रहे-
गुड्डे और गुडियो के,
खेल नीलोफर।
अब कैसे होगा,
तेरा अपनी सखियो से-
मेल नीलोफर।
रो रहा,रंग,-
अमिया को तोड़ने वाला,
तेरा छज्जे पे रखा-
गुलेल नीलोफर।

(एल आई सी की तरह करता है)

(एल.आई.सी की तरह करता है)
मै तंग आ गई हूँ उसकी किस्त से,,,,,,,,
ऐ,रंग----मेरा शौहर-----
मुझसे मोहब्बत भी---------
एल.आई.सी की तरह करता है।

(बिटिया)

(बिटिया)
ई बिटिया हौ कहिके--------
पेटे में ऐकराके मार दिहल जाला।
गर पैदा भी भईल----------
तो बेटवा के आगे दुत्कार दिहल जाला।
नकली हौ कहना की बिटिया हौ गहना,
अगर इहै सच हौ!
तो काहे के केहु कर बिटिया,
दहेज के खातिर---------
बंद कमरा में एक दिन जराय दिहल जाला।
पेट में ऐकराके मार दिहल जाला।
ई दुनिया मरद क,खुशी भी मरद क
शादी वियाहे क शापित बा बेवा,
एक बेवा मरद के सारी खुशी में,
बोलाई लिहल जाला!
हौ जग क रिति---------
कि बेवा बिटियवन के खुशीयन क मैना,
बंद पिंजरा में कईके रोआई दिहल जाला।
ई बिटिया हौ कहिके-------
पेटे में ऐकराके मार दिहल जाला।

@@@भोजपुरी पत्रिका में प्रकाशनार्थ भेजी एक रचना आपके स्नेह की आदालत में प्रेषित है।

(और एक ताजमहल)

ताज़महल पे हो रही सियासत से प्रेरित एक रचना-----------
                     (और एक ताज़महल)
मुहब्बत की निशानी की खातिर है याद महल-----
उफ!आज सियासत की ज़द में है ताज़महल।
मै नही कहता कि लड़ा जाये इस जगह------
लड़ने को और भी है इसके बाद महल।
कुछ जोड़े कसम खाते है न जुदा होने की--------
एैसा इसके सिवा दुनिया में नही है मुझे कोई याद महल।
रहने दो इसे मंदिर-मस्जिद मत कहो------
जैसे भी है रहने दो इस ज़मीने जन्नत मे ये आबाद महल।
क्योंकि जानता हूँ एै "रंग" कि बना नही सकती ये दुनिया---
इस ज़मी पे कोई एक और ताज़महल।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.----7800824758