Thursday, 30 April 2026

(आज तक)

अलविदा रोहित सरदाना 😢😢😢😢

(आज-तक )

अब कौन पुछेगा ?
आखिर सवाल,
इस दोगली सियासत से,
कि बताओ?
आखिर कब तक पहुंचेगी,
तुम्हारी वे सरकारी राहत,

गाँव के मंगरू
और 'मंगल "
की जलती चीता
और उसके पुरे घर में उड़ती,
हुई भूख कि----
"खाक तक".

लेकिन,
वे अब नहीं पुछेगा,
अपनी डिबेट के "दंगल" में
खामोश हो गया,
हमारा एंकर,
हमारा हीरो 

अब हमारी रिमोट भी,
नहीं ढूढ़ेगी,
शाम 5 बजे का "दंगल "

बस हम सहेजेंगे 
"रोहित सरदाना" को,
अपनी याद में,
और देख लिया करेंगे,
कभी-कभी,
महज़ तुम्हारी खातिर
एक चैनल की तरह
"आज-तक ".

रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
Mo. no.,7800824758

Thursday, 23 April 2026

लाल बत्ती

आदरणीय प्रधानमंत्री के निर्णय से पहले हमने एक कविता लिखी थी "लाल बत्ती" जो आज अचानक प्रासांगिक हो चुकी है,इस कविता को ले के बस इतना ही कहना है कि इसे बस औपचारिक भर पढ़ना है तो न पढ़े ये मेरे लेखन पे कृपा होगी अगर आप पुरा पढ़ेगे।

                             (लाल बत्ती )
हमसे पूछो कि कौन रही? लाल बत्ती,
एक दागी विधायक---------------
जब अपने फार्म हाऊस पे,
किसी अबला का रेप कर रहा था,
तो उसकी चीख और सिसकी सुन के,
किसी पत्थर का कलेजा भी पिघल जाता,
लेकिन बाहर------------------
इस होते हुये बलात्कार पर भी मौन रही लाल बत्ती।
दंगे हुये,मौते हुई 
सलमा,रजिया,गुड़िया,लक्ष्मी 
सभी तो मरी लेकिन इन्हें भी,
यादव,पंडित और मुसलमान कहा गया,
बहुत पीड़ा हुई,
जब एक वर्ग को बचाके स्याह रात को,
सरकारी दंगे हुये,
कान पे इसके जूँ तलक न रेंगी,
बल्कि ये जिस गाड़ी मे लगी थी उसी में बैठे मंत्री जी,
शराब के पैग छक रहे थे----------
और लखनऊ की तरफ जा रही थी लाल बत्ती।
थाने बिके,
न्याय गया तेल लेने,
शहर के होटलो मे महिना बंधा,
जूआ और जिस्मफ़रोशी हुई,
ऐस.पी.,डि.यम.,जज सभी तो थे,
लेकिन ये कही और बजा रहे थे------------
एक आम आदमी के न्याय और उसके उम्मीद की लाल बत्ती।
सच इसे अब उतर जाना चाहिये,
क्योंकि जब मै इसे तकता हूँ तो लगता है,
कि जैसे बहुत सारी बेगुनाह लाशो के खून से,
रंगी है एै"रंग"--------------
हमारे देश की हर लाल बत्ती।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
7800824758

Saturday, 18 April 2026

कश्मीरी पंडित

(कश्मीरी पंडित)

वे बांगा दी बुलबुल-
वे डलझील वे शीकारे.
हमारी मिट्टी-ए-मोहब्बत
कश्म़ीर,,
हमे ख्वाबो मे पुकारे.

ये सियासत-ए-साजिश
ये अलगाव,
कि हम कश्म़ीरी पंडित पड़े है-
खानाबदोशो से बदतर ऐ दिल्ली,
तेरी सड़को के किनारे.

वे गुल,वे केशर,वे सेब के बगीचे,
उफ!नही आती वे खूशबु
ना आती है--
वैसी यहाँ तक हवा रे!

ये लाशे मईयत,ये रुह-ए-तड़प है,
ऐ,"रंग"
हम कैसे होगे आखिर 
जन्नतनशी--
कश्मीर कि खाक-ए-मिट्टी
के बीना रे।

ये, बिस्थापित कश्मीरी पंडितो का एक दर्द है.

रंगनाथ द्विवेदी, जज कॉलोनी
मियांपुर, जौनपुर-222002 (U P )
Mo.no.7800824758

Wednesday, 15 April 2026

पायल

(पाँव के पायल की तरह है)
जिंदगी------------
मेरी प्रेमिका के पाँव के पायल की तरह है।
वे झुक कभी---------
जब अपनी नर्म सी अँगुलियो इसे बांधती है,
तो एैसा लगता है कि जैसे जिंदगी-----------
उसके यौवन से फिसले हुये आँचल की तरह है।
जिंदगी-------------
मेरी प्रेमिका के पाँव के पायल की तरह है।
वे शर्म और हया से लदी झुइमुई सी है,
जब मै देखता हूं एकटक---------
अपनी प्रेम हिरनी को,तो लगता है जैसे जिंदगी,
मेरी प्रेमिका के--------
आँख के काजल की तरह है।
जिंदगी-----------
मेरी प्रेमिका के पाँव के पायल की तरह है।
वे स्याह बाल उसके,
जब कभी खुलते है और खुल के बिखरते है,
तो लगता है जैसे जिंदगी,
मेरी प्रेमिका के बालो मे उतर आये एै"रंग"------
सावन के बादल की तरह है।
जिंदगी--------
मेरी प्रेमिका के पाँव के पायल की तरह है।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
mo.no.-----7800824758

पकौड़े तलते है

(पकौड़े तलते है)

नेता-----------
हमारी खुशहाली और तरक्की से जलते है.
वरना-------
इसमें गलत क्या है ?
की हम अपनी आत्मनिर्भरता के लिये,
गर किसी फूटपाथ पे,
कुछ घंटे पकौड़े तलते है.
ये हमारी दिवास्वप्न के,
वे जादुगर है,
जो अपनी राजनैतिक खुशहाली के लिये,
एक दूजे को पानी पी कोसते है,
वरना हकीकत है,
ये फैंसी रहनुमा हमारे,
अपने चुनाव की कडाही मे,
कही दिखावे के गेहूं काटते है,
तो कही देखावे के-----
पकौड़े तलते है.
आईये मिलके मतदान करे,
हम जाती नही,
एक अच्छी सरकार की पहचान करे,
खुद बारोजगार हो,
रही नौकरी,
गर मिलनी है तो मिले,
नही तो फिर शर्म कैसी,
आओ बेरोजगारी के खिलाफ,
हम ये पहल करते है,
किसी फूटपाथ पे----------
कुछ घंटे हम पकौड़े तलते है.

@@@रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर pin no.222002 (U P).
मो.नं.7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

Sunday, 12 April 2026

आनंद का किरदार

( आनंद का किरदार छोड़ जाऊंगा )

मैं जिंदगी के थिएटर को  
विरान छोड़ जाऊंगा,
फिर भी बाबू मोशाय,
मेरे साथ बीते हुए लम्हों की रील,
कभी खत्म नहीं होगी,
क्योंकि मैं आपकी जेहन में
आनंद का किरदार छोड़ जाऊंगा.

कुरकुरे और चिप्स

✍️✍️पत्नी के वैज्ञानिक व्यवहार से यदि आपका मन फीका रहता है तो ऐसे में आप अपनी जवान और खूबसूरत साली का गुप्त नाम कुरकुरे और चिप्स रख ले😀😀

टोपी

यह टोपी कभी हमारे इंकलाब की पहचान हुआ करती थी,, लेकिन बाद में नेताओं के लगाने की वजह से यह टोपी धीरे-धीरे विलुप्त हो गई.

Friday, 10 April 2026

आँखें रोटियां पढ़ती हैं

(आँखे रोटियाँ पढ़ती है)

तेरे स्कूल के दाखिले 
निशुल्क है लेकिन
ऐ,"रंग"
जब पेट हो खाली--
तो आँखे रोटियाँ पढ़ती है.

Thursday, 9 April 2026

डायरेक्ट गधा

✍️✍️आइए हम सभी लोग मिलकर यह सामूहिक कसम खाएं कि आज के बाद से हम किसी को डायरेक्ट गधा नहीं कहेंगे 😀😀

Tuesday, 7 April 2026

एतबार आए

सलमान की सज़ा फिर जमानत यानि कानून के मंदिर का ये जर्जरपन नही तो क्या है?
                          (ऐतबार आये)
आखिर कैसे?
किसी अपराधी और अपराध मे सुधार आये.
जब एक हिरन के मारने की सज़ा..........
बीस साल बाद आये.
वाह री! कानून की दहलीज़ तेरी जय हो
कल सज़ा आज़ ज़मानत..............
आखिर कैसे?
इस देश के आखिरी शख्स़ का......
तुझपे ऐतबार आये.

@@@रचयिता.....रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी.मियाँपुर
जौनपुर.

Sunday, 5 April 2026

नेताजी

(नेता जी)

चुनाव में----
हार के डर से,
बहुत घुट रहे---
नेता जी.
इसीलिए !
जरूरत से कहीं ज्यादा
झुक रहे----
नेता जी.
कल तलक बड़ी ऐठन थी,
दिखना मुहाल था,
आजकल----
गांव-गली, जवार मे,हर कहीं,
दिख रहे----
नेता जी.
खाने-पीने की सुध नहीं,
चिलचिलाती धूप में पसीने से तर-ब-तर हो,
अन्दर ही अन्दर, 
बहुत फूंक रहे----
नेता जी.
मन्दिर-मस्जिद में नवां रहे शीश,
कल तलक,
जिस दलित से चिढ़ते थे,
आजकल----
उसी की बस्ती
और घर मे भोजन कर,
कुछ देर रुक रहे----
नेता जी.

@ रचयिता--रंगनाथ द्विवेदी

Friday, 3 April 2026

व्यंग्य

वैसे अपनी काली-कलूटी पत्नी को--काली कहकर बुलाने से कही बेहतर है कि, आप उसे प्यार से "गुलाब जामुन" कहकर बुलायें 😀😀 क्योंकि प्यार की मिठास से हम भीतर तक गोरे हो सकते है.

बसंती गेहूं काट रही है)

(बसंती गेहूं काट रही हैं)

ए.सी.कमरो मे बैठ के--
जो इतनी सुघर और स्मार्ट रही है,
वही बसंती चुनाव में आज कल---
गेहूँ काट रही है.
गजब है लोकतंत्र,
कि ना कालिया, ना शाम्बा
और नाही गब्बर का डर,
इतनी बेखौफ हो गई है बसंती,
कि अपने सर पे,
दुपट्टे रखने वाली औरत को,
बेरहमी से डांट रही है----
बसंती गेहूं काट रही है.
ये अच्छे दिन है,मोदी के
कि सिनेमा की ड्रीमगर्ल,
कृष्ण की मथुरा मे,
शौचालय के पर्चे बांट रही है---
बसंती गेहूं काट रही है.

@Rangnath dubey

Thursday, 2 April 2026

प्यार की किताब

(प्यार की किताब)
हमारे और तुम्हारे प्यार की किताब,
पे महज़ जिम्मेदारियो कि धूल भर पड़ी है!
बाकी तुम वही हो और मै वही हूँ!
हाँ!कुछ पल मिल जाते है जब हम और तुम-----------
मिल के इस किताब की धूल को साफ करते है,
फिर पहले की तरह चमकने लगते है,
हमारे तुम्हारे प्यार के सारे हर्फ,
जिसे हमने-तुमने------
प्यार भरे उन दिनो मे लिखा था,
जब तुम-तुम थी और मै-मै था!
हाँ!याद करो जब घंटो हम,
एक दुसरे की शानो पर अपना सर रंखे,
शाम तलक सपने बुना करते थे,
आज उन्ही सपनो मे रंग भरने के लिये,
हम और तुम---------------
अपने दो मासूम जीवन फूलो की खातिर लगे है!
शायद या यकीनन हम फिर पढ़ेगे पहले की तरह ही----------
एक दूजे की शानो पर अपना सर रंखे,
पुराने दिनो की तरह ही-----------
अपने इस प्यार की किताब।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

Wednesday, 1 April 2026

वंदे मातरम्

(जाफ़रान वंदे मातरम)
क्यू नही गायेगा-------------
कोई हिन्दू या मुसलमान वंदे मातरम।
ये जेहनियत के बीमार है इन्हें क्या पता?
कि है हिन्दू के लिये गीता,
और मुसलमानो के लिये है-------
कुरान वंदे मातरम।
यकी न हो तो किसी भी कौम से पुछो,
यही कहेगा कि जिस मुल्क मे जन्मे,
आखिरी लम्हे वहीं की खाक मिले,
उसी ख्वा़हिश की है जुबान---वंदे मातरम।
आओ तरन्नूम मे गायें इसे हम तुम,
क्योंकि ये मुल्क मेरी माँ और तेरी अम्मी है,
एै"रंग" जिसके आँचल की दूध मे है बन के केसर------------
और जाफ़रान वंदे मातरम।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758
ये रचना आज वंदे मातरम को लेके छिड़े विवाद से प्रेरित है।

धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर और निर्मेश के त्यागी भईया मेरी इस रचना को स्नेह देने के लिये।