Friday, 22 November 2019

(औरत के अंग)

(औरत के अंग)
हा मै औरत हू-----------
इसलिए तो तुम्हारे उन अंग विशेष,
को मै तकने भर से जान जाती हू,
कि तुम्हारी मंशा मेरे उन अंगो के-----
बस नोचने-खसोटने और मसलने से है।
जबकि एक औरत के वही अंग विशेष,
अपने पती के प्यार पाने के वक़्त भी,
शर्म ओढ़े रहते है,
क्योंकि उसमें किसी तरह की नोच-खसोट नही,
बल्कि एक-दुसरे के परम विश्वास का देव श्पर्श है।
हा!शायद तुम्हारा पुरुषपन अंदर से सध नही पाता,
किसी एक समर्पित अंग से बध नही पाता,
वरना तकते तो तुम्हें भी अपनी पत्नी का वे अंग,
उतना ही आकर्षित करता------------
जीतना की पर स्त्री या औरत का।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

Sunday, 17 November 2019

(वाह कटे)

     ( वाह कटे)

आओ पतंग उड़ाये,वाह कटे.
छत पर चिल्लाये, वाह कटे.
सद्दी डोरी और मंझे को,
पूरे छत फैलाये, वाह कटे.

इधर-उधर चारो ओर नचाये आसमान मे,
अपनी पतंग को सबसे बचाये,
फिर किसी पतंग को हत्थे से,
हम काट चिल्लाये,वाह कटे.

खाना भुले,पीना भुले
समय का कुछ भी पता नही,
बस परेती और पतंग ले,
हम छत पर चिल्लाये,वाह कटे.

उफ! दिल टुटा---
जब सबसे अच्छी पतंग मेरी,
पीपल मे फंस गई,
तब पता चला कि,--
बगल के छत पर,
कोई और चिल्लाये,वाह कटे.

तब बेमन से उठाके अपनी परेती,
ज्यो रखा-तो ऐसा लगा कि,
जैसे परेती मुझको समझाये,ऐ मुन्ना-
दुःखी ना हो,
तुम कल फिर चिल्लाना,
पतंग उड़ाना 
और हँसकर कहना वाह कटे.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758

(नेपाल)

      (नेपाल)

नेपाल-----
तेरी आँखे किसी हिरन सी,
आवाज कोयल की कूक
और बाँसुरी की तरह,
चेहरे पे तुम्हारी ये छुईमुई सी शर्म,
उफ! तु क्या जाने? कि तु--
कितनी खूबसूरत है.

नेपाल-----
उसपे तेरी ये सफेद सफ्फाक सी सलवार,
और सीने पे एक अल्लहड़ लड़की सी,
दुपट्टे का इधर-उधर फिसलना,
यूँँ लगता है कि जैसे तु----
किसी परी या अप्सरा की बेटी है.

नेपाल----
तु आज मेरे पूरे हो रहे इस नावेल की,
किताब के------
एक-एक शब्द में जिंदा रहोगी,
क्योंकि हमने तुम्हें देश की तरह नही,
अपनी मोहब्बत
और महबूबा की तरह देखा है.


यह कविता मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है.

रचनाकार---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758