Sunday, 3 January 2021

कविता---(संविधान को फाड़ेंगे )

महाराष्ट्र के दलितो के साथ हुये अन्याय पे कुछ लाइन--------
                         (संविधान को फाड़ेंगे)
अच्छे दिन को---------
इस मुल्क के कैनवस पे कैसे उतारेंगे,
गर कुछ लोग जाति के नाम पे--------
दलितो को मारेंगे।
आखिर इन्हें कौन देता है मुहलते-----
ये आग लगाने की!
क्यों इन्हें डर या खौफ़ नही कानून का,
यदि यही हाल रहा तो एक दिन,
दलित कह---------
कुछ लोग अंबेडकर के संविधान को फाड़ेंगे।

कविता--(ताजमहल )

ताजमहल महज़ पत्थर की एक दिवाल भर नही वे तमाम मोहब्बत करने वालो की एक जिंदा सदा है।
एैसी सदा को आज के डेली वर्तमान अंकुर मे जगह देने के लिये शुक्रिया निर्मेश के त्यागी भइया।@@@ताज़महल@@@
(1)
ना अब कोई शाहजहाँ,ना दुसरा ताजमहल होगा!
तड़पेगी दुनिया मोहब्बत की हो इससे जुदा,
क्योंकि इस जमीं पे चाहत ने नवाज़े है वे पत्थर,
जिसे तुम लाख तराशो--------
फिर भी ना वे ताज़महल होगा।
अंधेरी रातो में रौशनी यहाँ होती है चाँद सी,
हाय!उस खुदा के घर भी-------
ना एैसा ताज़महल होगा।
लोग छुते है अँगुलियो से लोग छुते है अपनी साँसो से,
पर"रंग" गंदा--------
इससे ना कभी ताज़महल होगा।
(2)
एै चाँदनी नहला तु रौशनी से अपने-------
शायद यहीं कही रुहे मुमताज़ उतरी हो।
तु चुम-चुम ले ज़मी का हर कोई ज़र्रा-----
शायद यहीं कही से रुहे मुमताज़ गुजरी हो।
ये पत्थरे संगेमरमर मोहब्बत की जिंदा तहरीरे है----
पढ़ ले इन्हे क्या पता?वे भी यहीं ठहरी हो।
वे समेटे अपनी हर एक साँस मे गुलाब की खुशबू -------
क्या पता?अपने शहंशाहे आलम के दिल मे उतरी हो।
रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-------7800824758

कविता---(नंगा खेलता बच्चा )

(नंगा खेलता बच्चा)
वे अपनी तोतली ज़ुबान से बोलता है,
किसी भी हिन्दू या मुसलमान से अच्छा।
मुझे बहुत खूबसुरत लगता है,
वे गली मे नंगा खेलता बच्चा।
क्या?करुँगा जाके-----
मै मंदिर या मस्ज़िद में ऐ,रंग-------
वे मिट्टी से बना रहा देखो मासुम किस तरह----------
एक घर तेरी मकान से अच्छा।
मुझे बहुत खूबसुरत लगता है-----
वे गली मे नंगा खेलता बच्चा।