Monday, 31 May 2021

23 मई अमर-उजाला के हास्यरंजनी में प्रकाशित व्यंग्य---(हीरालाल की नाक )

23 मई अमर-उजाला के हास्यरंजनी में प्रकाशित
व्यंग्य---( हीरालाल की नाक )

मैंने महज़ अपनी 29 वर्ष की कम उम्र में ही तकरीबन 1500 से 2000 तरह की,बिभिन्न आकार-प्रकार की नाको को देखने और उसको भलीभांति समझने का घनघोर अध्ययन किया है. अतः इस आधार पर मैं खुद को निःसंकोच नाकों का एक कुशल और पहुंचा हुआ जानकार कह सकता हूं.

हमने अपनी इसी अध्ययन के दौरान अपनी कॉलोनी में हीरालाल जी की एक दुर्लभ नाक का भी साक्षात दर्शन किया है, यहां दुर्लभ मुझे इसलिए कहना पड़ रहा है कि, मैंने अब तलक जितने भी प्रकार की नाक को  देखा है उनमें सबसे विचित्र नाक इन्हीं महाशय की है.

दरअसल हीरालाल जी की नाक इतनी नुकीली और लंबी है कि उतनी नुकिली और लंबी नाक मेरे ख्याल से पुरे भारत में दूसरी ढूढ़ पाना संभव नहीं है, अगर गलती से या सही में किसी व्यक्ति ने ऐसी दूसरी नाक हमारे देश में ढूंढ ली तो मैं निश्चित है कि ऐसे व्यक्ति को अपने देश में दुर्लभ नाक ढूंढ लेने का वास्कोडिगामा कहूंगा.

हीरालाल जी की नाक के साथ इतनी ही दुर्घटना नहीं जुड़ी है,बल्कि इसके साथ ही उनकी नाक कम से कम तीन जगह से इतनी विचित्र तरीके से मुड़ी हुई है कि  लगता है जैसे उनकी नाक,नाक नहीं बल्कि किसी खूबसूरत प्लेट में,किसी ने बिना चाऊमीन के ही कांटे वाली चम्मच रख दी हो, सच एक तरह से उनके चेहरे का पूरा भूगोल इस नाक की नागफनी की वजह से, बिल्कुल ही खराब सा लगता है.

मैंने हीरालाल के नाक की इस दुर्लभ दुर्गति को और अच्छी तरीके से जानने और समझने के लिए, कॉलोनी के कुछ ऐसे लोगों से संपर्क कर पूछताछ की जिन्हें अक्सर दूसरों के बारे में खोद-निपोर करने में अत्यधिक आनंद की अनुभूति होती है. ऐसे ही लोगों से मुझे पता चला कि हीरालाल जी की नाक बचपन में ऐसी नहीं थी.दरअसल उनकी मां को किसी महिला ने, अपनी एक ऐसी गुप्त राय दी थी,जिसकी वजह से आज वर्तमान में हीरालाल अपनी नाक को लेकर पीड़ित और परेशान है.


वह महत्वपूर्ण राय यह थी कि,हीरालाल की माँ जब भी अपने हीरालाल की मालिश करे तो, कम से कम पूरे दिन में 6 से लेकर 8 बार,शुद्ध सरसों का तेल हीरालाल की नाक में डालकर उसे खूब अच्छी तरीके से खींचे, इससे हीरालाल कि नाक लंबी और देखने में खूबसूरत होगी अतः इस नुस्खे के तहत हीरालाल की मां ने हीरालाल की नाक को खींचना शुरू किया, और उसी का प्रतिफल हुआ की हीरालाल की नाक बड़े होने पर खूबसूरत तो ना हुई पर इतनी लंबी अवश्य हो गई, जिसकी वजह से उनकी शादी तक के लाले पड़ गए.


एक तरह से हीरालाल जी अपनी नाक को लेकर इतना ज्यादा परेशान हुए कि, उन्होंने अपने एक रिश्तेदार के बताएं हुए डॉक्टर को दिखाने के लिए कॉलोनी में बिना किसी को बताए 15 दिन के लिए गायब हो गए, दरअसल हुआ यह कि उनके रिश्तेदार ने  बताया था कि फला डॉक्टर प्लास्टिक सर्जरी के द्वारा आपकी नाक को अन्य लोगों की नाक की तरह खूबसूरत बना देंगे.


हीरालाल जी ने अपने नाक की प्लास्टिक सर्जरी करवाने के बाद मय पट्टी के अपनी मुँह पर गमछा लपेटकर कॉलोनी लौटे, लौटने के बाद डॉक्टर ने उन्हें एक हफ्ते के बाद अपने नाक की पट्टी को खोल देने के लिए कहा था,और जिस दिन हीरालाल अपनी नाक की पट्टी को शीशे के सामने खड़े होकर खोल रहे थे उस दिन उनके हाथ बहुत ही तेजी से कांप रहे थे


ज्यों -ज्यों उन्होंने अपनी पट्टी खोली उनका मुंह पहले से कहीं ज्यादा लटकता जा रहा था, क्योंकि  प्लास्टिक सर्जरी के बाद भी उनके नाक की सुंदरता में कोई भी सुधार नहीं हुआ अर्थात उनकी लंबी नाक अब देखने में  किसी "जापानी नाक" की तरह दिखने लगी एक तरह से उनके नाक की  दुर्गति दुर नहीं हुई बल्कि और बढ़ गई वे बेचारे कहा दूबे बनने गए थे और छब्बे बनके लौटे  यानि कि एक तरह से हीरालाल जी की नाक मेंरे द्वारा देखी गई सबसे दुर्लभ नाक ही रही उनकी नाक में कोई सुधार या संशोधन नहीं हुआ, सिवा "जापानी नाक" के .



यह व्यंग्य मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.


लेखक-रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P )
Mo. no.7800824758
(फिराक हो पीते थे)

तुम्हें पंडित और मौलवी---
पाक़ हो पीते थे.
ऐ शराब ----
ये तेरी खुश-नशीबी नहीं,
तो क्या है??
कि तुम्हें तमाम शायर ,
गालिब और ---
फिराक हो पीते थे.

@@रंगनाथ द्विवेदी
##  7800824758

Tuesday, 25 May 2021

(मेरे शहर में बरसात हो रही है)
जब से तुम्हें राग मल्हार लिखा है,
तब से मेरे शहर में बरसात हो रही है।
दिवाने हो गये है सारे स्याह बादल,
भूल गये है ये कुछ और शहर है,
जहां इनको बरसना है!
जब से तुम्हें राग मल्हार लिखा है,
तब से मेरे शहर में बरसात हो रही है।
कही तेरी खातिर यही न ठहर जायें,
भेज दे इन्हे ये बस तेरी सुनेंगे,
ये कैदी हो गये है------------
तब से तेरी रुप के,
जब से तुम्हें राग मल्हार लिखा है,
तब से मेरे शहर में बरसात हो रही है।

Saturday, 22 May 2021

(कुछ खूबसूरत औरते)
हाँ मैने देखी है कुछ खूबसूरत औरतें,
नदी के किनारे स्याह वर्ण मल्लाहन का------
वे कसे बदन साड़ी खोसे,
जूठे बरतनो का तल्लीन हो माजना,
और उसके उसकनो से आती एक मधुर सी,
खुरचने या रगड़ने की आवाज़,
हाँ एैसी ही खूबसूरती को देख मै कहता हूँ,
कि हाँ मैने देखी है----------
कुछ खूबसूरत औरते।
इस चिलचिलाती धूप में खामोश और बंद,
शहर की खिड़कियो के मौनपन को तोड़ती,
वे कुछ बड़े पत्थरो को,
छोटी-छोटी गिट्टियो में बदलती,
पुरे लय से हथौड़ी की आवाज़,
और उसकी हर चोट पे पसीने से तर-बतर हिलते,
उसके वे दो उरोज़,
मुझे उस मशहूर खजूराहो से ज्यादा खूबसूरत लगे,
हाँ इसिलिये एै"रंग" मै अक्सर कहता हूँ----------
कि हाँ मैने देखी है,
कुछ खूबसूरत औरते।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758
(इतवार जीते है)
हम नौकरीपेशा इतवार जीते है,
वे उस शहर,हम इस शहर
दूर रहके भी-------------
हम इतना प्यार जीते है।
हम नौकरीपेशा इतवार जीते है।
वे गीले बाल उनका कमरे में आना,
उतने ही पानी से हम--------------
तड़प के सावन की फुहार जीते है।
हम नौकरीपेशा इतवार जीते है।
छः दिन गुजारते है हम नागफनी के,
फिर लौटते है लेके उन्हे केवड़े का गजरा,
ऐ,रंग---------------
हम इतनी ही खुशी का त्यौहार जीते है।
हम नौकरीपेशा इतवार जीते है।
(मेंहदी लगाने के लिये)
जीसे ता-उम्र खुद की मेंहदी ने रुलाया,,,,,,,,,
ऐ,रंग---वही खातुन पुरे शहर मे------
मशहूर है,मेंहदी लगाने के लिये।

Thursday, 20 May 2021

(घर की दहलीज़ रोई)
 तुम किसी गैर औरत की आगोश में लेटे रहे,
वे इंतज़ार के दिये की तरह,
अपने अंदर तक भिग रोई।
तेरी बेवफ़ाई को तो एक आवारा निद आई,
मगर यहां वफ़ा अपनी आँख मे आँसू लिये,
तकती रही तेरा रास्ता----------
एै"रंग" उसके संग केवल पुरी रात,
तेरे घर की दहलीज़ रोई।
(पगली बना दो)
नन्हे-नन्हे पाँव----------
छोटी-छोटी अँगूली बना दो,
ऐ,खुदा----------
मुझे फिर से बचपन की तितली बना दो।
मै तैरु गाँव के पोखर,
और तोडू फिर बाग से अंम्बिया,
मुझे माँ की डाँट-------
और बापू के दुलार की पगली बना दो।
(खूबसूरत हो नही सकती)
तु चाहे जितना भी मेकप कर ले ऐ अमीरजादी,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
पर तु किसी मजूरन से ज्यादा---------
खूबसूरत हो नही सकती।

कविता---(दिया और चराग अलग है )

(दिया और चराग अलग है)
इसका शुरुर,इसका मिज़ाज अलग है,
मुहब्बत का रिवाज़ अलग है।
यहां होते है सजदे महबूब के,
यहां की मस्जिद और नमाज़ अलग है।
है ये तन्हाई की चादरपोशी,
यहां की कब्र और मज़ार अलग है।
यहां हर रात उर्स है और धड़कने कौव्वाली,
ऐ,रंग----यहां दिया और चराग अलग है।

Wednesday, 19 May 2021

(कई मर्तबा उजड़ा हूँ)
मेरे दिल को मकान मत लिख,,,,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----मै वे शख्श़ हूँ--------
जो कई मर्तबा उजड़ा हूँ।

@रंगनाथ द्विवेदी।
(बाँह मे मदिरा रही )
जब सभी ने छोड़ा मुझको--------------
तो हाथ मे मदिरा रही ।
हम तड़प के रो उठे,
कोई नही,कोई नहीं-------
बस साथ मे मदिरा रही ।
घर मेरा शमशान सा था,
और साँस मे मरघट मेरे ,
मै फिर भी  जिंदा रह गया ,
क्योंकि बिस्तर पे भी मेरे---
रात में मदिरा रही ।
रोजगाली ,रोज-नफरत 
है इसे जाने क्यों हासिल ?
ये वफा है,ये वफा है
बाकी दुनिया बेवफा है,
मै गिरा तो ये गिरी,
सब आते जाते रह गये,
उस राह मे भी साथ मेरे-----
बाँह मे मदिरा रही ।

@@@एक अलहदा टेस्ट की अलहदा रचना जो शायद आपको भी रास आये।

Saturday, 15 May 2021

(बिरान बहुत है)
भीड़ मे लोग बहका रहे है खुद को,,,,,,,,,,,,
वरना ऐ,रंग------------
इस शहर मे अंदर से बिरान बहुत है।

Friday, 14 May 2021

कविता--( उठाओ फेंक दो मुझको )

(उठाओ फेक दो मुझको)
उठाओ फेक दो मुझको----------------
जरा सा दिल कड़ा करके,
भला कौन रखता है?
घर में आईना टुटा।
उठाओ----------
लौट जाना तुम किनारे से,
समंदर के!
भला कौन ले जाता है?
आखिर साथ अपने------
रेत का घर बना टुटा।
उठाओ--------------
मै मौसमे खिज़ा का मारा हूँ,
ना मुझसे दिल लगाना तुम!
ऐ,रंग------भला कौन ले जाता है?
अपना घर सजाने------------
पत्ता शाख से टुटा।
उठाओ फेकदो मुझको,
जरा सा दिल कड़ा करके,
भला कौन रखता है------
घर में आईना टुटा।

कविता--( मां की दुआ आती है )

(माँ की दुआ आती है)
मै घंटो बतियाता हूं माँ की कब्र से,
मुझे एैसा लगता है कि जैसे-------
इस कब्र से भी मेरी माँ की दुआ आती है।
नही करती मेरी सरिके हयात भी ये यकिने मोहब्बत,
कि इस बेटे से मोहब्बत के लिये,
कब्र से बाहर निकल----------
मेरे माँ की रुह यहां आती है।
जब कभी थकन भरे ये सर मै रखता हू,
कुछ पल को आ जाती है नींद,
किसी को क्या पता?-----------
कि मेरी माँ की कब्र से जन्नत की हवा आती है।
एै,रंग----ये महज एक कब्र भर नही मेरी माँ है,
जिससे इस बेटे के लिये अब भी दुआ आती है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

####माँ पे लिखी एक बेहतरीन नज्म़ आप सबो के हवाले।

कविता--(रेप के घाव )

(रेप के घाव)
थाने पे--------
एक गरीब की बिटिया,
अपनी सलवार उतारे---------
जगह-जगह हुये रेप के घाव दिखा रही है।
दरोगा----------
बार-बार थप थपाके देख रहा,
दाँत और नाखून चुभे---------
उरोजो को बार-बार।
लड़की सिहर उठी---उसी रेप के छुअन कासा,
ऐहसास हुआ उसे!
वे समझ गई आँख भर-भरा आई उसकी,
कि अब एक रात और चीखेगी थाने पे,
फिर हरे हो जायेंगे---------------
ना भरने के लिये उसकी उरोजो पे ताजिंदगी,
एै,रंग-----------ये रेप के घाव. 

यह रचना मेरी स्व-रचित व अप्रकाशित है. 

रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
Mo. no. 7800824758
(हज़ किया है)
उसे टुट के चाहा है,,उससे लव किया है,,,,,,
ऐ,रंग----हमने अक्सर--------
उसकी गली में हज़ किया है।

कहानी---(नारे और ताली )

कहानी---(नारे और ताली )

बाजार मे देखा तो इधर -इधर किसी पार्टी की कुछ झंडे और बैनर  टंगी हुई थी. शायद आज किसी नेता की रैली व भाषण का प्रोग्राम था.क्योकि चौराहे के बाई तरफ माइक के साथ ही लोगों के बैठने के लिए कुर्सियां भी लगी हुई थी.

तकरीबन आधे घंटे बाद तो जैसे वहां भीड़ ही भीड़ दिखने लगी, जब भीड़ वहां आने वाले नेताजी के अनुकूल हुई तो,उन्हीं मे से किसी नेता के करीब ने उन्हें फोन कर दिया कि, आ जाइए! भीड़ काफी इकट्ठा हों गई है. इसके कुछ देर बाद ही, कुछ लोग उस तरफ दौड़ पड़े जिस तरफ से नेताजी कि गाड़ी को आना था.


और वाकई उसी तरफ से एक ही कलर की सात महंगी कारे वहां आकर रुकी, तो मैंने देखा कि उन सभी कारों के लास्ट के तीन नंबर सेम थे कार का गेट खुलते ही नेताजी की गरदन को वहां के स्थानीय नेताओं ने जैसे पाट दिया हों ऐसा वे केवल नेताजी  को खुश करने के लिए कर रहे थे.

और नारों का शोर तो, पूछिए मत! लेकिन इन नारे लगाने वालों के बीच मैंने एक खास बात नोट की वे यह कि उनमे से 8-10 ऐसे समर्थक थे जो अन्य से कही ज्यादा जोश और खरोश से नारे लगा रहे थे. फिर भीड़ इधर-उधर करते हुए नेताजी मंच पर जाकर बैठे एकाध स्थानीय नेता के बाद माइक उन्हें पकड़ा दी गई.

नेताजी की आवाज़ जब माइक से सुनाई दी,तो उनकी भाषा से समझ गया कि  इन्होंने दो-चार वर्ष किसी स्कूल को अवश्य अपनी भाषाई मूर्खता से गौरवान्वित किया होंगा. वे अनाप-शनाप लगातार बोले जा रहे थे और हर तीन मिनट पर उनके पीछे खड़े एक व्यक्ति ने अपनी ताली बजाकर औरो को भी ताली बजाने का संकेत कर देता था और सारी भीड़ ताली बजाने लगती.

फिर नेताजी का सम्बोधन खत्म हुआ और नेताजी के मंच से उतरते से लेकर उनके कार मे बैठकर जाने तलक इतना नारा लगा कि पूछिए मत. फिर थोड़ी देर बाद बाजार सामान्य हुआ, तो जिस चाय की  दुकान पर बैठा मैं यह सब देख रहा था. उसी चाय की दुकान पर मुझे वह दोनों आदमी आते दिखें जो की उस भीड़ मे सबसे ज्यादा नारे लगाकर ताली बजा रहे थे.

वे दोनों जब चाय की दुकान पर पहुंच गए तो एक खाली डेस्क पर बैठकर उन्होने दो बीड़ी सुलगाई और एक-एक बीड़ी अपने होठों से लगाकर दो-तीन बार अपनी नाक से धुँआ फेककर बोले यार! आज तो काफी थक गए. हाँ  यार! इतना बात करने के बाद उन्होंने दुकानदार को चाय लाने के लिए कहा.

जैसे ही दुकानदार ने उन्हें चाय पकड़ाई उन्होंने अपनी खत्म हों चुकि बीड़ी फेक दी. मैं भी उन्हीं के पास आकर चाय पीते हुए उनसे अपनी बातचीत शुरू की जब मुझे लगा कि, अब यह मेरी बात का उत्तर मेंरे अनुरूप दे सकते है. तो मैंने उनसे पुछा कि वाकई आप लोग इस पार्टी के बड़े समर्थक है.

मेरी यह बात सुनकर वे एक दुसरे कि तरफ देखकर मुस्कुराए और बोले नही साहब! ऐसा कुछ भी नही है. यह तो हम सब का धंधा है, जो भीड़ आप देख रहे थे ना कि नेताजी के लिए ताली बजा रही थी, नारे लगा रही थी, वह सारी भीड़ हमारे जैसे आदमियों की  ही थी. हमें यह सब करने के लिए किराए पर ठीकेदार लेकर आता है.जैसे ही हमारा काम खत्म होता है, हमें हमारा ठीकेदार तुरंत पैसा दे देता है.

और हाँ  आपको भी अगर कभी ताली बजाने वाले और नारे लगाने वालों को बुलाना हों तो हमें  बताइएगा, हम लोग ठीकेदार से भी सस्ते मे आदमी आपको उपलब्ध देंगे. साहब! फिर उन दोनों के चाय के पैसे भी हमी ने दिए, पैसे देकर मैं भी चाय की  दुकान से यह सोचते हुए निकला कि अब हमारी  राजनीति और हमारे नेताओं को नारे और ताली बजाने तक के लिए, किराए पर आदमी बुलाने की जरूरत पड़ रही है.जबकि एक समय वह भी था जब लोग इन नेताओं के भाषण को सुनने के लिए दुर-दुर से पैदल चलकर आते थे.


यह कहानी मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है.

लेखक-रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P )
mo.no.7800824758

Thursday, 13 May 2021

कविता---(इंदिरा थी )

(इंदिरा थी)

वे दर्द थी, पीडा़ थी
वे प्रियंका नही इंदिरा थी.
वे दृढ थी, लौह थी
उसने मिथक गढ़े,
आपातकाल लगाया,
पाक को टुकड़े मे तोड़ दिया,
वे राजनीति की नपुंसक नही,
एक दहाड़ थी,
तुम प्रियंका हो वे इंदिरा थी.
वे बचपन की गूंगी गुडिया थी,
लेकिन-------
जब बोली तो लोग गूंगे हो गये,
प्रियंका तुम बस प्रियंका हो,
नकल करो,
कोयले को कोयला रहने दो,
वे हिरा थी.
दादी तलक तो ठीक है,
लेकिन वे तुम्हारी नही,
हमारे इस देश की इंदिरा थी.

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U.P.)
Mo.no.7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

Wednesday, 12 May 2021

कहानी---(तु तु, मै मै )


कहानी----(तु तु, मै मै )

हर दुसरे या तीसरे दिन मेरी पत्नी इंदु से "तु तु, मै मै" हों जाया करती थी, यह सब केवल मेंरे बचपन कि उस लापरवाह आदत की वजह से था जो की आज भी ज्यों की त्यों बरकरार है.बस फर्क इतना है की बचपन मे माँ से मेरी "तु तु, मै मै " होती थी अब पत्नी से हों रही है.


दरअसल मै जब आफ़िस से फ्लैट मे लौटता तो अपने  सारे आवश्यक सामानो को इधर-उधर लापरवाही से फेक देता था, उसी को करिने से रखते हुए इंदु बीना मेरी तरफ देखकर गुस्से से भुंभूनाते हुए सारे सामानो को करिने से रख देती.फिर किचन मे जाकर वे मेंरे और अपने लिए चाय बना लाती.फिर जब हम दोनों चाय पीकर खाली होते तो मै उससे थोड़ी सी शरारत के लिए कहता कि सच इंदु जब तुम अक्सर गुस्से मे मुझसे "तु तु, मै मै" करती हों तो उस समय तुम मुझे बहुत ही खूबसूरत लगती हों.


मेरा यह प्यार यह शरारत जैसे इंदु को और चिढ़ा देता वे एक बार फिर मेरी तरफ गुस्से से देखकर अपने अन्य काम निपटाने चली जाती.ऐसे ही एक दिन आफ़िस कि छुट्टी होते ही मै सीढ़ियों से उतर रहा था, तो मेंरे पैर ना जाने कैसे उन सीढ़ियों से स्लिप कर गए, जिसकी वजह से मै तीन-चार सीढियां फीसलता हुआ नीचे आ गिरा, फिर उठने कि कोशिश की तो उठ नही पा रहा था.

तभी सीढ़ियों से उतर रहे मेंरे आफ़िस के अन्य  सहकर्मियों ने दौड़कर मुझे उठाया, ना सिर्फ उठाया बल्कि मुझे आफ़िस के बगल मे सड़क के उस तरफ बने हड्डी के अस्पताल के डॉक्टर को दिखाया भी.इसी बीच किसी सहकर्मी ने मेरी पत्नी इंदु को भी फोन कर दिया था, वे भी पंद्रह मिनट के अंदर अस्पताल आ गई, मुझे देखकर रोते हुए बोली क्या हुआ जी आपको.


अरे कुछ नही इंदु बस यू ही थोड़ी सी पैर मे चोट आ गई बस, तभी डॉक्टर मेरी बेड के पास आये और पुछा आराम तो है ना, जी आराम है डॉक्टर साहब अब पैर मे दर्द भी नही हों रहा. इंदु ने इसी बीच मौका पाकर पुछा कि क्या हुआ इन्हें डॉक्टर साहब. तो डॉक्टर ने कहा आप, तो इंदु ने कहा की जी मै इनकी वाइफ हूं.


तो डॉक्टर ने इंदु से कहा कि इन्हें कुछ भी नही हुआ है बस पैर मे थोड़ी सी मोच है, जिसके लिए मै कुछ दवाए और इनके पैर कि मालिश के लिए मलहम दे दे रहा हूं जिससे आप दिन मे तीन बार सुबह, दोपहर और शाम को मालिश करने के बाद पैर को हल्के गुनगुने पानी से सेक दिया करें और हा एक बात और इनको कम से कम पंद्रह दिन पुरी तरह से बेड रेस्ट करना है.

फिर इंदु के साथ मै अपने फ्लैट पर आ गया, इस बीच इंदु ने मेंरे बीस्तर को करिने से लगाकर आफ़िस के कपड़े को चेंज कर आराम दायक कपड़े पहना दिये फिर इसी तरह इंदु ने दिन-रात एककर मेरी इतनी सेवा कि की मै पुनः पहले की तरह ठीक हों गया.हा इस बीच मैंने नोट किया कि जैसे इंदु मुझे भूनभूनना और मुझसे "तु तु, मै मै" करना भूल गई थी.लेकिन इन पंद्रह दिनों के बेड रेस्ट ने मुझे भलीभांति यह एहसास करा दिया कि आखिर क्यों मेरी वजह से इंदु अक्सर गुस्से मे मुझे,भुंभूनाया करती थी.

दरअसल वे एक सुबह से काम पर लगती तो कही दोपहर मे थोड़ी बहुत खाली हो पाती थी,फिर एकाध घंटे बाद ही वे अपने शाम के कामों मे लग जाती एक मै था जिसने इंदु को कौन कहे सहयोग करने के मै उसके लिए काम अलग से बढ़ाए रहता आज मुझे एहसास हों रहा था कि आखिर क्यो बचपन मे मेरी माँ और अब इंदु मुझसे भुंभूनाया करती थी या मुझसे "तु तु, मै मै" किया करती थी.

यही सब याद करते हुए मेरी आँखों से आँसू निकलने लगे और मैंने इंदु को अपने पास बुलाया तो इंदु मुझे इस तरह रोता हुआ देखकर घबरा गई बोली क्या हुआ जी आपको? कोई तकलीफ है क्या?मैंने अपनी गरदन हिलाते हुए कहा नही,फिर मैंने इंदु को अपने गले से लगा लिया और कुछ देर बाद बोला कि इंदु क्या तुम अब मुझसे पहले कि तरह गुस्से मे नही भुंभूनाओगी,मुझसे "तु तु, मै मै" नही करोगी तो इंदु बोली नही जी मै अब आपसे कभी भी "तु तु, मै मै" नही करूंगी क्योंकि मुझे ऐसा लगता है मेंरे इसी "तु तु, मै मै" कि वजह से ही आपके पैर मे चोट आई थी .


सच शायद एक औरत का यही वात्सल्य कि वे अब भी अपने को ही दोषी मान रही थी , ऐसे ही बचपन मे जब मेरी तबीयत खराब हुआ करती थी तब माँ भी अपने आपको ही दोषी माना करती थी लेकिन आज मै वाकई पश्चातप करना चाहता था, इसलिए मैंने इंदु से कहा प्लीज इंदु तुम मुझे माफ कर दो सच मैंने तुमको बहुत परेशान किया है, फिर इंदु भी रों उठी और बोली नहीं जी आप ऐसा क्यूं कह रहे है, फिर मैंने अपनी हाथों से इंदु के आँसू पोछे फिर हम दोनों एक साथ काफी देर तक मुस्कुराते रहे.


Tuesday, 11 May 2021

कहानी---( आर्ट गैलरी )


कहानी----( आर्ट गैलरी )

रविवार होनें कि वजह से आज मेरे ऑफिस की छुट्टी थी. अतः मैंने शनिवार को ही अखबार में पढ़ा था कि इस समय दिल्ली की आर्ट गैलरी में, देश के तमाम प्रसिद्ध रंग कर्मियों की पेंटिंग की राष्ट्रीय प्रदर्शनी लगी हुई है.जो रविवार को भी अन्य दिनों की तरह ही  खुला रहेगा. यानी कि सुबह 9 बजे से लेकर दोपहर 1 बजे तक और शाम 4 बजे से लेकर रात्रि 8 बजे तक खुला रहेगा.

मैंने उस दिन सप्ताह भर के सारे पेंडिंग पड़े हुए काम को निपटाया और करीब दोपहर 12:00 बजे के  आस-पास खाली हुआ, खाली होने के बाद मैंने हल्का-फुल्का भोजन करके 3 घंटे तक आराम किया फिर इसके बाद उठकर जल्दी जल्दी तैयार होकर दिल्ली की आर्ट गैलरी देखने के लिए अपनी कार से चल पड़ा.

आर्ट गैलरी पहुंचने के बाद हमने अपनी कार को पार्किंग में खड़ी करके,जैसे ही आगे बढ़ने कि कोशिश की तो मुझे लगा कि किसी ने मुझे पीछे से आवाज़ दी है. मैंने जब अपनी गर्दन घुमाकर उस आवाज़ देने वाले की तरफ देखा तो एक आदमी दौड़ता हुआ सा मेरे पास आया और बोला साहब! मैंने उसके पहनावे से ही यह अंदाजा लगा लिया कि वह वहां कार पार्किंग के लिए ही लगाया गया है,उसने मुझे कार पार्किंग का टोकन देकर बोला कि साहब अब आप आर्ट गैलरी में जा सकते है. फिर इसके बाद उसने मुझे एक कड़क सलामी मारी,यह शायद उसने इस उम्मीद में मारी थी कि जब मै यहां से लौटूंगा तो उसे कुछ रुपए टिप के रूप में थमा दूंगा.


जब मैंने आर्ट गैलरी में प्रवेश किया, तो दंग रह गया क्योंकि वहां औरतों और आदमियों के साथ, युवा और बच्चों कि भी अच्छी खासी भीड़ थी और सभी जो उस आर्ट गैलरी में आए हुए थे, उन सभी के आकर्षण का केंद्र एक ही लाइन में करिने से लगी हुई, एक ही कलाकार की सारी पेंटिंग थी.जिसे सभी लोग मंत्रमुग्ध हो देख रहे थे और सभी के मुंह से हर 2 मिनट पर  वाह-वाह निकल रहा था. साथ ही कुछ लोग कह रहे थे क्या अद्भुत कला है. जैसे हर पेंटिंग बोल रही हो. पेंटिंग और कलाकार की इतनी तारीफ सुनने के बाद मैं खुद को उस पेंटिंग को देखने से नहीं रोक पाया.


ज्यों हि  मैंने पहली पेंटिंग देखी तो मुझे ऐसा लगा कि जैसे मेंरे सारे होशो-हवास उड़ गए हों.मुझ पर जैसे कोई जादू सा हों गया हों. वाकई मैंने आज तक उंगलियों और रंगों की इतनी बेहतरीन कला कभी भी किसी भी कैनवास पर नहीं देखी थी.वे तो मुझे तब होश आया जब माइक से मैंने किसी एंकर को यह कहते हुए सुना कि लेडीज एंड जेंटलमैन मुझे यह बताते हुए अपार खुशी और प्रसन्नता हो रही है, की अब आप सभी के सामने, इस आर्ट गैलरी में जिस  आर्ट को आप सभी ने खुब सराहा और इतनी इज्जत दी है,मैं उस पेंटिंग को अपनी उंगलियों कि कला और रंगों से जान डालने वाली,उस महान कलाकार उर्वशी शर्मा को आप सभी के सामने इस मंच पर बुलाता हूं.



तभी पुरी आर्ट गैलरी तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठी. मैंने पेंटिंग देखने के बाद जब उसके बनाने वाले का नाम बगल में पढ़ा तो दंग रह गया क्योंकि जिस पेंटिंग कि कला को मैंने इतनी देर तक अपनी सुध-बुध खोकर देखा था, वे कोई और नही बल्कि उर्वशी शर्मा की ही थी. अतः मैं भी झट एक खाली कुर्सी देखकर वही बैठ गया, मेंरे बैठने के थोड़ी देर बाद ही उर्वशी शर्मा जब स्टेज पर आई तो, मेरी खुशी का कोई ठिकाना ना रहा और मैं भावना के अतिरेक में ताली बजाने लगा. तभी मेंरे बगल बैठे एक सज्जन ने कहा अरे! कब तलक ताली बजाएंगे आप.

मैं उसकी यह बात सुनकर झेंप गया दरअसल सभी ताली बजा रहे लोग, अब ताली नही बजा रहे थे, बस  मैं अकेले ही ताली बजा रहा था. दरअसल उर्वशी शर्मा थी भी बिल्कुल अपने कला कि तरह खुबसूरत, जैसे मालिक ने उसे अपने प्रकृति कैनवास पर बनाकर भेजनें से पहले अपनी सारी कला को रंगों के रंगदान में खुब और काफी देर तक अपनी रंग कुचिका को डुबाया हों,मैं मन ही मन उर्वशी के उस रूप और लावण्य पर वाह! वाह! कह रहा था.


उर्वशी ने सफेद सलवार सूट और दुपट्टा पहना हुआ था. वह बड़ी ही मासूमियत के साथ स्टेज पर खड़ी थी तभी एंकर ने कहा कि,अपनी कला को कैनवास पर उतारकर उसे अपने भावों कि कुचिका से जुबान देने वाली उर्वशी शर्मा को भगवान ने बस एक चीज़ नही दी वे है, उर्वशी शर्मा कि जुबान. अतः उर्वशी कि बातो और उसके भाव को समझने के लिए मैं उनकी माँ से अनुरोध करता कि वे स्टेज पर आए और वे उर्वशी के भावों और उसके उदगार से हम सभी को अवगत कराए.


इतना सुनने के बाद जैसे मेरे नीचे से जमीन खिसक  गई हों. एक अजीब सा दर्द उठा जो क्षणभर को और मेरी आँख को नम कर गया. फिर खुद को थोड़ा सामान्य कर मैं उर्वशी कि माँ को सुनने लगा उन्होंने बताया कि मेरी प्यारी बेटी उर्वशी जन्म से ही गूँगी है.भगवान ने सब कुछ दिया बस एक कमी रह गई, इस कमी शब्द को उच्चारित करने के बाद जैसे उनका गला भर आया हों, फिर उन्होंने उर्वशी कि तरफ देखा और मुस्कुराकर जैसे कहा हों कि तुम बोलो बेटी फिर उर्वशी करिब 25 मिनट तक बोलती रही और उर्वशी कि माँ उसकि सारी बातो को माइक के माध्यम से सभी को समझाती रही, फिर अंत में तालियों के साथ उर्वशी और उसकी माँ स्टेज से उतर गई और फिर पूरी आर्ट गैलरी खाली हो गई, लेकिन मैं फिर भी काफी देर तक कुर्सी पर बैठा रहा जैसी मेरी इच्छा अब घर जाने की नही हों रही थी , लेकिन फिर भी मैं वहां से उठा, और आर्ट गैलरी से बाहर निकल कर कार पार्किंग वाले को अपनी कार का टोकन देकर मैं कार ड्राइव करके अपने घरआ गया.


लेकिन घर आने के बाद भी मुझे उस दिन ठीक से रात में नींद नहीं आई मुझे लगा कि हों ना हों पक्का मुझे उर्वशी से प्यार हों गया है. मैं दुसरे दिन ऑफिस से खाली होने के बाद फिर अपनी कार से आर्ट गैलरी की तरफ चल पड़ा. करीब इसी तरह 3 दिन लगातार जाने के बाद मुझे पता चला कि बस 2 दिन और यह प्रदर्शनी रहेगी. इतना जानने के बाद मेरी बेचैनी और बढ़ गई, मैंने बहुत प्रयास करने के बाद उर्वशी के घर का पता लगाया तो मुझे यह मालूम हुआ कि उर्वशी और उसकि माँ, दिल्ली के आनंद विहार कॉलोनी में ही रहती है.


फिर मैं, दो दिन आर्ट गैलरी न जाकर इस उधेड़बुन में लगा रहा कि आखिर मैं कैसे उर्वशी की माँ से उसकि और अपनी शादी की बात करूँ  या फिर मैं कैसे अपनी मम्मी-पापा से अपने शादी कि बात करूँ. दरअसल मैं अपने घर में एकलौता था मेंरे पास ना कोई बड़ी बहन, ना बड़े भाई ना ही कोई बड़ी भाभी थी, जिनसे मैं अपने शादी कि पहल करने कि बात कर पाता. ऐसे में मेरे मन में एक डर था,कि कही मम्मी-पापा इस शादी से इसलिए ना मना कर दे कि उर्वशी गूँगी है.


लेकिन कहते है कि मोहब्बत जो ना कराए कम है. ऐसा मेरे साथ भी हुआ और मैं बड़ी हिम्मत करके एक दिन उर्वशी के घर पहुंचा और उसके घर के दरवाज़े पर लगे डोरबेल पर अपनी उंगली रख दी. थोड़ी देर बाद भीतर से आवाज़ आई कौन? मैं झट पहचान गया कि ये उर्वशी के मम्मी कि आवाज़ है, मैंने कहा जी मैं आलोक. कौन आलोक इतना सुनने के वाद एक बारगी मेरे पूरे शरीर में एक झुरझुरी सी उठी. अतः मैंने फिर डोरबेल बजाया क्योंकि दुसरी बार आलोक कहने कि मेरी हिम्मत ना रही.


लेकिन इस बार दरवाजा खुला, तो उर्वशी कि माँ ने कहा जी कहिए! आपको किससे मिलना है? मेरा शरीर इस समय थोड़ा-थोड़ा काँप रहा था. फिर भी किसी तरह अपनी लड़खड़ाती जुबान से कहा जी- हमें आप से ही मिलना और बात करना है.ठीक है आइए! बैठिए, जब सोफे पर बैठ गया तो मेरे हिम्मत में भी थोड़ा सा इजाफा हुआ. मैंने बिना उनकी  तरफ देखें,अपने दिल कि पूरी बात उर्वशी के माँ से कह दी. लेकिन सर झुकाए रहा. करीब 20 मिनट बाद उर्वशी कि माँ ने कहा बेटा! उनके बेटा कहते ही मैंने अपनी निगाह उठाकर उन्हें देखा तो उन्होंने कहा.


कि तुम उर्वशी के बारे में जानते हों. तो मैंने कहा कि हाँ!जानता हूं, फिर भी तुम उससे अपने शादी कि बात कर रहे हों. माँ जी!  मैंने आपसे कुछ भी छिपाया नही है,  ना ही कोई मैंने आपसे झुठ बोला है. मैं सचमुच उर्वशी से प्यार करता हूं और मैं उसके जीवन को अपने प्यार और चाहत कि जुबान देना चाहता हूं. प्लीज!आप मना मत करिए.मैं आपके पाँव पड़ता हूं, इतना कहते ही अजय उनकी  पाँव में गिर पड़ा. उर्वशी कि माँ ने कहा कि अरे! अरे! ये तुम क्या कर रहे हो बेटा.

उन्होंने आलोक को उठाया और अपने गले से लगा लिया.गले से लगाने के बाद वे बोली ठीक है बेटा.मुझे कोई आपत्ति नही, हाँ! अगर तुम्हारें माँ-बाप को हों तो और बात है. इतना सुनते ही आलोक जैसे बावला हों गया हों.किसी तरह अपनी खुशी को कंट्रोल करने के बाद उसने देखा कि उर्वशी ने उसके और उसकी  माँ के बीच हुई जैसे सारी बाते सुन और समझ ली हों. उसे तब और विश्वास हों गया, जब उसने अपनी माँ के कहने पर चाय और पानी लेकर उस कमरें में आई और देकर जाने लगी तो उसकी  माँ ने कहा,- बेटी उर्वशी! तुम भी चाय लेकर हमारे पास बैठो. तो उर्वशी एक और कप में चाय लेकर अपनी मम्मी के बगल के सोफे पर जाकर बैठ गई. बैठने के बाद उर्वशी कि माँ ने उससे सभी बाते बता देने के बाद पुछा, बेटी उर्वशी! तुम्हें आलोक पसंद तो है ना?इतना पूछते ही जब उर्वशी शर्मायी तो उसकी माँ सब समझ गई. क्योंकि उन्हें बचपन से अपनी उर्वशी कि भाषा का पता था.


फिर आलोक ने सब-कुछ अपनी मम्मी-पापा से बता दिया और उसके मम्मी-पापा यह सुनकर बहुत खुश हुए और कहा कि आलोक आज तुम्हें अपना बेटा कहते हुए हमें गर्व हों रहा है.फिर इसके बाद हमारी और उर्वशी कि शादी पूरे धूम-धाम से हुई, इतना ही  नही हमने अपने मम्मी-पापा से इजाजत लेकर उर्वशी कि माँ को भी अपने साथ रहने के लिए तैयार कर लिया.शादी कि पहली रात जब मैं उर्वशी के पास पहुंचा तो शर्माई सकुचाई छुईमुई सी उर्वशी घुघट काढ़े बैठी थी.

मैंने जब उर्वशी का घुंघट खोला तो चौक गया क्योंकि उर्वशी कि आँखों से आँसू बह रहे थे. मैं डर गया कही उर्वशी इस शादी से दुखी तो नही है. मैंने किसी तरह उर्वशी से पूछा कि उर्वशी क्या तुम अपनी इस शादी से खुश नही हों? तो, उर्वशी मेंरे सीने से लगकर कुछ देर तक सिसकती रही, फिर उर्वशी ने एक कागज़ पर अपने दिल का लिखा एक पन्ना मेरी हाथों में पकड़ाया जिसे मैं अपनी एक सांस में पढ़ गया.पढ़ने के बाद मैंने कहा पगली फिर उसके आँसू पोछकर बोला मैं कोई देवता-वेवता नही बल्कि तुम हमारे प्रेम और मोहब्बत कि देवी हों.


हमारी शादी के 4 वर्ष बाद एक बार फिर दिल्ली कि उसी आर्ट गैलरी में, वैसी ही प्रदर्शनी लगी, लेकिन इस बार इस आर्ट गैलरी की सबसे बड़ी उपलब्धि थी उर्वशी शर्मा का इसी आर्ट गैलरी में टंगी वह पेंटिंग जिसमें "एक गुंगी दुल्हन जब सुबह के धुंधलके में  अपने कमरें कि खिड़की को खोलकर बाहर कि तरफ  देखती है,तो जैसे खिड़की के रास्ते से होकर कमरें में आती हुई रश्मिया उससे बात करना चाह रही हों,और वे दुल्हन जैसे रात भर अपने पिया से बात कर थकी हों. इसलिए वे उन रश्मियों को बस देखेगी पर उनसे कोई बात नही करेगी."


इस पेंटिंग का चयन इस बार पद्मश्री के लिए किया जाता है. यह समाचार जैसे ही टेलीविजन और दूसरे दिन के अखबार में वायरल हुआ तो जैसे आलोक और उर्वशी के घर पूरी दिल्ली उमड़ पड़ी हो. बधाइयो का तांता लग गया. जब इन सब से उर्वशी और आलोक खाली हुए तो रात काफी हों चुकि थी. अतः वे दोनो जब अपने कमरें में पहुंचे तो आलोक ने उर्वशी से अपनी आँखें मुंदने के लिए कहा, और उसने अपनी आँख मुंद ली.


फिर कुछ देर बाद जैसे आलोक ने उसकी  हथेली पर कुछ रखा हो.रखने के बाद कहा कि उर्वशी अब तुम अपनी आँख खोल सकती हों. इतना सुनने के बाद उर्वशी ने जब अपनी आँखें खोली तो दंग रह गई. उसका कारण था, उसकी  हथेलियों पर एक प्यारे से गुलाबी डिब्बे में करके करीने से रखी हुई हीरे की  खूबसूरत सी अंगूठी, उसे डिब्बे से निकालने के बाद उर्वशी ने अपनी कोमल ऊँगलिया आलोक के सामने कर दी .

जिसमें प्यार से अंगूठी पहनाते हुए आलोक ने कहा  कांग्रेचुलेशन माई लव! इतना सुनते ही उर्वशी,आलोक के सीने से लग गई. जैसे कह रही हों,लव यू आलोक! ये तुम्हारी देन है अगर तुम ना चाहते तो,मै कभी भी दोबारा कैनवास पर कुछ उतार ना पाती और आलोक ने भी जैसे अपनी उर्वशी से कहा हों, कि तुम हमारे दिल के आर्ट गैलरी में केवल एक जन्म तलक ही नही बल्कि कई जन्मो तक यूहीं टंगी रहोगी उर्वशी.


यह कहानी मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है.
दिनांक-11/5/21


लेखक-- रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P )
mo.no. 7800824758


 


Saturday, 8 May 2021

कविता---(रोटी रह गई )

मालगाड़ी से कटे मजदूर और रोटी--------

              (रोटी रह गई )

जिंदगी मजदूर की खोटी रह गई, 
वे मालगाड़ी से कट गया, 
एक तरफ उसकी लाश, 
तो दुसरी तरफ--------
ट्रेक पे चंद रोटी रह गई. 

इसे भूख ही परदेश लाई, 
ये रात-दिन खटता रहा, 
फिर छिन गई इससे रोटी, 
ये चल पड़ा परदेश से गाँव अपने, 
लेकिन उफ ! रे भूख तु भी,
छिन बैठी जिंदगी मजदूर की, 

वे देखो जा रही है मालगाड़ी----
बेहया, निर्लज्ज सी, 
उसके पीछे ट्रेक पे, 
मजदूर से होके जुदा---
चंद रोटी रह गई. 

रंगनाथ द्विवेदी. 
जौनपुर, mo. No. 7800824758

Friday, 7 May 2021

(गुरुत्वाकर्षण है)
उसकी खुबसुरती को एक टक देखना,,,,,,,,,
मेरी बद्चलनी नही,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
बल्कि ये उसके तराशे हुये बदन का-----
एै,रंग---गुरुत्वाकर्षण है।
(अवैध संम्बंध है)
हाँ मुझे कुब़ूल है,तेरे इल्ज़ाम से पहले,,,,,,,,
ऐ,खुबसूरती-----कि मेरा
तेरी तारिफो से अवैध संम्बंध है।
(अंदर एक मीर तड़पता है)
जब भी शहर में कोई भूख से मरता है,
मेरी नज्म़ो का कूनबा उजड़ता है।
ऐ,रंग----मैं सीसक उठता हूँ लफ्ज़-लफ्ज़,
और मेरे अंदर एक मीर तड़पता है।

मई,2021 के "सरस सलिल " प्रथम अंक में प्रकाशित लघुकहानी---( प्राइवेट अस्पतालों और डॉक्टर )

मई 2021 के "सरस सलिल " प्रथम अंक में प्रकाशित लघु-कहानी----(प्राइवेट अस्पताल और डॉक्टर  )

वह शहर का सबसे प्रसिद्ध और काफी महंगा प्राइवेट अस्पताल था, जिसकी सीढ़ियों तलक पर चमचमाते हुए संगमरमर के पत्थर लगे थे.उसी अस्पताल के अंदर एक औरत जो कि पहनावे से ही काफी गरीब लग रही थी,अपने बीमार बच्चे को,उस अस्पताल के डॉक्टर से केवल एक बार देख लेने के लिए वहां के सभी कर्मचारियों से गिड़गिड़ा रही थी अपने हाथ जोड़ रही थी, लेकिन उन सभी के कानों पर जू तक नही रेंग रही थी, बल्कि वे सभी आपस में बाते करते हुए जोर-जोर से हंस रहे थे.


वह औरत फिर भी उनके इस व्यवहार को नजर अंदाज कर,उनसे गिड़गिड़ाए जा रही थी,कि भगवान के लिए एक बार मेंरे बच्चे को डॉक्टर साहब को बुलाकर दिखा दीजिए आप सब की मुझ गरीब पर बड़ी कृपा होगी.कई बार ऐसा करने पर वह सभी बोले,  अरे जाओ! अभी डॉक्टर साहब के आने का टाइम नही हुआ है. ऐसा वे सभी उस औरत के चले जाने के लिए कह रहे थे, क्योंकि वह सभी जान गए थे कि इस औरत के पास अपने बच्चे को दिखाने के लिए एक फूटी कौड़ी तक नही है.लेकिन जिस माँ का बच्चा बीमार हो वे माँ अपने बच्चे को बचाने की कोशिश या प्रयास कैसे छोड़ सकती है.


उसने भी यह कोशिश और उम्मीद नही छोड़ी. लेकिन शायद इस बार की उसकी कोशिश से अस्पताल के सारे स्टाप उससे झूझला गए और उस औरत को जबरदस्ती हाथ सहित बेरहमी से पकड़ा और अस्पताल के बाहर कुछ इस तरह धकेला कि वह औरत अपने बीमार बच्चे के साथ गिरते-गिरते बची.


फिर वह कुछ देर उस अस्पताल के चमचमाते पत्थर लगी सीढ़ियों के एक किनारे अपने बीमार बच्चे को लेकर बैठ गई. जैसे वह डॉक्टर के आ जाने का इंतजार कर रही हो. इसी उम्मीद में वह बीच-बीच में अपने बच्चे को देखती और धीरे-धीरे थपकती जैसे वह अपने बच्चे को समझा रही हो,कि बस बेटा थोड़ी देर और बर्दाश्त कर ले फिर तू  एकदम भला चंगा हो जाएगा जबकि उसकी उस थपकी से उसके बच्चे के शरीर में कोई हरकत नही हो रही थी.


तभी उसकी कानों में डॉक्टर साहब आ गए, डॉक्टर साहब आ गए के का शोर सुनाई पड़ा, और इतना सुनते ही उसकी बुझी आँखों में जैसे अचानक कोई रौशनी आ गई हो. वह झट से उठकर अपने बच्चे को डॉक्टर को दिखाने के लिए ज्यो हि उठाने का प्रयास करती है,तो उसके बच्चे के शरीर में कोई हरकत नही होती. वह औरत बहुत जोर से चिखती है और अपने  बच्चे को लिए-दिए ही एक तरफ ढुलक जाती है.


और उस अस्पताल का पुरा स्टाप उस चिखने वाली औरत की तरफ दौड़ पड़ता है,उन दौड़ने वालों में अब वह डॉक्टर भी शामिल था जिसे दिखाने के लिए अभी थोड़ी देर पहले यह औरत उन सभी से गिड़गिड़ा रही थी.लेकिन तब इनमें से इस तरह कोई नही दौड़ा. इन सभी ने दौड़ने में बहुत देर कर दी. काश! यह सभी उसी समय दौड़े होते तो शायद यह औरत और इसका बीमार बच्चा बच गया होता.अब वही डॉक्टर उस औरत और उसके बच्चे की नब्ज़ देखने के बाद बोला कि, यह दोनों मर चुके है, इनकी डेड बॉडी जल्दी से अस्पताल के सामने से हटवाओ, इतना कहकर डॉक्टर अपने केविन की तरफ चला गया.

यह संवेदनहीनता महज़ एक शहर के अस्पताल या डॉक्टर की नही बल्कि देश के ना जाने कितने ऐसे  प्राइवेट अस्पताल और डॉक्टर की है जिसके फर्श तलक महंगे संगमरमर के टाइल्स से चमक रहे है, लेकिन उन पत्थरो की सीढ़ियों पर हर महीने कोई ना कोई ऐसी मजबूर माँ अपने बच्चे को बचाने के लिए इन बेरहम लोगों के सामने गिड़गिड़ा रही होगी.


लेकिन उसे भी कुछ इसी बेरहमी के साथ अस्पताल के बाहर सीढ़ियों की तरफ धकेल दिया जाता होगा, और वहां का डॉक्टर बिल्कुल यहां के डॉक्टर की तरह नब्ज़ देखकर कह रहा होगा की दोनों मर गए है, इनकी डेड बॉडी जल्दि से अस्पताल के सामने से हटवा कर सारे फर्श को फिनायल से साफ करवा दो.




यह कहानी मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है.




लेखक---रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
mo. no.7800824758

Tuesday, 4 May 2021

(नर बली लेती है)
उसके इश्क का बड़ा ही तांत्रिक तरिका है,,
ऐ,रंग-------------
वे इसमें नर बली लेती है।

कविता---( नागफनी सा हो गया हूँ )

(नागफनी सा हो गया हूँ)

गमले में सजी-------------
मै नागफनी सा हो गया हूँ.
आम, महुवे और निम्मौड़ी नीम की,
बंद कमरे की खिड़की से नही दिखते,
मेरे गाँव के पोखर,
ढ़ेरो आवाजें और शोर-शराबा
अंदर से मुझे कचोट रहा
ये कान भी तरस रहे सुनने को,
बागो में राग कोयल,
आज सबकुछ बदल गया है,
मै और मेरी जिंदगी दोनो,
अब बस केवल इतना है कि,
गमले मे सजी--------
मै नागफनी सा हो गया हूँ.
गरमी की उमस है,
और इतना बड़ा ये कंक्रीट का घर,
पर वे प्यास वे पानी,नही
जो मेरे कुँए के महज एक लोटे मे था,
उफ! शहर मे नमकीन और
मिठाई की ढ़ेरोंं दुकाने है,
लेकिन मन की मिठास कड़वी हो गई,
वे देशी गुड की डली,
छोड आया,
मै बस केवल इस कंक्रीट के घर मे,
गमले मे सजी--------
नागफनी सा हो गया हूँ.
चारो तरफ मशीनी खड़-खड़ाहट है,
रात है रौशनी है,
गाड़ियों की ढ़ेरों आवा-जाही है सड़क पे,
पर मेरी आँख खुली की खुली है,
याद आ रहा मुझे गाँव,
वे दरवाजे पे बिछी चारपाई,
वे पीपल के रात की सुंदरता मे ढेरों
चमकते जुगनू
हाय! ये पैसे की हत्तक ने छिन लिया,
आज मै जिंदा रह के भी,
केवल इस घर के,
गमले मे सजी ऐ "रंग" 
मै नागफनी सा हो गया हूँ.

@@@रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U.P.)
Mo.no.7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

Sunday, 2 May 2021

(ड्रग्स लेता हूँ)
मेरे रोम-रोम में है,उसके चुभने के निशानात--------
ऐ,रंग-------------
मै उसकी मोहब्ब़त का ड्रग्स लेता हूँ।

कविता--(वन्दे मातरम गाए )

(वंदे मातरम गाये)
शहीद की लाश को जब गाँव दफनाये------
तो वंदे मातरम गाये।
ना बीबी तोड़े चुड़ी ना आँसू बहाये,
फक्र करे हमपे और खुल के मुस्कुराये,
और अपने शौहर की शहादत पे---------
वंदे मातरम गाये।
माँ ने गाई थी बचपन में लोरियां बहुत,
आखिरी इच्छा है कि रोना नही माँ,
गर हो सके तो तु भी मेरी लाश के सिरहाने,
अपने बचपन के लोरियो की तरह-------
वंदे मातरम गाये।
बापु देना कांधा कब्र तक मुझे,
और मिट्टी डालते बखत,
दिल कमजोर मत करना,
क्योंकि मेरी इच्छा है कि आपके लब पे बेटा नही बापु-------
वंदे मातरम आये।
शहीद की लाश को जब गाँव दफनाये-------
तो वंदे मातरम गाये।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

कविता---(जिन्ना और नेहरू )

इस लेख का आशय किसी को आहत करना नही है,ये मेरा महज व्यक्तिगत विचार भर है।
                        (जिन्ना व नेहरु)
जिन्ना व नेहरु-----------
इस मुल्क के दो घाव थे!
इनकी चाह थी दिल्ली-----
इनके इसी चाह की भूख ने,
लाखो-लाख जिंदगियाँ निगल ली।
मजलुम औरतो की आबरू लुटी गई,
स्तन काटे गये,
मासूम बच्चियो के गुप्तांगो मे खंजर उतारा गया।
जिन्ना के कायदे आजम बनने की नाजायज भूख ने ही,
पाक जैसे नामाकूल देश को जन्म दिया।
लेकिन वहा भी खुदा ने एक मुसलमान के तौर पे,
जिन्ना को कबूल नही किया।
कहते है कि इस्लाम मे-----------
एक मर्तबा दफन होने के बाद दोबारा कब्र खोदना हराम है,
पर सुना है कि पाकिस्तान के इस कायदे आजम की कब्र,
कईयों मर्तबा खोदी गई।
एसे गलिज शख्स की तस्वीर ----------
हमारे मुल्क के तालिमे मस्जिद मे टंगा होना,
सच्चे और राष्ट्रभक्त मुसलमानों की तौहीन नही तो क्या है?
सच तो ये है की इस शख्स की तस्वीर को,
हमारी वर्षों पुरानी कांग्रेस सरकार को,
बेईज्जत कर कही फिकवा देना चाहिये था,
जो शायद अपने वोट बैंक की खातिर काग्रेस कभी कर नही पाई।
फिलहाल हमारे मुल्क के किसी भी दिवाल पे अगर किसी को-----
टांगना है तो वहाँ जिन्ना नहीं कलाम टंगे हो।
और इस देश के एैसे तमाम राष्ट्र-विरोधी--------
गैग्रीन जैसे पाँव काट देने चाहिये।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर----222002 (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.----7800824758

Saturday, 1 May 2021

(पी.एच.ड़ी.कर ली)
मोहब्बत में---------
मै आज तलक स्नातक न हुआ,,,,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----उसने कईयो का दिल तोड़----
इस हूनर पे पी.एच.ड़ी.कर ली।
(बुखार में सोया है)
ऐ अमीरी कहाँ तेरी तरह--------
वे किसी तीज या त्योहार मे सोया है।
अपने मासूम बच्चो के दोज़ख के लिये,
ऐ,रंग----एक मज़दूर--------
पुरी रात बुख़ार में सोया है।

@@मज़दूर दिवस।