Sunday, 26 April 2020

व्यंग्य---(लॉकडाउन में लिखी कवि की आत्मकथा )

व्यंग्य---( लॉककडाउन में लिखी कवि की आत्मकथा)

 इस कोरोनावायरस के लॉकडाउन ने मेरे अंदर के कवि की आत्मकथा को लिखने के लिए प्रेरित किया. यूं तो मैं भी सामान्य तरीके से जवान हुआ और सामान्य तरीके से एक  असामान्य लड़की से मेरा विवाह हुआ. अगर मैं डॉक्टर होता तो उसी समय तीन गिलास ग्लूकोज और दो बीपी कंट्रोल की गोली गटक जाता. मैंने आज तक जितनी भी शादी देखी या दुल्हन देखी उनमें यह अलहदा और सबसे अलग थी. उसे जिस भी कमरे में बाइज्जत मेरे साथ रहना था,  उसके किस्मत में भी ये स्याह  कोयले सी सुंदरी लिखी थी. 

 वहां पंडित विवाह के मंत्र पढ़ रहा था और मैं यहां मन ही मन बैठा महामृत्युंजय का जाप कर रहा था क्योंकि इसके साथ कितने दिन या रात गुजारने के बाद यह मंत्र भी याद रह पाएगा या नहीं, इसमें मुझे कंफ्यूजन है. मेरे अंदर रोमांटिक जितने भी भाव थे,  उनका एक्सीडेंट तो सुहागरात के दिन ही हो चुका था. उस रात के बाद मेरे मुंह पर 12:00 बज चुके थे. जो अब तलक बजे हुए हैं. जिसे मैं लाख चाहकर भी अब ठीक नहीं कर सकता. 

 मेरी जिंदगी में पदार्पण कर चुकी महान जानलेवा पत्नी दोनों पैर बेड पर फैलाए 70% बेड पर कब्जा किए हुए न्यू खर्राटे भर रही थी जैसे कोई 22 सालों से खड़ा स्कूटर किसी योग्य मिस्त्री के बनाने के बावजूद उस बिगड़े हुए स्कूटर की ध्वनि को ठीक नहीं कर पाया हो. उसके ठीक ना कर पाने का खामियाजा उस कॉलोनी के सभी पड़ोसी भुगत रहे हो, ठीक वैसे ही मैं भी अपनी उसी स्कूटर की तरह  बिगड़ी पत्नी को सारी रात भुगतता रहता हूं. जिस दिन उस महान अप्सरा के चेहरे पर मैं जरा सा भी गुस्से का मानसून देखता हूं मैं उससे पहले ही सतर्क हो जाता हूं क्योंकि गुस्से में वे एक खूंखार महिला दरोगा लगती है. 

 वे जब सो कर उठने के बाद मुझे प्राणनाथ कहकर चाय मंगाती है तो मैं समझ जाता हूं कि,  मेरे और उसके दिनचर्या की शुरुआत हो चुकी है. उसका मेरे जीवन में आने से मेरी विपत्तियों  की दुनिया गुलजार हो गयी . उस दिन मेरी पहली कविता लिखने की शुरुआत हुई, जब उसने विवाह के तीसरे महीने में करवा चौथ के दिन अपने भीषण राग में मेरी लंबी उम्र की आरती उतारी. लेकिन आरती उतारने के बाद ज्यों ही  छत से  कमरे में आई, फिर बेड पर सो कर लगी अपने पांव दबवाने. उस दिन तुलसीदास के अस्तर का स्वाभिमान तो नहीं जगह लेकिन हां एक कविता जरूर हाजमोला प्रजाति की इस ना हजम होने वाली पत्नी पर लिख बैठा. 

 फिर धीरे-धीरे 1 वर्ष बाद कवि सम्मेलन में आयात निर्यात होने लगा. इस आयात निर्यात से जो पैसे मिलते हैं,  उसे पत्नी को पकड़ा देता. इन मंचों पर मेकअप करके बैठी सुंदर कवित्री या उनके गीत व कविता से ज्यादा उनके देखने का सुख,  मैं लंबे समय से जी रहा था. कभी-कभी तो इच्छा होती कि काश यह कवि सम्मेलन एक आध महीने लगातार चलता रहे, लेकिन ऐसा भला कभी हुआ है. यह विश्वरी कारण आज तलक नहीं बना शायद इसीलिए भी न बन पाया हूं कि ईश्वर ने हम कवियों को आजीवन सुखी रहने का श्राप दे दिया हो.

 अब तो यही मन ही मन निकलता है कि, सत्यानाश हो इस चीनी कोरोनावायरस का जिसकी वजह से भारत सरकार कॉल लॉग डाउन करना पड़ा. इसमें भीषण उपलब्धि यह है कि,  मेरी पत्नी हर आधे घंटे बाद या तो मुझे दिख रही है,  या तो वह मुझे देख रही है. मैं उसकी इस प्रताड़ना से इतना ज्यादा सैनिटाइज हो चुका हूं कि मैं शायद कोरोनावायरस के खत्म होते ही यह " लॉकडाउन में लिखी कवि की आत्मकथा" पूर्ण कर लूं.

 यह व्यंग मेरा स्व-लिखित व अप्रकाशित है.

 लेखक-- रंगनाथ द्विवेदी
 जज कॉलोनी, मियांपुर, कलेक्ट्री कचहरी जौनपुर--222002 (U.P.)
Mo.no.-- 7800824758

Monday, 20 April 2020

कविता---(मजदूरन की सुंदरता )

कविता----(मजदूरन की सुंदरता )

चील-चिलाती धूप में
आकर्षित करती है, 
मेरी कविता को----
उस मजदूरन की सुंदरता.
जो अपने दूधमुहें बच्चे को, 
बगल में छाया कर लिटा,   
पसीने से तर-बतर भीगी 
चलाये जाती है, 
छोटा सा फावड़ा
उस बच्चे का---
बीच-बीच में रोकर, 
अपनी मजदूरन माँ को बुलाना, 
और उस मजदूरन माँ का,  
विह्वल हो--
अपने दूधमुहें बच्चे को ,  
स्तनपान कराना, 
और फिर उसे लिटा----
पहले की तरह
चील-चिलाती धूप में,
फिर से फावड़े को चलाना, 
और पसीने से तर-बतर भीग जाना, 
सच कितनी आकर्षित करती है, 
मेरी कविता को------
तब उस मजदूरन की सुंदरता. 


यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है. 

रचनाकार---रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin.no.222002 (U P)
Mo.no.7800824758

Sunday, 19 April 2020

कहानी---(इतवार के गोलगप्पे )

कहानी----(इतवार के गोलगप्पे )

 हमारी और नीलू के बीच इतवार से एक दिन पहले यानी कि शनिवार को तू तू मैं मैं कंफर्म थी. फिर इसके बाद--"मोहब्बत के  मौन युद्ध की शुरुआत , इस मौन युद्ध के लक्षण थे-- बिना बोले खाना निकाल कर थोड़ी सी आवाज के साथ थाली को पटकर सामने रखना, गिलास के पानी को भी कुछ यूं क्रोध की भंगिमा के साथ रखना कि उसने से दो-चार बूंद पानी का इधर उधर खाने की मेज पर गिर जाना". मुंह के हाव भाव से जैसे आज वे रोमांटिक लव स्टोरी नहीं बल्कि मोहब्बत के कश्मीर की ak-47 लग रही थी. 

 फिर बिना कुछ बोले बात किए बेडरूम में मेरी तरफ पीठ करके नीलू के सोने का वे नाटक मैं भली-भांति समझ रहा था, अक्सर वे जब शनिवार की रात को नाराज होती थी तो उस रात उसकी अन्य रात की अपेक्षा कुछ ज्यादा ही चूड़ियां और पायल बजा करती थी, नीलू के इस आर्टिफिशियल गुस्से की अदा मुझे सोने से पहले एक बार जरूर मुस्कुराने के लिए मजबूर कर देती थी. 

 क्योंकि दूसरा दिन इतवार का होता था उस दिन नीलू के तू तू मैं मैं के गुस्से का टेंपरेचर शनिवार से कहीं ज्यादा बढ़ा हुआ होता था. और इतवार के दिन मैं उससे वैसे ही  डरा और सहमा सा दिखने की कोशिश करता था जैसे कि मैं उस रविवार को डरा और शहमा था, जब नीलू से हमने अपने दिल की बात कही थी. एक तरह से रविवार हमारे और नीलू के मोहब्बत के इजहार का ही दिन नहीं बल्कि यह हम दोनों के मोहब्बत की एनिवर्सरी का दिन भी है. 

 मैंने शाम को गैरेज से बाइक निकालकर स्टैंड पर खड़ा करके, ज्योंही नीलू को लेने के लिए कमरे में पहुंचा तो देखा कि नीलू पहले से ही तैयार खड़ी है. लेकिन अभी भी उसी गुस्से के तापमान का अपने वे इजहार कर रही थी. नीलू बाइक पर बैठी तो लगा कि उसके गुस्से का तापमान अब थोड़ा घट रहा है उसका मुख्य कारण वे गोलगप्पे की दुकान थी जहां पर मैंने और नीलू ने शादी से पहले गोलगप्पे खाए थे. 

 अब नीलू के होठों पर हल्की-हल्की बूंदा बूंदी टाइप की मुस्कुराहट चेहरे पर दिख रही थी. उसकी इसी मुस्कुराहट के दरमियान हमने दो दो प्लेट गोलगप्पे खा लिए, अब नीलू की आंखें थोड़ी बहुत गीली हो उठी थी मैं जानता हूं कि वे गोलगप्पे का पानी तीखा है का बहाना बनाकर अपनी मोहब्बत को छिपा लेने का प्रयास करेगी लेकिन वे छिपा नहीं पाएगी क्योंकि मैं अब उसकी इस आदत को पहचान गया हूं. फिर घर वापसी के समय नीलू मेरी मुझसे यह हमेशा की तरह कहेगी कि जानते हैं कि मैं आपसे नाराज थोड़ी न थी बस आपके साथ मुझे इतवार को गोलगप्पे खाने थे. 

यह कहानी मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है. 

लेखक--रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin.no.222002 (U P)
Mo.no.7800824758

Thursday, 16 April 2020

लघुकथा---(मयूरी )

लघुकथा----(मयूरी )

 शहर के खचाखच भरे हुए हाल में शास्त्री नृत्य का आज आखिरी दिन था, सभी प्रतिभाग करने वाली लड़कियां एक-एक कर अपना  नृत्य प्रस्तुत कर चुकी थी. उन्हीं में अगला नाम मयूरी का भी लिया गया और जैसे ही मयूरी  स्टेज पर आई तो उसने सबसे पहले निर्णायक मण्डल फिर उस हाल में बैठे तमाम दर्शकों का अभिवादन किया. फिर इसके बाद मयूरी के पांव थिरके तो सभी कि मानो धड़कनें थम गई हो.  मयूरी के पाव के घुंघरू व उसके नृत्य का जादू ही कुछ ऐसा था.  फिर जब उसके पांव रुके तो ऐसा लगा जैसे मयूरी अभी नाच रही हो. 

 सारे दर्शकों और निर्णायक मंडल के निर्णय जिसका कि मैं स्वयं चीफ गेस्ट था.हम सभी ने मिलकर प्रथम पुरस्कार के लिए जैसे ही    मयूरी का नाम लिया दर्शको से भरा हुआ पूरा हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा. वे जब अपना पुरस्कार लेने के लिए स्टेज पर आई और मैंने उसे जब पुरस्कार थमाया तो मैंने मयूरी से ढेर सारी बातें करनी चाहि पर  वह मुझसे कुछ बोली ही नहीं,  तो मुझे कुछ अटपटा सा लगा मैंने आयोजक मंडल की तरफ देखा तो  उन्होंने झट मुझे बताया कि मयूरी--"जन्म से गूंगी है" वे कुछ बोल नहीं सकती.  मैंने कहा नहीं मयूरी गूंगी नहीं है वे अपनी कला से खुद इतना बोलती है कि जुबान वाले क्या उतना बोलेंगे, हां मैं इस मयूरी और इसकी कला को कभी गूंगी नहीं रहने दूंगा बल्कि मैं मयूरी से शादी कर आजीवन इसके  इस कला की आवाज को मै अपने कानो से  सुनता रहूंगा और मेरी मयूरी बोलती रहेगी. 


यह लघुकथा मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है. 


लेखक---रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin.no. 222002 (U  P)
Mo. no. 7800824758

लघुकथा---(चुरन वाले काका )

लघुकथा----(चुरन वाले काका )

 आज निर्मला अपने मायके कई सालों के बाद आई थी, वे घर के सारे सदस्यों से काफी रात तलक बाते करती रही. जिसकी वजह से उसकी नींद सुबह काफी देर से खुली. नींद खुलने के बाद निर्मला अपनी दिनचर्या के सारे काम निपटा कर अपनी उन सहेलियों से मिलने चल पड़ी जो बचपन में उसके साथ खेली व पढ़ी थी. निर्मला अपनी सभी सहेलियों से मिलने के बाद जब अंत में पुष्पा से मिलकर अपने घर लौट रही थी तो उसे--अपने स्कूल का वे गेट दिखा, स्कूल का गेट दिखते ही निर्मला के मुंह में वह बचपन का चटखारा और पानी भर आया जो उसे चूरन वाले काका को देखकर आता था. 

 उन दिनों निर्मला को सबसे ज्यादा पसंद वे चूरन और चूरन वाले काका ही थे. हालांकि निर्मला चूरन वाले काका नाम नहीं जानती थी इसलिए निर्मला उनको चूरन वाले का काका कहकर बुलाती थी.निर्मला के वे चूरन वाले काका कभी कभार पैसे ना रहने पर भी उसे चुरन  दे दिया करते थे. निर्मला जैसे अपने बचपन के चुरन वाले  काका को अगल-बगल कहीं देख या ढूंढ रही हो,  लेकिन उसके वे चूरन वाले काका कहीं दिखे नहीं उनके बारे में जानने की उत्कंठा निर्मला के मन में इतनी उठी कि वे अगल-बगल के लोगों से उस चूरन वाले काका के बारे में खुद को पूछने से नहीं रोक पाई.

 अगल-बगल के जानकारों से पता चला कि निर्मला के चूरन वाले काका को मरे  लगभग 2 वर्ष बीत चुका था. इतना सुनकर के निर्मला के मुंह में वह बचपन का चटखारा और पानी नहीं आया जो उनके चुरन के नाम पर अक्सर उसके मुंह में आ जाया करता था, हां इतना अवश्य हुआ कि वे पानी निर्मला की आंखों में भर आया. बचपन की निर्मला का अपने चुरन वाले काका के प्रति वे इतने भावुक आंसू थे जैसे किसी बिटिया ने अपनी बापू को याद किया हो. फिर न जाने क्यों निर्मला को ऐसा लगा कि जैसे तीन-चार पुड़िया चुरन की बांधे चूरन वाले काका कह रहे हो कि बिटिया तुम हमेशा खुश रहो. 


यह लघुकथा मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है. 

लेखक--रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin. no. 222002 (U P)
Mo. no. 7800824758

Monday, 13 April 2020

लेख---(फिर जीवित हुई 'कर्मनाशा की हार ')

 ( फिर जीवित हुई 'कर्मनाशा की हार')

इस समय लगभग पूरे देश व राज्य में बाढ़ से हाहाकार की स्थिति है. क्या पशु,क्या पक्षी, क्या मनुष्य सभी इसकी जद मे है. खाली ज़मीन तक दिखने के लाले है. इस भीषण जल प्लावन से.उसपे तुर्रा ये है कि-"विसंगतियां अट्टहास कर रही". ऐसी ही बाढ़ की विभीषिका पे हमने छात्र जीवन में एक जिवंत सी कहानी "कर्मनाशा की हार" पढ़ी थी.वैसे लेखक की उस बाढ़ पे लिखी कहानी जैसी कहानी मैंने फिर किसी लेखक मे न पायी और न पढ़ी.हाँँ इतना जरुर है, कि मैने सोचा न था कि आधुनिक व्यवस्था के इस दौर में वे कहानी "कर्मनाशा की हार" फिर से जीवित हो जायेंगी.

लेकिन कहानी "कर्मनाशा की हार" फिर जीवित हुई लेकिन कहानी से भयावह,हाँँ फर्क इतना जरुर है, कि इस बार ये "कर्मनाशा की बाढ़" केवल बिहार की बाढ़ नही अपितू लगभग-लगभग पूरे देश की बाढ़ है". वे तथाकथित राज्य चाहे चकाचौंध व अर्थ की राजधानी मुंबई या महाराष्ट्र हो,मध्यप्रदेश हो,उड़ीसा हो,गुजरात हो. वर्तमान में ये विभीषिका बिहार मे है ,उस बिहार में है जिस बिहार की एक नदी कर्मनाशा की बाढ़ पे लेखक ने अपनी कहानी "कर्मनाशा की हार" लिखी थी.वर्तमान मे बिहार में सुशासन बाबू की सरकार है,यहा सुशासन बाबू से अभिप्राय नीतीश बाबू से है.

कभी बिहार की राजधानी पटना को आंचलिक गानो में गायको ने गाया था कि--"पटना से वैद्या बोलाय दा कि नजरा गईनी गोईया".अब इस गाने की मिठास पे इस बाढ़ की भयानक कड़वाहट का असर है.इस बाढ़ की जद मे स्वयं सुशासन बाबू यानि नीतीश कुमार की राजनीति बुरी तरह फस चुकी है.इस आंचलिक गाने की लाईन "नजरा गईनी गोईयां" को अब आप नीतीश की राजनीति से जोड़कर देखे कि किस तरह इस बाढ़ से उनकी राजनीति और कुर्सी दोनो नजरा चुकी है.भाजपा से नाखुश होने के इज़हार से दो चार थे,अब उसी भाजपा के मोदी नाम की गलबहियां से ये अपनी राजनीति की इस "कर्मनाशा की हार " से निकलने व बचने को लालायित दिख रहे.लेकिन इनके राजनीति की "कर्मनाशा की हार" या जीत जनता तय करेंगी जो खुद इस समय बाढ़ से पीड़ित व आहत है.

लेकिन कहानी में "कर्मनाशा की हार" के लिये तमाम,जादु,टोने,टोटके होते है,"कर्मनाशा हारती भी है" लेकिन बहुतो को तबाह व बर्बाद कर.आधुनिक युग,तकनीकी विज्ञान इसे अंधविश्वास मानती है और सही भी है. लेकिन इस विज्ञान और आधुनिकता ने हमें प्रकृति से खेलने और इसे बर्बाद करने का ऐसा खेल सिखा दिया है जो कि उस कहानी से कही ज्यादा भयानक होगा, और पूरी आधुनिक विज्ञान की दुनिया कहीं ऐसा न हो कि वे "कर्मनाशा की हार"  की कहानी के साथ ही अपना सबकुछ खुद हार जाये.आईये हम आप प्रकृति में उस बाढ़ की कहानी "कर्मनाशा की हार" को जीवित होने से बचाये.


यह लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.

लेखक---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758

लेख--(हमीद मियां हमारी गाँव की रामलीला के राम )

 (हमीद मियां हमारी गाँव की रामलीला के राम)

हमारे गाँव की रामलीला के मंचन का ये जादुई चालीसवां वर्ष है.इस रामलीला के तमाम कीर्तिमान है,जो किवंदतियो की तरह काफी रोचक है. इसके किस्से जब सुने व सुनाये जाते है,तो बिना पूरा सुने उठा ही नही जाता. इस रामलीला की प्रसिद्धी गाँव-जवार तक ही नही अपितू पूरे राज्य में है.

इस रामलीला को देखने के लिये लोग महिनो पहले ही किसी न किसी जुगत मे लग जाते है.जो भी व्यक्ति यहां की रामलीला देखकर जाता है तो दुसरे वर्ष खुद-ब-खुद खिचा चला आता है. इस रामलीला के तमाम कलाकार छः महिने पहले से ही अपने-अपने मिले हुये किरदार की प्रेक्टिस करना शुरु कर देते थे. ये कलाकार भी कोई--"ऐरे-गैरे नत्थुखैरे न थे" वे जीवंत और एक से एक अलौकिक कलाकार थे.

इन्ही रामलीला के अलौकिक कलाकारों मे कभी--"राम बने इसी गाँव के हमीद मियां थे".जिनका नाम आज भी इस रामलीला के लिये अजर और अमर है. कहते है कि इस रामलीला में--राम का चरित्र या किरदार जैसा हमीद मियां ने निभाया ,वैसा फिर इस रामलीला में राम बने, किसी भी किरदार ने नही निभाया.

सच तो ये है कि हमीद मियां एक मुसलमान नही अपितू वे उस विषम कालखंड के हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रतीक थे और गाँव की लोकप्रिय रामलीला के सच्चे अर्थो मे राम थे.जानने वाले या ना जानने वाले भी केवल उन्हे रामलीला मे राम के रोल मे देखने के कारण,हमीद मियां नही अपितू राम कहकर ही बुलाते थे.

 वे खुद भी भुल गये थे कि--उनके घर वालो ने उनका नाम हमीद रखा था.लेकिन उनका रामलीला में राम बनना इतना आसान भी नही था. उन्हे रामलीला मे राम बनने के लिये बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी. इसके लिये उन्हें हिन्दू और मुसलमान दोनो की ही कंटरपंथ का सामना करना पड़ा था--"तीन बार उन्हें थाने की भी हवा खानी पड़ी थी".

लेकिन शायद भाईचारे और मोहब्बत की पैगाम के लिये,मालिक भी बीच-बीच में हमीद मियां जैसे लोगो को ज़मी पे भेजता रहता है. ताकि इंसानियत और मोहब्बत के चराग की रौशनी बुझने न पाये. आज इस रामलीला के मशहूर राम हमीद मियां नही है,लेकिन ये उन्ही की मुकद्दस देन है कि--"मेरे गाँव के लोगो ने हमीद होना सिखा लेकिन कभी भी कट्टर हिन्दू या मुसलमान होना नही सिखा"

यह लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.

लेखक---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758

व्यंग्य---(हमारी पुलिसवाली पत्नी का करवा चौथ )

(हमारी पुलिसवाली पत्नी का करवा चौथ)

हमारी 2019 मॉडल की पत्नी सौभाग्य से महिला पुलिस में अपने थाने की कोतवाल है.वे अपने थाना क्षेत्र में इतनी मशहूर है कि--"वहां के पति अपनी पत्नियों की सेवा मे हर वक्त इसके डर से पीले रहते है ,मै स्वयं चौबीस कैरेट का भुक्तभोगी हूं".आज जैसे ही वे थाने से लौटी, मैं झट एक गिलास पानी विथ मिठाई के लेके हाजिर हुआ, तो वे बोली रहने दीजिये मैं ले लुंगी,इतना ही नही उसने आज चाय अपने हाथ से बनाई,नहाने के लिये पानी निकाला,फिर बड़े प्यार से उसने साड़ी पहनी और शीशे के सामने खडी़ होंकर "ऐश्वर्या राय और सोनाक्षी सिन्हा की तरह अपने महीनो से लालित्यहीन होठों को इधर-उधर किया".

आज तो जैसे वे "मेरे सभी जीवित बल्बों को फ्यूज करने पे तुली थी". मेरी हिम्मत तो इससे कुछ भी पुछने की उसी दिन से जवाब दिये पड़ी थी,जबसे इसने पुलिस की नौकरी ज्वाइन की थी.उसकी कर्कश और कड़क आवाज़ का मै डरा पती इसके मूँह से बाँसुरी जैसी आवाज़ सुन मैं रोज से ज्यादा डर व सहम गया.क्योंकि इसके प्यार से बोलने की इतिश्री अभी कुछ ही दिनों पहले मै इसके थाने पे देख के आया था जब इसने एक मुजरिम को प्यार से बोलने के बाद बड़ी ही बेरहमी के साथ पीटा था.

आज वैसी ही कुछ हालत मेरी भी हो रही थी,हलक सुख रहा था,मैं अंदर ही अंदर अपने बढ़ते-घटते ब्लड-प्रेशर का ठीक से अंदाजा नही लगा पा रहा था.लेकिन बच गया उस बचने के सुख को मै व्यक्त नही कर सकता.वे मुझे बहुत ही प्यार और दुलार के साथ छत पे ले गई और बोली इतनी दुर-दुर क्यूँँ खड़े है,पास और पास आईये,हँसिये,मुस्कुराईये. मै आज आपकी लंबी उम्र के लिये व्रत हूं,

वे बार-बार निकलते हुये चाँद को देख रही थी,जैसे ही चाँद पुरा निकला मेरी पुलिस वाली पत्नी ने बड़ी ही छुईमुई-कमसीन अदा से नई दुल्हन की तरह सर पे पल्लू रखा पूजा की थाली और चलनी मे दीप जलाकर कर मुझे सामने खड़ाकर "लगी हिडिम्बा राग में गाने" गाने के बाद उसने मेरा पैर छुआ.मैं इतना खुश हुआ कि, जैसे मुझ नाशपीटे के दिन बहुर गये.ये शब्द मै मन ही मन यूँँ हीं नही कह रहा.बल्कि इसके मूल मे कारण था, उसका इस सारी मोहब्बत के नकली घटना अर्थात करवा चौथ  का वे टीक-टाक जिसे वे तल्लीन भाव से मोबाइल पे अपलोड कर रही थी.और इस पुलिस वाली के पती के करवा चौथ का हस्र हमारे थोबड़े पे "नेपाल मे आये भूकंप की तरह बखुबी देखा जा सकता है".

यह लघुव्यंग्य मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.

लेखक---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758

लघुकथा---(भूख से मरे शायर का दिवान )

एक भूखा शायर जो अपने जैसे भूखे शख्स की रोटियों की मजार पे लिख गया----------

                (भूख से मरे शायर का दिवान )

जी हाँँ! हमारे शहर मे फूटपाथ किनारे दिनभर वे बीड़ियाँ बनाता और उन्हें सेंकता था, तैयार हो जाने पर जब वे कुछ बीड़ियाँ बेच लेता तो उन्हि चंद पैसे से कुछ सुखी रोटियां व प्याज से अपने दोजख को किसी तरह भर बगल से गुजर रहे सप्लाई के काई लगी टोटी से पानी पी कई सालो पुराना मैला-कुचैला फटा कंबल निकाल वही अपनी बिड़ी बनाने और बेचने वाली फूटपाथ की जगह सो अपनी रात गुजार दी.

वही बिड़ियाँ बनाने और बेचने वाला शायर जिस दिन बिड़ियाँ न बेच पाता उस रात वे एकाध बिड़ि सुलगा अपनी होठों से लगा इधर-उधर से बीने हुये सादे कागज़ पे अपने दर्द के नग्में लिख उसे उसी बिड़ी वाले बाकडे के एक सुरक्षित जगह रख देता.

ऐसे ही एक दिन भूख मे सोये हुये उस शायर की मौत हो गई, काफी दिन निकल आने पे भी न उठा तो उसे पुलिस वालो ने उठाने की कोशिश की तो वे मरा पड़ा था,डाक्टर के बुलवाने पे पता चला कि इसकी मौत भूख से हुई है। उस शायर की जब सारी छान-बीन पुलिस वालो ने की तो उसकी नज्मों के वे सारे कागज़ बरामद हुये.

उस समय जो शहर कोतवाल आया हुआ था वे भी शेरो-शायरी और नज्मों का काफी शौकीन था,उसने अपनी मदत से और कुछ स्थानीय सेठ-साहुकारों की मदत से जब उस भूख से मरे शायर का दिवान छपवाया तो उस दिवान ने बिकने के सारे रिकार्ड तोड़ दिये। आज वे जिस शहर की फूटपाथ पे भूख से मरा था उसी शायर के नाम लाखों-लाख के मुशायरे होते है। लेकिन वे भूखा शायर "कभी किसी जश्न या त्यौहार पे नही लिखता था, वे अपनी तरह औरो के दोजख की भूख व उनकी रोटियों की मजार पे लिखता था" ।

@@@रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर पिन.नं.--222002(उत्तर-प्रदेश)।
Mo.no.---7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

व्यंग्य--(घुरहू यादव की साइकिल का देहावसान )

(घुरहू यादव की साइकिल का देहावसान)

घुरहू यादव की मोटी मूँछ और साइकिल पुरे गाँव जवार ही नही बल्कि तहसील तक चर्चित है. वे इसे अपनी पत्नी के बाद सबसे ज्यादा प्यार करते है .क्योंकि ये साइकिल उनके जीवन की कोई साधारण या लोकल साइकिल नही,बल्कि उनके ब्याह के दिन खिचड़ी खाते समय उनके ससुर द्वारा दी गई सबसे अविस्मरणीय निशानी है.

उन्हे वे दिन अब भी बहुत अच्छे से याद है जब वे इस साइकिल पे बैठ घर पहुँचे थे तो--उसी दिन रेडियो अर्थात आकाशवाणी से ये समाचार सुनने को मिला था कि इस प्रदेश मे एक एैसी पार्टी का गठन हुआ है जिसका चुनाव निशान साइकिल है,तब से वे अपने साइकिल को अपने लिये शुभ मानने लगे.

यहीं एक कारण उनके आजीवन सपाई होने का रहा!उन्होनें अपनी साइकिल और सपा के चुनाव निशान साइकिल के तमाम उतार-चढ़ाव वाले दिन देखे,फिर भी कभी उनको अपनी साइकिल को लेके कोई ठेस या पिड़ा नही पहुँची.""वे मूँछो पे ताव दे कहते भी थे--कि हमारे प्रदेश मे जितनी मजबूत यादव जाति है,उतनी ही मजबूत उनकी लट्ठ और प्रधान साधन उनकी साइकिल भी है।""
फिर घुरहू यादव की नई पिढ़ियो ने तमाम साधन लिये संपंन्नता आई उन्हे खड़ी करने के लिये गैराज बने,लेकिन उनका अब भी अपनी चारपाई के बगल मे साइकिल उसी तरह खड़ी करने कि वे आदत नही गई,उनकी इस बीमारी से पत्नी कई मर्तबा चिढ़ी,लेकिन वे अपनी पत्नी और साइकिल को मनाने मे काफी सिद्धहस्त रहे.

सच तो ये है कि अगर इस लेख मे मै लिख दु""कि साइकिल पे इतना इतराने बलखाने वाला शख्स न मैने लखनऊ और नही कभी समाजवादी पार्टी मे किसी नेता को देखा----मुझे गर्व है घुरहू यादव के चरित्र पे जिन्होने कभी अपनी मूँछ और अपने साइकिल प्रेम से बेवफ़ाई नही की"".

जबकि सियासत के कुछ तथाकथित साइकिल सवारों ने इस साइकिल की इज़्ज़त मान-मर्यादा का इतना अपमान किया कि अगर ये साइकिल कोई औरत होती तो एक गैलन पेट्रोल छिड़क खुद को आग लगा लेती.

आज मै घुरहू यादव के घर की तरफ ज्यो निकला तो मेरी नजर उनसे मिली मुझे वे इतने दु:खी दिखे कि मै उनसे बीना बोले खुद को रोक न सका क्योंकि मैने इस कांति पुरुष को इतना कभी हताश और दु:खी नही देखा,""पहली बार सपा के नेताओ की तरह उनके मूँछो के बाल आपस में उलझे और झगड़ते से दिखे।""
आज घुरहू यादव की वे लपलपाती मूँछ,वे मुस्कुराती आँख बड़ी मलिन रुख अख्त़ियार किये थी,उनके बगल मे खड़ी साइकिल भी उनके ब्याह के बाद से ये शायद ये पहली बार है जब उन्होनें पाँच-छ: दिन से उसे छुवा,सहलाया और अपना वे प्यार नही दिया जिसकी अभ्यस्त ये साइकिल हो चुकी है.

मेरे बोलते ही जैसे उनकी उस पिड़ा का बांध टूट गया,गला भरभरा आया""इतना दर्द शायद सपा के मुखिया मुलायम सिंह यादव के चेहरे पे भी पिछले दिनो से नही देखी जितना दर्द और पिड़ा उनके उस चेहरे से छलक रहा था"".

वे बोले बेटा-----""जो साइकिल आजीवन मेरे लिये शुभ रही आज उस साइकिल को,कुछ अशुभ लोगो ने मिलकर मार डाला,वे स्वार्थी लोग भुल गये सुख-सुविधा ने उनकी आँखो पे पर्दा डाल दिया है!बेटे ये केवल----साइकिल की रार भर नही बल्कि एक युद्ध है जिसमे लहुलूहान उन तमाम साइकिलो की लाशे पड़ी है जिसने इस प्रदेश मे तमाम नौनिहालो ने एक युग का उत्थान देखा है""
बेटे इस रार से प्रदेश मे ना जाने कितने घुरहू यादव और उनकी साइकिलो का देहावसान हुआ है!कल फिर समाजवादी पार्टी खड़ी हो सकती है,प्रदेश मे सरकार बना सकती है,लेकिन उन तमाम घुरहू यादवो के साइकिलो की आत्मा इन पितृ हंताओ को कभी भी माफ़ नही करेगी.

यह व्यंग्य लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.


@@@लेखक----रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियांंपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
mo.no.-----7800824758

व्यंग्य---(ऐतिहासिक उल्लूनामा)



 व्यंग्य--(ऐतिहासिक उल्लुनामा)

हमारे देश मे इधर कुछ वर्षो से शायद ही कोई  ऐसा महिना बीता हो--"जब कोई ना कोई एक बड़ा उल्लु ,किसी ना किसी क्षेत्र का बरामद न हुआ हो". लेकिन इन उल्लुओं के साथ मेरे हिसाब से वे न्याय अभी तलक नही हो पाया जोकि इनके साथ होना चाहिये था,जिसके वास्तविक हकदार ये उल्लु थे.आइये हम-आप और हमारे देश की सरकार दोनो मिलकर "इन तथाकथित  श्रेष्ठ उल्लुओं के साथ न्याय करे अर्थात इन्हें भी वे सारी सुख-सुविधाएं मुहैया कराई जाये जो पूर्व में राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त व्यक्तियों को कराई जाती है".

अतः इन बरामद और रंगेहाथ पकड़े गये उल्लुओं को हम दिवाली के शुभ-अवसर पर "राष्ट्रीय उल्लु" के खिताब से सुशोभित करे पुरस्कृत करे.इन उल्लुओं मे से अगर श्रेष्ठ उल्लु का चयन करने मे कोई दिक्कत हो,तो पुरे देश मे मौजुद उल्लुओं से इनके चयन की वोटिंग करवा ले, क्योंकि--"मेरे अंदेशात्मक जनगणना के अनुसार, हमारे पुरे देश में उल्लुओं की संख्या कई करोड़ होगी" जोकि विश्व के किसी छोटे-मोटे देश की जनसंख्या से भी ज्यादा होगी.i

हम इन "राष्ट्रीय उल्लुओं" का चयन विभिन्न क्षेत्रो से भी कर सकते है.ऐसे ही एक चर्चित और ख्वातिलव्ध क्षेत्र बाबागिरी या स्वामीगीरी का भी है. "लक्ष्मी इन उल्लुओं पे अतिशय मेहरबान भी है अर्थात इनके आश्रम मे सावन की तरह बरस रही है".बाबाओ में से किसी एक को "राष्ट्रीय उल्लु" चुनना बड़ा कठीन है,क्योंकि इन बाबाओं मे से "कोई उन्नीस उल्लु नही है,सभी बीस उल्लु है".ये पुरस्कार मेरे हिसाब से आशाराम बापू,नित्यानंद स्वामी और राम-रहीम को सामुहिक देनी होगी. क्योंकि इन्होंने ही बाबाओं मे पाये जाने वाले श्रेष्ठ उल्लुओं का सर्वाधिक संम्मान बढ़ाया.

उल्लुओं का जिक्र हो और राजनीति के उल्लु छुट जाये या रह जाये,ऐसा हो ही नही सकता,क्योंकि--"उल्लुओं की सबसे अच्छी नस्ल नेताओं मे ही सर्वाधिक पाई जाती है" यहां उल्लु केवल मिलते ही नही बल्कि ये बीच-बीच में अपना उल्लु भी साधते रहते है. हर पार्टी में ऐसे उत्कृष्ट उल्लु है,सच पुछिये तो-"उस पार्टी की जो भी राजनीतिक उपलब्धि या हासिल है वे इन्ही उल्लुओं से है".वैसे हिन्दी मे एक जनप्रिय और व्याकरण संम्मत कहावत है कि-"किसी व्यक्ति को बीना A सर्टिफिकेट के गाली देनी है तो उस व्यक्ति को नेता कह दिजिये".

दिवाली से पहले ही इन्हीं मे से किसी श्रेष्ठ उल्लु को ये राष्ट्रीय पुरस्कार दे करके मोदी सरकार को ये उपलब्धि भी अपने नाम दर्ज कर लेनी चाहिये.अगर समय रहते ही इस राष्ट्रीय पुरस्कार की घोषणा हो जाये तो ठीक है नही तो किसी वर्ष इन्हीं उल्लुओं मे से कोई एक "अरविंद केजरीवाल टाइप का उल्लु,समस्त उल्लुओं के हक के लिये संघर्ष का बिगुल फुक अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ जायेगा".फिर वही होगा कि एकदिन देश के कई राज्यो मे उल्लुओं की सरकार बन जायेगी.

अतः ये मेरे द्वारा लिखा गया महज एक लेख भर नही अपितु, दिवाली से पहले उल्लुओं के हित और हक पे लिखा एक "ऐतिहासिक उल्लुनामा" है.


यह लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.

लेखक--रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P )
Mo.no.7800824758

व्यंग्य--(महंगाई दो प्याजा )


व्यंग्य--(महंगाई दो प्याजा)

आखिर प्याज की इस लगातार बढ़ रही महंगाई ने मुझे प्याज पे व्यंग्य- 'महंगाई दो प्याजा' लिखने को बाध्य ही कर दिया. सच तो यह है कि, अभी तलक बरसात में नदियाँ ही खतरे के निशान से ऊपर बह रही थी, लेकिन इस समय - 'प्याज की महंगाई भी अपने खतरे के निशान से भी ऊपर है.' पत्नी का शेयर बाजार की तरह गिरे हुए मुँह को देखकर तरस आ रहा, पर क्या करूँ? मैं भी अपने जेब की संवैधानिक व्यवस्था से मजबूर हूँ. 'आज किचन की ये श्रृंगारिक हालत है कि वहा पिछले चार दिन से रखा प्याज नकचढ़ी साली की तरह टोकरी में ऐठ रही है.' 

प्याज ने मुझ व्यंग्य लेखक को भी कंफ्यूजा अवस्था में पहुंचा दिया है.  समझ नहीं पा रहा कि मैं प्याज को स्त्रीलिंग लिखूँ या पुलिंग. कभी ये प्याज - 'पत्नी की तरह बे-कीमत थी, आज प्रेमिका के हाव-भाव से भी महंगी लग रही.'  प्याज के चलते इस समय सब्जी मंडी भी.वल्लाह गज़ब है. जो ठेले वाला अपने ठेले पे केवल और केवल प्याज बेच रहा उसका मिजाज जैसे कि-- 'किसी थाने के कोतवाल सा है.'  ग्राहक प्याज का भाव भी पुछने के लिए गर ठेले  से प्याज उठा रहा तो डरते-डरते.  ये डर -- 'ठेले पर प्याज बेच रहे थानेदार रूपी दुकानदार से है.' कि कहीं वे चोर-उचक्के की तरह डाट न दे. 

पहले जो सब्जी मैं 20मिनट में खरीद कर खाली हो जाता था अब वही सब्जी खरीदने में मुझे घंटों लग जाते है. ये सारी महिमा प्याज के बढ़े हुऐ भाव या महंगाई के वजह से है.  सब्जी खरीदने की ये ओलंपिक शुरुआत सब्जी मंडी के पहले ठेले से शुरू हो कर आखिरी ठेले पर जाकर खत्म होती है. 

पहले सब्जी लेने जाता था तो, पत्नी यूँ ही झोले को पकड़ा देती थी और साथ ही दो- एक कड़ी बातें भी फ्री मे कह देती थी. लेकिन इस प्याज के बढ़े हुए दाम या महंगाई ने उसका बॉडी
लैंग्वेज ही बदल दिया है.  वे तीन-चार दिन से झोले को बहुत प्यार से पकड़ा रही और मेरे सब्जी लेके लौटने का इंतजार भी अब ऐसे कर रही जैसे वे तब किया करती थी, जब उसकी और मेरी शादी हुई थी.  ये सब प्याज की वजह से हुआ है.  वे गेट पर खड़ी रहती है और बड़़े उत्साह के साथ झोले को पकड़ती है.  लेकिन जैसे ही मैं उसे प्याज न खरीदने की बात कहता हूँ, उसका सारा उत्साह काफूर हो जाता है. और उसके -- 'किचन की तरफ बढ़ते पांव मन- मन भर के हो जाते है.'

अब तो मुझे और व्यंग्य लेख दोनो को ही --'इस प्याज के बढ़े दाम का खतरे के निशान के नीचे आने का बड़ी बेसब्री से इंतज़ार है.' क्योंकि प्याज की महंगाई की वजह से अपनी पत्नी का लटका हुआ मुँह मुझे अब बहुत कष्ट दे रहा. काश! सरकार जल्दी प्याज के दाम या महंगाई को कंट्रोल करें.  जिससे मेरी पत्नी के खूबसूरत से मुँह का लालित्य वापस लौटे और हम भी इस 'महंगाई दो प्याजा' से बरी हो.

यह लेख मेरी स्व-लिखित व अप्रकाशित है.

लेखक- रंगनाथ द्विवेदी
जजकालोनी मियांंपुर
जौनपुर 222002(U.P.)
Mo.no.--7800824758

व्यंग्य--(अंतराष्ट्रीय पुरुष दिवस )

व्यंग्य--(अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस )

19 नवंबर केवल अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस ही नही बल्कि ये उसकी पत्नी के प्रेम के-"गुरुत्वाकर्षण की चुंबकीय चाहत का लालित्य दिवस भी है".बेशक ये अंतरराष्ट्रीय पर्व अभी महिला दिवस की तरह मनाये जाने से कई किलोमीटर दुर है. लेकिन मुझे विश्वास है कि एकदिन हमारे देश मे ये पर्व--"करवा चौथ की तरह वायरल होगा". जो तथाकथित पुरुष इस पर्व से वंचित व पुरानी इमारत की तरह धराशायी है. उनके भी इस--"अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस के अच्छे दिन आयेंगे" और वे भी इसके रसास्वादन का फीलगुड महसूस करेगे.

इस अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस के पर्व व त्योहार के हफ्तो पहले,पुरुषो के भी मेकप की बाजारे सजेगी वे भी अपने मुखमंडल पे मसाज की वे "रंगाई-पुताई करायेगा, कि पत्नियां बस देखती रह जायेगी". ऐसा नही कि वे जानबूझकर अपने--"मुखमंडल को गड्ढायुक्त सड़क की तरह किये रहता है". वे भी चाहता है कि उसे भी इस अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस के दिन थोड़ी राहत मिले और वे अपनी पत्नी की--"मोहब्बत के फोरलेन पे उसकी मुस्कुराहट का लांग ड्राइव टेस्ट करे या छायावाद के हिन्दी की रीमिक्स चाऊमीन का रसास्वादन  करे".मुझे पूर्ण विश्वास है कि एक दिन हमारे देश का हर पुरुष अपनी पत्नी के हाथो इस अंतर्राष्ट्रीय पुरूष दिवस को --"24 कैरेट के तनिष्क डायमंड के लव गिफ्ट की तरह इन्ज्वॉय करेगा".

हमारे देश में पतियों या पुरुषो को भी अपनी पत्नी के प्रेम का--"ये स्वादिष्ट व स्वास्थ्यवर्धक डाबर च्यवनप्राश मिलते रहना चाहिये".नही तो पतियो या पुरुषो का मुँह टीबी के उस विज्ञापन की तरह हो जायेगा जिसमे ये दिखाते है कि--"कुछ लेते क्यो नही?". जिन होनहार पुरुषो या पतियो को उनकी पत्नियां ऐसा करती है उनके पतियो के मन का लव टेस्ट--"हल्दीराम के ब्राडेड चटपटे आलू भुजिया की तरह है". जिन पतियो का दिल अपनी पत्नी के प्रेम से वंचित या सुखाग्रस्त है वे बेचारे देखने मात्र से ही-- "अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस नही बल्कि सरकारी अनुदान लगते है".

हम ऐसे प्रेम के लकवाग्रस्त पतियो या पुरुषो के साथ हो रहे--"उनके दिल के आतंकी नुकसान" की खातिर इस अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस के एक हफ्ते पहले अपने-अपने पतियो से इस दिन प्रेम करने वाली पत्नियों से एक ग्रुप बनवाकर,
अपने पति से इस अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस के दिन भी प्रेम ना करने की इस--"मेंटल लव इलनेस से ग्रस्त पत्नियों की काउंसलिंग करा कर अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस से पहले उन्हे प्रेम या प्यार की मुख्य धारा मे लाने का नैसर्गिक प्रयास करेंगे".

मै सौभाग्यशाली पतियो की श्रेणी का अद्वितीय पुरुष हू,क्योंकि मुझे प्रतिवर्ष इस अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस के दिन मेरी पत्नी बिल्कुल अपने करवा चौथ की तरह मुझे भी सजा व सवाकर--" अपने लग्जरी प्रेम का रोमांटिक इजहार करती है".ये उसी के मोहब्बत की देन है, जो मै आज की तारीख मे--"आउट डेटेड स्कूटर से सेल्फ स्टार्ट न्यू ब्रांड की बाइक हो गया हूं".

वरना व्याह से पहले ही मेरे सर के काफी बाल--"मल्टिडिस्टर्ब टाइप के सर की तरह मेरा साथ छोड़ चुके थे या रिजेक्ट कर चुके थे"  जिसके चलते मेरा मुखमंडल 2019 मे ही "तलत अजीज के गज़ल की तरह हो गया था".लेकिन मेरी जिंदगी मे पत्नी जैसी महिला के आते ही मेरे अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस को चार चाँद लग गये मेरा कायाकल्प हो गया सच मेरी पत्नी मेरे खुशियों की कैडबरी चाकलेट है.

यह व्यंग्य लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.

लेखक--रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियाँँपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758

Sunday, 12 April 2020

व्यंग्य---(1 अप्रैल और महेंद्र मिश्र को पद्मश्री )

व्यंग--( 1 अप्रैल और महेंद्र मिश्र को पद्मश्री)

 हम सभी लोकल और राष्ट्रीय मूर्ख इस 1 अप्रैल को अपने संगठन के महान और धुरंधर मूर्ख महेंद्र मिश्र के लिए भी अन्य विधा के व्यक्तियों की तरह ही उनके पुरस्कार की घोषणा अर्थात "मूर्खों के प्रथम पद्मश्री  से नवाजा जाए की मांग करते है".क्योंकि--"महेंद्र मिश्र ने मूर्खों के हित में वह कार्य किया है जो कार्य कभी देश की स्वतंत्रता के लिए महात्मा गांधी या नेहरू ने किया था". एक सफल मूर्ख होने की लालिमा उनके चेहरे पर स्पष्ट देखी जा सकती है. कभी-कभी किसी उपेक्षित जगह  लेकर फेंके गए पुराने अखबार की तरह लगते हैं. हां थोड़ा बहुत कुछ  नए मूर्ख जो अपनी मूर्खता की आंखों से अर्ध नग्न नायिकाओं की छपी फोटो या तस्वीर को तक लेते हैं, तो लगता है कि जैसे इनके मूर्ख होने की  तथाकथित सावन की शुरुआत हो गई है. जो भविष्य में इन्हें भी मूर्खता के इस महान यशस्वी मूर्ख पुरुष महेंद्र मिश्र में बदल देगी. 

मूर्ख होने के जितने भी एक्सीडेंट या दुर्घटनाएं है शायद ही कोई ऐसी महान  दुर्घटना बची हो, जो महेंद्र मिश्र के साथ न घटी हो. वे मूर्ख होने की हमारे देश की सबसे बेहतरीन जिंदा ग्रंथावली हैं--"उन्हें पढ़ना या उनसे बात करना किसी भी स्तरीय मूर्ख की राष्ट्रीय उपलब्धि है". वे हम मूर्खों के आराध्य हैं. शायद एक दिन यह अवश्य आएगा जब मूर्खों के लिए 1 अप्रैल से 30 अप्रैल तक सदन हम मूर्खों के लिए विशेष रूप से चलाया जाएगा. और उस सत्र को पूरी दुनिया महामूर्ख सत्र के तौर पर जानेगी, एक नजीर की तरह याद रखेगी. जिसमें हमारी जायज मांग को ध्वनिमत के साथ पूरे सदन को अंगीकार करना होगा. क्योंकि हम भली-भांति जानते हैं कि सदन में भी " 60% किसी न किसी मूर्खता की चपेट के मूर्ख सदन में भी हैं   " लेकिन वे हमारे  राष्ट्रीय अध्यक्ष महेंद्र मिश्र की तरह मूर्ख जैसे व्याकरण के शब्द का ऐलान नहीं कर सकते. 

 ऐसा नहीं कि हम मूर्खो  के राष्ट्रीय अध्यक्ष महेंद्र मिश्र जी के लिए पद्मश्री की मांग कोई गलत या खैरात है और ना ही उनकी मूर्खता पर की गई कोई दया है. इस महान देश में हर तरह हर जाति की लोगों को आरक्षण है, तो फिर मूर्खो को यह आरक्षण देने में हर्ज क्या है. जबकि इस बार की जनगणना अगर स्पेशल तौर पर मूर्खों पे कराई जाए तो मूर्खों के राष्ट्रीय अध्यक्ष महेंद्र मिश्र के कथन के अनुसार " यह संख्या पूरे देश में सात करोड़ या उसके ज्यादा के आसपास होगी. "

 इस 1 अप्रैल को मूर्ख दिवस कहने वालों को शायद यह पता नहीं कि -- " 1 अप्रैल महज मूर्ख दिवस ही नहीं बल्कि वे  हम जैसे मूर्खों का 15 अगस्त है. " आइए इसे हम आप सभी मूर्ख अपनी जायज मांगों के साथ सरकार तलक पहुंचाएं. अर्थात इस 1 अप्रैल को हम सभी ग्रामीण,  स्थानीय,  जिला स्तरीय,  राज्य स्तरीय,  राष्ट्रीय मूर्खों के हित के लिए एक जन लोकपाल बिल की मांग इस सरकार से करे या उसे पारित कराने की मांग के साथ अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष महेंद्र मिश्र के लिए प्रथम मूर्खों के पद्मश्री की मांग करें. 


यह व्यंग मेरा स्व-लिखित व अप्रकाशित है. 
दिनांक--9/3/2020

लेखक--रंगनाथ द्विवेदी 
जज कालोनी, मियांपुर 
जिला-जौनपुर pin.no.222002 (U P)
Mo.no.7800824758

Friday, 10 April 2020

कहानी---(पहाड़ी लड़की )

कहानी---(पहाड़ी लड़की )

 जब भी मुझे उस पहाड़ी लड़की की याद आती है, मैं--"तमाम उन ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों की वादियों में खो जाता हूं". मुझे याद आने लगते है वे देवदार और सायबान के ढेर सारे दरख़्तों पर बोलते हुए परिंदों के जोड़े और शाम के धुंधलके में कल फिर इन शाखों पर आकर बैठने और अपनी महबूब परिंदे के साथ गुफ्तगू करने के वादे के साथ अपने-अपने घरोंदे की तरफ लौटना कितना संगीतमय था.ऐसी ही-- "हमारी महबूब पहाड़ी लड़की थी. जिसे मैं अब रफ्ता रफ्ता मोहब्बत करने लगा था". 

 वे भी पहाड़ों के सारे काम निपटा जब अपनी सहेलियों के साथ लौटीती तो उसका अपनी सहेलियों के साथ हंसना बोलना वे पहाड़ों का सबसे खूबसूरत संगीत सा पायलों का छनकना और लौटती भेड़ो के गले की घंटियां का बजना मेरी किसी कविता या ग़ज़ल की अब तलक लिखी सबसे बेहतरीन किताब सी वे एक एक शब्द मेरी दिल की धड़कनों के साथ कब धड़कने लगी इसका पता मुझे भी नहीं चला. और जब चला तो मैंने उस पहाड़ी लड़की से अपने दिल की  बात कहने में जरा भी देर नहीं की. 

 वह मेरा उस पहाड़ी लड़की को देखना जैसे  इस कायनात का सबसे बेहतरीन लम्हा हो, -- "उस पहाड़ी लड़की के शर्म में भी एक जादू था. वे किसी शहर की फूल नही बल्कि उस दुनिया से अलग एक मासूम बनफूल थी".मै उससे जब भी बात करने की कोशिश करता तो वे अपने    अंगूठे से मिट्टी  खुरचने लगती थी.  कहते हैं कि--"पहाड़ी लड़कियां अपने प्यार का इजहार ऐसे ही करती हैं" यानी मेरी ये पहाड़ी लड़की भी अपने अंदर के इस प्यार को अपने होठों से  नहीं बल्कि अपने अंगूठे से व्यक्त कर रही थी. 

 बस प्रति दिन वे आती और धीरे से दूध वाले कटोरे को मुझे थमा तब तलक वे दरवाजे पर खड़ी रहती जब तलक कि मैं उसे उसका कटोरा लौटा नहीं देता था, कटोरे को लेकर चली जाती लेकिन उसका जाना मेरा इसके अगले दिन फिर इसी समय आने के इंतजार में लगा रहता. फिर एक दिन मैं उस पहाड़ी लड़की के घर उसके बापू और मां से उसका अपने लिए हाथ मांगने गया, तो उन्होंने कहा कि बेटे--"यह पहाड़ियां तमाम परदेसी और पहाड़ी लड़कियों की मोहब्बत के अनगिनत  दास्तानो से भरी पड़ी है हम बहुत मासूम होते हैं बाबू हम दुनिया के धोखे नहीं जानते". अगर तुम्हें और बिटिया को कोई एतराज नहीं तो हमें क्या हम तैयार हैं. 

 पहाड़ी लड़की से विवाह करने की खुशी में जब मैं घर गया और मेरी नींद खुली तो मैं उठ बैठा तो देखा बगल में खड़े घर के सभी लोग कह रहे थे कि बेटे आराम से उठो ना जाने क्यों इतना सुन मेरा सर काफी भारी भारी लगने लगा. लेकिन जैसे ही थोड़ा आराम हुआ तो पता चला कि मैं दो वर्ष 4 महीने बाद उठ रहा हूं मेरा एक्सीडेंट हो गया था इतना सुनते ही मेरी पूरी दुनिया घूमती लगी. 

 और मैं फिर सामान्य होते ही फिर चल पड़ा--  "अपनी उस पहाड़ी लड़की से मिलने जिसे मैंने टूट कर और डूब कर चाहा था". मुझे रास्ते भर वही सायबान देवदार और उन पर बैठे परिंदों के जोड़े याद आते जा रहे थे. लेकिन जब मै पहाड़ो पे पहुंचा तो जैसे मेरे आने की आहट पे वे परिंदो के जोड़े जैसे चुप व खामोश हो गए हो. आज मुझे यह पहाड़ काफी सुना-सुना  लग रहा था. मैं इसी उधेड़बुन में जब पहाड़ी लड़की के घर पहुंचा तो पता चला कि मेरी वे पहाड़ी लड़की मेरा इंतज़ार दिन-दिन रात-रात भर इन पहाड़ों पर पागलों की तरह करती रहती थी  तुम्हारे ना आने पे वे रोती थी और अचानक एक दिन वे आवाज आनी भी बंद हो गई. 

 पहाड़ों के लोगों से पता चला कि मेरा नाम लेते लेते एक दिन वे पहाड़ी लड़की अचानक एक खाई में गिरी और हमेशा के लिए शांत हो गई. लेकिन नहीं वे पहाड़ी लड़की मेरी सांसो और धड़कनों में जिंदा है जिसे दुनिया या साहित्य जगत के लोग मेरी सबसे मशहूर किताब कह कर पुरस्कृत कर रहे हैं लेकिन वे नहीं जानते हैं कि जिस किताब का नाम हमने--"पहाड़ी लड़की" रखा है वह लड़की कोई और नहीं बल्कि यह वही पहाड़ी लड़की है. 


यह कहानी मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है. 

लेखक---रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin. no. 222002 (U P )
Mo. no. 7800824758

कविता---(याद तुम्हारी नही गई )

(याद तुम्हारी नही गई)
अभी तलक याद तुम्हारी नही गई,
वे पिंक से सूट मे तुम्हे देखना,
जैसे अभी कल की बात हो,
तुम गई तो बेशक---------
पर मेरी जेहन में ज्यो की त्यो तुम आज भी हो,
तुम्हारी कसम मौसम बदले,साल बदला
लेकिन तुम्हें चाहते रहने कि--------
मेरी खुमारी नही गई,
अभी तलक याद तुम्हारी नही गई।
वे पतझड़ की हवा,
और उनकी शाखो से गिरते पत्ते,
और तुम्हारे कालेज से छुटने का वे वक़्त,
जब तुम्हारे खुले बाल,
हवाओ से इधर-उधर बिखर जाते थे,
फिर उन्हे तुम अपनी नाज़ुक अँगुलियो से,
जब पिछे की तरफ करती थी,
वे मेरा तुम्हे देखने का खूबसूरत लम्हा था,
मै आज भी उसी लम्हें से मोहब्बत करता हूँ,
सच तो ये है कि----------
बिना तुम्हारी याद के हमसे,
कोई दिन या रात गुजारी नही गई!
अभी तलक याद तुम्हारी नही गई।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758


Thursday, 9 April 2020

व्यंग्य---(कोरोना वायरस और सेनिटाइज पति )

व्यंग्य----(कोरोना वायरस और सेनिटाइज पति )

 मैंने सबसे पहले जिस--"शादीशुदा व्यक्ति या पति में पत्नी रूपी कोरोना वायरस का लक्षण देखा था वह महान व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि मेरे आदरणीय ससुर जी थे". यह  कोरोना वायरस मेरी सास अपने मायके से लेकर आई थी, अर्थात यह कोरोना वायरस हमारे ससुराल में खानदानी थी जो की हमारी पत्नी में अपने मां से आई थी. एक तरह से हम यह कह सकते हैं कि--"जो भी लड़का इस खानदान की लड़की से विवाह करेगा वह निश्चित है  कि अपनी पत्नी की  मोहब्बत का कोरोना पॉजिटिव पेशेंट हो जाएगा". उसे फिर किसी डॉक्टर से जांच कराने की भी आवश्यकता नहीं पड़ेगी. यह पत्नियां अपने-- "कोरोना पॉजिटिव पति को पहले स्टेज से ही आगे नहीं बढ़ने देती". 

 जब से हमारी शादी उन दोनों महान विभूतियों की बेटी से हुई है तब से मैं भी इस मोहब्बत की कोरोना वायरस का पॉजिटिव पति हूं.यह-- "संक्रमित बीमारी केवल पत्नी के रूप में में ही घरों में पाई जाती है". इसमें किसी भी पति की असामयिक मृत्यु नहीं होती बल्कि वे अपना पूरा जीवन जीता है. यह कोरोना वायरस की चपेट में अपने-अपने पतियों को लेने वाली पत्नियां--"किचन में कुछ इस तरह अपने पति को  लाक डाउन करती है कि वे अपनी पत्नी को तरह-तरह के नाश्ता और भोजन बना कर देता रहता है". पत्नी अपने पति को किसी तरह का मास्क नहीं लगाने देती नहीं 1 मीटर से ज्यादा दूर अपने पति को रहने देती हैं. हां केवल पत्नी अपने मेकअप के मास्क को अवश्य अपने पति के द्वारा छूने नहीं देती--"यह पति को न छूने देना, उनके रूप के कोरोना वायरस को एक पति के लिए और खतरनाक बनाता है". 

 अपने पत्नी की मोहब्बत के संक्रमित ये कोरोना पॉजिटिव पति उनकी सेवा करते रहें इसके लिए कभी कभी यह--"दूसरी औरतों को ना देखें इसके लिए इनपे ये अक्सर कर्फ्यू लगा देती हैं". इस कर्फ्यू में थोड़ी बहुत ढील देने के लिए अर्थात अपने कोरोना पॉजिटिव पति के दिल और दिमाग में विद्रोह ना पनपे इसके लिए यह पत्नियां--"अपने रूप और सौंदर्य से बीच-बीच में अपने पति को सेनीटाइज करती रहती हैं".कुछ इसी प्रकार से मैं भी अपनी पत्नी के द्वारा सेनीटाइज किया जाता हूं, इसके अलावा मुझ जैसे कोरोना पॉजिटिव पति के पास कोई इलाज नही. 

 
 यह व्यंंग्य मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है. 

लेखक--रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin. no. 222002 (U P )
Mo. no. 7800824758

Wednesday, 8 April 2020

कहानी---(तांत्रिक दिनेश और कोरोना )

कहानी---(तांत्रिक दिनेश और कोरोना )

 तांत्रिक दिनेश के पास दो उसके समकक्ष तांत्रिक चेले थे खुर्शीद और संजय यह कभी-कभी अपने तांत्रिक गुरु की भी खाट खड़ी कर देते थे. और इस समय तो कोरोना वायरस जैसी महामारी के चलते इनके--"तांत्रिक खेत की उर्वरता अपने चरम पर थी". तांत्रिक दिनेश के दोनो चेलो ने इस वायरस की तांत्रिक शुरुआत से पहले की रखी हुई पुरानी इंसानी खोपड़ी व  हाथ की पुरानी हड्डी को फेंक कर कब्रिस्तान से एक मजबूत व नई हड्डी को लाकर धुला-पोछा और तांत्रिक क्रिया के अनुकूल उसका मेकअप कर दिया. 

 फिर उस गांव की ही एक महिला जो की अक्सर कमीशन पर तांत्रिक दिनेश के संपर्क में रहती थी. वे औरतों को झाड़-फूंक के लिए बहलाने और फूशलाने की जादूगर थी. तांत्रिक दिनेश के दोनों चेलो ने उस महिला से मिलकर तांत्रिक दिनेश की पूरी योजना समझाई व कहा कि वे शाम तलक 10 -12 महिलाओं की व्यवस्था कर उन्हें तांत्रिक दिनेश से मिलवाए और यह बताएं कि वह बहुत पहुंचे हुए तांत्रिक हैं जिन्होंने बड़े-बड़े भूत प्रेत बाधा को न केवल दूर किया, बल्कि उन्होंने उस घर और गांव से उस प्रेत बाधा को हमेशा के लिए खत्म कर दिया. तांत्रिक दिनेश बंगाल, आसाम की तंत्र साधना जानने के अलावा लाल किताब के भी बड़े पहुंचे जानकार है.

वह एक हफ्ते तक ही गांव में रुकेंगे, फिर इसके बाद एक अनजानी अंधेरी गुफा में  कोरोना के शैतान को मंत्र से बांधने के लिए चले जाएंगे. रात को 9:00 बजे 12 का क्या वे 20 महिलाओं के साथ तांत्रिक दिनेश के आश्रम में आई, उस आश्रम में प्रवेश करते ही जैसे सभी महिलाओं की बुद्धि 50% तांत्रिक दिनेश के वश में हो गई हो. इसका कारण था,  वे अंदर का धुआँ जो कि महिलाएं कह रही थी कि जादू था. तांत्रिक दिनेश भी अपने तंत्र के उस ड्रेस में था, जोकि अक्सर सुपर हिट भुतहे फिल्म के तांत्रिकों की होती हैं. 

 इतना ही नहीं वे अस्त्र-शस्त्र भी तंत्र साधना के  वहीं मौजूद थे. जैसे आज तांत्रिक दिनेश इस कोरोना वायरस की ऐसी-तैसी कर देगा सिंदूर से खींची लाल सुर्ख आड़ी तिरछी रेखा बड़ी ही डरावनी लग रही थी. उसमें से ऐसी चमक निकल रही थी, मानो वहां कोई रोशनी की गई हो. हड्डी से चारों तरफ सिंदूर के घुमाना चीखना खोपड़ी को स्पर्श करना, तीन नींबू, एक कागज में रखें लौंग, कपूर अगरबत्ती यह कोरोना वायरस को तंत्र-मंत्र और इस देश से भगाने की उठापटक का एक अद्भुत दृश्य था. 

 तभी उसकी पेटेंट महिला अपने फिक्स तांत्रिक व नाटकीय तरीके से बाल खोले गाली देती सिंदूर वाली घेरे के पास पहुंची और जोर-जोर से अजीब अजीब आवाजें निकालने लगी,  सारी औरतें एकटक अवाक व डरी सी उसको देखने लगीं. तभी वे  उठी और तांत्रिक दिनेश से उलझ गई. तांत्रिक जैसे हवा में कोरोना वायरस रूपी शैतान व उसकी आस -पास के चुड़ैलों को कहने लगा कि, -" जा मेरे मंत्र तंत्र को चैलेंज मत कर, नहीं तो,  तुम्हें नष्ट कर दूंगा. मैं नहीं जाऊंगी, पूरे गांव को निकल जाऊंगी " इतना कहते ही तांत्रिक दिनेश ने पास में रखी राखी उस पर फेंकी वह हाथ के शमशान वाली हड्डी से उसे पीटा, वह गुर्राते  हुए बेहोश हो गई.

 उसके बेहोश होते ही तांत्रिक दिनेश ने अपने तांत्रिक चेलों से चाकू मांगा फिर उस चाकू से तीनों नींबू में से एक नींबू को काटा तो लाल खून बहने लगा उसने इस औरत के अंदर मौजूद कोरोना के शैतान व उसके साथ की चुड़ैल को काटा हो उस उस खून को उस दिन उसने सिंदूर पर निचोड़ा , फिर दूसरे नींबू को उस औरत के ऊपर काटकर के निचोड़ा तो वे औरत अचानक सकपका कर उठी जैसे ही उठी तो उसने कहा,  मैं कहां हूं? मुझे क्या हुआ? उसके इतना पूछते ही तांत्रिक दिनेश ने झट तीसरा नींबू काटकर उस खोपड़ी पर निचोड़  दिया इतना करते ही वे खोपड़ी और भी खतरनाक और डरावनी दिखने लगी. 

 फिर उसके चेले पैसे ऐंठने और निकलवाने के अपने हुनर का प्रयोग करने लगे. उन सबको इस कोरोना वायरस की तांत्रिक झाड़-फूंक कराने के लिए प्रेरित किया. फिर सारी औरतें चली गई. क्योंकि तंत्र मत्र के धंधे की सबसे बड़ी ग्राहक व प्रचारक यह औरतें ही हैं फिर आधे घंटे बाद इनकी पेटेंट और फिक्स औरत अपना कमीशन लेने दिनेश के आश्रम पर आई. 

 अब तक इस गांव से कोरोना वायरस के शैतान को तंत्र मत्र से भगाने के नाम पर तांत्रिक दिनेश ने अपने दोनों तांत्रिक चेलों के व इस फिक्स  महिला के मिलीभगत से ₹80000 आ चुके हैं क्योंकि दिनेश भी अब कोई साधारण तांत्रिक नहीं है. बल्कि अपनी कमाई का कोरोना तांत्रिक हो गया है. 


यह कहानी मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है. 

लेखक---रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin. no. 222002 (U P)
Mo. no. 7800824758

Monday, 6 April 2020

कहानी---( आर्केस्ट्रा)

कहानी----(आर्केस्ट्रा )

 मैं भी अन्य बारातियों की तरह अपने गांव की एक शादी में गया था, नाश्ते व भोजन के बाद पता चला की बारात में शहर की सबसे मशहूर आर्केस्ट्रा पार्टी का इंतजाम भी बारातियों के मनोरंजन के लिए है. क्योंकि मैं उत्तर प्रदेश से हूं वहां आर्केस्ट्रा का अपना ही क्रेज है कभी-कभी तो आर्केस्ट्रा डांस के दौरान मारपीट हो जाना,  गोली चल जाना आम बात है और भोजपुरी गाने के साथ आर्केस्ट्रा के महिला डांसरों का अपने अंग विशेष को दिखाकर  किया डांस मानो आग में घी का काम करता है. 

 हालांकि उस बारात में ऐसा कोई वाकया ना घटित हुआ जिसमें कि मैं बारात गया था. हां उनमें एक ऐसी डांसर अवश्य थी जिसके डांस पे सारे बाराती अपने पुरुषोंचित तरंग में आ गए थे!  यहां पुरुषोंचित तरंग से मतलब वे अश्लील फब्तियां व कमेंट है जो कि अक्सर इस तरह के डांस में एक सामान्य सी बात है. कुछ लोग नोटों को चूम चूम कर ऐसे उड़ा रहे थे मानो नोटों की कोई फैक्ट्री इन्हीं के घर है. हालांकि मैं भी इस डांस से आनंदित व आह्लादित था. जैसे ही वे परदे के उस तरफ गई और उसकी जगह कोई और महिला डांसर स्टेज पर आई तो मेरा मन जैसे उस डांस से उचट गया. 

 मैं जैसे ही उठकर बारात से घर जाने के लिए आगे बढ़ा तो मेरे कदम बरबस पर्दे के उस तरफ एक नजर उस महिला डांसर को देख लेने की जाने क्यों बलवती हुई और मैं धीरे से उस परदे को खींच के ज्योंहि, अंदर देखा आवाक रह गया जो महिला अभी तलक स्टेज पर तमाम तरह की फरमाइशी गानो पर जानलेवा व अश्लील डांस कर रही थी वही औरत दौड़ती हुई अपने मासूम बच्चे को गोद में लेकर जैसे ही उसे अपना स्तनपान कराने लगी वे बच्चा चुप हो गया.  मैं खुद को उस समय इस आत्मग्लानि से ना रोक पाया. 

 अब मैं समझ पाया कि आखिर क्यों भूख अक्सर अपने पांव में घुंघरू बांध लेती है, एक मां क्यों अपने बीमार वह भूखे बच्चे की दवा के लिए अंधेरी रात में अपने सीने पर किसी गैर मर्द की बलात्कार के तवे की रोटी अखबार में लपेट कर लड़खड़ाते वा सूजी हुए होठों के साथ अपनी झोपड़ी में लौटती है आखिर क्यों एक मां अपने मासूम बच्चे को पर्दे के इस तरफ रोता छोड़कर किसी बारात में सारी रात आर्केस्ट्रा बे नाचती है. सच महज यह मेरे द्वारा देखी गई एक आर्केस्ट्रा नहीं बल्कि उसकी वह उसके बच्चे के भूख की रोटी है. 


यह कहानी मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है. 

लेखक---रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin. no. 222002 (U P)
Mo. no. 7800824758

कहानी--( कंक्रीट का शहर )

कहानी----( कंक्रीट का शहर)

कभी अंजली को गांव में देखी गई हिंदी फिल्मों ने महानगर की इन बड़ी-बड़ी इमारतो और उसकी चकाचौंध का इतना दीवाना बना दिया था कि--वे जिस गांव में पली बढ़ी थी वही गांव उसे पिछड़ा और बैकवर्ड दिखने लगा था. यही वे दीवानगी थी जिससे अंजली अंदर ही अंदर अपने गांव को पीछे छोड़ती जा रही थी. अंजली की खुशी का कोई पारावार ना था मानो उसके अरमानो को पँख मिल गये थे जब उसकी शादी महानगर के लडके से हुई और वे बिदा होकर महानगर आ गई. 

अंजली के कुछ दिन कैसे बीत गये ये उसे पता भी नही चला, लेकिन फिर रोटी की जरूरत, प्राइवेट जॉब को बचाये रखने की जरूरत इन्हें ऑफिस ले जाने लगी. इनके ऑफिस जाने के समय जब मुझे वक़्त मिलने लगा तब मै इन ऊंची ऊंची इमारतो भागती-दौड़ती जिंदगी को घंटो खिड़की खोलकर समझने व पढ़ने का प्रयास करने लगी. तो पाया कि ये बड़ी-बड़ी इमारते तो मेरे कल्पनाओं में रची-बसी फिल्मों की इमारते नही बल्कि ये तो कंक्रीट की इमारते है. जिसमें बस सांसे आती जाती है संवेदना नही और ये संवेदना धीरे-धीरे कब पति-पत्नी के रिश्ते को भी निगलती चली जाती है ऐसा मेरे साथ भी होना शुरू हो गया. 

ये थके-मादे जब फ्लैट में अपनी ड्यूटी से लौटते तो अंजली को यूँ लगता कि जैसे ये अपने पाँव रख नही रहे बल्कि घसीट रहे हो. फिर थकी-मादी ऊबन और एक निश्चित रूटीन की तरह उठे खाये-पिये फिर एक कंक्रीट की तरह संवेदनहिन कभी छुआ, कभी नही छुआ ये रिश्ते की भयावहता या महानगर की शुरुवात भर थी. यहाँ--"सांस से लेकर व्यक्ति का बदन तक कंक्रीट है और इस कंक्रीट में ढलना और जीना व्यक्ति की मजबूरी ". इन फ्लैटो की कंक्रीट में एक चीज जरूर चुभती है वे है सुखी न रह पाने की नागफनी. 

आज जब वे ऑफिस गये तो मै प्रतिदिन की तरह आज भी खिड़की को खोलकर कुछ सोचने बैठी तो बार-बार मेरी जेहन में वही गाँव उभर रहा था और मै बार-बार उस बैकवर्ड और पिछड़े गाँव को याद करके अंदर ही अंदर कराह उठ रही थी. जिस गाँव को मै पिछड़ा व बैकवर्ड कहकर उपहास उड़ाती थी या नाक- भौह सिकोड़ती थी वे मेरा गाँव इस कंक्रीट के जंगल या इमारतो से कही बेहतर था, जहाँ जिंदगी थी. सच में मै कितनी अभागी थी जो अपने गाँव की संवेदना का दिल दुखाकर इस कंक्रीट के शहर में आ गई. 


यह कहानी मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है. 

लेखक--रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला-जौनपुर pin. no. 222002 (U P)
Mo. no. 7800824758

Sunday, 5 April 2020

लघुकथा---(पगली )

लघुकथा----(पगली )

वे पगली जिसे मैंने कॉलोनी के कभी इस कचरे, कभी उस कचरे पे  नंगे व मैले-कुचैले बदन बैठकर, अपने गंदे बालो को खुजलाते देखा है.वे पगली मेरी इस लघुकथा की नायिका यूँही नही बन गई इसके मूल में पगली के साथ हुआ वे हादसा भी है जिसे देख मेरी इस कलम का कलेजा भी कांप गया और इस सभ्य समाज पे मुझे ऊबकाई आई सो अलग. 

जिस पगली को काम व सेक्स की कोई संवेदना या समझ नही. जिस पगली के पास से दिन में गुजरते समय लोग अपना मुँह व नाक उसकी गंदगी से ढक लेते थे. उसी नंगी और गंदी पगली को उस दिन जब बरबस मेरी नजर पड़ी तो मैंने पाया कि--उसके होंठ सुजे हुए थे उसके नंगे बदन के चारो तरफ नाख़ूनो के गहरे-गहरे निशान थे. उसके दोनो स्तन भी पुरी पाशविकता की गवाही दे रहे थे. 

ये कॉलोनी वही है, सभ्य लोग वही है जो दिन में इस पगली के बगल से गुजरते समय अपनी नाक व मुँह ढक लिया करते थे. लेकिन इन्हीं नाक मुँह ढकने वाले किसी शरीफ की शिकार ये पगली उसे पहचान भी नही सकती. 

इस हादसे के नौ महीने बाद उस पगली ने सरकारी अस्पताल में एक बच्चे को जन्म दिया, जिसे किसी पैसे वाले रहिस ने अस्पताल को पैसे ले-देकर अपना लिया. फिर दो दिन बाद अस्पताल वाले एक बार फिर इसी कॉलोनी में उस पगली को छोड़ गये. पगली फिर इस कचरे, उस कचरे आ जा रही. लेकिन मेरी लघुकथा कि ये पगली फिर नोंची-खसोटी जाएगी, बलात्कार होगा, फिर कॉलोनी के शरीफ चुप्पी साध जाएंगे यही पाशविकता इस शहर या कॉलोनी में टहल रही हर पगली की है.  

यह लघुकथा मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है. 


लेखक---रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin. no. 222002 (U P)
Mo. no. 7800824758

Saturday, 4 April 2020

व्यंग्य---(राहुल गाँधी यानि कांग्रेस के कोरोना वायरस )

व्यंग्य-----(राहुल गाँधी यानि कांग्रेस के कोरोना वायरस )

"राहुल गांधी को अब कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी का युवराज नहीं बल्कि उन्हें कांग्रेस का  कोरोना वायरस कहना चाहिए". जिस तरह चीन से पहले कोरोना वायरस को आज डब्ल्यूएचओ ने महामारी घोषित कर रखा है,  ठीक उसी प्रकार इस समय कांग्रेस के राहुल गांधी की स्थिति है. इनसे बचाव के लिए खुद कांग्रेस जैसी पार्टी के लोग डब्ल्यूएचओ की तरह लगे हैं, लेकिन राहुल गांधी से--"कांग्रेस जैसी कोरोना महामारी से बचने या बचाने का टीका उनके पार्टी के लोग ही नहीं ढूंढ पा रहे". 

 अब तो हालत यह है कि राहुल गांधी जिस भी राज्य में अपना कोरोना वायरस जैसी वाणी बोलते हैं वहां उनकी राजनैतिक समझ बूझ इतनी तीब्रता के साथ फैलती है, अगर उसे रिएक्टर पैमाने पर नापा जाए तो इस वायरस की रफ्तार अर्थात राहुल गांधी की रफ्तार 100% कोरोना वायरस से तेज व तीव्र पाई जाएगी ऐसा तथाकथित बौद्धिक लोगों का मानना है. 

 कुछ एक  राज्यों में कमलनाथ जैसे लोग इस कोरोना वायरस अर्थात राहुल गांधी जैसे लाइलाज, कोरोना वायरस से इतने ज्यादा राजनीतिक रूप से संक्रमित है कि उनकी सत्ता या  सरकार तलक कोरोना वायरस पीड़ित व्यक्ति की तरह मध्यप्रदेश में औंधे मुंह गिर जा रही . इस मामले में सबसे सौभाग्यशाली मध्य प्रदेश के ज्योतिरादित्य सिंधिया निकले,  जो समय रहते ना सिर्फ इस वायरस के संक्रमण से खुद को बचाया बल्कि तुरंत भाजपा की राजनैतिक इलाज के बचाव को अपना लिया यानी कांग्रेस की राजनीतिक महामारी अर्थात कोरोना वायरस से ज्योतिरादित्य सिंधिया बच गए. लेकिन अभी भी "इस कोरोना वायरस का कोई भी सटीक इलाज या टीका मुझे कांग्रेस में दूर की कौड़ी लग रहा". 

 जब से राहुल गांधी के नाम का कोरोना वायरस  कांग्रेस की मुख्य राजनीति में आया है,  तभी से धीरे धीरे कांग्रेस नष्ट होती जा रही. 
 सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाकर अपने पुत्र रूपी राहुल गांधी जैसे कोरोना वायरस से अपनी चालाकी के मास्क से कुछ समय के लिये  बचा तो लिया था,  लेकिन अंततः ऐसा वह कब तक कर पाती और कर भी नहीं पाई. अंततः कांग्रेस  जैसी राष्ट्रीय पार्टी में राहुल गांधी को अध्यक्ष बनाते ही इस पार्टी में लाइलाज कोरोना वायरस का प्रादुर्भाव हुआ. 

 और रफ्ता रफ्ता कांग्रेस में राहुल गांधी जैसे कोरोना वायरस ने विकराल रूप ले लिया. जिसका खामियाजा यह है कि, आज कांग्रेस में किसी कोरोना वायरस ग्रस्त नेता के साथ रहने या चुनाव लड़ने से बेहतर है कि वे नेता या व्यक्ति कांग्रेस के राहुल गांधी रूपी कोरोना वायरस से बचकर वे निर्दलीय चुनाव लड़कर अपना सटीक बचाव कर सकता है. 

 अतः कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी में आज राहुल गांधी जैसे कोरोना वायरस का होना पार्टी की महामारी का लक्षण है. किसी भी राज्य में आपको सबसे ज्यादा संक्रमित लोग अंन्यत्र  पार्टी में नही. बल्कि कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी में मिलेंगे. आइए अब भी गधे ने ज्यादा खेत नहीं खाया है. अतः समय रहते राहुल गांधी जैसे कोरोना वायरस से अगर पार्टी और पार्टी के लोगों को बचना है,  तो सबसे पहले उन्हें अब  इस उम्र में युवा कहना बंद करें, उनकी शादी किसी खूबसूरत विदेशी महिला से करा के 1 साल के लिए बिना किसी को बताए हमेशा की तरह गुपचुप तरीके से हनीमून पर भेज दें. जब इनकी चाहत का तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पार हो जाएगा, तो इनके अंदर व बाहर के कोरोना वायरस खुद ही नष्ट हो जायेगे और इस नाम की महामारी पे खुद पार्टी के लोग विजय पा लेंगे. 


यह व्यंग लेख मेरा स्व-लिखित व अप्रकाशित है. 
दिनांक-21/3/2020

लेखक--रंगनाथ द्विवेदी 
जज कालोनी, मियांपुर 
जिला-जौनपुर, pin. No. 222002 (U P)
मोबाइल नंबर-7800824758

व्यंग्य---(अप्रैल चालीसा )

व्यंग्य----(अप्रैल चालीसा )

 हमारे "अप्रैल चालीसा" के नेताजी कोई साधारण व्यक्ति नहीं बल्कि--हमारे व्यंग्य लेख "अप्रैल चालीसा" के असाधारण नायक है. मैं जबसे उन्हें बाइज्जत जानता व पहचानता हूं तब से उन्हें मैंने औरों को--"मूर्ख बनाकर उनकी खटिया को खड़ी करते हुए पाया है". उनके इस ऐतिहासिक अप्रैली चरित्र ने उन्हें बहुत कुछ दिया है. 

यहां तक कि उन्होंने सबसे पहले अपने होने वाले ससुर को ही--"अपने अप्रैल का पहला मूर्ख बनाया था और दूसरी मूर्ख उन्होंने, अपनी होने वाली पत्नी को बनाया था".बाकायदा नेता जैसी अपने बौद्धिक आश्वासन से अपने ससुर और पत्नी को मूर्ख बनाना नेताजी के जीवन की बड़ी उपलब्धि थी.

 शादी के शुरुआत में पत्नी यह नहीं समझ पाई की नेताजी को अप्रैल हमेशा से ही किसी जवान साली की तरह प्राप्त और सुख देती रही है. नेताजी वक़्त-बेवक़्त अपनी साली को भी मूर्ख बनाने से नहीं चूकते थे एक तरह से उनका कुर्सी और साली का संबंध अप्रैल के लिव इन रिलेशनशिप का था.  

 तीन बार विधानसभा और दो बार लोकसभा का चुनाव उन्होंने अप्रैल यानी तथाकथित मूर्खों के सीजन या महीने मैं जीता था. वे पूरे अप्रैल-- "उल्लू की फोटो के सामने घंटों खड़े होकर लोगों की मूर्खता फलती फूलती रहे इसके लिए वे अपने अलूल-जलूल मंत्रों का उच्चारण कर  जागरण करते थे". जिस दिन उनके इस जागरण का अर्थात अप्रैल के मूर्ख महीने की पूर्णाहति होती थी, उस दिन वह बकायदा  लोगों को भंडारे में प्रशाद वितरण करवाते थे.  
 

 नेताजी--"औरों को मूर्ख बनाने वाली मेरी सुनामी यादों के इकलौते पात्र हैं, मैंने आज तलक एक व्यक्ति में एक साथ इतने अलंकारिक परिवर्तन नहीं देखें". उनका मुंह मुझे देखने में अंग्रेजी शराब के कॉकटेल की तरह दीखता है,  जिसमें वे गरीबों के देसी तलाक मिलाकर गटक जाते है.

 अप्रैल को जो लोग मूर्खों का महीना या एक अप्रैल को जो लोग मूर्ख दिवस कहते हैं या मनाते है, उन्हें हमारे नेता जी की गुणवत्ता का पता नहीं कि--"वे हमारी व्यंग्य लेख 'अप्रैल चालीसा' के कितने विद्वान महानायक हैं". जिन्होंने इसको गलत साबित कर दिया है, उन्हें मैं भी कभी भाप ना पाता अगर मैं--"फेस रीडिंग का उन्हीं की प्रजाति का अप्रैली विद्वान ना होता". मैंने यह सोच लिया है कि मैं अपनी इस फेस रीडिंग की किताब का नाम "अप्रैल चालीसा" रखूंगा जिसका विमोचन मैं इन्हीं होनहार नेताजी से किसी ऐसे ही अप्रैल महीने में कराऊंगा. 

यह व्यंग्य लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है. 

लेखक--रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin. 222002 (U P)
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व्यंग्य---(मोहब्बत की उम्र 50 प्लस है )

व्यंग्य---(मोहब्बत की उम्र 50 प्लस है)

 जब से हमारे देश में--"डिजिटल और सुंदर महिलाओं की संख्या बुलेट ट्रेन की रफ्तार से बढ़ी है". तब से उन्हें 50 प्लस वाले नौजवान बड़े ही ध्यान से देख व तक रहे है. उनका मन इन सुंदर महिलाओ के मेकअप और पहनावे पे इतना लट्टू हो जा रहा कि ये खुद को इस नागिन डांस से बचा नही पा रहे यही कारण है कि  हमारे देश में  50 प्लस के नौजवानों की संख्या में भयंकर बृद्धि हो रही है. इन्होंने अपने हाव-भाव को इतना मेंटेन करना शुरू कर दिया है,  कि बेचारे युवा उनसे लगातार मोहब्बत के इस मैदान में में परास्त हो रहे हैं, "इन होनहार 50 प्लस के युवाओं ने बैद्यनाथ और डाबर के शिलाजीत अश्वगंधा को पछाड़ दिया है". अगर ऐसे ही युवाओं की हताशा बढ़ती रही, तो वे दिन दूर नहीं जब यह चोरी छिपे किसी-- "मेडिकल स्टोर से झंडू केसरी जीवन खरीदना शुरू कर देंगे".

 आप किसी भी जेंट्स पार्लर में चले जाइए तो यह 50 प्लस के नौजवान अक्सर आपको अपने चेहरे पर तमाम मसाज व फिजियोथेरेपी कराते हुए दिख जाएंगे. एक समय था जब--"50 प्लस के नौजवान लोगों को ज्यादातर लोग अंग्रेजी की एक्सपायरी डेट की फेंकी हुई दवा समझते थे". लेकिन नहीं! अब उन्होंने ना सिर्फ अपने युवा उमंगो का ब्रांड बदला बल्कि उसकी स्पायरी डेट अनिश्चितकाल के लिए टाल दी. अब ये तमाम वे हरकतें करते दिख जाएंगे--"जो पर्दे पर इमरान हाशमी का बाकायदा ट्रेडमार्क है". अब यह 'कहीं दीप जले, कहीं दिल' वाले गाने नहीं बल्कि बड़े चटकारे और चाव के साथ 'जलेबी बाई'और 'बीड़ी जिगर से जलाई ले पिया' सुनते हैं. 

 आजकल युवा लोगों  के चेहरे की तासीर इतनी धराशाई व क्षतिग्रस्त हो चुकी है,  कि अब इन्हें मोहब्बत के पर्व भी उतने आकर्षित नहीं करती,  जितने कि इन 50 प्लस वालों को. आजकल--"इन डिजिटल महिलाओं की सुंदरता ने इनकी बी.पी.और शुगर के साथ इनकी मोहब्बत का  प्लेटलेट भी मेंटेन किए हुए हैं और युवा का दिल तोड़ कर इन महिलाओं ने इन्हें मोहब्बत में हारे हुए डेंगू का पेशेंट बना दिया है". युवाओं के चेहरे पर कहीं कोई ताजगी या खिलापन नहीं है बल्कि किसी 50 प्लस के युवा के साथ गुलछर्रे उड़ाती हुई महिला को देखकर उस नौजवान पति के चेहरे सी हो गईं है जिसके 3 बच्चों की मां उसे छोड़कर एक रिटायर बूढ़े नौजवान के साथ घर छोड़कर भाग गई हो. अतः अब डिजिटल महिलाओं के पसंद नापसंद में भी परिवर्तन आ गया है. 

 यह डिजिटल महिलाएं कभी-कभी तो युवाओं और नौजवानों को ऐसे देखती व तकती व तकती हैं जैसे--"इलाज कराने में सक्षम महिला किसी झोलाछाप डॉक्टर को देखती व तकती है ". इनके लिए आजकल मोहब्बत उस मल्टीनेशनल अस्पताल की तरह है,  जिसका सर्वे सर्वा डॉक्टर उसका 50 प्लस का प्रेमी है. जो भरपूर परफ्यूम और रेमण्ड का सूट पहने अपनी प्रेमिका की कलाई को कुछ यू पकड़ता है,  जैसे हनीमून पे गये नये जोडें एक दुसरे की कलाई. अतः इन्होंने अब--"मोहब्बत के उम्र को अपनी लौह प्रतिभा से 50 प्लस कर दिया है". 

यह व्यंग्य लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है. 

लेखक--रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin. no. 222002 (U P)
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Wednesday, 1 April 2020

कहानी---(मजमें वाली लड़की )

कहानी----(मजमें वाली लड़की )

मैं अपने छात्र जीवन मे--कॉलेज से लौटते समय बीच रास्ते में पड़ने वाली कचहरी के मजमें में अक्सर रूक जाया करता था. "मेरे उस मजमें को देखने या रुकने का मुख्य मरकज वह मजमें वाली लड़की थी". जो दिन दुनिया के तमाम रंगों से अनजान बेखबर अपने करतब दिखाने में खो जाती फिर--जैसे ही करतब खत्म होता वह--"मजमें वाली लड़की" अपने कटोरे में इधर-उधर फेके सिक्के डालती और उसे अपनी फटी झोली में रख गर्मी की चिलचिलाती धूप में घर की तरफ चल देती.

 मैंने सुना था कि इस--"मजमें वाली लड़की को इसके शराबी बाप ने वसीयत में तीन छोटी बहने और टीवी से खासती हुई मां दी थी". उन्हीं का पेट भरने और मां की दवा ने उसे एक सामान्य सी लड़की से मजमें वाली लड़की में बदल दिया. सच--"किसी की भूख और मजबूरी विश्व की सबसे कठिन किताब है और टीवी से खासती हुई बीमार माँ की दवा सबसे बड़ी डिग्री". फिर कुछ  एक दिन आया तो पता चला कि तीन-चार दिन से वे मजमें वाली लड़की कचहरी में अपने करतब दिखाने नहीं आ रही. 

 इसी बीच मेरे पापा की बदली किसी और शहर हो गई और पढ़ लिख कर मुझे भी कचहरी में ही सरकारी नौकरी मिल गई. धीरे-धीरे कर  हमारे जेहन से वह मजमें वाली लड़की न जाने कब निकल गई इसका पता ही नहीं चला. अचानक उसी शहर और कचहरी में जब 19 वर्षों के बाद मैं बदली होकर आया तो मेरे जेहन में वह कॉलेज, कचहरी वाली लड़की फिर से याद आ गई. 

 मेरे पांव बरबस ही उस तरफ जैसे खींचे चले जा रहे थे जहां कभी कचहरी में--"वे मजमें वाली लड़की अपने करतब दिखाया करती थी". मेरी यह आंखें उसे जल्द से जल्द देखने को जैसे कई सालों से बेचैन हो. मैं जब वहां पहुंचा तो कचहरी की वे जगह वीरान खाली और खंडहर सी लग रही थी जहां मेरी मजमें वाली लड़की कभी अपने करतब दिखाया करती थी. 

उस जगह लोग तो थे लेकिन मेरे मजमें वाली लड़की नहीं थी. पूछने व पता करने पर यह पता चला कि मेरे उस--"मजमें वाली लड़की को उसके शराबी बाप की वसीयत ने उसे असमय ही मार डाला". यह सुन कर मेरे अंदर एक हूक सी उठी और मुझे करतब दिखाती, कटोरे में तमाशबीनो के फेके सिक्के उठाती, अपनी फटी झोली में रख गर्मी की तपती दोपहरी में नंगे पांव घर  जाती हुई वे मजमें वाली लड़की अब बस--"मेरी इस जेहन की याद बनके रह गईं". 

यह कहानी मेरी स्व-लिखित व अप्रकाशित है. 

लेखक--रंगनाथ द्विवेदी 
जज कालोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin. no. 222002 (U P )
Mo. no. 7800824758

लघुकथा---(आखिरी ख़त )

लघुकथा----(आखिरी ख़त )

कमरे में रखी आलमारी को अक्सर मैं तन्हाई मे जब उसके याद की इंतहा या हद होती है, तो खोलता हूं. वे आलमारी महज एक आलमारी नही, बल्कि हमारे और रुखसार के मोहब्बत की वे तमाम खट्टी-मीठी यादें व उसकी जुदाई का वे आखिरी ख़त भी है जो रुखसार ने अपनी भीगी आखों व थरथरती हाथों से मुझे थमाया था. 

उस ख़त को मै महज रुखसार का आखिरी ख़त नही मानता, उसे मै अपनी जुदा होती हुई रुखसार के कदमो की वे आवाज मानता हूं जो आखिरी ख़त के साथ जाती हुई रुखसार के कदमो से आंसुओ की तरह इस आखिरी ख़त के हर हर्फ से आती है. फिर रुखसार ख़त के आखिर मे नुमाया होती है और कहती है--"आदिल क्यों खुद को मेरी याद मे रुला व तड़पा रहे हो, प्लीज किसी से निकाह कर अपनी दुनिया बसा लो ".

फिर रुखसार को छूने की चाह मे जब अपने हाथ बढ़ाता हूं तो वही  हमेशा की तरह--"उसका आखिरी ख़त मेरे हाथों से छू जाता है".फिर खुली खिड़की से हवा के तेज झोंके ने मुझे कमरे की आलमारी की तरफ जाने और रुखसार के उस आखिरी ख़त को संभालकर रख देने के लिए मजबूर कर दिया हो. सच मैं मोहब्बत मे कितना बद--नसीब निकला  जिस "रुखसार के साथ रहने और घर बसाने का ख्वाब देखा था आज उसी रुखसार की याद आलमारी और उसका दिया आखिरी ख़त ही मेरे पास रह गया". 

यह लघुकथा मेरा स्व-लिखित व अप्रकाशित है, 

लेखक--रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला-जौनपुर pin. no. 222002 (U P)
Mo. no. 7800824758