इस कोरोनावायरस के लॉकडाउन ने मेरे अंदर के कवि की आत्मकथा को लिखने के लिए प्रेरित किया. यूं तो मैं भी सामान्य तरीके से जवान हुआ और सामान्य तरीके से एक असामान्य लड़की से मेरा विवाह हुआ. अगर मैं डॉक्टर होता तो उसी समय तीन गिलास ग्लूकोज और दो बीपी कंट्रोल की गोली गटक जाता. मैंने आज तक जितनी भी शादी देखी या दुल्हन देखी उनमें यह अलहदा और सबसे अलग थी. उसे जिस भी कमरे में बाइज्जत मेरे साथ रहना था, उसके किस्मत में भी ये स्याह कोयले सी सुंदरी लिखी थी.
वहां पंडित विवाह के मंत्र पढ़ रहा था और मैं यहां मन ही मन बैठा महामृत्युंजय का जाप कर रहा था क्योंकि इसके साथ कितने दिन या रात गुजारने के बाद यह मंत्र भी याद रह पाएगा या नहीं, इसमें मुझे कंफ्यूजन है. मेरे अंदर रोमांटिक जितने भी भाव थे, उनका एक्सीडेंट तो सुहागरात के दिन ही हो चुका था. उस रात के बाद मेरे मुंह पर 12:00 बज चुके थे. जो अब तलक बजे हुए हैं. जिसे मैं लाख चाहकर भी अब ठीक नहीं कर सकता.
मेरी जिंदगी में पदार्पण कर चुकी महान जानलेवा पत्नी दोनों पैर बेड पर फैलाए 70% बेड पर कब्जा किए हुए न्यू खर्राटे भर रही थी जैसे कोई 22 सालों से खड़ा स्कूटर किसी योग्य मिस्त्री के बनाने के बावजूद उस बिगड़े हुए स्कूटर की ध्वनि को ठीक नहीं कर पाया हो. उसके ठीक ना कर पाने का खामियाजा उस कॉलोनी के सभी पड़ोसी भुगत रहे हो, ठीक वैसे ही मैं भी अपनी उसी स्कूटर की तरह बिगड़ी पत्नी को सारी रात भुगतता रहता हूं. जिस दिन उस महान अप्सरा के चेहरे पर मैं जरा सा भी गुस्से का मानसून देखता हूं मैं उससे पहले ही सतर्क हो जाता हूं क्योंकि गुस्से में वे एक खूंखार महिला दरोगा लगती है.
वे जब सो कर उठने के बाद मुझे प्राणनाथ कहकर चाय मंगाती है तो मैं समझ जाता हूं कि, मेरे और उसके दिनचर्या की शुरुआत हो चुकी है. उसका मेरे जीवन में आने से मेरी विपत्तियों की दुनिया गुलजार हो गयी . उस दिन मेरी पहली कविता लिखने की शुरुआत हुई, जब उसने विवाह के तीसरे महीने में करवा चौथ के दिन अपने भीषण राग में मेरी लंबी उम्र की आरती उतारी. लेकिन आरती उतारने के बाद ज्यों ही छत से कमरे में आई, फिर बेड पर सो कर लगी अपने पांव दबवाने. उस दिन तुलसीदास के अस्तर का स्वाभिमान तो नहीं जगह लेकिन हां एक कविता जरूर हाजमोला प्रजाति की इस ना हजम होने वाली पत्नी पर लिख बैठा.
फिर धीरे-धीरे 1 वर्ष बाद कवि सम्मेलन में आयात निर्यात होने लगा. इस आयात निर्यात से जो पैसे मिलते हैं, उसे पत्नी को पकड़ा देता. इन मंचों पर मेकअप करके बैठी सुंदर कवित्री या उनके गीत व कविता से ज्यादा उनके देखने का सुख, मैं लंबे समय से जी रहा था. कभी-कभी तो इच्छा होती कि काश यह कवि सम्मेलन एक आध महीने लगातार चलता रहे, लेकिन ऐसा भला कभी हुआ है. यह विश्वरी कारण आज तलक नहीं बना शायद इसीलिए भी न बन पाया हूं कि ईश्वर ने हम कवियों को आजीवन सुखी रहने का श्राप दे दिया हो.
अब तो यही मन ही मन निकलता है कि, सत्यानाश हो इस चीनी कोरोनावायरस का जिसकी वजह से भारत सरकार कॉल लॉग डाउन करना पड़ा. इसमें भीषण उपलब्धि यह है कि, मेरी पत्नी हर आधे घंटे बाद या तो मुझे दिख रही है, या तो वह मुझे देख रही है. मैं उसकी इस प्रताड़ना से इतना ज्यादा सैनिटाइज हो चुका हूं कि मैं शायद कोरोनावायरस के खत्म होते ही यह " लॉकडाउन में लिखी कवि की आत्मकथा" पूर्ण कर लूं.
यह व्यंग मेरा स्व-लिखित व अप्रकाशित है.
लेखक-- रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर, कलेक्ट्री कचहरी जौनपुर--222002 (U.P.)
Mo.no.-- 7800824758