Wednesday, 29 October 2025

व्यंग्य

💃💃🕺🕺अगर आपकी पत्नी,, आपकी पड़ोसन से हंसते हुए यह कहे कि मेरे इसके पापा तो "एकदम गोबर गणेश है",,,तो समझिए की आपकी पत्नी आपके पतियोचीत व्यवहार से संतुष्ट है😀😀🤓🤓

Monday, 27 October 2025

(मुसलमान बना दो)

(मुसलमान बना दो)
गर मासुमो का कत्ल इतने से-
थम जाये वहसियो,
तो हमे शौक से हिंन्दू या मुसलमान बना दो।
ढहा दो मेरे जेहन का मंदिर,
मै शायर हूँ,मुहब्बत मेरी भूख है,
गर मै तेरी पूजा ना बन सका तो,
अज़ान बना दो।

Saturday, 25 October 2025

(लोरिया चांद की)

(लोरियाँ चाँद की)
दूध-रोटी से--------
खाली हो गई कटोरियाँ आज की,,,,,,,,,,
ऐ,रंग------अब माँ को भी-----
कहाँ याद है वे लोरियाँ चाँद की।

Friday, 24 October 2025

लखनऊ कलयुग की अयोध्या

(लखनऊ--कलयुग की अयोध्या)
सियासत---------
हर युग में बुढ़े पिता को दशरथ बना देती है।
अचानक मांग बैठती है साधना सी कैकेई,
मुलायम जैसे असहाय दशरथ से पिता से लिया कोई वचन,
और लखनऊ जैसी वर्तमान अयोध्या से,
छिन अखिलेश से राम को!
अपने पुत्र मोह की खातिर,
वे प्रतिक को--------
अमर सी मंथरा के कारण,
कलयुग का भरत बना देती है।
सियासत--------
हर युग में बुढ़े पिता को दशरथ बना देती है।
लेकिन समय की रामायण का ये कलयुगी कालखंड़ है,
अब सियासत की अयोध्या लखनऊ की गद्दी पे----------
आसीन होता है वही राम,
जिसकी यहां की जनता-----
अपने वोटो से बहुमत बना देती है।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758
उत्तर-प्रदेश के वर्तमान राजनैतिक हालात पर।

(अवैध संबंध है)

(अवैध संम्बंध है)
हा!मुझे कुबूल है,तेरे इल्ज़ाम से पहले---
ऐ खूबसुरती-------
कि मेरा तेरी तारीफो से---------
अवैध संम्बंध है।

Sunday, 19 October 2025

अयोध्या उदास है

राम मंदिर का फैसला आने से पहले 2019 में हमने एक रचना लिखी थी-------

(अयोध्या उदास है)

इस दिवाली भी---
सरयू उदास है,अयोध्या उदास है
हमारी आस्था टेंट मे है, 
उफ! मेरे अंतस मे केवट,
और हे! राम कह रहा--
जटायु उदास है.

रामभक्ति में-----
तमाम शबरी की आँख पथरा रही,
वे देखो----
मंदिर के लिये तराशी गई,
लंबे समय से रखी,
किसी अहिल्या सी,
राम मंदिर की––
शीला उदास है.

ये वनवास----
उन्हीं की नगरी में उफ!
हम नपुंसक है,
शायद इसी से-----
हनुमान, लक्ष्मण,सीता ही नही,
बल्कि अपने राम के वात्सल्य की,
मां--
कौशल्या उदास है.

इस दिवाली भी---
सरयू उदास है,अयोध्या उदास है.

रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
7800824758

व्यंग्य

✍️✍️इस समय हार्ट अटैक की वजह से ज्यादा मौते हो रही है,,,इसलिए आई लव यू जैसे रासायनिक शब्दो का प्रयोग😀😀पति और पत्नी भी बहुत अनिवार्य होने पर ही करें🤓🤓

व्यंग्य

✍️✍️अगर कोई खूबसूरत महिला आपको वरिष्ठ कहे तो आप उसे तुरंत डाट दीजिए,, क्योंकि अब किसी व्यक्ति के वरिष्ठ होने की उम्र 75 प्लस है😃😃

Monday, 13 October 2025

आदमी हूं

(आदमी हूँ)

तेरे रूप के लावण्य से,
देवता दहके थे,
मै तो आदमी हूँ.

है इसमे पाप-पुण्य कुछ नही,
ये सुरा आचमन है,
इसमे देवता बहके थे,
मै तो आदमी हूँ.

रंगनाथ द्विवेदी. 
जौनपुर, उत्तर-प्रदेश 
Mo.no.--7800824758

Friday, 10 October 2025

राम एक कलाकार में

(राम एक कलाकार में खंडित हो गये)
इंतज़ार कर रही है करके मेकप,
किसी ग्राहक का!
पत्थर की नहीं------------
अपने भूखे पापी पेट की अहिल्या।
आज गुलज़ार भी तो है,
कोठे वाली गली!
क्योंकि आज------------
दशहरे के राम और रावण की झांकी निकलनी है,
उसे याद है,
कि अगले बीते वर्ष भी वे इसी तरह,
मेकप किये अपने कोठे के छज्जे पे खड़ी थी,
तो राम बने कलाकार ने किस तरह काम उन्मुक्त नजरो से,
उसके उन स्तनो को तका था!
पहली बार दशहरे की---------------
उसकी वे पिड़ा असह्य थी!
क्योंकि इस कोठे वाली अहिल्या ने,
जिस राम को अब तलक सुना था,
वे राम जैसे-------------
इस कलाकार में खुद खंडित खड़े थे।

लहरों में फना होना है

(लहरो मे फ़ना होना है)
मै तो फ़कत एक नदी हूँ-------
ऐ वालिदे दरिया,,,,,,,,,,
जिसे एक दिन---------
तेरी लहरो मे फ़ना होना है।

मैं औरत नहीं मरुस्थली रेत हूं

(मै औरत नही मरुस्थली रेत हूँ)
मै औरत नही-----------
मरुस्थली रेत हूं!
बस यूँही अक्सर उकेरती हूं,
ताकी मेरी पिड़ा--------
इन रेतिली कड़ो से ताजी रहे।
मैने तो खुद चुना है----------
अपने जीवन का ये रुदालीपन!
अगर रो दुंगी तो क्या बचेगा?
आँख से बह जायेगी वे पिड़ा भी!
मर जाऊँगी बिना तड़पे,
पाप का पश्चाताप मै जिना चाहती हूं!
अपने चारो तरफ रेत और यही रेत,
मै मुट्ठी-दर-मुट्ठी खाली होऊँ,
चुभे मेरे अंतरतक ये नागफनी,
मैने यही तो किया है---------
झुठे प्यार की खातिर!
तड़पता छोड़ आई थी माँ-बाप,
अगर औरत होती-----------
तो ससुराल होता,मायका होता
आज मै कुछ नही,
बस बिना किसी संवेदना की-----
बहुत दुर तलक फैली,
मरुस्थली रेत हूं।
मै औरत नही------
मरुस्थली रेत हूं।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

राहुल के हाल पत्र

(राहुल के हाल पे)
बहुत तरस आता है राहुल के हाल पे,
अधकचरी जानकारी ले,
बेचारे पीट रहे मोहर्रम सी छाती सुना है "रफाल" पे----
बहुत तरस आता है राहुल के हाल पे।
बकरे तक का पता नही इनको,
डींगें हाक रहे शेर की खाल पे-----
बहुत तरस आता है राहुल के हाल पे।
इनकी बेजा छिछोरी हरकते,
यू लग रहा जैसे आधुनिक कालीदास,
ले टंगारी बैठा है अपने खानदानी डाल पे------
बहुत तरस आता है राहुल के हाल पे।
पुत्र मोह मे अंधराई सोनिया गांधारी सी,
कुछ ना कर पा रही दुर्योधन से राहुल के लिये,
हाय! दिल दुख रहा उनका,
अपने राहुल से लाल पे--------
बहुत तरस आता है राहुल के हाल पे।
पार्टी मे ही सुलगन और अंदर धुँआ है,
क्या करे ?
इनकी मजबूरी है नाचना,
इस पागल मदारी के बीन सुर-लय-ताल पे-----
बहुत तरस आता है राहुल के हाल पे।
हे! भगवान लुटिया डुब रही,
राहुल रोज पीट रहे,
शाह और मोदी के शतरंजी चाल पे-----
बहुत तरस आत है राहुल के हाल पे।

@@@रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर।
जिला--जौनपुर (उत्तर-प्रदेश)।
Mo.no---7800824 758

इस लेख व रचना को दिल से ना ले इसे शुद्ध रुप से व्यंग्य की तरह पढ़े, इसपे राजी होना ना होना आप पे है----धन्यवाद।

Wednesday, 8 October 2025

अपनी उर्वशी पे

(अपनी उर्वशी पे)
वे अपना सबकुछ वार देती है,
मेरी एक खुशी पे।
इसलिए,ऐ रंग,-मै
रोज कुछ न कुछ लिखता हूँ,
अपनी उर्वशी पे।

चांद की पीड़ा

(चाँद की पीड़ा)
हर्ष नही,
ये है,बिषाद की पीड़ा।
रोते चकोर को है,
अपने चाँद की पीड़ा।
ऐ रंग,-
नीगल लेगा राहू सुना है,
आज इतनी असह्य होती है,
चाँद की पीड़ा।

नदी रो रही

(नदी रो रही)
रोज लहू-लुहान हो रही---
हमारे शहर मे नदी रो रही।
ये माँ थी-हम बेवफ़ा बेटो की-----
आज हमी से जलिल हो रही,,,,,,,
ऐ,रंग------
हमारे शहर मे नदी रो रही।

भूख लिखता रहा

(भूख लिखता रहा)

तू रोटियां फेंकती रही,
अपनी हवेली से--
ए "रंग"--
मै बगावत और भूख लिखता रहा.

पुरानी पेंशन

(पुरानी पेंशन)

पुरानी पेंशन बहाल कर दो,
नही तो फिर तुम्हें,
यह सत्ता नही मिलेगी.

तुम्हारे दंभ का ये अड़ियलपन
हमारे वोटो से है
कही हम,बदल गए
अपनी भीड़
और हुजूम के साथ
फिर कुर्सी तो होगी
लेकिन तुम्हारी उस कुर्सी को
कोई महत्ता नही मिलेगी.

पुरानी पेंशन बहाल कर दो
नही तो फिर तुम्हें,
यह सत्ता नही मिलेगी.

ये आंदोलन है
जे.पी. और लोहिया का 
इसे पहचानो
हमारे चालीस वर्षो की
निष्ठा को 
चौथे स्तंभ से
दबाने और कुचलने वालो.

यह बिगुल है इंकलाब का
इसे हवा ना दो 
नही तो तुम्हारे अन्याय का सूरज 
डूब जाएगा
तुम पछताओगे,
दिल्ली की तरफ मुंह करके
जब तुम्हारी
महज एक गलती से
तुम्हे यह तुम्हारी,सत्ता नही मिलेगी.

पुरानी पेंशन बहाल कर दो
नही तो फिर तुम्हें
यह सत्ता नही मिलेगी.

यह रचना मेरी स्वरचित और अप्रकाशित है.

रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी,मियांपुर
जौनपुर (U P)

Monday, 6 October 2025

व्यंग्य

पत्नी के सामने खिलखिला के हंसना,,हंसने की श्रेणी में नही आता,,,बल्कि यह खीस निपोरने की श्रेणी में आता है

एक शेर

खुद भूख से मर गया ऐ "रंग",,,,जो ता उम्र
औरों की अमीरी के ताबीज़ बेचता था 😥😥

Saturday, 4 October 2025

ठंड की धूप

( गुनगुनी धूप )
मै टैरेस पे---------
कुर्सी निकाल गुनगुनी धूप मे घंटों बैठी,
वे तुम्हारी चाहत के एहसेसात को-----
अपने भीतर कही हौले-हौले टटोल रही.
लेकिन उस टटोलने मे न जाने कहां,
तुम्हारा श्पर्ष मुझे मिला नही,
सच अब तुम्हारे--------
चाहत का बासीपन टीस रहा.
याद है मुझे अच्छे से-------
ठंड की ये गुनगुनी धूप,
जब तुम्हारा छुना और श्पर्श करना,
मेरे प्यार के अंतरतक को गुनगुना जाता,
वे शायद युवापन था------
लेकिन आज जैसे टैरेस की गुनगुनी धूप,
एक सखी सी-------
मेरी युवावस्था से कह रही,
नही ऐसा कुछ नही,
ये जीवन के पलछिन की करवट भर है,
फिर यही टैरेस और कुर्सी के बगल-----
दोनों का गुनगुनी धूप मे बैठे,
काफी पीना होगा.
तभी एक झोका सा हवा का आता है,
और उन्हें मै थका मांदा,
आफिस से बैग लटकाये,
टैरेस पे पड़ी हुई एक खाली सी कुर्सी,
निढ़ाल सा पाती हूं,
तब मै-------
उनकी मजबूरियों की गुनगुनी धूप को,
अपने अंतर मे एक बार फिर महसूस कर पाती हूं.

@@@रचयिता---रंगनाथ द्वीवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला---जौनपुर pin no.222002
Mo.no.7800824758

यह कविता मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

मैं औरत नहीं

(मै औरत नही मरुस्थली रेत हूँ)
मै औरत नही-----------
मरुस्थली रेत हूं!
बस यूँही अक्सर उकेरती हूं,
ताकी मेरी पिड़ा--------
इन रेतिली कड़ो से ताजी रहे।
मैने तो खुद चुना है----------
अपने जीवन का ये रुदालीपन!
अगर रो दुंगी तो क्या बचेगा?
आँख से बह जायेगी वे पिड़ा भी!
मर जाऊँगी बिना तड़पे,
पाप का पश्चाताप मै जिना चाहती हूं!
अपने चारो तरफ रेत और यही रेत,
मै मुट्ठी-दर-मुट्ठी खाली होऊँ,
चुभे मेरे अंतरतक ये नागफनी,
मैने यही तो किया है---------
झुठे प्यार की खातिर!
तड़पता छोड़ आई थी माँ-बाप,
अगर औरत होती-----------
तो ससुराल होता,मायका होता
आज मै कुछ नही,
बस बिना किसी संवेदना की-----
बहुत दुर तलक फैली,
मरुस्थली रेत हूं।
मै औरत नही------
मरुस्थली रेत हूं।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

वक्त बूढ़ा हो गया

(वक्त बुढ़ा हो गया)
ऐ बेवफ़ा---------
तेरी लौटने का इंतजार करते-करते,,,,,
मेरी जिंदगी का------
वक्त बुढ़ा हो गया।

पुलिस

हनीप्रित को न पकड़ पाने वाली हमारे देश की महान पुलिस पे लिखा एक तिखा मगर सम-सामयिक व्यंग्य-----------------
                (आपके बिस्तर तक पुलिस है)
ठेला,खोमचा और रेहड़ी वालो के लिये--------
बड़ी हिंसक पुलिस है।
पर हनीप्रीत ने ये साबित कर दिया,
कि कुछ टुकड़े डालो,
और अपनी पहुँच का इस्तेमाल करो फिर देखो-------
कि कितनी नपुंसक पुलिस है।
ये बाइज्जत सब करते है,
इनकी कुत्तो से अच्छि नस्ल है,
कब कितने मे काटना और भौकना है,
सब जानते है!
सही किमत हो मालिक को काट लेंगे,
ये बड़े समझदार----------
और बड़ी हित-चिंतक पुलिस है।
मालिश-मशाज़,
ये खुद करवाने मे सक्षम है,
इनकी जानकारी में ढ़ेरो प्रीत है,
क्या आशाराम?, क्या राम-रहिम?
पैसे खरचिये तो,
महज़ डेरे तक नही बल्कि एै "रंग"------
आपके बिस्तर तक पुलिस है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर (उत्तर-प्रदेश)।

mo.no.----7800824758

(काग्रेस की जलेबी)

तभी 
उनकी पार्टी के हाथ 
जीत की विक्ट्री लगेगी,
जब 
इस देश में 
वैज्ञानिक तरीके से 
जलेबी की फैक्ट्री लगेगी.

हॉवर्ड से पढ़े हैं 
मजाक थोड़ी है ,
अब जलेबी की दुकान भी 
इटली के स्तर की 
कोई कंट्री लगेगी.

ग्राहक 
बी एम डब्लू से उतरेंगे 
हलवाई की पत्नी भी 
अब जलेबी विभाग की 
कैबिनेट मंत्री लगेगी.

"यहां मेरा आशय विपक्ष के व्यवहारी ज्ञान के जर्जर और कमजोर होने से है"

रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी,मियाँपुर 
जौनपुर 222002 (उत्तर प्रदेश )

एक टिप्पणी

✍️✍️मासूम बच्चियों की रेप से बेहतर है,,,कि हमारे शहर में कुछ बस्तियां तवायफों की हों🥲🥲

Wednesday, 1 October 2025

(हे! राम)

(हे! राम)
आज भी-
अहिंसा के सिने पे
चला रहा है,गोली,
नाथूराम।
कब थमेगी ये हिंसा-
बन्दुको की ऐ रंग,
आखिर कब निकलेगा,
कातिल के होंठो से-
हे!राम।
गांधी जयन्ति पर।