Sunday, 29 May 2022

(दंगा याद है)
हमें पुराना शहर याद है,
एक-एक गली मुहल्ला याद है।
वे कुर्आनखानी का खुरमा,
मुँह पोछती अपने दुपट्टे से,
अब्दुल की अम्मा याद है।
हमें पुराना शहर याद है!
राखी सुनि थी एक ब्राह्मन के घर,
आँख मे खुशियो के आँसू---------
मेरी इस कलाई को सलमा याद है।
हमें पुराना शहर याद है!
इतने सालों बाद देखा जब जला घर,
पुछा कहां गये ये सब,
तो नये शहर के बाशिंदो ने बताया,
तो अफसोस हुआ,रंग---------------
कि अब नये शहर को,
पुराने शहर की मोहब्बत नही,
नफरत,लाशे और दंगा याद है।
हमें पुराना शहर याद है।
(रुह तलक जल गई)
रख दिया-----------------
दहलीज़ पे खुद को दिये की तरह,
ऐै "रंग "----------------------तुम नही आये
जबकि मेरी रुह तलक जल गई।
( चाय पीते थे )

कभी हम-तुम तन्हा,
किनारे की टेबल पे ,घंटो बैठे
कैंटीन की चाय पीते थे.
वे दिन,वे कैंटीन, वे होठ
अब नही
बस यादो की टेबल पे,
खाली और ठंडा
काँच का गिलास रखा है,
जिसमें से कभी धुआं उठता था,
और उस धुएं को फुक,
हम-तुम किनारे की टेबल पे बैठ,
घंटो गुनगुनी चाय पीते थे.

@@@रंगनाथ द्विवेदी.
Mo.no.7800824758
(मुसलमान है, साहब)

ना ही पूजा 
ना ही किसी मस्जिद की ,
अजान है, साहब.!

ये लड़की ,
इस दौर-ए-ग़ालिब की,
दीवान है , साहब!

बड़़े सलीके और 
तमीज़ से ,
लिखा है कई रात ,
ये एक रात हिन्दू
तो एक रात मेरी ,
गज़लों की ----
मुसलमान है , साहब!

@ रंगनाथ द्विवेदी

Saturday, 28 May 2022

(नक्सली हो गये)
गुमराह रास्तो से गुजरे--------
हम जंगली हो गये,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग---अपनो का सीना चाक कर----
हम नक्सली हो गये।
(रुह तलक जल गई)
रख दिया-----------------
दहलीज़ पे खुद को दिये की तरह,
ऐ,रंग-------------------------तुम नही आये
जबकि मेरी रुह तलक जल गई।

Friday, 27 May 2022

(आशिकी--2 का रिंगटोन बजता रहा)
वे तेरी बेवफ़ाई के बाद भी,
तुमसे मोहब्बत करता रहा।
तभी तो अपनी कलाई की नशे काट,
वे पुरे बिस्तर पे-----------
तुम्हें याद कर हँसता रहा।
देख ये वही मोबाइल है,
जिसपे तु कभी उससे घंटो बतियाती थी,
आज उसकी लाश के सिरहाने,
बिना किसी रिसीब के,
इसके नाकाम मोहब्बत की तरह,
रुंधे गले से एै"रंग"----------
आशिकी--2 का रिंगटोन बजता रहा।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

एक माडर्न नाकाम मोहब्बत।

Wednesday, 25 May 2022

(मेरे शहर में बरसात हो रही है)
जब से तुम्हें राग मल्हार लिखा है,
तब से मेरे शहर में बरसात हो रही है।
दिवाने हो गये है सारे स्याह बादल,
भूल गये है ये कुछ और शहर है,
जहां इनको बरसना है!
जब से तुम्हें राग मल्हार लिखा है,
तब से मेरे शहर में बरसात हो रही है।
कही तेरी खातिर यही न ठहर जायें,
भेज दे इन्हे ये बस तेरी सुनेंगे,
ये कैदी हो गये है------------
तब से तेरी रुप के,
जब से तुम्हें राग मल्हार लिखा है,
तब से मेरे शहर में बरसात हो रही है।
(नील कमल)
तड़पता है,सिसकता है-----------
बुलाता है कोई नील कमल,,,,,,,,,,,,,,,
सदियो चुनी दिवाल से गाता है-----
कोई नील कमल।
ऐ,रंग-----किसी युग में
कोई पाता है कहाँ नील कमल।

Sunday, 22 May 2022

(मेंहदी लगाने के लिये)
जीसे ता-उम्र खुद की मेंहदी ने रुलाया,,,,,,,,,
ऐ,रंग---वही खातुन पुरे शहर मे------
मशहूर है,मेंहदी लगाने के लिये।
(इतवार जीते है)
हम नौकरीपेशा इतवार जीते है,
वे उस शहर,हम इस शहर
दूर रहके भी-------------
हम इतना प्यार जीते है।
हम नौकरीपेशा इतवार जीते है।
वे गीले बाल उनका कमरे में आना,
उतने ही पानी से हम--------------
तड़प के सावन की फुहार जीते है।
हम नौकरीपेशा इतवार जीते है।
छः दिन गुजारते है हम नागफनी के,
फिर लौटते है लेके उन्हे केवड़े का गजरा,
ऐ,रंग---------------
हम इतनी ही खुशी का त्यौहार जीते है।
हम नौकरीपेशा इतवार जीते है।
(कुछ खूबसूरत औरते)
हाँ मैने देखी है कुछ खूबसूरत औरतें,
नदी के किनारे स्याह वर्ण मल्लाहन का------
वे कसे बदन साड़ी खोसे,
जूठे बरतनो का तल्लीन हो माजना,
और उसके उसकनो से आती एक मधुर सी,
खुरचने या रगड़ने की आवाज़,
हाँ एैसी ही खूबसूरती को देख मै कहता हूँ,
कि हाँ मैने देखी है----------
कुछ खूबसूरत औरते।
इस चिलचिलाती धूप में खामोश और बंद,
शहर की खिड़कियो के मौनपन को तोड़ती,
वे कुछ बड़े पत्थरो को,
छोटी-छोटी गिट्टियो में बदलती,
पुरे लय से हथौड़ी की आवाज़,
और उसकी हर चोट पे पसीने से तर-बतर हिलते,
उसके वे दो उरोज़,
मुझे उस मशहूर खजूराहो से ज्यादा खूबसूरत लगे,
हाँ इसिलिये एै"रंग" मै अक्सर कहता हूँ----------
कि हाँ मैने देखी है,
कुछ खूबसूरत औरते।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

Saturday, 21 May 2022

धन्यवाद!दैनिक "विजय दर्पण टाइम्स" और संपादक आदरणीय संतराम पाण्डेय का जिन्होंने अपना पुत्रवत आशीर्वाद हमें दिया।

(सिंदूर रोये)
तेरी परी तेरी हूर रोये-----------------
एै रात अय्याशियों मे बिताने वाले,
तेरे घर मे तड़पे है एक औरत,
उसकी भरी मांग मे---------------
तेरे नाम का सिंदूर रोये।
मेंहदी और व्याह के जोड़े को,
वे किस तरह तकती है मजलूम,
उफ़! छाले फूटते हो जैसे------------
जब वे रात को तन्हा अपने पिया से दूर रोये।
सारे किये श्रृंगार उसपे हँसती है सौत सी,
वे जी रही है जिंदगी,
जिंदा रहके भी मौत सी,
वे दरवाज़े पे छोड़ आती है आँख अपनी,
तेरे आने के इंतज़ार मे,
कभी लौटना वक्त़ से और देखना,
कि तेरे कंधे से लग,
किस तरह तेरा प्यार पाने को,
तेरे घर मे तेरी पत्नी का,
शर्म से लरजता,
पहले रात किसी छुवन लिये,
तुम्हे पाने की खुशी मे बिस्तर की हर एक सीलवट,
कुछ टूटी चूड़ी, बिखरे गजरे
इधर-उधर कही खोई बिंदियां,
उसके टूटते बदन से,
तुमसे मिले प्यार की खुशी मे---------
उसकी उम्र और यौवन का अब तलक की तड़प को भुला,
तृप्त आँखों मे------------
जहा का मिल चुका शुरूर रोये।
एै रात अय्याशियों मे बिताने वाले,
तेरे घर मे तड़पे है एक औरत,
उसकी भरी मांग मे------------
तेरे नाम का सिंदूर रोये।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर----222002 (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758
(घर की दहलीज़ रोई)
 तुम किसी गैर औरत की आगोश में लेटे रहे,
वे इंतज़ार के दिये की तरह,
अपने अंदर तक भिग रोई।
तेरी बेवफ़ाई को तो एक आवारा निद आई,
मगर यहां वफ़ा अपनी आँख मे आँसू लिये,
तकती रही तेरा रास्ता----------
एै"रंग" उसके संग केवल पुरी रात,
तेरे घर की दहलीज़ रोई।
(हरियाणा के आस-पास है दोस्त)
आरक्षण-जातियो के आधार पे देना,
एक अभिशाप है साहब।
कुछ घर पंडितो और ठाकुरो के भी,
अब उदास है साहब।
कही बागी न बना दे-परदे के उस तरफ की भूख,
क्यूँकि उनकी जवान बिटियाँ के-----
तन पे भी अब आखिरी लिबास है साहब।
रहम!रहम!रहम!बख्श़िये,
हमारी वेदना भी अब----------
हरियाणा के आस-पास है साहब।

Friday, 20 May 2022

(खूबसूरत हो नही सकती)
तु चाहे जितना भी मेकप कर ले ऐ अमीरजादी,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
पर तु किसी मजूरन से ज्यादा---------
खूबसूरत हो नही सकती।
(दिया और चराग अलग है)
इसका शुरुर,इसका मिज़ाज अलग है,
मुहब्बत का रिवाज़ अलग है।
यहां होते है सजदे महबूब के,
यहां की मस्जिद और नमाज़ अलग है।
है ये तन्हाई की चादरपोशी,
यहां की कब्र और मज़ार अलग है।
यहां हर रात उर्स है और धड़कने कौव्वाली,
ऐ,रंग----यहां दिया और चराग अलग है।

Tuesday, 17 May 2022

धन्यवाद!आपका दैनिक "वर्तमान अंकुर" निर्मेश के त्यागी व दक्ष भईया का जिन्होंने मेरी रचना को अपना प्यार दइया।

(सेब द चाइल्ड लिखवा रही है)
किसी कन्या भ्रूण को कोई क्या मारेगा?
माँ खुद मरवा रही है।
हँसी-खुशी के साथ हजार दो हजार दे,
हर शहर के पैथालाॅजी मे रिपोर्ट ले,
किसी डाक्टर के टंगे नीले परदे के उस तरफ,
अपना एबार्शन करवा रही है।
आँख इसलिये भर आती है कि-------
इन तथाकथित माँओ ने कालेज मे पढ़ा है,
"इनके पथराये हृदयो ने--------
माँ शब्द की कोमलता खो दी है",
वही निरक्षर माँ----------
चार बेटिया जन पाप-पुण्य से डरती है,
सच तो ये है कि अपनी बेटियो के लिये-----
"उन पढ़ी-लिखि ढोंगी माँओ से ज्यादा,
अपनी इन बेटियो के लिये लड़ती है"।
सरकारी अमले की कारस्तानी तो और है,
जो महिला डाक्टर पैसे ले,
एबार्शन करवाने के लिये चर्चित है,
सुना है कि वही,
पुरे शहर की दिवालो पे-------------
"सेब द चाइल्ड लिखवा रही है"।

@@@भ्रूण हत्या को इंगित करती एक कविता।

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर----222002 (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।
कभी,थाने में एक पुलिस कर्मी के द्वारा मासूम बच्ची के रेप की घटना को हमने अखबार में पढ़ा था.
उसी घटना के भय को हमने शब्द देने की कोशिश की थी, लेकिन इसका आशय यह कतई नही कि हर थाना, और पुलिस कर्मी ऐसा ही है, फिर भी अगर किसी पुलिस कर्मी को हमारी इस रचना से थोड़ी-बहुत ठेस पहुंचती है, तो उसके लिए हमें क्षमा करें😢😢

(रेप के घाव)

थाने पे---
एक गरीब की बिटिया,
अपनी सलवार उतारे---
जगह-जगह हुये
रेप के घाव दिखा रही है,
दरोगा---
बार-बार थप थपाके देख रहा,
उसके दाँत और नाखून चुभे--
उरोजो को बार-बार.
लड़की सिहर उठी---
उसी रेप के छुअन का सा,
ऐहसास हुआ उसे!
वे समझ गई
आँख भर-भरा आई उसकी,
कि अब एक रात और चीखेगी थाने पे,
फिर हरे हो जायेंगे---
ना भरने के लिये
उसकी उरोजो पे ताजिंदगी,
एै,रंग---
ये "रेप के घाव".

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.----7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

Friday, 13 May 2022

(जन्म से गुँगी है)
वे थिरकती है----------
तो उसके घुँघरु और पाँव बोलते है,,,,,,,,
ऐ,रंग----------
वे मासुम जन्म से गुँगी है।
एक अलग ही टेस्ट की रचना-------

(हमदर्द की रूह-अफ्ज़ा)

तू मेरी ,
शरीक-ऐ-हयात है, कि--
हमदर्द की रूह-अफ्ज़ा.

ये तेरी----
नर्म-नाजूक सी कलाई की छुअन,
हाय !!
तू मह़ज़ गिलास है ,या ----
हमदर्द की रूह-अफ्ज़ा.

ये शर्म से झुकी नज़र, 
उसपे सुर्खी ,तेरे गाल की,
बता तू ,
गुलाब है, कि---
हमदर्द की रूह-अफ्ज़ा.

ये हवा की शरारत ,
ये उड़ती तेरी जुल्फें,
हाय !! 
तू खुबसूरत ढ़लती शाम है,या ----
हमदर्द की रूह-अफ्ज़ा.

टहलना ----
तेरा हौले-हौले यूं छत पे
और मेरा देखना तुमको ,
तू मेरी मुमताज़ है, या ----
हमदर्द की रूह-अफ्ज़ा.

यह मेरी स्वरचित व अप्रकाशित रचना है.

रचयिता-रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P )
Mo.no.--7800824758

Wednesday, 11 May 2022

(ईश्क़ लिखुँगा)
आओ मेरा सर कलम कर दो,,,,,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----------
गर मैं जिंदा रहा तो-ईश्क़ लिखुँगा।
(हिन्दू --मुसलमान बुना दो)
आप जीत जायेंगे अबकी चुनाव भी,
बस शहर मे अपने कुछ लाश गिराकर-------
उन्हें आप हिन्दू --मुसलमान बना दो।
(पानी बचाते है)
तेरे इंतकाल पे आबे जमजम,
तो हमारी मौत पे-----------
गंगा का पानी पीलाते है।
तुम्हे जन्नत मिलती है,
तो हम भी  स्वर्ग जाते है!
तो फिर क्यू हम नदियो और कुँओ,
के पानी को रुलाते है।
आओ तुम्हें एक इंकलाब की खातिर,
हम मंदिर और मंस्ज़िद से बुलाते है।
पानी को वालिद समझ के तुम बचाओ,
और हम भी पानी को ऐ,रंग------------
एक माँ की तरह बचाते है।

@@@सेब द वाटर।
(पानी बचाते है)
तेरे इंतकाल पे आबे जमजम,
तो हमारी मौत पे-----------
गंगा का पानी पीलाते है।
तुम्हे जन्नत मिलती है,
तो हम भी  स्वर्ग जाते है!
तो फिर क्यू हम नदियो और कुँओ,
के पानी को रुलाते है।
आओ तुम्हें एक इंकलाब की खातिर,
हम मंदिर और मंस्ज़िद से बुलाते है।
पानी को वालिद समझ के तुम बचाओ,
और हम भी पानी को ऐ,रंग------------
एक माँ की तरह बचाते है।

@@@सेब द वाटर।

Saturday, 7 May 2022

(शाख़ो से मोहब्ब़त की है)
गर तुम काटोगे--तो मै चिखुँगा,,,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग--------हमने---
दरख्त़ो के शाखो से मोहब्ब़त की है।
(अवैध संम्बंध है)
हाँ मुझे कुब़ूल है,तेरे इल्ज़ाम से पहले,,,,,,,,
ऐ,खुबसूरती-----कि मेरा
तेरी तारिफो से अवैध संम्बंध है।
(अंदर एक मीर तड़पता है)
जब भी शहर में कोई भूख से मरता है,
मेरी नज्म़ो का कूनबा उजड़ता है।
ऐ,रंग----मैं सीसक उठता हूँ लफ्ज़-लफ्ज़,
और मेरे अंदर एक मीर तड़पता है।
(गुरुत्वाकर्षण है)
उसकी खुबसुरती को एक टक देखना,,,,,,,,,
मेरी बद्चलनी नही,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
बल्कि ये उसके तराशे हुये बदन का-----
एै,रंग---गुरुत्वाकर्षण है।
इस रचना का आशय किसी को आहत करना नही है,ये मेरा महज व्यक्तिगत विचार भर है, जिससे आपका सहमत होना या ना होना आप पर निर्भर है, इसके साथ ही आप अपनी अभिव्यक्ति के लिए भी स्वतंत्र है.

 (जिन्ना व नेहरु)

जिन्ना व नेहरु--
इस मुल्क के दो घाव थे!
इनकी चाह थी दिल्ली-----
इनके इसी चाह की भूख ने,
लाखो-लाख जिंदगियाँ निगल ली।
मजलुम औरतो की आबरू लुटी गई,
स्तन काटे गये,
मासूम बच्चियो के गुप्तांगो मे खंजर उतारा गया।

जिन्ना के कायदे आजम बनने की नाजायज भूख ने ही,
पाक जैसे नामाकूल देश को जन्म दिया।
लेकिन वहा भी खुदा ने
एक मुसलमान के तौर पे,
जिन्ना को कबूल नही किया।

कहते है कि इस्लाम मे---
एक मर्तबा दफन होने के बाद
दोबारा उसकी मिट्टी को खोदना हराम है,
पर सुना है कि
पाकिस्तान के इस कायदे आजम की कब्र,
कईयों मर्तबा खोदी गई।

एसे गलिज शख्स की तस्वीर ----
हमारे मुल्क के तालिमे मस्जिद मे टंगा होना,
सच्चे और राष्ट्रभक्त मुसलमानों की तौहीन नही
तो क्या है?

सच तो ये है की इस शख्स की तस्वीर को,
हमारी वर्षों पुरानी कांग्रेस सरकार को,
बेईज्जत कर
कही फिकवा देना चाहिये था,

जो शायद
अपने वोट बैंक की खातिर काग्रेस कभी कर नही पाई।
फिलहाल हमारे मुल्क के
किसी भी दिवाल पे अगर किसी को--
टांगना है तो
वहाँ जिन्ना नहीं कलाम टंगे हो।
और इस देश के एैसे तमाम राष्ट्र-विरोधी--
गैग्रीन जैसे पाँव काट देने चाहिये।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर----222002 (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.----7800824758

Thursday, 5 May 2022

निर्भया के कातिलो को मिले फांसी से प्रेरित कुछ लाइन----------
                         (निर्भया को न्याय है)
ये महज़ फाँसी नहीं---------------
उस निर्भया को न्याय है।
जो चीखी,तड़पी,छटपटाई
तेरी विकृत कुंठा के डाले गये वे सरिये,
कितने घृणित थे!
काश तुम्हारी माँ ने कहा होता,
या तुमने-----------
अपनी सगी बहन के वे गुप्तांग याद किये होते,
तो तुम्हारा ज़मीर कहता कचोटता,
कि ये पाप है,अन्याय है
और तुम कांप जाते!
हां तुम्हारी पशुता व अमानवियता से,
वे कुछ ही दिनो मे मर गई,
लेकिन तुम तभी से मर रहे हो तील-तील,
सच गलिजो़--------------
आज निर्भया की रुह खुश होगी,
उसका गला रुंध आया होगा,
ये तुम्हें महज़ फाँसी नही बेगैरतो बल्कि------
उस मासुम और बेगुनाह लड़की,
निर्भया को न्याय है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758
(रोमांटिक वैगन बेलियाँ)

वे सायबान के पिछे---
शाम को छिपता हुआ सूरज,
और काम से लौटती पहाड़ि लड़कियाँ, 
ना कोई थकन,ना कोई सिकन,
अलमस्त,अल्हड़पन--------
बाते करती,खिल-खिलाती ऐ,रंग--------
मेरी कविता की 
वे रोमांटिक वैगन बेलियाँ।

Sunday, 1 May 2022

वरिष्ठ! कहानीकार बड़े भाई राम नगीना मौर्य, जनपद कुशीनगर (उत्तर-प्रदेश) का प्रकाशित कहानी संग्रह " सॉफ्ट कॉर्नर" डाक से प्राप्त हुआ, इसके लिए बड़े भैया को हमारा प्रणाम. 

रचना व पुरस्कार---इनके कहानी संग्रह "आखिरी गेंद" के लिए एक लाख रूपये का "डॉ विद्या निवास मिश्र " पुरस्कार व इसी  कहानी संग्रह के लिए "यशपाल पुरस्कार " उत्तर-प्रदेश साहित्य संस्थान से प्राप्त है. 

साथ ही विभिन्न राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित व पुरस्कृत.