धन्यवाद!दैनिक "विजय दर्पण टाइम्स" और संपादक आदरणीय संतराम पाण्डेय का जिन्होंने अपना पुत्रवत आशीर्वाद हमें दिया।
(सिंदूर रोये)
तेरी परी तेरी हूर रोये-----------------
एै रात अय्याशियों मे बिताने वाले,
तेरे घर मे तड़पे है एक औरत,
उसकी भरी मांग मे---------------
तेरे नाम का सिंदूर रोये।
मेंहदी और व्याह के जोड़े को,
वे किस तरह तकती है मजलूम,
उफ़! छाले फूटते हो जैसे------------
जब वे रात को तन्हा अपने पिया से दूर रोये।
सारे किये श्रृंगार उसपे हँसती है सौत सी,
वे जी रही है जिंदगी,
जिंदा रहके भी मौत सी,
वे दरवाज़े पे छोड़ आती है आँख अपनी,
तेरे आने के इंतज़ार मे,
कभी लौटना वक्त़ से और देखना,
कि तेरे कंधे से लग,
किस तरह तेरा प्यार पाने को,
तेरे घर मे तेरी पत्नी का,
शर्म से लरजता,
पहले रात किसी छुवन लिये,
तुम्हे पाने की खुशी मे बिस्तर की हर एक सीलवट,
कुछ टूटी चूड़ी, बिखरे गजरे
इधर-उधर कही खोई बिंदियां,
उसके टूटते बदन से,
तुमसे मिले प्यार की खुशी मे---------
उसकी उम्र और यौवन का अब तलक की तड़प को भुला,
तृप्त आँखों मे------------
जहा का मिल चुका शुरूर रोये।
एै रात अय्याशियों मे बिताने वाले,
तेरे घर मे तड़पे है एक औरत,
उसकी भरी मांग मे------------
तेरे नाम का सिंदूर रोये।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर----222002 (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758