Sunday, 6 December 2020

कविता---( गुनगुनी धूप)

( गुनगुनी धूप )
मै टैरेस पे---------
कुर्सी निकाल गुनगुनी धूप मे घंटों बैठी,
वे तुम्हारी चाहत के एहसेसात को-----
अपने भीतर कही हौले-हौले टटोल रही.
लेकिन उस टटोलने मे न जाने कहां,
तुम्हारा श्पर्ष मुझे मिला नही,
सच अब तुम्हारे--------
चाहत का बासीपन अब टीस रहा.
याद है मुझे अच्छे से-------
ठंड की ये गुनगुनी धूप,
जब तुम्हारा छुना और श्पर्श करना,
मेरे प्यार के अंतरतक को गुनगुना जाता,
वे शायद युवापन था------
लेकिन आज जैसे टैरेस की गुनगुनी धूप,
एक सखी सी-------
मेरी युवावस्था से कह रही,
नही ऐसा कुछ नही,
ये जीवन के पलछिन की करवट भर है,
फिर यही टैरेस और कुर्सी के बगल-----
दोनों का गुनगुनी धूप मे बैठे,
काफी पीना होगा.
तभी एक झोका सा हवा का आता है,
और उन्हें मै थका मांदा,
आफिस से बैग लटकाये,
टैरेस पे पड़ी हुई एक खाली सी कुर्सी,
निढ़ाल सा पाती हूं,
तब मै-------
उनकी मजबूरियों की गुनगुनी धूप को,
अपने अंतर मे एक बार फिर महसूस कर पाती हूं.

@@@रचयिता---रंगनाथ द्वीवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला---जौनपुर pin no.222002
Mo.no.7800824758

यह कविता मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

Saturday, 5 December 2020

कविता---(जीवित कामायनी)

(जीवित कामायनी)
इंतजार करती है-----------
अपने कोठे पे बैठ हर शाम कोई ग्राहक।
न आने पे फिर वहीं से खोलती है,
जहा से उसने मोड़ रखा था--------
जय शंकर प्रसाद की कामायनी।
डबडबाई आँख मे मनू और इडा से ज्यादा,
भर आते है आँसू !
ये अथाह पिड़ा के फफोले का फूटना रोज सहती है,
इसी कोठे पे-----------
जब कोई आता दिखता है,
तो टुटी कुंडी वाले दरवाज़े की तरफ बढ़ चलती है,
ग्राहक की जल्दबाजी में------------
बंद करते दरवाज़े की टुटी कुंडी की आवाज़,
का मतलब वे समझ----------------
अपने एक-एक कपड़े को उतारती है,
और चारपाई पे--------------
उसका ग्राहक पैसे सुलता है!
फिर थकी मादी उठती है----------
मरहूम जय शंकर प्रसाद की ये जीवित कामायनी।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

Saturday, 7 November 2020

( कश्मीरी पंडित)

(कश्मीरी पंडित)
वे बांगा दी बुलबुल-------
वे डलझील वे शीकारे--------
हमारी मिट्टी-ए-मोहब्बत कश्म़ीर,,
हमे ख्वाबो मे पुकारे।
ये सियासत-ए-साजिश-ए-अलगाव,
कि हम कश्म़ीरी पंडित पड़े है-------
खानाबदोशो से बदतर ऐ दिल्ली,
तेरी सड़को के किनारे।
वे गुल,वे केशर,वे सेब के बगीचे,
उफ!नही आती वे खूशबु ना आती है--
वैसी यहाँ तक हवा रे।
ये लाशे मईयत,ये रुह-ए-तड़प है,
ऐ,रंग---हम कैसे होगे जन्नतनशी----
ऐ कश्म़ीर तेरी पाक-ए-मिट्टी के बीना रे।

Saturday, 24 October 2020

(वन्देमातरम् कहना दिये)

इस दिवाली तू, शहीद के घर,
फक्र से जलना दिये.
ना रोना उसकी शहादत पे,
कसम है, तुम्हें
हर छत के दिये से,
जन-गण-मन ,
और वन्देमातरम् कहना दिये.

@रंगनाथ द्विवेदी.

कविता---(पिपिहरी बजाओगे )

चुनाव परिणाम पे हमारी प्रतिक्रिया-------
     
        ( पीपिहिरी बजाओगे)

आखिर कब तलक भाजपाइयों को----
जीत का च्यवनप्राश,
मोदी खिलायेंगे.

तुम किचड़ करते फिरो,
तुम्हारी दुर्गती दुर होगी,
क्योंकि तुम्हें विश्वास है
उस किचड़ मे भी-----
कमल मोदी खिलायेंगे.

ये मंदी और अर्थशास्त्र,
किसी गरीब का ठंडा तवा--
क्या जाने?
माफ! करना,
आप ऐश करनेवालो को मंत्री बनाओ,
और चुनाव-----
मोदी जितायेंगे.

लो चखो,करो टेस्ट
हरियाणा में चुनावी फिकेपन का,
ये लोकतंत्र है,भैय्या
यहा क्या खट्टर,
क्या हुड्डा ?
नही संभले तो फिर,
राहुल गांधी के चुनावी हार की तरह,
आन की तान,
सदन मे या फिर सदन के बाहर,
पीपिहिरी बजाओगे.

@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758

Monday, 19 October 2020

कविता---(उन्होंने मुझको चाँद कहा था )

(उन्होनें मुझको चाँद कहा था)

पहले साल का व्रत था मेरा-----
उन्होनें मुझको चाँद कहा था।
तब से लेकर अब तक मै-----
वे करवा चौथ नही भुली।
मै शर्म से दुहरी हुई खड़ी थी,
फिर नजर उठाकर देखा तो,
वे बिलकुल मेरे पास खड़े थे,
मैने उनकी पूजा की-------
फिर तोड़ा करवे से व्रत!
उन्होनें अपने दिल से लगा के-----
मुझको अपनी जान कहा था।
पहले साल का व्रत था मेरा-----
उन्होनें मुझको चाँद कहा था।
बनी रहु ताउम्र सुहागिन उनकी मै,
यूँही सज-सवर कर देखू उनको मै,
फिर शर्मा उठु कर याद वे पल,
जब पहली बार पिया ने मुझको----
छत पर अपना चाँद कहा था।
पहले साल का व्रत था मेरा----
उन्होनें मुझको चाँद कहा था।

@@@आप सभी को कल के करवा चौथ की ढ़ेरो बधाई।
रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

Saturday, 17 October 2020

कविता---( ताजमहल)

ताज़महल पे हो रही सियासत से प्रेरित एक रचना-----------
                     (और एक ताज़महल)
मुहब्बत की निशानी की खातिर है याद महल-----
उफ!आज सियासत की ज़द में है ताज़महल।
मै नही कहता कि लड़ा जाये इस जगह------
लड़ने को और भी है इसके बाद महल।
कुछ जोड़े कसम खाते है न जुदा होने की--------
एैसा इसके सिवा दुनिया में नही है मुझे कोई याद महल।
रहने दो इसे मंदिर-मस्जिद मत कहो------
जैसे भी है रहने दो इस ज़मीने जन्नत मे ये आबाद महल।
क्योंकि जानता हूँ एै "रंग" कि बना नही सकती ये दुनिया---
इस ज़मी पे कोई एक और ताज़महल।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.----7800824758

Friday, 16 October 2020

कविता--(मैं दर्दे दरख़्त हूं )

(मै दर्दे दरख्त़ हूँ)
मै वे दर्दे दरख्त़ हूँ--------
जो चोट पे भी चुप रहती है शाख-शाख।
सब छोड़ जाते है--------
कुछ लम्हों के बाद मुझको,
मै सिसकती हु तन्हा अक्सर,
अपनी ही साँस-साँस।
मेरे बदन की ये लिबासे पत्तियां,
कर देती है खिज़ा में-------
बेपर्दा बदन मेरा!
मै जीती हूं किस तरह-------
शर्म को अपनी पलको से टांक-टांक।
मै वे दर्दे दरख्त़ हूँ-------
जो चोट पे भी चुप रहती है शाख-शाख।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

कविता---(रावण )

(रावण )
पुराने खल चरित्र का रावण ,
आज के माडर्न खल चरित्र के रावण से,
कही ज्यादा पवित्र व श्रेष्ठ था,
क्योंकि उस रावण पे,
आज के माडर्न रावण की तरह-----
"किसी मासूम आठ वर्ष की बच्ची के,
रेप का कोई इल्जाम न था" ।
पुराने रावण पे तो,
उस राम ने विजय पाली,
पर माडर्न रावण से,
आज के राम डर गये है,
उससे गली-गली, शहर-शहर,
बचते व छिपते फिर रहे,
और माडर्न रावण अट्हास कर रहा।
शायद ऐसा लग रहा कि जैसे,
उस महा-विद्वान पुराने रावण के----
 मारने के श्राप से राम पीड़ित हो गये है।
सच तो ये है कि आज के माडर्न रावण को जला पाना,
इस नपुंसक समाज के बस का नही,
तभी तो अब भी,
हर दशहरे मे उसी पुराने रावण को------
जलाया जा रहा।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला---जौनपुर Pin.no.222002
(उत्तर-प्रदेश)।
Mo.No.--7800824758.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

Monday, 12 October 2020

कविता---(मैं भी कुम्हार हूँ )

(मै भी कुम्हार हूँ)
हा मै भी----------------
अपने गीतो की चाकी पे,
शब्दो की मिट्टी रख,
कुछ गीत------------
उसके दिवाली के दीये की तरह बनाता हूँ।
वे भी कुम्हार है मिट्टी के दियले का,
और मै भी कुम्हार हूँ-------
अपने गीतो का।
वे उपले की आँच में,
पकाता है दियलो को और मै--------
अपने हृदय के उपलो की आँच में,
गीतो के शब्द पकाता हूँ।

Sunday, 11 October 2020

लघुकथा---(जुम्मन की शहनाई )


लघुकथा----( जुम्मन की शहनाई)

जिस जुम्मन की मौत हुई थी वे कोई आम मौत नहीं बल्कि हमारे शहर के एक मशहूर शहनाई कलाकार की मौत थी. लगभग छ दशक तक जुम्मन मियां ने शायद ही कोई ऐसी शादी रही हो जिसमें उन्होंने अपनी शहनाई ना बजाई हो. 

उस छ दशक में जितनी जरूरत एक युवा जोड़े को शादी की थी, उतनी ही जरूरत उस शादी में जुम्मन मियां के शहनाई की भी थी. इसलिए जुम्मन की मौत की खबर ने छह दशक की उन सभी शादियों की आंखें भी भीगो दी जिन शादियों में जुम्मन मियां ने अपनी शहनाई बजाई थी. 

जुम्मन मियां का एक-एक अंदाज आने वाली कई पीढ़ियां याद रखेंगी, उनका वे विशेष टोन में हंसना व पान की गिलोरी को एक तरफ दबा कर बात करना सब खत्म हो गया. ऐसा नहीं कि अब शादियां नहीं होगी, होंगी लेकिन उन शादियों में जुम्मन मियां की शहनाई की वे धून नहीं गूजेंगी जिससे वे पूरी महफिल लूट लिया करते थे . 

हमारे शहर के वे एकलौते ऐसे शख्स थे, जिन्हे शहर का कोई भी मोहल्ला कभी हिंदु या मुसलमान नही कहता था. उनके मौत की खबर सुन मैं और मेरी पत्नी दोनो ही फ़फ़क के रो पड़े. 

क्योंकि जुम्मन मियां ने हम दोनो की टूट और बिगड़ रही शादी को एक पिता की तरह आगे बढ़कर बचाया था. हमारी शादी की वे घटना आज फिर से जीवित हो गई, जब भरी मंडप में चक्कर आने की वजह से मैं गिर गया था और होने वाली पत्नी के मुहल्ले के लोगो ,रिश्तेदारो ने मुझे व मेरे पुरे परिवार को बंधक बनाकर  थाने से पुलिस बुला करके एफ आई आर कर दिया. 

मेरी पत्नी के तरफ के लोगों ने पुलिस को बताया कि इस लड़के की शादी उसकी बीमारी को छिपाकर की जा रही है. जबकि सच्चाई ठीक इसके उलट थी मुझे अत्यधिक थकान के कारण यह चक्कर आया था, तब मैंने पहली बार जुम्मन मियां को अपने पूरे आत्मविश्वास के साथ उस शहनाई की कसम खाते हुए सुना व देखा जो उन्होंने आज से पहले कभी भी किसी भी शादी में नहीं किया था. 


उन्होंने अपने भरे कंठ से कहा साहब मैं पिछले कई पीढ़ियों से इस खानदान और परिवार की शादियों में ना केवल शहनाई बजाई है बल्कि इस परिवार के एक- एक सदस्य को मैं अपने घर की तरह जानता हूं, इस लड़के में कोई बीमारी नहीं है अगर आप सबको विश्वास ना हो तो आप मुझे अपने यहां महीनों बंधक बनाकर इस लड़के की डाक्टर से जाँच करा ले. 

 तब थाने के दरोगा ने कहां की जुम्मन की शहनाई अपने आप में खुद एक विश्वास व यकीन है, क्योंकि जुम्मन तो मर सकता है, लेकिन अपने शहनाई की झूठी कसम कभी नहीं खा सकता, और सच भी वही हुआ हमारी शादी फिर रुकी नहीं कहने वाले तो यहां तक कहते हैं कि जैसी शहनाई मेरी शादी के विदाई के वक्त जुम्मन मियां ने बजाई थी वैसी शहनाई शायद ही किसी शादी में उन्होंने बजाई हो. 

अतः आज केवल जुम्मन की मौत ही नहीं हुई थी बल्कि हम पति-पत्नी के एक शहनाई बजाने वाले वालिद का भी इंतकाल हुआ था. 


यह लघुकथा मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है. 

लेखक---रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin. no. 222002 (U P)
Mo. no. 7800824758

दिनांक-11/10/20 को राजस्थान पत्रिका के परिवार में प्रकाशित. 

Saturday, 10 October 2020

कविता---(राम एक कलाकार में खंडित हो गये )

(राम एक कलाकार में खंडित हो गये)
इंतज़ार कर रही है करके मेकप,
किसी ग्राहक का!
पत्थर की नहीं------------
अपने भूखे पापी पेट की अहिल्या।
आज गुलज़ार भी तो है,
कोठे वाली गली!
क्योंकि आज------------
दशहरे के राम और रावण की झांकी निकलनी है,
उसे याद है,
कि अगले बीते वर्ष भी वे इसी तरह,
मेकप किये अपने कोठे के छज्जे पे खड़ी थी,
तो राम बने कलाकार ने किस तरह काम उन्मुक्त नजरो से,
उसके उन स्तनो को तका था!
पहली बार दशहरे की---------------
उसकी वे पिड़ा असह्य थी!
क्योंकि इस कोठे वाली अहिल्या ने,
जिस राम को अब तलक सुना था,
वे राम जैसे-------------
इस कलाकार में खुद खंडित खड़े थे।

Friday, 9 October 2020

व्यंग्य----( निकली हुई तोंद )

व्यंग्य-----( निकली हुई तोंद )

वैसे आप सभी माने या ना माने लेकिन मेरा यह मानना है कि चाहे जिस भी सरकारी महकमे के घुस  खाने वाले मुलाजिम या व्यक्ति की तोंद निकली हो लेकिन उनमें सबसे खूबसूरत व स्मार्ट तोंद अगर  देखने में लगती है तो यह पुलिस महकमें की लगती  है. 

वे जब अपनी घूस लेने की--"प्रदूषण युक्त मूछों के साथ हंसते हैं तो लगता है कि जैसे इन्होंने या इनके किसी खानदान ने अच्छाई का कोई भी सुंदरवन आज तलक नहीं देखा है जिसका साक्षात असर इन पर पड़ा है ".यह तोंद वाले  पुलिसकर्मी मनुष्य नहीं बल्कि मनुष्य के रूप में जन्मे नागासाकी और हिरोशिमा के आणविक रेडिएशन है.

इनके वजन का--"भयंकर रसास्वादन कर रही थाने की कुर्सी भी ऐसे सांस छोड़ती है जैसे कि उसका दम घुट रहा हो". जब तोंदवाले यह साहब जरा सी अपनी तशरीफ़ उठाते हैं तो कुर्सी से आई आवाज अपने पंचर फेफड़े में थोड़ा सा ऑक्सीजन भर इनके पुनः तोंदग्रस्त वजन के साथ बैठने के लिए भर लेती है. 

पुलिस वाले की तोंद किसी--"भू माफिया के जबरदस्ती कबजाए गये कई बीघे जमीन सी लगती है". कोई फरियादी रोए या गाये इससे इनका कोई मतलब नहीं बस इनके तोंद के सेवा रूपी  गुल्लक या बैंक के खाते में कितना पैसा डाल सकता है इससे मतलब है.

सब्जी मंडी, फल मंडी, मीट मार्केट हर कहीं इनकी निकली हुई तोंद कि कुछ अपनी कहानियां या गुलछर्रे हैं, इस ठेले से उस ठेले जाना और उस बीच क्लासिकल तरीके से उनकी तोंद का हिलना यह साबित करता है कि यहां इनकी वर्दी व तोंद की निशुल्क पुलिसिया रंगदारी चलती है.

सच इच्छा होती है कि ऐसे तोंदवाले किसी योग्य पुलिसकर्मी कि तोंद को प्रति वर्ष मै अपनी व्यंग्य विधा के बाई नेम सर्वश्रेष्ठ वार्षिक तोंद के सम्मान पत्र से नवाजे व उनके खूबसूरत व स्मार्ट तोंद को हर उस घर में अनिवार्य रूप से टंगवाउ जो घूस रूपी सुंदरता के साथ अपनी-अपनी तोंद के वजन में पुलिसवाले की तरह  श्रीवृद्धि कर रहे हैं.

यह व्यंग्य मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है. 

लेखक--रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला-जौनपुर pin.no.222002 (U P)
Mo.no.7800824758

व्यंग्य---( पुलिस महकमे का सौंदर्य वर्णन)

व्यंग्य-----(पुलिस महकमें का सौंदर्य वर्णन )

"सारे सरकारी विभाग या महकमें  का सौंदर्य वर्णन काफी बदमजा और असाहित्यिक है". बिना पुलिस विभाग के सौंदर्य वर्णन का जिक्र किए--हमारी व्यंग्य विधा के सारे सुकुमार व खूबसूरत शब्द रूपी व्याकरण के यह--"पुलिस महकमें के लोग शाहनाज के ब्यूटी प्रोडक्ट हैं". इनमें व्यंग्य अलंकार को चार चांद लगाने वाली गालियों के छंद या अतुकांत कविता या साहित्य पद्य व्यंग्य के यह--"मॉडर्न हरिशंकर परसाई हैं". इनके स्तर का साहित्य आप हर थाने पर 2 या 4 पा जाएंगे--"जिसका पाठन यह अपनी सुविधानुसार गालियों से करते हैं".

 इनके होठों पर हंसने की संभावना काफी कम पाई जाती है--"यह हंसते भी हैं तो लगता है कि जैसे 5 या 6 महीने बाद हंसे हो, इनके होठ भी इनके हंसने में अपना प्राकृतिक साथ नहीं दे पाते". यह जबरदस्ती अपना दांत चीआरे  से लगते हैं और इनका पेट तो माशा अल्लाह इनकी इस सुंदरता में और भी चार चांद लगा बैठता है जिस थाने के आसपस किसी ने कभी भी पेट से हुई महिला का पेट ना देखा हो तो-- "इनके पेट को देख ले तो उसकी यह राष्ट्रीय हसरत भी पूरी हो जाएगी".

 पुलिस महकमें की पेट को देख आप यूं ही समझ जाएंगे की पैदा होने और चलने से पहले क्या हमारे देश की यह महान विभूति जमीन पर दौड़े भी थे. "पैसा और दलाली इनके स्वास्थ्य के लिए प्रोटीन का काम करता है ".पुलिस महकमा अन्य सरकारी महकमे से कहीं ज्यादा खतरनाक व बंगाल के काले जादू की तरह है. "पुलिस वालों पर व्यंग्य लिखना,  मारने वाले सांड को लाल कपड़ा दिखाने के समान है".अतः हम व्यंग्यकार भी इन पर कुछ लिखने से पहले अपनी कलम की--"बीपी और सादे कागज की शुगर को भली-भांति चेक कर लेते हैं, तब कहीं जाकर हम इनके सौंदर्य वर्णन पर थोड़ा बहुत रिस्क लेकर लिख पाते हैं".

यह व्यंग्य लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है. 
दिनांक--27/3/2020

लेखक--रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला-जौनपुर pin.no. 222002 (U P )
Mo.no. 7800824758 

Thursday, 8 October 2020

कविता---(प्यार का चाँद )

करवा चौथ की सभी व्रती महिलाओ के प्यार की एक खूबसूरत कविता----
                             (प्यार का चाँद)
हमने पाया है तुममे अपने प्यार का चाँद,
बेशक कल तुम तकोगी छत पे मुझे,
मेरे हाथो से पियोगी व्रत का पानी,
लेकिन मै नही तकुंगा तेरे सिवा मेरी सजनी,
क्योंकि दुनिया तकेगी उसे,
मै तो तकुंगा तुम्हें क्योंकि तुम्हि हो-----------
हमारी धड़कन और हमारे प्यार का चाँद।
मेंहदी,महावर,चुड़ियाँ,सिन्दूर,बिंदिया,
वही पहले करवे सी शर्म,
तुम बहुत अच्छि हो मेरी सजनी,
क्या करुंगा तक के मै,
बहुत फिका है तेरे आगे आज-----
इस पुरे संसार का चाँद।
मै तुम्हें पाऊ हर जनम,
कभी न छिने मेरी आँखो से मेरी सजनी,
क्योंकि पल-छिन नही है तुमसे मेरी सजनी,
तुम्हारे साजन के प्यार का चाँद------
हमने पाया है तुममे अपने प्यार का चाँद।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर (उत्तर--प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

Tuesday, 6 October 2020

व्यंग्य----(हाय रे ! प्याज़ )

व्यंग्य------(हाय रे !प्याज ) 

 

अभी तलक बरसात में नदियां हैं खतरे के निशान से ऊपर बह रही थीलेकिन इस समय--प्याज की महंगाई भी अपने खतरे के निशान से ऊपर है. " पत्नी का शेयर बाजार की तरह गिरे हुए मुंह को देखकर तरस आ रहापर क्या करूंमैं भी अपने जेब की संवैधानिक व्यवस्था से मजबूर हूं, " आज किचन की यह श्रृंगारीक हालत हैकि वहां भी पिछले दिन से रखा प्याज नकचढ़ी साली की तरह सब्जी वाली टोकरी में ऐंठ रही है. "

 

प्याज की महंगाई ने मुझ जैसे व्यंग्य लेखक को भी कंफ्यूजावस्था में पहुंचा दिया है. समझ नहीं पा रहा हूं कि मैं--प्याज को स्त्रीलिंग लिखूं या पुलिंगकभी यह प्याज--पत्नी की तरह थी आज इसके सारे हाव-भाव किसी प्रेमिका की तरह लग रहे". प्याज के चलते इस समय सब्जी मंडी के बाहर ठेले लगाने वाले भी अपने ग्राहकों से ऐसे बातें कर रहे जैसे वे कोई--"सब्जी विक्रेता नहीं बल्कि वे इस पूरे इलाके के शहर कोतवाल हो.ग्राहक भी अगर प्याज खरीदने के लिए उसके ठेले के पास रुकता है तो प्याज को वे इस डर से छूकर उसके दाम नहीं पूछता कि कहीं यह-- "ठेलेवाला कोतवाल इसे किसी चोर उचक्के  या जेबकतरे की तरह डाट ना दे."

 

 

पहले मैं जो सब्जी 20 मिनट में खरीद कर खाली हो जाता थाअब वही सब्जी खरीदने में मुझे घंटों लग जाते हैं. यह सारी महिमा प्याज के बढ़े हुए भाव की वजह से है. मेरे सब्जी खरीदने की यह--"ओलंपिक शुरुआत पहले ठेले से शुरू होकर आखरी ठेले पर जाकर खत्म होती है.

 

पहले सब्जी लेने जाता था तोपत्नी यूं ही बेमन से सब्जी वाले झोले को पकड़ा देती थी और साथ ही दो-एक कड़ी बातें मुझे अलग से सुना देती थी. लेकिन  इस प्याज के बढ़े हुए दाम ने उसका पूरा बॉडी लैंग्वेज ही बदल दिया है. वे तीन-चार दिन से मुझे बहुत ही प्यार से सब्जी के झोले को पकड़ा रही और मेरे सब्जी लेकर लौट आने तलक बड़ी ही बेसब्री के साथ वे  दरवाजे पर खड़ी रहती है. 

 

ऐसे बेसब्री के साथ मेरा इंतजार वे तब किया करती थी जब उसकी और हमारी नई-नई शादी हुई थी. यह सब परिवर्तन इस प्याज की वजह से हुआ है. मैं अब  जब भी बाजार से सब्जी लेकर लौटता हूं. तो वह मेंरे हाथ से बहुत ही प्यार से सब्जी वाले झोले को पकड़ लेती है. लेकिन जैसे ही मैं उसे प्याज ना खरीद पाने की वजह बताता हूं तो उसका सारा उत्साह पल भर में ही गायब हो जाता है फिर वे किचन की तरफ बड़े ही उदास मन से सब्जी रखने चली जाती है.

 

अब तो मुझे और मेंरे व्यंग्य लेख दोनों को ही--इस प्याज के बढ़े हुए दाम का खतरे के निशान से नीचे आने का बड़ी बेसब्री से इंतजार है.क्योंकि प्याज की महंगाई की वजह से मुझे अब अपनी पत्नी का लटका हुआ मुंहबहुत कष्ट दे रहा. काश! की सरकार जल्दी प्याज के दाम या महंगाई को कंट्रोल करेंजिससे मेरी पत्नी के खूबसूरत चेहरे का लालित्य वापस लौटे और हम भी इस कहने या लिखने से बरी हो सके कि--"हाय रे ! प्याज."

 

 

यह व्यंग्य मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है. 

 

लेखक---रंगनाथ द्विवेदी 

जज कॉलोनीमियांपुर 

जिला--जौनपुर pin.no.222002

Mo.no.7800824758

Wednesday, 30 September 2020

लघुकथा----(हे ! राम )

लघुकथा-----(हे ! राम )

शहर के चौराहे पर अलसुबह कुछ लोगों की भीड़ देखकर, मैं भी कौतूहलवश उस भीड़ की वजह जानने के प्रयास में ज्यों ही भीड़ के करीब गया, तो वहां पड़ी हुई एक लाश देखकर मै अवाक रह गया. 

क्योंकि जिस व्यक्ति की वह लाश वहां पड़ी हुई थी वे देखने मात्र से ही कोई मजदूर लग रहा था. जिसे कल रात किसी वक़्त काम से लौटते समय किसी ने बड़ी ही बेरहमी के साथ चाकुओं से गोदकर मार डाला था. या उसकी हत्या कर दी थी.

उस व्यक्ति या मजदूर की लाश के घावों पर बैठी भिनभिना रही मक्खियां, मुझे वहां इकट्ठी भीड़ से कहीं ज्यादा संवेदनशील लग रही थी. क्योंकि वे  मक्खियां अपनी मक्खी होने के धर्म का निर्वहन तो कर रही थी, जबकि यह मनुष्य अपने मनुष्य होने के धर्म का कतई निर्वहन नहीं कर रहे थे. जोकि दुर्भाग्यपूर्ण था. 

अगर यह मनुष्य होते और इनमें संवेदना नाम की कोई चीज होती तो उन्हें उस मजदूर की लाश, महज लाश नहीं दिखती. बल्कि इस लाश के पीछे कि वे हिंसा दिखती, जिसके कारण इसकी पत्नी ने अपना सुहाग और इसके दो छोटे-छोटे मासूम बच्चों ने अपना पिता खो दिया. 

मैं फिर ना जाने क्यों और अधिक देर तक उस भीड़ के बीच ना रुक सका ?  मुझे उस भीड़ से एक कोफ़्त सी हुई और मैं चौराहे से जल्द से जल्द काफी दुर निकल जाना चाहता था. लेकिन तभी चौराहे पर टंगी "महात्मा गाँधी" की फोटो पर मेरी नजर पड़ी,और  नजर पड़ते ही मुझे उस मजदूर की लाश व उसके आसपास बहकर सूखे हुए खून पर बैठी वे भिनभिनाति मक्खियां याद हो आई और इस हिंसा ने मुझे "महात्मा गाँधी" के वे आखिरी शब्द 'हे ! राम ' कहने को बाध्य कर दिया. 


यह लघुकथा मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है. 

लेखक--रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin.no. 222002 (U P)
Mo. no. 7800824758

Sunday, 27 September 2020

लघुकथा----(नीम का दरख़्त )

लघुकथा----( नीम का दरख़्त)

अमजद अपने अब्बू के इंतकाल के बाद, अपनी अम्मी ख़ालिदा को गांव में अकेले व तन्हा रहने के लिए छोड़कर अपनी बेगम और बच्चों के साथ रहने के लिए शहर चला गया. लेकिन खालिदा भला कैसे अपने जिंदा रहते उस गांव व घर को छोड़ सकती थी. जिसके जर्रे-जर्रे में उसके शौहर की यादें बसी थी. 

ख़ालिदा को ख़ासकर दरवाज़े पर लगे उस नीम के दरख़्त से बेइंतहा मोहब्बत थी. जिसे अमजद के अब्बू ने अपने हाथों से लगाया था. वे ज़ब भी कभी खुद को बहुत तन्हा व अकेली महसूस करती थी,  तो घंटो उस नीम के दरख़्त से  ऐसे  बाते करती थी, जैसे वे कोई नीम का दरख़्त नहीं बल्कि, उसके पास अमजद के अब्बू खड़े हो.

एक बार ख़ालिदा ने अमजद से कहा भी था,  कि अमजद मेरे बेटे तू बेशक अपनी इस अम्मी को हज मत कराना, लेकिन बेटे मेरे जिंदा रहते तू कभी भी किसी से अपने अब्बू की इस नीम के  दरख़्त का सौदा मत करना. लेकिन शायद अमजद को अपने अम्मी ख़ालिदा की परवाह कहा थी, अगर होती तो उस दिन वे हरगिज उस नीम की दरखत का सौदा ना करता. जिसके लिए उसकी अम्मी ख़ालिदा ने उसे मना किया था. 

उस दिन ख़ालिदा ने पहली बार अपने कलेज़े पर पत्थर रखकर ना सिर्फ अमजद से लड़ पड़ी, बल्कि उसने यहां तलक कह दिया, कि जा !  चला जा!  मेरी नजरो के सामने से और आइंदा मेरे जिंदा रहते कभी भी तू  गांव मत आना और गर मेरी मौत भी हो जाये तो, तू मेरी  मिट्टी को हाथ भी मत लगाना.इसके बाद अमजद तीन दिन और गांव रहा लेकिन इस दरमिया उसने अपनी अम्मी से बात भी नही की. चौथे दिन वे बिना अपनी अम्मी से बात व सलाम किये, शहर चला गया, ऐसा पहली बार हुआ . 

ख़ालिदा अमजद की इस हरकत पर बहुत रोई , उसकी आँख तो आँख वे पाक आँचल तलक भीग गया,  जिसके साये तले सोने के लिए फरिश्ते तलक तड़पते है. लेकिन ये अमजद ना समझ सका.


इसके बाद फिर अमजद तभी गांव लौटा ज़ब उसके गांव वालों ने उसे फोन से ये बताया कि अमजद आज सुबह तुम्हारी अम्मी ख़ालिदा का इंतकाल हो गया. ये सुनकर अमजद को एक शॉक सा लगा. वे तुरंत ही अपने गांव के लिए चल पड़ा और गांव पहुंचने पर  ज़ब अमजद की नजर अपनी अम्मी की लाश पर पड़ी,  तो उसने देखा की जैसे उसकी अम्मी ख़ालिदा आज नीम के  दरख़्त के  नीचे अब्बू के साथ बैठी कह रही हो, कि तू आ गया अमजद. 


यह लघुकथा मेरे द्वारा स्वलिखित व अप्रकाशित है.
 
लेखक--- रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर 222002 ( उत्तर प्रदेश)
Mo. no. 7800824758

Tuesday, 22 September 2020

(रेगमाल सी जिंदगी )

(रेगमाल सी जिंदगी)
कौन नही बुनता-----------
जुलाहे के कालीन सी जिंदगी!
तरह-तरह के धागे में पिरो,
कौन नही देखना चाहता मुकम्मल अपना शाहकार,
पर हो नही पाता ज्यो का त्यो चाहा,
फंस के खत्म हो जाती है मछली सी----
किसी मछेरे के जाल सी जिंदगी।
सारी ख्व़ाहिशे धरी रह जाती है,
एक-एक कर खत्म होती जाती है,
एै रंग------------------
यहां पे सबकी है रेगमाल सी जिंदगी।

Tuesday, 8 September 2020

कविता----(तेरे शहर में )

(तेरे शहर में)
तेरे शहर में--------------
हमारे मोहब्बत की एक शाम वसीयत है।
ले लेना तुम हमारी गज़ल का जर्रा-जर्रा,
कोई बंदिश नही----------
यहाँ जाफ़रान की खुशबू है हर शख्स़ की खातिर,
यहाँ न कोई कौम न मज़हब और----------
ना ही सरियत है।
तुम्हारें शहर में--------------
हमारे मोहब्बत की एक शाम वसीयत है।
आहिस्ता-आहिस्ता उतरेगा जे़हन मे तेरे,
इन लफ्ज़ो का गुलाबीपन,
मै याद आऊँगा तुम्हारें शहर को,
यहाँ से जाने के बाद भी,
क्योंकि मोहब्बत ही एै "रंग"--------
इस अदब के दिवान की नियत है।
तुम्हारें शहर में------------
हमारे मोहब्बत की एक शाम वसीयत है।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.------7800824758

Sunday, 6 September 2020

कविता---(मिट्टी से जुदा मत करना )

(मिट्टी से जुदा मत करना)
बेटे मै बुढ़ि हो गई हूँ-------------
मुझे इस उम्र में अपने अब्बु से जुदा मत करना।
ना बेचना किसी को-------------
दरवाज़े पे जो उन्होनें लगाया है दरख्त़,
मै उसी से बतियाती हूँ अक्सर,
मुझे दर्द होगा------------
जब कोई काटेगा टंगारे से तेरी अब्बु की याद को।
बेटा बेशक तु मुझे हज़ ना कराना,
पर लेने देना मुझे आखिरी साँस इस मकान में,
मर जाऊँ तो तेरा हक है इस पर,
पर जीते जी मेरे बेटे,
अपनी इस अम्मी को अपने अब्बु के-----
इस मुकद्दस मिट्टी से जुदा मत करना।

Saturday, 5 September 2020

कविता---(गुरु )

(गुरु)
होते है साधु,संत और फकीर के गुरु,
अमर हो जाते है-----------------
पा के शिष्य कबीर के गुरु।
कौन भुला है प्रेम दिवानी मीरा को,
रैदास थे--------------
अपनी शिष्या के पीर के गुरु।
कर्ण का चरित्र और धनुर्विद्या,
स्वयं केशव कह उठे थे कुरुक्षेत्र में
वाह!कर्ण वाह!--------------
परशुराम थे एैसे बीर के गुरु।
जब खाली लग रहा था--------
ओलंपिक के मेडल से अपना देश,
तभी जीती एक लड़की
और दुनिया जान गई!
कि एै,रंग-------------
पुलेला है अपनी शिष्या सिंधु जैसी तीर के गुरु।

@@@आप सभी को शिक्षक दिवस की ढ़ेरो बधाई।

Tuesday, 1 September 2020

लेख----(खो रहे देश की हम अद्वितीय परंपरा )

श्राद्ध-विशेष चिंतन---(खो रहे हम देश की अद्वितीय परंपरा)

आज हमसे हमारी बहुत सारी पारिवारिक व वैदिक संवेदनाएं काफी जर्जर हो चुकी है,या अगर जर्जर नही हुई है तो नष्ट होने की कगार पर है.उन्हीं उत्कृष्ट परंपरा या संवेदना मे से एक प्रमुख है,अपने वृद्धों का आदर पूर्वक किया गया उनका श्राद्घ चूँँकिं श्राद्ध का आशय श्रद्धा से है,अगर ये श्रद्धा मर जाये तो हमारे देश की समृद्ध वैदिक परंपरा भी मर जायेगी. तब केवल और केवल मनुष्य हाड़-मांस का बना यंत्र भर रह जायेगा, जिसमें सब कुछ रहेगा बस संवेदना नही रहेगी.

आज पूरी दुनिया में संवेदना मे आ रही लगातार गिरावट का ये भयंकर दौर है,जिसकी भयंकरता का मापन हम दुनिया के किसी भी वैज्ञानिक रिएक्टर पैमाने पे नही कर सकते.इसका स्पष्ट असर अब हमारे देश में  भी केवल श्राद्ध के महीने मे ही नही अपितू अपने वृद्ध माँ-बाप की उपेक्षा मे भी हमे स्पष्ट दिख रहा है.जबकि हम सभी भारतीय कभी इस दौलत की खान थे. पूरी दुनिया हमारी संवेदना और यहां की समृद वैदिक परंपरा को बड़ी श्रद्धा से देखती थी.लेकिन हमीं अब अपनी इस संवेदना की समृद्ध व गौरवशाली परंपरा को खुद जर्जर व नष्ट कर रहे.

"हमें विदेशों की अतिशय नकल परंपरा के इस ओलंपिक से बाहर निकलना होगा". और हमें जिन बुढ़े माँ-बाप ने पाला-पोशा अपने सारे सुख-सुविधाओं को त्यागकर अपना वात्सल्य दिया.उन्हें हम कही उपेक्षा तो नही दे रहे,हमारा बागबान कही हमारी उपेक्षा से आहत या पीड़ित हो अकेले में रोतो नही रहा, गर ऐसा है तो फिर ये देश भी "विदेशी मूल के कुत्तों के मार्निंग वाक और इवनिंग वाक का देश होने जा रहा". बुढ़े माँ-बाप का श्रवण कुमार वाला देश अब मिस्टर कुमार होने जा रहा.यानि हमारी समृद्ध परंपरा का देश उन्हें अपनों से अलग रखने वाले वृद्धाश्रम का देश होने जा रहा.

हम सभी अपनी समृद्ध वैदिक परंपरा को जर्जर करने का दोषारोपण अब किसी विदेशी के सर नही मढ़ सकते.क्योंकि इसको जर्जर व नष्ट हम स्वयं कर रहे न कि कोई विदेशी वाह्य आक्रांता. अगर हम सभी समय रहते अपनी इन परंपराओं को न बचा पायेंगे तो फिर हम उस दरिद्र की तरह होंगें जिसके पास सबकुछ वैभव होगा लेकिन वे उस वैभव से अपने दो घड़ी चैन की नींद भी नही ले पायेगा.आईये हम अपनी उस वैदिक, सामाजिक व समृद्ध परंपरा को सहेजे. "जहां मनुष्य तो मनुष्य सुना है, कि देव भी पैदा होने को तरसते है".

आज भगवान राम,कृष्ण, बुद्ध, गाँधी की वैदिक परंपरा का देश हमें कुछ आहत व पीड़ित लग रहा शायद ये लेख उसी पीड़ा के कुछ आँसू है. और हो भी क्यों न जिस देश मे इतना तक कहा गया हो की "माँ पुरी दुनिया का एकलौता पूर्ण शब्द है ,"माँ ऊँ है."माँ कहने वालो के लिये गीता या कुरान से भी ज्यादा शबाब उसे केवल माँ कहने में है". "पिता हिमालय की तरह है."माँ और पिता केवल एक रिश्ते का औपचारिक या मशीनी नाम नही अपितू हमारा संम्पूर्ण जीवन है.

"हम अपने वृद्धो की संस्कारों से पुष्पित व पल्लवित एक बोधि वृक्ष है" .यही कारण है कि- "हमारा ये देश मानसिक पीड़ितो की विश्व दवा है". ये देश कबीर के प्रेम के ढा़ई आखर का देश है और हमारे बुढ़े माँ-बाप उस ढा़ई आखर के प्राण तत्व. बम,बारुद, मिसाइल के ढ़ेर पे बैठी दुनिया भी ये कहने से गुरेज नही करती कि, माँ के छुवन या स्पर्श की थिरैपी मेडिकल थिरैपी से कही ज्यादा कार-आमद है.ये थिरैपी हमारी समृद्ध वैदिक परंपरा की ही देन है. यशोदा माँ व नंद बाबा के प्यार की थिरैपी में पले भगवान कृष्ण की "गीता का उपदेश" जीवन-मृत्यु-युद्ध को इतना स्पष्ट परिभाषित करता है, जितना की दुनिया की कोई अन्य किताब नही.आईये हम सभी इस श्राद्ध के पवित्र महीने में,अपनी इस वैदिक अनमोल धरोहर की संवेदना  व उसकी समृद्ध परंपरा को जर्जर व नष्ट होने से बचाये.


यह लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.

लेखक--रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758

(एक जिंदा दिया हूं )

(एक जिंदा दिया हूँ)
ताउम्र अपनी मै जल-जल के जिया हूं,
मै आदमी नही-----------
एक जिंदा दिया हूँ।
तमाम खराशे है,है तमाम सिलवटे
उधड़ा रहा मै----------
किसी मुफ़लिस के बिछौने सा,
हर जख्म जिंदगी का-------
मै खुद से सिया हूं।
मै आदमी नही--------
एक जिंदा दिया हूँ।
हु मै एक एैसा सजायाफ्ता,
जो रो नही सकता!
खौलते है आँसू मेरे दिल के अंदर,
मै कभी बहार में नही-------
खिजा़ में जिया हूं।
मै आदमी नही------
एक जिंदा दिया हूँ।

Sunday, 30 August 2020

कविता---(दो घड़ी की रात )

(दो घड़ी की रात)
जिंदगी है बस दो घड़ी की रात,
आओ गुज़ार ले लिहाफ में हम,
एक दुजे के संग---
दो घड़ी की रात।
आयेगी धूप कमरे में कल किसी और के लिये,
खुली खिड़की से फिर बाल सँवारेगी कोई दुल्हन,
फिर अँधेरा होगा!
वे भी गुजारेगी इसी तरह अपनी जिंदगी की-------------
ये दो घड़ी की रात।
भुल जायेंगे सभी एक दिन रफ्ता-रफ्ता,
जैसे हम भुले है औरो के जिंदगी की---
दो घड़ी की रात।
एै,रंग-----यहाँ से हमी फना होगे,
बाकी यही रह जायेगी औरो के लिये---
ये दो घड़ी की रात।

(इश्क़ )

हमारे इश्क़ के--------------
मस्जिद की अजा़न है वो,
मै शेख हुँ उसकी धड़कनो का,
मेरी साँसो की पठान है वो।
हम जीते है मुकद्दस सरियत,
मै उसका पाकिज़ा फतवा हुँ,
चुमता हुं उसे--------------
मेरी इन आँखो की कुरआन है वो।
इल्में चराग रौशन है उसमें भी,मुझमे भी 
मै उसका आसमानी गुफ्तगू हूँ,
सुनता हु उसे!
एै,रंग------वे महज एक लड़की नही,
मेरी मुकम्मल जुबान है वो।
रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo. no----7800824758

Saturday, 22 August 2020

कविता---(ब्यॉयफ्रेंड हो गयें )

(लड़कियो के ब्वायफ्रेंन्ड हो गये)
स्कूल के बस्ते----------------
बढ़ते-बढ़ते बैग हो गये!
खत लिखने वाले देश की संवेदना मर गई,
दिल में रहने वाले लोग------------
सब मोबाइल में टैग हो गये।
माँ यशोदा का आँचल बदला,
वे जिंस और टाप पहन के माम हो गई,
और जितने भी पिता थे वे रफ्ता-रफ्ता डैड हो गये।
दूध-घी खाने-पीने वाले देश ने गिलास रख दिया,
अब उन्ही गिलासो में---------------
बार बालाओ के ढ़ाले पैग हो गये।
अर्द्धनग्न सड़को पे--------------
यौवन उछालती कुछ माडर्न लड़कियाे
के अश्लील और भौड़े कपड़े,
शर्म आती है लिखते,
कि जिस देश में भाई होते थे,
एै,रंग-------आज उसी देश में लड़के,
होटलो के बंद कमरो में--------------
इन लड़कियो के ब्वायफ्रेंन्ड हो गये।

###इस रचना को तर्क-वितर्क से दुर रख बस पढ़े क्योंकि ये जरुरी नही कि इससे सहमत ही हुआ जाय।

Friday, 14 August 2020

व्यंग्य---(हिन्दी दिवस के इमरान हाशमी )

व्यंग्य-- (हिन्दी दिवस के इमरान हाशमी)
ये हिन्दी साहित्य की--"चाटुकारिता का ओलंपिक युग चल रहा है". जिसके लिये ये चाटुकार महिनो--"अपनी हिन्दी का मेंटल रियाज करते है". उनकी सम्पूर्ण मेंटल रियाज के विशेष दिन का नाम ही हिन्दी दिवस है. "लेकिन ये विशेष दिन इनकी हिन्दी का बसंत नही,बल्कि इनके वर्ड लिट्रेचर का वेलेंटाइन-डे है"


ये हिन्दी दिवस के ऐसे तथाकथित--"शेक्सपियर है,जिन्हें शेक्सपियर का नाम तो लेना आता है लेकिन हिन्दी लिटरेचर की आत्मा को लहू-लूहान करके". ये सभी महंगे होटलो मे जुटते है, और बड़ी गहन वार्ता हिन्दी को लेके करते है, फिर दो-एक आर्टीफिशियल साँसे छोड़ते है तो यूँँ लगता है,कि जैसे-- "पूस की रात का हल्कू इनके महंगे सिगार में अपने तम्बाकू धुआं ढुढ़ रहा हो"

 उस मोटल में  बीच-बीच में बेयरा आकर इन्हे कोल्डड्रिंक और आइस क्यूब के साथ बिदेशी शराब के पैग थमाता रहता है,एंकर तो ऐसे ही लोगो में से कोई प्रकांड पर्सनैलिटी होती है,जो अपनी हिन्दी की चाटुकार भाषा का--"शब्द दर शब्द और भाव दर भाव अपनी भाषा के चेहरे पे शहनाज का मेकअप किये रहता है".

एंकर इन सभी के कद या पूँँजीपति होने के स्टैंडर के हिसाब से नाम ले इन्हें उस हिन्दी के स्टेज पे बुलाता है और ये हिन्दी के मूर्धन्य  साहित्यकार स्टेज की तरफ जाते समय अपनी टाई-सुट को सेट कर फिर बोलना शुरु करते है. इनके इस कन्फ्यूज ज्ञान से उस मोटल मे यूँँ लगता है कि ,जैसे "हिन्दी साहित्य की ग्राम्य बाला के पसीने की साहित्यिक महक जैसे एसी हाल के परफ्यूम ने छिन लिया हो".

सच तो ये है कि "ये सभी राइटर हिन्दी के इमरान हाशमी है, जिनकी बेवकूफियो की मेंटल स्टेज पे इनके समझ की कन्फ्यूज हिन्दी मल्लिका शेरावत की तरह कैटवॉक कर रही है".

ये सभी तथाकथित हिन्दी के इमरान हाशमी अपनी हिन्दी की लिट्रेचर लैग्वेंज  रुपी नालेज की रेव पार्टी में शब्दो का ड्रग्स, हसीस,कोकीन ले रहे है,इन्हें हिन्दी से कोई मतलब नही,क्योंकि हिन्दी मे इनकी बेवकूफी की इस अय्याश विद्वता को चैलेंज कर पाना संभव नही.इसी से इनकी ये रेव पार्टी पुर्णतः सफल है.ये जानते है कि कल हमी मे से कोई--"हिन्दी साहित्य व भाषा का सर्वोच्च राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त करेगा".
सच अब इन्ही जैसे इमरान हाशमी से हिन्दी अपने माँ बेटे का वात्सल्य नही अपितु लव,सेक्स और धोखा जी रही.ये कटु सत्य अगर कही से किसी को आहत या पीड़ित कर हो,तो वे भी ऐसी हिन्दी की रेव पार्टी से एक कश लगाये और आगे बढ़ जाये.



यह लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.

@@@लेखक---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758

लेख----(हिन्दी साहित्य यानि कृष्ण की विश्व-बांसुरी )

(हिन्दी साहित्य यानि कृष्ण की विश्व बाँसुरी)
आज हम और पुरी दुनिया जिस सुमधुर हिन्दी से जुड़े है या जिस हिन्दी साहित्य का रसास्वादन कर रहे है,उस हिन्दी ने एक अनवरत यात्रा तय की है.इसके तमाम समकालीन बेटो ने इस हिन्दी साहित्य को समृद्ध करने के लिये एक माँ की तरह इसकी सेवा की है.हालांकि इसके प्रथम प्रादुर्भाव की तमाम बाते और किवंदतियां है लेकिन कहते है कि--"इसके प्रथम पुत्र संत कवि गंगादास जी थे जिनका कालखंड(1823-1913) था".
जैसा कि सर्वविदित है और हम ये जानते भी है कि--"हिन्दी भारत ही नही अपितु विश्व मे सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं मे से एक है इसकी जड़े बहुत गहरी है". वैसे भी हिन्दी मे सर्व-प्रथम जैसा कि अध्यनोपरांत लगता है कि काव्य यानि कविता साहित्य का विकास हुआ,उसके बहुत बाद गद्य साहित्य का विकास हुआ. वे साहित्य काव्य चाहे संस्कृत मे रहा हो,चाहे मध्यकाल की व्रजभाषा, चाहे अवधी,मैथली मे रहा हो. चूँकि काव्य रसमय,सुमधुर और कर्णप्रिय होता था इसलिये ही शायद सर्वप्रथम हिन्दी मे काव्यशास्त्र का ही विकास हुआ.
वैसे बाद मे गद्य-साहित्य भी काफी समृद्ध व पुष्पित-पल्लवित हुआ.इस विधा मे भी तमाम श्रेष्ठ रचनाये लिखी गई चाहे वे नाट्यविधा हो,चाहे उपन्यास विधा.इसकी प्रमाणिकता सर्व-प्रथम जिस किताब से होती है वे उपन्यास साहित्य था,जोकि बाबू देवकीनंदन खत्री ने लिखा था. ये किताब रहस्य और तिलिस्म के ऐसे ताने-बाने मे लिखा गया कि लोग इस कथानक मे गहरे तक डुब गये. इसका एक ताजा और आधुनिक उदाहरण हम लोगो के सामने है--"जब बाबू देवकीनंदन खत्री के बहु प्रतिक्षित उपन्यास को टीबी सिरियल के रुप मे चन्द्रकान्ता के नाम से बनाया गया तो जितनी देर तक चन्द्रकान्ता सीरियल का समय होता था उतनी देर जैसे पुरा भारत ही एक अघोषित बंदी की चपेट मे हो".
वैसे तो हिन्दी साहित्य को कयी कालखंडों मे विभक्त कर ही समझा जा सकता है,जोकि एक वृहद वटवृक्ष की तरह हो जायेगा,फिर भी इसे और इसके बेटो का जिक्र या चर्चा किये बगैर लेख को थाम देना--"ये हिन्दी साहित्य के कत्ल सरीखा होगा जोकि न्यायोचित नही". इस लेख मे ऐसे कुछ महाश्रेष्ठ साहित्य पुत्रों की चर्चा करता हूँँ जोकि हिन्दी काव्य शास्त्र को असीम ऊँचाई दी जिसपे केवल हम,हमारा देश ही नही बल्कि पुरी दुनिया गर्व करती है उनमें से सर्व-प्रमुख नाम है.
सूरदास जी का जो अंधे और कृष्ण भक्ति शाखा के सर्वोत्कृष्ट और अमर कवि है इन्होंने वात्सल्य और विरह पे जो कुछ कहा पढा वे भारत ही नही अपितु पुरी दुनिया का दिल और आँख भिगो दे-----
मैया मोरी मै नही माखन खायो,
भोर भये गैयन के पाछे,मधुबन मोही पठायो-----
मैया मोरी मै नही माखन खायो.
चाहे गोपियों का विरह वर्णन हो------
कि उद्धव मन नही दस-बीस,
एक हुतौ सो गयो स्याम संग, जैसी अमर कृतियां अब यहा ही नही अपितु पुरी दुनिया मे दुर्लभ है.
कबीरदास--ये हिन्दी साहित्य के प्रथम बागी रचनाकार है,इनकी जनप्रियता अजर-अमर है ये एकलौते ऐसे कवि है जिन्हें देश का साक्षर व निरक्षर दोनो ही उतनी मस्ती से जानता व पहचानता है इन्होनें अपने समय की विसंगतियों पे प्रहार ही नही किया बल्कि ध्वस्त और धर्मान्धता पर खुला आक्रमण किया कुछ उदाहरण देखे----
1--कांकर-पाथर जोड़ के मस्जिद लिया बनाय,
ता चढ़ मुल्ला बाग दे------
का बहरी हुई खुदाय.
2--मुड-मुडाये हरि मिले,तो हर कोई लेय मुडाये,
बार-बार के मुडते भेड़ बैकुंठ न जाय।
या काशी मे स्वर्ग की परिकल्पना या फिर मगहर मे नर्क की परिकल्पना हो सब पे बराबर चोट व प्रहार किया-----
जो कबिरा काशी मरै तो रामही कौन निहोर.
आज उसी कबीर पे पुरी दुनिया शोध व रिसर्च कर रही जो की खुद कबीर पढे लिखे न थे.
ऐसे ही तमाम-तमाम नाम है "जिन्होंने हिन्दी को विश्व हिन्दी बना दिया" इनमे संत-कवि रैदास जी है जिनकी एक लाईन तो हमारे यहाँ किवंदती की तरह इस्तेमाल की जाती है अर्थात "मन चंगा तो कठौती मे गंगा". मीराबाई को भला कौन भुल सकता है जो साक्षात कृष्ण की प्रेम-दिवानी है "हेरी मै तो प्रेम दिवानी मेरा दर्द न जाने कोय".या फिर नरोत्तमदास जी का "सुदामा चरित" हो. इन सबो के अलावे एक बड़ा नाम हिन्दी साहित्य का है जिसे हम सब "रहिम खानखाना" के नाम से जानते है ये अकबर महान के नौरत्नों मे से एक श्रेष्ठ रत्न थे. इन्हे अरबी,उर्दू और हिन्दी का एक समान ग्यान था. कहते है कि इनके एक-एक दोहो मे दो-दो,तीन-तीन अर्थ निकलते थे-
रहिमन धागा प्रेम ना तोरो चटकाय,
जोरे से फिर ना जुरै,जुरै गाँठ परि जाय.
"आज पुरी दुनिया मे बाईबिल के बाद सबसे ज्यादा बिकने वाला कोई अमर काव्य ग्रंथ है तो वे है रामचरितमानस" जिसकी रचना हमारे देश के अमर कवि बाबा तुलसीदास जी ने की है कहते है कि इसे जितनी बार पढिये इसके फिर-फिर पढने की प्यास बढती जाती है सच तो ये है कि एक ये ही किताब सारी दुनिया को अपने मे बांध लेने की क्षमता रखता है.हिन्दी साहित्य विराट और काफी अलौकिक है.
हिन्दी साहित्य की ग्राह्यता का पुरी दुनिया मे कोई जवाब नही महाभारत, गीता सबकुछ तो है जिसको कम मे समेट पाना समुद्र को कटोरे मे भरने के समान है.हिन्दी साहित्य ने समय-समय पे हमारा मार्ग ही नही प्रशस्त किया बल्कि आवश्यकता पड़ने पर अपनी छाती ठोक कर अपने समय को ललकारा भी है. याद करिये "आनंद मठ" का वे वंदेमातरम जिसने ब्रिटिश हुकूमत की चुले हिला दी थी.
आज आधुनिक हिन्दी साहित्य मे तमाम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय लेखन हो रहा है हिन्दी और सुघर और समृद्ध होती जा रही है.हिन्दी आज दुनिया के सबसे सुमधुर भाषाओं मे से एक होता जा रहा है.मुझे गर्व है कि मै हिन्दी के ऐसे ही समृद्ध गाँव व देश मे जन्मा व पला बढ़ा. "मै हिन्दी को महज हिन्दी नही बल्कि कृष्ण के अधर की विश्व बाँसुरी कहता हूँ".
वे पनघट------
वे राधा के पाँव की हिन्दी,
मै आज भी नही भुला ऐ "रंग' नीम के छाँव,
और वे अपने गाँव की हिन्दी.

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर
जिला---जौनपुर pin.no.222002 (उत्तर-प्रदेश).
Mo.no.7800824758

यह लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.

Tuesday, 4 August 2020

कविता---(मील का सायरन )

( मील का सायरन) 
मील का सायरन बजा है----------
शायद आज फिर किसी मील के मजदूर को, 
घर पे भूखे बच्चो की रोटी, 
और बीमार बीबी की दवा ने, 
असमय ही इसे मार दिया है. 
रोज लौटता था थका-मांदा,
फिर उसके लौटने के थोड़ी देर बाद, 
घर से-----------
ईधन के जलने का धुआँ उठता था, 
वे धुआँ ------------
जो उसकी बीमार बीबी के साँसो मे घुसते ही, 
उसके न थमने वाली खाँसी मे बदल जाती. 
आज न लौटेगा-----------
तकते--तकते जब इनकी आँखें थक जायेंगी, 
तो इस मजदूरे की बीमार बीबी, 
किसी बच्चे को भेजेगी,
अपने बापू का पता करने, 
फिर कुछ मील के मजदूर मिलके उसकी लाश लायेंगें, 
रोना-पीटना होगा कुलबुलाते खाली पेट. 
फिर अल-सुबह रोज की तरह बजेगा----
मील का सायरन, 
इन्हीं मे से कोई निकलेगा जाने के लिये, 
क्योकि इनकी जिंदगी है एै "रंग"
यही मौत और बजता हुआ मील का सायरन. 

@@@रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी. 
जज कालोनी, मियाँपुर 
जिला---जौनपुर पिन नं.  222002 ( उत्तर-प्रदेश)
Mo.no.----7800824758
यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है ।

Monday, 3 August 2020

कविता----(गीतों का सर्कस )

( गोपालदास नीरज के गीतो का सर्कस) 
नीरज ने मेरा नाम जोकर लिखा था, 
लोग आते रहे, लोग जाते रहे
अँधेरा--उजाला होता रहा, 
ये सर्कस सा जीवन--------
कभी इस शहर, कभी उस शहर चलता रहा. 
कोई बसा, कोई ठहरा कुछ ही दिन, 
फिर चल पड़ा ,
सर्कस ही सर्कस चारो तरफ, शहर दर शहर 
वे सिनेमा का सर्कस 
ये जीवन का सर्कस, जोकर के आँसू भी 
एक तमाशा, 
वे जोकर थे नीरज जो हँसे और रोये,
कभी खाली तो कभी भरी पेट सोये,
फिर थिएटर भरा और तमाशा हुआ, 
खाली हुआ फिर एक दिन-------
वे देखो चला दुनिया को छोड़े कोई नीरज नही,
गीतो का अपने वे राजू जोकर. 

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी. 
जज कालोनी, मियाँपुर 
जिला---जौनपुर पिन नं. --222002 (उत्तर-प्रदेश)
मो. नं. --7800824758.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है. 
महा-गीत पुरूष को हमारा प्रणाम ।

Sunday, 2 August 2020

हास्य-व्यंग्य---(म्हारी लुगाई खो गई )

हास्य-व्यंग्य ----------
(म्हारी लुगाई खो गई )
दरोगा साहब-------
म्हारी रिपोट लिख ल्यो,
की म्हारी लुगाई खो गई.
ससुरे दरोगा ने-------
म्हारी रिपोट लिखणे से मना कर दियो,
पट्ठे ने रिपोट न लिखणे का जैसे------
खुटा गाड दियो.
मैणे कहा की आप म्हारी रिपोट,
लिखते क्यू नही?
तो उसणे अपणी थूथण लटका,
के म्हारे से पुछ्या,
कि ये बता थारी शादी हुये कितने साल भयो,
तो मैणे कहा की चौदा साल,
तो वे बोल्या चिंता न करो,
वे कुछ ही दिन मे खुद ही लौट आवेगी,
और थारी छाती पे ससुरी मूँग दल्येगी .
क्योकि ------
म्हारी भी लुगाई ऐसे ही थारी तरह खोई थी,
मै बहुत खुश थ्या.
लेकिन एक दिन घर पहुँचा तो देख्या,
कि वे ससुरी अपणे खूसट बाप के,
दिये पलंग पे किसी डायण सी सोई थी.
तबसे बीसो केस इस म्हारे थाणे पे आयो,
वे सारे बेवकूफ मण-ही-मण बहुत खुश थे,
कि उणकी लुगाई खो गई.
बाद मे घर जाणे पे,
वे म्हारे इस थाणे पे नही लौटे,
इसका मतलब तु जाणे है,
कि उणको भी म्हारी तरह खुद ही,
बिना खोजे लुगाई मिल गई,
जा भाई--------
थारी लुगाई भी इसी तरह से मिल जावेगी.

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर
जिला---जौनपुर पी. नं--222002 (उत्तर--प्रदेश).
मो.नं.----7800824758.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

लघुकथा---(चितचोर )

लघुकथा----(चितचोर )

हां आनंद मेरा चितचोर ही तो था, जो--"धीरे-धीरे मुझे चुराता रहा और मैं चोरी होती रही". उसके बात करने की कशिश, चलने का अंदाज सब कुछ मुझे मंत्रमुग्ध कर देता. 

मैं उसकीआगोश में घंटो-घंटो तक खोई रहती शाम धुंधला कर कब रात होने की तरफ बढ़ने का इशारा कर देती मुझे यह भी तभी पता चलता जब आनंद मुझे अपनी आगोश से अलग कर यह कहता कि चलो अब काफी शाम हो गई आओ अब घर चलते हैं तब मुझे न जाने क्यों शाम के इतनी जल्दी ढल जाने और उसके गहराने से चिढ़ होती. 


मैं और आनंद हरदिन रेत पर घर बनाते उन्हें सजाते लेकिन कोई ना कोई समंदर की एक तेज लहर ना सिर्फ उस- "रेत के घर को बहा ले जाती बल्कि उसके निशानात  को भी मिटा देती थी'.

तब शायद सपनों के घर के टूटने का वे दर्द उस तरह चेहरे पर नहीं दिखता था, जैसा कि आज मेरी चेहरे पर दिख रहा है. क्योंकि उन दिनों मुझे और आनंद को यह अच्छे से पता था कि कल फिर हम इसी तरह मिलके एक नये रेत का घर बना लेंगे. 

लेकिन उस रेत के घर के--"टूटने के पीछे की जो हकीकत थी उससे हमें समंदर की लहरें आगाह करती थी". जिसे मैं नासमझ तब समझी जब सब कुछ मेरा तबाह व बर्बाद हो गया. 

यानी मेरे चितचोर आनंद ने एक दिन मेरा वह भी चुरा लिया जिसे कि मुझे हरगिज भी नहीं चोरी होने देना चाहिए था उस चोरी के दाग को यह दुनिया आज भी माफ नहीं करती. 

लेकिन उन दिनों मैं आनंद के प्यार में इतनी अंधी व पागल थी कि मुझे आनंद के सिवा कुछ ना दिखता था और ना ही समझ में आता था मैं आज उसी चितचोर की चुराई दुश्वारियां जी रही हूं. आनंद मेरी जिस्मानी चोरी के बाद फिर नहीं लौटा मैं बस केवल उसका इंतजार करती रही. 

लेकिन यह इंतजार भी मैं कब तलक करती क्योंकि उसकी चोरी का अंश अब तलक मेरे पेट में पांव पसारने लगा था और धीरे-धीरे वे 3 महीने से ज्यादा का हो गया लोगों ने कानाफूसी शुरू कर दी और इस कानाफूसी का मैं विरोध भी नहीं कर पाई करती भी कैसे मैं उनके सवालों के क्या जवाब देती? अतः आनंद के बच्चे को जन्म दे मैं हमेशा के लिए वे शहर वह अपना घर बार छोड़ आई.

आज मैं एक अजनबी और अनजान शहर में जीने के लिए संघर्ष कर रही, बहुत ढूंढने के बाद बमुश्किल एक प्राइवेट ऑफिस में क्लर्क की नौकरी मिल गई है जिससे मेरा और मेरे मासूम बच्चे का जीवन चल रहा.

आज ऑफिस से लौटते समय अचानक मेरी नजर  चितचोर आनंद पर पड़ गई वे एक नई और खूबसूरत लड़की के साथ खिलखिला कर हंसता हुआ बाहों में बाहें डाले चला जा रहा था, मैं समझ गई कि यह लड़की भी अब आनंद के चितचोर वाले धोखे से बच नहीं पाएगी यानी इस लड़की का नसीब भी इसे किसी अजनबी या अनजान शहर की तरह धीरे-धीरे ले जा रही.


यह लघुकथा मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है. 

लेखक---रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin. no.222002 (U P)
Mo.no.7800824758

Friday, 31 July 2020

कविता---(दीवाना रोया है )

(दिवाना रोया है)
ये जो सारी रात------------
शहर मे बरसात हुई है,
कही किसी की याद मे----
कोई दिवाना रोया है।
ये बिजली,ये चमक--------
किसी बंद हवेली के जले चराग से,
लिपट------------------
आखरी लम्हे कोई परवाना रोया है।
कल सहर के बाद--------------
निकल के देखना तुम आलमे बारिश,
एक हमी है जो जानेगे,
कि कल सारी रात तड़प के----
किसी का अफसाना रोया है।
ये जो सारी रात--------------
शहर मे बरसात हुई है,
एै,रंग------किसी की याद मे,
कोई दिवाना रोया है।

Wednesday, 29 July 2020

कविता---(देवता कौन है? )

(देवता कौन है?)
अधर पे गलिज़गी है सबके---------
तो फिर इस शहर मे देवता कौन है?।
खामि अय्यासपन की तकती है जवान लड़की,
आखिर बताओ----------
तुम्हारे घर की जवान लड़की को तकता कौन है?।
अधर पे गलिज़गी है सबके--------
तो फिर इस शहर मे देवता कौन है?।
गरीब क्या जाने,हदीस,तकरीर,मज़हब,
वे रोटी की खातिर--------
मजदूरी मंदिर और मस्जिद दोनो मे कर रहा है,
आखिर इन्हें----------
हिन्दू  और मुसलमान कहता कौन है?।
अधर पे गलिज़गी है सबके--------
तो फिर इस शहर मे देवता कौन है?।
हर दंगे मे जलते है घर तबाह होती है बस्तियाँ,
इन घरो मे तो जिंदा इंसान रहते है,
एै "रंग" बताओ तुम्हें गीता और कुरान की कसम,
कि आखिर-----------
इस मंदिर और मस्जिद मे रहता कौन है?।
अधर पे गलिज़गी है सबके---------
तो फिर इस शहर मे देवता कौन है?।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-------7800824758

लेख----(दुसरा पाकिस्तान पनप रहा है )

एक स्वतंत्र लेख-----------
                      ( दुसरा पाकिस्तान पनप रहा है)
ये लिखते मेरी अंगुलियाँँ लरज रही है,एक झुरझुरी, एक कपकपाहट सी हो रही है कि--"हमारे देश मे एक दुसरा पाकिस्तान पनप रहा है". इसके तमाम विरवे आज देश के हर राज्य मे पुष्पित व पल्लवित हो रहे,ये विष की बेलरी जिस दिन कत्लेआम पे उतरी वे पल बड़ा ही भयावह होगा, ये अंदेशा मेरा हाल-फिलहाल एक पागल-प्रलाप भर लगे लेकिन इसके मूल मे एक डर-एक भय है.
आज देश को एक बडे़ आंदोलन और जन-जागरूकता की आवश्यकता है,इसके लिये मुस्लिम और हिन्दू दोनो कौमो के आलिम और फाजिल लोगो को पहल करनी होगी, हर महिने मे कम से कम दो-दो मिटिंगे इन्हे अपनी-अपनी बस्तियों या कस्बो मे एक दुसरे को बुलाके करनी होगी, ,"और बारुद के ढ़ेर की तरफ जा रहे अधिसंख्य मुस्लिम नौजवानो को रोकना होगा इन्हें मुहब्बत के तराने की तरफ लाना होगा"
हालांकि मैने राजनीति पे कभी देश को विखंडित करती या आहत करती टिप्पणियाँ नही की लेकिन संपूर्ण अवलोकनोपरांत ये पाया है कि देश मे सत्ता सुख की ख़ातिर वे--"वे सभी कुछ हुआ जो की नही होना चाहिये था". शायद जिन्नी और नेहरू का आजादी के बाद की महत्वाकांक्षा ने--"इस देश के सीने पे कुछ बेगुनाह लोगो की लाश बिछाई और प्रधानमंत्री की कुर्सी का रक्त ऋृंगार किया".
काश देश के बंटवारे के समय ही एक स्पष्ट निर्णय ले लिया गया होता तो दोनो देश को इस कैंसर से मुक्ति मिल जाति. "इस देश मे झूठे भाषण, झूठे प्रलाप, घड़ियाली आँसू के इतने अदाकार हुये कि उस स्तर के अदाकार सिनेमा मे भी नही हुये". देश के बंटवारे के समय जो संख्या पाकिस्तान मे हिन्दूओ की थी वे आज खत्म होने की कगार पर है. 
"और हमारे यहाँ मुसलमानों को पाकिस्तान के मुसलमानों से भी कही ज्यादा उर्वरा धरती मुहैया कराई गई ,इनकी न मानने वाली बातो का भी राजनैतिक पोषण हुआ". ये जिस तरह रहना चाहे हमेशा रहे. जरूरत पड़ी तो यहां के कानून को भी धत्ता बताया. तमाम हिन्दू आस्थाओ को तोड़ने वाले आक्रांता को हिरो मानने वाले मुसलमान कभी पहल करते नही दिखा कि---" पौराणिक काल से करोड़ो-करोड़ हिन्दूओ की आस्था के राम आज इनके वादी होने से टेंट में पड़े हैं ". कोई पहल नही सच ये देश की राजनैतिक नपुंसकता और अपने ही देश के चंद होनहार गद्दार की बानगी नही तो क्या है?. 
सच तो ये है कि इस देश का मुसलमान कुछ को छोड़--" दो-मूँहे साँप सा जी रहा, इन्हें जिस दिन भी ये भान हुआ या ये उस हद तक सच्छम हुये तो निश्चित जानिये कि--" हिन्दुस्तान एक इस्लामिक राष्ट्र होगा". ये लोग बेशक तथाकथित खुद को सेकुलर कहने वाले को बुरा लगे लेकिन--" मै उन बुरा लगने वालो के डर से मै आने वाले वहशी दौर की परिकल्पना से मुकर नही सकता".
हमें बताये उत्तर दिजिये क्या आप भारत या हिन्दुस्तान के है? नही अगर होते तो--" जे. एन. यू  से ये आवाज़ न आती कि--भारत तेरा टुकड़े होंगे, हम लड़के लेंगे आजादी ,तुम जितने अफ़जल मारोगे, हर घर से अफ़जल निकलेगा" . मदरसो के हालात भी इतर नही--"हरे चाँद तारे वाले पाकिस्तानि झंडे को इस्लामिक झंडे का नाम दे सगर्व फहराया जा रहा और उसपे तुर्रा ये कि सरकारे बाकायदा इन्हें आर्थिक खाद-पानी दे भरपूर लह-लहाने का मौका दे रही". ये इतने बड़े मुल्क मे रहते हुये भी--" आज तक यहाँ के राष्ट्रगान तक को नही स्वीकार पाये है जबकि राष्ट्रगान किसी सिनेमा का गीत नही अपितु हमारा राष्ट्र-गौरव है". हमने अक्सर इनके मुशायरा मे कुछ को राष्ट्र-विरोधी गज़लो को तरन्नुम मे पढ़ते सुना है. बकायदा इतने बड़े लोकतंत्र के चुने हुये प्रधानमंत्री को ममता बनर्जी के तथाकथित मुस्लिम बंगाल से एक मुस्लिम मौलाना को---" म्यानमार से भा भागकर  आये हुये रोहिग्यांओ के लिये ये कहते देखा व सुना है कि दुनिया का कोई भी मुसलमान, मुसलमान पहले है, वे उनके अपने है, उनका हमारा कुरान अपना है, नरेन्द्र मोदी ये जान ले अगर इन रोहिग्यांओ के साथ कुछ हुआ तो खून की नदी बह जायेगी ". जबकि देश विरोधी कुछ कार्यो मे हमारे इंटेलिजेंस ने इनके शामिल होने की आशंका जगाई है. पुरी दुनिया पहले अपने मुल्क की बात करती है तब कही उसके बाद धर्म की. जबकि पुरी दुनियां मे मुसलमान एक कौम है जो पहले अपने धर्म और मज़हब की बात करता है. 
मुसलमान अगर इस देश का होता तो यहाँ की जम्मूरियत और मोहब्बत कब की सीख लेता और अपने ही मज़हब की एक बेगुनाह औरत--" निदा खान को उसके शौहर के द्वारा दिये गये बेजा तलाक का समर्थन न करती, उसे हलाला जैसे दुष्कर्म को न कहा जाता, उसके खिलाफ एक टुच्चा मौलवी ये फतवा कभी जारी न करता कि निदा के बीमार होने पर कोई दवा या पानी न दे, कोई भी उससे किसी तरह का रिश्ता न पंखे, उसका सर मूँड़ा दिया जाये, उसके चप्पलो से पिटा जाये और उसको मारने वाले को इतनी रकम दी जाये, उसे इस देश से निकाल दिया जाये ये सब यहाँ के मुकम्मल नागरिक होने के लच्छण तो नही. 
आखिर ये देश कब तलक एक कलाम और अब्दुल बन्द के तराने गायेगा (हाँ यहाँ मै ये जरूर लिखता हूँ कि ये दोनो महापुरुष मुकम्मल हिन्दुस्तान हैं  ). इतिहास गवाह है कि अगर गलत मानसिकता को समय से न कुचला  जाये तो--" आने वाली नस्ले उसकी किमत चुकाती है, कास कांग्रेसी हुकूमत ने पुरी बर्बरता के साथ गलत और बेजा मुस्लिम मांगो को इसके शैशवकाल मे ही कुचल दिया होता तो ठीक था".
"आज "राज-तरंगिणी" जैसे साहित्य, केशर और गुलाब की खुशबू, सेब के बाद, डलझील-शिकारे सी खूबसूरती का राज्य कश्मीर--अपनी साँस मे बारूद की बू लिये है". अलगाववादी वहाँ की दशा और दिशा तय कर रहे, उनके ऊपर करोड़ो-अरबो खर्च हो रहा और हासिल क्या है? आतंकवादी-पत्थरबाज हमारे छुट्टी पे गये जवानो को अगवा कर कत्ल करना. कश्मीरी पंडितो का आज इतने सालो से भयावह, यातनामय शरणार्थियो की तरह जीवन, सरकार कोई भी हो लेकिन--"मैने हमेशा कश्मीर के नाम पे महज अपने यहाँ की सत्ता को नपुंसक होते देखा है ".
सच पुरी दुनियां मे इस्लाम कत्ल, कत्ल और बस कत्ल का एक मज़हब बनके रह गया है. उफ! रोंगटे खड़े हो जाते है. जब कही दो सौ, तीन 
सौ बेगुनाह लोग ,आतंकवादी विस्फोट मे मारे जाते है. ये इन आतंकवादियो के जन्नत मे मिलनेवाला हीरो का कौन सा नशा है अल्लाह जाने. अब अपने देश भारत मे भी पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगते है, झंडा तक फहराया जाता है, आई. यस. आई. यस. जैसी आतंकी संगठन के लोग पकड़े जा रहे. आखिर ये कौन है? मुसलमान, खलिफा, इस्लाम के ही माननेवाले लोग न तो फिर क्यू? ये बात हमेशा इतने रटे-रटाये से वाक्य मे खत्म कर दी जाती है कि--"आतंक का कोई मजहब नही होता ". सच तो ये है कि --" सावधान! जाने-अंजाने मे हमारे आस-पास हमारे ही मुल्क मे एक दुसरा पाकिस्तान पनप रहा है".

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी. 
जज कालोनी, मियाँपुर.
जिला---जौनपुर, पिन नं. 222002 (उत्तर -प्रदेश). 
मो.नं.----7800824758.

यह लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है. 
इस लेख का मक़सद किसी के प्रभावित होने से नही है इसे एक लेख के नजरिये मात्र से पढ़े.

Sunday, 26 July 2020

कविता--(कारगिल रह गया )

(करगिल रह गया)
सरहद से नही लौटा----------
एक नई दुल्हन का वही दिल रह गया,
सीने पे थे गोलियो के निशान,
उसकी खुली आँखो मे---------
लहराता तिरंगा और करगिल रह गया।
माँ भुलती नही जार-जार रोती है,
उसे गम नही------------------
अपने एकलौते बेटे की शहादत का,
उसे गम है कि सरहद के उस तरफ,
तमाम साँप------------------
और उन साँपो का बील रह गया।
राखी के दिन बहन उसकी--------
बंद कमरे मे सुनती है राष्ट्रगान,
और फक्र करती है उस भाई पे एै,रंग----
जिसके नाते
हिंद के नक्शे में करगिल रह गया।
###करगिल के तमाम शहीदो को एक श्रद्धांजलि।

Saturday, 25 July 2020

कविता---(माँ )

(माँ)
तेरा हर बेटा मुल्क की खातिर-------
यूं शहीद और कुर्बान हो माँ!
ना बटने दे किसी को मजहब के नाम पे,
समय से पूजा समय से अजा़न हो माँ।
फक्र हो तुम्हे अपने आँचल और दूध पे,
तेरी लोरी में राष्ट्र हो और राष्ट्रगान हो माँ।
ना पंजाब,ना गुजरात,ना महाराष्ट्र निकले,
आखिरी लम्हें गर लब भी फड़फड़ाये,
तो लब पे तुम और हिन्दुस्तान हो माँ।
गर सुपुर्द-ऐ-खाक होने लगू,
तो मुट्ठी में मुल्क की मिट्टी-------
और डालने वाले के होंठो पे मुस्कान हो माँ।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
एडवोकेट कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
###आप सभी को हमारे मुल्क की ये आजाद सुबह मुबारक हो।

Thursday, 23 July 2020

व्यंग्य----(राहुल गाँधी का सदन में भूकंप )

व्यंग्य----------
          (राहुल गाँधी का सदन मे भुकंप)
हालाँकि राहुल गाँधी ने ये बयान बहुत पहले से ही दे रंखा था कि--"अगर मै सदन मे इतने मिनट बोल दु तो पुरे सदन मे भुकंप आ जायेगा",और वाकई वे ऐतिहासिक कारनामा काग्रेंस के राहुल गाँधी ने कर दिखाया. भारतिय स्वतंत्रता के बाद मेरी जानकारी मे कभी भी--"इतने बड़े देश के सदन मे इतना भयंकर और भिषण भुकंप नही आया".
और भुकंप भी ऐसा आया कि--"काग्रेंस खुद अपने ही रिऐक्टर पैमाने पर इसकी तीव्रता का आकलन नही कर पा रही". इसके चपेट का आलम ये था कि--खुद प्रधानमंत्री मोदी इस सुंदर और कलात्मक भुकंप को काफी देर तलक समझ नही पाये और जब तलक समझ आया तब तलक--"काग्रेंस के भुकंप यानी आदरणीय राहुल गाँधी अपना काम कर चुके थे".
                         बेबाकी तो उनकी पुरे सदन मे देखते बन रही थी खुद को पप्पू तलक कहते हुये भी उनके चेहरे पे कही से भी जारा सा सिकन नही था,लेकिन अब बेचारे राहुल करते भी तो क्या? खुद अपने ही मुखारबिंद से पप्पू कह बैठे तो उस शब्द की गरिमा का भी ध्यान रखना था अतः इसी शब्द को प्रमाणित करने हेतु वे अचानक से उठे बीना किसी तरह के आव-ताव देखे--"झट प्रधानमंत्री के गले लग पड़े और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी खुद को इस अप्रत्याशित भुकंप से बचा नही पाये".
जब थोड़ा सा इस गले आ पड़े भुकंप से राहत मिली तो पुनः प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने--"बड़े आदर से इस काग्रेंस के भुकंप से हाथ मिला कर जोशो-खरोश के साथ राहुल की पीठ थपथपाई".
ये भुकंप फिर बड़ी अदा से अपनी उस सीट की तरफ बढ़ा जिसपे बैठ उसने इतने बड़े सदन की गरिमा को अपनी हरकत से चार चाँद लगाया था. मैने भी जिंदगी मे पहली बार एक विपक्ष व राष्ट्रीय पार्टी के सर्वेसर्वा को इतने जाँलि मुड मे देखा सच क्या वे पल था--"कि अभी तलक वे भुकंप का झटका खुद मुझे महसूस हो रहा".
उनके वे आँख मारने की अदा ने--सदन को बेशक शर्मिंदा किया हो पर कालेज के उन छात्र व छात्राओं को जैसे--"उन्होंने रिवाइटल की गोली दे दी हो". उफ! कितना कौमार्य था उनके आँख मारने की उस अदा मे ये वे भुकंप है जिसकी चपेट मे आये व्यक्ति का जीवन धन्य होता है. राहुल गाँधी को मै प्रधानमंत्री होने की तो अभी नही पर---"हा मै विवाह के एक पहुँचे हुये नास्त्रेदमस की तरह ये भविष्यवाणी जरुर करता हूँ कि इनके मानसिक व शारिरीक भुकंप को सह पाने वाली एक अदद पत्नी की आवश्यकता है".
अब हालाँँकि राहुल गाँधी के इस भुकंप की राजनैतिक गलियारे मे लोकसभा चुनाव तक चर्चा व परिचर्चा होगी तमाम प्रिंट मिडिया और इलेक्ट्रॉनिक मिडिया --"अपने-अपने टीआरपी के लिहाज से भुकंप के इस मोमोज को विथ चटनी परोसेंगे पर राहुल की मुन्नाभाई वाली झप्पी इनमे हमेशा इतर रहेगी".

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर
जौनपुर---222002 (उत्तर-प्रदेश).
Mo.no.---7800824758.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

Wednesday, 22 July 2020

कविता---(सखी हे रे बदरवा )

तन मन भिगोये सखी हे रे बदरवा,
करे छेड़खानी सखी छेड़े बदरवा।

सिहर-सिहर जाऊँ शरमाऊँ इत-उत,
मोहे पिया की तरह सखी घेरे बदरवा,
तन मन भिगोये सखी हे रे बदरवा।

चुम्बन पे चुम्बन की है झड़ी,
बुँद-बुँद चुम्बन सखी ले रे बदरवा,
तन मन भिगोये सखी हे रे बदरवा।

अँखियो को खोलु अँखियो को मुँदू,
जैसे मेरी अँखियो में कुछ सखी हे रे बदरवा,
तन मन भिगोये सखी हे रे बदरवा।

मेरी यौवन का आँचल छत पे गिरा,
मेरी रुप का पढ़े मेघदुतम सखी हे रे बदरवा,
तन मन भिगोये सखी हे रे बदरवा।

###हिन्दी प्रतिलिपि में इस रचना को प्रकाशित 
करने के लिये मै विणा वत्सल सिंह जी का तहेदिल से शुक्रगुजार हूँ।

Monday, 20 July 2020

(चरागों की रात )

(चरागो की रात)
लफ्ज़ो की नदी मे घिर गयी है किश्ती,
मै कहां ढुंढु!है कहां किनारो की रात।
ना कोई दर,ना ठौर,ना ठिकाना,
कैसे लिखूँ कि कहां गुजरी है मेरी बहारो की रात।
महकते फूलो की खुशबू ना राश आ रही,
कितनी मनहुस लग रही है-----
चमकते सितारे की रात।
एक सील-सीला लिये है गम जो,
ना खत्म हो रहा-------
कैसे लिखूँ बजती बाँसुरी और पहाड़ो की रात।
वे कहकशे,वे शायरो की महफ़िल छीन गयी,
अब याद है बस कुछ मुशायरे की रात।
तु लौट आ ऐ दिल उस आसमाँ से------
तेरे इंतज़ार मे है किसी के चरागो की रात।

@@मरहूम नीरज साहब को अपनी मौसकी का एक सलाम।

Wednesday, 15 July 2020

कविता---(पन्द्रह अगस्त )

(पन्द्रह अगस्त)
एक माँ----------------
अपने दुध-मुँहे बच्चे का पेट भरने के लिये,
लूट के आई है अस्त-ब्यस्त,
क्या?एैसे ही देश मे-----------
हम मनाते है पन्द्रह अगस्त।
फिर रहा युवा--------------
डिग्रीयो की लाश लिये काँधो पे,
माँ बहन की आबरु चिथड़ो में लिपटी है,
बाप टी बी से खाँस रहा,
कहां है इनका वंदेमातरम,
कहां है इनका पन्द्रह अगस्त।
देश के रहनुमा वे है,
जिन्हे मादरे-तमीज़ तक नही,
फहरा के लौटे तिरंगा---------
बंद कमरे में खुली शराब की बोतल,
बगल में सोफे पे गिरी गाँधी टोपी,
अस्त-ब्यस्त खद्दर की धोती,
वाह!क्या खुब क्रांति है,
ये है वर्तमान भगत सिंह-----
और इनका है पन्द्रह अगस्त।

###पन्द्रह अगस्त के प्रकाशनार्थ पत्रिका में छपने हेतु भेजी गई एक रचना।

कविता----(शराब नही लेकिन )

(शराब नही लेकिन)
तेरी सरिया मे शराब नहीं लेकिन-----------
हम पीने वालो के लिये खराब नही लेकिन।
हम बाँट लेते है अक्सर नशे मे जूठन भी-----
यहाँ के पंडित और मियाँ का जवाब नही लेकिन,
तेरी सरिया मे शराब नही लेकिन।
ना वे गीता जानता है और न मै कुरान की आयत,
जबकि उसका घर मंदिर की तरफ है,
और मेरा घर मस्जिद की तरफ है,
हमारे लिये जुम़ा और मंगलवार एक सा है,
हम पीते है,किसी दिन का हमारे पास एै"रंग"-----
कोई हिसाब नही लेकिन।
तेरी सरिया मे शराब नही लेकिन,
हम पीने वालो के लिये खराब नही लेकिन----
तेरी सरिया मे शराब नही लेकिन।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.----7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

कविता---(फिर घिरे आज बादल )

(फिर घिरे आज बादल)
सारे शहर में फिरे आज बादल,
तुम्हे देखकर फिर घिरे आज बादल।
है तेरी हुस्न के ये बादल भी मारे,
ये जाना सनम--------------
जब तुम्हे चुमने की हसरत लिये,
आपस मे ही खुद भिड़े आज बादल।
सारे शहर में फिरे आज बादल,
तुम्हे देखकर फिर घिरे आज बादल।
मांगा सभी ने पानी मगर,
ना सुनी बादलो ने-------
किसी की दुआ!
वे तो तुम थी हमारे शहर में सनम,
जो बूँद बनकर ज़मी पे गिरे आज बादल।
सारे शहर में फिरे आज बादल,
तुम्हे देखकर फिर घिरे आज बादल।

###हमारे शहर में आज लगातार बादल घेरे हुये है अब बरसात कितनी होती है ये बात की बात है।

Monday, 13 July 2020

कविता----(मेरी कविता की बुढ़िया )

(मेरी कविता की बुढ़िया)
मेरी कविता की बुढ़िया उदास है,
विदेश मे रहते है इसके बेटे और बहु,
इसका पुरा मकान खाली है।
वे देखो आँगन और सुखी तुलसी,
और किनारे खड़ी----------------
बिल्कुल बुढ़िया के दिल की तरह,
टुटी चारपाई,
जिसपे वे ठंड के दिनो मे,
गुनगुनी धूप मे सरसो के तेल की,
घंटो बेटे की किया करती थी मालिश,
आज उसी तेल की कटोरी में,
उसके वात्सल्य का अरमान खाली है।
वे देख रही है एकटक------------
दिवाल पे टंगी अपने बेटे के बापु की,
वे धूल भरी फोटो!
फिर बुदबुदा के लौटती है बीना रोये,
जैसे पढ़ लेगे फोटो से ही,उसके बापु
उसका दर्द उसकी पिड़ा!
आँखो में उसके अब तुफान खाली है।
अभी पिछले ही दिनो,
मेरी कविता की ये बुढ़िया बिमार हुई है,
अब न बचेगी!
इसकी हिचकियाँ और बार-बार
दरवाजे की तरफ तकना,
वही हुआ बुढ़िया मर गई,
मेरी कविता तो पुरी हो गई,
पर उसके विदेशी बेटे और बहु नही आये,
जहाज़े आती और जाती रही,
एै,रंग------फिर भी हर ऐयरपोर्ट पे,
मेरी कविता की बुढ़िया उदास खड़ी है।

###मेैने ये रचना कमेंट और टिप्पणी के लिये नही लिखी है इसे कमही लोग पढ़े पर पुरी रचना पढ़े इसका लास्ट इस रचना का प्राण है ये बिदेश मे रह रहे उन तमाम बेटे और बहुओ के ऐहसास के उस मौत से है,जहाँ पर मेरी कविता की ये बुढ़िया अर्थात एक माँ का वात्सल्य दरवाजे पे मुँदती हुई अपनी आँखो से एक मर्तबा बस बेटे को देख भर पाने का मोह लिये दुनिया छोड़ देती है,ये मेरे लेखन की एक सदा है या मालिक ये सदा 
गर इस तरह के एक बेटे के कान तलक भी गई तो मै समझुगा की ये मेरी इस रचना की पुर्णता हुई।

Thursday, 2 July 2020

कविता---(पहला सावन था )

(पहला सावन था)
जब तुम भीगे थे,मै भीगी थी
वे पहला सावन था।
सिहर के तेरे सीने से,
शर्मा के लिपटी थी
वे तेरी बाँहो का,मेरी बाँहो से-----
पहला सावन था।
तुमने होंठो पे रंखा था,होंठ मेरे
वे तेरी होंठो का,मेरी होंठो पे-----
पहला सावन था।
तुम बूँद-बूँद भीगे थे,
मै साँस-साँस भीगी थी----
वे तेरी साँसो का,मेरी साँसो से
पहला सावन था।
जब तुम भीगे थे,मै भीगी थी------
वे पहला सावन था।

###आज हमारे शहर के बरसात की रोमानियत है ये।

Wednesday, 1 July 2020

कविता--(आखिरी सेल्फी )

(आखिरी सेल्फी)
तुम्हे-------------
कहा था कई मर्तबा,
पर तुम माने कहां,
रोज खिचते रहे-------
हमारी और अपनी निजी पलो की सेल्फी।
आज वे सभी शहर में वायरल हो गये,
मै नंगी गुजर रही हूँ सड़क से,
हर भूखी आँख देख रही है जैसे,
तुम्हारे द्वारा ली गई-------------
सहवास के पलो की वे सारी सेल्फी।
काश तुम मान गये होते!
तो आज ख़ुदकुशी न करती,
और न छोड़ती अपने सिरहाने,
तुम्हारे लिये मै-----------
अपनी आखिरी सेल्फी।
देखना ता उम्र-----------
अपनी डबडबाई आँखो से,
मै तुम्हारे बहुत पास रहुँगी,
कभी डिलिट नही होगी तुम्हारी जेहन से,
ये हमारी आखिरी सेल्फी।

###आधुनिकता नितांत आवश्यक है पर आजकल कुछ घटनाये रोंगटे खड़ी कर दे रही है सेल्फी के द्वारा हमने एक भाव व्यक्त किया है,मेरा उद्देश्य किसी का समर्थन या विरोध नही है,धन्यवाद।

Sunday, 28 June 2020

व्यंग्य---(मै खूबसूरत व स्मार्ट हूँ )


व्यंग्य-----(मै खूबसूरत व स्मार्ट हूँ )

"मैं जन्म से ही वेस्टइंडीज के बच्चों और नागरिकों से ज्यादा खूबसूरत व स्मार्ट हूं". बचपन में तो कॉलोनी की कुछ एक चालाक माँये अपने रोते हुए बच्चे के सामने जब मेरा नाम ले लेती थी तो उनके रोते हुए बच्चो पे मेरे नाम का इतना--"काला जादू की तरह असर होता कि वे सक- पकाकर ना केवल चुप हो जाते थे अपितु यू थरथरा कर कांपने लगते थे जैसे किसी कमजोर दिल के आदमी ने राम से ब्रदर कि कोई बहुत ही डरावनी फिल्म देख ली हो". 

 इसी तरह की एक घटना से मेरी पत्नी भी दो-चार हुई थी जिसको याद करके आज भी मेरी पत्नी को--"हल्का-फुल्का फीवर आ जाता है और उसे एक आध गोली कॉलपाल की खानी पड़ती है". वह घटना हमारी और उसके सुहागरात की है. क्योंकि वे पूरी शादी में अपनी एक लंबा सा घूंघट काढ़े हुई थी इसलिए उस समय वे मेरी सोहनी-सूरत देख नहीं पाई थी और यह अच्छा ही था अगर वह मुझे शादी के वक्त ही देख लेती तो शायद--"शादी के मंडप में ही वे गश खाकर गिर जाती और मेरी सुंदरता इतनी मशहूर हो जाती कि उस गांव व शहर की जवान लड़कियां अपनी सखियों की शादी से पहले एक बार जरूर चुहलबाजी के चटखारे लेकर मेरा लजीज मजाक उड़ाती". 


 सुहागरात के दिन जब मेरी पत्नी ने मेरा यह रूप और लावण्य देखा तो मुझे ऐसा लगा कि जैसे वे अपने पति को नहीं बल्कि--"अपने अरमानों के नेपाल का भयंकर भूकंप देख रही हो". फिर खुद को किसी तरह उसने संयत किया और अपने कापते हाथों से उसने माचिस व मोमबत्ती पकड़ी जिसे सही से पकड़ने और जलाने  में उसे 15 मिनट लग गए. जब मैंने उससे पूछा तो उसने कहा कि मुझे आपको पूरी जिंदगी देखना है अंधेरे में देखने से अच्छा है की आपको उजाले में देखकर मैं अपनी--"सांसो के ब्लड प्रेशर को अभी से दुरुस्त कर लूं". 


यह व्यंग्य लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है. 


लेखक---रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin. no. 222002 (U P )
Mo. no. 7800824758

व्यंग्य---(रेडजोन में पत्नी का मेकप बॉक्स )

व्यंग्य--(रेड जोन में पत्नी का मेकप बॉक्स )

इस कोरोना वायरस के लॉकडाउन में--"मेरी पत्नी का मेकप बॉक्स रेड जोन में आ गया है.  उसकी सुंदरता को निखारने वाले सारे प्रोडक्ट एक-एक कर कोरोना पाजीटिव होते जा रहे हैं". उसका उतरा हुआ मुँह  अब तलक कोरोना के तमाम उतार-चढ़ाव को व्यक्त करने के लिए पर्याप्त है.

मैंने तो दो दिन से टीवी पर कोरोना से संबंधित समाचार ही देखना बंद कर दिया है.क्योंकि मुझे अच्छे से याद है,  जब मेरी पत्नी का मेकअप बॉक्स--"मेकअप के सामानों से भरा था,  तो वे ग्रीन जोन की तरह खुश थी.कुछ खाली हुआ तो वे ऑरेंज जोन की तरह खुश थी".  यहां तलक तो गनीमत थी, लेकिन जैसे ही मेरी पत्नी की--"खूबसूरती को निखारने वाली तमाम प्रोडक्ट खत्म हुए तो उसका मेकअप बॉक्स रेड जोन में आ गया". 

जिसके चलते आज मेरी पत्नी ना ढंग से मेकअप कर पाने के क्वॉरेंटाइन के दर्द से गुजर रही है. उसके मेकप की इस कोरोना वायरस जैसी बिपत्ती का असर अब उसके मन मस्तिष्क और हाव-भाव में भी पड़ने लगा है. वे पहले की तरह आईने के सामने खड़ी होकर अपने होठों को कुछ यू इधर-उधर करती है जैसे वे लिपस्टिक लगाने के बाद अक्सर किया करती थी, लेकिन आज जैसे ही उसने अपने होठों को इधर-उधर किया,  तो उसकी दोनों मासूम आँखों में आँसू भर आये.उफ! हे !भगवान काश मेरी पत्नी अपने--"मेकअप बॉक्स के इस रेड जोन से निकलकर पुनः अपनी सुंदरता के ग्रीन जोन में आ जाए".

मैंने अपनी पत्नी की सुंदरता व उसके मेकअप की कभी भी इतनी गिरी हुई इम्यूनिटी नहीं देखी. मुझे जहां तक याद है वे यह है कि किसी भी पत्नी के--"मेकप की गिरी हुई इम्यूनिटी को बढ़ा सकें,  ऐसी कोई दवा दुनिया में बनी ही नहीं". लेकिन मैं अपनी पत्नी के इस घटते हुए मेकअप के इम्यूनिटी कॉल में भी लगातार एक "पति रूपी कोरोना वारियर्स की तरह लगा हुआ हूं. निश्चित है कि हम बहुत जल्द अपनी पत्नी को उसकी मेकअप के रेड जोन  से निकाल कर ग्रीन जोन मे ला पाएंगे". 


यह व्यंग्य मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है. 

लेखक---रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin.no.222002 (U P)
Mo.no.7800824758

व्यंग्य---(ऑनलाइन गर्लफ्रेंड से बाते )

व्यंग्य-----(ऑनलाइन गर्लफ्रेंड से बाते )

 कोरोना-वायरस के चलते मेरे दिल की राष्ट्रीय छति हुई है. इसकी चपेट में आने से मेरी गर्लफ्रेंड किसी अन्य ब्वॉयफ्रेंड से ऑनलाइन हो मोहब्बत की गुफ्तगू कर रही. मैं लगातार तभी से अपने आंसुओं के सेनीटाइजर से आपने उदास व गमगीन चेहरे को सेनीटाइज कर रहा हूं. लेकिन फिर भी वे मेरी जेहन में मुस्कुराती हुई जब दिख जाती है तो मुझे लगता है कि--जैसे मैं उसके सामने कोरोना-वायरस से प्रताड़ित महाराष्ट्र की तरह खड़ा हूं. 


 अगर मुझ जैसे ब्वॉयफ्रेंडों की इस समय दिल टूटने की कोरोना जांच कराई जाए तो यह मेरा दावा है कि- इन गर्लफ्रेंडों के धोखा देने का वे आंकड़ा देश के सामने आएगा जिस आंकड़े को तोड़ पाना ना तो आज की पीढ़ी के ब्वॉयफ्रेंडो के बस की बात है और ना ही आने वाले कल की पीढ़ी के ब्वॉयफ्रेंड ही इस आंकड़े को तोड़ पाएंगे. 


 इतना ही नहीं अगर आप इन--"गर्लफ्रेंडों के ऑनलाइन खूबसूरत चेहरे को देखेंगे तो पाएंगे कि जैसे इस लॉक- डाउन में सब कुछ लॉक-डाउन  हुआ बस इन गर्लफ्रेंडो की सुंदरता के ब्यूटी-पार्लर कभी भी इस लॉक डाउन की जद में नहीं आए अर्थात इनकी सुंदरता रेड जोन में नहीं पाई गई. बल्कि इनके कई सारे बॉयफ्रेंड  रेड जोन में आए और इन सभी में मोहब्बत के कोरोनावायरस पॉजिटिव पाए गए जिसके बाद से  लगातार यह सारे बॉयफ्रेंड इन गर्लफ्रेंड की गम के क्वारंटाइन में है". 

 इतना धोखा देने के बाद भी इन गर्लफ्रेंडो ने सहानुभूति की एक हल्की सी मुस्कुराहट की बिरियानी भी इन बॉयफ्रेंडों को दया स्वरूप देना गवारा न समझा. उफ! इतना अन्याय. पत्थरबाजी अपने पुराने  ब्वॉयफ्रेंड पर अब तो यही इन पुराने बॉयफ्रेंडो  से मेरी अपील है कि वे अपनी-अपनी पुरानी गर्लफ्रेंडो को सामूहिक रूप से यह डिजिटल श्राप दे  कि जा तुझे अगर ब्वॉयफ्रेंड प्रजाति का पति मिले तो वे भी तुम्हें धोखा देकर किसी अन्य गर्लफ्रेंड से ऑनलाइन मोहब्बत की रोमांटिक बातें करें.


यह व्यंग्य लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है. 

लेखक-- रंगनाथ द्विवेदी  
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin. no. 222002 (U P )
Mo. no. 7800824758

लेख---(सफाईकर्मियों की अप्रतिम राष्ट्रभक्ति )

लेख---(सफाईकर्मियों की अप्रतिम राष्ट्रभक्ति )

 पूरे देश में कोरोना आपदा के समय सफाई कर्मियों ने जिस निष्ठा व सेवा भाव का प्रदर्शन किया वे उन्हें  वंदनीय व प्रशंसनीय बनाता है. सच्चे अर्थों में वे एक सजग--"राष्ट्रभक्त सिपाही की तरह अपनी जिम्मेदारियों की सरहद पर डटे रहे". उन्हें सफलता विफलता मिलती रही समाज के तमाम तंज और झंझावात को भूल उनके अंदर एक असीम मानव प्रेम व सेवा भाव का जो इस आपदा काल में प्रादुर्भाव हुआ वैसा ना मैंने कभी पढ़ा और ना ही अपनी इन जिंदा आंखों से देखा ही. 

 सच तो यह है कि उस देश को कभी कोई आपदा या युद्ध परेशान या पराजित नहीं कर सकता, जिस देश का-"आखरी व्यक्ति भी अपनी संपूर्ण मानव सेवा भाव  को निछावर करने को तैयार हो, वैसा ही कुछ हमारी तमाम सफाई कर्मियों ने विश्व आपदा के कालखंड में कर दिखाया है". वे किसी भी मोहल्ले. बस्ती या शहर मैं हिंदू मुसलमान सिक्ख, इसाई, बनकर अपने काम को अंजाम नहीं दिया. बल्कि उन्होंने पहले से भी कहीं ज्यादा श्रेष्ठ सेवा इस समय पूरे देश को दी. जब पूरा देश लॉक-डाउन की कैद में रहा, कोरोना वायरस की चपेट में आता रहा,  ये उस विषम परिस्थिति में भी अपने सफाई करने के धेय या लक्ष्य को पूरा करते  रहे. 

 प्रयाग या कुंभ के मेले में जब हमारे देश के प्रधानमंत्री ने इन सफाई कर्मियों का स्वयं पैर धुलकर गमछे से पोछा तो उस समय--"राजनीतिक हलके में उनका मजाक उड़ाया गया या इसको उनकी राजनीति कही गई लेकिन उन सफाई कर्मियों का पैर धुलना आज अपनी सार्थकता का प्रमाण स्वयं दे रहे हैं". वे मैले  पांव है जो हमारी गलियों, शहरों को साफ व स्वच्छ कर--"हमारी और कोरोना आपदा के बीच एक दीवार की तरह खड़े हैं", जीन पैरों को उस समय प्रधानमंत्री के द्वारा धुला गया वे पैर आज जन-जन को धोना चाहिए राजनीति चाहे जितनी घृणित हो लेकिन हमारे  और आपके दिल को घृणित नहीं होना चाहिए. 

 महात्मा गांधी ने स्वयं सफाई और सफाई कर्मियों के हक की  बात करते थे. वे हर व्यक्ति को--"एक सफाई कर्मी कहते थे, इतना ही नहीं इन सफाई कर्मियों की महत्वपूर्ण भूमिका भारत के स्वतंत्रता-संग्राम में भी थी" आज इस कोरोना महामारी में एक बार फिर सफाई कर्मियों ने अपनी सशक्त राष्ट्रभक्ति व सेवा का परिचय दिया है, हां यह भी एक सच रहा है कि चाटुकारिता पोषक लेखन ने तमाम ऐसे लोगों की-- "राष्ट्रभक्ति का पृष्ठ नष्ट कर दिया". हो सकता है कि कोरोना विपदा के  बाद भी इनके इस सेवा भाव के तथ्य का भी कत्ल कर दिया जाए लेकिन हम जैसे एक आध लेखक अपनी--"श्रद्धा भाव के तिरंगे से इन्हीं कभी महरूम नहीं होने देंगे". 

 ऐसा नहीं कि कोरोना आपदा काल में यह सफाई कर्मी इसकी चपेट में ना आए हो, यह भी चपेट में आए  इनकी भी मौतें हुई यह भी अपने परिवार को छोड़ गए. हम आप लॉक-डाउन और क्वारनटाइन रहे और यह सभी सफाई कर्मी कोरोना वायरस की परवाह किए बिना हमारी आपकी स्वच्छता को बनाए रखा आज मैं अपने इस लेख में उन तमाम--"सफाई कर्मियों की शहादत को, कोई सामान्य शहादत नहीं बल्कि सरहद के शहीद का दर्जा देता हूं और अपने शब्दों के तमाम श्रद्धा पुष्प उन्हें अर्पित करता हूं'. 


यह लेख मेरा स्व-लिखित व अप्रकाशित है. 

लेखक---रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin. no. 222002 (U P)
Mo. no. 7800824758

Saturday, 27 June 2020

(इश्क करके )

(इश्क़ करके)
ना पढ़ सकी कोई किताब मै इश्क़ करके,
मै औरत सुफि हो गई इश्क़ करके।
मौलाना और तकरीरे मस्जिद-------
तुम्हे मुबारक!
मै खुद हो गई----------------
मुकम्मल मुसलमान इश्क़ करके।
ये हिज़ाब,ये परदे,ये चारदीवारी 
कैद है औरत की,
तुम क्या निकालोगे इस कैद से मुझको,
मै खुद ही छोड़े जा रही,
अपने जिस्म का मकान-------
ऐ,रंग--------------इश्क़ करके।

कविता--(विधवा वीणा हूँ )

(बिधवा विणा हूँ)
मै पथरीली------------------
कंटक राहो की ब्यथा लिये,
जिये जा रही उस चिड़ियाँ सी,
जिसके निड़ का तिनका-तिनका,
हर आँधी ने नष्ट किया!
है क्षिण हृदय में पीड़ा मेरे,
मै जयशंकर प्रसाद की आँसू हूं।
ना बदली ना सावन आये,
मेरी यौवन के गाँव कभी,
तपती धूप में देह जले
और तड़पे अंतर घट मेरा,
मै तार-तार टूटी नारी,
जो बज न सकु जीवन तट पे----
मै एैसी बिधवा विणा हूँ।

Thursday, 25 June 2020

(जुल्फों में बांध लेती है )

(जूल्फों में बांध लेती है)
उतरते है,घिरते है उसकी जूल्फों की तरफ बादल,
और वे इन बादलो को-------------
अपनी जूल्फों में बांध लेती है।
वे हुस्ऩ-ए-ज़ीनत है शहर की,
लोग तकते है उसके छत की तरफ,
वे उम्मीद-ए-बरसात है,
जो एक अदा से------------
अपनी जूल्फ़ो में सावन बांध लेती है।
है तैरने भर का पानी उसकी आँखो में,
ऐ,रंग-------------------
वे हम शायरो का सागर भी,
अपनी जूल्फ़ो में बांध लेती है।

Wednesday, 24 June 2020

कविता---(एक बाँझ औरत )

(एक बाँझ औरत)
एक बाँझ औरत---------------
किसी पीर की मज़ार पे बच्चे मांगने आ गई।
क्या करती----------
सास,ससुर,शौहर की उम्मीदे उसपे तलाक का डर,
वे भीगी आँख------------
इस दर पे अपना घर बचाने आ गई।
एक बाँझ औरत--------
किसी पीर की मज़ार पे बच्चे मांगने आ गई।
औरत को तो ये भी हक नही कि वे कह सके,
कि बाँझ वे नही!
एै! पीर उठ और जग इस मज़ार से,
और देख एक औरत----------
अपने शौहर का मज़हब बचाने आ गई।
एक बाँझ औरत--------
किसी पीर की मज़ार पे बच्चे मांगने आ गई।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Monday, 22 June 2020

कविता---(हमपे हँसे है बदरवा सखी )

(हमपे हँसे है बदरवा सखी)
अँखिया मे लोरन के पानी बहे-----
ढुढ़े मीले ना कजरवा सखी,,,,,,,,,,
ड़से है मनवा के पोर-पोर हमरा----
हमपे हँसे है,बदरवा सखी।
नीक ना लागे घर अँगनईया------
सौतन लगे है ओसरवा सखी।
ऐ,रंग-----
हियरा के आह लग जातई,,,,,,,,,,,,
बस पीके कोठरियाँ सलामत रहत--
बाकी जरी जातई पुरा शहरवा सखी।
ड़से है मनवा के पोर-पोर हमरा----
हमपे हँसे है बदरवा सखी।

###हमारे यहा की स्थानिय भाषा की एक रचना।

Friday, 19 June 2020

कविता---(सावन के अंधे को बहार लगती हो )

(सावन के अंधो को बहार लगती हो)
हे!प्रिये------तुम मेकप में
सौन्दर्य प्रसाधन का------
इश्तहार लगती हो।
मै न्यूज चैनल सा लगता हूं------
और तुम चित्रहार लगती हो।
जब तुम्हे देखता है कोई गैर,
तो मै सलगता हु--------------
मजूरे की बीड़ी की तरह अंदर-अंदर,
मै उन्हें मोहर्रम का दर्द लगता हू,
और तुम उन्हे ईद का त्योहार लगती हो।
हे!प्रिये----------------
मेरे अच्छे दिन गये,
मै पतझड़ का पत्ता----------
तुम सावन के अंधो को बहार लगती हो।

Sunday, 14 June 2020

कविता---(जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है )

(जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है)
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है,
जिसे मोड़कर कई दिनो से यूँही रख दिया है,
कि समय मिलते ही फिर उस पृष्ठ को खोल पढ़ुगा,
अपने जीवन के हूबहू घटनाओ की वे तमाम बाते,
यानी की गतांक से आगे---------------
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है।
तमाम उठा-पटक झंझावतो का जीवन,
कही कोई विदेशी रोमांटनिजम नही,
एक विछोह,एक दर्द,
हर पृष्ठ के कथनांक के आगे--------
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है।
इसी मोटी सी किताब को,
कुछ लोग लुगदी साहित्य कह,
यू छिटक जाते है जैसे मंटो की भूखी नायिका,
अपने से ज्यादा नंगो को देखती है,
अपनी काली सलवार और कपकंपाती टाँग के आगे-----
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है।
कुछ पन्ने और बचे है पढ़ने को,
कल खत्म कर लुंगा इसे भी,
और बिना मोड़े रख दुंगा,
फिर इच्छा ही नही बचेगी इसके पढ़ने की,
क्योंकि पता चल जायेगा कि क्या कुछ लिखा है,
एै"रंग" इस नावेल मे गतांक से आगे-------
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

लेख---(तलाक )

(तलाक)
कभी-कभी जब किसी मासूम तलाकशुदा खातून को अपने सीने से लगाये हुये अपनी मासूम सी बच्ची के साथ किसी टेलीविजन के तलाक वाले कार्यक्रम में रोता हुआ देखता हूं,तो लगता है जैसे इस खूबसूरत से मज़हब को कुछ जेहन से बीमार मौलवियो ने इसे कहां से कहां पहुँचा दिया,आज एैसे ही चंद नामाकुलो के नाते---इस्लाम और कुरान की आयत भी अपनी ही अमीना की आँखो में उस आँसू को तकने को बाध्य है अर्थात इस्लाम आज मजलूम औरत की आँख का वे आँसू बन गया है जिसका कतरा कुरान की आयत के उस सीने पे गीर रहा है जिसे हर मुसलमान अपना दीन और इमान मानता है।
तलाक महज एक शब्द भर नही बल्कि एक औरत का इस्लाम की आड़ मे किया गया वे कत्ल है जिसकी सदा इस मरदे मजहब ने कभी अपनी चाहरदिवारी के बाहर नही आने दिया।
उफ!औरत को कितना लिजलिज़ा और कमजोर कर दिया है कुछ लोगो ने कि पुछिये मत----"जिस औरत को उसकी चाहत और मोहब्बत का ईद मिलना था उसे इन चंद इबलिसे मौलवियो ने जबरदस्ती इस्लाम और हदिस का नाम लेकर एक हँसती खेलती औरत की जिंदगी मे तलाक लाकर उसे ताउम्र के लिये न खत्म होने वाले आँसू और गम के मोहर्रम से जोड़ दिया"।
आज तलाक के खिलाफ उठ रही तमाम आवाज़ो से इन लोगो की वे दरो-दिवार व बुनियादे कांपने लगी है सिकन से वे चेहरे तमतमा गये है लेकिन अब शायद ये बगावत न थमेगी आज औरत के वही तमाम दर्द बारुद बन गये है मेरा दावा है कि ये उठा हुआ इंकलाब हमारे हिन्दुस्तान की मुस्लिम औरतो के हक और हुकूक की नज़ीर बनेगा,और फिर बेज़ा तलाक दे रहे हर शौहर की रुह कांप जायेगी।
अब इनके पाक कानो को नमाज़ सुनाई देगी,कुरान की आयत सुनाई देगी लेकिन तलाक और हलाला के वे शरियती फरमान न सुनाई देगे ये बागी इंकलाब ऐसी नीच जहनियत को अपने बदलाव की उस सैलाबे दरिया मे बहा ले जायेगे जिसके बाद मुकद्दस इस्लाम होगा।
औरत के अच्छे दिन आयेगे,इस्लाम के अच्छे दिन आयेंगे,न कत्ल होगा किसी वालिद और अम्मी के दिये हुये उस मेहर का जिसे वे ताजिंदगी अपने शौहर व उसके परिवार के सुपूर्द करती है-------या अल्लाह जल्द मयस्सर हो उन्हें वे कानून जो इस मुल्क मे हर औरत को मयस्सर है यानिं कानून के अच्छे दिन।
@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उ.प्र.)
mo.no.-----7800824758

धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर और निर्मेश के त्यागी भईया मेरे "तलाक" जैसे विषय पे लिखे संवेदनशील लेख को जो स्नेह दिया।

Tuesday, 26 May 2020

कविता---(मेरे शहर मे बरसात हो रही है )

(मेरे शहर में बरसात हो रही है)
जब से तुम्हें राग मल्हार लिखा है,
तब से मेरे शहर में बरसात हो रही है।
दिवाने हो गये है सारे स्याह बादल,
भूल गये है ये कुछ और शहर है,
जहां इनको बरसना है!
जब से तुम्हें राग मल्हार लिखा है,
तब से मेरे शहर में बरसात हो रही है।
कही तेरी खातिर यही न ठहर जायें,
भेज दे इन्हे ये बस तेरी सुनेंगे,
ये कैदी हो गये है------------
तब से तेरी रुप के,
जब से तुम्हें राग मल्हार लिखा है,
तब से मेरे शहर में बरसात हो रही है।

Sunday, 24 May 2020

(आवश्यकताओ का एक विशाल अग्निपथ )

नरेन्द्र मोदी की सत्ता मे पुनर्वापसी----------
  (आवश्यकताओ का एक विशाल अग्निपथ)

सर्वप्रथम तो मै भारत के इतने बड़े और समृद्ध लोकतंत्र मे एक बार पुन: नरेन्द्र मोदी को पिछली बार से कही ज्यादा सीटे जीतकर आने और उनके प्रधानमंत्री बनने की बधाई देता हूं.अब दो टूक और स्पष्ट बात करते हुये अपनी लेखनी से मै उन तमाम मुद्दों व विसंगतियों की तरफ ध्यान आकृष्ट करना चाहुंगा जहां अब भी बहुत ज्यादा करने की इस मोदी सरकार से जन-अपेक्षा है, इस जन-अपेक्षा को पुरा करने के लिये मोदी के साथ ही उनकी कैबिनेट को भी खपना और तपना है. इस खपने और तपने के लिये सत्ता के नशे से इन सभी को दुर रहना होगा तभी सकुशल सबका साथ,सबका विकास हो पायेगा.
इस वृहद व ऐतिहासिक जीत के साथ ही तमाम बिसंगतियांं भी अपना विकराल मूँह बाये खड़ी है,बेशक अगली बार मोदी ने जाती,संप्रदाय व भाषा से ऊपर उठकर काम किया तभी ये प्रचंड बहुमत उन्हे व उनके किये गये कार्यो को मिला इसलिये ये विजय खैरात नही बल्कि उनके किये गये पिछली सरकार के कार्यो का प्रतिफल है,लेकिन इस प्रतिफल को बनाये रखने और आगे ले जाने के लिये नरेन्द्र मोदी को जन-आकांक्षाओं के अग्निपथ पे खरा उतरना होगा.
ये सत्य है कि किसी भी समृद्ध व विकासशील देश की महति-आवश्यकता है शिक्षा,स्वास्थ्य, सुरक्षा,रोजगार आदि .ऐसे ही कुछ कार्य है जिसे पुरा करना हर सरकार को अग्निपथ पे चलने के बराबर है,इधर कुछ एक सालो से मतदान का ट्रेड हमारे भारत मे तीव्रगति से बदला है. अब जनता अपने जनाधिकार से उसी सरकार का चयन कर रही है जो उनके मानको पे कुछ खरी उतर रही है,जो ऐसा नही कर रही उन्हें जनता खानदानी सीटो से पटखनी दे ससंम्मान उनकी हैसियत काग्रेंस के राहुल की तरह बता दे रही. बहुमत के साथ सत्ता देने पे आप ये विधवा-विलाप नही कर सकते की जनता ने आपको एक असहाय व लगड़ी सरकार दी थी. नरेन्द्र मोदी आज युवाओं के एंग्री यंग मैन है,तरक्की व उनके अथक श्रम ने आज देश ही नही विदेश मे भी भारत के आत्म-संम्मान का मस्तक ऊँचा किया है,सच तो ये है कि आज वे हर उम्र वय के लोगो के हिरो है. मै उसी हिरो यानी---"विजय दीनानाथ चौहान रुपी नरेन्द्र मोदी को भी इस विशाल व वृहद भारत की आवश्यकताओं के अग्निपथ पे विजय पानी होगी".आईये कुछ ऐसी ही आवश्यकताओ के अग्निपथ की तरफ हम इस चुनी सरकार से खरे उतरने की उम्मीद करे.
    ( 1) शिक्षा किसी भी विकसित या विकासशील देश की रीढ़ है जिसको लेके प्लेटो जैसे विद्वान ने कहा कि---"शिक्षा एक जीवन पर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है" .सच ये है कि हमारे यहां की शिक्षा बड़ी बदहाल है,ये देश के कुछ समृद्ध व साफ्ट डकैतों के हाथ है,इसका ये आलम है कि विश्व के सौ कालेजों मे भारत के किसी कालेज का नाम न आना ये सरकार के आदेशों को भी अपने ठेंगे पे रखते है,इस हालात से बाहर सर्व-सुलभ व उत्कृष्ट शिक्षा उपलब्ध कराना इस सरकार की बड़ी जिम्मेदारी है.

(2)स्वास्थ्य---भारत मे शिक्षा से कही ज्यादा बदहाल तो यहां की स्वास्थ्य व्यवस्था है,एक रुपये की गोली सौ रुपये मे आराम से बेची जाती है दस हजार का इलाज एक लाख मे. और यही दस हजार का इलाज जब लाख मे परिणत होता है तो इनके चम-चमाते अस्पताल की सीढियों पे एक गरीब माँ अपने जवान बेटे की लाश के साथ निर्जीव सी एकटक अस्पताल को तकती है,इस माँ के बेटे के इलाज का सबसे कठीन अग्निपथ है,ये डाक्टर भगवान नही पैसो के हैवान है,सरकार को सरकारी कालेजों से पढ़े सभी डाक्टरों से कडाई के साथ सप्ताह मे एक दिन जनसेवा के तहत कार्य लेना होगा, इस कार्य मे कोताही या हिला-हवाली करने पे आम आदमियों के टेक्स से पढ़े ऐसे डाक्टरों की डिग्री अवैध कर दी जाये.
(3)सुरक्षा के कई चक्र है सरकार की जिम्मेदारी होती है कि वे एक भयमुक्त समाज की श्री वृद्धि करे. महिला सुरक्षा लगभग हर चुनाव मे मुद्दा रहा लेकिन ये अभी भी कुछ एक को छोड़ मुद्दे के आगे बहुत बढ़ नही पाया.हालांकि इस सरकार ने सेना के संम्मान व इनके आयुधो पे बहुत कार्य किया.लेकिन आंतरिक अपराध के मामले आज भी विकराल है,चाहे वे बाल-अपराध हो या कोई अन्य अपराध. वैसे " एक कैंसर अपराध है नक्सलवाद" इसने देश-विरोधी अपराध से लेके हमारे तमाम सैनिकों के जानमाल का भी नुकसान किया है,इसका उन्मूलन एक चैलेंज है ये कठीन अग्निपथ है.
(4)रोजगार इतने बड़े देश मे सभी को रोजगार मुहैय्या करा पाना मुमकिन तो नही,लेकिन जरुरत है जिस स्तर का हूनर उस स्तर का रोजगार युवा व सभी को मिले भले चुनाव मे ये कहना कि---"रोजगार के लिये पकोड़े तले लेकिन ये चुनाव तलक ही ठीक था क्योंकि कि कोई अभिभावक लाखो का कर्ज ले अपने बेटे को महंगी व्यवसायिक डिग्री इसलिए नही दिलवाता की आगे चलकर उसका बेटा पकौड़े तले".अगर पकौड़े ही उसे अपने बेटे से तलवाना होता तो फिर क्या जरुरत थी उसे अपने बेटे को महंगी शिक्षा दिलवाने की .सरकार को समुचित और न्यायसंगत रोजगार, उपलब्ध कराना आंकडे के तहत नही बल्कि यथार्थ के तहत करना होगा,ये उम्मीद आज हर भारतीय नरेन्द्र मोदी से कर रहा.

(5)हमारे एक पूर्व-प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने एक नारा दिया था--"जय जवान और जय किसान का" ये नारा आज भी उतना ही प्रासंगिक है. किसान किसी भी अरबपति व उद्योगपति से ज्यादा पुज्य व श्रेष्ठ है.किसान को किसी कवि ने अपनी कविता मे "ग्राम्य देवता" कहा है.पिछली मोदी सरकार ने ये कार्य तो अवश्य किया कि---"बीना किसी भेदभाव के व किसी ब्लैकिये के खाद,पानी व विजली मुहैय्या कराई". लेकिन ये सरकार अगली बार सबसे ज्यादा आवारा पशुओं के मुद्दों पे घिरती दिखी ये मुद्दा यथार्थ भी था.किसान की आय दोगुनी हो ये इस देश की सबसे बड़ी खुशी होगी लेकिन आय के साथ ही सरकार को किसानों की फसलो को इन आवारा पशुओं से छुटकारा दिलाना होगा.

(6) इस बहुमत व जादुई आकडे के साथ चुनी सरकार को सभी के लिये स्वच्छ पीने का पानी मुहैय्या कराना बहुत आवश्यक है. जैसा की दुनिया के तमाम भूगर्भ जलवेत्ता कह रहे है कि---"तीसरा विश्व युद्ध पानी को लेकर होगा" अगर होगा तो ये अतिसयोक्ति न होगी क्योंकि हमारे यहा बहुत पहले ही पानी को महत्ता दी गई. तभी तो रहीम जैसे कवि ने कहा कि---
        "रहिमन पानी राखिऐ, बीन पानी सब सून
        पानी गये न उबरै मोती,मानुष, चून"
भारत जैसे वृहद देश मे भांति-भांति के प्रदेश व आवश्यकताये है किसी राज्य मे पानी की दयनीयता बड़ी भयावह है,इस मोदी सरकार से उम्मीद है स्वच्छ व पीने योग्य पानी मुहैय्या कराने की.

इसके साथ अन्य भी तमाम-तमाम आवश्यकताओ का अग्निपथ है अपने पड़ोसी देशो से संबंधों मे नीत सुधार का वैश्विक प्रयास भी मोदी सरकार को करना होगा.अटल बिहारी वाजपेयी जैसे कालजयी प्रधानमंत्री ने कहा भी कि---"हम अपना पड़ोसी नही बदल सकते".तेजी से गिरती अर्थव्यवस्था को कंट्रोल करना,धार्मिक व जातिगत द्वेश की खाई को पाटना.ये तमाम वे बिंदु है जिसपे--" इस ऐतिहासिक विजय नायक नरेन्द्र मोदी को कार्य करना है" और जनता के जनमत से लग रहा कि नरेन्द्र मोदी को अब ये रहते कायनात न भुलेगा,उन्हें विश्वास है की हमारा मोदी ये करेगा आजादी के कुछ एक प्रधानमंत्री हुये जिसे जनता ने अधिकार पुर्वक हमारा या अपना कहा,.ऐसे मे मोदी की जिम्मेदारी पहले से चौगुनी बढ़ जाती है ये जिम्मेदारी और आम-आदमी की आवश्यकताओ का विशाल अग्निपथ मोदी अवश्य पार करेंगे ये इस देश के जनता की उम्मीद है.

@@@लेखक---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला---जौनपुर 222002 (U.P.)
Mo.no.7800824758

यह लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.

Thursday, 21 May 2020

लेख---(एक्जिट पोल )

2019 की लोकसभा चुनाव का-------
                        (एक्जिट पोल)

जैसा की सभी सर्वे मोदी को एक मर्तबा फिर सत्ता मे--"अगली सुनामी की तरह ही लौटता दिखा रहे है".अगर खुदा ना खास्ता इस एक्जिट पोल की सुनामी सच हुई तो मुझे ये कहते व लिखते हुये आश्चर्य नही कि--"मोदी अपने चिंतन की गुफा से बाहर तो आ जायेंगे लेकिन काग्रेंस व अपने-अपने राज्य की बड़ी पार्टियां अपनी हताशा की उस गुफा मे चला जायेगा, जहां से बाहर निकलने के लिये एक न खत्म होने वाली घड़ियों का इंतजार करना होगा". इस बोझिल इंतजार के बाद का प्रतिफल क्या होगा बाद की बात है ,लेकिन सभी चुनावी एक्जिट पोल इस समय भाजपा को अकेले सरकार बनाने की बहुमत का संदेशा दे रहा और पुरे N.D.A को 350 के कुछ कम या ज्यादा बता रहा,ये एक्जिट पोल---"औंधे मुंह गिरे तभी कुछ संभव है, ये आज की तारीख मे मुमकीन नही अगर ऐसा हुआ तो, ये भारत के लोकतंत्र मे हुऐ चमत्कारो मे से पहला चमत्कार होगा जिसके एक्जिट पोल को सदियां याद करेंगी". क्योंकि ऐसा एकाध नही बल्कि समस्त एक्जिट पोल कह रहे कि, रिटर्न आफ मोदी.
सातवे व अंतिम चरण के मतदान से पहले काग्रेंस ने अपने एक समर्थक से सत्ता मे मोदी को आने से रोकने के लिये राज्य की उन मजबूत पार्टियों से संपर्क साधना चालू कर दिया था,जो चुनाव से पहले ऐंठे-ऐंठे से थे.आज की काग्रेंस एक झुकी हुई, पूर्ण रुप से टूटी काग्रेंस है ,ये सभी पार्टियां भी बाखूबी जानती है.लेकिन काग्रेंस के साथ ही कमोबेश इनकी भी यही हालत है.इन सबो ने खासकर काग्रेंस ने इससे पार-पाने व उबरने के लिये एक मीटिंग आगे की रणनीति के लिये 23 को रखी थी,जिसे एक्जिट पोल ने इन्हें टालने के लिये विवश कर दिया, यानि एक्जिट पोल ने कुछ तो तुषारापात या वज्रपात इनपे कर ही दिया है.
भाजपा की जीत के चाणक्य या कौटिल्य कहे जाने वाले अमित शाह जैसे कुटनीतिकार आज की राजनीति मे एकलौते कहे जा सकते है.आज एक्जिट पोल का खाका जो चमकता या 23 मई को उदय होता दिख रहा है,वे इन्हीं अमित शाह के तहत हो पा रहा.अमित शाह की बुद्धि का माइनर इतना ससंक्त है कि इसे डिसफ्यूज करने के चक्कर में---"उन्ही के राज्य मे कई और सारे राजनीतिक माइनर फट जा रहे".बंगाल की ममता के समर्थकों का इस चुनाव मे नग्न नर्तन बहुत कुछ बताने के लिये पर्याप्त है.मोदी और शाह ने एक तरह से ममता के बंगाल को इतना शसक्त तरीकें से घेरा कि वे इसमें घिर गई,ममता का ये घिरापन ही एक्जिट पोल मे दिख रहा ये एक्जिट पोल अगर सच हुआ तो--" फिर ममता को बंगाल मे खुद को काग्रेंस हो जाने से रोकना होगा".
एक्जिट पोल ने 23 मई को आने वाले चुनाव परिणामों से पहले ही ये संकेत दे दिया है कि---"काग्रेंस के सत्ता की दुल्हन ने निमंत्रण बट जाने के बाद काग्रेंस से अपना विवाह न करने का एक घाती निर्णय ले लिया है,यानी काग्रेंस के राहुल को ये एक्जिट पोल उनके डबल कुवारे होने का सर्टिफिकेट देता दिख रहा".
23 मई तलक के लिये इति-सिद्धम् एक्जिट पोल.

Tuesday, 19 May 2020

लघुकथा---(मालगाड़ी )

लघुकथा----(मालगाड़ी )

त्रिलोकी व उसके कामगार मजदूर साथियों को इस लॉकडाउन के दरमियां , इतने बड़े महानगर में अब ज़हर खाने को भी पैसा नही बचा था. उसपे भी चलो, रह लेते अगर सरकारी दावे के अनुसार उन्हें रूखी-सुखी कुछ भी खाने को मिल जाती, लेकिन नही मिला अंत में मजबूर होकर, त्रिलोकी अपने दस मजदूर साथियों के साथ, किसी तरह इधर-उधर से चंद रोटियों की व्यवस्था कर मुंबई से पैदल ही रेल की पटरियों के किनारे-किनारे अपने-अपने घर  चल पड़े. 

रेल की पटरियों पे चलते-चलते त्रिलोकी ने कहा- यार! थक गये है,  थोड़ा आराम कर लिया जाये, फिर चला जाये. तो सभी साथियों ने त्रिलोकी के हां में हां  मिलाई. चूकि पाँव की थकन और मन की थकन त्रिलोकी के सभी मजदूर साथियों पे इतनी हावी थी,  कि कहाँ  वे बस रेल की पटरी पर हल्का सा आराम करना चाहते थे, लेकिन इस हल्के से आराम भर से उन्हें इतनी गहरी नींद उन पटरीयों पर आ गई कि उन्हें पटरीयों पे हॉर्न बजाती हुई मालगाड़ी भी जगा ना सकी. और पटरियों पे सोये हुए त्रिलोकी के मजदूर साथिओं को कुचलते हुए,  वे मालगाड़ी आगे बढ़ गई. 

 वे तो त्रिलोकी की किस्मत अच्छी थी, कि वे अचानक लघुशंका को चला गया और जब लौटकर उसने अपने साथियों का हाल देखा तो, त्रिलोकी आवाक़  सा कभी साथियों की कटी तड़पती लाशें, ख़ून से सनी बिखरी रोटीआं व उस मालगाड़ी को देख रहा था, जो अपने पीछे उसके मजदूर साथिओं की उन खुली और पथराई आँखों में अपने घर कभी न पहुंच पाने का सन्नाटा व दर्द छोड़े जा रही थी. 

यह लघुकथा मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है. 


लेखक---रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin. no. 222002 (U P)
Mo. no. 7800824758

कविता---(मेरी डिग्रियां )

कविता---(मेरी डिग्रियां )

मै रोज चढ़ता हूं, 
इस महानगर में देने, 
इंटरव्यू की सीढ़िया. 

पर मेरे हार की सलीब पे, 
लटक जाती है, 
मेरी डिग्रियां. 

ये बेरोजगारी का भयावहपन, 
और घुटन, 
वही इंटरव्यू
और मेरे हताश लौटते कदमो पे, 
कहकहे लगाती----
महानगर के दफ्तरों की सीढ़िया. 

नौकरी के लिए---
फुटपाथ-फुटपाथ राते काटी, 
खाया कभी नही खाया, 
बस अखबार में कलम से, 
कहां-कहां जाना है, 
निशान लगा अल-सुबह चल पड़ता, 
चढ़ने और उतरने---
मैं दफ्तर की सीढ़ियां.

हमेशा की तरह सुनने नो, 
एक दिन हार गया, 
और भीतर से टुट गया, 
तड़पाने लगी माँ की खांसी, 
छोड़ दिया मैंने दफ्तर-दफ्तर जाना, 
चलाने लगा रिक्शा, 
आज महीनो हो गये मैंने नही देखी, 
क्या करता देखकर, 
जब मुझसे कही ज्यादा ऐ "रंग"
असहाय और बेरोजगार थी--
मेरी डिग्रियां. 


यह कविता मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है. 

रचनाकार--रंगनाथ द्विवेदी 
जज कालोनी, मियांपुर 
जिला-जौनपुर pin.no.222002 (U P)
Mo.no.7800824758