Friday, 22 November 2019

(औरत के अंग)

(औरत के अंग)
हा मै औरत हू-----------
इसलिए तो तुम्हारे उन अंग विशेष,
को मै तकने भर से जान जाती हू,
कि तुम्हारी मंशा मेरे उन अंगो के-----
बस नोचने-खसोटने और मसलने से है।
जबकि एक औरत के वही अंग विशेष,
अपने पती के प्यार पाने के वक़्त भी,
शर्म ओढ़े रहते है,
क्योंकि उसमें किसी तरह की नोच-खसोट नही,
बल्कि एक-दुसरे के परम विश्वास का देव श्पर्श है।
हा!शायद तुम्हारा पुरुषपन अंदर से सध नही पाता,
किसी एक समर्पित अंग से बध नही पाता,
वरना तकते तो तुम्हें भी अपनी पत्नी का वे अंग,
उतना ही आकर्षित करता------------
जीतना की पर स्त्री या औरत का।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

Sunday, 17 November 2019

(वाह कटे)

     ( वाह कटे)

आओ पतंग उड़ाये,वाह कटे.
छत पर चिल्लाये, वाह कटे.
सद्दी डोरी और मंझे को,
पूरे छत फैलाये, वाह कटे.

इधर-उधर चारो ओर नचाये आसमान मे,
अपनी पतंग को सबसे बचाये,
फिर किसी पतंग को हत्थे से,
हम काट चिल्लाये,वाह कटे.

खाना भुले,पीना भुले
समय का कुछ भी पता नही,
बस परेती और पतंग ले,
हम छत पर चिल्लाये,वाह कटे.

उफ! दिल टुटा---
जब सबसे अच्छी पतंग मेरी,
पीपल मे फंस गई,
तब पता चला कि,--
बगल के छत पर,
कोई और चिल्लाये,वाह कटे.

तब बेमन से उठाके अपनी परेती,
ज्यो रखा-तो ऐसा लगा कि,
जैसे परेती मुझको समझाये,ऐ मुन्ना-
दुःखी ना हो,
तुम कल फिर चिल्लाना,
पतंग उड़ाना 
और हँसकर कहना वाह कटे.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758

(नेपाल)

      (नेपाल)

नेपाल-----
तेरी आँखे किसी हिरन सी,
आवाज कोयल की कूक
और बाँसुरी की तरह,
चेहरे पे तुम्हारी ये छुईमुई सी शर्म,
उफ! तु क्या जाने? कि तु--
कितनी खूबसूरत है.

नेपाल-----
उसपे तेरी ये सफेद सफ्फाक सी सलवार,
और सीने पे एक अल्लहड़ लड़की सी,
दुपट्टे का इधर-उधर फिसलना,
यूँँ लगता है कि जैसे तु----
किसी परी या अप्सरा की बेटी है.

नेपाल----
तु आज मेरे पूरे हो रहे इस नावेल की,
किताब के------
एक-एक शब्द में जिंदा रहोगी,
क्योंकि हमने तुम्हें देश की तरह नही,
अपनी मोहब्बत
और महबूबा की तरह देखा है.


यह कविता मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है.

रचनाकार---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758

Saturday, 19 October 2019

(उन्होने मुझको चाँद कहा था)

(उन्होनें मुझको चाँद कहा था)

पहले साल का व्रत था मेरा-----
उन्होनें मुझको चाँद कहा था।
तब से लेकर अब तक मै-----
वे करवा चौथ नही भुली।
मै शर्म से दुहरी हुई खड़ी थी,
फिर नजर उठाकर देखा तो,
वे बिलकुल मेरे पास खड़े थे,
मैने उनकी पूजा की-------
फिर तोड़ा करवे से व्रत!
उन्होनें अपने दिल से लगा के-----
मुझको अपनी जान कहा था।
पहले साल का व्रत था मेरा-----
उन्होनें मुझको चाँद कहा था।
बनी रहु ताउम्र सुहागिन उनकी मै,
यूँही सज-सवर कर देखू उनको मै,
फिर शर्मा उठु कर याद वे पल,
जब पहली बार पिया ने मुझको----
छत पर अपना चाँद कहा था।
पहले साल का व्रत था मेरा----
उन्होनें मुझको चाँद कहा था।

@@@आप सभी को कल के करवा चौथ की ढ़ेरो बधाई।
रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

Saturday, 28 September 2019

(1965 की जंग और हाजी पीर)

(1965 की जंग और हाजी पीर)
आज भी उभर आती है बनके ताजी पीर,
हम कैसे भुले वे जंगे लम्हा,
जब एक-एक कर मर रहे थे------
हमारी बटालियन के बीर।
कैसे भुले हम उस अब्दुल को जो------
लहू से तरबतर कह रहा था,
अल फतह एै मादरे वतन------
तेरे लिये हाजी पीर।
वे जंग 65 की हम जीत तो गये,
पर हमारे घर के चंद सियासी गद्दारो ने,
गवा दिया अपने सुख के लिये मेज पे,
हम शहीदो के लहू से----------
जीता हुआ हाजी पीर।
वे घुसपैठिये या दहसतगर्द नही,
वे आर्मी थी दुश्मने पाक की-----
मेरे मूल्क ने मुआफ कर उन्हें,
झुका दिया सर हमारे हर बीर की।
आज भी चुभता है---------
मुझ रिटायर फौजी के सीने में,
जहां गोली लगी थी!
अब भी आवाज आती है मेरे कानो में एै,रंग---------
मेरे बटालियन के उस अमर शहीद अब्दुल की---------
जैसे कह रहा हो कि हम हार गये भाई,
अपने ही सरहद वालो से जो जीता था---
हमने इतनी शहादत से हाजी पीर।

@@@@1965 के पाकिस्तानी जंग में शहीद हुये तमाम शहीदो को मेरा सलाम।

Sunday, 1 September 2019

(एक जिंदा दिया हूँ)

(एक जिंदा दिया हूँ)
ताउम्र अपनी मै जल-जल के जिया हूं,
मै आदमी नही-----------
एक जिंदा दिया हूँ।
तमाम खराशे है,है तमाम सिलवटे
उधड़ा रहा मै----------
किसी मुफ़लिस के बिछौने सा,
हर जख्म जिंदगी का-------
मै खुद से सिया हूं।
मै आदमी नही--------
एक जिंदा दिया हूँ।
हु मै एक एैसा सजायाफ्ता,
जो रो नही सकता!
खौलते है आँसू मेरे दिल के अंदर,
मै कभी बहार में नही-------
खिजा़ में जिया हूं।
मै आदमी नही------
एक जिंदा दिया हूँ।

(बेगुनाह रावण जल रहा है)

(बेगुनाह रावण जल रहा है)
अब रावण का चरित्र---------
रामलीला में खल रहा है!
बेचारा------------
एक सीता के नाते प्रतिवर्ष जल रहा है।
एै दिल्ली--------------
जबकि तु लंका से गई बीती है,
क्योंकि रेप और बलात्कार,
तेरी सड़को पे चल रहा है,
और बेवजह---------
दशहरे में रावण जल रहा है।
अब वक्त आ गया है कि,
तेरी सदन में---------
रावण की समिक्षा होनी चाहिये!
क्योंकि अपनी सीता को,
अब रावण से कही ज्यादा,
उसका राम छल रहा है,
और दशहरे में एै,रंग------
बेगुनाह रावण जल रहा है।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.---7800824758
यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।
आप सभी को नौरात्र और दशहरे की ढ़ेर सारी बधाई।

Saturday, 3 August 2019

(दोस्ती कागज़ के नाव की थी)

फ्रेंड डे की बधाई के साथ इस रिश्ते पे लिखी एक कविता----
      
(दोस्ती कागज़ के नाव की थी)

उसकी और मेरी दोस्ती कागज़ के नाव की थी.
आम-अमरुद,बरगद,पीपल और
दरवाजे पे लगे नीम के छाँव की थी-----
उसकी और मेरी दोस्ती कागज़ के नाव की थी.

साथ मे घुमना और घंटो टहलना,
खेत की पगडंडियो पे चलना,
सच एै शहर-------------
बीना स्वार्थ और मतलब के कितनी पाकिज़ा दोस्ती,
हम दोनो के गाँव की थी-----
उसकी और मेरी दोस्ती कागज़ के नाव की थी.

कितनी डांटे सही,कितनी शिकायते सुनी,
माँ के चाटे खाये-----------
फिर भी चोरी से मिलते रहे दोनो,
क्योंकि वे दोस्ती हम दोनो के बेइंतहा लगाव की थी-----
उसकी और मेरी दोस्ती कागज़ के नाव की थी.

कंचे खेले,आम के बाग से अंबिया तोड़ी,
साथ पोखर नहाये,
दोस्ती के वे सारे मखमली दिन छिन गये,
रोटी की हत्तक मे कहाँ से कहाँ चले आये,
एै"रंग" याद इसलिये है जेहन को,
क्योंकि वे दोस्ती,
हम दोनो के दो जिस्म मगर एक जान की थी-----
उसकी और मेरी दोस्ती कागज़ के नाव की थी.

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.------7800824758

Monday, 29 July 2019

(पहली सी दिवाली न रही)

( पहली सी दिवाली न रही )
वे पोखर न रहा, वे चाकी न रही
अब मेरे गाँव मे--------
पहली सी दिवाली न रही.
वे अगले जन्म घर के मासूम बच्चो को छछुंदर होने से,
बचाने के लिये,
घर मे एक बड़े से दियले मे--------
काजल पालने वाली काकी न रही.
वे उल्लास, वे पटाखे, थोड़े मे खुश हो जाना,
कितना सोंधापन था,
आज चाईनीज़ टिमटिमाते झालर जल रहे,
लेकिन उनमें---------
वे प्यार व छुअन कही बाकी न रही.
अब तो बस पथरायापन ही खुरचना है,
क्योंकि माँ के साथ बैठ,
कमरे मे एक-एक दिये मे तेल रखती,
हमारें गाँव की-----
रुपाली न रही.
वे पोखर न रहा,वे चाकी न रही
अब मेरे गाँव मे------
पहली सी दिवाली न रही.

@@@रचनाकार----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला---जौनपुर पिन नं.222002 (उत्तर-प्रदेश)
Mo.no.7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

Thursday, 25 July 2019

(ब्राह्मन और तुर्क)

(ब्राह्मन और तुर्क)
लड़ गये थे-----------------
ज़मीने हिंद की खातिर,
कभी इस कबीले के बुज़ुर्ग।
बटे नही एक थाली थी खाने की,
साथ बैठे थे ब्राह्मन और तुर्क।
वे बुत और सुखा दरख्त,
एक किस्सा है!
चादर पोशी करो लगाओ तिलक,
ये मिट्टी शहीदो के लहू से---------
हुई थी सुर्ख।
ये नज्म़ नही------------
हर हर्फ है मेरा ऐहसासे बिस्मिल,
जगा रहा हु फिर कबीले को,
कि ना लड़े,ना जलाये कोई घर
ब्राह्मन की हिफ़ाज़त मे हो नमाज़,
और नौरात्र मे गले से मिले तुर्क।
लड़ गये थे-----------------
जमीने हिंद की खातिर एै,रंग
कभी इस कबीले के बुज़ुर्ग।

Tuesday, 16 July 2019

(बाँहो मे भर नही पाये)

(बाँहो मे भर नही पाये)
हमने साँस-साँस भर लिया उन्हे-----
वे इतने के बाद भी,मेरे हो नही पाये।
मै आँख में बसा के उन्हे देखती रही,
वे अपनी आँखो में हमे,
कभी भर नही पाये।
मै आयते कुरान की तरह,पढ़ती रही उन्हे
वे एक लफ्ज़ भी वफा़ का,
मेरी पढ़ नही पाये।
मै उतर गई उनमें कर शौहरे यकीन,
वे एक रात भी हमे हमारी हक से,
एै,रंग----अपनी बाँहो में भर नही पाये।

(अनार से महंगा टमाटर खा रहा हूं)

व्यंग्य---(अनार से महंगा टमाटर खा रहा हूं )
आ गये अच्छे दिन---------
मै इलू-इलू गा रहा हूं,
अनार से महंगा टमाटर खा रहा हूं।
मार्केट से सभी सब्ज़ियाँ तो ले ली,
पर टमाटर को लेने मे लग गये घंटो,
क्योंकि सभी एक से भाव मे बेच रहे थे,
यहाँ तलक कि टमाटर को बीना मतलब छुने से रोक रहे थे,
थक-हार एक ठेले वाले को पटा रहा हूं------
बड़ी  मुश्किल से घर टमाटर ला रहा हूं,
अनार से महंगा टमाटर खा रहा हूं।
बीबी भी सबसे पहले सब्ज़ियो के झोले से,
टमाटर टटोल कर निकालती है,
और पुछती है क्या भाव पाये,
कैसे कहु कि हे!भाग्यवान तुम अपने टमाटर खाने का शौक,
काश सस्ते होने तलक टाल पाती,
लेकिन नही,तुम नही टाल पाओगी,
तुम्हारे इसी न टालने के नाते,
अपनी एक महिने की सेलरी का तीस पर्सेंट खर्च कर,
बस मै तुम्हारे लिये टमाटर ला रहा हूं।
आ गये अच्छे दिन-------
मै इलू-इलू गा रहा हूं,
अनार से महंगा टमाटर खा रहा हूं।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no,----7800824758

Monday, 15 July 2019

(हमारी मोहब्बत है)

(हमारी मोहब्बत है)

ये पहाड़
और धुंधलि सी शाम,
और ढेरो सायबान-----
हमारी मोहब्बत है.

धिरे-धिरे हौले से चलती ठंडी हवा,
तेरा शर्माना ,सकुचाना मेरी बाँह मे,
और चारो तरफ फैला गुलाबी आसमान----
हमारी मोहब्बत है.

हर तरफ एक संगीत,
चरवाहो की बाँसुरी
और अपने-अपने काम से लौटती ,
पहाड़ी लड़कियों की खिल-खिलाहट,
अपने घोसलो की तरफ लौटते हुये परिंदे,
के चह-चहाने की मीठी जुबान,
हमारी मोहब्बत है.

आओ अब हम भी चले,
एक-दुजे का हाथ थामे,
कुछ बतियाते, सपने बुनते
और घर आते-आते जो निकल आये चाँद,
हमारी मोहब्बत है.

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर
जौनपुर----222002 (उत्तर-प्रदेश).
no. no. ----7800824758.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है ।

Sunday, 14 July 2019

(शराब नही लेकिन)

         (शराब नही लेकिन)    

तेरी सरिया मे शराब नहीं लेकिन-----------
हम पीने वालो के लिये खराब नही लेकिन.

हम बाँट लेते है अक्सर नशे मे जूठन भी-----
यहाँ के पंडित और मियाँ का जवाब नही लेकिन.

तेरी सरिया मे शराब नही लेकिन।
ना वे गीता जानता है और न मै कुरान की आयत,
जबकि उसका घर मंदिर की तरफ है,
और मेरा घर मस्जिद की तरफ है,
हमारे लिये जुम़ा और मंगलवार एक सा है,
हम पीते है,किसी दिन का हमारे पास एै"रंग"-----
कोई हिसाब नही लेकिन.

तेरी सरिया मे शराब नही लेकिन,
हम पीने वालो के लिये खराब नही लेकिन----
तेरी सरिया मे शराब नही लेकिन।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.----7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

(फिर घिरे आज बादल)

(फिर घिरे आज बादल)

सारे शहर में फिरे आज बादल,
तुम्हे देखकर फिर घिरे आज बादल।
है तेरी हुस्न के ये बादल भी मारे,
ये जाना सनम--------------
जब तुम्हे चुमने की हसरत लिये,
आपस मे ही खुद भिड़े आज बादल.

सारे शहर में फिरे आज बादल,
तुम्हे देखकर फिर घिरे आज बादल.

मांगा सभी ने पानी मगर,
ना सुनी बादलो ने-------
किसी की दुआ!
वे तो तुम थी हमारे शहर में सनम,
जो बूँद बनकर ज़मी पे गिरे आज बादल.

सारे शहर में फिरे आज बादल,
तुम्हे देखकर फिर घिरे आज बादल।

###हमारे शहर में आज लगातार बादल घेरे हुये है अब बरसात कितनी होती है ये बात की बात है।

Saturday, 13 July 2019

(शीकारे वाली लड़की)

(शीकारे वाली लड़की)
मुझे बार-बार याद आती है,
वे शीकारे वाली लड़की!
डलझील की मदमस्त लहरो को,
वे उसका एकटक देखना,
फिर जादुई हँसी,
हाय!जाने कहाँ खो गई,
वे अदभुत नजारे वाली लड़की,
मुझे बार-बार याद आती है,
वे शीकारे वाली लड़की।
वे उसका तिलिस्मी बदन,
और उसके जुड़े से निकलती वे गुलाब की खुशबू,
अब कही नही मिलती सुघने को,
और कही नही दिखती मुझे,
वे लश्कारे वाली लड़की,
मुझे बार-बार याद आती है,
वे शीकारे वाली लड़की।
पहाड़ो की वे ढ़लती शाम,
वे संगीतमय आवाजे,वे बाँसुरी के स्वर
कही कुछ नही!
बस तन्हाई मे यादो की चंद तस्बीर,
जो हवाओ के झोके से फड़फड़ाती है,
और मै निकल आता हु यादो से उसकी,
बस रह जाती है याद जेहन में,
वे शीकारे वाली लड़की।

###न जाने कब घाटियो मे अब अमन के दिन लौटेगे,न जाने फिर कब डलझील में दिखेगी हम शायरो और कवियो की वे शीकारे वाली लड़की।

Saturday, 6 July 2019

(जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है)

(जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है)
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है,
जिसे मोड़कर कई दिनो से यूँही रख दिया है,
कि समय मिलते ही फिर उस पृष्ठ को खोल पढ़ुगा,
अपने जीवन के हूबहू घटनाओ की वे तमाम बाते,
यानी की गतांक से आगे---------------
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है।
तमाम उठा-पटक झंझावतो का जीवन,
कही कोई विदेशी रोमांटनिजम नही,
एक विछोह,एक दर्द,
हर पृष्ठ के कथनांक के आगे--------
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है।
इसी मोटी सी किताब को,
कुछ लोग लुगदी साहित्य कह,
यू छिटक जाते है जैसे मंटो की भूखी नायिका,
अपने से ज्यादा नंगो को देखती है,
अपनी काली सलवार और कपकंपाती टाँग के आगे-----
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है।
कुछ पन्ने और बचे है पढ़ने को,
कल खत्म कर लुंगा इसे भी,
और बिना मोड़े रख दुंगा,
फिर इच्छा ही नही बचेगी इसके पढ़ने की,
क्योंकि पता चल जायेगा कि क्या कुछ लिखा है,
एै"रंग" इस नावेल मे गतांक से आगे-------
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Thursday, 27 June 2019

(ओ ! कनेर के फूल)

(ओ ! कनेर के फूल)

क्यों ? तुम्हें कोई चाहता नही,

गुलाब की तरह-------

ओ ! कनेर के फूल.

क्यों ? कोई रुपसी तुम्हें

अपने जुड़े मे जगह नही देती,

ओ ? कनेर के फूल.

क्यों ? किसी कब्र पे लोग,

तुम्हें चढ़ाते नही,

क्या ? उन मुर्दों को भी,

कुबूल नही तु-------

ओ ! कनेर के फूल.

क्यों ? कोई महसूस नही करता,

तेरा दर्द

क्यों ? तुम्हें सहलाने,प्यार देने

आता कोई माली------

ओ ! कनेर के फूल.

लिखते है शायर और कवि

सभी फूलो पे,

क्यो ? कोई शेर कोई कविता

तुमपे नही लिखता------

ओ ! कनेर के फूल.

क्यों ? तुम्हें कोई चाहता नही,

गुलाब की तरह-----

ओ ! कनेर के फूल.

@@@रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी.

जज कालोनी,मियांपुर

जिला--जौनपुर 222002 (U.P.)

Mo.no.7800824758

Monday, 3 June 2019

रविवार लिखा

(रविवार लिखा)

तुमने ही तो---------
मेरी दिल की डायरी में रविवार लिखा.
तुमने ही इसे फाड़ा,इसे ठुकराया
और--------
किसी गैर की डायरी में रविवार लिखा.
मेरे ख्वाब की आँख में रेत भर आई,
मै किसी------
मछली सा तड़पता हूं,
ये छुट्टी नही,
मेरी दर्द का दिन है,
फाड़ देता हूं इस दिन मै,
अपने घर का कैलेंडर भी----
जहां पढ़ता हूं रविवार लिखा.
अब तो इतनी सी दुआ है रब,
कि मेरी तरह ना तड़पे कोई,
और किसी की जिंदगी में न आये,
फिर इस तरह------
डायरी में रविवार लिखा.

@@@रचयिता--रंगनाथ द्विवेदी.
Mo.no.7800824758

अखबार लिखता था

(अखबार लिखता था)
वे कलम की रोशनाई से अपने,
एक आग लिखता था।
कल कत्ल हो गया उसका तिराहे पे,
जो अपने अखबार में इंकलाब लिखता था।
वे खुद को बेच न सका कभी,
सियासत के तवायफे महफ़िल मे,
वे मज़लूम की सिसकी को,
फकत आँसू नही तेजाब लिखता था।
अब तो ये लाश जलेगी बेशक,
इसमें सफेदपोश कातील भी सरिक होगा,
ये घड़ियाली आँसू सुख जायेंगे,
ऐ,रंग------कल फिर पैदा होगा
जो स्याह अँधेरे में जलायेगा चराग,
और सारी रात उकेरेगा सच का हौसला,
सुबह फिर लोग कहेंगे,
कि बहुत पहले हमारे शहर में-------
ऐसे ही एक शख्श़ अखबार लिखता था।

@@@पत्रकारिता दिवस के अवसर पर मै सभी पत्रकारो को बधाई देता हूँ जो विसंगतियो के बावजूद मज़लूम और सच की लड़ाई लड रहे है।व दैनिक हिन्दुस्तान के उस पत्रकार को मेरी ढ़ेरो श्रद्धांजलि जिनकी अभी प्रतापगढ़ में हत्या हुई है।

रंडी--एक विभत्स और भयावह यथार्थ

(रंडी---एक विभत्स और भयावह यथार्थ)
"अँधेरी रात मे-------
वे शहर की स्ट्रिट लाइट से टेक लगा,
अपना आधे से अधिक वक्षस्थल खोले,
किसी ग्राहक को रिझाने और लुभाने का प्रयास करती है,
किसी रात जब काफी प्रयासो के इतर,
कोई ग्राहक आता और रिझता नही दिखता,
तो अपनी निदाई आँखो की निद दुर करने को,
वे गाढ़ी और सुर्ख लिपस्टिक के उस तरफ,
अक्सर बीड़ी पीने से सँवलाये होंठो के बीच,
एक बीड़ी दबा--------------
बड़ी अश्लीलता और निर्लज्जता से वे अपने हाथो को,
अपने अधखुले वक्षस्थल मे डाल,
चारो तरफ जलाने को दियासलाई टटोलती है,
उस टटोलने मे स्त्रियोचित कोई संवेदना नही,
बल्कि बेरहमी से दियासलाई निकाल बीड़ी जला-----
कुछ तगड़े-तगड़े सुट्टे ले जब अपने नथुनो से धुआँ निकालती है,
तो उस धुँये की धुँध उसे अपनी एकलौती जीवन सखी लगती है,
कभी-कभी जब एकाध कस की शुरुआत मे ही किसी ग्राहक को आता देखती है,
तो उसे रोज अपनी तरह जली बीना बुझाये फेक,
कुछ इस तरह झुकती है,
कि उसके अधखुले वक्षस्थल थोड़ा और गहरे खुल,
ग्राहक को यौन मदांध कर बाबले और उतावले कर देते है,
उसकी इस झुकन की कलात्मकता ने ही उसे अब तक,
ज्यादा ग्राहक दिये है!
वे हर रात अपने ग्राहक को शिशे मे उतार,
इस स्ट्रिट लाइट की कुछ दुरी पे बने अपने उस दो कमरे की सिलन की बदबू से रचे बसे कोठरी मे ले जाती है,
और उसी कमरे की एक जर्जर तखत पे सो जाती है,
कभी इसी तखत पे दुल्हन की तरह सोने आई थी,
और इसी तखत पे सोने के लिये,
माँ-बाप का घर छोड़----------
प्रेमी के साथ भाग आई थी ये शायद उन्हिं की पीड़ा का श्राप है,
कि सुहाग तखत पे रंडी बन रह गई।
फिर समय के साथ मैने ख़ुदकुशी न की,
हाँ उस शरीर और अंग से बदला जरुर लेती हूँ,
जिसे अगर कुछ दिन और संभाल लेती तो एक औरत होने का,
संम्पुर्ण ऐहसास करती,
मै बलात भागी थी उसी बलात भागने ने जीवन नर्क कर दिया।
हर रात उसका ग्राहक तृप्त हो जब ये जुमले कहता है कि-----
तेरे अर्धखुले वक्षस्थल ब्लाउज मे तो सुंदर थे ही,
और आजाद हुये तो और कयामत व सुंदर हो गये,
ये सुन उसने हमेशा की तरह अपने ग्राहक को मन ही मन मादरजात गाली दे,
फिर अपने उस ब्लाउज को उठा एक रुटीन की तरह,
बीना किसी कोमलता के जबरदस्ती इधर-उधर ठुस,
और उस ठुसने की रगड़ को,
वे राड़ कह खूब हँसती है वे हँसी अपने को और पीड़ित करने की होती है,
फिर उसी तखत पे अस्त-ब्यस्त लेट,
एक रंडी की तरह पुरा दिन बीता उठती है,
नहा धुलकर,गाढ़ी लिपस्टिक लगा चल पड़ती है,
एक बीड़ी होठ पे लगाये उसी स्ट्रिट लाइट की तरफ,
वैसे ही खड़ी हो फिर किसी ग्राहक को,
अपने अधखुले ब्लाउज से रोज की तरह दिखाने अपना,
अाधे से अधिक खुला वक्षस्थल।

@@@एक अलग और दुसरे नेचर की वे रचना जो शायद हर बड़े-छोटे शहर की किसी स्ट्रिट लाइट की रौशनी मे ये पात्रा दिख जाये।

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.------7800824758

Thursday, 2 May 2019

(भयावह जंगल)

बेटियो और बच्चियो के हर रोज हो रहे बलात्कार पे लिखी रचना.
                         (भयावह जंगल)
शहर की भीड़ मे भी हमने देखा है---------
कुछ आदमियो के अंदर का भयावह जंगल.
मासुम सा सीधा-साधा सा दिखने वाला-----
किसी बच्ची का अकेले मे जब रेप करता है,
और होठो पे कुत्सित हँसी दिखती है तो लगता है,
कि एक कमजोर सी चिड़ियाँ,तड़पेगी,चिचिआयेगी,
रहम की भीख मांगेगी,
मगर फिर भी निगल जायेगा उसे------------
इस शहर के कुछ आदमियो के अंदर का भयावह जंगल.
उसके पंख तितर-बितर हो जायेगे,
सबकुछ हा सबकुछ छिन लेगा,
चिड़ियाँ डरेगी,कापेगी,थरथरायेगी---------
फिर भी मजबुरी है जीना उसे भी ये भयावह जंगल.
उसकी डरी-सहमी खुली आँखो मे ये सवाल,
निरूत्तर सा रहेगा कि आखिर चिड़ियाँ,
किस नीड़,किस डाल,किस छाह जाये,
इस डर से वे रोज मरेगी,
बहुत घुटन है इस भीड़ मे,
बिटिया और चिड़ियाँ अब एक सी ही है,
न जाने दोनो को कब निगल जाये,
शहर के बाहर-----------------
और शहर के अंदर का भयावह जंगल.

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी, मियाँपुर
जौनपुर-----222002  (उत्तर-प्रदेश).
no.no.----7800824758

(साइकिल है भाई)

(साइकिल है,भाई)

ये हमारी यादों में, --
बसी हुई, बचपन के--
फिल्म की कुछ रील है, भाई.
ये कैची, मार के चलाता हुआ, मैं
और हमारे दादा की----
बहुत प्रिय ,साइकिल है, भाई.
इस तरफ ----
धान की लहलहाती फसल
और उस तरफ ----
सिंघाड़े वाली झील है, भाई.
जहां गिरे ,चोट तो न आई ,
पर डर गया , उस समय
घर लगा जैसे ----
बहुत मील है, भाई.
दबे पांव,
बचने की जुगत फेल हुई,
दादा ने ,कड़क कर पूछा ,
कहांं गये थे,
उफ !! डर-सहम गया
और सांस यूं लगा कि,जैसे
साइकिल की----
टूटी हुई तील है, भाई.
लेकिन ,दादा समझ गये ,
प्यार से मुझे दुलारा - पुचकारा
और कहा,----
पगले !!मेरे पोते से अच्छी
और प्यारी इस दुनिया में----
नहीं कोई साइकिल है, भाई.

@@ रंगनाथ द्विवेदी

वंदे मातरम गाये

(वंदे मातरम गाये)
शहीद की लाश को जब गाँव दफनाये------
तो वंदे मातरम गाये।
ना बीबी तोड़े चुड़ी ना आँसू बहाये,
फक्र करे हमपे और खुल के मुस्कुराये,
और अपने शौहर की शहादत पे---------
वंदे मातरम गाये।
माँ ने गाई थी बचपन में लोरियां बहुत,
आखिरी इच्छा है कि रोना नही माँ,
गर हो सके तो तु भी मेरी लाश के सिरहाने,
अपने बचपन के लोरियो की तरह-------
वंदे मातरम गाये।
बापु देना कांधा कब्र तक मुझे,
और मिट्टी डालते बखत,
दिल कमजोर मत करना,
क्योंकि मेरी इच्छा है कि आपके लब पे बेटा नही बापु-------
वंदे मातरम आये।
शहीद की लाश को जब गाँव दफनाये-------
तो वंदे मातरम गाये।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

Wednesday, 24 April 2019

(मै कुल्हड़ हूँ)

   (मैं कुल्हड़ हूँ)

मैं कुल्हड़ हूँ,


मैं इतनी खूबसूरत


और सुघर


यूँ हीं नहीं हूँ,


मुझे मेरे कुम्हार नें --


पसीने से तर-ब-तर भीग,


बड़ी मेहनत से गढ़ा है,


फिर सुखने के लिए 


इसने घंटो कड़ी धूप में रख 


मेरी रखवाली की,


सुख जाने पे,


मेरे कुम्हार ने ---


एक एक कर 


बहुत प्यार से मुझे उठाया


ताकि मैं कहीं से


फूटूं न ,उसी प्यार से फिर मुझे


मेरे कुम्हार ने,


आवें मे रख मुझे पकाया


और फिर आवें से निकाल


उसनें  मुझे तका


और पूछा, बता तूं ,


कैसी है??


मैंने भी ---


अपने कुम्हार से कहा,कि


तेरी कला ही कुछ ऐसी है, कि


क्या कहूँ??


बस !तू इतना समझ ले,


मेरे कुम्हार ,


मैं पहले सी खूबसूरत


और सुघर हूँ.


मैं कुल्हड़ हूँ.

@@रंगनाथ द्विवेदी


जज कालोनी,मियांपुर


जिला. जौनपुर 222002(U.P.)


(लाल-बत्ती)

       (लाल-बत्ती)


हमसे पूछो कि कौन रही? लाल बत्ती,


एक दागी विधायक---------------


जब अपने फार्म हाऊस पे,


किसी अबला का रेप कर रहा था,


तो उसकी चीख और सिसकी सुन के,


किसी पत्थर का कलेजा भी पिघल जाता,


लेकिन बाहर------------------


इस होते हुये बलात्कार पर भी मौन रही लाल बत्ती।


दंगे हुये,मौते हुई 


सलमा,रजिया,गुड़िया,लक्ष्मी 


सभी तो मरी लेकिन इन्हें भी,


यादव,पंडित और मुसलमान कहा गया,


बहुत पीड़ा हुई,


जब एक वर्ग को बचाके स्याह रात को,


सरकारी दंगे हुये,


कान पे इसके जूँ तलक न रेंगी,


बल्कि ये जिस गाड़ी मे लगी थी उसी में बैठे मंत्री जी,


शराब के पैग छक रहे थे----------


और लखनऊ की तरफ जा रही थी लाल बत्ती।


थाने बिके,


न्याय गया तेल लेने,


शहर के होटलो मे महिना बंधा,


जूआ और जिस्मफ़रोशी हुई,


ऐस.पी.,डि.यम.,जज सभी तो थे,


लेकिन ये कही और बजा रहे थे------------


एक आम आदमी के न्याय और उसके उम्मीद की लाल बत्ती।


सच इसे अब उतर जाना चाहिये,


क्योंकि जब मै इसे तकता हूँ तो लगता है,


कि जैसे बहुत सारी बेगुनाह लाशो के खून से,


रंगी है एै"रंग"--------------


हमारे देश की हर लाल बत्ती।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।


जज कालोनी,मियाँपुर


जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)


7800824758