मैंने अपने खानदान की तकरीबन एक दर्जन डोरी वाली चड्ढीयों को बहुत ही सहेज और संभाल कर रखा है. इन चड्डियो से मेरे इतने गहरे लगाव का मुख्य कारण यह है,कि मैं अपने खानदान का ऐसा आखिरी चश्मो-चिराग हूँ,-"जो अंग्रेजी के अंडरवियर के जमाने में भी इस डोरी वाली चड्ढी को पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ पहन रहा हूं."
इस आधुनिक युग ने अपने यहां कि, स्वदेशी चड्ढीयों के साथ, अन्याय किया है,इसका मखौल उड़ाया है.सच तो यह है कि,अंग्रेजी के अंडरवियर को पुरे देश में स्थापित करने के लिए हमारे यहां की सरकारें भी दोषी है. इन्होंने पैसे की खातिर हमारी उस डोरी वाली चड्ढी का राष्ट्रीय अपमान किया है,जिसे कभी "मंगल पांडे, अब्दुल हमीद और लाला लाजपत राय पहना करते थे. "सभी कंपनी आज इसी का व्यावसायिक लाभ उठा रही है.
वह अपने अंडरवियर को लोकप्रिय बनाने के लिए किसी स्मार्ट मॉडल से टीवी के विज्ञापन में जब यह कहलवाते हैं कि "यह अंदर की बात है" और उस विज्ञापन के तुरंत बाद ही एक खूबसूरत औरत उस मांडल के कंधे से लग जाती है.तो हमारे यहां के युवाओं को ऐसा लगता है कि जैसे इस अंडरवियर के पहनते ही उनके कंधे से भी कोई खूबसूरत औरत लग जाएगी.
यही स्मार्ट विज्ञापन हमारे देश के नौजवानों को अपने यहां की पारम्परिक चड्ढीयों से इन्हें दूर करता जा रहा है,बस हमारी डोरी वाली चड्ढीयों का यही दोष है कि यह कभी नही कह सकती कि "यह हमारे अंदर की बात है ",
आज मन बहुत उदास हो जाता है, जब कभी मै अकेले में बैठकर अपने द्वारा संग्रहित करके रखी हुई दर्जन भर इन डोरी वाली खानदानी चड्ढीयों को देखता हूं,तो हमारे जेहन में हमारे खानदान वे सारे चेहरे एक-एक कर नुमाया होने लगते है,जिन्होंने कभी मेंरे संग्रह करके रखी हुई इस चड्ढी को पहना था.
मेंरे परिवार की वर्तमान जनरेशन इसे पहनना ही नही चाहती जबकि मैंने अपनी तरफ से उन्हें इस डोरी वाली चड्ढी के पहनने के लिए हर तरह से मोटिवेट करने का प्रयास किया. लेकिन उन सभी को हमारी "यह डोरी वाली चड्ढी, काफी बैकवर्ड लगी".इस "ढाक के तीन पात" वाले परिणाम ने यह साबित कर दिया कि अब हमारी "डोरी वाली चड्ढीयों के अच्छे दिन कभी नही आएंगे".
हाँ! इतना अवश्य होगा कि हमारी डोरी वाली चड्ढी भी एक दिन हमारी लोककला और लोकसाहित्य की तरह विलुप्त हो जाएगी और इतिहास पढ़ाने कालेजों के प्रोफेसर कभी कभार अपने इतिहास के छात्रों को यह बताया और पढ़ाया करेंगे कि, हमारे यहां के पूर्वजों ने "अंडरवियर युग से बहुत पहले ही डोरी वाली चड्डी का अविष्कार कर लिया था ".
यह व्यंग्य मेरा स्वरचित व अप्रकाशित है.
दिनांक-1/3/21
rangnathdubey90@gmail. com
लेखक--रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
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