Sunday, 28 February 2021

व्यंग्य---( हाय! हमारी डोरी वाली चड्ढीयां )

व्यंग्य---( हाय! हमारी डोरी वाली चड्ढीयां  )

मैंने अपने खानदान की तकरीबन एक दर्जन डोरी वाली चड्ढीयों को बहुत ही सहेज और संभाल कर रखा है. इन चड्डियो  से मेरे इतने गहरे लगाव का मुख्य कारण यह है,कि मैं अपने खानदान का ऐसा आखिरी चश्मो-चिराग हूँ,-"जो अंग्रेजी के अंडरवियर के जमाने में भी इस डोरी वाली चड्ढी को पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ पहन रहा हूं."


इस आधुनिक युग ने अपने यहां कि, स्वदेशी चड्ढीयों  के साथ, अन्याय किया है,इसका मखौल उड़ाया है.सच तो यह है कि,अंग्रेजी के अंडरवियर को पुरे देश में स्थापित करने के लिए हमारे यहां की सरकारें भी दोषी है. इन्होंने पैसे की खातिर हमारी उस डोरी वाली चड्ढी का राष्ट्रीय अपमान किया है,जिसे कभी "मंगल पांडे, अब्दुल हमीद और लाला लाजपत राय पहना करते थे. "सभी कंपनी आज इसी का व्यावसायिक लाभ उठा रही है.


वह अपने अंडरवियर को लोकप्रिय बनाने के लिए किसी स्मार्ट मॉडल से टीवी के विज्ञापन में जब यह कहलवाते हैं कि  "यह अंदर की बात है" और उस  विज्ञापन के तुरंत बाद ही एक खूबसूरत औरत उस मांडल के कंधे से लग जाती है.तो हमारे यहां के युवाओं को ऐसा लगता है कि जैसे इस अंडरवियर के  पहनते ही उनके कंधे से भी कोई खूबसूरत औरत लग जाएगी.


यही स्मार्ट विज्ञापन हमारे देश के नौजवानों को अपने यहां की पारम्परिक चड्ढीयों से इन्हें दूर करता जा रहा है,बस हमारी डोरी वाली चड्ढीयों का यही दोष है कि यह कभी नही कह सकती कि "यह हमारे अंदर की बात है ",


आज मन बहुत उदास हो जाता है, जब कभी मै अकेले में बैठकर अपने द्वारा संग्रहित करके रखी हुई दर्जन भर इन डोरी वाली खानदानी चड्ढीयों को देखता हूं,तो हमारे जेहन में हमारे खानदान वे सारे चेहरे एक-एक कर नुमाया होने लगते है,जिन्होंने कभी मेंरे संग्रह करके रखी हुई इस चड्ढी को पहना था.

मेंरे परिवार की वर्तमान जनरेशन इसे पहनना ही नही चाहती जबकि मैंने अपनी तरफ से उन्हें इस डोरी वाली चड्ढी के पहनने के लिए हर तरह से मोटिवेट करने का प्रयास किया. लेकिन उन सभी को हमारी "यह डोरी वाली चड्ढी, काफी बैकवर्ड लगी".इस "ढाक के तीन पात" वाले परिणाम ने यह साबित कर दिया कि अब हमारी "डोरी वाली चड्ढीयों के अच्छे दिन कभी नही आएंगे".

हाँ! इतना अवश्य होगा कि हमारी डोरी वाली चड्ढी भी एक दिन हमारी लोककला और लोकसाहित्य की तरह विलुप्त हो जाएगी और इतिहास पढ़ाने कालेजों के प्रोफेसर कभी कभार अपने इतिहास के छात्रों को यह बताया और पढ़ाया करेंगे कि, हमारे यहां के पूर्वजों ने "अंडरवियर युग से बहुत पहले ही डोरी वाली चड्डी का अविष्कार कर लिया था ".



यह व्यंग्य मेरा स्वरचित व अप्रकाशित है.
दिनांक-1/3/21
rangnathdubey90@gmail. com

लेखक--रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
mo. no.7800824758

(होली और समाजवादी कवि-सम्मेलन )

(होली और समाजवादी कवि-सम्मेलन)
डरिये नही क्योंकि--------------
यहाँ न बीवी न उसके हाथ मे बेलन है,
आज छूट है,आॅफर है,लाभ उठाये
ये हम जैसे बेलन सिद्ध कवियो का-----
एक समाजवादी कवि-सम्मेलन है।
यहाँ सबसे सीनियर कवि को,
आशाराम बापु स्वर्णभष्म सम्मान से अलंकृत कर,
उससे इस कवि-सम्मेलन की अध्यक्षता करवायेंगे,
और किसी महिला कवयित्री को----------
हनीप्रित सम्मान से नवाज कर,
किसी राम-रहीम नेचर के कवि से,
उसके गुलाबी गालो पे अबीर मलवायेंगे।
बैंक से पैसे न निकलपाने के कारण,
इस कवि-सम्मेलन का भुगतान,
हम विथ जियसटी के होली बाद करवायेंगे।
क्योंकि हम कवि है कोई नीरव मोदी नही,
हमारी तो बीस हजार की खातिर,
जाँच पचीसो करवायेंगे-------
और ये निश्चित है कि वे हमे किसी नियम पाँच मे बझायेंगे,
इसलिये हम उनके कथनानुसार,
अपने ही पैसे को होली बाद ही ले पायेंगे।
हे! भगवान अजीब स्थिति है--------
कलम किंग और पीयनबी वाले बड़े-बड़े,
फैंसी फ्राडो का भुगतान करोड़ो और अरबो का करवायेंगे,
और हमे हमारे ही चंद हजार के लिये,
बैंक का दिवाल पे लिखा नियम पढ़वायेंगे,
अब तो कालेधन की छोड़िये-----------
उजला धन तो अब काले से ज्यादा जा रहा,
विपक्ष मे राहुल ट्वीट पे ट्वीट कर पुछ रहे,
अपनी अगली होली----------
दो हजार उन्नीस मे ढूंढ रहे,
यानी भाजपा के लिये बसंती,
तो राहुल के लिये अगला चुनाव------
एै "रंग" विदेशी हेलन है।
ये हम जैसे बेलन सिद्ध कवियो का------
एक समाजवादी कवि-सम्मेलन है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर---222002 (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Friday, 26 February 2021

कविता--(लोकसभा की होली )

(लोकसभा की होली)
लाईब टेलिकास्ट हो---------
सभी चैनलो पे लोकसभा की होली!
अध्यक्ष को पिलाई जाय भांग,
और पियम(PM) को खिलाई जाय भांग वाली गोली।
पन्द्रह मिनट----------
पुरे सदन को शुरु होने से पहले,
मनमोहन कब बोले थे रिकार्ड से निकाल--
उनकी सुनवाई जाय बोली।
राहुल के लिये-----------
कुछ कुँवारियाँ बुलवाई जाये,
और उनकी माँ की बगल मे रखवाई जाय--
एक बहु वाली डोली।
भगवंत मान बेचारे आपके टंच रहे,
पीके तमाम पिनेवालो के प्रतिनिधी,
यानी अंग्रेज़ी और देशी के सरपंच रहे,
और उनसे लगवाई जाये-----------
विजय माल्या की तस्वीर पे अबीर वाली रोली।
लाईब टेलिकास्ट हो-------------
सभी चैनलो पे लोकसभा की होली।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

(खूबसूरत औरत नही देखी )

(खूबसुरत औरत नही देखी)
माथे पे चुह-चुहाता पसीना,
कमर पे खुशी साड़ी!
और सर पे सीमेंट की भदेली,
श्रम की मादक चाल!
ऐ,रंग---मेरी कविता ने कभी-------
इतनी खूबसुरत औरत नही देखी।

(फागुन मोहब्बत के फ्लेवर का महीना है )

(फागुन मोहब्बत के फ्लेवर का महिना है)
ये गुन-गुने मिजाज़,तेवर का महिना है,
वे देखो सज रही है घंटो दर्पण के सामने,
ये उसके पिया के दिये जेवर का महिना है।
भाभी टटोलती है ननद और देवर को,
ऐ,रंग--इस देश मे फागुन----
मोहब्ब़त के फ्लेवर का महिना है।

Thursday, 25 February 2021

कहानी---(प्राइवेट अस्पताल और डॉक्टर )

कहानी----(प्राइवेट अस्पताल और डॉक्टर  )

वह शहर का सबसे प्रसिद्ध प्राइवेट हॉस्पिटल था, जिसकी सीढ़ियों तलक पर चमचमाते हुए संगमरमर के पत्थर लगे थे.उसी अस्पताल के अंदर एक औरत जो कि पहनावे से ही काफी गरीब लग रही थी,अपने बीमार बच्चे को दिखाने के लिए वहां के सभी कर्मचारियों से गिड़गिड़ा रही थी, लेकिन उन सभी के कानों पर जैसे जू तक नही रेंग रही थी, बल्कि वे सभी आपस में बाते करते हुए जोर-जोर से हंस रहे थे.


वह हिम्मत करती फिर उनसे कहती, उनसे गिड़गिड़ाती,कि भगवान के लिए एक बार मेंरे बच्चे को डॉक्टर साहब को बुलाकर दिखा दीजिए आप सब की मुझ गरीब पर बड़ी कृपा होगी.कई बार ऐसा करने पर वह सभी बोले,  अरे जाओ! अभी डॉक्टर साहब के आने का टाइम नही हुआ है. ऐसा वे सभी उस औरत के चले जाने के लिए कह रहे थे, लेकिन जिस माँ का बच्चा बीमार हो वे माँ अपने बच्चे को बचाने की कोशिश भला कैसे छोड़ सकती है.


उसने भी यह कोशिश और उम्मीद नही छोड़ी. लेकिन शायद इस बार की उसकी कोशिश से अस्पताल के सारे स्टाप उससे झूझला गए और उस औरत को जबरदस्ती या बेरहमी से उस औरत का हाथ पकड़ा और अस्पताल के बाहर कुछ इस तरह धकेला कि वह औरत अपने बीमार बच्चे के साथ गिरते-गिरते बची.


फिर वह कुछ देर उस अस्पताल के चमचमाते पत्थर लगी सीढ़ियों के एक किनारे अपने बीमार बच्चे को लेकर बैठ गई. जैसे वह डॉक्टर के आ जाने का इंतजार कर रही हो. इसी उम्मीद में वह बीच-बीच में अपने बच्चे को देखती और धीरे-धीरे थपकती जैसे वह अपने बच्चे को समझा रही हो,कि बस बेटा थोड़ी देर और बर्दाश्त कर ले फिर तू  एकदम भला चंगा हो जाएगा जबकि उसकी उस थपकी से उसके बच्चे के शरीर में कोई हरकत नही हो रही थी.


तभी उसकी कानों में डॉक्टर साहब आ गए, डॉक्टर साहब आ गए के का शोर सुनाई पड़ा, और इतना सुनते ही उसकी बुझी आँखों में जैसे अचानक कोई रौशनी आ गई हो. वह झट से उठकर अपने बच्चे को डॉक्टर को दिखाने के लिए ज्यो हि अपने बच्चे को उठाने का प्रयास करती है,तो उसके बच्चे के शरीर में कोई हरकत नही होती. वह औरत बहुत जोर से चिखती है और अपने बच्चे को लिए-लिए ही एक तरफ ढुलक जाती है.


और उस अस्पताल का पुरा स्टाप उस चिखने वाली औरत की तरफ दौड़ पड़ा, दौड़ने वालों में वह डॉक्टर भी शामिल था. लेकिन इन सभी ने दौड़ने में बहुत देर कर दी. काश! यह सभी लोग तब दौड़े होते जब यह औरत अपने बीमार बच्चे को डॉक्टर साहब से दिखाने के लिए इन सभी से गिड़गिड़ा रही थी, लेकिन अब वही डॉक्टर उस औरत और उसके बच्चे की नब्ज़ देखने के बाद बोला कि, यह दोनों मर चुके है, इनकी डेड बॉडी जल्दी से अस्पताल के सामने से हटवाओ, इतना कहकर डॉक्टर चला गया.

यह संवेदन हीनता महज़ एक शहर के अस्पताल या डॉक्टर की नही बल्कि देश के ना जाने कितने ऐसे  प्राइवेट अस्पताल और डॉक्टर की है जिसके फर्श तलक महंगे संगमरमर के टाइल्स से चमक रहे है, लेकिन उन पत्थरो की सीढ़ियों पर हर महीने कोई ना कोई ऐसी मजबूर माँ अपने बच्चे को बचाने के लिए इन बेरहम लोगों के सामने गिड़गिड़ा रही होगी.


लेकिन उसे भी कुछ इसी बेरहमी के साथ अस्पताल के बाहर सीढ़ियों की तरफ धकेल दिया जाता होगा, और वहां का डॉक्टर बिल्कुल यहां के डॉक्टर की तरह नब्ज़ देखकर कह रहा होगा की दोनों मर गए है, इनकी डेड बॉडी जल्दि से अस्पताल के सामने से हटवा दिया जाए

Tuesday, 23 February 2021

कविता---(आवारा किस्सों में याद रहूंगा )

(आवारा किस्सो मे याद रहुंगा)
एै दुनिया--------------------
मै अपने आवारा किस्सो मे वे रहुंगा।
किसी तवायफ के कोठे की वे बदनाम रौशनी,
जहां की सिढ़ियो पे पड़े थे मेरे पाँव,
मै उन अनगिनत-----------
कोठे की सिढ़ियो पे याद रहुंगा।
एै दुनिया------------
मै अपने आवारा किस्सो मे  रहुंगा।
जब कही-------------
पीने-पिलाने वालो की बोतले खुलेंगी,
कहकहे और गम छलकेंगे,
मै एैसी हर जगह----------
की बदनाम चुस्कियो मे याद रहुंगा।
एै दुनिया-------------
मै अपने आवारा किस्सो मे याद रहुंगा।
बहुत कुछ लिखा है मेरी कलम ने------
मंदिर,मस्जिद,गुरुद्वारे पे,
लेकिन वे कुछ अलहदा नही आम सा लेखन है,
हाँ! एक किताब है जिसमे मैने---------
एक औरत को मुकम्मल नग्न कामुक,
शारिरीक संबंधो की तपती आँच पे लिखा है,
जो शायद मुझे अपने वक़्त का मंटो बना देगी,
लोग आहे भर पढ़ेगे!
तमाम अदब की मज़लिसो में आलिम-फाज़िल लोग मुझे उधेड़ेंगे,
मै उनकी उन्ही जलिल करते हुये----
हर्फो मे याद रहुंगा।
एै दुनिया----------
मै अपने आवारा किस्सो मे याद रहुंगा.

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर Pin.no.222002 (U P).
जिला--जौनपुर।
mo.no.-----7800824758


Sunday, 21 February 2021

(आवारा शाम हूं )

(एक आवारा शाम हूं )
धुँधला जाते है एै "रंग"----------
मेरी आगोश मे चेहरे,
मै शरीफ़ो के शहर की----
एक आवारा शाम हूं ।

Friday, 19 February 2021

(ब्राह्मण काफ़िर हो गया है )

(ब्राह्मन काफ़िर हो गया है)
मंदिर की गली से गुज़र जाता है,
तुम्हारी गली की तरफ!
तुम्हारी मोहब्बत मे--------
एक ब्राह्मन काफ़िर हो गया है।

Thursday, 18 February 2021

(रोटियों के जलने के निशान मिलते है )

(रोटियो के से जलने के निशान मिलते है)
अँधेरी रात वे औरत है--------
जो सिसकती है फूटपाथ पे होंठ कुचलकर!
इसे पति की छुअन नही मिलती,
इसके पुरे बदन पे ऐ,रंग---------
बस रोटियो के से जलने के निशान मिलते है।

कविता--(सावधान!सामने चुनाव है )

(सावधान!सामने चुनाव है)
सावधान!
सामने चुनाव है।
आपको अपना बताना------
इनका राजनीतिक दाव है!
सावधान !
सामने चुनाव है।
इतने दिन याद नही आये,
अब कहते है----------
ये इनके पुरखो का गाँव है!
सावधान!
सामने चुनाव है।
मुसहर बस्ती की दशा ज्यो की त्यो,
भूखो मरा बुनकर,
उसकी बेवा के सामने घड़ियाली आँसू,
कुछ करने के वादे--------
चेहरे पे ताव है!
सावधान!
सामने चुनाव है।
झोपड़ी की रोटी-चटनी छक रहे,
खाट पे बैठे हँस रहे-------
बढ़ा काका और काकी से इनका लगाव है!
सावधान!
सामने चुनाव है।
इनका चरित्र समझ से परे,
एै,रंग----ये लोकतंत्र की आड़ है,
वरना कोयल की कुक में-----
ये कौवो की काँव है!
सावधान!
सामने चुनाव है।
@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर----222002
mo.no.7800824758

धन्यवाद!दैनिक भारत संवाद के संपादक बड़े भईया अशोक सत्यवीर जी का जिन्होने आज के साहित्यिक परिशिष्ट मे मेरी कविता"सावधान!सामने चुनाव है"को अपना बहुमूल्य स्नेह दिया।

कविता---(सपेरे की बिटिया )

(सपेरे की बिटिया)
कभी पढ़ने आती थी हमारे स्कूल में,
सपेरो की बस्ती से---------------
एक सपेरे की बिटिया।
वे तमाम किस्से सुनाती थी साँपो के अक्सर,
वे खुद भी साँपो से खेलना जानती थी,
पर वे मासुम नही जानती थी,
इंसानी साँपो का जहर,
एक दिन-----------
उसी मासूम की नग्न लाश,
उसकी बस्ती से पहले--------
पड़ने वाले एक झुरमुट में पाई गई,
मै सिहर गया!
उस नग्न मासूम की लाश देख,
मै अब भी इतने सालो बाद भी-----
अपनी उस मासूम छात्रा को भूल नही पाता,
हर नाग पंचमी को वे मेरी जेहन मे
उभर आती है,
और पुछती है मुझसे कि बताईये न सर,
कि कैसे चुक गई,
अपने पुरे बदन पे रेंगे हुये नाखूनि साँपो से,
एक सपेरे की बिटिया।
@@@आप सभी को नाग पंचमी की बधाई।
## # रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
एडवोकेट कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।

कविता---(पूजा या अजान से ढकति है )

(पूजा या अजा़न से ढ़कती है)
मुझे उस मजबूर औरत की----------
टूटी चुड़ियो की आवाज़ ईधन की लगती है,
वे अपने ग्राहक की गर्म साँसो पे,
अपनी मजबूरीयो का-------------
कई दिनो से पड़ा हुआ ठंडा तवा रखती है।
उसकी चीख और पीड़ा में,
उसके भूखे बच्चो के खाली पेट भरने वाली रोटी-----------------
की खुशी दिखती है।
वे अपने कपड़े समेट ब्लाउज पहन,
जब अपनी उरोजो में ये रुपये रखती है,
तभी उसकी नज़र उसी कमरे मे--------
टंगे हुये एक माँ के नंंगे उरोज वाले,
कैलेंडर पर पड़ती है,
जो अपने मासूम बच्चे का पेट इसी उरोज से भरती है।
वे एक मर्तबा फिर-------------
इस कमरे मे से निकलने से पहले,
अपने बंद ब्लाउज में--------------
रंखे पैसो को अपने जख्मी उरोजो के बीच टटोलती है।
न जाने क्यू उसके वे दोनो उरोज,
हमारे दो किरदार से लगते है!
एै,रंग-----मुआफ करना
मैले हो जाते है फिर भी कभी-कभी ,
कुछ औरतो के यही उरोज,
चाहे वे इसे पूजा के आँचल या-------
किसी मस्जिद के अजान से ढ़कती है।

कविता---(सुलगती सिगरेट )

लगाये बैठा है—————-
होंठो पे अपनी वे सुलगती सिगरेट!
बगल में अनगिनत टुकड़े गिरे है,
धुआँ है!
उस कमरे में जिस कमरे में कभी तुम,
छिन के फेक दिया करती थी,
उसकी अधजली सिगरेट।
अब होंठ पे लगा भुल जाता है,
वे तो सुलगते-सुलगते,
जब होंठ के आखिरी सिरे पे पहुँचती है,
तो वे चौकता है!
फिर जला होंठो पे रख लेता है,
वे अपने एक नई सिगरेट।
और तकने लगता है दरवाजे की तरफ,
कि शायद तुम लौट के आओ,
छिन के फेकने इसके होंठो से,
अधजली सिगरेट।
एक सुबह———-
दरवाज़ा खुला था लोगो की भिड़ थी,
शायद कुछ देर पहले ही मरा है,
क्योंकि—————-
अभी भी उसकी होंठो पे एै,रंग
धीरे-धीरे आगे बढ़ रही बुझने के लिये,
बिल्कुल इसके जीवन की तरह——-
ये सुलगती सिगरेट।

कविता---(कैडिल नाइट )

बहुत उदास है—————
आज हमारे तुम्हारे मोहब्बत की,
कैंडिल नाईट।
मै वही बैठी हूँ ठिक सामने,
बस वे जगह खाली है-
जहां तुम बैठते थे,
आज बहुत उदास है मेरे अंदर जिंदगी,
मै टुट रही हूँ!
मेरे संग बीत रही है,
बस तुम्हारे खूबसूरत यादो की—–
कैंडिल नाईट।
शायद कही चुक गये हम,
इसी से हमारे रिश्ते में गलतफ़हमी बढ़ती गई!
तुम अलग हो गये मै अलग हो गई,
अब तो अक्सर————–
डिनर मेज पे ही रह जाता है,
और मै कुर्सी पे बैठी यु ही,
गुजार देती हू————-
अपनी कैंडिल नाईट।
गर गुंजाइश हो तो लौट आओ,
एक मर्तबा ही सही मुआफ करने,
क्योंकि ऐ,रंग—–कही ऐसा न हो,
कि तेरा इंतजार करते-करते,
हमेशा के लिये बुझ जाये,
मेरी ये कैंडिल नाईट।

कविता--(औरत के अंग )

(औरत के अंग)

हा मै औरत हू-----------
इसलिए तो तुम्हारे उन अंग विशेष,
को मै तकने भर से जान जाती हू,
कि तुम्हारी मंशा मेरे उन अंगो के-----
बस नोचने-खसोटने और मसलने से है।
जबकि एक औरत के वही अंग विशेष,
अपने पती के प्यार पाने के वक़्त भी,
शर्म ओढ़े रहते है,
क्योंकि उसमें किसी तरह की नोच-खसोट नही,
बल्कि एक-दुसरे के परम विश्वास का देव श्पर्श है।
हा!शायद तुम्हारा पुरुषपन अंदर से सध नही पाता,
किसी एक समर्पित अंग से बध नही पाता,
वरना तकते तो तुम्हें भी अपनी पत्नी का वे अंग,
उतना ही आकर्षित करता------------
जीतना की पर स्त्री या औरत का।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

Wednesday, 17 February 2021

(जींस और टी-शर्ट वाली औरते )

(जींस और टी-शर्ट वालि औरते)
मुझे ये जींस और टी-शर्ट पहनी औरतो से,
ज्यादा खूबसूरत लगती है--------------
घर की गृहस्थ साड़ी पहनी औरते।
जिम्मेदारियो की इनके लोच और खम की रोमांटिकता,
मेरे अंदर एक सिहरन भर देती है,
उसके बालो का इधर-उधर का बिखरापन,
फिर उसकन लिये,
जूठे पड़े घर के बरतनो का माजना,
और उसपे हल्की-हल्की चुड़ियो की आवाज का संगीत,
ये संगीत क्या जाने?
क्लब मे भौंडे म्यूजिक पे थिरकती------
ये जींस और टी-शर्ट वाली औरते।
सेक्स अपील की विद्रुपता और अश्लील फिगर से,
कही ज्यादा खूबसूरत लगती है,
अपनी साड़ी खोसे,
उस गृहस्थ औरत का थकी-मादी उठ,
टाॅवल ले बाथरुम में,
शाॅवर के नीचे नहाना,
उसके नहाने की शालिनता का ये शास्त्रियपन,
को क्या जाने?
स्विमिंग-पुलो मे अर्धनग्न नहाती-------
ये जींस और टी-शर्ट वाली औरते।

@@@इस रचना का आशय किसी माडर्न या आधुनिक औरत को आहत करना कतई नही है ये महज़ एक रचना मात्र है।

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

(संवेदना मर गयी होगी )

(संवेदना मर गयी होगी)
आठ साल की मासूम से रेप हुआ है,
एक मस्ज़िद के बगल मे!
सवाल मज़हब का नही,ना इस्लाम का है,
ऐ,रंग-----बस किसी इंसान की-----
संवेदना मर गयी होगी।

Sunday, 14 February 2021

लघुकथा---( हैप्पी न्यू ईयर)

लघुकथा----(हैप्पी न्यू ईयर)

यू तो 31 दिसंबर की रात भीषण ठंड से ठिठुरती हुई जश्न और हैप्पी न्यू ईयर की रात थी जिसमें  राजेश के सभी दोस्त शामिल थे. उन्होंने इस जश्न में राजेश को भी शामिल करने के लिए बहुत प्रयास किया लेकिन राजेश ने अपने दोस्तों से साफ-साफ इस जश्न में शामिल होने से मना कर दिया हालांकि उससे उसके कुछ दोस्त नाराज भी हुए लेकिन राजेश ने इसकी कोई भी परवाह नहीं की.

और जब उसके सभी दोस्त नए साल को सेलिब्रेट. करने में पूरी तरह डूब गए, तो राजेश चुपचाप अपने घर से बाईक पर 15 कंबल लेकर बैठा और वे रेलवे स्टेशन और रोडवेज के फुटपाथ की तरफ चल पड़ा जहां पर इस भीषण ठंड में ठंड की वजह से कांप रहे असहाय और बेसहारा बूढ़ो को वे कंबल देकर हैप्पी न्यू ईयर कह रहा था.

14 कंबल इन बूढ़ो को देने के बाद जब राजेश ने अपना 15वां कंबल एक बूढ़े को देने के लिए हाथ बढ़ाया तभी आतिशबाजी की आवाज के साथ ही रोशनी की चकाचौंध से पूरा शहर नहा गया इसका मतलब था कि अब इस जश्न व पार्टी में एक दूसरे को हैप्पी न्यू ईयर कहने की शुरुआत हो गई थी.


लेकिन शहर की इस रोशनी के तले एक भयावह अंधेरा भी था, जिसे शहर की यह अय्याशी किसी भी कीमत पर हैप्पी न्यू ईयर नहीं कह सकती.जबकि इन्हीं में से कई बूढ़ो ने सिर्फ अपने बेटों के हैप्पी न्यू ईयर के लिए अपने तमाम हैप्पी न्यू ईयर कुर्बान कर दिये होंगे.

यह सोच राजेश के होठों पर एक टीस और पीड़ा भरी मुस्कान आई फिर वे घर की तरफ अपने बाइक से चल पड़ा और रास्ते भर ये गाना राजेश को हर चौराहे क्लब,और रेस्टोरेंट से सुनाई पड़ता रहा नए साल का पहला जाम, आपके नाम, बोलो-----हैप्पी न्यू ईयर.



यह लघुकथा मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.


लेखक---रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर pin.no.222002 (U P )
Mo. no.7800824758

व्यंग्य---( विद्वान कहलवाने की ठेलम-ठेल )

व्यंग्य----(विद्वान क़हलवाने की ठेलम-ठेल )

इस समय हमारे पूरे देश में खुद को विद्वान कहलवाने  की एक अजीब सी ठेलम-ठेल मची हुई है. उस पर भी तुर्रा यह है कि अगर आपने गलती से या भूल से किसी को विद्वान कह दिया तो यह 24 कैरेट सच मानिए की वह व्यक्ति आपकी इस उपमा से इतना डिस्टर्ब हो जाएगा कि उसे किसी अन्य व्यक्ति के नेटवर्क में,आने के लिए चार से छ महीने लग जाएंगे. लेकिन वे  फिर कभी आपके नेटवर्क में आ पाएगा या नहीं इसकी कोई संभावना नहीं.

दरअसल आजकल ऐसे तथाकथित विद्वान कुकुरमुत्ते की तरह, हर क्षेत्र में बहुतायत की संख्या में हो गए हैं.चाहे वह साहित्य का क्षेत्र हो, राजनीति का क्षेत्र हो या फिर बाबागिरी का. सबकी अपनी अलग-अलग एक स्वादिष्ट विद्वता है, ऐसे ही विद्वानों में अगर किसी की डिजिटल विद्वता वायरल हो गई तो समझिये एक तरह से इनके विद्वता की बल्ले बल्ले है. अगर काम चलाऊ टाइप की विद्वता है तब भी हालांकि कोई खराबी नहीं.

स्थापित ना हो पाने वाले विद्वानो के दिल पर क्या गुजरती है, यह वही विद्वान समझ सकता है, जिसको की दो-चार लोगों ने कभी भी विद्वान नहीं कहा है. मेरी जानकारी में एक ऐसे ही होनहार विद्वान मिल गए जिनकी फोटो एकाध माला के साथ शायद गलती से किसी अखबार में छप गई, उन्होंने इस अखबार की कई प्रतियां ना सिर्फ खरीदी, बल्कि इस अखबार में  छपी अपनी फोटो को पूरे क्षेत्र में तब तलक दिखाया जब तलक की उस क्षेत्र के दो दर्जन से अधिक व्यक्तियों ने उन्हें विद्वान नहीं कह दिया.

जितने लोगों ने उन्हें उस दिन विद्वान कहा था उन व्यक्तियों के पूरे नाम को उन्होंने अपनी होनहार मेमोरी में कुछ इस तरह रट लिया था जैसे बचपन में किसी बच्चे ने अपने स्कूल की एबीसीडी रट ली हो,  उन्होंने इतना ही नहीं किया बल्कि, उनके प्रति अपना नैसर्गिक आचरण भी बदल लिया वे क्षेत्र के ऐसे व्यक्तियों से इस तरह मिलने लगे जैसे किसी व्यक्ति को वृद्धावस्था में शिलाजीत ने रिएक्शन कर दिया हो.

अतः यह मेरा व्यक्तिगत मशवरा है कि किसी भी व्यक्ति को विद्वान कहने से पूर्व अपनी बुद्धि का डिजिटल टेस्ट कर ले, उसके बाद ही किसी व्यक्ति को विद्वान कहने का रिस्क ले, क्योंकि यह एक खतरनाक राष्ट्रीय गलती है.


यह व्यंग्य मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.



लेखक--रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
mo.no.7800824758

लघुकथा---(मेरी पत्नी काव्या और वेलेंटाइन-डे )

लघुकथा----(मेरी पत्नी काव्या और वैलेंटाइन-डे )

काव्या से मेरी शादी होने के कुछ ही महीने बाद एक दिन ऑफिस से लौटते समय मेरा रोड एक्सीडेंट हो गया.जिसमें मेरे दाहिने पैर की हड्डी टूटने के साथ ही कुछ गंभीर चोटे भी आई थी.

डॉक्टर ने मुझे देखने और मेंरे दाहिने टूटे हुए पैर में  प्लास्टर चढ़ाने के साथ ही सख्त हिदायत देते हुए कहां की कम से कम तुम्हें 3 महीने कंप्लीट बेड रेस्ट करना होगा. डॉक्टर की बात सुनकर मुझे एक धक्का सा लगा.

क्योंकि मुंबई जैसे महानगर में मेरे और काव्या के अलावा, हमारे परिवार का कोई भी सदस्य यहां नहीं रहता था. अतः अस्पताल से अपने फ्लैट में आने के बाद,मैंने काव्या से कहा की काव्या अगर तुम कहो तो मैं गांव से किसी को यहां बुला लूं, ताकि तुम्हें कोई परेशानी ना हो.

मेरे इतना कहते ही काव्या की आंखों में आंसू आ गए शायद काव्या मेरे अंतर्मन के भाव को समझ गई और  वह बोली की क्या एक पत्नी अपने पति का 3 महीने सेवा भी नहीं कर सकती, मैं काव्या के इस कथन से झेंप  गया और मुझे थोड़ी सी आत्मग्लानि भी हुई. जिस को छिपाने के लिए मैंने काव्या के सामने अपने दोनों  हाथों से कान पकड़ने के साथ ही सॉरी कहा.

तब कहीं जाकर काव्या के गुलाबी और खूबसूरत होठों पर मुस्कान आई, फिर काव्या की मोहब्बत और मेहनत की बदौलत मैं 3 महीने से पहले ही चलने फिरने लायक हो गया, और जब मैं पूर्णतः ठीक हो गया तो, काव्या के साथ कैंडल नाइट डिनर करने के लिए एक होटल में गया और वहां एक प्राइवेट केबिन बुक कराने के बाद वेटर को खाने और नाश्ते का आर्डर दे दिया जिसे लेकर वेटर केविन से बाहर चला गया.


इसके बाद मैंने काव्या से कहा कि जानती हो काव्या आज कौन सी तारीख और कौन सा दिन है,तो काव्या ने कहा जी मैं तो नहीं जानती. उसकी इस सादगी पर मैं बावला सा हो गया. लेकिन अपने आप को संयत करते हुए,  मैंने कहा चलो कोई बात नहीं,बस तुम अपनी यह दोनों खूबसूरत आंखें कुछ देर के लिए बंद कर लो तो फिर मैं तुम्हें बताऊं कि आज कौन सी तारीख और कौन सा दिन है?


काव्या ने जब अपनी खूबसूरत आंखें मूंद ली तो मैंने एक नजर काव्या को देखा और फिर मैंने काव्या को अपनी खूबसूरत आंखें खोलने के लिए कहा, जब काव्या ने अपनी खूबसूरत आंखें खोली तो उसने मेज पर रखे हुए एक दिल के आकार के गुलाबी डिब्बे को देखा और उसे खोला,खोलने के बाद जब उसने उस डिब्बे में रखी हुई हीरे की अंगूठी को देखा तो वह बोली, कि आप ही इसे मेरी उंगली में पहना दीजिए.


मैंने काव्या की उंगली में अंगूठी पहनाते हुए कहा जानती हो काव्या, कि मैंने तुमसे क्यों पूछा था कि आज कौन सी तारीख?और कौन सा दिन है?.आज की तारीख '14 फरवरी है', जिसे सभी प्यार करने वाले और मोहब्बत करने वाले अपने दिल के जज्बात के इजहार का दिन भी कहते है यानि की वेलेंटाइन-डे ,और मैं भी आज तुमसे अपनी मोहब्बत का इजहार करता हूं, आई लव यू मेरी काव्या. क्योंकि एक्सीडेंट के बाद मै सही अर्थों में तुम्हें समझ और पहचान पाया, सच तुम मेरे लिए और मेरी जिंदगी के लिए एक पिंक खूबसूरत गुलाब हो, जिसे मैं ता जिंदगी, आई लव यू कहता रहू तब भी कम है.


यह कहानी मेरी स्वलिखत व अप्रकाशित है.


लेखक--रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
mo. no.7800824758

लघुकथा---(तवा ठंडा हो गया )

लघुकथा---(तवा ठंडा हों गया )

शहर से दुर पड़ने वाली बस्ती की एक जर्जर झोपड़ी के बाहर,उस बस्ती की तमाम औरते जुटी आपस में कानाफूसी कर रही थी, उसका कारण था उस झोपड़ी में रहने वाली वह औरत जो झोपड़ी के बाहर काफी सारा दिन निकल आने के बावजुद भी पागलो की तरह बैठी अपनी गोदी में लिटाए हुए बिटिया को थपक रही थी.


लेकिन उस औरत के थपकने के बाद भी उसकी बिटिया में कोई भी हरकत नही हों रही थी. तभी उन औरतों में से एक औरत जो कि देखने और अपने बात करने से ही साफ लग रही थी कि वह औरत इस बस्ती की सारी औरतों की चोधरी थी, ने जाकर उस गोद में ली हुई बिटिया की माँ को जोर से झिझोड़ा तो अचानक उस औरत ने कहा धीरे बोलो चाची अभी मुन्नी जाग जाएगी.


लेकिन उस चाची ने मानो कुछ भी ना सुना हों उसने बड़ी जोर से उस औरत की गाल पर तमाचा मारा और कहा कि पागल हों गई हों चंपा तुम्हारी बिटिया तो ना जाने रात में कब कि मर चुकि है. इतना सुनते ही चम्पा चीख उठी नही और फिर बेहोश हों गई.


जब चंपा को पानी के छींटे मारकर उसे होश में लाया  गया तो चंपा चुपचाप उठी और अपनी झोपड़े के अंदर से जब वह लौटी तो उसके हाथ में एक लोहे का तवा था जिसे वह बस्ती की सभी औरतों को दिखाती हुई बोली देखो तो चाची यह तवा कितना गरम है ना  अभी मैं इसपे गरम-गरम रोटियां सेक कर मुन्नी को खिलाऊंगी.


उसकी इस हरकत से बस्ती की सारी औरतें जान गई कि चंपा को बिटिया के मर जाने का तगड़ा झटका लगा है और लगे भी क्यों ना आखिर सारी रात उसने अपनी भूख से बिलबिला रही बिटिया को गोल से रोटी के आकर के चाँद को दिखा-दिखाकर अपनी बेटी को  उस रोटी के पक जाने का झूठा दिलाशा देकर सुलाने की कोशिश करती रही, लेकिन इस दिलाशा को टूटना था और अंततः इस दिलाशा के टूटते ही इसकी मासूम बेटी के प्राण-पखेरू उड़ गए.और एक माँ के वात्सल्य का तवा हमेशा-हमेशा के लिए ठंडा हो गया.



यह लघुकथा मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है.


लेखक---रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
Mo. no.7800824758

Thursday, 11 February 2021

(तारे ज़मी पर )

(तारे ज़मी पर)
ना समझना कभी बोझ-इनको अपने पापा-मम्मी पर,
ना हँसना कभी दोस्त इनकी कमी पर।
हासिल करेंगे ये भी सारी सफलता------------
जब चमकेंगे एक दिन ये तारे ज़मी पर।

 @@विकलाँग(दिव्यांग) बच्चो के प्यार व स्नेह को समर्पित एक रचना।

(लोकतंत्र )

(लोकतंत्र)
आम आदमी को दिल मे पैबस्त करती है,
ये झुठ के सारे मुल्लमे ध्वस्त करती है।
ऐ,रंग----लोकतंत्र मे लोक इसकी आत्मा है।
ये वोट दे खुद को स्पष्ट करती है।