Wednesday, 27 November 2024

(आसमानी किताब हो)

(आसमानी किताब हो)
खुद को जरा सलिके से रंखो----
ऐ पारा-ऐ-हूश्ऩ,,
तुम कोई मामूली शख्स़ियत नही---
मेरी ख्व़ाहिशो की आसमानी किताब हो।

Tuesday, 26 November 2024

(द सुप शॉर्ट स्टोरी)

आज "The Soup" Short Stories की दो प्रतिया मुझे डाक से प्राप्त हुई जिसमें मेरी लघुकथा "The Old man on Platform Number-3" भी प्रकाशित है इस लघुकथा को ट्रांसलेट करने के लिए कल्पना भट्ट और संपादक वरुण महेश्वरी जी के साथ ही ज्ञानमुद्रा पब्लिकेशन भोपाल का बहुत-बहुत धन्यवाद 🌹🌹

Saturday, 23 November 2024

(कांच का ताजमहल था)

(काँच का ताज़महल था)
उस बेवफ़ा के हाथ से-----
गिरा और गिरके टुट गया,,,,,,,
ऐ,रंग----वे मेरा तोहफ़ा नही----
काँच का ताज़महल था।

(औरत के अंग)

(औरत के अंग)
हा मै औरत हू-----------
इसलिए तो तुम्हारे उन अंग विशेष,
को मै तकने भर से जान जाती हू,
कि तुम्हारी मंशा मेरे उन अंगो के-----
बस नोचने-खसोटने और मसलने से है।
जबकि एक औरत के वही अंग विशेष,
अपने पती के प्यार पाने के वक़्त भी,
शर्म ओढ़े रहते है,
क्योंकि उसमें किसी तरह की नोच-खसोट नही,
बल्कि एक-दुसरे के परम विश्वास का देव श्पर्श है।
हा!शायद तुम्हारा पुरुषपन अंदर से सध नही पाता,
किसी एक समर्पित अंग से बध नही पाता,
वरना तकते तो तुम्हें भी अपनी पत्नी का वे अंग,
उतना ही आकर्षित करता------------
जीतना की पर स्त्री या औरत का।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

(ट्रेन हादसा)

कानपुर में हुए ट्रेन हादसे की बरसी पर लिखा हुआ मेरी पीड़ाओं का एक मरसिया.

(एक दर्द कानपुर के नाम)

एै कानपुर------------
तेरे शहर में ये आँसुओ वाली ट्रेन,
हमे याद रहेगी।
ना भुलुंगा क्योकि---------
इस हादसे की मरसिया नीरज की तरह,
अब हमारे पास रहेगी।
मै जानता हु कि---------
तेरी फाइलो में गुम हो जायेगा ये दर्द,
तु सरकारी महकमा है!
पर जीना है उन घरो को ये हादसा,
उनके दिलो में आँसू रहेगा और-----
ता-उम्र ये चेहल्लुम की रात रहेगी।
एै कानपुर-----------
तेरी पटरियो से होके फिर गुजरेगी ट्रेन,
फिर उतरेंगे चढ़ेंगे मुसाफ़िर,
तेरी कानो मे---------
हर रोज एक नई आवाज़ रहेगी।
एै कानपुर----------
तेरे शहर में ये आँसुओ वाली ट्रेन,
हमें याद रहेगी।

@@@कानपुर ट्रेन हादसे पे लिखी एक गमज़दा रचना।

रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

व्यंग्य

✍️✍️✍️परसों एक मांगलिक कार्यक्रम में मुझे दो हेयर बैंड लगाए हुए युवकों को देखने का परम सौभाग्य प्राप्त हुआ,,लेकिन तभी से कंफ्यूज हूं कि मैं इन्हें पुरुषों की किस श्रेणी में रखूं🤓😀🤓😀 कृपया मनुष्यो की "श्रेणी सुधार के जानकार" अपनी राय दे,क्या ये मानसिक रुप से तीस प्रतिशत महिला होने के आधुनिक लक्षण तो नही 🤓🤓✍️✍️

Friday, 22 November 2024

(रोटी)

(रोटी)

भूख-
एक टक देखती है,
तवे पे सिंकती हुई,रोटी।
गरीब जानता है-
इसका हुस्न,इसका गंध
ऐ रंग,-
कितनी खुबसुरत लगती है,
तवे पे पलटी हुई,रोटी।

Thursday, 21 November 2024

(मै यहां रोने आता हूं)

(मै यहां रोने आता हूं)
तुम्हे पाने और खोने आता हूं,
अब हर शाम मै यहां रोने आता हु।
बनाता हु घरौदा फिर तोड़ देता हु,
मै यहां समंदर की लहरो मे,
खुद को हर शाम----------
डुबते सूरज की तरह डुबोने आता हु।
तु गई तेरी याद रह गई,
उसी याद की लाश को हर शाम-----
मै यहां धोने आता हु।
नींद और सुकून भी मेरी आँखो मे अब नही,
मै यहां कुछ लम्हे रेतीली कब्र पे--------
तेरी निशानियो के सिरहानें सोने आता हु।
मै तब भी पागल था और अब भी पागल हु,
तभी तो तेरी जुदाई के इतने सालो बाद भी,
मै यहां तेरा होने आता हु।
तुम्हें पाने और खोने आता हूं-------
अब हर शाम मै यहां रोने आता हु।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.--7800824758

(नेपाल)

अलग तरीके से नेपाल को लिखने की एक छोटी सी कोशिश-------

(नेपाल)

नेपाल-----
तेरी आँखे किसी हिरन सी,
आवाज कोयल की कूक
और बाँसुरी की तरह,
चेहरे पे तुम्हारी ये छुईमुई सी शर्म,
उफ! तु क्या जाने? कि तु--
कितनी खूबसूरत है.

नेपाल-----
उसपे तेरी ये सफेद सफ्फाक सी सलवार,
और सीने पे एक अल्लहड़ लड़की सी,
दुपट्टे का इधर-उधर फिसलना,
यूँँ लगता है कि जैसे तु----
किसी परी या अप्सरा की बेटी है.

नेपाल----
तु आज मेरे पूरे हो रहे इस नावेल की,
किताब के------
एक-एक शब्द में जिंदा रहोगी,
क्योंकि हमने तुम्हें देश की तरह नही,
अपनी मोहब्बत
और महबूबा की तरह देखा है.

यह कविता मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है.

रचनाकार---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758

Tuesday, 19 November 2024

(मरुस्थल हो गया)

(मरुस्थल हो गया)
जाने कब--------------
मेरी संवेदनाये मर गई,,,
दिल मे---------
नागफ़नी और कैक्टस उग आये!
ऐ,रंग---------
मै आदमी से मरुस्थल हो गया।

(तबस्सुम चली गई)

(तब्बसुम चली गई)

तुम्हें विदा करे उर्दू
या फिर विदा करे हिंदी
लेकिन---
तेरे जाने से
तहज़ीब के होठों से 
"तब्बसुम" चली गई 😥😥😥

रचनाकार--रंगनाथ द्विवेदी 
जनपद--जौनपुर (उत्तर प्रदेश)

"अलविदा तब्बसुम"💐💐💐

Friday, 15 November 2024

(अक्षरा)

यूजीसी से मान्यता प्राप्त हिंदी साहित्य की मध्य प्रदेश से प्रकाशित मासिक पत्रिका " अक्षरा" के नवंबर 2021 अंक की लेखकीय प्रति मिलने की याद मुझे दिलाने के लिए धन्यवाद फेसबुक और संपादक कैलाशचन्द्र पन्त जी का बहुत-बहुत आभार 🌹🌹🌹🌹

(स्वदेश डाला छठ)

कल दिनांक 17/11/23 से शुरू हो रहे छठ पर्व पर लिखा मेरा लेख आज के दैनिक स्वदेश के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ हैं,,,, जिसकी जानकारी मुझे भाई "डॉ अतुल मोहन सिंह" जी ने PDF के साथ दी हैं,इसके लिए उन्हें धन्यवाद देने के साथ ही उनके लोकप्रिय पत्रकारिता की तमाम उपलब्धियां के लिए भी मैं उन्हें ढेर सारी बधाई एवम् शुभकामनाएं देता हूं✍️✍️✍️✍️🙏🙏

डॉ.अतुल मोहन सिंह*
स्थानीय संपादक, स्वदेश, लखनऊ
*प्रांतीय कार्यालय, उत्तर प्रदेश*
2/38 विकासखंड, गोमतीनगर, लखनऊ-206010
संपर्क : 9807766888, 9451907315
(संस्करण : लखनऊ, आगरा, झांसी, ग्वालियर, भोपाल, इंदौर, जबलपुर, सतना, गुना, रीवा, खंडवा एवं शाजापुर)
swadeshnews.lko@gmail.com

Thursday, 14 November 2024

(सब कुछ था)

(खुदा ही सब कुछ था)

वे एक किरदार,वे एक बलंदी
वे एक मकाम
सब कुछ था,

वे एक शजर,
वे एक दरख़्त,एक शाख
एक परिंदा, एक दहर
सब कुछ था 

भागते,दौड़ते,थकते 
दौलत की जिंदगी गुजरी
और फिर एक दिन
सांस टूट गई
अपने समय के सिकंदर की 
तब लगा कि
कही कुछ नहीं,
बस खुदा ही
सब कुछ था.

✍️✍️ रंगनाथ द्विवेदी
इस रचना का सर्वाधिकार सुरक्षित है इसलिए इसे कही कॉपी या शेयर करने से पहले मेरी अनुमति अवश्य ले या मेरे नाम के साथ ही इस रचना को कॉपी या शेयर करे.

स्कूटर से लेकर प्लेन तक जिसने तमाम बुलंदियों को छुआ ऐसी महान शख्सियत सुब्रत राय सहारा को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि✍️✍️💐💐🙏🙏

Wednesday, 13 November 2024

(औरत नही देखी)

(औरत नही देखी)
माथे पे चुहचुहाता पसीना-----
कमर पे खुशी साड़ी-----
और सर पे सीमेंट की भदेली,,,,,,,,,,
श्रम की मादक चाल------
ऐ,रंग----मेरी कविता ने कभी----
इतनी खूबसुरत औरत नही देखी।

(बाल दिवस है)

(बाल दिवस है)
चाय की दुकान पे----------
सुट-बूट वाले साहब के,
अधरो पे सुलगते सिगरेट का कश है,
उस फैले धुँऐ में तेरह साल का बच्चा,
जूठे कप-प्लेट उठाता है,
जरा सा उसके मैले हाथो का श्पर्श
और माँ की गाली!
मासूम गालो पर------
बाल पकड़कर चंद चाटे,
देख रोटी-------
इतनी कम उम्र में इस बच्चे की भूख,
तेरी खातिर कितना विवश है!
इस मासूम को---------
अपनी पिड़ाओ की दुनिया से बाहर,
ये भी पता नही कि---------
कल तमाम देश के बच्चो के चाचा नेहरु का जन्मदिन,
यानी की बाल दिवस है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.7800824758

(ओढ़नी)

(ओढ़नी)
याद है बचपन---------
मैं पहले कहाँ ओढ़ती थी ओढ़नी।
वे तो जब मैं तेरह की हुई,
तो अचानक-माँ ने डाँटना शुरु किया,
और कहने लगी-----------
अब अपने सीने पे तुम रंखा करो ओढ़नी।
मैं चौंकी-----------------
कि ये अचानक माँ को क्या हुआ?
फिर लगा नही कुछ तो है,
यूँही नही माँ रखवाना चाहती होगी----
सीने पे ओढ़नी।
फिर कमरे में बंद कर,
खुद को शीशे में टटोलने लगी,
तो अचानक कुछ शर्म सी आई,
कुछ बदला सा था,
जहाँ माँ ने कहा था-रखने को ओढ़नी।
मै बाहर निकली----------
तो देखा बचपन को खिसकते,
लगा माँ कि कितना सच कह रही थी,
कि तु सयानी हो रही है,
क्योंकि कुछ लोग तक रहे थे,
एै,रंग------वही जहां माँ ने कहा था,
रख लो तुम ओढ़नी।

####एक सयानी होती हुई लड़की के वे तमाम चित्र इस रचना में है!गर सच लिखु तो इस कविता की ओढ़नी वाली वे तेरह साल की लड़की बन मैने--इस कविता को जिवंत लिखने की कोशिश की है,इसपे मै कितना खरा उतरा ये तो आप सभी सुधीजन पाठको पे है।

(कृति बहुमत)

छत्तीसगढ़, से प्रकाशित साहित्य की सर्वोत्कृष्ट त्रैमासिक पत्रिका "बहुमत" के 101 अंक में मेरी लघुकथाओ को स्थान देने के लिए संपादक बड़े भैया विनोद मिश्रा जी के इस आशीर्वाद व स्नेह के लिए मेरा कोटिशः प्रणाम🙏🙏. 

■"बहुमत " का 101 वां अंक ■
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● लुइस ग्लक की 9 कविताएं ।। अनुवाद--मंगलेश डबराल, लीलाधर मंडलोई, विनोद दास, तिथि दानी,प्रभात रंजन,श्री बिलास सिंह ।।
■ 75वें वर्ष में कवि -राजेश जोशी की तीन कविताएं
● रचना की जरूरत:निर्मल वर्मा
■ कविता का प्रयोजन: राजाराम भादू
●महात्मा गांधी के छत्तीसगढ़ प्रवास की शताब्दी स्मृति: राहुल सिंह का विशेष लेख
■रामनगीना मौर्य और आलोक रंजन की कहानियां
●रोअल्ड डाहल की अंग्रेजी कहानी:खाल (अनुवाद-सुशांत सुप्रिय )
■शानी की कहानी:कफ़न चाहिए

● कविताएं:: लीलाधर जगूड़ी, वेणु गोपाल,रूपम मिश्र, जोशना बैनर्जी आडवाणी, संदीप निर्भय,रवि प्रकाश, सुलोचना वर्मा,विनय सौरभ, हर्ष भारद्वाज,रजत कृष्ण, योगेश ध्यानी,शिवम चौबे, फिरोज खान, उल्लास पाण्डे, अंकिता आनंद,विधान,निधि अग्रवाल, अंकिता शाम्भवी, कुबेर कुमावत, अनामिका चक्रवर्ती,कुंदन सिद्धार्थ, पल्लवी मुखर्जी, वन्दना गुप्ता,अनु चक्रवर्ती,सोनी पाण्डेय,ज्योति रीता,अमृता सिन्हा ।।।।

■लघुकथाएं: सुशांत सुप्रिय, रंगनाथ द्विवेदी
● गज़लें: अनिता सिंह,देववंश दुबे, फूलचंद गुप्ता ।
■पुस्तकें मिली-महेन्द्र मिश्र, अशोक शाह,उषा दशोरा, सुभाष चन्द्र कुशवाहा,राम नगीना मौर्य, रामकुमार तिवारी,गौरव गुप्ता,नीरज नीर, कुबेर सिंह साहू, अरविंद श्रीवास्तव, वन्दना गुप्ता, अजित कुमार राय, राजेश झरपुरे, कुबेर कुमावत ।।

#आवरण: अनिल वशिष्ठ
#रेखांकन: अनुभूति श्रीवास्तव

•संपादक: विनोद मिश्र
•प्रबंध संपादक: अरुण श्रीवास्तव
•परामर्श: राजीव चौबे
               : दिनेश वाजपेयी
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श्री चतुर्भुज मेमोरियल फाउंडेशन, भिलाई-दुर्ग(छत्तीसगढ़) एवं जनसंपर्क विभाग छत्तीसगढ़ शासन के सहयोग से प्रकाशित
-■---------------------------------------■----------■

Saturday, 9 November 2024

ना ब्लाउज,ना बटन,ना काज तक 
वाह! रे! साहित्य आज तक 
हिंदी के छ्न्द,उर्दू के‌ मिसरे
फट गए 
कौन लिखेगा इतनी बेहयाई 

Thursday, 7 November 2024

व्यंग्य

🤓😀व्यंग्य के व्याकरण पर रिसर्च करते हुए मुझे अचानक पता चला कि नेता शब्द "गिरगिट और सांप का ही एक पर्यायवाची नाम हैं "🤓😀

(कश्मीरी पंडित)

(कश्मीरी पंडित)
वे बांगा दी बुलबुल-------
वे डलझील वे शीकारे--------
हमारी मिट्टी-ए-मोहब्बत कश्म़ीर,,
हमे ख्वाबो मे पुकारे।
ये सियासत-ए-साजिश-ए-अलगाव,
कि हम कश्म़ीरी पंडित पड़े है-------
खानाबदोशो से बदतर ऐ दिल्ली,
तेरी सड़को के किनारे।
वे गुल,वे केशर,वे सेब के बगीचे,
उफ!नही आती वे खूशबु ना आती है--
वैसी यहाँ तक हवा रे।
ये लाशे मईयत,ये रुह-ए-तड़प है,
ऐ,रंग---हम कैसे होगे जन्नतनशी----
ऐ कश्म़ीर तेरी पाक-ए-मिट्टी के बीना रे।

Wednesday, 6 November 2024

व्यंग्य यात्रा

अंग्रेजी कहानी में जो स्थान ब्रेट हार्ट,हिंदी में मुंशी प्रेमचंद का हैं वही स्थान व्यंग्य साहित्य के लेखन में हरिशंकर परसाई का है,जिनके बारे में हम कह सकते हैं कि ऐसा व्यंग्य लेखक "ना तो भूतों ना तो भविष्यति" कोई होगा लेकिन ऐसा भी नहीं इनके बाद व्यंग्य की धरती बंजर हो गई उत्कृष्ट व्यंग्य लेखन अब भी हो रहा हैं,,,, लेकिन हा ऐसे समय में जब हिंदी की तमाम बड़ी पत्रिकाएं अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही हों ऐसे समय में "व्यंग्य यात्रा" व्यंग्य के पाठकों की पहली पसंद बना हुआ है तो इसमें व्यंग्य के वर्तमान शिखर पुरुष प्रेम जनमेजय सर का बहुत बड़ा योगदान है.

"व्यंग्य यात्रा" केवल एक व्यंग्य पत्रिका ही नहीं बल्कि व्यंग्य कि एक पूरी क्लासिक यात्रा भी हैं", ऐसे में इस बार का अंक "हरिशंकर परसाई" पर रखकर प्रेम जनमेजय सर ने इस अंक को एक कालजई रूप दिया है, आज की डाक से मुझे सिर्फ इसकी एक पाठकीय प्रति ही नहीं बल्कि मुझे ऐसा लग रहा कि जैसे मैं भी व्यंग्य के इस नालंदा विश्वविद्यालय में हरिशंकर परसाई सर के लिखें हुए व्यंग्य की विधिवत क्लास देश के श्रेष्ठ और उत्कृष्ट व्यंग्य के गुणी आचार्यों से ले रहा हूं,,,,,,, एक बार पुनः मुझे अपना प्यार स्नेह और आशीर्वाद देने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद और सादर प्रणाम सर ✍️✍️🙏🙏

Monday, 4 November 2024

(बेगुनाह कर्ण)

कर्ण और कुंती दो पात्रो पे लिखी ये महज़ कविता नही अपितु बेगुनाह कर्ण के वे आँसू है जो बीना किसी अपराध के आज भी आँख से अपनी कुंती जैसी माँ से अपना अपराध जानना चाहता है?
                            (बेगुनाह कर्ण)
आज भी विवाह पूर्व जने बच्चे को-------
कुंती कचरे मे फेक रही है!
नियति का पहिया घुम रहा है,
कचरे का कर्ण--------
फिर बेइज़्ज़त और अपमानित होगा,
अपने दंम्भ और जाती का आँचल बचाने की खातिर,
आज की कुंती भी---------
कहाँ झेप रही है।
अट्टहास कर रहा कहकहे लगा रहा अमीरो का महल,
तमाम घिनौने कृत्यो को समेटे,
लेकिन मौन है?
कर्ण के उस कचरे के डिब्बे के रुदन से,
नही पिघल रही कुंती,
क्योंकि आज की कामांध कुंती के,
कामातुर मसले स्तन,
किसी कर्ण के होंठ से नही लगेंगे,
क्योंकि इस धरती पे हर कर्ण,
एक गाली था,गाली है और गाली रहेगा!
वे देखो घने अँधेरे मे चली आ रही फिर कोई कुंती,
कचरे के डिब्बे में फेकने-----
एक बेगुनाह कर्ण।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

Sunday, 3 November 2024

(परिंदे नही आए)

(परिंदे नही आये)
जो देश छोड़ गये थे,उनकी माँ मरी-----
पर वे बाशिंदे नही आये।
और तो और इस साल बगीचा भी सुना रहा-----------
क्युकि ऐ,रंग----हर मौसम जो आते थे-
वे परिंदे नही आये।

Friday, 1 November 2024

(मदिरा की गली में)

(मदिरा की गली मे)
हमने देखा है,ये प्रेम बस-------
मदिरा की गली मे।
कि राम चुस्कियाँ लेते है,
भूल कौम,मज़हब---------
और खुद डालते है मदिरा,
गिलास-ए-अली मे।
ऐ,रंग----हमने देखा है,ये प्रेम बस----
मदिरा की गली मे।

(इनकाउंटर)

(आतंकियो का-----इनकाउंटर)
क्या है?
उन आतंकियो और तुममें कोई अंतर,
तमाम इंसानी जानो से खेलने वाले---
ये आततायी सही हलाक हुये,
भले सही या गलत था इनका इनकाउंटर।
पर सियासत तेरा स्तर----------
जिस्मानी तवायफ़ो से गया बीता है,
वे जिस्म देती है!
और तुम नामुराद उतार देते हो------
अपने मादरे वतन के पीठ खंजर।
सच एैसे दोगलो तुमपे उबकाई आती है,
तुम एक जहरीले----------
आस्तीनी साँप हो अपने ही घर के अंदर।

@@@कल के आतंकी इनकाउंटर का एक छोटा सा समर्थन।

(शहर के लोग)

(शहर के लोग)
मुझे नंगी सुला गये शहर के लोग!
एै खिज़ा के पत्तो--------
तुम कभी मेरी कब्र पे गिरना।
कितनी मोहब्बत थी गुसलखाने से,
रहने नहीं दिये एक इंतकाले सब-----
बड़े बेमुरौवत निकले शहर के लोग।
मुझे नंगी सुला गये शहर के लोग।
एै मौसमें सावन--------
तुम कभी मेरी दफ़न-ऐ-बदन पे गिरना!
कभी शफ़क चाँदनी में टहलती थी,
घंटो जिस छत पे,
ले चले उसी छत वाली गली से-----
मेरा जनाज़ा मेरी शहर के लोग।
मुझे नंगी सुला गये शहर के लोग।
एै चाँद वैसे ही शफ़क रातो की तरह,
मेरी इस रुहे बदन पे पड़ना,
मेरी तड़प है कि अब भुले से नही आते,
शहर तो शहर मेरे अपने घर के लोग।
मुझे नंगी सुला गये मेरे शहर के लोग।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

(आईना तोड़ देती हैं)

(आईना तोड़ देती हैं)

पटकती है बेरहमी से
सिसकता-
छोड़ देती है.

ए "रंग"
वे हुश्ने बेगैरत 
हर महीने 
एक आईना तोड़ देती है.