Thursday, 30 June 2022

आज दिनांक 30/6/21 के अंक में देश,के सर्वाधिक पढ़े जाने वाले दैनिक समाचार पत्रों में से एक " प्रभात खबर " के संपादकिय पृष्ठ के "कुछ अलग" कालम में प्रकाशित मेरा व्यंग्य.
 धन्यवाद दैनिक प्रभात खबर 🌹🌹🙏🙏.
स्त्री केवल देह या कामुकता नही बल्कि वे विश्व दर्शन है, वे अगर किसी पुरुष के द्वारा तिरोहित भी है तो उसके देवत्व का पवित्र आचमन भी है,स्त्री अगर नग्न भी होगी तब भी वे शिवानी के रथ्या की तरह समाज के कामुक धुंधलके से गुजरती हुई अपनी स्त्री देह को थकाकर अपने अंदर उस स्त्री को तलासेगी जो उसके अंतरतम में कही घुटती हुई अपने दोनो हाथो से स्तन को छिपाए अपने स्त्रीत्व के एक टुकड़े को भी बचाने का प्रयास करेगी लेकिन वे बचा नही पाएगी क्योंकि किसी भी स्त्री के स्तन पुरी दुनिया में सर्वाधिक रेप का सामना करती है.

ऐसे में अगर केनवास गूंगे हो गए तो फिर हमारी दुनिया से इस नग्नता की वे नैसर्गिक कलात्मकता मर जाएगी, वहा सिर्फ पशुता बची रह जाएगी,
मै आपकी इस कृति में दर्शाई गई यौनिक नग्नता को देवत्व के एक ठहराव की तरह देख रहा.
ये आपके उत्कृष्ट कला की "मत्स्यगंधा हैं जहा किसी भी पुरूष मन के,शांतनू की एक प्राकृतिक प्यास हैं जो जितना देखेगा उसकी प्यास इस कला के नदी तट पर और बढ़ती जाएगी ✍️✍️💐💐

Wednesday, 29 June 2022

(राग मल्हार सा गाता हूँ)
घीर आते है बादल,बरसात बहुत होती है,,
ऐ,रंग----------------
जब मै उसे,राग मल्हार सा गाता हूँ।

Tuesday, 28 June 2022

(ज्यादा देवता मिलते है)
हाँ!मै तलाशता हूँ------------
अँधेरी रात में आवारा गज़ल,,,,,,,,,,,
क्योकि ऐ,रंग------------
उजाले में ज्यादा देवता मिलते है।
(इश्क़ करके)

ना पढ़ सकी कोई किताब, 
मै इश्क़ करके.

मै औरत सुफि हो गई 
इश्क़ करके.

मौलाना और तकरीरे मस्जिद, 
तुम्हे मुबारक!
मै खुद हो गई----
मुकम्मल मुसलमान 
इश्क़ करके.

ये हिज़ाब,ये परदे,ये चारदीवारी 
कैद है औरत की,

तुम क्या निकालोगे इस कैद से मुझको,
मै खुद ही छोड़े जा रही,
अपने जिस्म का मकान, 
ऐ,रंग-
इश्क़ करके. 

रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर (उत्तर-प्रदेश ).

Monday, 27 June 2022

(बिधवा विणा हूँ)
मै पथरीली------------------
कंटक राहो की ब्यथा लिये,
जिये जा रही उस चिड़ियाँ सी,
जिसके निड़ का तिनका-तिनका,
हर आँधी ने नष्ट किया!
है क्षिण हृदय में पीड़ा मेरे,
मै जयशंकर प्रसाद की आँसू हूं।
ना बदली ना सावन आये,
मेरी यौवन के गाँव कभी,
तपती धूप में देह जले
और तड़पे अंतर घट मेरा,
मै तार-तार टूटी नारी,
जो बज न सकु जीवन तट पे----
मै एैसी बिधवा विणा हूँ।
(रोटी किस कौम की है)

भरे पेट हिंदू- मुसलमान होना आसान है, 

पर ऐ, "रंग"
किसी भूखे से पुछ------

कि उसकी रोटियाँ किस कौम की है.

Friday, 24 June 2022

(जूल्फों में बांध लेती है)
उतरते है,घिरते है उसकी जूल्फों की तरफ बादल,
और वे इन बादलो को-------------
अपनी जूल्फों में बांध लेती है।
वे हुस्ऩ-ए-ज़ीनत है शहर की,
लोग तकते है उसके छत की तरफ,
वे उम्मीद-ए-बरसात है,
जो एक अदा से------------
अपनी जूल्फ़ो में सावन बांध लेती है।
है तैरने भर का पानी उसकी आँखो में,
ऐ,रंग-------------------
वे हम शायरो का सागर भी,
अपनी जूल्फ़ो में बांध लेती है।

Saturday, 18 June 2022

(तमाशे करता रहा)
मै--
अपने ही चेहरे पे तमाँचे करता रहा,,,,,,,
ऐ,भूख मै तेरी खातीर----------
पुरे शहर में तमाशे करता रहा।

Friday, 17 June 2022

(पतझड़ की तरह रोई)
बहुत खूबसूरत थी मै लेकिन--------
रोशनी में तन्हा घर की तरह रोई।
कोई ना पढ़ सका कभी मेरा दर्द------
मै लहरो में अपने ही,समंदर की तरह रोई।
सब ठहरते गये----------------
अपनी अपनी मील के पत्थर तलक,
मै पीछे छुटते गये सफर की तरह रोई।
लोग सावन में भीग रहे थे,
ऐै "रंग"----मै अकेली अभागन थी
जो सावन में पतझड़ की तरह रोई।

@ रंगनाथ द्विवेदी
# 7800824758

Thursday, 16 June 2022

(सावन में भीगी हुई लड़की)
मै आज भी भीग जाता हूँ----------
तर-बतर बीना सावन के,क्यूकि ऐ,रंग--
मेरी शरिके हयात बन गई है-------
सावन मे भीगी हुई लड़की।
(औरत की इज्ज़त की है)
हाँ!इस ब्राह्मन ने-------------------
इस शहर की मशहूर फिरदौस से मोहब्बत की है,
कोई गुनाह नही-----------------
हमने तो बस एक औरत की इज्ज़त की है।
माँग भरा है-----------------
उसे निकाल कर इस गलिज़ गली से,
उसके नाम हमने----------
एक मकान और पुरी छत की है।
कोई गुनाह नही---------------
हमने तो बस एक औरत की इज्ज़त की है।
मै श्लोक पढ़ता हूँ----------------
वे नमाज़ पढ़ती है मेरे पूजे के कमरे में,
उसे ये इजाज़त ऐ,रंग----------------
मेरे मोहब्बत के शरियत की है,
कोई गुनाह नही--------------
हमने तो बस एक औरत की इज्ज़त की है।

Sunday, 12 June 2022

(पा गये बादल)
चमके-गरजे तुम छा गये बादल,,,,,,,,,,,,,,
किसी प्रेयसी के बुलावे पे--------
तुम आ गये बादल।
झुमो,इतराओ,मदमस्त हो पागल,,,,,,,,,,,,,,,
तुम कितनी आसानी से----------
उन्हे पा गये बादल।

Wednesday, 8 June 2022

(केरल से लौट आई है)
शायद जल्द ही घिर जाये,,,,,,,,,,,,
हमारे शहर में-मानसून के बादल-----
क्योकि ऐै, "रंग"----हमने सुना है,,,,,,,,,,,,,
कि मेरी मोहब्बत-------
केरल से लौट आई है।
(आज रात)
ऐ बेवफ़ा सामने बैठ और सभल आज रात,
मै पढुँगी तेरे शहर में गज़ल आज रात।
लब पे हँसी होगी दिल में आँसू ,
रोशनी लुटाऊँगी-----------------
मै चराग की तरह जल आज रात।
तड़प उठेगी चाँदनी मेरी सदा से,
पछतायेगी वे भी निकल आज रात।
मै ये मुशायरा छोड़ जाऊँगी,
उस बेवफ़ा के दिल में--------
ऐ,रंग----रह जायेगी एक कसक आज रात।

Monday, 6 June 2022

(हम शुकू से नही सोये)
तड़पे सारी रात,हम चाँदनी मे रोये,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----जबसे टुटा दिल------
हम शुकू से नही सोये।
(मूल्क के मिट्टी की)
आ गई खुशबू मेरे मूल्क के मिट्टी की,
महक उठी साँसे याद की फिर,
मुँह मे आ गया पानी------------
ले नाम माँ के चोखे और लिट्टी की।
आ गई खुशबू मेरे मूल्क के मिट्टी की।
सारी मकबूल किताबे पढ़ डाली,
पर कही इतने जिंदा हर्फ न मिले,
मैने इज्ज़त की गर कूरआन के बाद,
तो अपने मूल्क के खत और चिट्ठी की।
आ गई खुशबू मेरे मूल्क के मिट्टी की।
यु ही नही है अमी असतो मूल्क मेरा,
जितने बीमार है इस गैरे मूल्क मे,
ऐ,रंग-----उतने इलाज की तासीर है,
मेरे मूल्क के मिट्टी की।
आ गई खुशबू मेरे मूल्क के मिट्टी की।
बारिश ने अचानक से रोमांटिक कर दिया----------
                     (सखी हे रे बदरवा)
तन-मन भिगोये सखी हे रे बदरवा,
करे छेड़खानी मोहे छेड़े बदरवा।
सिहर-सिहर जाऊँ शरमाऊँ इत-उत,
मोहे पिया की तरह सखी घेरे बदरवा----
तन-मन भिगोये सखी हे रे बदरवा।
चुंबन पे चुंबन की है झड़ी,
बूँद-बूँद चुंबन सखी ले रे बदरवा-----
तन-मन भिगोये सखी हे रे बदरवा।
अँखियो को खोलु,अँखियो को मुदू,
जैसे मेरी अँखियो मे कुछ सखी ढुढ़े बदरवा----
तन-मन भिगोये सखी हे रे बदरवा।
मेरी यौवन का आँचल छत पर गिरा,
मेरी रुप का पढ़े मेघदुतम सखी हे रे बदरवा-----
तन-मन भिगोये सखी हे रे बदरवा।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
mo.no.-----7800824758

Friday, 3 June 2022

(हाँ!मै भी बुनकर हूँ)
हाँ!मै भी बुनकर हूँ------------
तुम तिनका-तिनका कालीन बुनते हो,,,,,,
और मै शब्द-शब्द गीत बुनता हूँ।
हाँ!मै भी बुनकर हूँ।
शमीम रहती थी

कभी सामने नीम के———
एक घर था,
जिसमें मेंरी शमीम रहती थी।
वे महज़———
एक खूबसुरत लड़की नही,
मेंरी चाहत थी।
बढ़ते-बढ़ते ये मुहल्ला हो गया,
फिर काॅलोनी बन गई,
हाय!री कंक्रिट——–
तेरी खातिर नीम कटा,
वे घर ढ़हा——–
जिसमें मेरी शमीम रहती थी।
अब तो बीमार सा बस,
डब-डबाई आँखो से तकने की खातिर,
यहाँ आता हूँ!
शुकून मिल जाता है इतने से भी,
ऐ,रंग———–
कि यहाँ कभी,
मेरे दिल की हकिम रहती थी!
कभी सामने नीम के——–
एक घर था,
जिसमें मेरी शमीम रहती थी।
( बीना शौहर की हो गई)

मै जबसे----
उस बेवफ़ा सितमगर की हो गई,
मेंरे सूख गये अरमान
मैं पत्थर की हो गई.

क्या-क्या नही छोड़ा
खातिर उसके,
वालिद का दिल तोड़ा!
और अम्मी का यकीन

मैं कहां बसने आई थी---
भागकर घर से, 
देख लो आज मैं 
बिना घर की हो गई.

मै जबसे---
उस बेवफा सितमगर की हो गई.

सुर्ख जोड़े,हिना,आईना सिसके
अज़ीब निकाह किया मैंने 
कुबूल कर भी ऐ,"रंग"--
मै बीना "शौहर की हो गई".
( घुँघट नही दिखता)

हा!मेरी खता है कि-
मै अब चाँद नही लिखता

पर क्या?करु ऐ,"रंग"
तरक्की के दौर मे

हमे औरत तो दिखती है--
पर उसका घुँघट नही दिखता!

Thursday, 2 June 2022

(पोयम ने छिन लिया)
हिन्दी की कविता की संवेदना को-------
अंग्रेज़ी के पोयम ने छिन लिया।
दूध-कटोरी,माँ की लोरी,आँचल और गाँव को--
इस कंकरीट की सीटी ने छिन लिया।
पति और पत्नी के रिश्ते गुम हो गये,
क्योंकि सारा प्यार नंगे बदन लौटती----
उसकी नाइट ड्यूटी ने छिन लिया।
बच्चो का खेलना-कुदना,धमाचौकड़ी को,
नौ साल की उम्र से ही कान्वेंट,ट्यूशन और-----
मोटी-मोटी फिजिक्स,कमेस्ट्री ने छिन लिया।
गाँव मे बुढ़े और गरीब माँ-बाप ने कर्ज ले पढ़ाया था,
उनकी उस पीड़ा को वाइफ के माम-डैड और------
उसकी छोटी सिस्टर स्विटी ने छिन लिया।
हिन्दी की कविता की संवेदना को-------
अंग्रेज़ी के पोयम ने छिन लिया।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
mo.no.----7800824758
(गीत गुम है)
भीड़ है लाखो की लेकिन प्रीत गुम है----
हम नही रह पायेगे ऐसे शहर मे,,,,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग---------------
जहाँ होठ तो लाखो है,लेकिन गीत गुम है।
(चिखती निर्भया है)

इसकी आँखो मे ना कोई पानी,
और ना कोई हया है,
ए "रंग "---
"दिल्ली" वे बे-हया है.

जहाँ मिटती है श़कूर बस्ती,
और सड़को पे
चिखती निर्भया है.

Wednesday, 1 June 2022

(शहनाज़ का मेकप नही करती)

हमारी गज़ल वे खूबसूरत औरत है,
जो कभी शहनाज़ का मेकप नही करती.

वे सादगी और सलिके की रस्म़ है,
वे जिधर से गुजरती है निगाहे पाकिज़ा,
अपने सर से दुपट्टे को ओझल नही करती.

हमारी गज़ल----
जीनत है ज़मी की आयत है,
ये ज़न्नत से घर को कभी दोज़ख नही करती.

ऐ,रंग---
इसकी दुनिया फकत शौहर है,
ये हवस के मारो की तरह कभी ब्रेकप नही करती.

हमारी गज़ल वे खूबसूरत औरत है,
जो कभी शहनाज़ का मेकप नही करती.

रचनाकार--रंगनाथ द्विवेदी
जिला-जौनपुर, (U P )
mo. no.7800824758