Saturday, 28 December 2024

कहानी अंतिम संस्कार

*काशी में करोड़पति साहित्यकार का निधन:* 

बेटे-बेटी ने निकाला तो वृद्धाश्रम में रहने लगे; अंतिम संस्कार में भी नहीं आया परिवार
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वाराणसी के साहित्यकार श्रीनाथ खंडेलवाल का शनिवार सुबह निधन हो गया। खंडेलवाल 80 करोड़ की प्रॉपर्टी मालिक थे। उन्होंने 400 किताबें लिखीं थीं। आखिरी बाद उन्होंने दैनिक भास्कर को इंटरव्यू दिया था, जिसमें कहा था- पुराना कुछ नहीं पूछिएगा। वो सब अतीत था, जिसे मैंने खत्म कर दिया। अब नया खंडेलवाल है, जो सिर्फ किताबें लिख रहा है। जब तक सांस है, कलम चलती रहेगी।
खंडेलवाल काशी कुष्ठ सेवा संघ वृद्धाश्रम में 17 मार्च, 2024 से रह रहे थे। श्रीनाथ खंडेलवाल ने शनिवार सुबह 8 बजे वाराणसी के 'दीर्घायु अस्पताल' में अंतिम सांस ली। इसके बाद भी उनके घर से कोई नहीं आया।
सूचना मिलते ही कबीर अमन दोस्तों के साथ अस्पताल पहुंचे। साहित्यकार को मुखग्नि दी और पिंडदान किया।

*अंतिम संस्कार में भी नहीं आया परिवार*

अमन करीब ने ही हीरामनपुर के काशी कुष्ठ सेवा संघ वृद्धाश्रम में खंडेलवाल को रखवाया था। खंडेलवाल मार्च 2024 से यहां रहे रहे थे। वृद्धाश्रम के केयर टेकर रमेशचंद्र श्रीवास्तव ने बताया, उन्हें 25 दिसंबर को सीने में जकड़न, सांस लेने में दिक्कत और किडनी की समस्या के कारण अस्पताल में एडमिट कराया गया। यहां इलाज के दौरान उनका शनिवार सुबह 9 बजे देहांत हो गया।
रमेशचंद्र श्रीवास्तव ने तुरंत इसकी सूचना अमन कबीर को दी। अमन कबीर ने बताया- यहां आने के बाद सबसे पहले कमिश्नर कौशल राजा शर्मा को घटना की जानकारी दी गई। जिस पर उन्होंने परिजनों को सूचना देने को कहा।
श्रीनाथ खंडेलवाल जी के बेटे को फोन किया गया तो उसने आने में असमर्थता जताई। कहा वह बाहर है नहीं आ सकता है। इसके बाद उसकी बेटी को फोन किया गया, लेकिन उसने फोन नहीं उठाया। न ही मैसेज का कोई जवाब दिया।
अमन करीब ने बताया, इसके बाद हम लोग शव लेकर सराय मोहना घाट पहुंचे और उनका अंतिम संस्कार किया। मैंने पिडंदान के ही साथ उन्हें अजय कुमार के साथ मिलकर मुखाग्नि दी।
श्रीनाथ खंडेलवाल ने भास्कर इंटरव्यू में बताया था कि उनका बेटा बड़ा बिजनेसमैन और बेटी सुप्रीम कोर्ट में वकील है। दामाद भी वकील है। उनके पास करीब 80 करोड़ की प्रॉपर्टी है। जिसे हड़प कर बेटे-बेटी ने उन्हें घर से निकाल दिया।

दिलीप तिवारी वरिष्ठ समाजसेवी
दिलीप तिवारी समाजसेवी समर्थक

(पूस की रात)

(पुस की रात)
कहाँ कटती है-
फटे कंम्बल से,ऐ शहर गाँव मे,
पुस की रात।
हाँड़ कंप-कपाती ठंड मे,
कहाँ देख पाता है-शहर
खेत के किनारे पडे किसी-
किसान की लाश।
अखबार की बे-शरमी है,रंग-
वरना गाँव मे आज भी है,वही ठंड
और वही प्रेमचंद के-
               पुस की रात।

(दिसंबर की आखिरी रात)

(दिसंम्बर की आखिरी रात)
शकीना कलेन्डर मे लपेट के लाई है रोटी,
ऐ,रंग----इसके भूखे पेट का पागलपन देख-----
और देख हवस के खरोचो ने इसके पुरे बदन पे लिखा है------
दिसंम्बर की आखिरी रात।

(जनवरी आई थी)

जनवरी से लेकर दिसंबर तक के रोमांटिक प्यार की काब्य गाथा।
(दिसंबर बनके हमारे प्यार की ऐनवर्सरी आई थी)
कभी बन सँवर के दुल्हन सी---------
मेरे कमरे मे जनवरी आई थी।
सच वे गुलाब ही तो पकड़ा था तुमने,
जो इतने सालो से बेनुर था,
मेरी जिंदगी में-----------
वेलेनटाइन डे की रोमानियत लिये,
वे पहली फरवरी आई थी।
मार्च के महिने मे-----------
पहली बार खिले थे मेरी अरमान के गुलमुहर,
हमारे प्यार की डालियो पे कोयल कूकी थी,
वे मार्च ही था-----------
जब आम और महुवे पे मंजरी आई थी।
अप्रैल याद है---------
जब तुम मायके गई थी,
मै कितना उदास था-------
कई राते हमे नींद कहां आई थी।
फिर मई महिने ने ही उबारा था,
हमे तेरी विरह से!
इसी महिने इंतज़ार करते हुये मेरे कमरे मे---
कमरे की परी आई थी।
फिर जून की तपिस में--------
हम घंटो टहलने निकलते थे एक दुजे का हाथ पकड़े,
नदी के तट की तरफ,
वे शामे शरारत याद है और याद है वे कंपकपाते होंठ,
जब हमने अपनी अँगुलियो से छुआ था,
और तुम्हारी झील सी आँखो मे शर्म उतर आई थी।
फिर जुलाई की---------
वे घिरी बदलियां,
वे बारिश मे पहली बार तुम्हे छत पे भीगा देखना एकटक,
फिर बिजली की गरज सुन,
तुम एक हिरनी सी दौड़ी मेरी बाँहो मे चली आई थी,
मुझे भी तुम्हे छेड़ने की---------
इस बरसात मे मसखरी आई थी।
फिर पुरा अगस्त-----------
तुम्हारी बहन की चुहलबाजियो में गुजरा,
मौके कम मिले,
तब पहली बार तुम्हे चिढ़ाते आँखो से मुस्कुराते कनखियो से देखा,
मै मन ही मन कुढ़ता रहा क्या करता?
मेरे हारने और तेरी शरारतो के जितने की घड़ी आई थी।
फिर सितम्बर ने दिये मौके,
वे मौके जो मै भुलता नही,क्योंकि इसी महिने
तेरी कलाई की तमाम चुड़ियाँ टूटी,
और इसी महिने तेरे लिये,
मैने दर्जनो की तादात मे खरिदे,
तुम्हारी साड़ी से मैच करती तमाम चुड़ियाँ,
उन चुड़ियो मे तुमने कहा था---------
कि तुम्हे पसंद दिल से चुड़ी हरि आई थी।
फिर अक्टुबर के महिने मे,
हमने-तुमने अपनी जिंदगी के इस हनीमून को,
फिर टटोला!
लगा कि अभी भी तुम सुहागरात सी हो----
जैसे घूँघट किये आई थी।
फिर नवंबर---------
हमारी-तुम्हारी जिंदगी मे महिना नही था,
हम माँ-बाप बन गये थे,
हमारे आँगन में-----------
हँसने-खेलने एक गुड़िया चली आई थी।
इस दिसम्बर----------
जो हमारे कमरे मे कैलेंडर टंगा है,
उसमे एक छोटी सी बिटिया को,
छोटे-छोटे नन्हे पाँवो मे----------
घूँघरुओ की पायल पहने चलते दिखाया है,
हमारी बिटिया केवल बिटिया नही,
इस दिसम्बर बनके--------------
हमारे प्यार की ऐनवर्सरी आई थी।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

###अखबार मे छपी रचना को न पढ़ पाने वाले परम स्नेही लोगो की शिकायत को दुर करने का एक प्रयास।

Friday, 27 December 2024

(पहली जनवरी हो)

( पहली जनवरी हो )

तुम मेरी पहली जनवरी हो,
मैं तुम्हे,
बहुत ही टूट कर चाहता हूं,
तुम मेरी हर पल और हर सांस की,
14 फरवरी हो.

ये तुम्हारी शर्म का,
गुलाबी आंचल
मुझे बावला सा कर देता है.
सच तुम केवल मार्च की होली ही नहीं.
बल्कि,
मेरे दिल के आम के बगीचों की 
पहली मंजरी हो.

सच तुम यूं ही सिलसिलेवार,
मेरे रोमांटिक कविता की दिसंबर हो.
तुम्हें मैंने टांग रखा है,
अपने दिल में,
और तुम हमारे उसी दिल के दीवाल की,
कभी ना उतरने वाली.
एक बेशकीमती कैलेंडर.
की पहली जनवरी हो.

रचनाकार--रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जौनपुर-(उत्तर-प्रदेश )
मोबाइल नंबर---7800824758

(सांवली)

एक रोमांटिक कविता---(सांवली मछेरन )

मै नदी के किनारे बैठा,
अपलक---
उस सांवली सी मछेरन को देख रहा था.
जो डुबते हुये सूरज की लालिमा मे
अपनी कसी हुई देहयष्टि के 
कमर तक साड़ी खोसे,
एक खम और लोच के साथ
अपनी मछली पकड़ने वाले जाल को 
खींच रही थी.
मुझे यूं लगा कि जैसे--
उसकी जाल की फंसी मछलियों मे से,
एक फंसी हुई मछली सा 
मेरा मन भी है.

वह इससें बेखबर,
एक-एक मछली निकाल--
अपने पास रखे पानी से भरे डिब्बे
मे डालती रही.
बस ! इतना उसने 
इतनी देर मे जरुर किया,
कि अपने माथे पे गिर आये,
बाल को पीछे कर
उसने कुछ और बची मछलियां,
उस डिब्बे मे रख
गीले जाल और डिब्बे को पकड़,
ज्यो घुटनों भर पानी से निकली,
तो यूं लगा कि जैसे--
वे सांवली मछेरन,
विश्व कैनवास की सबसे खूबसूरत औरत हो.

नाम---रंगनाथ द्विवेदी
ईमेल आईडी--rangnathdubey90@gmail.com
फोन और वाट्सप--7800824758

(टंगा था कैलेंडर)

(टंगा था कैलेंडर)

तमाम हादसों से दुखी था कैलेंडर 
आँख मेरी भरी थी,
पर रोया था कैलेंडर.

सच तो ये है कि,
हमें तारीख बताने के लिए 
ऐ "रंग"–
पूरे साल भगवान यीशु की तरह,
मेरे कमरे की कील में-
टंगा था कैलेंडर.

यह रचना मेरी स्वरचित है.

रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी,मियांपुर
जौनपुर,(उत्तर-प्रदेश )

Thursday, 26 December 2024

(साधना कट)

अपने समय की मशहूर अदाकारा साधना की मौत आज ही के दिन हुई थी और उस दिन मैने चंद लाईन मरहूम साधना के लिये लिखि थी।
खासकर आज भी महिलाओ के हेयर कट की बात अगर आती है तो सबसे पहले एक कट का नाम आता है और वे कट है साधना कट।

(साधना कट)
सिसक उठे मोहब्ब़त के सभी खत,
उफ!खत्म हो गया-------
हमारी दौर का आखिरी चित्रपट।
वे सिटियां,वे तालियां याद आ रही,
हाय!आज कितनी तन्हा जा रही है-----
ऐ,रंग---हम लोगो की साधना कट।

Tuesday, 24 December 2024

(सेंटा क्लॉज हो जाए)

(सेंटा क्लाॅज़ हो जाये)
आओ बाँटे तोहफ़े यतिमो में हम,
किसी अपाहिज़ की बैशाखी,
या किसी गुँगे की मीठी ज़ूबान हो जाये।
ऐ,रंग----आओ एक रात ही सही---
हम सेंटा क्लाॅज हो जाये।

Saturday, 21 December 2024

(मुसलमान बना दो)

(मुसलमान बना दो)
गर मासुमो का कत्ल इतने से-
थम जाये वहसियो,
तो हमे शौक से हिंन्दू या मुसलमान बना दो।
ढहा दो मेरे जेहन का मंदिर,
मै शायर हूँ,मुहब्बत मेरी भूख है,
गर मै तेरी पूजा ना बन सका तो,
अज़ान बना दो।
बेशक मेरे हाथो से तुम छिन लो गीता
ऐ रंग-ये ख्वाहिश है
कि मासुमो का कत्ल ना हो,
चाहो तो इसके लिये,
इस ब्राह्मन को मुसलमान बना दो।

पेशावर मे मासुमो की कत्ल पे।

Tuesday, 17 December 2024

(पत्थर की हो गई)

(पत्थर की हो गई)
मै जबसे---------------
उस बेवफ़ा सितमगर की हो गई,
सूख गये अरमान मैं पत्थर की हो गई।
क्या-क्या नही छोड़ा खातिर उसके,
वालिद का दिल तोड़ा!
बसने आई थी मैं बेघर की हो गई।
मै जबसे---------------
सुर्ख जोड़े,हिना,आईना सिसके
ये अज़ीब निकाह है देखो,
कुबूल कर भी ऐ,रंग----------
मै बीना शौहर की हो गई।
मै जबसे--------------
उस बेवफ़ा सितमगर की हो गई,
सूख गये अरमान मैं पत्थर की हो गई।

(अपने पापा की गुड़िया)

(अपने पापा की गुड़िया)
दो चुटिया बांधे और फ्रॉक पहने,
दरवाजे पे-खड़ी रहती थी---------
घंटो कभी अपने पापा की गुड़िया।
फिर समय खिसकता गया,
मै बड़ी होती गई!
मेरे ब्याह को जाने लगे वे देखने लड़के,
फिर ब्याह हुआ,
मै विदा हुई पापा रोये नही,
पर मैने उनके अंदर----------
के आँसूओ का गीलापन महसूस किया,
पीछे छोड़ आई सब कुछ
अपने पापा की गुड़िया।
सुना था बहुत दिनो तक,
पापा तकते रहे वे दरवाज़ा,
शायद ये सोच----------------
कि यही खड़ी रहती थी कभी,
उनके इंतज़ार में घंटो,
फ्रॉक पहने दो चुटिया बांधे
इस पापा की अपने गुड़िया।
फिर आखिरी मर्तबा उन्हे बीमारी मे देखा,
वे चल बसे!
अब यादो में है-------------------
कुछ फ्रॉक दो चुटिया
और तन्हा खड़ी-----------------
दरवाजे के उस तरफ,
आँखो में आँसू लिये----------------
अपने पापा की गुड़िया।

(लड़कियों के बॉयफ्रेंड हो गए)

(लड़कियो के ब्वायफ्रेंन्ड हो गये)
स्कूल के बस्ते----------------
बढ़ते-बढ़ते बैग हो गये!
खत लिखने वाले देश की संवेदना मर गई,
दिल में रहने वाले लोग------------
सब मोबाइल में टैग हो गये।
माँ यशोदा का आँचल बदला,
वे जिंस और टाप पहन के माम हो गई,
और जितने भी पिता थे वे रफ्ता-रफ्ता डैड हो गये।
दूध-घी खाने-पीने वाले देश ने गिलास रख दिया,
अब उन्ही गिलासो में---------------
बार बालाओ के ढ़ाले पैग हो गये।
अर्द्धनग्न सड़को पे--------------
यौवन उछालती कुछ माडर्न लड़कियाे
के अश्लील और भौड़े कपड़े,
शर्म आती है लिखते,
कि जिस देश में भाई होते थे,
एै,रंग-------आज उसी देश में लड़के,
होटलो के बंद कमरो में--------------
इन लड़कियो के ब्वायफ्रेंन्ड हो गये।

(दो घड़ी की रात)

(दो घड़ी की रात)
जिंदगी है बस दो घड़ी की रात,
आओ गुज़ार ले लिहाफ में हम,
एक दुजे के संग---
दो घड़ी की रात।
आयेगी धूप कमरे में कल किसी और के लिये,
खुली खिड़की से फिर बाल सँवारेगी कोई दुल्हन,
फिर अँधेरा होगा!
वे भी गुजारेगी इसी तरह अपनी जिंदगी की-------------
ये दो घड़ी की रात।
भुल जायेंगे सभी एक दिन रफ्ता-रफ्ता,
जैसे हम भुले है औरो के जिंदगी की---
दो घड़ी की रात।
एै,रंग-----यहाँ से हमी फना होगे,
बाकी यही रह जायेगी औरो के लिये---
ये दो घड़ी की रात

(मैं सयाना नहीं हुआ)

(मै सयाना नही हुआ)
माँ बुढ़ि हो गई------------
मै सयाना नही हुआ।
चाहे जितना जहां से भी खाके लौटु,
फिर भी जब तलक अपने हाथ के,
दो निवाले न खिला ले---------
कहती है तब तलक माँ कि बेटा झूठ न बोल,
अभी तलक तेरा खाना नही हुआ।
माँ बुढ़ि हो गई----------
मै सयाना नही हुआ।
बीबी मेरी दरवाज़े पे खड़ी हो,
तकती है माँ का प्यार!
उसने गिली आँखो से कई मर्तबा कहां,
मै कितनी खुशनसीब हूं,आप सा पती पा
जिसका कभी कमरे में,
बीना माँ से मिले अपने------
कभी आना नही हुआ।
माँ बुढ़ि हो गई--------
मै सयाना नही हुआ।
सच मुझे भी लगता है उतनी देर,
माँ के पास-------
जब बाल सहला वे बचपन सा,
मुझे घंटो,अच्छा-बुरा समझाती है,
तो लगता है बस कुछ वक्त सरका है----
मै सयाना नही हुआ।
माँ बुढ़ि हो गई--------
मै सयाना नही हुआ।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

(दलित हो गई)

(दलित हो गई)

रात के अंधेरे में सोने आई थी 
दलित बस्ती से 
छूपके-छूपाके 
लेकिन सुबह के धुंधलके में 
उठी,
तो उसने अपने दुखते बदन को
थोड़ा सा,तोड़ा 
फिर,पलंग के अगल बगल
बेतरतीब लटकी साड़ी
को उसने बिना पहने ही कुछ देर देखा
और सोचा
कि रात भर छुई हुई उसकी देह
इस कोठरी से
बाहर निकलते ही
दिन के उजाले में
दलित हो जाएगी
वे भी क्या करे
जिससे व्याही है 
वे नीरा शराबी हैं
उसे शराब मिल जाए बस
क्या फर्क पड़ता है
कि उसकी ब्याहता
रात के अंधेरे में
छुप छुपा के कहा
और क्यों जाति हैं?
वह भी एक औरत थी
अपनी देह को
पति के देह से आत्मसात कर
उसके पौरुष की गंध को 
अपने सांसों में महसूस करना चाहती थी 
लेकिन
शराबी पति की वजह से 
उसकी देह 
रात में रानी 
और दिन के उजाले में दलित हो गई .

✍️✍️

Sunday, 8 December 2024

(औरत बांझ है)

(औरत बांझ है)
ये मेरी कलम-ए-तोहमत है,
ऐ,रंग---------
कि जिस औरत ने बेटी न जनी,
वे औरत बांझ है।

(बेटी के ब्याह का लिबास दिखाऊं)

(बेटी के ब्याह का लिबास दिखाऊ)
आओ अय्याशियो मे डुबे हुये चौथे स्तंभ,
तुम्हे इस मुल्क मे रेप से इतर,
खेत के मेड़ पे पड़ी बीना कफ़न--------
किसान की लाश दिखाऊ।
बंद कमरे मे बरसता सावन,
तीतर-बीतर कपड़े पैमाने से छलकी शराब,
किसान की आँखो मे सुखा,
उसकी दुपट्टे के फंदे से मरी बेटी,
रुदाली सी बीबी,लंबा सन्नाटा
उसकी जंग खाई पेटी में,
एै,रंग------------
बेटी के ब्याह का लिबास दिखाऊ।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

Saturday, 7 December 2024

(शहीद)

(शहीद)
इस गाँव की औरत कभी बेवा नही होती।
इस गाँव मे कभी भी लाशे नही आती,
तिरंगे मे लिपटे शहीद आते है।
यहाँ की कोई भी बुढी माँ-
काशी या काबे नही जाती।
ऐ रंग-
वे फिर से शहीद बेटे की वर्दी का
धुल साफ कर
सरहद की हिफाजत के लिये-
पोते पालती है।

(कंगन भई सौतन)

(कंगन भई सौतन)
तुम्हरे न आये--------
हाय! कंगन भई सौतन।
रही-रही के हियरा मे हुक उठे हमरे,
हाय! तुम्हरे न आये---------
यौवन भई सौतन।
इ कजरा,इ बिंदिया,इ सेन्हुर,महावर
कैसे सजु और सँवरु,
हाय! चुभे अँगुरी मे बिछुवा,
तुम्हरे न आये---------
मोरे बैरी बलम कि पऊवाँ क हमरे पायल भई सौतन।
तुम्हरें न आये--------
हाय! कंगन भई सौतन।
हे पियवा तु आवअ छोड़ आपन नोकरिया,
तड़पत हौ दिल सेजिया पे पनिया से निकालल मछरी नियन,
हाय! बीना तोहरे रहले--------
कमरा के हमरे पलंग भई सौतन।
तुम्हरें न आये------
हाय! कंगन भई सौतन।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Friday, 6 December 2024

(कितनी भीड़ है अम्मा)

(कितनी भीड़ है अम्मा)

तमिलनाडु का सारा आलम रो रहा,
उन आँसूओ के कतरे मे तेरी तस्वीर है अम्मा,
सच!तु बड़ी खुशनसीब और अमीर है अम्मा।
तुझे हर शख्स का कांधा नसीब हो रहा,
ये पूजा मे तेरी उम्र और अजान मे तेरी साँस मांग रहे थे,
सच तु इस दौर की जहाँगीर है अम्मा।
फिर लोग आयेंगे-जायेंगे----------
जारी रहेगा ये ज़मी का फ़नापन,
लेकिन तेरा जाना एक सदमा एक पीर है अम्मा।
उठ!हाथ हिला,बात कर,गरीब मुफ़लिसो से
अब भी इन्हे यकीन नही तेरी मौत का,
देख तुझे सुनने को आज--------------
तमिलनाडु मे कितनी भीड़ है अम्मा।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

(उतर रेलवे)

( उत्तर-रेलवे )
उत्तर-रेलवे----------
के एक मुसाफ़िर खाने मे बैठी, 
एक चौबीस-पच्चीस साला पगली,
अपने गंदे बाल खुजला रही थी,
मैने देखा---------
उसके आसपास आठ-नौ आवारा बद्चलन,
पुरुष खड़े--------
अश्लील फब्तियां कस रहे थे,
वे इस सबसे बेखबर-----
अपने गंदे बाल खुजलाये जा रही थी,
तो अचानक मेरी नजर भी,
उनका अनुसरण कर,
पगली की गदराई हुई देहयष्टि से चिपक सी गई.
फिर वे सभी मेरी तरफ मुड़े--------
और खिलखिला के हँस पड़े.
मै झेपा---------
और सोचने लगा कि क्या ?
मेरा चरित्र भी अब गिरने लगा है,
शायद नही,
अगर ये सच है तो फिर.
न जाने कल आने वाली पीढ़ी का---
चरित्र क्या होगा.

@@@रचयिता---रंगनाथ द्वीवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर pin no.222002 (उत्तर-प्रदेश)

Mo.no.7800824758

यह कविता मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

(गुनगुनी धूप)

( गुनगुनी धूप )
मै टैरेस पे---------
कुर्सी निकाल गुनगुनी धूप मे घंटों बैठी,
वे तुम्हारी चाहत के एहसेसात को-----
अपने भीतर कही हौले-हौले टटोल रही.
लेकिन उस टटोलने मे न जाने कहां,
तुम्हारा श्पर्ष मुझे मिला नही,
सच अब तुम्हारे--------
चाहत का बासीपन अब टीस रहा.
याद है मुझे अच्छे से-------
ठंड की ये गुनगुनी धूप,
जब तुम्हारा छुना और श्पर्श करना,
मेरे प्यार के अंतरतक को गुनगुना जाता,
वे शायद युवापन था------
लेकिन आज जैसे टैरेस की गुनगुनी धूप,
एक सखी सी-------
मेरी युवावस्था से कह रही,
नही ऐसा कुछ नही,
ये जीवन के पलछिन की करवट भर है,
फिर यही टैरेस और कुर्सी के बगल-----
दोनों का गुनगुनी धूप मे बैठे,
काफी पीना होगा.
तभी एक झोका सा हवा का आता है,
और उन्हें मै थका मांदा,
आफिस से बैग लटकाये,
टैरेस पे पड़ी हुई एक खाली सी कुर्सी,
निढ़ाल सा पाती हूं,
तब मै-------
उनकी मजबूरियों की गुनगुनी धूप को,
अपने अंतर मे एक बार फिर महसूस कर पाती हूं.

@@@रचयिता---रंगनाथ द्वीवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला---जौनपुर pin no.222002
Mo.no.7800824758

यह कविता मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

Thursday, 5 December 2024

(घुंघरू बांधती थी)

(घूँघरु बांधती थी)
रईसो के दरमियाँ वे सलिके से आती थी,
कभी ठुमरी,कभी दादरा गाती थी।
ऐ,रंग-----------
वे पाक थी कोठे पे सुना है,
कि वे केवल पाँव मे घूँघरु बांधती थी।

(जीवित कमायनी)

(जीवित कामायनी)
इंतजार करती है-----------
अपने कोठे पे बैठ हर शाम कोई ग्राहक।
न आने पे फिर वहीं से खोलती है,
जहा से उसने मोड़ रखा था--------
जय शंकर प्रसाद की कामायनी।
डबडबाई आँख मे मनू और इडा से ज्यादा,
भर आते है आँसू !
ये अथाह पिड़ा के फफोले का फूटना रोज सहती है,
इसी कोठे पे-----------
जब कोई आता दिखता है,
तो टुटी कुंडी वाले दरवाज़े की तरफ बढ़ चलती है,
ग्राहक की जल्दबाजी में------------
बंद करते दरवाज़े की टुटी कुंडी की आवाज़,
का मतलब वे समझ----------------
अपने एक-एक कपड़े को उतारती है,
और चारपाई पे--------------
उसका ग्राहक पैसे सुलता है!
फिर थकी मादी उठती है----------
मरहूम जय शंकर प्रसाद की ये जीवित कामायनी।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

Tuesday, 3 December 2024

(मासूम लड़की)

(मासुम लड़की)
तुम जीसे कहते हो गुँगी------
वे अक्सर मेरी गज़लो मे ढ़लती है,
वे थिरकती है------
जब पाँवो में बाँध के घूँघरु,
तो कितना बोलती है,
ऐ,रंग----वे गुँगी नही-------
एक मासुम लड़की है।

विश्व विकलांग दिवस पे।

(बातूनी लड़की)

(बातुनी लड़की)
मुस्लिम हो गई-----------
मुझ ब्राह्मण के गोद की वे बातुनी लड़की।
एक वालिद सा मेरा ख़याल रखती थी,
आज आई तो----------
पर दहलीज़ पे कुछ पल रुक,
फिर अपनी आँख में आँसू लिये लौट गई,
शायद वे समझ गई---------
कि अब वे पहले की तरह गले से नही लग सकती,
क्योंकि मुस्लिम हो गई समय के साथ--------
मुझ ब्राह्मण वालिद की वे बातुनी लड़की।
सर से पाँव तलक--------
बुरके से ढकी मुझे न जाने क्यू ,
आज एक मज़हब की कैद मे लगी एै "रंग"---
इस वालिदे ब्राह्मण की वे बातुनी लड़की।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Monday, 2 December 2024

(पोलियो ग्रस्त लड़की)

विश्व दिव्यांग दिवस पे लिखी कविता---------
         
             (पोलियो ग्रस्त लड़की )
वे लंगड़ी--------
पोलियो ग्रस्त लड़की,
तुम्हारी कुछ नही शायद,
पर मेरी बहुत कुछ है,
वे फूल है, कविता है मेरी
उसे छूता हूं, प्यार देता हूं
भावनाओं के कोरे कागज़ पे,
मेरे कही कोई रुपसी नही,
वही है----------
जिसे मै हुबहू उतार देता हूं.
कहा-अनकहा कुछ नही है तो बस,
उसकी मजबूरियों से नहाई आँखे,
मै उसके आँसुओं को------
शबनमी बूँदों की तरह पीता हूं,
उसे मै--------
अपना पहला और आखिरी,
प्यार देता हूँ.
मै अपने अंदर के कवि को उसपे---
और उसकी भावनाओं पे वार देता हूँ.

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर
जिला--जौनपुर पिन नं.222002 (उत्तर-प्रदेश).
Mo.no.---7800824758.

यह कविता मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

(कुंभ--अलौकिक विश्व आस्था)

(कुंभ--अलौकिक विश्वआस्था )
प्रयाग के कुंभ का स्नान, महज स्नान ही नही अपितु--"ये एक विश्वआस्था है जो पुरी दुनिया मे अन्यंत्र दुर्लभ है ऐसा तीन महान नदियों का संगम केवल और केवल अनादि और अनंत काल से प्रयाग मे होता आया है और शायद इस धरती के रहते कायनात तक होता रहेगा".
ऐसा सदियों से धार्मिक व आध्यात्मिक मान्यता है कि--"यहाँ पे स्नान करने के लिये तमाम देवी-देवता बड़ी तल्लीनता के साथ इस सुअवसर का पुरे वर्ष इंतजार करते है".
ये प्रयाग के कुंभ का स्नान धीरे-धीरे और ज्यादा वृहद व समृद्ध होता गया,आज हालत ये है कि प्रयाग जैसे जिले मे इन तीन महान नदियों के यानी--गंगा,यमुना, सरस्वती के संगम तट पर--"लगभग-लगभग कुछ बड़े देशो की कुल संख्या को छोड़कर उसके बाद की कुल जनसंख्या वाले देश के इतनी संख्या महज संगम तट पे ठहरती है".
इस स्नान मे भारत की तमाम बहुरंगी और बहुआयामी धार्मिक संस्कृति का एक वृहद दृश्यावलोकन होता है,तमाम तरह के अखाड़े का ढोल-ताशे के साथ स्नान को आना एक अद्भुत और एक अलौकिक छवि का दर्शन कराते है.
इनके दर्शन की बड़ी ही समुचित व उच्च स्तर की व्यवस्था रहती है, अगर कहे तो इसे सकुशल संपन्न होने तक---"हमारे इस उत्तर-प्रदेश जैसे राज्य के मुख्यमंत्री तक को चैन की नीद नही आती".
संगम तट की धूनी,अलाव,संतो,महंतो और तमाम-तमाम मठो और गृहस्थो का एक महिने का कल्पवास इस संगम नगरी को एक दैवीय स्वर्ग सी धरती मे परिवर्तित कर हमे हमारे अंदर के मोह,माया,दंभ,द्वेश को मानो नष्ट कर देते है अर्थात " ये महज तीन नदियों के संगम का स्नान भर नही, बल्कि ये हमारी आत्म सिद्धि का त्रिलोक भी है".
  
आप सभी आईये----"हमारी आस्था संगम पे स्नान करती है".

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर
जिला--जौनपुर पिन नं.222002 (उत्तर-प्रदेश).
Mo.no.7800824758

यह लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.

(कमरे की चूड़ियां)

( कमरे की चूड़ियां )

मै हर रोज,
बहाने बनाकर घूम जाता हूं 
नमाज़ के वक़्त
मस्जिद के बगल से,
जो गुजरती है--
चंद चूड़ीहारो की गली की तरफ से!

मैं-
उसे एक बार फिर से देखने की चाह में, 
तमाम चूड़ियों के,
दुकानो की तरफ देखता हूं,
कि शायद वे किसी दुकान पे,
दिख जाए मुझे,
अपनी नाजुक सी कलाई में,
पहनती हुई 
किसी चूड़िहार से चूड़ियां.

वे मुझे,अगले जुमें तक!
नही दिखी,
शायद वे किसी और शहर से थी,
मै ज्यों घुमा,उदास होकर 

तभी मेरी अचनाक नज़र पड़ी,
और मैं अपने होशो हवास खो बैठा 
क्योंकि-
वे आ रही थी सामने से,
अपनी सहेलियो के संग,
चूड़ीहारों की गली की तरफ,
मुझे यूं लग रहा था,
कि जैसे,
बज रही हो उस पूरी गली में,
चूड़ीहारों की,
मेरी महबूबा के हाथों में पहनी,
मेरे मोहब्बत की---
महबूब चूड़ियां!

सच आज---
वे मेरी शरीके हयात है,
जिसकी कलाई को चूमता हूं मैं 
एक-एक आयत की तरह,
सच किसी मस्जिद से कम नहीं,
पाकीजा,
मेरे घर और मेरे कमरे की चूड़ियां.

🌹🌹सर्वाधिकार सुरक्षित 🌹🌹

(सुकरात को भी)

"सच की जुबा अगर खामोश करनी है,तो इस दौर के सुकरात को भी जहर दे दो"---- रंगनाथ द्विवेदी

Wednesday, 27 November 2024

(आसमानी किताब हो)

(आसमानी किताब हो)
खुद को जरा सलिके से रंखो----
ऐ पारा-ऐ-हूश्ऩ,,
तुम कोई मामूली शख्स़ियत नही---
मेरी ख्व़ाहिशो की आसमानी किताब हो।

Tuesday, 26 November 2024

(द सुप शॉर्ट स्टोरी)

आज "The Soup" Short Stories की दो प्रतिया मुझे डाक से प्राप्त हुई जिसमें मेरी लघुकथा "The Old man on Platform Number-3" भी प्रकाशित है इस लघुकथा को ट्रांसलेट करने के लिए कल्पना भट्ट और संपादक वरुण महेश्वरी जी के साथ ही ज्ञानमुद्रा पब्लिकेशन भोपाल का बहुत-बहुत धन्यवाद 🌹🌹

Saturday, 23 November 2024

(कांच का ताजमहल था)

(काँच का ताज़महल था)
उस बेवफ़ा के हाथ से-----
गिरा और गिरके टुट गया,,,,,,,
ऐ,रंग----वे मेरा तोहफ़ा नही----
काँच का ताज़महल था।

(औरत के अंग)

(औरत के अंग)
हा मै औरत हू-----------
इसलिए तो तुम्हारे उन अंग विशेष,
को मै तकने भर से जान जाती हू,
कि तुम्हारी मंशा मेरे उन अंगो के-----
बस नोचने-खसोटने और मसलने से है।
जबकि एक औरत के वही अंग विशेष,
अपने पती के प्यार पाने के वक़्त भी,
शर्म ओढ़े रहते है,
क्योंकि उसमें किसी तरह की नोच-खसोट नही,
बल्कि एक-दुसरे के परम विश्वास का देव श्पर्श है।
हा!शायद तुम्हारा पुरुषपन अंदर से सध नही पाता,
किसी एक समर्पित अंग से बध नही पाता,
वरना तकते तो तुम्हें भी अपनी पत्नी का वे अंग,
उतना ही आकर्षित करता------------
जीतना की पर स्त्री या औरत का।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

(ट्रेन हादसा)

कानपुर में हुए ट्रेन हादसे की बरसी पर लिखा हुआ मेरी पीड़ाओं का एक मरसिया.

(एक दर्द कानपुर के नाम)

एै कानपुर------------
तेरे शहर में ये आँसुओ वाली ट्रेन,
हमे याद रहेगी।
ना भुलुंगा क्योकि---------
इस हादसे की मरसिया नीरज की तरह,
अब हमारे पास रहेगी।
मै जानता हु कि---------
तेरी फाइलो में गुम हो जायेगा ये दर्द,
तु सरकारी महकमा है!
पर जीना है उन घरो को ये हादसा,
उनके दिलो में आँसू रहेगा और-----
ता-उम्र ये चेहल्लुम की रात रहेगी।
एै कानपुर-----------
तेरी पटरियो से होके फिर गुजरेगी ट्रेन,
फिर उतरेंगे चढ़ेंगे मुसाफ़िर,
तेरी कानो मे---------
हर रोज एक नई आवाज़ रहेगी।
एै कानपुर----------
तेरे शहर में ये आँसुओ वाली ट्रेन,
हमें याद रहेगी।

@@@कानपुर ट्रेन हादसे पे लिखी एक गमज़दा रचना।

रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

व्यंग्य

✍️✍️✍️परसों एक मांगलिक कार्यक्रम में मुझे दो हेयर बैंड लगाए हुए युवकों को देखने का परम सौभाग्य प्राप्त हुआ,,लेकिन तभी से कंफ्यूज हूं कि मैं इन्हें पुरुषों की किस श्रेणी में रखूं🤓😀🤓😀 कृपया मनुष्यो की "श्रेणी सुधार के जानकार" अपनी राय दे,क्या ये मानसिक रुप से तीस प्रतिशत महिला होने के आधुनिक लक्षण तो नही 🤓🤓✍️✍️

Friday, 22 November 2024

(रोटी)

(रोटी)

भूख-
एक टक देखती है,
तवे पे सिंकती हुई,रोटी।
गरीब जानता है-
इसका हुस्न,इसका गंध
ऐ रंग,-
कितनी खुबसुरत लगती है,
तवे पे पलटी हुई,रोटी।

Thursday, 21 November 2024

(मै यहां रोने आता हूं)

(मै यहां रोने आता हूं)
तुम्हे पाने और खोने आता हूं,
अब हर शाम मै यहां रोने आता हु।
बनाता हु घरौदा फिर तोड़ देता हु,
मै यहां समंदर की लहरो मे,
खुद को हर शाम----------
डुबते सूरज की तरह डुबोने आता हु।
तु गई तेरी याद रह गई,
उसी याद की लाश को हर शाम-----
मै यहां धोने आता हु।
नींद और सुकून भी मेरी आँखो मे अब नही,
मै यहां कुछ लम्हे रेतीली कब्र पे--------
तेरी निशानियो के सिरहानें सोने आता हु।
मै तब भी पागल था और अब भी पागल हु,
तभी तो तेरी जुदाई के इतने सालो बाद भी,
मै यहां तेरा होने आता हु।
तुम्हें पाने और खोने आता हूं-------
अब हर शाम मै यहां रोने आता हु।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.--7800824758

(नेपाल)

अलग तरीके से नेपाल को लिखने की एक छोटी सी कोशिश-------

(नेपाल)

नेपाल-----
तेरी आँखे किसी हिरन सी,
आवाज कोयल की कूक
और बाँसुरी की तरह,
चेहरे पे तुम्हारी ये छुईमुई सी शर्म,
उफ! तु क्या जाने? कि तु--
कितनी खूबसूरत है.

नेपाल-----
उसपे तेरी ये सफेद सफ्फाक सी सलवार,
और सीने पे एक अल्लहड़ लड़की सी,
दुपट्टे का इधर-उधर फिसलना,
यूँँ लगता है कि जैसे तु----
किसी परी या अप्सरा की बेटी है.

नेपाल----
तु आज मेरे पूरे हो रहे इस नावेल की,
किताब के------
एक-एक शब्द में जिंदा रहोगी,
क्योंकि हमने तुम्हें देश की तरह नही,
अपनी मोहब्बत
और महबूबा की तरह देखा है.

यह कविता मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है.

रचनाकार---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758

Tuesday, 19 November 2024

(मरुस्थल हो गया)

(मरुस्थल हो गया)
जाने कब--------------
मेरी संवेदनाये मर गई,,,
दिल मे---------
नागफ़नी और कैक्टस उग आये!
ऐ,रंग---------
मै आदमी से मरुस्थल हो गया।

(तबस्सुम चली गई)

(तब्बसुम चली गई)

तुम्हें विदा करे उर्दू
या फिर विदा करे हिंदी
लेकिन---
तेरे जाने से
तहज़ीब के होठों से 
"तब्बसुम" चली गई 😥😥😥

रचनाकार--रंगनाथ द्विवेदी 
जनपद--जौनपुर (उत्तर प्रदेश)

"अलविदा तब्बसुम"💐💐💐

Friday, 15 November 2024

(अक्षरा)

यूजीसी से मान्यता प्राप्त हिंदी साहित्य की मध्य प्रदेश से प्रकाशित मासिक पत्रिका " अक्षरा" के नवंबर 2021 अंक की लेखकीय प्रति मिलने की याद मुझे दिलाने के लिए धन्यवाद फेसबुक और संपादक कैलाशचन्द्र पन्त जी का बहुत-बहुत आभार 🌹🌹🌹🌹

(स्वदेश डाला छठ)

कल दिनांक 17/11/23 से शुरू हो रहे छठ पर्व पर लिखा मेरा लेख आज के दैनिक स्वदेश के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ हैं,,,, जिसकी जानकारी मुझे भाई "डॉ अतुल मोहन सिंह" जी ने PDF के साथ दी हैं,इसके लिए उन्हें धन्यवाद देने के साथ ही उनके लोकप्रिय पत्रकारिता की तमाम उपलब्धियां के लिए भी मैं उन्हें ढेर सारी बधाई एवम् शुभकामनाएं देता हूं✍️✍️✍️✍️🙏🙏

डॉ.अतुल मोहन सिंह*
स्थानीय संपादक, स्वदेश, लखनऊ
*प्रांतीय कार्यालय, उत्तर प्रदेश*
2/38 विकासखंड, गोमतीनगर, लखनऊ-206010
संपर्क : 9807766888, 9451907315
(संस्करण : लखनऊ, आगरा, झांसी, ग्वालियर, भोपाल, इंदौर, जबलपुर, सतना, गुना, रीवा, खंडवा एवं शाजापुर)
swadeshnews.lko@gmail.com

Thursday, 14 November 2024

(सब कुछ था)

(खुदा ही सब कुछ था)

वे एक किरदार,वे एक बलंदी
वे एक मकाम
सब कुछ था,

वे एक शजर,
वे एक दरख़्त,एक शाख
एक परिंदा, एक दहर
सब कुछ था 

भागते,दौड़ते,थकते 
दौलत की जिंदगी गुजरी
और फिर एक दिन
सांस टूट गई
अपने समय के सिकंदर की 
तब लगा कि
कही कुछ नहीं,
बस खुदा ही
सब कुछ था.

✍️✍️ रंगनाथ द्विवेदी
इस रचना का सर्वाधिकार सुरक्षित है इसलिए इसे कही कॉपी या शेयर करने से पहले मेरी अनुमति अवश्य ले या मेरे नाम के साथ ही इस रचना को कॉपी या शेयर करे.

स्कूटर से लेकर प्लेन तक जिसने तमाम बुलंदियों को छुआ ऐसी महान शख्सियत सुब्रत राय सहारा को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि✍️✍️💐💐🙏🙏

Wednesday, 13 November 2024

(औरत नही देखी)

(औरत नही देखी)
माथे पे चुहचुहाता पसीना-----
कमर पे खुशी साड़ी-----
और सर पे सीमेंट की भदेली,,,,,,,,,,
श्रम की मादक चाल------
ऐ,रंग----मेरी कविता ने कभी----
इतनी खूबसुरत औरत नही देखी।

(बाल दिवस है)

(बाल दिवस है)
चाय की दुकान पे----------
सुट-बूट वाले साहब के,
अधरो पे सुलगते सिगरेट का कश है,
उस फैले धुँऐ में तेरह साल का बच्चा,
जूठे कप-प्लेट उठाता है,
जरा सा उसके मैले हाथो का श्पर्श
और माँ की गाली!
मासूम गालो पर------
बाल पकड़कर चंद चाटे,
देख रोटी-------
इतनी कम उम्र में इस बच्चे की भूख,
तेरी खातिर कितना विवश है!
इस मासूम को---------
अपनी पिड़ाओ की दुनिया से बाहर,
ये भी पता नही कि---------
कल तमाम देश के बच्चो के चाचा नेहरु का जन्मदिन,
यानी की बाल दिवस है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.7800824758

(ओढ़नी)

(ओढ़नी)
याद है बचपन---------
मैं पहले कहाँ ओढ़ती थी ओढ़नी।
वे तो जब मैं तेरह की हुई,
तो अचानक-माँ ने डाँटना शुरु किया,
और कहने लगी-----------
अब अपने सीने पे तुम रंखा करो ओढ़नी।
मैं चौंकी-----------------
कि ये अचानक माँ को क्या हुआ?
फिर लगा नही कुछ तो है,
यूँही नही माँ रखवाना चाहती होगी----
सीने पे ओढ़नी।
फिर कमरे में बंद कर,
खुद को शीशे में टटोलने लगी,
तो अचानक कुछ शर्म सी आई,
कुछ बदला सा था,
जहाँ माँ ने कहा था-रखने को ओढ़नी।
मै बाहर निकली----------
तो देखा बचपन को खिसकते,
लगा माँ कि कितना सच कह रही थी,
कि तु सयानी हो रही है,
क्योंकि कुछ लोग तक रहे थे,
एै,रंग------वही जहां माँ ने कहा था,
रख लो तुम ओढ़नी।

####एक सयानी होती हुई लड़की के वे तमाम चित्र इस रचना में है!गर सच लिखु तो इस कविता की ओढ़नी वाली वे तेरह साल की लड़की बन मैने--इस कविता को जिवंत लिखने की कोशिश की है,इसपे मै कितना खरा उतरा ये तो आप सभी सुधीजन पाठको पे है।

(कृति बहुमत)

छत्तीसगढ़, से प्रकाशित साहित्य की सर्वोत्कृष्ट त्रैमासिक पत्रिका "बहुमत" के 101 अंक में मेरी लघुकथाओ को स्थान देने के लिए संपादक बड़े भैया विनोद मिश्रा जी के इस आशीर्वाद व स्नेह के लिए मेरा कोटिशः प्रणाम🙏🙏. 

■"बहुमत " का 101 वां अंक ■
================================
● लुइस ग्लक की 9 कविताएं ।। अनुवाद--मंगलेश डबराल, लीलाधर मंडलोई, विनोद दास, तिथि दानी,प्रभात रंजन,श्री बिलास सिंह ।।
■ 75वें वर्ष में कवि -राजेश जोशी की तीन कविताएं
● रचना की जरूरत:निर्मल वर्मा
■ कविता का प्रयोजन: राजाराम भादू
●महात्मा गांधी के छत्तीसगढ़ प्रवास की शताब्दी स्मृति: राहुल सिंह का विशेष लेख
■रामनगीना मौर्य और आलोक रंजन की कहानियां
●रोअल्ड डाहल की अंग्रेजी कहानी:खाल (अनुवाद-सुशांत सुप्रिय )
■शानी की कहानी:कफ़न चाहिए

● कविताएं:: लीलाधर जगूड़ी, वेणु गोपाल,रूपम मिश्र, जोशना बैनर्जी आडवाणी, संदीप निर्भय,रवि प्रकाश, सुलोचना वर्मा,विनय सौरभ, हर्ष भारद्वाज,रजत कृष्ण, योगेश ध्यानी,शिवम चौबे, फिरोज खान, उल्लास पाण्डे, अंकिता आनंद,विधान,निधि अग्रवाल, अंकिता शाम्भवी, कुबेर कुमावत, अनामिका चक्रवर्ती,कुंदन सिद्धार्थ, पल्लवी मुखर्जी, वन्दना गुप्ता,अनु चक्रवर्ती,सोनी पाण्डेय,ज्योति रीता,अमृता सिन्हा ।।।।

■लघुकथाएं: सुशांत सुप्रिय, रंगनाथ द्विवेदी
● गज़लें: अनिता सिंह,देववंश दुबे, फूलचंद गुप्ता ।
■पुस्तकें मिली-महेन्द्र मिश्र, अशोक शाह,उषा दशोरा, सुभाष चन्द्र कुशवाहा,राम नगीना मौर्य, रामकुमार तिवारी,गौरव गुप्ता,नीरज नीर, कुबेर सिंह साहू, अरविंद श्रीवास्तव, वन्दना गुप्ता, अजित कुमार राय, राजेश झरपुरे, कुबेर कुमावत ।।

#आवरण: अनिल वशिष्ठ
#रेखांकन: अनुभूति श्रीवास्तव

•संपादक: विनोद मिश्र
•प्रबंध संपादक: अरुण श्रीवास्तव
•परामर्श: राजीव चौबे
               : दिनेश वाजपेयी
-■---------------■----------------■-------------■
श्री चतुर्भुज मेमोरियल फाउंडेशन, भिलाई-दुर्ग(छत्तीसगढ़) एवं जनसंपर्क विभाग छत्तीसगढ़ शासन के सहयोग से प्रकाशित
-■---------------------------------------■----------■

Saturday, 9 November 2024

ना ब्लाउज,ना बटन,ना काज तक 
वाह! रे! साहित्य आज तक 
हिंदी के छ्न्द,उर्दू के‌ मिसरे
फट गए 
कौन लिखेगा इतनी बेहयाई 

Thursday, 7 November 2024

व्यंग्य

🤓😀व्यंग्य के व्याकरण पर रिसर्च करते हुए मुझे अचानक पता चला कि नेता शब्द "गिरगिट और सांप का ही एक पर्यायवाची नाम हैं "🤓😀

(कश्मीरी पंडित)

(कश्मीरी पंडित)
वे बांगा दी बुलबुल-------
वे डलझील वे शीकारे--------
हमारी मिट्टी-ए-मोहब्बत कश्म़ीर,,
हमे ख्वाबो मे पुकारे।
ये सियासत-ए-साजिश-ए-अलगाव,
कि हम कश्म़ीरी पंडित पड़े है-------
खानाबदोशो से बदतर ऐ दिल्ली,
तेरी सड़को के किनारे।
वे गुल,वे केशर,वे सेब के बगीचे,
उफ!नही आती वे खूशबु ना आती है--
वैसी यहाँ तक हवा रे।
ये लाशे मईयत,ये रुह-ए-तड़प है,
ऐ,रंग---हम कैसे होगे जन्नतनशी----
ऐ कश्म़ीर तेरी पाक-ए-मिट्टी के बीना रे।

Wednesday, 6 November 2024

व्यंग्य यात्रा

अंग्रेजी कहानी में जो स्थान ब्रेट हार्ट,हिंदी में मुंशी प्रेमचंद का हैं वही स्थान व्यंग्य साहित्य के लेखन में हरिशंकर परसाई का है,जिनके बारे में हम कह सकते हैं कि ऐसा व्यंग्य लेखक "ना तो भूतों ना तो भविष्यति" कोई होगा लेकिन ऐसा भी नहीं इनके बाद व्यंग्य की धरती बंजर हो गई उत्कृष्ट व्यंग्य लेखन अब भी हो रहा हैं,,,, लेकिन हा ऐसे समय में जब हिंदी की तमाम बड़ी पत्रिकाएं अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही हों ऐसे समय में "व्यंग्य यात्रा" व्यंग्य के पाठकों की पहली पसंद बना हुआ है तो इसमें व्यंग्य के वर्तमान शिखर पुरुष प्रेम जनमेजय सर का बहुत बड़ा योगदान है.

"व्यंग्य यात्रा" केवल एक व्यंग्य पत्रिका ही नहीं बल्कि व्यंग्य कि एक पूरी क्लासिक यात्रा भी हैं", ऐसे में इस बार का अंक "हरिशंकर परसाई" पर रखकर प्रेम जनमेजय सर ने इस अंक को एक कालजई रूप दिया है, आज की डाक से मुझे सिर्फ इसकी एक पाठकीय प्रति ही नहीं बल्कि मुझे ऐसा लग रहा कि जैसे मैं भी व्यंग्य के इस नालंदा विश्वविद्यालय में हरिशंकर परसाई सर के लिखें हुए व्यंग्य की विधिवत क्लास देश के श्रेष्ठ और उत्कृष्ट व्यंग्य के गुणी आचार्यों से ले रहा हूं,,,,,,, एक बार पुनः मुझे अपना प्यार स्नेह और आशीर्वाद देने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद और सादर प्रणाम सर ✍️✍️🙏🙏

Monday, 4 November 2024

(बेगुनाह कर्ण)

कर्ण और कुंती दो पात्रो पे लिखी ये महज़ कविता नही अपितु बेगुनाह कर्ण के वे आँसू है जो बीना किसी अपराध के आज भी आँख से अपनी कुंती जैसी माँ से अपना अपराध जानना चाहता है?
                            (बेगुनाह कर्ण)
आज भी विवाह पूर्व जने बच्चे को-------
कुंती कचरे मे फेक रही है!
नियति का पहिया घुम रहा है,
कचरे का कर्ण--------
फिर बेइज़्ज़त और अपमानित होगा,
अपने दंम्भ और जाती का आँचल बचाने की खातिर,
आज की कुंती भी---------
कहाँ झेप रही है।
अट्टहास कर रहा कहकहे लगा रहा अमीरो का महल,
तमाम घिनौने कृत्यो को समेटे,
लेकिन मौन है?
कर्ण के उस कचरे के डिब्बे के रुदन से,
नही पिघल रही कुंती,
क्योंकि आज की कामांध कुंती के,
कामातुर मसले स्तन,
किसी कर्ण के होंठ से नही लगेंगे,
क्योंकि इस धरती पे हर कर्ण,
एक गाली था,गाली है और गाली रहेगा!
वे देखो घने अँधेरे मे चली आ रही फिर कोई कुंती,
कचरे के डिब्बे में फेकने-----
एक बेगुनाह कर्ण।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

Sunday, 3 November 2024

(परिंदे नही आए)

(परिंदे नही आये)
जो देश छोड़ गये थे,उनकी माँ मरी-----
पर वे बाशिंदे नही आये।
और तो और इस साल बगीचा भी सुना रहा-----------
क्युकि ऐ,रंग----हर मौसम जो आते थे-
वे परिंदे नही आये।

Friday, 1 November 2024

(मदिरा की गली में)

(मदिरा की गली मे)
हमने देखा है,ये प्रेम बस-------
मदिरा की गली मे।
कि राम चुस्कियाँ लेते है,
भूल कौम,मज़हब---------
और खुद डालते है मदिरा,
गिलास-ए-अली मे।
ऐ,रंग----हमने देखा है,ये प्रेम बस----
मदिरा की गली मे।

(इनकाउंटर)

(आतंकियो का-----इनकाउंटर)
क्या है?
उन आतंकियो और तुममें कोई अंतर,
तमाम इंसानी जानो से खेलने वाले---
ये आततायी सही हलाक हुये,
भले सही या गलत था इनका इनकाउंटर।
पर सियासत तेरा स्तर----------
जिस्मानी तवायफ़ो से गया बीता है,
वे जिस्म देती है!
और तुम नामुराद उतार देते हो------
अपने मादरे वतन के पीठ खंजर।
सच एैसे दोगलो तुमपे उबकाई आती है,
तुम एक जहरीले----------
आस्तीनी साँप हो अपने ही घर के अंदर।

@@@कल के आतंकी इनकाउंटर का एक छोटा सा समर्थन।

(शहर के लोग)

(शहर के लोग)
मुझे नंगी सुला गये शहर के लोग!
एै खिज़ा के पत्तो--------
तुम कभी मेरी कब्र पे गिरना।
कितनी मोहब्बत थी गुसलखाने से,
रहने नहीं दिये एक इंतकाले सब-----
बड़े बेमुरौवत निकले शहर के लोग।
मुझे नंगी सुला गये शहर के लोग।
एै मौसमें सावन--------
तुम कभी मेरी दफ़न-ऐ-बदन पे गिरना!
कभी शफ़क चाँदनी में टहलती थी,
घंटो जिस छत पे,
ले चले उसी छत वाली गली से-----
मेरा जनाज़ा मेरी शहर के लोग।
मुझे नंगी सुला गये शहर के लोग।
एै चाँद वैसे ही शफ़क रातो की तरह,
मेरी इस रुहे बदन पे पड़ना,
मेरी तड़प है कि अब भुले से नही आते,
शहर तो शहर मेरे अपने घर के लोग।
मुझे नंगी सुला गये मेरे शहर के लोग।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

(आईना तोड़ देती हैं)

(आईना तोड़ देती हैं)

पटकती है बेरहमी से
सिसकता-
छोड़ देती है.

ए "रंग"
वे हुश्ने बेगैरत 
हर महीने 
एक आईना तोड़ देती है.

Wednesday, 30 October 2024

व्यंग्य

✍️✍️भूख और गरीबी पर आजकल सूट बूट पहन कर लोग लिख रहे हैं,,यह दौर नागार्जुन का नहीं है,,,हां इस समय हमारी रोटी और गरीबी दोनों ही व्यंग्य है😃😃

व्यंग्य

✍️एक तथाकथित लेखक ने मासिक पत्रिका में छपने की लालसा के वशीभूत होकर उस पत्रिका को “महा ग्रंथ” लिख दिया.बस गनीमत इतनी थी कि, उन्होंने संपादक को “महर्षि व्यास” नहीं लिखा.😃😃😃😃

Tuesday, 29 October 2024

(व्यंग्य)

💃💃🕺🕺अगर आपकी पत्नी,, आपकी पड़ोसन से हंसते हुए यह कहे कि मेरे इसके पापा तो "एकदम गोबर गणेश है",,,तो समझिए की आपकी पत्नी आपके पतियोचीत व्यवहार से संतुष्ट है😀😀🤓🤓

Monday, 28 October 2024

(मां)

(माँ)
माँ-
    मै ढ़ेरो खाता हूँ,पर तेरी 
चुपड़ी रोटी की भूख-
रह जाती है।
आज सबकुछ है,
स्लीपवेल के गद्दे,एसी कमरे
पर नींद-
घण्टो नही आती है।
ऐ रंग यादो मे-
माँ की गोद,
और लोरी रह जाती है।

(याद आऊंगा)

(हिचकियो मे याद आऊँगा)

✍️✍️जाओ चाहे जितनी दूर तुम हमसे,,ऐ मेरी मोहब्बत--
मै तेरी हिचकियो मे याद आऊँगा.

Sunday, 27 October 2024

(दर्द के सीने में जलूंगी)

(दर्द के सीने मे जलुंगी)
ऐ दिवाली के दिये-----------
मै भी तेरे संग जलुंगी।
बस फर्क ये होगा कि------
तुम प्रीत की तीलि से जलोगे,,,
और मै विरह के तीलि से जलुंगी।
तुम मुँडेर,घर और दहलिज़ पे जलोगे--
रौशनी के लिये,
मै तो घुटुंगी,क्योकि मै वे दिया हूँ----
जो अपने ही दर्द के सीने मे जलुंगी।

Saturday, 26 October 2024

शेर

अंधेरी रात का खौफ 
कुछ और बढ़ जाएगा,
क्योंकि––
हमारे शहर के कुछ रईस 
उजाले खरीदने की फिराक में हैं.

Thursday, 24 October 2024

महत्वपूर्ण लेख

आवश्यक सूचना - साहित्यनामा पत्रिका के दीपावली विशेषांक के लिए रचनायें आमंत्रित हैं
साहित्यनामा पत्रिका के दीपावली विशेषांक के लिए प्रमुखतः नीचे दिए गए विषयों पर आलेख और निबंध इत्यादि आमंत्रित हैं। नियत विषयों पर आलेखों के अतिरिक्त रचनाएँ जैसे कहानी, लघु कथा, यात्रा वृत्तान्त, संस्मरण, गीत, गज़ल, कविता, छंद, मुकरी, हाइकु आदि भी भेजी जा सकती हैं। 
यात्रा वृत्तान्त, संस्मरण, कहानी और आलेख के लिए शब्द सीमा अधिकतम 1500 शब्द है। लघु कथाओं के लिए अधिकतम शब्द सीमा 400 शब्द होगी । गीत, गज़ल, कविता, छंद, मुकरी, हाइकु के लिए अधिकतम 20 लाइन नियत है ।
सभी नवोदित व स्थापित रचनाकारों से आग्रह है कि आप अपनी सर्वश्रेष्ठ व अप्रकाशित रचनाएँ ही भेजें। सम्पादकीय मंडल की स्वीकृति होने पर ही रचना को पत्रिका में स्थान मिलेगा इसलिए रचना का स्तरीय होना आवश्यक है । 
रचनाएँ भेजने की अंतिम तिथि 12 नवम्बर रखी गयी है । निर्धारित समय सीमा के बाद भेजी गयी रचनाएँ स्वीकार्य नहीं होंगी। 
अपनी रचना के साथ आप यह अवश्य लिखें कि यह रचना मौलिक और अप्रकाशित है । रचना के साथ आपका एक चित्र, संक्षिप्त परिचय, पता, फोन नंबर और ईमेल भी अवश्य ही दें और सभी कुछ एक ही मेल में दें, अलग अलग मेल से नहीं। रचना के बारे में और अन्य कोई पत्राचार अनुत्तरित रह सकता है ।
आपको अपनी रचनाएँ साहित्यनामा पत्रिका ईमेल sahityanamaa@gmail.com पर भेजनी हैं ।
साहित्यनामा पत्रिका का आगामी अंक दीपावली विशेषांक है इसलिए रचनाएँ दीपावली के त्यौहार और इससे सम्बंधित विषयों पर केन्द्रित हों और रचनाओं का कलेवर भी उसी प्रकार का होना चाहिए । कुछ विषय नीचे दिए गए है जो नियमित स्तंभों से इतर हैं :- 
दीपावली विशेष -
1. कार्तिक मास का महत्व 
2. त्योहारों का व्यवसायीकरण
3. प्रवासी कथा साहित्य में दीपावली
4. भारत में दीपावली को लेकर प्रचलित मान्यताएँ
5. खुशियों और सौगातों का त्योहार है दीपावली
6. सरहदों पर दिवाली
7. त्यौहार की मूल भावनाओं से भटकाव 
8. भगवान् राम के आदर्श और आज के समय में उनकी उपादेयता 
9. हिंदी कविताओं में जलते दीपावली के दीपक
10. दिवाली के दीयों से जगमग है हिंदी साहित्य
11. आलोक पर्व का सांस्कृतिक महत्त्व
12. भगवान धन्वन्तरि का चिकित्सा जगत में योगदान 
13. त्योहारों की बढती चकाचौंध में फीके होते स्वाद और संस्कार 
14. धन तेरस/ नरक चतुर्दशी या रूप चतुर्दशी/ दिवाली/ गोवर्धन/ भाई दूज का पौराणिक महत्त्व 
नियमित स्तम्भ -
A. साहित्य 
1. साहित्यकार जिनकी जन्मतिथि या पुण्यतिथि अक्टूबर/नवम्बर में है जैसे – प्रेमचंद, राम चन्द्र शुक्ल, भगवती चरण वर्मा, जय शंकर प्रसाद, हरिवंश राय बच्चन 
2. साहित्य के रोचक तथ्य 
3. बाल साहित्य 
4. साहित्य इतिहास के झरोखे से 
5. दलित साहित्य 
6. महिला साहित्य 
7. विदेशी साहित्यकार – जॉन कीट्स /ऑस्कर वाइल्ड/ मार्क ट्वेन/ जॉर्ज इलियट
8. नयी पुस्तकें 

B. प्रमुख व्यक्तित्व 
9. लाल बहादुर शास्त्री / महात्मा गाँधी/ भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू/ भारतीय मज़दूर संघ के संस्थापक दत्तोपन्त ठेंगडी/ क्रांतिकारी विरसा मुंडा/ भारत रत्न से सम्मानित विनोबा भावे/ समाज-सुधारक ज्योतिराव फुले
10. चंद्रशेखर वेंकट रमन जयंती

C. प्रमुख दिवस 
11. गाँधी जयंती / अहिंसा दिवस 
12. विश्व शाकाहार दिवस  
13. राष्ट्रीय कैंसर जागरूकता दिवस
14. भारत में बाल दिवस / विश्व मधुमेह दिवस
15. राष्ट्रीय शिक्षा दिवस

D. रंगमंच और सिने जगत 
16. अभिनेता शशि कपूर
17. अभिनेता पृथ्वीराज कपूर
18. प्रेम नाथ 
19. अशोक कुमार / किशोर कुमार 

E. तीज - त्यौहार 
20. दशहरा/विजयादशमी  
21. नवरात्रि /दुर्गा पूजा 
22. करवा चौथ 
23. शरद पूर्णिमा 

F. स्वास्थ्य, पर्यावरण और विज्ञान 
24. चिकत्सा विज्ञान के क्षेत्र में बढ़ते कदम  
25. आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस का प्रभाव और योगदान 
26. क्या महिलाओं और पुरुषों को एसी का अलग तापमान चाहिये?
27. विज्ञान और तकनीक  

G. साक्षात्कार और परिचय 
28. युवा रचनाकार का साक्षात्कार 
29. किसी गीतकार का साक्षात्कार 
30. साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर
31. आधुनिक भारतीय साहित्यकार का परिचय
32. विदेशी साहित्यकार का परिचय 
33. सशक्त हस्ताक्षर 
34. प्रतिभा किसी की मोहताज नहीं 
35. शिवानी का व्यक्तित्व और कृतित्व 
36. नारी मन की चतुर चितेरी शिवानी
37. रामकुमार वर्मा की साहित्यिक- यात्रा
38. रामकुमार वर्मा की इतिहास दृष्टि )


I. पर्यटन – यात्रा वृत्तान्त 
J. सामाजिक सरोकार
K. देश –विदेश 
L. समीक्षा, साहित्य आलोचना और साहित्यिक गतिविधियाँ (समाचार)
M. आपकी पाती (पाठकों की प्रतिक्रियाएं)
N. कैरियर सलाह – कैरियर के लिए नई स्किल्स 
O. क़ानूनी सलाह
P. संस्मरण 
Q. कार्टून और चित्रण 
R. पाक कला 
S. युवा लेखकों का कोना 
T. पाठकों का कोना

(कलयुग की अयोध्या)

(लखनऊ--कलयुग की अयोध्या)
सियासत---------
हर युग में बुढ़े पिता को दशरथ बना देती है।
अचानक मांग बैठती है साधना सी कैकेई,
मुलायम जैसे असहाय दशरथ से पिता से लिया कोई वचन,
और लखनऊ जैसी वर्तमान अयोध्या से,
छिन अखिलेश से राम को!
अपने पुत्र मोह की खातिर,
वे प्रतिक को--------
अमर सी मंथरा के कारण,
कलयुग का भरत बना देती है।
सियासत--------
हर युग में बुढ़े पिता को दशरथ बना देती है।
लेकिन समय की रामायण का ये कलयुगी कालखंड़ है,
अब सियासत की अयोध्या लखनऊ की गद्दी पे----------
आसीन होता है वही राम,
जिसकी यहां की जनता-----
अपने वोटो से बहुमत बना देती है।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758
उत्तर-प्रदेश के वर्तमान राजनैतिक हालात पर।

(प्याज)

(प्याज़ )

प्याज़ ठेले की सभी सब्जियों में----
करीना कपूर और 
ऐश्वर्या राय लगने लगी है, 

अदा---
प्रियंका चौपड़ा की तरह, 
ठसक--
कंगना राणावत की तरह, 

हाय रे ! ठेले की किस्मत, 
कि प्याज़, सभी सब्जियों में
बिपाशा बसु
और कैटरीना कैफ लगने लगी है.

😀😀😀😀😄😄😄😄

रंगनाथ द्विवेदी. 
जौनपुर ( उत्तर-प्रदेश)

(अवैध संबंध है)

(अवैध संम्बंध है)
हा!मुझे कुबूल है,तेरे इल्ज़ाम से पहले---
ऐ खूबसुरती-------
कि मेरा तेरी तारीफो से---------
अवैध संम्बंध है।

Monday, 21 October 2024

(बाल दिवस है)

(बाल दिवस है)
चाय की दुकान पे----------
सुट-बूट वाले साहब के,
अधरो पे सुलगते सिगरेट का कश है,
उस फैले धुँऐ में तेरह साल का बच्चा,
जूठे कप-प्लेट उठाता है,
जरा सा उसके मैले हाथो का श्पर्श
और माँ की गाली!
मासूम गालो पर------
बाल पकड़कर चंद चाटे,
देख रोटी-------
इतनी कम उम्र में इस बच्चे की भूख,
तेरी खातिर कितना विवश है!
इस मासूम को---------
अपनी पिड़ाओ की दुनिया से बाहर,
ये भी पता नही कि---------
कल तमाम देश के बच्चो के चाचा नेहरु का जन्मदिन,
यानी की बाल दिवस है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.7800824758

(बॉलीवुड एक बेवा बिखराव है)

(बाॅलीवुड----एक बेवा बिखराव है)
बाॅलीवुड----------
नरगिस और राज कपुर का अलगाव है,
गुरुदत्त की ख़ुदकुशी है,
तो घुट-घुट के दुनिया से विदा हुई------
मीना कुमारी के सीने का घाव है।
बाॅलीवुड----------
आँसू और ड्रामा है ,
ये उस काका के आनंद का किरदार है,
जो बाबु मोशाय के बाद--------
एक तन्हा कोठरी में तड़पता और घुटता है,
सच बॉलीवुड-----------
एक शराबी
की पिड़ाओ का गैंग्रीनी पाँव है।
बाॅलीवुड----------
वे परवीन बाॅबी है जिसे कई महेश भट्ट ने चाहा मगर,
उसे तन्हा छोड़ दिया!
वे डिप्रेस्ड बंद कमरे में छ दिनो तलक,
मरी पड़ी रही बीना किसी वारिस के,
सच तो ये है कि बाॅलीवुड-------
 औरत की अधुरी ख्वा़हिशो की घुटन,
और एक बेवा बिखराव है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर पिन नं--222002 (उत्तर-प्रदेश).
mo.no.----7800824758.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

(चुनाव आ गया)

( चुनाव आ गया )
ठंडे नेताओं को-----------
चार साल बाद ताव आ गया,
इसका मतलब है चुनाव आ गया.

ये कांंइयाँ--------
फिर इतने वादे दिल-दिमाग मे झोक देगा,
कि हम कल्पनाओं मे खो जायेंगे,
और हमें लगेगा की जैसे हमारे यहाँ------
बहुत जल्द एक अमेरिकन गाँव आ गया,
इसका मतलब है चुनाव आ गया.

बाते चिकनी और चुपडी कर,
दिल और दिमाग मे उतर जायेगा,
लगेगा इसी का कहा ही सच,
कि अब तलक इस गाँव मे केवल चोर-डाकु आये थे,
ये पहली बार है कि उसके रुप मे-----
हमारे यहाँ भी कुछ करने भगवान के भेजे,
एक साव आ गया--------
इसका मतलब है चुनाव आ गया.

ठंडे नेताओं को--------
चार साल बाद ताव आ गया,
इसका मतलब है चुनाव आ गया.

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर
जिला--जौनपुर पिन नं.222002 (उत्तर-प्रदेश).
Mo.no.--7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

Sunday, 20 October 2024

(उजाले की रात है)

(उजाले की रात है)
घर मे देवता आयेंगे,
उजाले की रात है।
दुःख,दर्द भगायेंगे,
उजाले की रात है।
नेह भर के रख दूँ,
आज की थाली-
वे भोग लगायेंगे,
उजाले की रात है।
ऐ रंग,-
क्या अमीर?क्या गरीब?
वे आज-
सब के घर जायेंगे,
उजाले की रात है।
घर मे देवता आयेंगे,
उजाले की रात है।

ढ़ेर सारे दीपो के साथ दीपावली की
शुभकामनाऐ,-रंगनाथ दुबे।

(गुलेल नीलोफर)

(गुलेल नीलोफर)
छुट रहे-
गुड्डे और गुडियो के,
खेल नीलोफर।
अब कैसे होगा,
तेरा अपनी सखियो से-
मेल नीलोफर।
रो रहा,रंग,-
अमिया को तोड़ने वाला,
तेरा छज्जे पे रखा-
गुलेल नीलोफर।

@@@नीलोफर यानी एक सिल-सिलेवार दर्द।

(गुनाह नीलोफर)

(गुनाह नीलोफर)
रखती थी-
सभी का खयाल नीलोफर।
फिर जलायी क्यूँ गयी?
अपने ससुराल नीलोफर।
ऐ रंग,-मेरी नज्म का -
वे गीरेबान झींझोड़े
पूछ रही हमसे-
अपनी गुनाह नीलोफर।

{आप बचा सकते है,
अपने आस-पास एक-
बेगुनाह नीलोफर।}

(अयोध्या उदास है)

राम मंदिर का फैसला आने से पहले 2019 में हमने एक रचना लिखी थी-------

(अयोध्या उदास है)

इस दिवाली भी---
सरयू उदास है,अयोध्या उदास है
हमारी आस्था टेंट मे है, 
उफ! मेरे अंतस मे केवट,
और हे! राम कह रहा--
जटायु उदास है.

रामभक्ति में-----
तमाम शबरी की आँख पथरा रही,
वे देखो----
मंदिर के लिये तराशी गई,
लंबे समय से रखी,
किसी अहिल्या सी,
राम मंदिर की––
शीला उदास है.

ये वनवास----
उन्हीं की नगरी में उफ!
हम नपुंसक है,
शायद इसी से-----
हनुमान, लक्ष्मण,सीता ही नही,
बल्कि अपने राम के वात्सल्य की,
मां--
कौशल्या उदास है.

इस दिवाली भी---
सरयू उदास है,अयोध्या उदास है.

रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
7800824758

(जोक)

✍️✍️इस समय हार्ट अटैक की वजह से ज्यादा मौते हो रही है,,,इसलिए आई लव यू जैसे रासायनिक शब्दो का प्रयोग😀😀पति और पत्नी भी बहुत अनिवार्य होने पर ही करें🤓🤓

Saturday, 19 October 2024

(एक जिंदा दिया हूं)

(एक जिंदा दिया हूँ)
ताउम्र अपनी मै जल-जल के जिया हूं,
मै आदमी नही-----------
एक जिंदा दिया हूँ।
तमाम खराशे है,है तमाम सिलवटे
उधड़ा रहा मै----------
किसी मुफ़लिस के बिछौने सा,
हर जख्म जिंदगी का-------
मै खुद से सिया हूं।
मै आदमी नही--------
एक जिंदा दिया हूँ।
हु मै एक एैसा सजायाफ्ता,
जो रो नही सकता!
खौलते है आँसू मेरे दिल के अंदर,
मै कभी बहार में नही-------
खिजा़ में जिया हूं।
मै आदमी नही------
एक जिंदा दिया हूँ।

(जोक)

फेसबुक के सभी कुंवारे लड़के दिसंबर लास्ट तक ऊर्फी जावेद की फोटो को ध्यान से देखे🤓 
उन्हें ठंड में डाबर च्यवनप्राश खाने की जरूरत नही पड़ेगी यह सूचना कुंवारों के जनहित में जारी 🤓🤓

Thursday, 17 October 2024

(गुलेल नीलोफर)

(गुलेल नीलोफर)
छुट रहे-
गुड्डे और गुडियो के,
खेल नीलोफर।
अब कैसे होगा,
तेरा अपनी सखियो से-
मेल नीलोफर।
रो रहा,रंग,-
अमिया को तोड़ने वाला,
तेरा छज्जे पे रखा-
गुलेल नीलोफर।

(एल आई सी की तरह करता है)

(एल.आई.सी की तरह करता है)
मै तंग आ गई हूँ उसकी किस्त से,,,,,,,,
ऐ,रंग----मेरा शौहर-----
मुझसे मोहब्बत भी---------
एल.आई.सी की तरह करता है।

(ताजमहल)

ताज़महल पे हो रही सियासत से प्रेरित एक रचना-----------
                     (और एक ताज़महल)
मुहब्बत की निशानी की खातिर है याद महल-----
उफ!आज सियासत की ज़द में है ताज़महल।
मै नही कहता कि लड़ा जाये इस जगह------
लड़ने को और भी है इसके बाद महल।
कुछ जोड़े कसम खाते है न जुदा होने की--------
एैसा इसके सिवा दुनिया में नही है मुझे कोई याद महल।
रहने दो इसे मंदिर-मस्जिद मत कहो------
जैसे भी है रहने दो इस ज़मीने जन्नत मे ये आबाद महल।
क्योंकि जानता हूँ एै "रंग" कि बना नही सकती ये दुनिया---
इस ज़मी पे कोई एक और ताज़महल।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.----7800824758

Wednesday, 16 October 2024

(बनके फूल नीलोफर)

(बन के फूल नीलोफर)
कर नही पाये,
बना के तुम्हे बेटी
ये कुबूल नीलोफर।
तबाह कर देगी,पुरा कुनबा
उनकी-
ये भूल नीलोफर।
ऐ रंग,-
ये दुनियावी चलन है
कि फिर-
किसी के आँगन मे खिलेगी-
बन के फूल नीलोफर।

(खपरैल के घर)

(खपरैल के घर)
मिट्टी की सोंधी गंध,वे तितलियो के पर,,
वे खुला आसमान,वे पीपल की हवा---
सब कुछ टिसता है मेरी यादो मे।
ऐ,रंग--इस फ्लैट की घुटन से कही अच्छे थे-----------
मेरी गाँव मे खपरैल के घर।

(रावण)

(रावण )
पुराने खल चरित्र का रावण ,
आज के माडर्न खल चरित्र के रावण से,
कही ज्यादा पवित्र व श्रेष्ठ था,
क्योंकि उस रावण पे,
आज के माडर्न रावण की तरह-----
"किसी मासूम आठ वर्ष की बच्ची के,
रेप का कोई इल्जाम न था" ।
पुराने रावण पे तो,
उस राम ने विजय पाली,
पर माडर्न रावण से,
आज के राम डर गये है,
उससे गली-गली, शहर-शहर,
बचते व छिपते फिर रहे,
और माडर्न रावण अट्हास कर रहा।
शायद ऐसा लग रहा कि जैसे,
उस महा-विद्वान पुराने रावण के----
 मारने के श्राप से राम पीड़ित हो गये है।
सच तो ये है कि आज के माडर्न रावण को जला पाना,
इस नपुंसक समाज के बस का नही,
तभी तो अब भी,
हर दशहरे मे उसी पुराने रावण को------
जलाया जा रहा।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला---जौनपुर Pin.no.222002
(उत्तर-प्रदेश)।
Mo.No.--7800824758.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

(मैं दर्दे दरख़्त हूं)

(मै दर्दे दरख्त़ हूँ)
मै वे दर्दे दरख्त़ हूँ--------
जो चोट पे भी चुप रहती है शाख-शाख।
सब छोड़ जाते है--------
कुछ लम्हों के बाद मुझको,
मै सिसकती हु तन्हा अक्सर,
अपनी ही साँस-साँस।
मेरे बदन की ये लिबासे पत्तियां,
कर देती है खिज़ा में-------
बेपर्दा बदन मेरा!
मै जीती हूं किस तरह-------
शर्म को अपनी पलको से टांक-टांक।
मै वे दर्दे दरख्त़ हूँ-------
जो चोट पे भी चुप रहती है शाख-शाख।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

Tuesday, 15 October 2024

(गुनाह नीलोफर)

(गुनाह नीलोफर)
रखती थी-
सभी का खयाल नीलोफर।
फिर जलायी क्यूँ गयी?
अपने ससुराल नीलोफर।
ऐ रंग,-मेरी नज्म का -
वे गीरेबान झींझोड़े
पूछ रही हमसे-
अपनी गुनाह नीलोफर।

{आप बचा सकते है,
अपने आस-पास एक-
बेगुनाह नीलोफर।}

(बहस की जुर्रत करेगी)

(बहस की ज़ूर्रत करेगी)
गीता-कूर्आन----------
की मौत का मुझे खौफ़ नही।
गर कोई माँ किसी दंगे मे मरेगी,,,,,,,
तो ऐ,रंग--मेरी नज़्म हर मर्तबा------
मंदिर-मस्ज़िद से बहस की ज़ूर्रत करेगी।

Monday, 14 October 2024

तंज

😀😀वह पारिवारिक रील बनाकर वायरल नहीं हो रही थीं,,लेकिन जबसे उसने 90% अपने शरीर को ढकने वाली कपड़ों की रील काटी है,,तब से उसकी हर रील "वायरल बुखार हो गई है"😢😢

(जोक)

🥸🥸सावधान विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि इस समय हमारे देश में "बेरोजगार और इच्छाधारी प्रेमिकाओं की संख्या काफी तेजी से बढ़ रही हैं"😀😀😀

(शेर)

✍️✍️नाम लेने को 
लें तो लूँ ऐ "रंग" --
लेकिन कोई शख्स मेरे शहर में बेनकाब हो जाएगा.😢😢

(शेर)

✍️✍️काफ़िया रदीफ़ में तुम लिखो,,हमें तो मोहब्बत लिखना था लिख दिया🌹🌹♥️♥️

(जोक)

✍️✍️आप सभी अपनी–अपनी पत्नियों को विश्व हृदय दिवस की हार्दिक बधाई दे दीजिए,, क्योंकि एक व्यक्ति का हृदय उसके शादी के बाद ही सर्वाधिक मजबूत होता है.😀😀😀😀

(जोक)

✍️✍️एक बहुत बड़ी पत्रिका है जो केवल अंतिम चरण वाले लेखकों को ही छापती है,,अतः अगर आप अंतिम चरण वाले लेखक हैं एक दो चरण में ही अपनी रचना या अपना लेख भेज दे 😀😀🥸🥸

(जोक)

मोहब्बत के एक वरिष्ठ डॉक्टर का कहना है कि--"प्रेमिका डेंगू है,साली चिकनगुनिया,सरहज टाइफाइड और सास मलेरिया,,इसलिए ज्यादा से ज्यादा आप अपने दिल के प्लेटलेट को मेंटेन रखें"😀😀

(जोक)

✍️✍️पहले विवाह से पूर्व लड़की वालों की तरफ से हमारे यहां के लड़को का इंटरव्यू लिया जाता था,,आज नौकरी के लिए लिया जाने वाला इंटरव्यू उसी की नकल है😁😁😁😁

(बस्तियां)

✍️✍️मासूम बच्चियों की रेप से बेहतर है,,,कि हमारे शहर में कुछ बस्तियां तवायफों की हों🥲🥲

(शेर)

खुद भूख से मर गया ऐ "रंग",,,,जो ता उम्र
औरों की अमीरी के ताबीज़ बेचता था 😥😥

(अख्तरी बेगम)

(अख्तरी बेगम)

लग रहा कि जैसे 
गा रही हो 
ठुमरी,दादरा,टप्पा 
अख्तरी बेगम. 

सामने चांद है,रात है, 
तारे है 
उन्हीं के बीच दिख रही 
अपने आप में डूबी
और खोई सी 
अख्तरी बेगम. 

उसके हौले–हौले से चलने की आवाज़ 
करीब आती जा रही
शायद! मेहमान खाने में 
फिर किसी से मिलने आ रही है
अख्तरी बेगम.

ना कुछ खोने का दर्द, 
ना कुछ मिलने की चाह 
बस एक तार टूटा 
और इस जमीं से 
सिर्फ विदा हुई 
मरी नही 
अख्तरी बेगम.

रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी,मियाँपुर 
जिला--जौनपुर 222002 (U P)

(जोक)

✍️✍️हमारे जौनपुर में तो जलेबी से ज्यादा इमरती मशहूर है,,वैसे भी "जलेबी की शक्ल जहां ललिता पवार से मिलती है वही हमारे यहां की इमरती की शक्ल ऐश्वर्या राय से"😃😃😃😃

(सूक्ति परक वाक्य)

✍️✍️डॉक्टर आज की तारीख में भगवान की आड़ में सफेद कपड़े में छिपा वह कातिल है जो अपने अस्पताल से लेकर पैथोलॉजी के जांच तक आपकी हत्या करता है🥲🥲

(जोक)

✍️✍️दीपावली में योग्य उल्लू ना मिलने पर आप आपात स्थिति में अपने पति की पूजा कर सकती हैं,,😃😃

(शेर)

✍️✍️ आड़े-तिरछे उबड़-खाबड़ पत्थरों की ओट में लिपट के लौटते हैं पति-पत्नी,,, उफ़!क्या करे आठ लोगों की बैठी चाल में मोहब्बत नहीं होती 😢😢 
मुंबई का एक सच यह भी

(जोक)

आप ऐसी लड़की से कदापि शादी ना करें,जिसके पिता के बाल उसकी मम्मी की शादी के बाद से झड़ गए हो,,😃😃 एक जेनेटिक सर्वे

(गूंजा का गाँव)

(गुंजा का गाँव)
है,आज भी नदिया का पानी
है,आज भी पीपल की छाँव।
आज भी-
उतरे है,चन्दा पूरे आँगन
है,आज भी ऐ रंग,-
वही चन्दन
और है,वही उसकी-
गुंजा का गाँव।

(हिन्दू और मुसलमान सुनना)

(हिन्दु और मूसलमान सुनना)
कभी भूख का वंदे मातरम-------
तो कभी रोटियो का राष्ट्रगान सुनना।
जो चंद रुपये मे खुद को बेच आई है---
ऐ,रंग---कभी उस औरत की ज़ुबां से,,,
हिन्दु और मूसलमान सुनना।

(बेजा तलाक ना दो)

(बेजा तलाक न दो)
ख्वा़हिशो को खाक न दो!
एै मेरे शौहर-----------
सरिया के नाम पे,
मुझे बेजा तलाक न दो।
बख्श दो---------
कहा जाऊँगी ले मासुम बच्चे,
मुझ बेगुनाह को-------
इतना भी शाॅक न दो,
बेजा तलाक न दो।
न उड़ेलो कान में पिघले हुये शीशे,
मुझ बांदी को सजा तुम--------
इतनी खौफ़नाक न दो,
बेजा तलाक न दो।
न छिनो छत,न लिबास
खुदा के वास्ते रहने दो,
मेरी बेगुनाही झुलस जाये-------
मुझे वे तेजाब न दो,
बेजा तलाक न दो।
सी लुंगी लब,रह लुंगी लाशे जिंदा,
लाके रहना तुम दु जी निकाहे औरत,
मै उफ न करुंगी!
बस मेरे बच्चो की खुशीयो को कोई बेजा,
इस्लामी हलाक न दो-------
बेजा तलाक न दो।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.7800824758
____तलाक एक दर्द है जो इसे भुगत रही कोई औरत ही समझ सकती है!अगर संभव है तो मेरी इस रचना के पढ़ने वालो से मेरी कलम अनुरोध करती है प्लीज कभी किसी भी औरत से बेजा तलाक न ले,शुक्रिया।

(काबुली वाला)

( काबुलीवाला)

मैं रोज देखती हूं------
 खुली खिड़की से
 घंटों सड़क की तरफ, ए 'रंग '
 इस उम्मीद में कि शायद, 
 कभी दिख जाए, 
 वे मेरी बचपन का----
"काबुलीवाला "

@@रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जौनपुर, उत्तर-प्रदेश 
Mo.no.7800824758

Saturday, 12 October 2024

(सजा याफ्ता हूं)

(सजा याफ्ता हूँ)
मै उनकी कैद से
रिहाई कहां मांगता हूँ।
ऐ रंग,-
क्या खुब है,मेरी किस्मत
कि मै उनकी जुल्फो का-
सजा याफ्ता हूँ।

(शहनाई कलाकार)

(शहनाई कलाकार)
खुशी मे-
वे हँसा देता था,कई बार।
गम मे-
वे रूला देता था,कई बार।
उसकी मौत-
शहनाई की मौत थी,
ऐ रंग,-
वैसा फिर ना हुआ,कोई शहर मे-
शहनाई कलाकार।

(मैं भी कुम्हार हूं)

(मै भी कुम्हार हूँ)
हा मै भी----------------
अपने गीतो की चाकी पे,
शब्दो की मिट्टी रख,
कुछ गीत------------
उसके दिवाली के दीये की तरह बनाता हूँ।
वे भी कुम्हार है मिट्टी के दियले का,
और मै भी कुम्हार हूँ-------
अपने गीतो का।
वे उपले की आँच में,
पकाता है दियलो को और मै--------
अपने हृदय के उपलो की आँच में,
गीतो के शब्द पकाता हूँ।

Friday, 11 October 2024

(एक जिंदा दिया हूं)

(एक जिंदा दिया हूँ)
ताउम्र अपनी मै जल-जल के जिया हूं,
मै आदमी नही-----------
एक जिंदा दिया हूँ।
तमाम खराशे है,है तमाम सिलवटे
उधड़ा रहा मै----------
किसी मुफ़लिस के बिछौने सा,
हर जख्म जिंदगी का-------
मै खुद से सिया हूं।
मै आदमी नही--------
एक जिंदा दिया हूँ।
हु मै एक एैसा सजायाफ्ता,
जो रो नही सकता!
खौलते है आँसू मेरे दिल के अंदर,
मै कभी बहार में नही-------
खिजा़ में जिया हूं।
मै आदमी नही------
एक जिंदा दिया हूँ।

Thursday, 10 October 2024

(राम एक कलाकार में खंडित हो गए)

(राम एक कलाकार में खंडित हो गये)
इंतज़ार कर रही है करके मेकप,
किसी ग्राहक का!
पत्थर की नहीं------------
अपने भूखे पापी पेट की अहिल्या।
आज गुलज़ार भी तो है,
कोठे वाली गली!
क्योंकि आज------------
दशहरे के राम और रावण की झांकी निकलनी है,
उसे याद है,
कि अगले बीते वर्ष भी वे इसी तरह,
मेकप किये अपने कोठे के छज्जे पे खड़ी थी,
तो राम बने कलाकार ने किस तरह काम उन्मुक्त नजरो से,
उसके उन स्तनो को तका था!
पहली बार दशहरे की---------------
उसकी वे पिड़ा असह्य थी!
क्योंकि इस कोठे वाली अहिल्या ने,
जिस राम को अब तलक सुना था,
वे राम जैसे-------------
इस कलाकार में खुद खंडित खड़े थे।

(लहरों में फना होना है)

(लहरो मे फ़ना होना है)
मै तो फ़कत एक नदी हूँ-------
ऐ वालिदे दरिया,,,,,,,,,,
जिसे एक दिन---------
तेरी लहरो मे फ़ना होना है।

(मैं औरत नही मरुस्थली रेत हूं)

(मै औरत नही मरुस्थली रेत हूँ)
मै औरत नही-----------
मरुस्थली रेत हूं!
बस यूँही अक्सर उकेरती हूं,
ताकी मेरी पिड़ा--------
इन रेतिली कड़ो से ताजी रहे।
मैने तो खुद चुना है----------
अपने जीवन का ये रुदालीपन!
अगर रो दुंगी तो क्या बचेगा?
आँख से बह जायेगी वे पिड़ा भी!
मर जाऊँगी बिना तड़पे,
पाप का पश्चाताप मै जिना चाहती हूं!
अपने चारो तरफ रेत और यही रेत,
मै मुट्ठी-दर-मुट्ठी खाली होऊँ,
चुभे मेरे अंतरतक ये नागफनी,
मैने यही तो किया है---------
झुठे प्यार की खातिर!
तड़पता छोड़ आई थी माँ-बाप,
अगर औरत होती-----------
तो ससुराल होता,मायका होता
आज मै कुछ नही,
बस बिना किसी संवेदना की-----
बहुत दुर तलक फैली,
मरुस्थली रेत हूं।
मै औरत नही------
मरुस्थली रेत हूं।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

Tuesday, 8 October 2024

(चिट्ठी)

मैं भला
कैसे भूल सकती हू
जब हर रोज दरवाजे पर
मैं घंटो खड़ी रहती थी
डाकिए 
को सारे गांव की चिट्ठियों का गट्ठर
अपनी साइकिल पर टांगे
बाटने के लिए
आते हुए देखने के लिए इस उम्मीद से
की शायद
वह अपनी साइकिल खड़ी कर
अपने चिट्ठियों के गट्ठर से
तुम्हारे प्यार की चिट्ठी निकाल
मुझे थमा
जैसे ही जाने को होता
तो इच्छा होती की उससे कह दू
कि जरा उनकी लिखी चिट्ठियां
थोड़ी और जल्दी दे जाया करो
फिर खुद को तुम्हारे चिट्ठियों के
प्रेम की बावली
समझ, खुद को धत कहती
और उस चिट्ठी को लेकर
बिस्तर के तकिए को सीने से लगाकर
कुछ देर
तुम्हारी चिट्ठियों को देखती 

जब तुम्हारे प्रेम की चिट्ठियां डाक से आती थी,
सच उस चिट्ठी को खोलने से पहले मेरी नज़र
उस चिट्ठी से चिपके

(अपनी उर्वशी पे)

(अपनी उर्वशी पे)
वे अपना सबकुछ वार देती है,
मेरी एक खुशी पे।
इसलिए,ऐ रंग,-मै
रोज कुछ न कुछ लिखता हूँ,
अपनी उर्वशी पे।

(प्यार का चांद)

करवा चौथ की सभी व्रती महिलाओ के प्यार की एक खूबसूरत कविता----
                             (प्यार का चाँद)
हमने पाया है तुममे अपने प्यार का चाँद,
बेशक कल तुम तकोगी छत पे मुझे,
मेरे हाथो से पियोगी व्रत का पानी,
लेकिन मै नही तकुंगा तेरे सिवा मेरी सजनी,
क्योंकि दुनिया तकेगी उसे,
मै तो तकुंगा तुम्हें क्योंकि तुम्हि हो-----------
हमारी धड़कन और हमारे प्यार का चाँद।
मेंहदी,महावर,चुड़ियाँ,सिन्दूर,बिंदिया,
वही पहले करवे सी शर्म,
तुम बहुत अच्छि हो मेरी सजनी,
क्या करुंगा तक के मै,
बहुत फिका है तेरे आगे आज-----
इस पुरे संसार का चाँद।
मै तुम्हें पाऊ हर जनम,
कभी न छिने मेरी आँखो से मेरी सजनी,
क्योंकि पल-छिन नही है तुमसे मेरी सजनी,
तुम्हारे साजन के प्यार का चाँद------
हमने पाया है तुममे अपने प्यार का चाँद।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर (उत्तर--प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

(जोक)

😀😀व्यंग्य लिखने वाले एक डॉक्टर ने बताया कि फेसबुक पर जब महिलाए अपनी सुंदर फोटो लगाती है तो इससे "पुरुषो की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है" 🤓🤓🤓

Monday, 7 October 2024

जोक

😁😁😁दीपावली में योग्य उल्लू ना मिलने पर आप आपात स्थिति में अपने पति की पूजा कर सकती हैं,,😃😃ग्रह नक्षत्र वाले पंडित जी

Sunday, 6 October 2024

(बांसुरी रोई)

(बाँसुरी रोयी)
फूल रोया,
फूल की पाँखुरी रोयी।
इतना दर्द था,उसके जाने का,
ऐ रंग,-
कि अधर पे रखा-
तो बाँसुरी रोयी।

जोक

पत्नी के सामने खिलखिला के हंसना,,हंसने की श्रेणी में नही आता,,,बल्कि यह खीस निपोरने की श्रेणी में आता है

Friday, 4 October 2024

(वक्त बूढ़ा हो गया)

(वक्त बुढ़ा हो गया)
ऐ बेवफ़ा---------
तेरी लौटने का इंतजार करते-करते,,,,,
मेरी जिंदगी का------
वक्त बुढ़ा हो गया।

Thursday, 3 October 2024

(आवरा छोड़ दिया)

(आवारा छोड़ दिया)
उसके शहर को--------
नजदीक से देखने की खातिर,,,,,,,,
ऐ,रंग----हमने-------
खुद को आवारा छोड़ दिया।

(किसानों के अच्छे दिन आ गए)

(किसानो के अच्छे दिन आ गये)
लात-घूँसा और पुलिस के बर्बरता की,
लाठी तलक खा गये----------
किसानों के अच्छे दिन आ गये।
डीजल--पेट्रोल महगा होता गया,
बड़ी मुश्किल से इस मर्तबा खेत जोता गया,
इनके बिकास का सारा पैसा--------
नीरव मोदी और माल्या खा गये,
किसानों के अच्छे दिन आ गये।
पिछली सरकार दस साल रही,
क्या किया उसने ?
हा इतना जरुर किया की हमारे जख्मों पे---
हमसे भी ज्यादा रोने आ गये,
किसानों के अच्छे दिन आ गये।
हर सरकार इन किसानों पे सांडर्स की तरह,
जलियांवाला बाग सा दर्द देती है,
ये ऐसे ही कभी मौसम,
तो कभी हुकूमत से लड़ते--लड़ते हार गये,
ये तब बागी हुये जब सह न सके,
तभी तो ऐ दिल्ली तेरी दहलीज पे आके,
तेरे अच्छे दिन को नकार गये-----
किसानों के अच्छे दिन आ गये।
लेकिन राजनीति अब भी कह रही,
कि विपक्ष को ईधन चाहिये था चुनाव का,
और अब भी पक्ष का वही दावा,
कि किसानों का पहले से कही ज्यादा-----
हमारी सरकार मे अच्छे दिन आ गये।

(पत्रकारिता के नाम पर रेप)

(ब्रेकिंग न्यूज--रेप)

उफ!
थम नहीं रहा, 
हमारे देश में
राजनीतिक रेप, 

किसी मजलूम लड़की
के घाव के निशान 
को ये 
कई-कई बार देखते है 
क्योंकि इन्हे, 
लड़की के घावों से 
विधानसभा के जीत की कुर्सी
अपनी जीभ 
लप लपाती हुई दिखती है 
हर नेता--
शायद इसीलिए चाहता है कि 
होता रहे, 
मासूम और मजलूम, 
लड़कियो का रेप 

यही, 
कमोबेश मीडिया भी 
अपनी लोकप्रियता के, 
टी आर पी का कैमरा लिए, 
बार-बार ब्रेकिंग न्यूज़,  
का ढ़िढोरा पीट, 
उस लड़की का मसालेदार बयान, 
उसके फटे कपड़े, 
ब्रा और टेप, 
को धुंधला दिखाकर 
कर रहा
अपनी पत्रकारिता के नाम पर 
"रेप."

यह रचना मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है. 

रचनाकार----रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर (U P )

Wednesday, 2 October 2024

(धरती के भगवान)

धरती के भगवान कहे जाने वाले डॉक्टर बीस रुपए का विगो 195 रुपए में बेच रहे हैं,,,और हमारी चुनी हुई सरकारे नपुंसक और मौन है😥😥

Tuesday, 1 October 2024

(हे! राम)

(हे! राम)
आज भी-
अहिंसा के सिने पे
चला रहा है,गोली,
नाथूराम।
कब थमेगी ये हिंसा-
बन्दुको की ऐ रंग,
आखिर कब निकलेगा,
कातिल के होंठो से-
हे!राम।
गांधी जयन्ति पर।

(आईने तोड़ रही है)

(आईने तोड़ रही है)
जब से आईने ने--------
उसकी ढ़लती उम्र की हक़िकत कह दी,,,,
ऐ,रंग----तब से वे गुस्से मे-----
आईने तोड़ रही है।

(लिंग काट लेती है)

(लिंग काट लेती है)
आज घर मे अकेला पा--------------
उसका पिता ही उससे जबरदस्ती कर,
उसकी अस्मत लुट,
बीना किसी पछतावे के करवट ले-----
यूँही नंगा लेटा रहता है,
बिटिया मौन ओढ़े उठती है,
और उठाती है यहाँ-वहाँ पिता के हाथो फटे,
बिखरे अपने अधोवस्त्र और लिबास,
फिर जाने क्यू ?
उन वस्त्रो को फेक देती है घिन से,
क्या करती? आखिर क्यू पहनती?
और क्यू ढकती?
उस पिता से अपने अंग,
जिसने पुरे शरीर को अपने नाखूनो से खरोंचा,
और दाँतो से बेरहमी से काटा,
उन स्तनो को------------
जो नारी की सर्वोच्च सुंदरता और,
उसके वात्सल्य की प्रतिमूर्ति है।
वे पुन: अपने कामांध पिता को तक,
एक गहरी साँस लेती है,
और यूँही नंगी बढ़ चलती है किचन की तरफ,
वहाँ से चाकू उठा,
आँख मुदे अपने आनंदातिरेक में नंगे सोये पिता का,
सुसुप्तावस्था मे एक तरफ ढ़लके----------
लिंग को काट लेती है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

मेरी एकाध रचना आपको बिचलित कर सकती है लेकिन इस तरह कि रचना मे एक आंशिक सत्यता भी आप अपने ही सभ्य समाज के किसी न किसी कोने मे पा जायेंगे------ये इसी तरह की एक सत्य घटना का प्रारुप भर है।

(लघुकथा की परिभाषा)

"मेरे खयाल से लघुकथा इतनी भी लघु नहीं होनी चाहिए, जिसमें लघुता तो बनी रहे पर कथा गायब हो जाए"

(जोक)

प्रेमिका डेंगू है और साली चिकनगुनिया,,,इसलिए अपना प्लेटलेट मेंटेन रखने के लिए आप बीच–बीच में अपनी पत्नी को दिखाते रहे. 😀😀

Monday, 30 September 2024

(राम एक कलाकार में खंडित हो गए)

(राम एक कलाकार में खंडित हो गये)
इंतज़ार कर रही है करके मेकप,
किसी ग्राहक का!
पत्थर की नहीं------------
अपने भूखे पापी पेट की अहिल्या।
आज गुलज़ार भी तो है,
कोठे वाली गली!
क्योंकि आज------------
दशहरे के राम और रावण की झांकी निकलनी है,
उसे याद है,
कि अगले बीते वर्ष भी वे इसी तरह,
मेकप किये अपने कोठे के छज्जे पे खड़ी थी,
तो राम बने कलाकार ने किस तरह काम उन्मुक्त नजरो से,
उसके उन स्तनो को तका था!
पहली बार दशहरे की---------------
उसकी वे पिड़ा असह्य थी!
क्योंकि इस कोठे वाली अहिल्या ने,
जिस राम को अब तलक सुना था,
वे राम जैसे-------------
इस कलाकार में खुद खंडित खड़े थे।

Sunday, 29 September 2024

(चंदन का धुंआ थी)

(चन्दन का धुआँ थी)
जो लड़की अभी यहाँ थी,
वे पीरो-फकीरो की दुआ थी।
उफ!अभी तलक है-
सांसो मे उसकी खुशबू,
ऐ रंग,-वे लड़की-
चन्दन का धुआँ थी।

(एक नई मासूम निर्भया)

हाथरस की घटना ने एक बार फिर हमे उस निर्भया की याद दिला दी, आप मेरे इस विचार या रचना से आहत हो सकते है, इसलिए इस रचना को पढ़े सहमत होना या ना होना आपके स्वविवेक पर है😢😢😢😢

(एक नई मासूम निर्भया )

निर्भया--------
जो चीखी,तड़पी,छटपटाई
उफ !------
तेरी विकृत कुंठा के 
डाले गये वे सरिये,
कितने घृणित थे!

काश तुम्हारी माँ ने कहा होता,
या तुमने-----------
अपनी सगी बहन के 
वे गुप्तांग याद किये होते,
तो तुम्हारा ज़मीर तुम्हें रोकता कचोटता,
कि ये पाप है,अन्याय है
और तुम कांप जाते!

हां ये जरूर हुआ कि 
तुम्हारी पशुता व अमानवियता से,
निर्भया-----
कुछ ही दिनो मे मर गई,
लेकिन तुम नही मरें, 

क्योंकि अगर तुम मरे होते, 
तो कतई नही, 
चीखती और तड़पती 
हाथरस में,
एक नई मासूम निर्भया. 

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

यह रचना मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है।

(जुलाहा हूं)

(जुलाहा हूँ)
मै पंडित नही------------
तेरी मस्जिद का अजा़न,
और तेरी बस्ती का जुलाहा हूँ।
देख लेता हूँ सारे कौमो का खुदा मै,
फिर बुनता हूं एक धागे से मुहब्बत की चादर,
मै कबीर सा हिन्दू ----------------
और उसकी मस्ती सा जुलाहा हूँ।
मुझे नापसंद है धुआँ अलग-अलग,
मुझे नापसंद है कुआँ अलग-अलग,
मुफ़लिस और रईस सब छके पानी,
आचमन और वज़ू सब एक से ही है,
ये सर जहां झुके---------
मै उस मिट्टी का जुलाहा हूँ।
हर मासूम हँसे खेले एक हो आँगन,
ना समझ सके वे राम और जुम्मन,
जिस गोद खुश हो जाये वे मासूम सी बच्ची,
एै "रंग" मै----------
एैसी हर उस बच्ची का जुलाहा हूँ।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Saturday, 28 September 2024

(फर्क है)

(फर्क है)
ना मुशायरा,ना कव्वाली,ना उर्स है,
चादर की बात कौन करे।
कभी इस जगह-
चराग भी जले क्या?
ऐ रंग-
यही एक मुफलिस दिवाने
और शहंशाह मे फर्क है।
[मुफलिस-गरीब]
रंगनाथ दुबे

(मेरी हीर लिए चल)

(मेरी हीर लिये चल)
मेरा दर्द,मेरी पीर लिये चल-----
ऐ भीड़---उस बेवफ़ा की,,,,,,,,,,
एक तस्ब़ीर लिये चल।
रुह़ानी गुफ्त़गु की खातिर ऐ,रंग-----
उसके घर की मिट्टी को-----
समझ मेरी हीर लिये चल।

(हाजी पीर)

(1965 की जंग और हाजी पीर)
आज भी उभर आती है बनके ताजी पीर,
हम कैसे भुले वे जंगे लम्हा,
जब एक-एक कर मर रहे थे------
हमारी बटालियन के बीर।
कैसे भुले हम उस अब्दुल को जो------
लहू से तरबतर कह रहा था,
अल फतह एै मादरे वतन------
तेरे लिये हाजी पीर।
वे जंग 65 की हम जीत तो गये,
पर हमारे घर के चंद सियासी गद्दारो ने,
गवा दिया अपने सुख के लिये मेज पे,
हम शहीदो के लहू से----------
जीता हुआ हाजी पीर।
वे घुसपैठिये या दहसतगर्द नही,
वे आर्मी थी दुश्मने पाक की-----
मेरे मूल्क ने मुआफ कर उन्हें,
झुका दिया सर हमारे हर बीर की।
आज भी चुभता है---------
मुझ रिटायर फौजी के सीने में,
जहां गोली लगी थी!
अब भी आवाज आती है मेरे कानो में एै,रंग---------
मेरे बटालियन के उस अमर शहीद अब्दुल की---------
जैसे कह रहा हो कि हम हार गये भाई,
अपने ही सरहद वालो से जो जीता था---
हमने इतनी शहादत से हाजी पीर।

@@@@1965 के पाकिस्तानी जंग में शहीद हुये तमाम शहीदो को मेरा सलाम।

Thursday, 26 September 2024

(दूरदर्शन)

दूरदर्शन अब काफी दूर हो चुका है क्योंकि वह उतना नायक और नायिका का दैहिक दर्शन नहीं दिखा पाता जितना की और चैनल आजकल दिखा रहे हैं✍️✍️

(यात्रीगण कृपया ध्यान दे)

आज, रश्मि प्रकाशन लखनऊ से प्रकाशित वरिष्ठ कहानीकार राम नगीना मौर्य का साहित्यिक अनाउंसमेंट मुझे जैसे जनपद जौनपुर के साहित्यकार के कान से होते हुए दिल तक पहुंची. 

आइए हम आप आज की जिंदगी और उसकी कहानियों के "चारबाग स्टेशन" से उस साहित्यिक अनाउंसमेंट को सुने जहां से ये कहानियां कह रही है------

"यात्रीगण कृपया ध्यान दे ".

धन्यवाद, बड़े भैया आज आपका ये बेशक़ीमती कहानियों का शाहकार प्राप्त हुआ.

Tuesday, 24 September 2024

(पहले गान लिखूं)

(पहले गान लिखूँ)
कब तक जादू ,टोने का मै
अन्धा ज्ञान लिखूँ।
आज तो वे दिन आया है
कि,मै विज्ञान लिखूँ।
चाँद-सितारे,रूप-जवानी बाद की चीजे है,
धन्य! हुये माँ के बेटो का,
पहले गान लिखूँ।

विश्व शिखर होने पर(मंगलयान)-
                             रंगनाथ दुबे

(बरसात रहेगी)

(बरसात रहेगी)
ना पुछ किसके घर,किसके साथ रहेगी
मईया!तो हर घर मे,नवरात रहेगी।
बढेगी यश,कीर्ति और सम्पदा
ऐ रंग,-नवो दिन -
ये बरसात रहेगी।
   जय माता दी।-रंगनाथ दुबे

(जिबह खाने)

(ज़िबह खाने)
मै नही जानता स्वर्ग और जन्नत माने---
बस ये जानता हूँ ऐ,रंग-------
कल बे-ज़ूबानो के खूं से----------
तर हो जायेगे ज़िबह खाने।

(मेरे यार की बस्ती)

(मेरे यार की बस्ती)

कभी पतझड़ , कभी बहार की बस्ती
है शहर से दूर - 
मेरे गुनहगार की बस्ती ।
ऐ रंग ,- रूहे चैन की खातिर
ले चल मेरा जनाजा - 
मेरे यार की बस्ती ।

(पायल कर दे)

(छम से पायल कर दे )

भूख तब है, भूख 
जब रोटी की गंध पागल कर दे
प्यार तब है, प्यार 
जब कहीं से थके आओ, 
और बीवी सामने आंचल कर दे. 

गीत तब है 'रंग: गीत
जब उसकी खन से चूड़ी, 
और छम से पायल कर दें. 

@@@रंगनाथ द्विवेदी. 
जौनपुर (U P )
Mo.no. 7800824758

(मेहर का दुपट्टा)

उससे
मेरा तलाक तो हो गया लेकिन
ऐ "रंग",
मैं उसकी मोहब्बत की मेहर के
पहले दुप्पटे को,लौटा नही पाई .

(किडनी बेच दू)

(किडनी बेच दू)

मैं कहां कमा सका
दो वक्त की रोटी.
उस पर बिटिया सयानी हो गई 
सोचता हूं,कि 
मैं उसकी ब्याह की खातिर 
ऐ "रंग"––
शहर के किसी डॉक्टर को 
अपनी किडनी बेच दूं.😢😢

Monday, 23 September 2024

(एक गोल सी रोटी)

(चाँद )
अच्छा है चाँद------------
कि तु अभी तलक किसी के कब्ज़े मे नही,
वरना तेरा भी किसी रईस से---------
ये शाम तलक सौदा कर देते,
तु भी तड़पता किसी कमरे से सारी रात,
तुझे पिंजरे में कैद--------------
ये परिंदा कर देते।
फिर गरीब और मज़लूम-----------
कैसे तकता तुम्हे अपने खाली पेट,
कैसे कोई माँ सुलाती----------
अपने भूखे बच्चे को ये धोखा दे,
कि बेटा वे देखो---------
तवे पे भगवान पका रहे है,
तुम्हारे लिये एक गोल सी रोटी,
सो जाओ!
चाँद तुम एक उम्मीद हो गर इनके हाथ
लग जाते---------
तो ये तुम्हे किसी रईस के आँगन तक का
एक ब्याज़ के कर्ज़ से बिंधा--------
न भर पाने वाला कारिंदा कर देते।

Sunday, 22 September 2024

(रेगमाल सी जिंदगी)

(रेगमाल सी जिंदगी)
कौन नही बुनता-----------
जुलाहे के कालीन सी जिंदगी!
तरह-तरह के धागे में पिरो,
कौन नही देखना चाहता मुकम्मल अपना शाहकार,
पर हो नही पाता ज्यो का त्यो चाहा,
फंस के खत्म हो जाती है मछली सी----
किसी मछेरे के जाल सी जिंदगी।
सारी ख्व़ाहिशे धरी रह जाती है,
एक-एक कर खत्म होती जाती है,
एै रंग------------------
यहां पे सबकी है रेगमाल सी जिंदगी।

(जवा कातिल फरेब है)

(जवां कातिल फरेब है)
वे इतनी खूबसुरत है कि--------
हर एक दिले कत्ल पे मूस्कुराती है।
ऐ,रंग----वे औरत नही-------
एक जवां कातिल फरेब़ है।

(खजुराहो का पत्थर)

(khajuraho ke patthar)
bnaya hai ek klakar ne tap kar ,
kamuk nhi uski murtiya kewl ,
ek jaadu hai "rang" 
wrna hme apni trf bulaate hai,
khajuraho ke patthar.

(प्यासा के गुरुदत्त सा)

(pyaasa ke guru dtt sa)
mai pdh ke bahut jaar-jaar roya,
ve uska aakhiri khat tha,
ae"rang" isk me ; mai bhi mra,
"pyaasa" ke guru dtt sa.

(दीपिका दिलरुबा सिगरेट है)

( दीपिका दिलरुबा सिगरेट है)

दीपिका------
तेरे आवारा होंठ की 
ये जुंबिश
ये कश, ये धुँआ, ये नशा 
और उसकी कशिश 
तेरी आँखों में उत्तर आना, 

उफ ! वाकई----
तु एक लाजवाब हीरोइन है, 
तुम्हें पाने और देखने की ये बेचैनी, 
ये चाहत, 
किसी ड्रग्स से कम नही, 

तु इतने इल्जामों के बाद भी, 
एक-----
दिलरुबा सिगरेट है. 

@@@रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जौनपुर mo.no.7800824758

Saturday, 21 September 2024

(बेवा की जमीन)

(Bewa ki jmin)
hai bda muskil siyast pe ykin,
ye aise sanp hai , jin pe kar aamd,
nhi koi bin ,
ae "Rang" ye din me kat,te hai chek ,
aur raato ko hdpte hai ,
bewa ki jmin.

(टूटी हुई गुड़िया)

(टुटी हुई गुड़िया)
गौर से देखती है,वे अक्सर बंद कमरे मे--
ऐ,रंग-------
वे टुटा हुआ गुड्डा और टुटी हुई गुड़िया।

(दो घाव हो गए)

( दो घाव हो गए)

जीन उरोजों को ढ़क, 
वे मासूम देखती थी, 
कभी वात्सल्य का सपना, 
 ए "रंग"-------

उसके वही दोनों उरोज, 
गरीबी के चलते, 
दो घाव हो गए. 

@@@ रंगनाथ द्विवेदी, 
जट कॉलोनी, मियापुर
जौनपुर उत्तर प्रदेश
मोबाइल नंबर--7800824758

Friday, 20 September 2024

(मोबाइल के नेटवर्क में है)

(मोबाइल के नेटवर्क में)

ऑन लाइन कपड़े उतारने वाली पीढ़ी 
इश्क क्या जाने?
कि किस तरह एक लड़की 
घंटो अकेले में 
अपने महबूब से मिलकर 
वह बिल्कुल महफूज़ 
अपने लौट आती थी .
आज तो सीने का दुपट्टा भी 
उतार देती है 
एक पूरी बेहयाई 
मोबाइल के नेटवर्क में है.

इस रचना का आसय किसी को ठेस पहुंचाना नहीं है.

रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी,मियाँपुर 
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
rangnathdubey90@gmail.com

(पिता बो नही पाए)

(पिता बो नही पाए)

मैं तेरे वंश को चलाने के लिए
एक बार फिर 
अपनी कोख में कुछ बो नही सकती.

दो बार बोया तो बेटियां हुई 
मासूम,चंचल,कोमल 
इन्हें प्यार दो 
ये भी वंश है 
हा अगर तुम नही माने 
और तुम्हारी मां जिद पर अड़ी रही 
तो अब तुम भी 
मेरे स्त्रीत्व को बरगलाकर 
मेरी कोख में 
कुछ नया बो नही सकते.

सब कमी दोष मुझी में था 
तुम पुरूष हो 
तुम्हें दंभ हैं 
अपने पुरूष होने के शुक्राणुओं पर 
सच तो यह है 
कि सारी कमी तुममे है 
क्योंकि तुम 
अभी तक अपने मन में 
एक पिता बो नही पाए.

✍️✍️यह स्वरचित और अप्रकाशित है.

रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी,मियाँपुर 
जिला--222002 (U P)
rangnathdubey90@gmail.com

(बूढ़े पिता का कंपकपाता हाथ)

(बुढ़े पिता का कंपकपाता हाथ)
कल शहीद की चीता जला रहा बाप---
रो रहा था!
तभी किसी ने कंधे पे रंखा हाथ,
तो वे चीख पड़ा-----------
कि रहने दो कंधे पे मत रंखो,
इस देश के ये नपुंसक हाथ!
जरुरत नही,
इतनी ही सहानुभूति है मेरे शहीद बेटे से,
तो कहो देश की सियासत से,
कि ला दे-------------
उस हाफिज़ सईद का कटा हाथ,
नही ला सकता ना जानता हूं,
इसी जगह फिर सजेगी,
कुछ फौजी बजायेंगे मातमी धुन,
और अपने शहीद बेटे की चीता को,
आग देगा--------------
किसी बुढ़े पिता का कंपकपाता हाथ।

@@@उरी के तमाम शहीदो को मेरा सलाम।

Tuesday, 17 September 2024

(ताज का पत्थर)

(taj ka patthar)
gaur se dekho siskta hai,
             taj ka patthar.
dard ki had hoti hai, chitkta hai,
             taj ka patthar.
shahanshahe hind pe, ek katl hai aayd,
               tbhi to kbra pe bnke aanshu ,
       ae "rang" tpkta hai ,
        taj ka patthar.

(घुंघरू बांधती थी)

(घूँघरु बांधती थी)
रईसो के दरमियाँ वे सलिके से आती थी,
कभी ठुमरी,कभी दादरा गाती थी।
ऐ,रंग-----------
वे पाक थी कोठे पे सुना है,
कि वे केवल पाँव मे घूँघरु बांधती थी।

(तवायफ की कब्र है)

(तवायफ़ की कब्र है)

यहाँ चराग नही जलते,
कोई चादर नही चढ़ती!
ये शहर की मशह़ूर तवायफ़ की कब्र है.

आज भी करती है,ये रुहें मूज़रा,
फिर फूट के रोती है.

ऐ,रंग---
बस आ जाते है खिज़ा में,
दरख्त़ो के चंद पत्ते------
आवारगी करने।
ये शहर की मशह़ूर तवायफ़ की कब्र है. 

@@@ रंगनाथ द्विवेदी 
जज कालोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर (U P)
Mo. no. 7800824758

Monday, 16 September 2024

(तीज हूं मैं)

(तीज हूँ मै)
तेरी खुशियो के लिये-------
कभी बांदी,तो कभी कनीज़ हूँ मै।
खड़ी हूँ तेरे घर लौट आने तलक-----
तेरी चौखट,तो कभी दहलीज़ हूँ मै।
मालिक भी हूँ,तेरे दिल की ऐ पी मेरे,,,,,,,,,
तेरी खातिर--------
कभी करवा चौथ,तो कभी तीज हूँ मै।

Sunday, 15 September 2024

(चुपके से बचपना)

(chupke se bchpna)
tera alhadpan,chidiyo sa fudakna,
ye kya?
jhuki nazar , angudhe se mitti kurchna
ae "rang" nikl gya kitne chupke se bchpna.

(बुद्ध की जमीन)

(buddh ki jmin)
chhal, fareb, dhokha teri rgo me hai,
tu dhundhta hai ab bhi yuddh ki jmin.
mehman nwaji ham aaj bhi krte hai,
rasiya ho ya chin,
aana to mohbbat se chumna ae "rang" 
hai pak utni ab bhi , buddh ki jmin.

chini rastrapti ke aagmn par.

(नीलकमल)

(नील-कमल)
तड़पता है,सिसकता है,बुलाता है कोई नील-कमल-----
सदियो चुनी दिवाल से,गाता है कोई नील-कमल।
एै "रंग" किसी यूग में------------
कोई पाता है कहाँ नील-कमल।

(पत्थरों का घर)

(parindo ka ghar)
masini ho gya shahari basindo ka ghar,
nikl aata hu , kafi dur mai tnha ,
aur dekhta hu "rang" bnte parindo ka ghar.

Saturday, 14 September 2024

(हिंदी में लोरी थी)

(हिन्दी मे लोरी थी)
कभी श्याम थी,कभी गोरी थी,,,,,,,,,,,
हिन्दी ब्रज की छोरी थी।
माँ लल्ला को अपने-------
जो कभी थपकी दे गाती थी,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----वे हिन्दी मे लोरी थी।

Friday, 13 September 2024

(इतिहास चुप है)

(itihas chup hai)
sonaganchhi ki tawayaf pe,
itihas chup hai.
we galij thi, ujale ki,
shahar bha me,
wrna usne khanjar se ,
firngi ko cheer dala.
kya kare aakhir pani ka kunwa,
"rang" rahiso ke ghar ka gilas chup hai.

(नेपाल की लड़की)

(nepal ki ladki)
surmai aankho , aur khule baal ki ladki,
sayar hu pasand hai, mujhko,
sham pahado ki,
aur baaho me nepal ki ladki.

Thursday, 12 September 2024

(तेरी लोरिया होती)

(loriyan hoti)
bachpan hota ,bachpan ki choriyan hoti,
maa mai sukun se sota -
is patthar ke sahar me , agar tu hoti
aur teri loriyan hoti.

(तलाक ना दो)

( talak n do)
rkh lo tum mehr pr sak n do,
khushi n de sk to khak n do.
main g longi ta umr tnha,
meri pakija mohbbat ko , 
u talak n do.

Tuesday, 10 September 2024

(उमराव जान)

(umrao jaan)
wahi chhat , wahi chhajje, wahi daalan
lacknow mai ab gar nhi to kewl-
ruswa ki umrao jaan.

(शमा गाएगी)

(शमा गायेगी)
तेरे निकाह की रात में--------
शमा गायेगी।
आँखे रोयेंगी मेरी,बीना आँसू 
अंदर एक ताजमहल टुटेगा-----
और शमा गायेगी।
तु अगर सोयेगा भी--------
अपनी सेजे मोहब्बत!
तो तेरी शरिके हयात की हर चुड़ी से---
शमा गायेगी।
तु तड़पेगा मेरी सदा से भागने वाले,
कभी बच न सकेगा!
क्योंकि इस कायनात के हर जर्रे से----
शमा गायेगी।

अनुभूति गुप्ता

मेरी साहित्यिक मित्र डॉक्टर अनुभूति गुप्ता जो कि,आज किसी परिचय की मोहताज नही,उनके खुद का अपना "उदीप्त प्रकाशन" नाम से एक प्रकाशन संस्था है.उन्होने कुछ बेहतरीन साहित्यिक पत्रिकाओं का संपादन भी किया है, इसके साथ ही वह देश की बहुचर्चित चित्रकार, साहित्यकार,जिनके बनाए चित्र हंस से लेकर वागर्थ,आजकल, साहित्य अमृत, पाखी आदि पत्रिकाओं की कहानियों, कविताओं और लेखो में जान डालते रहे है और इतना ही नही उनके बनाएं हुए विभिन्न चित्रों के लिए देश की प्रमुख संस्थाओं ने सम्मानित व पुरस्कृत भी किया है.ऐसे में मेरी इस रचना के रेखांकन के लिए मैं अपने इस ऑल इन वन मित्र को अपना बहुत-बहुत धन्यवाद प्रेषित करता हूं ✍️✍️🙏🙏

Sunday, 8 September 2024

(मेरी रूह कैद है)

(मेरी रुह कैद है)
ऐ बेवफ़ा मुझे आजाद कर दे,,,,,,,,
क्यूकि तेरे शहर मे---------
अब तलक मेरी रुह कैद है।

(तेरे शहर में)

(तेरे शहर में)
तेरे शहर में--------------
हमारे मोहब्बत की एक शाम वसीयत है।
ले लेना तुम हमारी गज़ल का जर्रा-जर्रा,
कोई बंदिश नही----------
यहाँ जाफ़रान की खुशबू है हर शख्स़ की खातिर,
यहाँ न कोई कौम न मज़हब और----------
ना ही सरियत है।
तुम्हारें शहर में--------------
हमारे मोहब्बत की एक शाम वसीयत है।
आहिस्ता-आहिस्ता उतरेगा जे़हन मे तेरे,
इन लफ्ज़ो का गुलाबीपन,
मै याद आऊँगा तुम्हारें शहर को,
यहाँ से जाने के बाद भी,
क्योंकि मोहब्बत ही एै "रंग"--------
इस अदब के दिवान की नियत है।
तुम्हारें शहर में------------
हमारे मोहब्बत की एक शाम वसीयत है।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.------7800824758

Saturday, 7 September 2024

(छत पर परिंदे नही आते)

(छत पे परिंदे नही आते)
हमने अपनी माँ का कहा नही माना,,,
ऐ,रंग----अब इसी से शायद----
हमारे छत पे परिंदे नही आते।

Friday, 6 September 2024

(मंदिर मस्जिद मकान सा लगता है)

(मंदिर और मस्जिद मकान सा लगता है)
हमने देखी है---------
दंगे मे अल्लाह और राम की लाशे,
ऐ,रंग----तब से हमे-----
ये मंदिर और मस्जिद एक मकान सा लगता है।

(मिट्टी से जुदा मत करना)

(मिट्टी से जुदा मत करना)
बेटे मै बुढ़ि हो गई हूँ-------------
मुझे इस उम्र में अपने अब्बु से जुदा मत करना।
ना बेचना किसी को-------------
दरवाज़े पे जो उन्होनें लगाया है दरख्त़,
मै उसी से बतियाती हूँ अक्सर,
मुझे दर्द होगा------------
जब कोई काटेगा टंगारे से तेरी अब्बु की याद को।
बेटा बेशक तु मुझे हज़ ना कराना,
पर लेने देना मुझे आखिरी साँस इस मकान में,
मर जाऊँ तो तेरा हक है इस पर,
पर जीते जी मेरे बेटे,
अपनी इस अम्मी को अपने अब्बु के-----
इस मुकद्दस मिट्टी से जुदा मत करना।

Wednesday, 4 September 2024

(शिक्षक दिवस है)

(शिक्षक दिवश है)
ना पहले सी किर्ति,ना पहले सा यश है---
सरकारी तरिके से शिक्षक विवश है।
स्कूलो मे जिसने कदम भी न रंखा-----
उसी के लिये,रंग---शिक्षक दिवश है।

(चूड़ियां तीज कहती है)

(चुड़ियाँ तीज की)
पहली बार आपने ही तो पहनाई थी,
मेरी कलाई में ये चुड़ियाँ तीज की।
तब से अब तलक मेरी कलाई के साजन,
आपको ही बुलाती है सब के बीच से,
चुपके से----------------
खनक के ये चुड़ियाँ तीज की।
आप भी उठ आते है कर बहाना,
चुपके से पकड़ने हमें किसी तरह,
मै शर्मा जाती हूँ!
तो उस शर्म की घड़ी में,
बोलती है आपसे---------
ये चुड़ियाँ तीज की।
है मेरी इच्छा,है मेरी पूजा 
कि सलामत रहे आप मै सुहागन रहुं,
आप पहनाते रहे इस कलाई मे मेरे,
मै पहनती रहुं आपसे उम्र भर------
ये चुड़ियाँ तीज की।

(तंज)

✍️✍️हिंदी साहित्य को अपने ही देश के  शेक्सपियर ने मार दिया😢😢

Tuesday, 3 September 2024

(चूड़ियों की भाषा)

(चुड़ियो की भाषा)
हाँ मै औरतो के चुड़ियो की भाषा जानता हूँ----------
क्यूकि एक लय है दर्द का,,
और एक लय है खुशी की-------!
लाख छिपाये कोई चुड़ियाँ अपनी,,,
मै फिर भी----------
बीना उसके खनके ही जान जाता हूँ।
हाँ!मै औरतो के चुड़ियो की भाषा जानता हूँ।

(तीन मर्तबा तलाक)

(तीन मर्तबा तिलाक)
एक औरत---------
किसी सरिया के नाम पे
कैसे हो सकती है मजाक।
कैसे-----------
लिख सकता है कोई शौहर,
अपनी अँगुलियो से इतनी दुर रहके,
मोबाइल के वाट्सप पे----------
तीन मर्तबा तिलाक।
नही अब औरत को भी----------
उसके हिस्से की इस्लामिक ताकत बख्श़ो,
उसे भी हक दो!
कि वे ले सके एैसे मर्द से एै,रंग--------
तीन मर्तबा तिलाक।
@@@रचयिता-------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।

(बेवफा माचिस)

( बेवफा माचिस)

जल गया-------
मोहब्बत के धोखे में, 
जब सुशांत ने छुआ, 
ये रीया माचिस. 

अपने रूप और यौवन की, 
तीली से--- 
इसने ऐसा जलाया
कि मोहब्बत के चारों तरफ
दिखने लगा, 
सुशांत को अपनी खुदकुशी का, 
ये दिलफ़रेब---
और धुंआ माचिस. 

आओ बचे, 
कहीं ऐसा ना हो कि 
शहर दर शहर, 
जान लेती फिरे ए "रंग "
ये बेवफा माचिस. 

यह मेरा स्वरचित रचना है. 
@@@ रंगनाथ द्विवेदी
 जज कॉलोनी, मियापुर
 जिला जौनपुर( उत्तर प्रदेश)
 मोबाइल नंबर---7800824758

Monday, 2 September 2024

(मर्सिया लिखना है)

(मरसिया लिखना है)
अभी तो बस यादो के चराग जले है---
ऐ,रंग----अभी तो हमे सारी रात------
उस बेवफा पे मरसिया लिखना है।

(मैं लिखता हूं कोई गीत)

(मै लिखता हूँ कोई गीत)
जब बेचैन कर देता है------------
मेरे अंदर का मरुस्थल मुझको,
तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत।
जब------------
शब्द के होंठ पे चुभती है कोई नागफनी,
तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत।
जब पथ की रेत पे-----------
चलता जाता हूँ दूर पथिक सा
और फूट जाते है पाँव के छाले,
तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत।
जब------------
बहुत सन्नाटा मेरे भीतर का,
उधेड़ता है मुझको---------
तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत।
बोता हूँ रेत पे कुछ शब्द,
पर कटिले वृक्ष के विरवे ही पनपते है,
उन्ही वृक्षो की------------
खरोंच जब आ जाती है बन के पीर,
तब मै लिखता हूँ कोई गीत।