Friday, 29 September 2023

(चंदन का धुंआ थी)

(चन्दन का धुआँ थी)
जो लड़की अभी यहाँ थी,
वे पीरो-फकीरो की दुआ थी।
उफ!अभी तलक है-
सांसो मे उसकी खुशबू,
ऐ रंग,-वे लड़की-
चन्दन का धुआँ थी।

(भूख लिखता हूं)

(भूख लिखता रहा)
तु रोटियाँ फेकती रही,अपनी हवेली से--
ऐ रंग--------
मै बगावत और भूख लिखता रहा।

(फिर एक निर्भया)

आखिर यह रेप कब थमेगा 😢😢😢😢

(नई मासूम निर्भया )

निर्भया--
जो चीखी,तड़पी,छटपटाई
उफ !-----
तेरी विकृत कुंठा के डाले गये वे सरिये,
कितने घृणित थे!

काश तुम्हारी माँ ने कहा होता,
या तुमने----
अपनी सगी बहन के 
वे गुप्तांग याद किये होते,
तो तुम्हारा ज़मीर 
तुम्हें रोकता कचोटता,
कि ये पाप है,अन्याय है
और तुम कांप जाते!

हां ये जरूर हुआ की तुम्हारी 
पशुता व अमानवियता से,
निर्भया-----
कुछ ही दिनो मे मर गई,
लेकिन तुम नही मरें, 

क्योंकि अगर तुम मरे होते, 
तो कतई नही, 
चीखती और तड़पती 
हाथरस में,
एक नई मासूम निर्भया. 

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

यह रचना मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है।

Thursday, 28 September 2023

(फर्क है)

(फर्क है)
ना मुशायरा,ना कव्वाली,ना उर्स है,
चादर की बात कौन करे।
कभी इस जगह-
चराग भी जले क्या?
ऐ रंग-
यही एक मुफलिस दिवाने
और शहंशाह मे फर्क है।
[मुफलिस-गरीब]
रंगनाथ दुबे

(1965 की जंग और हाजी पीर)

(1965 की जंग और हाजी पीर)
आज भी उभर आती है बनके ताजी पीर,
हम कैसे भुले वे जंगे लम्हा,
जब एक-एक कर मर रहे थे------
हमारी बटालियन के बीर।
कैसे भुले हम उस अब्दुल को जो------
लहू से तरबतर कह रहा था,
अल फतह एै मादरे वतन------
तेरे लिये हाजी पीर।
वे जंग 65 की हम जीत तो गये,
पर हमारे घर के चंद सियासी गद्दारो ने,
गवा दिया अपने सुख के लिये मेज पे,
हम शहीदो के लहू से----------
जीता हुआ हाजी पीर।
वे घुसपैठिये या दहसतगर्द नही,
वे आर्मी थी दुश्मने पाक की-----
मेरे मूल्क ने मुआफ कर उन्हें,
झुका दिया सर हमारे हर बीर की।
आज भी चुभता है---------
मुझ रिटायर फौजी के सीने में,
जहां गोली लगी थी!
अब भी आवाज आती है मेरे कानो में एै,रंग---------
मेरे बटालियन के उस अमर शहीद अब्दुल की---------
जैसे कह रहा हो कि हम हार गये भाई,
अपने ही सरहद वालो से जो जीता था---
हमने इतनी शहादत से हाजी पीर।

@@@@1965 के पाकिस्तानी जंग में शहीद हुये तमाम शहीदो को मेरा सलाम।

(बेबी पेगविन है)

(बेबी पेंग्विन हो )

दिशा की नग्न लाश, 
को तेरे------
बेबी पेंग्विन ने कई माले से फेंक दिया, 

ए मुंबई के धृतराष्ट्र, 
ये उस मासूम की खुदकुशी नहीं. 
रेप है. 

थू है-----
वहा की पुलिस तुमपे, 
कि तुम्हें----
उस मासूम में अपनी बिटिया नही दिखी, 

उसकी लाश के, 
साथ एक रेप तुमने भी किया है, 
तुम---
मुंबई की हर ऐसी दिशा के 
बेबी पेंग्विन हो. 

@@@ रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियापुर, जिला--जौनपुर
(उत्तर प्रदेश)
मोबाइल नंबर---7800824758

Wednesday, 27 September 2023

(बेगुनाह रावण जल रहा है)

(बेगुनाह रावण जल रहा है)
अब रावण का चरित्र---------
रामलीला में खल रहा है!
बेचारा------------
एक सीता के नाते प्रतिवर्ष जल रहा है।
एै दिल्ली--------------
जबकि तु लंका से गई बीती है,
क्योंकि रेप और बलात्कार,
तेरी सड़को पे चल रहा है,
और बेवजह---------
दशहरे में रावण जल रहा है।
अब वक्त आ गया है कि,
तेरी सदन में---------
रावण की समिक्षा होनी चाहिये!
क्योंकि अपनी सीता को,
अब रावण से कही ज्यादा,
उसका राम छल रहा है,
और दशहरे में एै,रंग------
बेगुनाह रावण जल रहा है।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.---7800824758
यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।
आप सभी को नौरात्र और दशहरे की ढ़ेर सारी बधाई।

(राम एक कलाकार में खंडित हो गए)

(राम एक कलाकार में खंडित हो गये)
इंतज़ार कर रही है करके मेकप,
किसी ग्राहक का!
पत्थर की नहीं------------
अपने भूखे पापी पेट की अहिल्या।
आज गुलज़ार भी तो है,
कोठे वाली गली!
क्योंकि आज------------
दशहरे के राम और रावण की झांकी निकलनी है,
उसे याद है,
कि अगले बीते वर्ष भी वे इसी तरह,
मेकप किये अपने कोठे के छज्जे पे खड़ी थी,
तो राम बने कलाकार ने किस तरह काम उन्मुक्त नजरो से,
उसके उन स्तनो को तका था!
पहली बार दशहरे की---------------
उसकी वे पिड़ा असह्य थी!
क्योंकि इस कोठे वाली अहिल्या ने,
जिस राम को अब तलक सुना था,
वे राम जैसे-------------
इस कलाकार में खुद खंडित खड़े थे।

(सलमान खान की होंठ का धुंआ है)

(सलमान खान की होंठ का धुँआ है )

जावेद अख्तर पहचानों, 
ये तुम्हारी------
जोया अख्तर के होंठ का धुँआ है. 

जया बच्चन पहचानो, 
ये दीपिका पादुकोण के 
जे. एन. यू में गईं गलीज़ 
और--------
काफिर होंठ का धुँआ है. 

नसीरुद्दीन, आमीर 
तुम्हें डर लगता है तो डरो, 
क्योंकि ये फुटपाथ पर सोये, 
तमाम मुफलिशो के कातिल----
सलमान खान की होंठ का धुँआ है. 

@@@ रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियापुर
जिला जौनपुर, उत्तर प्रदेश, 
मोबाइल नंबर 7800 824 758

Tuesday, 26 September 2023

(अजनबी के साथ हूं)

(अज़नबी के साथ हूँ)
बिस्तर की सिलवटे---------
बिल्कुल खामोश है मेरी तरह।
वे जानती है कि मै-------
बस कहने को खाबिंद के साथ हूँ,,,,,,,,,
वरना ऐ,रंग----ये स्याह सच है---
कि मै एक बंद कमरे मे------
अज़नबी के साथ हूँ।

खाबिंद----पती।

(जुलाहा हूं)

(जुलाहा हूँ)
मै पंडित नही------------
तेरी मस्जिद का अजा़न,
और तेरी बस्ती का जुलाहा हूँ।
देख लेता हूँ सारे कौमो का खुदा मै,
फिर बुनता हूं एक धागे से मुहब्बत की चादर,
मै कबीर सा हिन्दू ----------------
और उसकी मस्ती सा जुलाहा हूँ।
मुझे नापसंद है धुआँ अलग-अलग,
मुझे नापसंद है कुआँ अलग-अलग,
मुफ़लिस और रईस सब छके पानी,
आचमन और वज़ू सब एक से ही है,
ये सर जहां झुके---------
मै उस मिट्टी का जुलाहा हूँ।
हर मासूम हँसे खेले एक हो आँगन,
ना समझ सके वे राम और जुम्मन,
जिस गोद खुश हो जाये वे मासूम सी बच्ची,
एै "रंग" मै----------
एैसी हर उस बच्ची का जुलाहा हूँ।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Monday, 25 September 2023

(बरसात रहेगी)

(बरसात रहेगी)
ना पुछ किसके घर,किसके साथ रहेगी
मईया!तो हर घर मे,नवरात रहेगी।
बढेगी यश,कीर्ति और सम्पदा
ऐ रंग,-नवो दिन -
ये बरसात रहेगी।
   जय माता दी।-रंगनाथ दुबे

(पंडित दीनदयाल उपाध्याय)

( पंडित दीनदयाल उपाध्याय )

चिंतन, मनन. स्वाध्याय
तब लिखता है समय,
अपनी शिला पर, 
एकात्मवाद का अध्याय
यानी कि, 
पंडित दीनदयाल उपाध्याय.

🌹🌹🌹🙏🌹🙏🙏🙏
रंगनाथ द्विवेदी, 
जज कॉलोनी, मियापुर.
जौनपुर.mo.no.7800824758

(पहले गान लिखूं)

(पहले गान लिखूँ)
कब तक जादू ,टोने का मै
अन्धा ज्ञान लिखूँ।
आज तो वे दिन आया है
कि,मै विज्ञान लिखूँ।
चाँद-सितारे,रूप-जवानी बाद की चीजे है,
धन्य! हुये माँ के बेटो का,
पहले गान लिखूँ।

विश्व शिखर होने पर(मंगलयान)-
                             रंगनाथ दुबे

(जुड़े का गुलाब)

(जूड़े का गुलाब)
अब भी रखा है, हमने
अपने कमरे मे -
उनके जूड़े का गुलाब।
वही खुशबू, वही सुगन्ध, वही चाहत
ऐ रंग,-हमसे गुफ्तगू करता है-
उनके जूड़े का गुलाब।

Sunday, 24 September 2023

! दुपट्टे को लौटा नही पाई)

उससे
मेरा तलाक तो हो गया लेकिन
ऐ "रंग",
मैं उसकी मोहब्बत की मेहर के
पहले दुप्पटे को,लौटा नही पाई .

(सांवलापन)

(sanwlapn)
pyar me,
sbkuch kitaabi nhi hota.
kuch,hota hai bawlapn,
ae"Rang" ve kvita ve kvi kya?
jisme na ho-
nayika ka sawlapn.

(मदिरापान किया है)

(मदिरापान किया है)
हाँ मैने भी-----------------
यौवन के बोतल से अक्सर,
थोड़ा सा मदिरापान किया है।
जहां-जहां से भी छलका है----
मैने पैग भरे है!
हाँ काफिर होकर भी मैने--------
ये पूजा और अजान किया है,
थोड़ा सा मदिरापान किया है।
सच तो ये है कि यौवन को थोड़े-थोड़े,
तकते सब ही है,
सबकी लालच अलग-अलग है छिपी-छिपी,
बस मेरी खता यही है यारो----------
कि मैने इसको मान लिया है,
थोड़ा सा मदिरापान किया है।
इस यौवन की मदिरा ने-------
कई संत मौलबी छिन लिये,
इसकी अँगड़ाई ही एैसी है कि क्या किजै?
एै,रंग-----ये मदिरा माया है
जो हिचकी-हिचकी कड़वी है,
मैनै इस कड़वाहट के बोतल से 
थोड़ा सा मदिरापान किया है।

(मेरे यार की बस्ती)

(मेरे यार की बस्ती)

कभी पतझड़ , कभी बहार की बस्ती
है शहर से दूर - 
मेरे गुनहगार की बस्ती ।
ऐ रंग ,- रूहे चैन की खातिर
ले चल मेरा जनाजा - 
मेरे यार की बस्ती ।

(छम से पायल कर दे)

(छम से पायल कर दे )

भूख तब है, भूख 
जब रोटी की गंध पागल कर दे
प्यार तब है, प्यार 
जब कहीं से थके आओ, 
और बीवी सामने आंचल कर दे. 

गीत तब है 'रंग: गीत
जब उसकी खन से चूड़ी, 
और छम से पायल कर दें. 

@@@रंगनाथ द्विवेदी. 
जौनपुर (U P )
Mo.no. 7800824758

Saturday, 23 September 2023

(किडनी बेच दू)

(किडनी बेच दू)

मैं कहां कमा सका
दो वक्त की रोटी.
उस पर बिटिया सयानी हो गई 
सोचता हूं,कि 
मैं उसकी ब्याह की खातिर 
ऐ "रंग"––
शहर के किसी डॉक्टर को 
अपनी किडनी बेच दूं.😢😢

Thursday, 21 September 2023

वैसे भी व्यंग्य विधा ऐसे ही लाज़वाब नही है उसके मूल मे आप सा बडा लेखन है ✍️✍️

Wednesday, 20 September 2023

(बेवा की जमीन)

(Bewa ki jmin)
hai bda muskil siyast pe ykin,
ye aise sanp hai , jin pe kar aamd,
nhi koi bin ,
ae "Rang" ye din me kat,te hai chek ,
aur raato ko hdpte hai ,
bewa ki jmin.

(गुलशन नंदा के किताब से)

(Gulshan nanda ke kitab se)
jo ldki- kbhi lgti thi nalnda ke kitab si,
pyar paake wohi ldki -
ae"Rang" lgne lgi ,
Gulshan nanda ke kitab si.

(टूटी हुईं गुड़िया)

(टुटी हुई गुड़िया)
गौर से देखती है,वे अक्सर बंद कमरे मे--
ऐ,रंग-------
वे टुटा हुआ गुड्डा और टुटी हुई गुड़िया।

(दो घाव हो गए)

( दो घाव हो गए)

जीन उरोजों को ढ़क, 
वे मासूम देखती थी, 
कभी वात्सल्य का सपना, 
 ए "रंग"-------

उसके वही दोनों उरोज, 
गरीबी के चलते, 
दो घाव हो गए. 

@@@ रंगनाथ द्विवेदी, 
जट कॉलोनी, मियापुर
जौनपुर उत्तर प्रदेश
मोबाइल नंबर--7800824758

(बूढ़े पिता का कपकपाता हाथ)

(बुढ़े पिता का कंपकपाता हाथ)
कल शहीद की चीता जला रहा बाप---
रो रहा था!
तभी किसी ने कंधे पे रंखा हाथ,
तो वे चीख पड़ा-----------
कि रहने दो कंधे पे मत रंखो,
इस देश के ये नपुंसक हाथ!
जरुरत नही,
इतनी ही सहानुभूति है मेरे शहीद बेटे से,
तो कहो देश की सियासत से,
कि ला दे-------------
उस हाफिज़ सईद का कटा हाथ,
नही ला सकता ना जानता हूं,
इसी जगह फिर सजेगी,
कुछ फौजी बजायेंगे मातमी धुन,
और अपने शहीद बेटे की चीता को,
आग देगा--------------
किसी बुढ़े पिता का कंपकपाता हाथ।

@@@उरी के तमाम शहीदो को मेरा सलाम।

Tuesday, 19 September 2023

(नई संसद)

(नई संसद)

तुम पर गर्व है,फक्र है
ऐ नई संसद!

बहुत कुछ बदला समय के साथ
आखिर कब तलक पहनती
तू किसी और की दी हुई 
भीख में,मिर्जई संसद.

उतार दे!
आ चल! अब नए चोले में 
क्योंकि,ये कुनबा तेरा है,
संस्कार तेरे है
तू भारत है
और तेरी आत्मा है 
यह नई संसद. ✍️✍️

यह रचना मेरी स्वरचित और अप्रकाशित है.

रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी,मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
mo.no.7800824758

(दर्द से है)

(dard se hai)
ye kisi hindu , kisi muslman mard se hai,
sharifo ki bsti me-ek pgli garbh se hai.
phule , suje honth astan pe kharocho ke nishan ,
gndili julphe ,nange bdn,
ae"Rang"bs tera hi sambandh es dard se hai.

(बंजारन)

( बंजारन )

मेरी जिंदगी में आई थी कभी, 
एक खानाबदोश बंजारन.

उसकी कत्थई आंखों को याद कर, 
मैं लिखता गया, लिखता गया
ना जाने कब, 
एक मुकम्मल किताब बन गई, 
ए रंग-------
वे खानाबदोश बंजारन. 

@@@ रंगनाथ द्विवेदी 
 जिला जौनपुर, मोबाइल नंबर 7800824758

Monday, 18 September 2023

(घुघरू बांधती थी)

(ghunghuru bandhti thi)
raiso ke darmiya ve salike se aati thi,
kbhi thumri,kbhi dadra gati thi.
ae"Rang"ve paak thi,kothe pe suna hai,
ki kewl,ve paaw me ghunghuru bandhti thi.

(बेनकाब हुई हूं)

(बे-नकाब हुई हूँ)
आओ मुझे लेने-------
ओ मेरी मौत के शौहर,,,,,,,,,,,,
तेरी खातिर मै-------
फिर बे-नकाब हुई हूँ।

Friday, 15 September 2023

(तीज हूं मैं)

(तीज हूँ मै)
तेरी खुशियो के लिये-------
कभी बांदी,तो कभी कनीज़ हूँ मै।
खड़ी हूँ तेरे घर लौट आने तलक-----
तेरी चौखट,तो कभी दहलीज़ हूँ मै।
मालिक भी हूँ,तेरे दिल की ऐ पी मेरे,,,,,,,,,
तेरी खातिर--------
कभी करवा चौथ,तो कभी तीज हूँ मै।

(चुपके से बचपना)

(chupke se bchpna)
tera alhadpan,chidiyo sa fudakna,
ye kya?
jhuki nazar , angudhe se mitti kurchna
ae "rang" nikl gya kitne chupke se bchpna.

(यौवन मदिरे)

(मेरी यौवन मदिरे)
हे!मेरी यौवन मदिरे--------
मेरे प्यास के चुल्लु मे उड़ेल,,,,,,
मै पीऊ छक के।
हे!मेरी योवन मदिरे-------
कवि हूँ मै-----
तेरी नख-शिख पे आसक्त,,,,,,,,,,,
हे!मेरी प्रेम मणिके-----
तु श्पर्श कर,,,,,,,,,,,
मै जीऊ छक।
हे!मेरी यौवन मदिरे।

(सुलगती सिगरेट)

(सुलगती सिगरेट)
लगाये बैठा है----------------
होंठो पे अपनी वे सुलगती सिगरेट!
बगल में अनगिनत टुकड़े गिरे है,
धुआँ है!
उस कमरे में जिस कमरे में कभी तुम,
छिन के फेक दिया करती थी,
उसकी अधजली सिगरेट।
अब होंठ पे लगा भुल जाता है,
वे तो सुलगते-सुलगते,
जब होंठ के आखिरी सिरे पे पहुँचती है,
तो वे चौकता है!
फिर जला होंठो पे रख लेता है,
वे अपने एक नई सिगरेट।
और तकने लगता है दरवाजे की तरफ,
कि शायद तुम लौट के आओ,
छिन के फेकने इसके होंठो से,
अधजली सिगरेट।
एक सुबह----------
दरवाज़ा खुला था लोगो की भिड़ थी,
शायद कुछ देर पहले ही मरा है,
क्योंकि----------------
अभी भी उसकी होंठो पे एै,रंग
धीरे-धीरे आगे बढ़ रही बुझने के लिये,
बिल्कुल इसके जीवन की तरह-------
ये सुलगती सिगरेट।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

(नील कमल)

(नील-कमल)
तड़पता है,सिसकता है,बुलाता है कोई नील-कमल-----
सदियो चुनी दिवाल से,गाता है कोई नील-कमल।
एै "रंग" किसी यूग में------------
कोई पाता है कहाँ नील-कमल।

(परिंदो का घर)

(parindo ka ghar)
masini ho gya shahari basindo ka ghar,
nikl aata hu , kafi dur mai tnha ,
aur dekhta hu "rang" bnte parindo ka ghar.

Wednesday, 13 September 2023

(हिन्दी मे लोरी थी)

(हिन्दी मे लोरी थी)
कभी श्याम थी,कभी गोरी थी,,,,,,,,,,,
हिन्दी ब्रज की छोरी थी।
माँ लल्ला को अपने-------
जो कभी थपकी दे गाती थी,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----वे हिन्दी मे लोरी थी।

(ओढ़नी)

(ओढ़नी)
याद है बचपन---------
मैं पहले कहाँ ओढ़ती थी ओढ़नी।
वे तो जब मैं तेरह की हुई,
तो अचानक-माँ ने डाँटना शुरु किया,
और कहने लगी-----------
अब अपने सीने पे तुम रंखा करो ओढ़नी।
मैं चौंकी-----------------
कि ये अचानक माँ को क्या हुआ?
फिर लगा नही कुछ तो है,
यूँही नही माँ रखवाना चाहती होगी----
सीने पे ओढ़नी।
फिर कमरे में बंद कर,
खुद को शीशे में टटोलने लगी,
तो अचानक कुछ शर्म सी आई,
कुछ बदला सा था,
जहाँ माँ ने कहा था-रखने को ओढ़नी।
मै बाहर निकली----------
तो देखा बचपन को खिसकते,
लगा माँ कि कितना सच कह रही थी,
कि तु सयानी हो रही है,
क्योंकि कुछ लोग तक रहे थे,
एै,रंग------वही जहां माँ ने कहा था,
रख लो तुम ओढ़नी।

(नेपाल की लड़की)

(nepal ki ladki)
surmai aankho , aur khule baal ki ladki,
sayar hu pasand hai, mujhko,
sham pahado ki,
aur baaho me nepal ki ladki.

(हिन्दी)

(हिन्दी)
मै अब तलक नही भूला,अपने गाँव की हिन्दी-----------
वे पनघट की तरफ जाती तेरे पाँव की हिन्दी।
क्या जाने है आखिर भला ऐ,रंग-----
ये कंकरिट का जंगल,,,,,,,,,,,,,,
कि क्या होती है?-----
अपनो से लगाव की हिन्दी।

(इतिहास चुप है)

(itihas chup hai)
sonaganchhi ki tawayaf pe,
itihas chup hai.
we galij thi, ujale ki,
shahar bha me,
wrna usne khanjar se ,
firngi ko cheer dala.
kya kare aakhir pani ka kunwa,
"rang" rahiso ke ghar ka gilas chup hai.

Tuesday, 12 September 2023

(लोरिया होती)

(loriyan hoti)
bachpan hota ,bachpan ki choriyan hoti,
maa mai sukun se sota -
is patthar ke sahar me , agar tu hoti
aur teri loriyan hoti.

(तलाक ना दो)

( talak n do)
rkh lo tum mehr pr sak n do,
khushi n de sk to khak n do.
main g longi ta umr tnha,
meri pakija mohbbat ko , 
u talak n do.

(रोता हूं)

(rota hun)
kabhi gazal kabhi saaz me rota hun,
na jane mai kitni aawaj me rota hun.
koi jane bhi to kahe pagle,
ai"rang" hamko 
mai kuch is trh k andaj me rota hu.

(काहे के इमाम हो)

(काहे के इमाम हो)
जब शहर------
सुलगता है मज़हब के नाम पे,,,,,,,,
तो तुम काहे के पंडित-----
ऐ,रंग-----
तुम काहे के इमाम हो।

Sunday, 10 September 2023

(शमा गाएगी)

(शमा गायेगी)
तेरे निकाह की रात में--------
शमा गायेगी।
आँखे रोयेंगी मेरी,बीना आँसू 
अंदर एक ताजमहल टुटेगा-----
और शमा गायेगी।
तु अगर सोयेगा भी--------
अपनी सेजे मोहब्बत!
तो तेरी शरिके हयात की हर चुड़ी से---
शमा गायेगी।
तु तड़पेगा मेरी सदा से भागने वाले,
कभी बच न सकेगा!
क्योंकि इस कायनात के हर जर्रे से----
शमा गायेगी।

(उमराव जान)

(umrao jaan)
wahi chhat , wahi chhajje, wahi daalan
lacknow mai ab gar nhi to kewl-
ruswa ki umrao jaan.

(पितृ पक्ष)

(pitra-paksh)
ta- umra lete rhe ,
aap apne pote ka paksh.
mai bahut roya ,
jab le gya aap ko ,
aasmani yaksh.
lagta hai ab bhi,
mere pas aap hai apratyaksh.
ligiye ajuri bhar jal, kuch pusp,
ls pitra paksh.

Saturday, 9 September 2023

(आमची मुंबई)

(आमची मुंबई )

नहीं है-------
ये किसी उद्धव, आदित्य या संजय राऊत
की अक्खि मुंबई. 

नही है 
ये किसी बीएमसी,और
किसी पुलिस वाले की 
आमची मुंबई.

और नही है, 
ये किसी कांग्रेस, भाजपा या शिवसेना की 
आमची मुंबई. 

हार ! जाओगे--
क्योंकि तुम्हें और तुम्हारे घमंड को 
हरा देगी, 
हिंदी सिनेमा की नही, 
बल्कि हमारे देश की 
एक मनीकर्णिका. 

उसे हक है सच कहने का 
वे कहेगी----
क्योंकि ए "रंग "
ये भारत के संबिधान की है----
आमची मुंबई. 

@@@रंगनाथ द्विवेदी 
जज कालोनी, मियांपुर 
जिला----जौनपुर (उत्तर-प्रदेश )

(चूड़ियां की भाषा)

( चूड़ियों की भाषा)

हां मै-------
औरतो के चूड़ियों की भाषा जानता हूं .

क्यूकि इनकी खनक में, 
एक लय है दर्द का,,
और एक लय है खुशी की, 

लाख छिपाये हमसे, 
कोई औरत, 
चूड़ियाँ अपनी
मै फिर भी पहचान जाता हूं
बिना उसके खनके, 
क्योंकि ए "रंग "मै -----
औरतो के चुड़ियो की भाषा जानता हूं . 

Rangnath Dubey भैया

(घर को छोड़े)

(घर को छोड़े)
एक जमाना हुआ तुम्हे जिस घर को छोड़े,
उस घर की,छत की मुंडेर पर-----
बैठते है वही दो कबुतर के जोड़े,,,,,,,,,
जिन्हे कभी हम तुम तकते थे------
घंटो बिना मूँह मोड़े।
एक जमाना हुआ तुम्हे जिस घर को छोड़े।

Friday, 8 September 2023

(मेरी रूह कैद है)

(मेरी रुह कैद है)
ऐ बेवफ़ा मुझे आजाद कर दे,,,,,,,,
क्यूकि तेरे शहर मे---------
अब तलक मेरी रुह कैद है।

(धान की यौवन शिखर पर)

(धान की यौवन शिखर पर)
इस बार की बरसात का पानी गिरा है,
धान की फसलो के यौवन शिखर पर।
वे देखो-------------
खेत में सिहरी खड़ी है एक बाला गाँव की,
उसका भीगा आँचल गिर गया है खेत में,
वे उठा के रख रही है जिस लोच से,
बरबस नयन थम जा रहे------------
धान की यौवन शिखर पर।
धान की ये बालियाँ खुद चाहती है,
कि खेत में आये पिया-------------
वे भी सुहागिन हो उठे बरसात में!
आँख मुँदे,साँस फूले,धान भीगे
दे बालियाँ!न्योता खुदी आँचल गिरा,
कि हे बादलो तुम खुब बरसो--------
अब मेरी यौवन शिखर पर।

(तेरे शहर में)

(तेरे शहर में)
तेरे शहर में--------------
हमारे मोहब्बत की एक शाम वसीयत है।
ले लेना तुम हमारी गज़ल का जर्रा-जर्रा,
कोई बंदिश नही----------
यहाँ जाफ़रान की खुशबू है हर शख्स़ की खातिर,
यहाँ न कोई कौम न मज़हब और----------
ना ही सरियत है।
तुम्हारें शहर में--------------
हमारे मोहब्बत की एक शाम वसीयत है।
आहिस्ता-आहिस्ता उतरेगा जे़हन मे तेरे,
इन लफ्ज़ो का गुलाबीपन,
मै याद आऊँगा तुम्हारें शहर को,
यहाँ से जाने के बाद भी,
क्योंकि मोहब्बत ही एै "रंग"--------
इस अदब के दिवान की नियत है।
तुम्हारें शहर में------------
हमारे मोहब्बत की एक शाम वसीयत है।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.------7800824758

Thursday, 7 September 2023

(छत पर परिंदे नही आते)

(छत पे परिंदे नही आते)
हमने अपनी माँ का कहा नही माना,,,
ऐ,रंग----अब इसी से शायद----
हमारे छत पे परिंदे नही आते।

(खाट गायब है)

(खाट गायब है)
इतने जहरीले-------------
साँपो की बस्ती में चले आये!
तुम्हे डस लेंगे।
क्योंकि तुम्हारे खेमें मे--------
अब वे सपेरे नही रहे!
लौट जाओ----------
जब तलक तुम्हारे पास,
एैसे साँपो के जहर की काट गायब है।
कैसे लड़ोगे------------
इस चुनाव के जंगल में,
तुम्ही बताओ-----------
जब तुम्हारी पार्टी से,
ब्राह्मण,मुस्लिम,यादव,दलित और जाट गायब है।
तुम्हारे अपने ही मसखरे हो गये है,
उन्ही के नाते---------------
तुम्हारी योग्यता पर सवाल खड़े हो गये है!
मै पुरी मिडिया पे एक इल्ज़ाम देता हूँ,
जो बोले थे वहाँ राहुल---------
वे पुरी बात गायब है,
बस बार-बार यही दिखाया जा रहा है,
कि जनसभा से नही जैसे एै,रंग-------
पुरे चुनाव से काग्रेस की खाट गायब है।
@@@रचयिता-------रंगनाथ द्विवेदी।
एडवोकेट कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।

(हिन्दू और मुसलमान बनके)

(हिन्दू और मूसलमां बनके)
मंदिर और मस्ज़िद दोनो को रौशनी दी---
ऐ,रंग----------
चराग कभी नही ज़ला----------
हिन्दू और मूसलमां बनके।

Wednesday, 6 September 2023

(मिट्टी से जुदा मत करना)

(मिट्टी से जुदा मत करना)
बेटे मै बुढ़ि हो गई हूँ-------------
मुझे इस उम्र में अपने अब्बु से जुदा मत करना।
ना बेचना किसी को-------------
दरवाज़े पे जो उन्होनें लगाया है दरख्त़,
मै उसी से बतियाती हूँ अक्सर,
मुझे दर्द होगा------------
जब कोई काटेगा टंगारे से तेरी अब्बु की याद को।
बेटा बेशक तु मुझे हज़ ना कराना,
पर लेने देना मुझे आखिरी साँस इस मकान में,
मर जाऊँ तो तेरा हक है इस पर,
पर जीते जी मेरे बेटे,
अपनी इस अम्मी को अपने अब्बु के-----
इस मुकद्दस मिट्टी से जुदा मत करना।

(मंदिर और मस्जिद मकान सा लगता है)

(मंदिर और मस्जिद मकान सा लगता है)
हमने देखी है---------
दंगे मे अल्लाह और राम की लाशे,
ऐ,रंग----तब से हमे-----
ये मंदिर और मस्जिद एक मकान सा लगता है।

Sunday, 3 September 2023

(तीन मर्तबा तलाक)

(तीन मर्तबा तिलाक)
एक औरत---------
किसी सरिया के नाम पे
कैसे हो सकती है मजाक।
कैसे-----------
लिख सकता है कोई शौहर,
अपनी अँगुलियो से इतनी दुर रहके,
मोबाइल के वाट्सप पे----------
तीन मर्तबा तिलाक।
नही अब औरत को भी----------
उसके हिस्से की इस्लामिक ताकत बख्श़ो,
उसे भी हक दो!
कि वे ले सके एैसे मर्द से एै,रंग--------
तीन मर्तबा तिलाक।
@@@रचयिता-------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।

Saturday, 2 September 2023

(ये सरकारी स्कूल है)

(ये सरकारी स्कूल है)

पशु गणना,बाल गणना,मत गणना,
जन गणना,पोलियो
कोरोना वैक्सीन 
साहब सब कुबूल है.

डी. एम, एस. ड़ी.एम 
एम. डी. एम 
अध्यापक बद्हवास
चेहरे पे जमी धुल है.

दिल्ली,लखनऊ
कही से आईए,
ठहरिये!खामी ढुढिए!
हमारी अच्छाई कुचलिए!
अखबार मे निकलवाईए!

क्योंकि
ये सरकारी स्कूल है.

बंद कर दीजिए
फिर देखिए
कैसे प्राइवेट स्कूलों के हाथों 
इस देश के 
एक तबके की "शिक्षा
मार दी जाएगी" 

तुम्हें क्या पता---
तुम्हारे बच्चे तो "सैंडविच" खाते है
वे देखो,
हमारे सरकारी स्कूल के
बच्चे की "मां
का पिचका हुआ पेट"
 गवाही दे रहा
कि उसके बच्चे की 
आखिरी शिक्षा
यही "सरकारी स्कूल है".

सर्वाधिकार सुरक्षित रचना.

रचनाकार--रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियापुर
जौनपुर 222002 (U P)
mo.no.7800824758
rangnathdubey90@gmail.com

(मर्सिया लिखना है)

(मरसिया लिखना है)
अभी तो बस यादो के चराग जले है---
ऐ,रंग----अभी तो हमे सारी रात------
उस बेवफा पे मरसिया लिखना है।

(मैं लिखता हूं कोई गीत)

(मै लिखता हूँ कोई गीत)
जब बेचैन कर देता है------------
मेरे अंदर का मरुस्थल मुझको,
तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत।
जब------------
शब्द के होंठ पे चुभती है कोई नागफनी,
तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत।
जब पथ की रेत पे-----------
चलता जाता हूँ दूर पथिक सा
और फूट जाते है पाँव के छाले,
तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत।
जब------------
बहुत सन्नाटा मेरे भीतर का,
उधेड़ता है मुझको---------
तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत।
बोता हूँ रेत पे कुछ शब्द,
पर कटिले वृक्ष के विरवे ही पनपते है,
उन्ही वृक्षो की------------
खरोंच जब आ जाती है बन के पीर,
तब मै लिखता हूँ कोई गीत।

Friday, 1 September 2023

(एक जिंदा दिया हूं)

(एक जिंदा दिया हूँ)
ताउम्र अपनी मै जल-जल के जिया हूं,
मै आदमी नही-----------
एक जिंदा दिया हूँ।
तमाम खराशे है,है तमाम सिलवटे
उधड़ा रहा मै----------
किसी मुफ़लिस के बिछौने सा,
हर जख्म जिंदगी का-------
मै खुद से सिया हूं।
मै आदमी नही--------
एक जिंदा दिया हूँ।
हु मै एक एैसा सजायाफ्ता,
जो रो नही सकता!
खौलते है आँसू मेरे दिल के अंदर,
मै कभी बहार में नही-------
खिजा़ में जिया हूं।
मै आदमी नही------
एक जिंदा दिया हूँ।

(दिवाली नही आई)

(दिवाली नही आई)
भरपेट भोजन की थाली नही आई,
कुछ एैसे भी घर है----------
जहां दिवाली नही आई।
रो रही घर में---------
तक-तक के दरवाजे को भूखी बेटिया,
उन्हे अपनी माँ की बुलाती आवाज़,
प्यार भरी थपकी,
छोटी बिटिया के खुशीयो की------
वे ताली नही आई!
अभी तलक----------
लौट कर इस घर की दिवाली नही आई।
सुबह के धुधलके में--------
दो पुलिसिये चादर में लपेटकर,
लाये थे नग्न लाश!
बेटिया डर गई,
एकटक देखा कि कौन है?
फिर माँ कह झिंझोडा--------
लेकिन उसकी माँ की खुली आँखो ने तका नही,
पहली बार-उसकी माँ के चेहरे पे
कोई लाली नही आई।
ये बेटिया क्या जाने?
कि करोड़ो के पटाखो में दब गई,
इनके माँ की सिसकिया!
देख लो आज तुम भी मेरी कविता,
इसके बदन पे हवस के निशान-----
ये आज भी अपने घर खाली नही आई,
ये और बात है कि----------
इसके घर कोई दिवाली नही आई।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

----शायद कुछ एैसे वंचित घर है जहां दिवाली नही आती,फिर भी ईश्वर हर घर को रौशनी दे।

(राम एक कलाकार में खंडित हो गए)

(राम एक कलाकार में खंडित हो गये)
इंतज़ार कर रही है करके मेकप,
किसी ग्राहक का!
पत्थर की नहीं------------
अपने भूखे पापी पेट की अहिल्या।
आज गुलज़ार भी तो है,
कोठे वाली गली!
क्योंकि आज------------
दशहरे के राम और रावण की झांकी निकलनी है,
उसे याद है,
कि अगले बीते वर्ष भी वे इसी तरह,
मेकप किये अपने कोठे के छज्जे पे खड़ी थी,
तो राम बने कलाकार ने किस तरह काम उन्मुक्त नजरो से,
उसके उन स्तनो को तका था!
पहली बार दशहरे की---------------
उसकी वे पिड़ा असह्य थी!
क्योंकि इस कोठे वाली अहिल्या ने,
जिस राम को अब तलक सुना था,
वे राम जैसे-------------
इस कलाकार में खुद खंडित खड़े थे।

(बेगुनाह रावण जल रहा है)

(बेगुनाह रावण जल रहा है)
अब रावण का चरित्र---------
रामलीला में खल रहा है!
बेचारा------------
एक सीता के नाते प्रतिवर्ष जल रहा है।
एै दिल्ली--------------
जबकि तु लंका से गई बीती है,
क्योंकि रेप और बलात्कार,
तेरी सड़को पे चल रहा है,
और बेवजह---------
दशहरे में रावण जल रहा है।
अब वक्त आ गया है कि,
तेरी सदन में---------
रावण की समिक्षा होनी चाहिये!
क्योंकि अपनी सीता को,
अब रावण से कही ज्यादा,
उसका राम छल रहा है,
और दशहरे में एै,रंग------
बेगुनाह रावण जल रहा है।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.---7800824758
यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।
आप सभी को नौरात्र और दशहरे की ढ़ेर सारी बधाई।

(मेरी किस्मत में ये जागना आया)

(मेरी किस्मत मे ये जागना आया)

उन्हे कहा, 
कभी हमे चाहना आया.
मेरी ख्व़ाहिशो को रौदा, 
बस उनकी समझ मे, 
वासना आया.

मै घुटी बंद कमरे मे,
वे चैन से सोये, 
ऐ,रंग--
मेरी किस्मत मे ये जागना आया. 

@@@ रंगनाथ द्विवेदी
 जिला---जौनपुर, ( उत्तर प्रदेश)