Saturday, 24 October 2020

(वन्देमातरम् कहना दिये)

इस दिवाली तू, शहीद के घर,
फक्र से जलना दिये.
ना रोना उसकी शहादत पे,
कसम है, तुम्हें
हर छत के दिये से,
जन-गण-मन ,
और वन्देमातरम् कहना दिये.

@रंगनाथ द्विवेदी.

कविता---(पिपिहरी बजाओगे )

चुनाव परिणाम पे हमारी प्रतिक्रिया-------
     
        ( पीपिहिरी बजाओगे)

आखिर कब तलक भाजपाइयों को----
जीत का च्यवनप्राश,
मोदी खिलायेंगे.

तुम किचड़ करते फिरो,
तुम्हारी दुर्गती दुर होगी,
क्योंकि तुम्हें विश्वास है
उस किचड़ मे भी-----
कमल मोदी खिलायेंगे.

ये मंदी और अर्थशास्त्र,
किसी गरीब का ठंडा तवा--
क्या जाने?
माफ! करना,
आप ऐश करनेवालो को मंत्री बनाओ,
और चुनाव-----
मोदी जितायेंगे.

लो चखो,करो टेस्ट
हरियाणा में चुनावी फिकेपन का,
ये लोकतंत्र है,भैय्या
यहा क्या खट्टर,
क्या हुड्डा ?
नही संभले तो फिर,
राहुल गांधी के चुनावी हार की तरह,
आन की तान,
सदन मे या फिर सदन के बाहर,
पीपिहिरी बजाओगे.

@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758

Monday, 19 October 2020

कविता---(उन्होंने मुझको चाँद कहा था )

(उन्होनें मुझको चाँद कहा था)

पहले साल का व्रत था मेरा-----
उन्होनें मुझको चाँद कहा था।
तब से लेकर अब तक मै-----
वे करवा चौथ नही भुली।
मै शर्म से दुहरी हुई खड़ी थी,
फिर नजर उठाकर देखा तो,
वे बिलकुल मेरे पास खड़े थे,
मैने उनकी पूजा की-------
फिर तोड़ा करवे से व्रत!
उन्होनें अपने दिल से लगा के-----
मुझको अपनी जान कहा था।
पहले साल का व्रत था मेरा-----
उन्होनें मुझको चाँद कहा था।
बनी रहु ताउम्र सुहागिन उनकी मै,
यूँही सज-सवर कर देखू उनको मै,
फिर शर्मा उठु कर याद वे पल,
जब पहली बार पिया ने मुझको----
छत पर अपना चाँद कहा था।
पहले साल का व्रत था मेरा----
उन्होनें मुझको चाँद कहा था।

@@@आप सभी को कल के करवा चौथ की ढ़ेरो बधाई।
रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

Saturday, 17 October 2020

कविता---( ताजमहल)

ताज़महल पे हो रही सियासत से प्रेरित एक रचना-----------
                     (और एक ताज़महल)
मुहब्बत की निशानी की खातिर है याद महल-----
उफ!आज सियासत की ज़द में है ताज़महल।
मै नही कहता कि लड़ा जाये इस जगह------
लड़ने को और भी है इसके बाद महल।
कुछ जोड़े कसम खाते है न जुदा होने की--------
एैसा इसके सिवा दुनिया में नही है मुझे कोई याद महल।
रहने दो इसे मंदिर-मस्जिद मत कहो------
जैसे भी है रहने दो इस ज़मीने जन्नत मे ये आबाद महल।
क्योंकि जानता हूँ एै "रंग" कि बना नही सकती ये दुनिया---
इस ज़मी पे कोई एक और ताज़महल।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.----7800824758

Friday, 16 October 2020

कविता--(मैं दर्दे दरख़्त हूं )

(मै दर्दे दरख्त़ हूँ)
मै वे दर्दे दरख्त़ हूँ--------
जो चोट पे भी चुप रहती है शाख-शाख।
सब छोड़ जाते है--------
कुछ लम्हों के बाद मुझको,
मै सिसकती हु तन्हा अक्सर,
अपनी ही साँस-साँस।
मेरे बदन की ये लिबासे पत्तियां,
कर देती है खिज़ा में-------
बेपर्दा बदन मेरा!
मै जीती हूं किस तरह-------
शर्म को अपनी पलको से टांक-टांक।
मै वे दर्दे दरख्त़ हूँ-------
जो चोट पे भी चुप रहती है शाख-शाख।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

कविता---(रावण )

(रावण )
पुराने खल चरित्र का रावण ,
आज के माडर्न खल चरित्र के रावण से,
कही ज्यादा पवित्र व श्रेष्ठ था,
क्योंकि उस रावण पे,
आज के माडर्न रावण की तरह-----
"किसी मासूम आठ वर्ष की बच्ची के,
रेप का कोई इल्जाम न था" ।
पुराने रावण पे तो,
उस राम ने विजय पाली,
पर माडर्न रावण से,
आज के राम डर गये है,
उससे गली-गली, शहर-शहर,
बचते व छिपते फिर रहे,
और माडर्न रावण अट्हास कर रहा।
शायद ऐसा लग रहा कि जैसे,
उस महा-विद्वान पुराने रावण के----
 मारने के श्राप से राम पीड़ित हो गये है।
सच तो ये है कि आज के माडर्न रावण को जला पाना,
इस नपुंसक समाज के बस का नही,
तभी तो अब भी,
हर दशहरे मे उसी पुराने रावण को------
जलाया जा रहा।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला---जौनपुर Pin.no.222002
(उत्तर-प्रदेश)।
Mo.No.--7800824758.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

Monday, 12 October 2020

कविता---(मैं भी कुम्हार हूँ )

(मै भी कुम्हार हूँ)
हा मै भी----------------
अपने गीतो की चाकी पे,
शब्दो की मिट्टी रख,
कुछ गीत------------
उसके दिवाली के दीये की तरह बनाता हूँ।
वे भी कुम्हार है मिट्टी के दियले का,
और मै भी कुम्हार हूँ-------
अपने गीतो का।
वे उपले की आँच में,
पकाता है दियलो को और मै--------
अपने हृदय के उपलो की आँच में,
गीतो के शब्द पकाता हूँ।

Sunday, 11 October 2020

लघुकथा---(जुम्मन की शहनाई )


लघुकथा----( जुम्मन की शहनाई)

जिस जुम्मन की मौत हुई थी वे कोई आम मौत नहीं बल्कि हमारे शहर के एक मशहूर शहनाई कलाकार की मौत थी. लगभग छ दशक तक जुम्मन मियां ने शायद ही कोई ऐसी शादी रही हो जिसमें उन्होंने अपनी शहनाई ना बजाई हो. 

उस छ दशक में जितनी जरूरत एक युवा जोड़े को शादी की थी, उतनी ही जरूरत उस शादी में जुम्मन मियां के शहनाई की भी थी. इसलिए जुम्मन की मौत की खबर ने छह दशक की उन सभी शादियों की आंखें भी भीगो दी जिन शादियों में जुम्मन मियां ने अपनी शहनाई बजाई थी. 

जुम्मन मियां का एक-एक अंदाज आने वाली कई पीढ़ियां याद रखेंगी, उनका वे विशेष टोन में हंसना व पान की गिलोरी को एक तरफ दबा कर बात करना सब खत्म हो गया. ऐसा नहीं कि अब शादियां नहीं होगी, होंगी लेकिन उन शादियों में जुम्मन मियां की शहनाई की वे धून नहीं गूजेंगी जिससे वे पूरी महफिल लूट लिया करते थे . 

हमारे शहर के वे एकलौते ऐसे शख्स थे, जिन्हे शहर का कोई भी मोहल्ला कभी हिंदु या मुसलमान नही कहता था. उनके मौत की खबर सुन मैं और मेरी पत्नी दोनो ही फ़फ़क के रो पड़े. 

क्योंकि जुम्मन मियां ने हम दोनो की टूट और बिगड़ रही शादी को एक पिता की तरह आगे बढ़कर बचाया था. हमारी शादी की वे घटना आज फिर से जीवित हो गई, जब भरी मंडप में चक्कर आने की वजह से मैं गिर गया था और होने वाली पत्नी के मुहल्ले के लोगो ,रिश्तेदारो ने मुझे व मेरे पुरे परिवार को बंधक बनाकर  थाने से पुलिस बुला करके एफ आई आर कर दिया. 

मेरी पत्नी के तरफ के लोगों ने पुलिस को बताया कि इस लड़के की शादी उसकी बीमारी को छिपाकर की जा रही है. जबकि सच्चाई ठीक इसके उलट थी मुझे अत्यधिक थकान के कारण यह चक्कर आया था, तब मैंने पहली बार जुम्मन मियां को अपने पूरे आत्मविश्वास के साथ उस शहनाई की कसम खाते हुए सुना व देखा जो उन्होंने आज से पहले कभी भी किसी भी शादी में नहीं किया था. 


उन्होंने अपने भरे कंठ से कहा साहब मैं पिछले कई पीढ़ियों से इस खानदान और परिवार की शादियों में ना केवल शहनाई बजाई है बल्कि इस परिवार के एक- एक सदस्य को मैं अपने घर की तरह जानता हूं, इस लड़के में कोई बीमारी नहीं है अगर आप सबको विश्वास ना हो तो आप मुझे अपने यहां महीनों बंधक बनाकर इस लड़के की डाक्टर से जाँच करा ले. 

 तब थाने के दरोगा ने कहां की जुम्मन की शहनाई अपने आप में खुद एक विश्वास व यकीन है, क्योंकि जुम्मन तो मर सकता है, लेकिन अपने शहनाई की झूठी कसम कभी नहीं खा सकता, और सच भी वही हुआ हमारी शादी फिर रुकी नहीं कहने वाले तो यहां तक कहते हैं कि जैसी शहनाई मेरी शादी के विदाई के वक्त जुम्मन मियां ने बजाई थी वैसी शहनाई शायद ही किसी शादी में उन्होंने बजाई हो. 

अतः आज केवल जुम्मन की मौत ही नहीं हुई थी बल्कि हम पति-पत्नी के एक शहनाई बजाने वाले वालिद का भी इंतकाल हुआ था. 


यह लघुकथा मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है. 

लेखक---रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin. no. 222002 (U P)
Mo. no. 7800824758

दिनांक-11/10/20 को राजस्थान पत्रिका के परिवार में प्रकाशित. 

Saturday, 10 October 2020

कविता---(राम एक कलाकार में खंडित हो गये )

(राम एक कलाकार में खंडित हो गये)
इंतज़ार कर रही है करके मेकप,
किसी ग्राहक का!
पत्थर की नहीं------------
अपने भूखे पापी पेट की अहिल्या।
आज गुलज़ार भी तो है,
कोठे वाली गली!
क्योंकि आज------------
दशहरे के राम और रावण की झांकी निकलनी है,
उसे याद है,
कि अगले बीते वर्ष भी वे इसी तरह,
मेकप किये अपने कोठे के छज्जे पे खड़ी थी,
तो राम बने कलाकार ने किस तरह काम उन्मुक्त नजरो से,
उसके उन स्तनो को तका था!
पहली बार दशहरे की---------------
उसकी वे पिड़ा असह्य थी!
क्योंकि इस कोठे वाली अहिल्या ने,
जिस राम को अब तलक सुना था,
वे राम जैसे-------------
इस कलाकार में खुद खंडित खड़े थे।

Friday, 9 October 2020

व्यंग्य----( निकली हुई तोंद )

व्यंग्य-----( निकली हुई तोंद )

वैसे आप सभी माने या ना माने लेकिन मेरा यह मानना है कि चाहे जिस भी सरकारी महकमे के घुस  खाने वाले मुलाजिम या व्यक्ति की तोंद निकली हो लेकिन उनमें सबसे खूबसूरत व स्मार्ट तोंद अगर  देखने में लगती है तो यह पुलिस महकमें की लगती  है. 

वे जब अपनी घूस लेने की--"प्रदूषण युक्त मूछों के साथ हंसते हैं तो लगता है कि जैसे इन्होंने या इनके किसी खानदान ने अच्छाई का कोई भी सुंदरवन आज तलक नहीं देखा है जिसका साक्षात असर इन पर पड़ा है ".यह तोंद वाले  पुलिसकर्मी मनुष्य नहीं बल्कि मनुष्य के रूप में जन्मे नागासाकी और हिरोशिमा के आणविक रेडिएशन है.

इनके वजन का--"भयंकर रसास्वादन कर रही थाने की कुर्सी भी ऐसे सांस छोड़ती है जैसे कि उसका दम घुट रहा हो". जब तोंदवाले यह साहब जरा सी अपनी तशरीफ़ उठाते हैं तो कुर्सी से आई आवाज अपने पंचर फेफड़े में थोड़ा सा ऑक्सीजन भर इनके पुनः तोंदग्रस्त वजन के साथ बैठने के लिए भर लेती है. 

पुलिस वाले की तोंद किसी--"भू माफिया के जबरदस्ती कबजाए गये कई बीघे जमीन सी लगती है". कोई फरियादी रोए या गाये इससे इनका कोई मतलब नहीं बस इनके तोंद के सेवा रूपी  गुल्लक या बैंक के खाते में कितना पैसा डाल सकता है इससे मतलब है.

सब्जी मंडी, फल मंडी, मीट मार्केट हर कहीं इनकी निकली हुई तोंद कि कुछ अपनी कहानियां या गुलछर्रे हैं, इस ठेले से उस ठेले जाना और उस बीच क्लासिकल तरीके से उनकी तोंद का हिलना यह साबित करता है कि यहां इनकी वर्दी व तोंद की निशुल्क पुलिसिया रंगदारी चलती है.

सच इच्छा होती है कि ऐसे तोंदवाले किसी योग्य पुलिसकर्मी कि तोंद को प्रति वर्ष मै अपनी व्यंग्य विधा के बाई नेम सर्वश्रेष्ठ वार्षिक तोंद के सम्मान पत्र से नवाजे व उनके खूबसूरत व स्मार्ट तोंद को हर उस घर में अनिवार्य रूप से टंगवाउ जो घूस रूपी सुंदरता के साथ अपनी-अपनी तोंद के वजन में पुलिसवाले की तरह  श्रीवृद्धि कर रहे हैं.

यह व्यंग्य मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है. 

लेखक--रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला-जौनपुर pin.no.222002 (U P)
Mo.no.7800824758

व्यंग्य---( पुलिस महकमे का सौंदर्य वर्णन)

व्यंग्य-----(पुलिस महकमें का सौंदर्य वर्णन )

"सारे सरकारी विभाग या महकमें  का सौंदर्य वर्णन काफी बदमजा और असाहित्यिक है". बिना पुलिस विभाग के सौंदर्य वर्णन का जिक्र किए--हमारी व्यंग्य विधा के सारे सुकुमार व खूबसूरत शब्द रूपी व्याकरण के यह--"पुलिस महकमें के लोग शाहनाज के ब्यूटी प्रोडक्ट हैं". इनमें व्यंग्य अलंकार को चार चांद लगाने वाली गालियों के छंद या अतुकांत कविता या साहित्य पद्य व्यंग्य के यह--"मॉडर्न हरिशंकर परसाई हैं". इनके स्तर का साहित्य आप हर थाने पर 2 या 4 पा जाएंगे--"जिसका पाठन यह अपनी सुविधानुसार गालियों से करते हैं".

 इनके होठों पर हंसने की संभावना काफी कम पाई जाती है--"यह हंसते भी हैं तो लगता है कि जैसे 5 या 6 महीने बाद हंसे हो, इनके होठ भी इनके हंसने में अपना प्राकृतिक साथ नहीं दे पाते". यह जबरदस्ती अपना दांत चीआरे  से लगते हैं और इनका पेट तो माशा अल्लाह इनकी इस सुंदरता में और भी चार चांद लगा बैठता है जिस थाने के आसपस किसी ने कभी भी पेट से हुई महिला का पेट ना देखा हो तो-- "इनके पेट को देख ले तो उसकी यह राष्ट्रीय हसरत भी पूरी हो जाएगी".

 पुलिस महकमें की पेट को देख आप यूं ही समझ जाएंगे की पैदा होने और चलने से पहले क्या हमारे देश की यह महान विभूति जमीन पर दौड़े भी थे. "पैसा और दलाली इनके स्वास्थ्य के लिए प्रोटीन का काम करता है ".पुलिस महकमा अन्य सरकारी महकमे से कहीं ज्यादा खतरनाक व बंगाल के काले जादू की तरह है. "पुलिस वालों पर व्यंग्य लिखना,  मारने वाले सांड को लाल कपड़ा दिखाने के समान है".अतः हम व्यंग्यकार भी इन पर कुछ लिखने से पहले अपनी कलम की--"बीपी और सादे कागज की शुगर को भली-भांति चेक कर लेते हैं, तब कहीं जाकर हम इनके सौंदर्य वर्णन पर थोड़ा बहुत रिस्क लेकर लिख पाते हैं".

यह व्यंग्य लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है. 
दिनांक--27/3/2020

लेखक--रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला-जौनपुर pin.no. 222002 (U P )
Mo.no. 7800824758 

Thursday, 8 October 2020

कविता---(प्यार का चाँद )

करवा चौथ की सभी व्रती महिलाओ के प्यार की एक खूबसूरत कविता----
                             (प्यार का चाँद)
हमने पाया है तुममे अपने प्यार का चाँद,
बेशक कल तुम तकोगी छत पे मुझे,
मेरे हाथो से पियोगी व्रत का पानी,
लेकिन मै नही तकुंगा तेरे सिवा मेरी सजनी,
क्योंकि दुनिया तकेगी उसे,
मै तो तकुंगा तुम्हें क्योंकि तुम्हि हो-----------
हमारी धड़कन और हमारे प्यार का चाँद।
मेंहदी,महावर,चुड़ियाँ,सिन्दूर,बिंदिया,
वही पहले करवे सी शर्म,
तुम बहुत अच्छि हो मेरी सजनी,
क्या करुंगा तक के मै,
बहुत फिका है तेरे आगे आज-----
इस पुरे संसार का चाँद।
मै तुम्हें पाऊ हर जनम,
कभी न छिने मेरी आँखो से मेरी सजनी,
क्योंकि पल-छिन नही है तुमसे मेरी सजनी,
तुम्हारे साजन के प्यार का चाँद------
हमने पाया है तुममे अपने प्यार का चाँद।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर (उत्तर--प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

Tuesday, 6 October 2020

व्यंग्य----(हाय रे ! प्याज़ )

व्यंग्य------(हाय रे !प्याज ) 

 

अभी तलक बरसात में नदियां हैं खतरे के निशान से ऊपर बह रही थीलेकिन इस समय--प्याज की महंगाई भी अपने खतरे के निशान से ऊपर है. " पत्नी का शेयर बाजार की तरह गिरे हुए मुंह को देखकर तरस आ रहापर क्या करूंमैं भी अपने जेब की संवैधानिक व्यवस्था से मजबूर हूं, " आज किचन की यह श्रृंगारीक हालत हैकि वहां भी पिछले दिन से रखा प्याज नकचढ़ी साली की तरह सब्जी वाली टोकरी में ऐंठ रही है. "

 

प्याज की महंगाई ने मुझ जैसे व्यंग्य लेखक को भी कंफ्यूजावस्था में पहुंचा दिया है. समझ नहीं पा रहा हूं कि मैं--प्याज को स्त्रीलिंग लिखूं या पुलिंगकभी यह प्याज--पत्नी की तरह थी आज इसके सारे हाव-भाव किसी प्रेमिका की तरह लग रहे". प्याज के चलते इस समय सब्जी मंडी के बाहर ठेले लगाने वाले भी अपने ग्राहकों से ऐसे बातें कर रहे जैसे वे कोई--"सब्जी विक्रेता नहीं बल्कि वे इस पूरे इलाके के शहर कोतवाल हो.ग्राहक भी अगर प्याज खरीदने के लिए उसके ठेले के पास रुकता है तो प्याज को वे इस डर से छूकर उसके दाम नहीं पूछता कि कहीं यह-- "ठेलेवाला कोतवाल इसे किसी चोर उचक्के  या जेबकतरे की तरह डाट ना दे."

 

 

पहले मैं जो सब्जी 20 मिनट में खरीद कर खाली हो जाता थाअब वही सब्जी खरीदने में मुझे घंटों लग जाते हैं. यह सारी महिमा प्याज के बढ़े हुए भाव की वजह से है. मेरे सब्जी खरीदने की यह--"ओलंपिक शुरुआत पहले ठेले से शुरू होकर आखरी ठेले पर जाकर खत्म होती है.

 

पहले सब्जी लेने जाता था तोपत्नी यूं ही बेमन से सब्जी वाले झोले को पकड़ा देती थी और साथ ही दो-एक कड़ी बातें मुझे अलग से सुना देती थी. लेकिन  इस प्याज के बढ़े हुए दाम ने उसका पूरा बॉडी लैंग्वेज ही बदल दिया है. वे तीन-चार दिन से मुझे बहुत ही प्यार से सब्जी के झोले को पकड़ा रही और मेरे सब्जी लेकर लौट आने तलक बड़ी ही बेसब्री के साथ वे  दरवाजे पर खड़ी रहती है. 

 

ऐसे बेसब्री के साथ मेरा इंतजार वे तब किया करती थी जब उसकी और हमारी नई-नई शादी हुई थी. यह सब परिवर्तन इस प्याज की वजह से हुआ है. मैं अब  जब भी बाजार से सब्जी लेकर लौटता हूं. तो वह मेंरे हाथ से बहुत ही प्यार से सब्जी वाले झोले को पकड़ लेती है. लेकिन जैसे ही मैं उसे प्याज ना खरीद पाने की वजह बताता हूं तो उसका सारा उत्साह पल भर में ही गायब हो जाता है फिर वे किचन की तरफ बड़े ही उदास मन से सब्जी रखने चली जाती है.

 

अब तो मुझे और मेंरे व्यंग्य लेख दोनों को ही--इस प्याज के बढ़े हुए दाम का खतरे के निशान से नीचे आने का बड़ी बेसब्री से इंतजार है.क्योंकि प्याज की महंगाई की वजह से मुझे अब अपनी पत्नी का लटका हुआ मुंहबहुत कष्ट दे रहा. काश! की सरकार जल्दी प्याज के दाम या महंगाई को कंट्रोल करेंजिससे मेरी पत्नी के खूबसूरत चेहरे का लालित्य वापस लौटे और हम भी इस कहने या लिखने से बरी हो सके कि--"हाय रे ! प्याज."

 

 

यह व्यंग्य मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है. 

 

लेखक---रंगनाथ द्विवेदी 

जज कॉलोनीमियांपुर 

जिला--जौनपुर pin.no.222002

Mo.no.7800824758