Monday, 29 July 2019

(पहली सी दिवाली न रही)

( पहली सी दिवाली न रही )
वे पोखर न रहा, वे चाकी न रही
अब मेरे गाँव मे--------
पहली सी दिवाली न रही.
वे अगले जन्म घर के मासूम बच्चो को छछुंदर होने से,
बचाने के लिये,
घर मे एक बड़े से दियले मे--------
काजल पालने वाली काकी न रही.
वे उल्लास, वे पटाखे, थोड़े मे खुश हो जाना,
कितना सोंधापन था,
आज चाईनीज़ टिमटिमाते झालर जल रहे,
लेकिन उनमें---------
वे प्यार व छुअन कही बाकी न रही.
अब तो बस पथरायापन ही खुरचना है,
क्योंकि माँ के साथ बैठ,
कमरे मे एक-एक दिये मे तेल रखती,
हमारें गाँव की-----
रुपाली न रही.
वे पोखर न रहा,वे चाकी न रही
अब मेरे गाँव मे------
पहली सी दिवाली न रही.

@@@रचनाकार----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला---जौनपुर पिन नं.222002 (उत्तर-प्रदेश)
Mo.no.7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

Thursday, 25 July 2019

(ब्राह्मन और तुर्क)

(ब्राह्मन और तुर्क)
लड़ गये थे-----------------
ज़मीने हिंद की खातिर,
कभी इस कबीले के बुज़ुर्ग।
बटे नही एक थाली थी खाने की,
साथ बैठे थे ब्राह्मन और तुर्क।
वे बुत और सुखा दरख्त,
एक किस्सा है!
चादर पोशी करो लगाओ तिलक,
ये मिट्टी शहीदो के लहू से---------
हुई थी सुर्ख।
ये नज्म़ नही------------
हर हर्फ है मेरा ऐहसासे बिस्मिल,
जगा रहा हु फिर कबीले को,
कि ना लड़े,ना जलाये कोई घर
ब्राह्मन की हिफ़ाज़त मे हो नमाज़,
और नौरात्र मे गले से मिले तुर्क।
लड़ गये थे-----------------
जमीने हिंद की खातिर एै,रंग
कभी इस कबीले के बुज़ुर्ग।

Tuesday, 16 July 2019

(बाँहो मे भर नही पाये)

(बाँहो मे भर नही पाये)
हमने साँस-साँस भर लिया उन्हे-----
वे इतने के बाद भी,मेरे हो नही पाये।
मै आँख में बसा के उन्हे देखती रही,
वे अपनी आँखो में हमे,
कभी भर नही पाये।
मै आयते कुरान की तरह,पढ़ती रही उन्हे
वे एक लफ्ज़ भी वफा़ का,
मेरी पढ़ नही पाये।
मै उतर गई उनमें कर शौहरे यकीन,
वे एक रात भी हमे हमारी हक से,
एै,रंग----अपनी बाँहो में भर नही पाये।

(अनार से महंगा टमाटर खा रहा हूं)

व्यंग्य---(अनार से महंगा टमाटर खा रहा हूं )
आ गये अच्छे दिन---------
मै इलू-इलू गा रहा हूं,
अनार से महंगा टमाटर खा रहा हूं।
मार्केट से सभी सब्ज़ियाँ तो ले ली,
पर टमाटर को लेने मे लग गये घंटो,
क्योंकि सभी एक से भाव मे बेच रहे थे,
यहाँ तलक कि टमाटर को बीना मतलब छुने से रोक रहे थे,
थक-हार एक ठेले वाले को पटा रहा हूं------
बड़ी  मुश्किल से घर टमाटर ला रहा हूं,
अनार से महंगा टमाटर खा रहा हूं।
बीबी भी सबसे पहले सब्ज़ियो के झोले से,
टमाटर टटोल कर निकालती है,
और पुछती है क्या भाव पाये,
कैसे कहु कि हे!भाग्यवान तुम अपने टमाटर खाने का शौक,
काश सस्ते होने तलक टाल पाती,
लेकिन नही,तुम नही टाल पाओगी,
तुम्हारे इसी न टालने के नाते,
अपनी एक महिने की सेलरी का तीस पर्सेंट खर्च कर,
बस मै तुम्हारे लिये टमाटर ला रहा हूं।
आ गये अच्छे दिन-------
मै इलू-इलू गा रहा हूं,
अनार से महंगा टमाटर खा रहा हूं।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no,----7800824758

Monday, 15 July 2019

(हमारी मोहब्बत है)

(हमारी मोहब्बत है)

ये पहाड़
और धुंधलि सी शाम,
और ढेरो सायबान-----
हमारी मोहब्बत है.

धिरे-धिरे हौले से चलती ठंडी हवा,
तेरा शर्माना ,सकुचाना मेरी बाँह मे,
और चारो तरफ फैला गुलाबी आसमान----
हमारी मोहब्बत है.

हर तरफ एक संगीत,
चरवाहो की बाँसुरी
और अपने-अपने काम से लौटती ,
पहाड़ी लड़कियों की खिल-खिलाहट,
अपने घोसलो की तरफ लौटते हुये परिंदे,
के चह-चहाने की मीठी जुबान,
हमारी मोहब्बत है.

आओ अब हम भी चले,
एक-दुजे का हाथ थामे,
कुछ बतियाते, सपने बुनते
और घर आते-आते जो निकल आये चाँद,
हमारी मोहब्बत है.

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर
जौनपुर----222002 (उत्तर-प्रदेश).
no. no. ----7800824758.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है ।

Sunday, 14 July 2019

(शराब नही लेकिन)

         (शराब नही लेकिन)    

तेरी सरिया मे शराब नहीं लेकिन-----------
हम पीने वालो के लिये खराब नही लेकिन.

हम बाँट लेते है अक्सर नशे मे जूठन भी-----
यहाँ के पंडित और मियाँ का जवाब नही लेकिन.

तेरी सरिया मे शराब नही लेकिन।
ना वे गीता जानता है और न मै कुरान की आयत,
जबकि उसका घर मंदिर की तरफ है,
और मेरा घर मस्जिद की तरफ है,
हमारे लिये जुम़ा और मंगलवार एक सा है,
हम पीते है,किसी दिन का हमारे पास एै"रंग"-----
कोई हिसाब नही लेकिन.

तेरी सरिया मे शराब नही लेकिन,
हम पीने वालो के लिये खराब नही लेकिन----
तेरी सरिया मे शराब नही लेकिन।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.----7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

(फिर घिरे आज बादल)

(फिर घिरे आज बादल)

सारे शहर में फिरे आज बादल,
तुम्हे देखकर फिर घिरे आज बादल।
है तेरी हुस्न के ये बादल भी मारे,
ये जाना सनम--------------
जब तुम्हे चुमने की हसरत लिये,
आपस मे ही खुद भिड़े आज बादल.

सारे शहर में फिरे आज बादल,
तुम्हे देखकर फिर घिरे आज बादल.

मांगा सभी ने पानी मगर,
ना सुनी बादलो ने-------
किसी की दुआ!
वे तो तुम थी हमारे शहर में सनम,
जो बूँद बनकर ज़मी पे गिरे आज बादल.

सारे शहर में फिरे आज बादल,
तुम्हे देखकर फिर घिरे आज बादल।

###हमारे शहर में आज लगातार बादल घेरे हुये है अब बरसात कितनी होती है ये बात की बात है।

Saturday, 13 July 2019

(शीकारे वाली लड़की)

(शीकारे वाली लड़की)
मुझे बार-बार याद आती है,
वे शीकारे वाली लड़की!
डलझील की मदमस्त लहरो को,
वे उसका एकटक देखना,
फिर जादुई हँसी,
हाय!जाने कहाँ खो गई,
वे अदभुत नजारे वाली लड़की,
मुझे बार-बार याद आती है,
वे शीकारे वाली लड़की।
वे उसका तिलिस्मी बदन,
और उसके जुड़े से निकलती वे गुलाब की खुशबू,
अब कही नही मिलती सुघने को,
और कही नही दिखती मुझे,
वे लश्कारे वाली लड़की,
मुझे बार-बार याद आती है,
वे शीकारे वाली लड़की।
पहाड़ो की वे ढ़लती शाम,
वे संगीतमय आवाजे,वे बाँसुरी के स्वर
कही कुछ नही!
बस तन्हाई मे यादो की चंद तस्बीर,
जो हवाओ के झोके से फड़फड़ाती है,
और मै निकल आता हु यादो से उसकी,
बस रह जाती है याद जेहन में,
वे शीकारे वाली लड़की।

###न जाने कब घाटियो मे अब अमन के दिन लौटेगे,न जाने फिर कब डलझील में दिखेगी हम शायरो और कवियो की वे शीकारे वाली लड़की।

Saturday, 6 July 2019

(जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है)

(जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है)
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है,
जिसे मोड़कर कई दिनो से यूँही रख दिया है,
कि समय मिलते ही फिर उस पृष्ठ को खोल पढ़ुगा,
अपने जीवन के हूबहू घटनाओ की वे तमाम बाते,
यानी की गतांक से आगे---------------
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है।
तमाम उठा-पटक झंझावतो का जीवन,
कही कोई विदेशी रोमांटनिजम नही,
एक विछोह,एक दर्द,
हर पृष्ठ के कथनांक के आगे--------
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है।
इसी मोटी सी किताब को,
कुछ लोग लुगदी साहित्य कह,
यू छिटक जाते है जैसे मंटो की भूखी नायिका,
अपने से ज्यादा नंगो को देखती है,
अपनी काली सलवार और कपकंपाती टाँग के आगे-----
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है।
कुछ पन्ने और बचे है पढ़ने को,
कल खत्म कर लुंगा इसे भी,
और बिना मोड़े रख दुंगा,
फिर इच्छा ही नही बचेगी इसके पढ़ने की,
क्योंकि पता चल जायेगा कि क्या कुछ लिखा है,
एै"रंग" इस नावेल मे गतांक से आगे-------
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758