Monday, 31 January 2022

(मोहब्बत की कोई हद न थी)
मोहब्बत की,कोई हद न थी,
सब कुछ था,कोई सरहद न थी।
उड़ता था दिले परिंदा दुर तक,
ऐ,रंग-
नियत किसी की बद न थी।
(नट की बिटियाँ)
कहां उसकी माँ ने उसके बाल सवाँरे,
कहां उसकी माँ ने बनाई उसकी चुटियाँ।
वे स्कूल के सामने की सड़क पे,
टिन बजाके करतब दिखाती रही,
फिर कटोरे के चंद सिक्के,
फटी झोली में भर आगे बढ़ गई-------
करतब दिखाने नट की बिटियाँ।

Thursday, 27 January 2022

(रुप का आचमन करना)
मै इस ज़मी पे--------------
किसी देवता के प्याले से छलक आई हूँ!
एै"रंग" जरा संभल के-------------
मेरी रुप का आचमन करना।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

Sunday, 23 January 2022

(मुल्क की याद आती है)
इस गैरे मुल्क में-----------------
बड़ी शिद्दत से मुझे अपने मुल्क की याद आती है।
खोल देता हूं खिड़कियाँ,
और घंटो टहलता हूं कमरे मे-------
जब रात आती है!
अपने मुल्क की याद आती है।
तकता हूं चाँद तो बीबी का चेहरा नुमाया होता है,
याद फिर उसकी हर बात आती है!
अपने मुल्क की याद आती है।
तारे जैसे हो मेरे मासूम बेटे,
उन तारो से गुफ्तगू करता हूं,
लेकिन उन्हे जब प्यार करने को बढ़ाता हूं हाथ,
तो बस खाली हाथ रहता है,
मेरे हिस्से यही इतनी सी सौगात आती है!
अपने मुल्क की याद आती है।
फिर खिड़की से---------------
अंदर आती है एक झीनी सी रौशनी,
जैसे मेरे अब्बु की दुआ!
फिर हवा की एक ठंडी छुवन मे अम्मी की मोहब्बत,
उफ!ये रोटी,ये दोज़ख की बेबसी
कि सहर होने तलक-------------
अपने घर के हर शख्स की जरुरत,
और बहन के निकाह की-----------
याद बस इमदाद आती है!
इस गैरे मुल्क मे------------
बड़ी शिद्दत से मुझे अपने मुल्क की याद आती है।
## # मुल्क से बाहर कमा रहे एक शख्स के अंतरमन की व्यथा।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758
(26 जनवरी है)
कीटनाशक पी के-----------
अभी ख़ुदकुशी किये किसान की लाश,
उसके खेत की मेड़ पे पड़ी है-----------
सुना है आज 26 जनवरी है।
एकटक तके जा रही उसकी बिटिया,
अपने बापु की लाश को,
क्या करे बेचारी रो भी तो नही सकती,
अपने भाई और बहनो मे सबसे बड़ी है,
तभी वे अपने जवान सिने से दुपट्टा उतार,
ढ़कती है अपने बापु की लाश,
उसकी पैबन्द लगी सलवार का यू नंगा होना,
साबित करता है कि----------
अभी बहुतो से दुर इस देश मे 26 जनवरी है।
बस कुछ देश लुटने वाले घंटो बोलेंगे भाषण देंगे,
इशारो पे तालियाँ बजाई जायेगी,
इन्ही के अगल- बगल किमती सोफे होगे,
पांव तले मसलने को दरी होगी,
शायद एै "रंग" इतने ही लोगो तलक पहुँची-----
हमारे इस देश की 26 जनवरी है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758
जोधा-अकबर और पद्ममावत फिल्म में डायरेक्टर के द्वारा हमारे गौरवशाली इतिहास के साथ की गई छेड़छाड़ के बिरोध में लिखी एक रचना.

(जोधा-अकबर और पद्ममावत क्यू है?)

बता एै सिनेमा-
आखिर तुम्हें हमारी इतिहास से,
इतनी अदावत क्यू है?
तेरे दामन मे-----
जोधा-अकबर और पद्ममावत क्यू है?.

सवाल है मेरा तुझसे,
कि सिनेमा के वे--
सेंटीमेंटल सीन और अंतरंगता,
कोई मनोरंजन नही,
ये इतिहास की पद्ममिनी का,
सीने से खिचा आँचल है,
हद तो ये है कि,
इतने टुच्चे सिनेमाकारो के साथ आखिर--
हमारे यहाँ की अदालत क्यू है?.

ठीक है माना कि,
पद्ममावत जायसी की है,
लेकिन एक तरफ "लव माई बुरका" पे रोक,
लगाने वाली अदालत बता,
कि पद्ममावती हर सिनेमाघर मे लगे,
आखिर ये तेरी---
दो मुँही इजाज़त क्यू है? ।
तेरे दामन मे---
जोधा-अकबर और पद्ममावत क्यू है?.

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Friday, 21 January 2022

(आईनो पे गीत लिखे)
हमने टुटे हुये ख्व़ाबो पे गीत लिखे,
सारी रात तड़पे हुये चिरागो पे गीत लिखे।
लोग कहते रहे कि-------
उसके घर का आईना खुबसुरत है,
ऐ,रंग---हमने उसी के हाथो टुटे हुये,
कई आईनो पे गीत लिखे।

Sunday, 16 January 2022

(पुराना खत)
बड़ा संभाल के रंखा है,
तेरी याद की दराज़ में------
हमने पुराना ख़त।
तु बिछड़ी,जुदा हुई हमसे,
फिर भी ये शकु था कि,हमसे ना मांगा--
तुमने पुराना ख़त।
है ये ख्व़ाहिश कि गर----
आखिरी हिंचकी भी आये,
तो मेरी तकिये के नीचे से----
निकले पुराना ख़त।
ऐ,रंग----वे लाश-ए-दफ्ऩ पे भी,
नही आयेगी,
उसे उसकी मजबुरियाँ रोकेंगी,
पर गम नही,
बस मेरे कब्र-ए-सिरहाने कोई चराग नही,
जलाना पुराना ख़त।

Thursday, 13 January 2022

(चैन से सोने नही देगी)
मेरा कत्ल-
तेरी जिंदगी का आखिरी होगा।
तडपोगे,ऐ रंग-जब मेरी चीख,
तुम्हे चैन से सोने नही देगी।
(तेरी कोख़ माँ)
कौन जाँचेगा तेरी कोख़ माँ,
लड़ खड़ी हो ज़माने से,
तु भी है एक बेटी ये सोच माँ।
कौन जाँचेगा तेरी कोख़ माँ।
दे प्यार,लोरियाँ गा,मेरा हक दे,
उठा!एक बेटे की तरह,
मुझको भी ले अपनी गोद माँ।
कौन जाँचेगा तेरी कोख़ माँ।
उगने दे ये चाँद,उतरने दे अपने आँगन,
मै यकीन दिलाती हूँ-----
कि तुम अपने बेटे से भी ज्यादा करोगी----
एक दिन इस बेटी पे नाज़ माँ।
कौन जाँचेगा तेरी कोख़ माँ।

सेब द चाइल्ड।
संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत त्रेमासिक पत्रिका "प्रणाम पर्यटन " का इस नववर्ष मे प्रदीप सर के बहुमूल्य आशीर्वाद के साथ मिलना, मेरे लिए गर्व की बात है.

Tuesday, 11 January 2022

(बाँहो मे गीत रोये)
गज़ल की बाँहो मे गीत रोये,
रोये शहनाई तेरी याद की,
तो बाँसुरी भी लबो से भीग रोये।
गज़ल की बाँहो मे गीत रोये।
एक तरफ तेरे इंतज़ार की श़मा,
तो दुसरी तरफ विरह के दीप रोये।
गज़ल की बाँहो मे गीत रोये।
लौट आ ऐ,रंग----फिर से मेरी दुनिया मे,
कि तेरी प्रीत रोये।
गज़ल की बाँहो मे गीत रोये।