Sunday, 30 April 2023

बीते हुये बचपन की एक कसक------------
                         (चुरन और इमली)
स्कूल की छुट्टी के समय--------------
जब अपनी छोटी बिटिया की अँगुली पकड़े लौट रही थी,
तो अचानक------------
वे अपनी नन्ही अँगुलियो को छुड़ा बहुत खुश हो उछली,
तो देखा सामने लकड़ी के गुटके में,
रंखे बेच रहा था एक बुढ़ा-------------
चुरन और इमली।
मेरी जेहन में-----------
वे बचपन के चटखारे याद आये,
मै भी तो एैसी ही थी बिल्कुल अपनी छोटी बिटिया सी,
लेकिन समय के पंख के साथ,
सब कुछ बदलता गया,
और न चाह के भी बड़ी होती गई,
इत-उत उड़ने और खुश रहने वाली----------
ये बचपन की तितली।
फिर बेटी ने झिझोड़ मम्मी-मम्मी कहां तो मेरी तंन्द्रा टूटी,
पर्स से निकाल उस इमली वाले के पैसे दे,
घर चल पड़ी------------
और रास्ते भर खाती रही अपने में मस्त हो,
उसी चटखारे के साथ,
जैसे कभी मै खाया करती थी एै"रंग"---------
ये चुरन और इमली।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-------7800824758
अलविदा रोहित सरदाना 😢😢😢😢

(आज-तक )

अब कौन पुछेगा ?
आखिर सवाल,
इस दोगली सियासत से,
कि बताओ?
आखिर कब तक पहुंचेगी,
तुम्हारी वे सरकारी राहत,

गाँव के मंगरू
और 'मंगल "
की जलती चीता
और उसके पुरे घर में उड़ती,
हुई भूख कि----
"खाक तक".

लेकिन,
वे अब नहीं पुछेगा,
अपनी डिबेट के "दंगल" में
खामोश हो गया,
हमारा एंकर,
हमारा हीरो 

अब हमारी रिमोट भी,
नहीं ढूढ़ेगी,
शाम 5 बजे का "दंगल "

बस हम सहेजेंगे 
"रोहित सरदाना" को,
अपनी याद में,
और देख लिया करेंगे,
कभी-कभी,
महज़ तुम्हारी खातिर
एक चैनल की तरह
"आज-तक ".

रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
Mo. no.,7800824758
आज ही के दिन ऋषि कपूर भी दुनिया छोड़ गये उफ़ !

(हिना )

उफ़ ! जा नहीं पाई 
इस फानी दुनिया से
तेरे संग "हिना ".

अब रोएगी सीसकेगी
तेरी याद में
हर लम्हें, हर रोज,
पर लिख नही पायेगी 
फिर से हथेली पे
तुम्हारा नाम----
ये तुम्हारी "हिना ".

देख तेरी नीतू--
नीतू ना रही, 
उफ़ ! बनके रह गयी,
एक औरत से---
बदरंग "हिना ".

रंगनाथ द्विवेदी 
जौनपुर (उत्तर-प्रदेश )
Mo.no.7800824758

Saturday, 29 April 2023

(रुबाई बेच देना)
गर किसी भूखे को रोटी मिल सके,
तो बड़े शौक से ऐ,रंग--------
किसी रईस को,
मेरी रुबाई बेच देना।
छत्तीसगढ़ के सुकमा मे हमारे शहीद सीआरपियफ(C R P F) के जवानो की शहादत पे लिखा एक हृदयस्पर्शी लेख।
                 (छत्तीसगढ़ सुकमा और हमारे शहीदो के तीन सौ कातिल)
मै किसी भी राजनैतिक पार्टी पे किसी भी प्रकार का दोषारोपण नही करता और नही उनके राष्ट्रभक्ति पे सवाल उठाता हूँ।लेकिन मेरे साहित्य के संवेदना की वे आँख भर आती है,जो आँख किसी माँ के उस एकलौते शहीद बेटे को देख व उसके चित्कार को सुन बिचलित से हो जाते है।
जब कोई रोती हुई बहन आँख मे आँसू लिये अपने एकलौते शहीद भाई कि वे कलाई टटोलती है"जिसपे अब तलक उसने अपनी संवेदना की राखी का न टुटने वाला वे डोर बांधा था"।
उस शहीद के पत्नी की पथराई उम्मीदे जिसके आँखो से आँसू भी नही टपकते बस वे एकटक"तिरंगे मे लिपटे अपने उस शहीद पति को तकती है उसका ये तकना मेरे इस साहित्यिक हृदय को-----उन नक्सलियो के गोली की तरह भेद देती है"।
उस शहीद के बुढ़े बाप को देखो जिसके बुढ़ापे मे स्वस्थ रहने के चर्चे पुरे गाँव मे थे"आज उसी को अपने चार वर्ष के पोते को पकड़ कंपकपकता देख के लग रहा कि आज उसकी पिड़ा विश्व की सबसे असह्य पीड़ा है"।
ये एैसी पीड़ा है जहां मेरे लेख के शब्द गौड़ और मौन है।
ये हमारे देश की एक बड़ी दुखांत विडंबना है कि हम अपने ही घर,देश और राज्य मे"तमाम तरह के शौकिया कैंसर पालते है"।
गौर करेंगे तो ये नंगे,पुरी आजादी के साथ राष्ट्र,राष्ट्रगान और राष्ट्र ध्वज को अपमानित करते हर कही दिख जायेंगे,हां कभी इनका विरोध बस कुछ
तथाकथित विद्वानो तक सिमट कर रह जाता है फिर अगली कोई एक नई घटना होने तलक ये मौन साध लेते है अर्थात अपने धैर्य और संयम के उस बस्ते मे डाल लेते है"जिसमे पहले से ही हमारी नपुंसकता के बेगैरत तमाम समान पहले से ही एक रद्दी के न खुलने वाले गट्ठर की तरह पड़े है"।
अगर एैसा न होता तो छत्तीसगढ़ का वे सुकमा जहां बाइज्जत और बेखौफ हमारे सीआरपियफ(C R P F) के जवानो का कत्ल होता है और हमारी सियासत रटे-रटाये कई सालो के वे--"धैर्य के जुमले को जब अपने होंठ खोल इस्तेमाल करती है तो लगता है कि------एक मर्तबा और हमारे देश के जघन्य और क्रुरतम नक्सली कातिलो की विजय हुई"।
इस हृदय विदारक घटना से,मेरे मानस पटल पे कुछ न समझ आने वाले प्रश्नो का रेखांकन होता है वे प्रश्न पीड़ित से रह जाते है!क्योंकि उसके उत्तर के मूल में हमारे सरकार की न समझ आने वाली वे शक्ति है जिसका हमने कभी भी इस्तेमाल होता नही देखा।
"वे शक्ति है इच्छा शक्ति जिसे अगर सरकार चाहे तो इतना बाखूबी इस्तेमाल कर सकती है कि भविष्य में----हमारे ही आस्तीन के ये तीन सौ नक्सली साँप कभी भी देश के किसी भी सुकमा के जंगल मे खो नही सकते"।
मै दावा करता हूं कि वे तीन सौ नक्सली अब भी हमारी सरकार की उस रडार पे है"जहां इनकी रीढ़ को तोड़ हमेशा के लिये पंगु किया जा सकता है,क्योंकि एक,दो नही ये तीन सौ है!जो किसी मैजिक से नही बल्कि योजनाबद्ध बुलाये व गोलिआये गये है"।
मै अपने लेख से ये गारंटी और दावा करता हूं कि छत्तीसगढ़ के उस सुकमा मे अब भी मेरे जवानो के तमाम कातिल होंगे।
हे!मेरे देश की सियासत इन शहीदो की शहादत-----"का यलगार लो इन्हें केवल तुम्हारें नम आँखो की विदाई या वे तीस लाख का चेक नही चाहिये जिसे तुम आज कितने वर्षो से दे रहे हो"।
"हाँ अगर दे सकते हो तो तिरंगे में लिपटे उन तमाम शहीदो की रुह और आत्मा को वे मादरे शुकून दो जिसके लिये-------हमारे देश का जवान बड़ी फक्र और मोहब्बत से शहीद होता है"।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-------7800824758
महान अदाकार इरफ़ान का जाना काफी दुःखद. 
        
(पान सिंह तोमर )

वे तुम्हारा किरदार, वे बोलती आँखे 
उफ़ ! यकीन नही हो रहा---- 
कि तुम चले गये 
हम लोगो के दिलो की चाहत के, 
बिहड़ से------
ऐ "पान सिंह तोमर ". 

ये तुम्हारे ना रहने का खालीपन, 
शायद फिर भर ले सिनेमा, 
लेकिन तुम्हारे किरदार के किस्से  
ज्यो की त्यों 
हमारी यादो की बिहड़ में, 
गूँजते रहेंगे-------
ऐ "पान सिंह तोमर ".

@@@रंगनाथ द्विवेदी 
जौनपुर mo. No. 7800824758

Friday, 28 April 2023

(बिधवा हो गई मधुशाला)
बंद करो मंदिर के पुजे,
बंद करो अजान सभी!
शायद तुमको खबर नही----
कि बिधवा हो गई मधुशाला।
आओ-आओ साथ चले हम,
लेके दारु की बोतल!
और एक हाथ में हम प्याला,
ताकि उसकी रुह कहे न,
कि देकर धोखा सब यारो ने,
शायद खुद ही पी डाला।
या रब दे उसको तु ज़न्नत,
जो यार था अपने मैखाने का,
देखो सब पीने वालो ने----
एक-एक ढ़क्कन डाला।
यहाँ अब न रहेगी वे रौनक,
और अब न सज़ेगी वे महफ़िल,
अब तो दर्द सहेगी ये,
भला कौन रहा सुनने वाला।
बंद करो मंदिर के पुजे,
बंद करो अज़ान सभी,
शायद तुमको खबर नही----
कि बिधवा हो गई मधुशाला।

@@सभी पीने वाले मृत आत्माओ को मेरे कलम
की तरफ से एक श्रद्धांजली।

रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी, मियाँपुर
जौनपुर---222002 (उत्तर-प्रदेश)
no.no.---7800824758
आज हिन्दू और मुसलमान की कड़वाहट के बीच शायद थोड़ी सी राहत दे जाये, मजहब ना जानने वाला ये बच्चा.

(मकान से अच्छा )

वे अपनी तोतली जुबान से बोलता है----
किसी भी हिन्दू या मुसलमान से अच्छा.

मुझे बहुत खूबसूरत लगता है---
वे गली मे नंगा खेलता बच्चा. 

क्या?करुंगा जा के मै मंदिर या मस्जिद में,
मुझे पता है कि---------
तुम बांध दोगे बंदिशो मे एक दिन इसे भी,
ये भी समझ जायेगा जाती और मज़हब,
और बन जायेगा ये खो के अपना बचपना,
हमारी गीता और तुम्हारे कुरान का बच्चा.

तब तलक तो तक लु इस मासुम से बच्चे को,
जो खुद मे खो बना रहा मिट्टी से एै"रंग"----
एक घर इस शहर मे हर मकान से अच्छा.

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758
(एक अलहदा जुबां है)

भरी बज्म में बिना बोले 
दोनो ने बात कर ली.
ए,रंग-
खामोंशी भी मोहब्बत की
एक अलहदा जुबां है.

Thursday, 27 April 2023

(ननिहाल है नेपाल)
पुरी ठंड़ी पहना है तेरा स्वेटर------
और ओढ़ा है तेरा साल,,,,,,,,,,,,,,,
माँ अक्सर कहती थी कहानियाँ-------
अपने राम के लव-कुश की,,,,,,,,,,,,,,
माँ है नेपाल।
ऐ,रंग--इस रिस्ते से-----------
हम सभी लोगो का ननिहाल है नेपाल।

नेपाल से हम सभी लोगो का एक संवेदना का रिस्ता है,,उस नाते मै आज़ अपने इस लेख के पढ़ने वालो से मार्मिक अपिल करता हूँ कि दूःख की इस घड़ी मे जो थोड़ा बहुत संभव हो अपने स्तर से नेपाल का सहयोग अवस्य करे!धन्यवाद।

Tuesday, 25 April 2023

नक्सली हमले मे शहीद एक सिपाही के बुढ़े बाप की आँख नम करती पीड़ा।
                   (बुढ़े पिता का कंपकपाता हाथ)
कल शहीद----------
की चीता जला रहा बाप रो रहा था!
तभी किसी ने कंधे पे हाथ रखा,
तो वे चीख पड़ा-----------
कि रहने कंधे पे मत रखो,
इस देश के ये नपुंसक हाथ जरुरत नही।
गर इतनी ही सहानुभूति है मेरे शहीद बेटे से,
तो कहो देश की सियासत से---------
कि ला दे उन तमाम नक्सलियो के कटे हाथ,
नही ला सकता न जानता हूँ।
इसी जगह फिर सजेगी---------
कुछ फौजी बज़ायेंगे मातमी धुन,
और अपने शहीद बेटे की चीता को आग देगा------
किसी बुढ़े पिता का कंपकपाता हाथ।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
7800824758

छतीसगढ़ मे शहीद सी आर पी यफ के उन जवानो को मेरी श्रद्धांजलि।
मजदूर दिवस के उपलक्ष मे लिखी एक यथार्थ कविता।
                             (पाँव रिक्शा)
चेहरे पे एक थकन--------
होंठो पे सुलगती बीड़ी!
पेट भरने की खातिर----------
सिने से खिचने को पाँव रिक्शा,
बाबू यही है अपना किस्सा।
तपती डामर की सड़क पे,
हर रोज लिखते है अपनी भूख,
बाबू यही है हमारी जिंदगी,
और सिने से खिचने को पाँव रिक्शा,
बाबू यही है अपना किस्सा।
कभी किसी पुलिसिये की बेज़ा गाली,
बीन किराये के उतरना,
चेहरे पे चंद थप्पड़,
और पसीने से भीगे तर-बतर चेहरे को,
मैले गमछे से पोछना,
फिर आगे बढ़ जाना पिके गुस्सा,
पेट की खातिर---------
सीने से खिचने को पाँव रिक्शा,
बाबू यही है अपना किस्सा।
छोटे बच्चे,बीमार बीबी,टपकती छत,
अपनी घर से दुर खुले आसमान तले,
सुलगती बीड़ी फुटपाथ,
और अपने दाहिने हाथ से,
लोहे की सिकड़ी से बांध लगा ताला,
ठिक सिरहाने सारी रात खड़ा,
मेरी जिंदगी की तरह पाँव रिक्शा।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
mo.no.-----7800824758
बाबाओ की अय्यासी व उनके रासलीला को लेके बहुत पहले लिखी मेरी एक कविता.
                     
(जापानी तेल लगाओ----राधे माँ)

तुम भी अब स्वर्ण-भस्म और शीलाजीत सी-------
कोई दवाई खाओ---राधे माँ।
बर्दाश्त नही हो रहा आशाराम और राम-रहिम से,
स्याह कोठरी का खालीपन,
किसी बगल की बैरक मे कैसे भी हो-------
तुम आ जाओ--राधे माँ।
स्त्री-गामी संसर्गो का स्वर्ग छिना,
नरक हो गया जीवन,
इस जीवन की रति-सुंदरी कि काया का------
कुछ तो दरस कराओ--राधे माँ।
हम बाबाओ के अच्छे दिन चले गये,
मालिश,काजू ,पिस्ता सब ख्वाब हुआ,
आश्रम मे पोर्न बहुत देखा,
कही नपुंसक न हो जाये हम बाबा,
अपने प्रेम का कुछ दिन ही सही,
तुम आके यहाँ गुजारो--राधे माँ।
सारे आसन कामुकता के फिर से जीवित हो,
तुम भरके हथेली मे अपने थोड़ा सा,
ये जापानी तेल लगाओ--राधे माँ।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.------7800824758

Sunday, 23 April 2023

(आशिकी-2 का रिंगटोन बजता रहा)
वे अपनी कलाई की नशे काटकर हँसता रहा------------
उसकी आँखे मूँद गई और उसकी मोबाईल पे---------
ऐ,रंग--आशिकी-2 का रिंगटोन बजता रहा।
बेटियो और बच्चियो के हर रोज हो रहे बलात्कार पे लिखी रचना.
                         (भयावह जंगल)
शहर की भीड़ मे भी हमने देखा है---------
कुछ आदमियो के अंदर का भयावह जंगल.
मासुम सा सीधा-साधा सा दिखने वाला-----
किसी बच्ची का अकेले मे जब रेप करता है,
और होठो पे कुत्सित हँसी दिखती है तो लगता है,
कि एक कमजोर सी चिड़ियाँ,तड़पेगी,चिचिआयेगी,
रहम की भीख मांगेगी,
मगर फिर भी निगल जायेगा उसे------------
इस शहर के कुछ आदमियो के अंदर का भयावह जंगल.
उसके पंख तितर-बितर हो जायेगे,
सबकुछ हा सबकुछ छिन लेगा,
चिड़ियाँ डरेगी,कापेगी,थरथरायेगी---------
फिर भी मजबुरी है जीना उसे भी ये भयावह जंगल.
उसकी डरी-सहमी खुली आँखो मे ये सवाल,
निरूत्तर सा रहेगा कि आखिर चिड़ियाँ,
किस नीड़,किस डाल,किस छाह जाये,
इस डर से वे रोज मरेगी,
बहुत घुटन है इस भीड़ मे,
बिटिया और चिड़ियाँ अब एक सी ही है,
न जाने दोनो को कब निगल जाये,
शहर के बाहर-----------------
और शहर के अंदर का भयावह जंगल.

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी, मियाँपुर
जौनपुर-----222002 (उत्तर-प्रदेश).
no.no.----7800824758
(तु मेरी आवारा लत है)
तड़प-तड़प के मर जाऊँगा,,बे-शक मै----
पर नही छोड़ पाऊँगा तुझको--------
तु मेरी आवारा लत है।
(मुमताज़ की आँखे)
है सबसे खुबसुरत मेरी मुमताज़ की आँखे,
कितना कशीश,कितना नशा लिये है-----
मेरी मुमताज़ की आँखे!
कभी यहाॅ उठे,कभी वहाँ उठे,
है कैमरे से कही अच्छि--------
मेरी मुमताज़ की आँखे।
है मेरा दिले परिंदा परवाज़ को बेचैन,
ऐ,रंग---आसमाँ है मेरी मुमताज़ की आँखे।
आदरणीय प्रधानमंत्री के निर्णय से पहले हमने एक कविता लिखी थी "लाल बत्ती" जो आज अचानक प्रासांगिक हो चुकी है,इस कविता को ले के बस इतना ही कहना है कि इसे बस औपचारिक भर पढ़ना है तो न पढ़े ये मेरे लेखन पे कृपा होगी अगर आप पुरा पढ़ेगे।

                             (लाल बत्ती )
हमसे पूछो कि कौन रही? लाल बत्ती,
एक दागी विधायक---------------
जब अपने फार्म हाऊस पे,
किसी अबला का रेप कर रहा था,
तो उसकी चीख और सिसकी सुन के,
किसी पत्थर का कलेजा भी पिघल जाता,
लेकिन बाहर------------------
इस होते हुये बलात्कार पर भी मौन रही लाल बत्ती।
दंगे हुये,मौते हुई 
सलमा,रजिया,गुड़िया,लक्ष्मी 
सभी तो मरी लेकिन इन्हें भी,
यादव,पंडित और मुसलमान कहा गया,
बहुत पीड़ा हुई,
जब एक वर्ग को बचाके स्याह रात को,
सरकारी दंगे हुये,
कान पे इसके जूँ तलक न रेंगी,
बल्कि ये जिस गाड़ी मे लगी थी उसी में बैठे मंत्री जी,
शराब के पैग छक रहे थे----------
और लखनऊ की तरफ जा रही थी लाल बत्ती।
थाने बिके,
न्याय गया तेल लेने,
शहर के होटलो मे महिना बंधा,
जूआ और जिस्मफ़रोशी हुई,
ऐस.पी.,डि.यम.,जज सभी तो थे,
लेकिन ये कही और बजा रहे थे------------
एक आम आदमी के न्याय और उसके उम्मीद की लाल बत्ती।
सच इसे अब उतर जाना चाहिये,
क्योंकि जब मै इसे तकता हूँ तो लगता है,
कि जैसे बहुत सारी बेगुनाह लाशो के खून से,
रंगी है एै"रंग"--------------
हमारे देश की हर लाल बत्ती।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
7800824758

Saturday, 22 April 2023

(मूफ्ति-ए-शहर का)
इल्ज़ाम है मेरे सर,,जब से मोहब्ब़त का,,,,,,
ऐ,रंग--तब से--------------
मेरे खिलाफ़ फतवा है,मूफ्ति-ए-शहर का।

Thursday, 20 April 2023

(मैं कुल्हड़ हूँ)

मैं कुल्हड़ हूँ,
मैं इतनी खूबसूरत
और सुघर
यूँ हीं नहीं हूँ,
मुझे मेरे कुम्हार नें --
पसीने से तर-ब-तर भीग,
बड़ी मेहनत से गढ़ा है,
फिर सुखने के लिए 
इसने घंटो कड़ी धूप में रख 
मेरी रखवाली की,
सुख जाने पे,
मेरे कुम्हार ने ---
एक एक कर 
बहुत प्यार से मुझे उठाया
ताकि मैं कहीं से
फूटूं न ,उसी प्यार से फिर मुझे
मेरे कुम्हार ने,
आवें मे रख मुझे पकाया
और फिर आवें से निकाल
उसनें मुझे तका
और पूछा, बता तूं ,
कैसी है??
मैंने भी ---
अपने कुम्हार से कहा,कि
तेरी कला ही कुछ ऐसी है, कि
क्या कहूँ??
बस !तू इतना समझ ले,
मेरे कुम्हार ,
मैं पहले सी खूबसूरत
और सुघर हूँ.
मैं कुल्हड़ हूँ.

@@Rangnath Dwivedi..

Wednesday, 19 April 2023

(मासूम को दूध)
जींस टी-शर्ट मे सिमटा माँ का वजुद,,,,,,,,,,
अब फिगर बिगड़ने के डर से,,,,,,,,,,,,,,
नही पिलाती ऐ,रंग-------------
माँ अपने मासूम को दूध।
(बजरंग बली चुनाव में है)

न जाने ----
       किस गली, किस गांव में है,
इस बार ----
        प्रभु श्री राम के साथ,
        बजरंग बली चुनाव में है.
ले गये थे ----
       कभी ये राम को,
        चुनावी सबरी के घर,
        बेर खाने,
         तब से राम,
          कश्मीरी पंडितों की तरह उपेक्षित,
           अपने ही देश, शह़र
            और गांव में है.
इन्हें नेता ----
            मंदिर के नाम ठग रहे,
            हाय ! कलयुग में राम,
             अपने भक्त नहीं बल्कि,
              जो इन्हें डूबो दे ,
             ऐसे मल्लाह ,
              और केवट की नांव मे है.
न जाने ----
             किस गली, किस गांव में है,
 इस बार ----
            प्रभु श्री राम के साथ ,
            बजरंग बली चुनाव में है.

@@@ रंगनाथ द्विवेदी
 Mo.no. 7800824758

Tuesday, 18 April 2023

(मोहब्ब़त मूसलमां थी)
मोहब्ब़त हम दोनो मे बे-पनाह थी,,,,,,,
फिर भी न मिल सके,,,,,,,
ऐ,मै ब्राह्मण था और-----------
मेरी मोहब्ब़त मूसलमां थी।

Saturday, 15 April 2023

(पाँव के पायल की तरह है)
जिंदगी------------
मेरी प्रेमिका के पाँव के पायल की तरह है।
वे झुक कभी---------
जब अपनी नर्म सी अँगुलियो इसे बांधती है,
तो एैसा लगता है कि जैसे जिंदगी-----------
उसके यौवन से फिसले हुये आँचल की तरह है।
जिंदगी-------------
मेरी प्रेमिका के पाँव के पायल की तरह है।
वे शर्म और हया से लदी झुइमुई सी है,
जब मै देखता हूं एकटक---------
अपनी प्रेम हिरनी को,तो लगता है जैसे जिंदगी,
मेरी प्रेमिका के--------
आँख के काजल की तरह है।
जिंदगी-----------
मेरी प्रेमिका के पाँव के पायल की तरह है।
वे स्याह बाल उसके,
जब कभी खुलते है और खुल के बिखरते है,
तो लगता है जैसे जिंदगी,
मेरी प्रेमिका के बालो मे उतर आये एै"रंग"------
सावन के बादल की तरह है।
जिंदगी--------
मेरी प्रेमिका के पाँव के पायल की तरह है।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
mo.no.-----7800824758
(पकौड़े तलते है)

नेता-----------
हमारी खुशहाली और तरक्की से जलते है.
वरना-------
इसमें गलत क्या है ?
की हम अपनी आत्मनिर्भरता के लिये,
गर किसी फूटपाथ पे,
कुछ घंटे पकौड़े तलते है.
ये हमारी दिवास्वप्न के,
वे जादुगर है,
जो अपनी राजनैतिक खुशहाली के लिये,
एक दूजे को पानी पी कोसते है,
वरना हकीकत है,
ये फैंसी रहनुमा हमारे,
अपने चुनाव की कडाही मे,
कही दिखावे के गेहूं काटते है,
तो कही देखावे के-----
पकौड़े तलते है.
आईये मिलके मतदान करे,
हम जाती नही,
एक अच्छी सरकार की पहचान करे,
खुद बारोजगार हो,
रही नौकरी,
गर मिलनी है तो मिले,
नही तो फिर शर्म कैसी,
आओ बेरोजगारी के खिलाफ,
हम ये पहल करते है,
किसी फूटपाथ पे----------
कुछ घंटे हम पकौड़े तलते है.

@@@रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर pin no.222002 (U P).
मो.नं.7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

Tuesday, 11 April 2023

(निवाले के लिए लेटी हूं )

मैं शरीर नहीं
और ना ही तुम्हारे शहर की बेटी हूं
मैं तमाशा हूं,मेरी फोटो 
किसी अखबार के लिए मत खींचो .

इन खाली बोतलों पर मैंने
अपने छोटे भाई बहनों की भूख का तवा रखा हैं .

धूप तुम्हें लग रही होगी
छाए में खड़े हो जाओ साहब 
तुम्हारे वहा से फेके हुए कुछ सिक्कों से 
इस चूल्हे का ईधन सुलगेगा.

और मैं खुद को 
जब इन बोतलों के इधर उधर पलटूंगी
तो सिकेंगी कुछ रोटियां.

मैं जानती हूं ,कि कुछ लोग
तमाशे की आड़ में 
देखते हैं
मेरी दुपट्टे के उस तरफ का अंकुरण 
उनकी लार टपकती हैं.

वे खाना चाहते हैं
किसी बंद कमरे में उधेड़ कर
मेरे "जिस्मानी पराठे"
लेकिन मैं
किसी आवारा बांह के तकिए से दूर
इस खुरदरे फुटपाथ पर
निवाले के लिए लेटी हूं.

"सर्वाधिकार सुरक्षित" 

रचनाकार----
रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी,मियापुर 
जौनपुर,222002 (U P)
mo.no.7800824758

Sunday, 9 April 2023

(ओढ़नी)
याद है बचपन---------
मैं पहले कहाँ ओढ़ती थी ओढ़नी।
वे तो जब मैं तेरह की हुई,
तो अचानक-माँ ने डाँटना शुरु किया,
और कहने लगी-----------
अब अपने सीने पे तुम रंखा करो ओढ़नी।
मैं चौंकी-----------------
कि ये अचानक माँ को क्या हुआ?
फिर लगा नही कुछ तो है,
यूँही नही माँ रखवाना चाहती होगी----
सीने पे ओढ़नी।
फिर कमरे में बंद कर,
खुद को शीशे में टटोलने लगी,
तो अचानक कुछ शर्म सी आई,
कुछ बदला सा था,
जहाँ माँ ने कहा था-रखने को ओढ़नी।
मै बाहर निकली----------
तो देखा बचपन को खिसकते,
लगा माँ कि कितना सच कह रही थी,
कि तु सयानी हो रही है,
क्योंकि कुछ लोग तक रहे थे,
एै,रंग------वही जहां माँ ने कहा था,
रख लो तुम ओढ़नी।

@@@महिलाओ का चर्चित दैनिक समाचारपत्र"वूमेन ऐक्सप्रेस" मे मेरी कविता "ओढ़नी" को जगह देने के लिये इस अखबार की संपादिका को मेरा आभार।
(भरपेट दूध मिलेगा)
झोपड़ी से------------
नरगिस के सिसकने की,
आवाज़ आ रही है!
ऐ,रंग----आज शायद,
उसके भूखे बेटे को-----
भरपेट दूध मिलेगा।
@@Rangnath dubey

Saturday, 8 April 2023

(झुठे वादे रह गये होंगे)
उदास बगीचे हो गये होंगे,
स्वप्न आँखो से बनके आँसू बह गये होंगे।
विरह झेलती होंगी तेरी तमन्नाये,
तेरे प्रिये के झुठे वादे रह गये होंगे।

@@आज एक अलग नेचर की चंद लाइन।

Thursday, 6 April 2023

(बच्चा पाल रही हूँ मै)
इस सुंदरतम सृष्टि को------
आहुती डाल रही हूँ मै!
दोज़ख में अपने-------
नन्हा सा एक बच्चा पाल रही हूँ मै।
देगा मुझको अपना ही कोई गाली,
ये नाज़ायज है फिर भी-------
कुम्हार की मिट्टी सा,
इसको ढ़ाल रही हूँ मै।
दोज़ख मे अपने-----
नन्हा सा एक बच्चा पाल रही हूँ मै।

@@मेरी एक कुछ लंबी कविता की चंद लाइन।
सलमान की सज़ा फिर जमानत यानि कानून के मंदिर का ये जर्जरपन नही तो क्या है?
                          (ऐतबार आये)
आखिर कैसे?
किसी अपराधी और अपराध मे सुधार आये.
जब एक हिरन के मारने की सज़ा..........
बीस साल बाद आये.
वाह री! कानून की दहलीज़ तेरी जय हो
कल सज़ा आज़ ज़मानत..............
आखिर कैसे?
इस देश के आखिरी शख्स़ का......
तुझपे ऐतबार आये.

@@@रचयिता.....रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी.मियाँपुर
जौनपुर.

Wednesday, 5 April 2023

(आधा शहर कत्ल हो जाये)
उनके निगाहो की है,,,तासीर कुछ ऐसी,,,,
गर तबीयत से देख ले तो,,,,,,,,,,,
दावा है,ऐ,रंग--------
कि आधा शहर कत्ल हो जाये।
(मकान बेच आये)
नीम बेच आये,उसकी छाँव बेच आये!
जीस कमरे मे हमें माँ की लोरी सुलाती थी,
ऐ शहर तेरी ज़वा आगोश की खातीर,
हम वे मकान बेच आये।
(शाम आवारा भटकना चाहता हूँ)
देवताओ से उबन होने लगी है---------
मै कुछ शाम आवारा भटकना चाहता हूँ।
हर एक के ख्व़ाहिश के फूल की तरह,
मै किसी मंदिर-मस्जिद या कब्र पे चढू----
ये गवारा नही,
हाँ मै किसी तवायफ़ के गजरे से लग-----
एक रात ही सही महकना चाहता हूँ।
ये दावते रईशी के निवाले बहुत हुये,
मै किसी फुटपाथ पे-------------
उस हरामी बच्चे की तरह,
अखबार पे सुखी रोटियां रख,
मै भी शहर के नाले की बजबजाती बू के पास,
उस सरकारी नल के पानी से----------
कुछ कौर निगलना चाहता हूँ।
देवताओ से उबन होने लगी है"रंग"-------
मै कुछ शाम आवारा भटकना चाहता हूँ।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758
(इतवार का गम)
ये महज दिवान नही-------
आँसुओ का दरिया है,,,,,,,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----इतवार का गम-------
मेरी चाहते कत्ल का मरसिया है।

दिवान----किताब।
मरसिया----शोक गीत।
(तुझे मै हिर लिखुगाँ)
मै इंतज़ार की कागज़ पे------
अपने लहू से तुझे हिर लिखुँगा।
इस सारी कायनात मे-----
बस तुही एक ज़ीनत और नही कोई,
मै अब हर एक चेहरे को------
तेरी ही तस्बीर लिखुगाँ!
अपने लहू से तुझे हिर लिखुँगा।
तेरी तिज़ारत है रब की तिज़ारत,
क्या खाक जाऊ ऐसे मे मस्ज़िद की तरफ मै,
है अजान तु मेरी,है कुर्आन की आयत!
तेरी पाजेब की आवाज़ को मै संगीत लिखुँगा।
अपने लहू से तुझे मै हिर लिखुँगा।
मै ना सही दाग,,और ना ही सही गालीब,
पर फिर भी ना मुझे गम!
मेरी साँस मे है ईश्क,
ये खुद मे गज़ल है,
ऐ,रंग----जब-जब याद आयेगी उसकी,
तो उसके चेहरे को चाँद------
जुल्फ़ो को जंजीर लिखुँगा।
मै इंतज़ार की कागज़ पे------
अपने लहू से तुझे हिर लिखुँगा।

@@आज की ये रचना मोहब्बत करने वालो के नाम।
(नेता जी)

चुनाव में----
हार के डर से,
बहुत घुट रहे---
नेता जी.
इसीलिए !
जरूरत से कहीं ज्यादा
झुक रहे----
नेता जी.
कल तलक बड़ी ऐठन थी,
दिखना मुहाल था,
आजकल----
गांव-गली, जवार मे,हर कहीं,
दिख रहे----
नेता जी.
खाने-पीने की सुध नहीं,
चिलचिलाती धूप में पसीने से तर-ब-तर हो,
अन्दर ही अन्दर, 
बहुत फूंक रहे----
नेता जी.
मन्दिर-मस्जिद में नवां रहे शीश,
कल तलक,
जिस दलित से चिढ़ते थे,
आजकल----
उसी की बस्ती
और घर मे भोजन कर,
कुछ देर रुक रहे----
नेता जी.

@ रचयिता--रंगनाथ द्विवेदी

Tuesday, 4 April 2023

(महबुब का दिल धड़का था)
ऐ शहर---------
मेरी जश्ऩ-ए-उर्स मे,
मेरी ही किताब के चंद शे,र पढ़ना!
क्यूँकि कभी इसकी हर्फों मे,
ऐ,रंग---------
मेरी महबुब का दिल धड़का था।
(उपले जला रही थी)
कल जिस अखबार मे छपी थी-तिरंगे की तस्बीर,
ऐ,रंग----उसी अखबार से गरीबी,
अपने तीन दिनो से ठंड़े-----------
चूल्हे के उपले जला रही थी।

मोबाइल खराब होने के बाद हम पुनः आपसे मुखातिब हूं.
(बेजा तलाक न दो)

ख्वा़हिशो को खाक न दो!
एै मेरे शौहर-----------
सरिया के नाम पे,
मुझे बेजा तलाक न दो।

बख्श दो---------
कहा जाऊँगी ले मासूम बच्चे,
मुझ बेगुनाह को-------
इतना भी शाॅक न दो,
बेजा तलाक न दो।

न उड़ेलो कान में पिघले हुये शीशे,
मुझ बांदी को सजा तुम----
इतनी खौफ़नाक न दो,
बेजा तलाक न दो।

न छिनो छत,न लिबास
खुदा के वास्ते रहने दो,
मेरी बेगुनाही झुलस जाये---
मुझे वे तेजाब न दो,
बेजा तलाक न दो।

सी लुंगी लब,रह लुंगी लाशे जिंदा,
लाके रहना तुम दु जी निकाहे औरत,
मै उफ्फ़! भी न करुंगी!
बस मेरे बच्चो की खुशीयो को कोई बेजा,
इस्लामी हलाक न दो-----
बेजा तलाक न दो।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.7800824758

____तलाक एक दर्द है जो इसे भुगत रही कोई औरत ही समझ सकती है!प्लीज कभी किसी भी औरत से बेजा तलाक न ले,शुक्रिया।🙏🙏

Monday, 3 April 2023

(भगवान यीशू)
येरुशलम की सड़को पे-------
लहू के कतरे गीरते रहे,,,,,,,,,,,,,,
उफ!तलक न की भगवान के बेटे ने।
बस इबलिशो की नादानियत पे हँसे थे यीशू---------
मै फिर आऊँगा लौट के,,ये कहे थे यीशू।
ऐ,रंग--इंसानियत की खातीर--------
अपनी आखिरी साँस तक लड़े थे यीशू।

इबलिशो----शैतानो।
आप सभी को गुड़ फ्राईड़े की ढ़ेर सारी बधाई।
(मेड इन चाइना)
वे अक्सर तोड़ता है-----
हमारे मूल्क का दिल!
हम कितने देशभक्त है-----
उसी से खरिदते है,
हम अपना उतरा हुआ मूँह----
देखने को आईना!
ऐ,रंग---------
जिसपे लिखा होता है!
मेड इन चाइना।

@@चीन के एक मर्तबा फिर हमारे खिलाफ आतंक का समर्थन करने से प्रेरित चंद लाईन।
(बसंती गेहूं काट रही हैं)

ए.सी.कमरो मे बैठ के--
जो इतनी सुघर और स्मार्ट रही है,
वही बसंती चुनाव में आज कल---
गेहूँ काट रही है.
गजब है लोकतंत्र,
कि ना कालिया, ना शाम्बा
और नाही गब्बर का डर,
इतनी बेखौफ हो गई है बसंती,
कि अपने सर पे,
दुपट्टे रखने वाली औरत को,
बेरहमी से डांट रही है----
बसंती गेहूं काट रही है.
ये अच्छे दिन है,मोदी के
कि सिनेमा की ड्रीमगर्ल,
कृष्ण की मथुरा मे,
शौचालय के पर्चे बांट रही है---
बसंती गेहूं काट रही है.

@Rangnath dubey

Sunday, 2 April 2023

(प्यार की किताब)
हमारे और तुम्हारे प्यार की किताब,
पे महज़ जिम्मेदारियो कि धूल भर पड़ी है!
बाकी तुम वही हो और मै वही हूँ!
हाँ!कुछ पल मिल जाते है जब हम और तुम-----------
मिल के इस किताब की धूल को साफ करते है,
फिर पहले की तरह चमकने लगते है,
हमारे तुम्हारे प्यार के सारे हर्फ,
जिसे हमने-तुमने------
प्यार भरे उन दिनो मे लिखा था,
जब तुम-तुम थी और मै-मै था!
हाँ!याद करो जब घंटो हम,
एक दुसरे की शानो पर अपना सर रंखे,
शाम तलक सपने बुना करते थे,
आज उन्ही सपनो मे रंग भरने के लिये,
हम और तुम---------------
अपने दो मासूम जीवन फूलो की खातिर लगे है!
शायद या यकीनन हम फिर पढ़ेगे पहले की तरह ही----------
एक दूजे की शानो पर अपना सर रंखे,
पुराने दिनो की तरह ही-----------
अपने इस प्यार की किताब।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758
(इस्लाम और माँ)
ऐ इस्लाम़ के चंद काफ़िरो!
तुम्हारी बेज़ा फतवो से---
इसकी ईज्जत कम नही होती।
क्यूँकि ऐ,रंग--------
मूल्क़ वे मुकद्दस माँ है,
जो कभी मज़हब नही होती।

@@कुछ तथाकथित बेज़ा फतवे के खिलाफ ऐक सच।