Monday, 31 March 2025

(अप्रैल फूल हूं)

(रजिस्टर्ड अप्रैल फूल हूँ)
शादी के बाद से------
किचन और बच्चे संम्भालने मे मशगूल हूँ,,,,,
महारत हासिल कर ली है,,पैर दबाने में,,,,,,,,
वे अक्सर लाल-पीली होती है-------
मै कुल हूँ।
ऐ,रंग--मै अपनी लुगाई का--------
रजिस्टर्ड अप्रैल फूल हूँ।

आप सभी संम्मानित पतीयो व होने वाले पतीयो को मूर्ख दिवस की ढेर सारी बधाई।

(घर की पैंजनी रोती है)

(घर की पैंजनी रोती है)
बद्चलन-------------
रातो की आगोश मे सो तो लिया!
पर कभी सोचना ऐ,रंग-------
कि तुम्हारे इंतज़ार मे सारी रात,
घर की पैंजनी रोती है।

गांव आया

ए शहर
जब से तू मेरे गांव आया
रधिया
अपने दुपट्टे वाले सीने से बेलिबास हो गई
लोग टुकुर टुकुर देखने लगे
उस जगह
जहा कभी नजर उठती ना थी
हाय!
ना जाने कब तेरे आने से
हमारे गांव की बहन बेटी
के पांव फिसले
गांव का भाई गलीज हुआ
ए शहर
जब से तू मेरे गांव आया.

Sunday, 30 March 2025

(एक टिप्पणी)

✍️✍️किसी भी धर्म को ना मानना कहीं ज्यादा बेहतर है,,बनिस्बत कि किसी भी धर्म की राजनीतिक नौटंकी करने से. 🙏🙏

Saturday, 29 March 2025

(प्रदेश में चुनाव होना है)

(प्रदेश मे चुनाव होना है)
मंदिर मे कटी गाय,मस्ज़िद मे कटा सुअर,
तुम्हे हिन्दु और मुझे मुसलमान होना है।
क्यूँकि ऐ,रंग-------------
अब पुरे प्रदेश मे चुनाव होना है।

(आनंद का किरदार छोड़ जाऊंगा)

(आनंद का किरदार छोड़ जाऊँगा)

मै ज़िदगी के थिऐटर को विरान छोड़ जाऊँगा,
फिर भी बाबु मोशाय!

मेरे साथ बीते हुये लम्हो की रिल------
कभी खत्म नही होगी!

क्योकि मै आपकी ज़ेहन मे-------
आनंद का किरदार छोड़ जाऊँगा।

विश्व रंगमंच दिवस.

Friday, 28 March 2025

(शबरी के है राम)

(शबरी के है राम)
सबकी भक्ति-------
सबकी श्रद्धा के है राम।
कौन कहता है कि केवल-----
अयोध्या के है राम।
ऐ,रंग--जुठे बेर जाती की छोटी,,,,,,
शबरी जैसी वृद्धा के है राम।

आप सभी को राम नवमी की बधाई--जय श्री राम।

(केंडिल नाइट)

(कैंडिल नाइट)
बहुत उदास है—————
आज हमारे तुम्हारे मोहब्बत की,
कैंडिल नाईट।
मै वही बैठी हूँ ठिक सामने,
बस वे जगह खाली है-
जहां तुम बैठते थे,
आज बहुत उदास है मेरे अंदर जिंदगी,
मै टुट रही हूँ!
मेरे संग बीत रही है,
बस तुम्हारे खूबसूरत यादो की—–
कैंडिल नाईट।
शायद कही चुक गये हम,
इसी से हमारे रिश्ते में गलतफ़हमी बढ़ती गई!
तुम अलग हो गये मै अलग हो गई,
अब तो अक्सर————–
डिनर मेज पे ही रह जाता है,
और मै कुर्सी पे बैठी यु ही,
गुजार देती हू————-
अपनी कैंडिल नाईट।
गर गुंजाइश हो तो लौट आओ,
एक मर्तबा ही सही मुआफ करने,
क्योंकि ऐ,रंग—–कही ऐसा न हो,
कि तेरा इंतजार करते-करते,
हमेशा के लिये बुझ जाये,
मेरी ये कैंडिल नाईट।

(यही धारावी)

(यही धारावी)
मै रोज थकी मांदी,
काम से लौटती हूं जीने------
यही धारावी।
वे चारपाई पे लेटा है,धुत्त कच्ची पिये
गंदी गालियाँ दे रहा,
अभी जबरदस्ती खीचेगा,
मै अपनी ऊबकाईयां रोके,
बर्दाश्त करुंगी एक बलात्कार,
फिर उठुंगी वे सो जायेगा,
थका मांदा!
मै उल्टीयां कर,
पुरे बदन से अपने एै,रंग-------
छुड़ाऊँगी सारी रात मै यही धारवी।

(बेजा तलाक ना दो)

(बेजा तलाक न दो)
ख्वा़हिशो को खाक न दो!
एै मेरे शौहर-----------
सरिया के नाम पे,
मुझे बेजा तलाक न दो।
बख्श दो---------
कहा जाऊँगी ले मासुम बच्चे,
मुझ बेगुनाह को-------
इतना भी शाॅक न दो,
बेजा तलाक न दो।
न उड़ेलो कान में पिघले हुये शीशे,
मुझ बांदी को सजा तुम--------
इतनी खौफ़नाक न दो,
बेजा तलाक न दो।
न छिनो छत,न लिबास
खुदा के वास्ते रहने दो,
मेरी बेगुनाही झुलस जाये-------
मुझे वे तेजाब न दो,
बेजा तलाक न दो।
सी लुंगी लब,रह लुंगी लाशे जिंदा,
लाके रहना तुम दु जी निकाहे औरत,
मै उफ न करुंगी!
बस मेरे बच्चो की खुशीयो को कोई बेजा,
इस्लामी हलाक न दो-------
बेजा तलाक न दो।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.7800824758
____तलाक एक दर्द है जो इसे भुगत रही कोई औरत ही समझ सकती है!अगर संभव है तो मेरी इस रचना के पढ़ने वालो से मेरी कलम अनुरोध करती है प्लीज कभी किसी भी औरत से बेजा तलाक न ले,शुक्रिया।

(ओढ़नी)

(ओढ़नी)
याद है बचपन---------
मैं पहले कहाँ ओढ़ती थी ओढ़नी।
वे तो जब मैं तेरह की हुई,
तो अचानक-माँ ने डाँटना शुरु किया,
और कहने लगी-----------
अब अपने सीने पे तुम रंखा करो ओढ़नी।
मैं चौंकी-----------------
कि ये अचानक माँ को क्या हुआ?
फिर लगा नही कुछ तो है,
यूँही नही माँ रखवाना चाहती होगी----
सीने पे ओढ़नी।
फिर कमरे में बंद कर,
खुद को शीशे में टटोलने लगी,
तो अचानक कुछ शर्म सी आई,
कुछ बदला सा था,
जहाँ माँ ने कहा था-रखने को ओढ़नी।
मै बाहर निकली----------
तो देखा बचपन को खिसकते,
लगा माँ कि कितना सच कह रही थी,
कि तु सयानी हो रही है,
क्योंकि कुछ लोग तक रहे थे,
एै,रंग------वही जहां माँ ने कहा था,
रख लो तुम ओढ़नी।

(सेब द चाइल्ड लिखवा रही है)

(सेब द चाइल्ड लिखवा रही है)
किसी कन्या भ्रूण को कोई क्या मारेगा?
माँ खुद मरवा रही है।
हँसी-खुशी के साथ हजार दो हजार दे,
हर शहर के पैथालाॅजी मे रिपोर्ट ले,
किसी डाक्टर के टंगे नीले परदे के उस तरफ,
अपना एबार्शन करवा रही है।
आँख इसलिये भर आती है कि-------
इन तथाकथित माँओ ने कालेज मे पढ़ा है,
"इनके पथराये हृदयो ने--------
माँ शब्द की कोमलता खो दी है",
वही निरक्षर माँ----------
चार बेटिया जन पाप-पुण्य से डरती है,
सच तो ये है कि अपनी बेटियो के लिये-----
"उन पढ़ी-लिखि ढोंगी माँओ से ज्यादा,
अपनी इन बेटियो के लिये लड़ती है"।
सरकारी अमले की कारस्तानी तो और है,
जो महिला डाक्टर पैसे ले,
एबार्शन करवाने के लिये चर्चित है,
सुना है कि वही,
पुरे शहर की दिवालो पे-------------
"सेब द चाइल्ड लिखवा रही है"।

@@@भ्रूण हत्या को इंगित करती एक कविता।

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर----222002 (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

(चूल्हा नहीं जलता)

(चुल्हा नही जलता)

तुम तो
बात-बात मे शहर जलाना जानते हो,
तुम्हारे पास तो
कौमो को जलाने का ईधन है!
पर यहाँ फाँकाकशी सोने नही देती,
पेट तो जलता है
ऐ रंग---------
पर इस बस्ती मे अक्सर
चुल्हा नही जलता.

Sunday, 23 March 2025

कुछ आलोचक कभी-कभी आलोचना की साहित्यिक शास्त्रीयता खो बैठते हैं 

Saturday, 22 March 2025

ज्ञानपीठ

मैंने महसूस किया है कि 
जो आंखें साहित्यिक साजिश नहीं करती 
उन्हें अक्सर बहुत देर से मिलता हैं 
साहित्य में कुछ 
चाहे वह पद्म श्री हो 
या फिर ज्ञानपीठ .

(राम )

(राम)
तेरी पीड़ा की प्रत्यंचा को------
सब खीच रहे है राम!
तेरी नगरी मे,
तुम्हें टेंट से ढक कर,
मंदिर यहीं बनायेंगे-----
बस चीख रहे है राम।
हर चुनाव के मुद्दे मे,
बस भुना रहे अयोध्या को,
कुछ न किया और कुछ न करेंगे,
सच तो ये है कि,
ये नकली भक्त है आपके सारे,
जो अपने-अपने स्वार्थ का चंदन-----
भर माथे पे टीक रहे है राम।
तेरी पीड़ा की प्रत्यंचा को------
सब खीच रहे है राम।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर---222002 (उत्तर--प्रदेश)।
mo.no.----7800824758

Thursday, 20 March 2025

(गीत)

(गीत)
गीत----------
केवल उर्वशी या शकुंतला नही!
ऐ,रंग----ये उस गरीब की पतीली भी है,
जिसमें कई रोज से-चावल पके नही।

(केदारनाथ सिंह एक श्रद्धांजलि)

(केदारनाथ सिंह-एक श्रद्धांजलि)
केदारनाथ------------
के साहित्य से यहां की मिट्टी बोलती थी,
शब्द-दर-शब्द का खाटीपन था,
पन्ने-दर-पन्ने उनकी किताबभर नही,
दोस्तो को लिखि उस दौर की-------
उनकी हर चिट्ठी बोलती थी।
लेकिन एक-एककर सब जाते गये,
और टुटता गया ये सिलसिला,
गाँव की उबड़-खाबड़ सड़के,
और उनके साथियो की तरह बिछड़े,
किनारे पड़े छिटके आँख नम किये-------
उस सड़क के यादो की गिट्टी बोलती थी।
लेकिन आज वे भी चले गये,
उनके जाने का रुंधापन और नम आँखे,
कह रही कि---------
उनके साहित्य का ये रितापन,
शायद फिर न भर सके।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर--222002 (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Wednesday, 19 March 2025

(तिलिस्म ए होशरुबा)

(तिलिस्म़-ऐ-होशरुबा)
कई रात जगा हूँ,नींद टुटी है,,,,
हर बार------
बार-बार तेरा चेहरा नुमाया हुआ है।
ऐ,रंग--कह दो-----
अब उतर आये मेरी कागज़ पे,,,,
मेरे ख्वाहिशो की-----
तिलिस्म़-ऐ-होशरुब़ा।

(मकान से अच्छा)

(मकान से अच्छा)
वे अपनी तोतली जुबान से बोलता है----
किसी भी हिन्दू या मुसलमान से अच्छा।
मुझे बहुत खूबसूरत लगता है----------
वे गली मे नंगा खेलता बच्चा ।
क्या?करुंगा जा के मै मंदिर या मस्जिद में,
मुझे पता है कि---------
तुम बांध दोगे बंदिशो मे एक दिन इसे भी,
ये भी समझ जायेगा जाती और मज़हब,
और बन जायेगा ये खो के अपना बचपना,
हमारी गीता और तुम्हारे कुरान का बच्चा।
तब तलक तो तक लु इस मासुम से बच्चे को,
जो खुद मे खो बना रहा मिट्टी से एै"रंग"----
एक घर इस शहर मे हर मकान से अच्छा।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

(मजहब होके रह गई)

(मज़हब हो के रह गई)
हर रात लहू-लूहान सेज़ पे सोती है,,,
इसका शौहर----
इसकी ख्व़ाहिशो का कत्ल़ करता है।
ये मोहब्ब़त तलाशती है कतरा-कतरा,,,
वे मोहब्ब़त के लम्हो मे तकरिर करता है।
ऐ,रंग--वे यहाँ आई थी औरत होने-----
मज़हब होके रह गई।

तकरिर--धार्मिक भाषण।

Tuesday, 18 March 2025

(मुसलमान हैं साहब)

(मुसलमान है, साहब)

ना ही , पूजा 
ना ही , किसी मस्जिद की ,
अजान है , साहब.

ये लड़की ,
इस दौर-ए-ग़ालिब की,
दीवान है , साहब.

बड़़े सलीके और 
तमीज़ से ,
लिखा है , कई रात ,
ये एक रात , हिन्दू
तो एक रात मेरी ,
गज़लों की , ----
मुसलमान है , साहब.

@ रंगनाथ द्विवेदी

Sunday, 16 March 2025

(कलम तोड़ दी है)

(कलम तोड़ दी है)
मोहब्बत के---
ताजिराते हिंद की दफा से,,
वे बचती रही है।
हमने पहली दफा ये,वहम तोड़ दी है,,
ऐ,रंग--उन्हे बेवफा लिखके कलम तोड़ दी है।

(लिख दूं बनारस)

(लिख दूं बनारस)

तेरी यह खूबसूरत आंखे है 
या कि "भेलूपुर".

उस पर यह शर्म तेरी
जैसे "गिलट बाजार".

ऊफ! यह दिल की इंतहा है
या कि पागलपन 
बता ऐ मेरी मोहब्बत
कि मैं तुम्हें 

"कचौड़ी गली" लिखूं 
या लिख दूं
बनारस.

✍️✍️ रंगनाथ द्विवेदी
जौनपुर,(उत्तर-प्रदेश)

Friday, 14 March 2025

(शराबी आचमन)

(शराबी आचमन है)
ये जो तेरा अल्हड़ बाकपन है,,,
कशीश है शायर का----
ऐ,रंग--कवि का------
शराबी आचमन है।

(गौरैया)

(गौरैया)
याद करो बचपन--------
वे फुदक के!चहक के!कितना बहलाती थी!
एक बेटे की तरह।
ऐ,रंग-------गौरैया
केवल हमारे छत की चिड़ियाँ नही,
आज रुठ गई!
जो कल हमारी माँ थी।

(याद तुम्हारी)

(याद तुम्हारी नही गई)
अभी तलक याद तुम्हारी नही गई,
वे पिंक से सूट मे तुम्हे देखना,
जैसे अभी कल की बात हो,
तुम गई तो बेशक---------
पर मेरी जेहन में ज्यो की त्यो तुम आज भी हो,
तुम्हारी कसम मौसम बदले,साल बदला
लेकिन तुम्हें चाहते रहने कि--------
मेरी खुमारी नही गई,
अभी तलक याद तुम्हारी नही गई।
वे पतझड़ की हवा,
और उनकी शाखो से गिरते पत्ते,
और तुम्हारे कालेज से छुटने का वे वक़्त,
जब तुम्हारे खुले बाल,
हवाओ से इधर-उधर बिखर जाते थे,
फिर उन्हे तुम अपनी नाज़ुक अँगुलियो से,
जब पिछे की तरफ करती थी,
वे मेरा तुम्हे देखने का खूबसूरत लम्हा था,
मै आज भी उसी लम्हें से मोहब्बत करता हूँ,
सच तो ये है कि----------
बिना तुम्हारी याद के हमसे,
कोई दिन या रात गुजारी नही गई!
अभी तलक याद तुम्हारी नही गई।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

Sunday, 9 March 2025

जे एन यू

(जे एन यू के दोगलो पर है)
जहाँ कि फिज़ा मे----------
अफज़ल गुरु शहिद से बढ़कर है!
जहाँ कि तालिंम मे--------
दूर्गा सेक्स वर्कर है!
ऐ,रंग----ये हमारे मूल्क कि बदकिस्मती है,
कि इतना बेज़ा खर्च बेवज़ह----------
नमक-हराम जे एन यू के दोगलो पर है।

Saturday, 8 March 2025

(बच्चा पाल रही हूं मैं)

(बच्चा पाल रही हूँ मै)
इस सुंदरतम सृष्टि को आहूति----
डाल रही हूँ मै,,
दोज़ख मे अपने नन्हा सा-----
एक बच्चा पाल रही हूँ मै।
देगा मुझको अपना ही कोई गाली,,
ये नाज़ायज फिर भी ,रंग----
कुम्हार की मिट्टी सा-----
इसको ढ़ाल रही हूँ मै।
इस सुंदरतम,सृष्टि को आहूति डाल रही हूँ मै----
दोज़ख मे अपने नन्हा सा----
एक बच्चा पाल रही हूँ मै।

महिला दिवस पे मेरी लंबी कविता की शुरुआती लाईने।

(पति के हाथ से जली )

(पती के हाथ से जली)
कभी मिट्टी के तेल तो कभी तेज़ाब से जली,
औरत सीता भी हुई तो आग से जली।
ये दुनिया मर्दें शहर है आज भी,
गर मासुम सजी-सँवरी भी तो ऐ,रंग-----
अपने पती के हाथ से जली।

Wednesday, 5 March 2025

(फागुन हैं)

(फागुन है)
मदभरी गुन-गुनी धुप मे फागुन है,
आम की अमराई,कोयल के कूक मे फागुन है।
ढलती उम्र मे कोई पढ़ रहा दोहे,
कोई कह रहा गोरी,तुम्हारे रुप मे फागुन है।
प्रीत के,प्यार के,हर कही बरस रहे रंग,
फिर भी किसी विरहन के-हूक मे फागुन है।
कोई हथेली से मल रहा गुलाल,
तो कही किसी प्रेमी के चुक मे फागुन है।
ढोल की थाप पर,मेरा झुम रहा मन,
हाय!,रंग--कितने शुरुर मे फागुन है।

होली की ढेर सारी बधाई।
ये रचना अगले वर्ष दैनिक जागरण के,विथिका से प्रकाशित मेरी पसंदीदा रचना है।

(तबसरा करती हैं)

(तबसरा करती है)
मेरी गज़ल अक्सर तबसरा करती है,
किसी गरीब की भूख से मशवरा करती है।
सुना है एक हयात और एक जन्नत है शहर,
लेकिन इसी शहर में कुछ जन्नत,
माँ की कोख में मरा करती है--------
मेरी गज़ल अक्सर तबसरा करती है।
मजबूरियाँ बिकती है,खरिदो-फरोख्त़ होता है,
कुरआन पढ़ने वालो जरा सोचो,
किसी गली में हर रात अपने जख्म़-----
न चाह के भी कोई अमीना हरा करती है।
एै"रंग" इसी से न चाह के भी---------
मेरी गज़ल अक्सर तबसरा करती है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

Monday, 3 March 2025

(उपले जला रही थी)

(उपले जला रही थी)
कल जिस अखबार मे छपी थी-तिरंगे की तस्बीर,
ऐ,रंग----उसी अखबार से गरीबी,
अपने तीन दिनो से ठंड़े-----------
चूल्हे के उपले जला रही थी।

जवान हुई

(जवान हुई)
कैसे निखरते------------
किसी मजदूर बाप की बिटिया के अंग,
इसके पेट और नाभी का पिचकापन,
गर पढ़ सके तो पढ़,
अरे ये वो पगली है------------
जो आधे से ज्यादा फाकाकसी मे जवान हुई।
रातभर खाँसती माँ के सिरहाने बैठी रही,
दवा की खाली शीशी का दर्द पूछ इससे,
एक झपकी का इसके झोंका भी टूट गया------
ये एैसी ही गुजरी रातो मे जवान हुई।
बापु के काम से लौटने के पदचाप की पीड़ा,
का असह्यपन जानती है!
फिर भी मूक और मौन है,
अंदर ही अंदर बेटी को न व्याह पाने का सुलगापन क्या है?
ये जानती है!
तभी तो कभी सजी-सँवरी नही ना आईना देखा,
एै "रंग" ----------
ये एैसे ही अभागेपन मे जवान हुई।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर---222002 (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

द्रोपदी

सड़क के सारे 
दु:शासन डर गये है,
ऐ रंग ––
21वीं सदी में
इतनी नग्न हुई द्रोपदी.