Wednesday, 31 May 2023

(घुँघट नही दिखता)
हा!मेरी खता है कि-----------
मै अब चाँद नही लिखता,,,,,,,,,,,,,,,,,,
पर क्या?करु ऐ,रंग--तरक्की के दौर मे
हमे औरत तो दिखती है-------
पर उसका घुँघट नही दिखता।
(शहनाज़ का मेकप नही करती)
हमारी गज़ल वे खूबसूरत औरत है,
जो कभी शहनाज़ का मेकप नही करती।
वे सादगी और सलिके की रस्म़ है,
वे जिधर से गुजरती है निगाहे पाकिज़ा,
अपने सर से दुपट्टे को ओझल नही करती।
हमारी गज़ल--------------------
ये जीनत है ज़मी की आयत है,
ये ज़न्नत से घर को कभी दोज़ख नही करती।
हमारी गज़ल-----------------------
ऐ,रंग----इसकी दुनिया फकत शौहर है,
ये हवस के मारो की तरह कभी ब्रेकप नही करती।
हमारी गज़ल वे खूबसूरत औरत है,
जो कभी शहनाज़ का मेकप नही करती।

Tuesday, 30 May 2023

(नक्सली हो गये)
गुमराह रास्तो से गुजरे--------
हम जंगली हो गये,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
ऐै ",रंग"-----अपनो का सीना चाक कर----
हम नक्सली हो गये।
दंगा याद है
May 30th, 2016 | by admin
कवितायें 0
रंगनाथ द्विवेदी

हमें पुराना शहर याद है,
एक-एक गली मुहल्ला याद है।
वे कुर्आनखानी का खुरमा,
मुँह पोछती अपने दुपट्टे से,
अब्दुल की अम्मा याद है।
हमें पुराना शहर याद है!
राखी सुनि थी एक ब्राह्मन के घर,
आँख मे खुशियो के आँसू———
मेरी इस कलाई को सलमा याद है।
हमें पुराना शहर याद है!
इतने सालों बाद देखा जब जला घर,
पुछा कहां गये ये सब,
तो नये शहर के बाशिंदो ने बताया,
तो अफसोस हुआ,रंग—————
कि अब नये शहर को,
पुराने शहर की मोहब्बत नही,
नफरत,लाशे और दंगा याद है।
हमें पुराना शहर याद है।

@@@दैनिक समाचार पत्र सच का हौसला मे मेरी रचना(दंगा याद है) को जगह देने के लिये वंदना दिदी का ढ़ेरो धन्यवाद।
(ईदी मांगती है)
दो दिन से भूखी बच्ची कुछ दे दो दिदी मांगती है,
गरीबी वे शै है जो हर रोज ईदी मांगती है।
उसके नन्हे-नन्हे पाँव दूर निकल आते है,
उसकी थकन फिर चल पड़ना,
उफ! कलेजा हिल जाता है जब किसी दरवाजे,
वे अपनी चारपाई पे पड़ी बीमार माँ के लिये-------
एक फटी धोती मांगती है।
हर रोज ईदी मांगती है-----
स्कूल की वे बड़ी सी बिल्डिंग और,
उसमे ढ़ेरो बड़े घरो से आती बेटिया,
वे एक बार तक--------
रो देती है किस्मत पे अपनी कि वे भीख मांग रही,
और ये बड़े घरो की बेटिया---------
अपने माँ-बाप से तालीम ऊँची मांगती है।
इस तपन मे जल रहे उसके पाँव नंगे,
उफ!मै लिख नही सकता ये हादसा,
छाले पड़ रहे है हर्फ-हर्फ ये सुन------
कि वे एक दरवाजे चप्पल टुटी मांगती है।
दो दिन से भूखी बच्ची कुछ दे दो दिदी मांगती है,
एै"रंग" गरीबी वे शै है जो हर रोज़ ईदी मांगती है।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758
(रंडी---एक विभत्स और भयावह यथार्थ)

"अँधेरी रात मे---
वे शहर की स्ट्रिट लाइट से टेक लगा,
अपना आधे से अधिक वक्षस्थल खोले,
किसी ग्राहक को रिझाने
और लुभाने का प्रयास करती है.

किसी रात जब काफी प्रयासो के इतर,
कोई ग्राहक आता और रिझता नही दिखता,
तो अपनी निदाई आँखो की निद दुर करने को,
वे गाढ़ी और सुर्ख लिपस्टिक के उस तरफ,
अक्सर बीड़ी पीने से सँवलाये होंठो के बीच,
एक बीड़ी दबा------
बड़ी अश्लीलता
और निर्लज्जता से वे अपने हाथो को,
अपने अधखुले वक्षस्थल मे डाल,
चारो तरफ
जलाने को दियासलाई टटोलती है,
उस टटोलने मे
स्त्रियोचित कोई संवेदना नही,
बल्कि बेरहमी से
दियासलाई निकाल बीड़ी जला-----
कुछ तगड़े-तगड़े सुट्टे ले
जब अपने नथुनो से धुआँ निकालती है,
तो उस धुँये की धुँध
उसे अपनी एकलौती जीवन सखी लगती है,
कभी-कभी जब एकाध कस की शुरुआत मे ही
किसी ग्राहक को आता देखती है,
तो उसे रोज
अपनी तरह जली बीना बुझाये फेक,
कुछ इस तरह झुकती है,
कि उसके
अधखुले वक्षस्थल थोड़ा और गहरे खुल,
ग्राहक को यौन मदांध कर
बाबले और उतावले कर देते है,
उसकी इस झुकन की
कलात्मकता ने ही उसे अब तक,
ज्यादा ग्राहक दिये है!
वे हर रात
अपने ग्राहक को शिशे मे उतार,
इस स्ट्रिट लाइट की कुछ दुरी पे बने
अपने उस दो कमरे की
सिलन की बदबू से रचे बसे
कोठरी मे ले जाती है,
और उसी कमरे की
एक जर्जर तखत पे सो जाती है,
कभी इसी तखत पे
दुल्हन की तरह सोने आई थी,
और इसी तखत पे सोने के लिये,
माँ-बाप का घर छोड़----------
प्रेमी के साथ भाग आई थी
ये शायद उन्हिं की पीड़ा का श्राप है,
कि सुहाग तखत पे रंडी बन रह गई।
फिर समय के साथ
मैने ख़ुदकुशी न की,
हाँ उस शरीर और अंग से बदला जरुर लेती हूँ,
जिसे अगर कुछ दिन और संभाल लेती
तो एक औरत होने का,
संम्पुर्ण ऐहसास करती,
मै बलात भागी थी
उसी बलात भागने ने जीवन नर्क कर दिया।
हर रात उसका ग्राहक
तृप्त हो जब ये जुमले कहता है कि-----
तेरे अर्धखुले वक्षस्थल
ब्लाउज मे तो सुंदर थे ही,
और आजाद हुये तो
और कयामत व सुंदर हो गये,
ये सुन उसने
हमेशा की तरह अपने ग्राहक को
मन ही मन मादरजात गाली दे,
फिर अपने उस ब्लाउज को उठा
एक रुटीन की तरह,
बीना किसी कोमलता के
जबरदस्ती इधर-उधर ठुस,
और उस ठुसने की रगड़ को,
वे राड़ कह खूब हँसती है
वे हँसी अपने को
और पीड़ित करने की होती है,
फिर उसी तखत पे अस्त-ब्यस्त लेट,
एक रंडी की तरह
पुरा दिन बीता उठती है,
नहा धुलकर
,गाढ़ी लिपस्टिक लगा चल पड़ती है,
एक बीड़ी होठ पे लगाये
उसी स्ट्रिट लाइट की तरफ,
वैसे ही खड़ी हो फिर किसी ग्राहक को,
अपने अधखुले ब्लाउज से
रोज की तरह दिखाने अपना,
अाधे से अधिक खुला वक्षस्थल।

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.------7800824758
(मुसलमान है, साहब)

ना ही पूजा 
ना ही किसी मस्जिद की ,
अजान है, साहब.!

ये लड़की ,
इस दौर-ए-ग़ालिब की,
दीवान है , साहब!

बड़़े सलीके और 
तमीज़ से ,
लिखा है कई रात ,

ये एक रात हिन्दू
तो एक रात मेरी ,
गज़लों की ----
मुसलमान है , साहब!

@ रंगनाथ द्विवेदी

Monday, 29 May 2023

(उनके हूश्ऩ का पारा)
शहर मे गरमि का रोज टुट रहा पारा,,,
जबकि ऐ,रंग---इसमे नही है शामिल--
उनके हूश्ऩ का पारा।
(दंगा याद है)
हमें पुराना शहर याद है,
एक-एक गली मुहल्ला याद है।
वे कुर्आनखानी का खुरमा,
मुँह पोछती अपने दुपट्टे से,
अब्दुल की अम्मा याद है।
हमें पुराना शहर याद है!
राखी सुनि थी एक ब्राह्मन के घर,
आँख मे खुशियो के आँसू---------
मेरी इस कलाई को सलमा याद है।
हमें पुराना शहर याद है!
इतने सालों बाद देखा जब जला घर,
पुछा कहां गये ये सब,
तो नये शहर के बाशिंदो ने बताया,
तो अफसोस हुआ,रंग---------------
कि अब नये शहर को,
पुराने शहर की मोहब्बत नही,
नफरत,लाशे और दंगा याद है।
हमें पुराना शहर याद है।
( चाय पीते थे )

कभी हम-तुम तन्हा,
किनारे की टेबल पे ,घंटो बैठे
कैंटीन की चाय पीते थे.
वे दिन,वे कैंटीन, वे होठ
अब नही
बस यादो की टेबल पे,
खाली और ठंडा
काँच का गिलास रखा है,
जिसमें से कभी धुआं उठता था,
और उस धुएं को फुक,
हम-तुम किनारे की टेबल पे बैठ,
घंटो गुनगुनी चाय पीते थे.

@@@रंगनाथ द्विवेदी.
Mo.no.7800824758
(मुसलमान है, साहब)

ना ही पूजा 
ना ही किसी मस्जिद की ,
अजान है, साहब.!

ये लड़की ,
इस दौर-ए-ग़ालिब की,
दीवान है , साहब!

बड़़े सलीके और 
तमीज़ से ,
लिखा है कई रात ,
ये एक रात हिन्दू
तो एक रात मेरी ,
गज़लों की ----
मुसलमान है , साहब!

@ रंगनाथ द्विवेदी

Sunday, 28 May 2023

(नक्सली हो गये)
गुमराह रास्तो से गुजरे--------
हम जंगली हो गये,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग---अपनो का सीना चाक कर----
हम नक्सली हो गये।
(रुह तलक जल गई)
रख दिया-----------------
दहलीज़ पे खुद को दिये की तरह,
ऐ,रंग-------------------------तुम नही आये
जबकि मेरी रुह तलक जल गई।
(चरागो की रात)
लफ्ज़ो की नदी मे घिर गई है किश्ती,
मै कहा ढ़ुढू----------
है कहाँ किनारो की रात।
ना कोई दर,ना ठौर,ना ठिकाना 
कैसे लिखू कि---------
कहाँ गुजरी है मेरे बहारो की रात।
महकते फूलो की खुशबू ना रास आ रही,
कितनी मनहूस लग रही है---------
चमकते सितारो की रात।
एक सिलसिला लिये है गम जो ना खत्म हो रहा,
कैसे लिखू---------
बजती बाँसुरी और पहाड़ो की रात।
वे कहकशे,वे शायरो की महफ़िल छिन गई,
अब याद है बस----------
कुछ मुशायरे की रात।
तु लौट आ एै दिल उस आसमा से,
तेरे इंतज़ार में है-------
किसी के चरागो की रात।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758
(खूबसूरत हो नही सकती)
तु चाहे जितना भी मेकप कर ले एै अमीरजादी,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
पर तु किसी मजूरन से ज्यादा---------
खूबसूरत हो नही सकती।
( रेखा )

रेखा---
शहरयार और रुसवा की,
किताब बनके रह गई.
वे घुंघरू,नजाकत के लिये मशहूर हुई,
लेकिन उसके अंदर की औरत,
हके मोहब्बत को तड़पती रही,
वे साँसे खुदकुशी,
और मोहब्बत के सिरहाने,
अपने ही कब्र का-------
एक चराग बनके रह गई.

@@@रंगनाथ द्विवेदी.
Mo.no.7800824758

Friday, 26 May 2023

(मेरे शहर में बरसात हो रही है)
जब से तुम्हें राग मल्हार लिखा है,
तब से मेरे शहर में बरसात हो रही है।
दिवाने हो गये है सारे स्याह बादल,
भूल गये है ये कुछ और शहर है,
जहां इनको बरसना है!
जब से तुम्हें राग मल्हार लिखा है,
तब से मेरे शहर में बरसात हो रही है।
कही तेरी खातिर यही न ठहर जायें,
भेज दे इन्हे ये बस तेरी सुनेंगे,
ये कैदी हो गये है------------
तब से तेरी रुप के,
जब से तुम्हें राग मल्हार लिखा है,
तब से मेरे शहर में बरसात हो रही है।
(रविवार लिखा)

तुमने ही तो---------
मेरी दिल की डायरी में रविवार लिखा.
तुमने ही इसे फाड़ा,इसे ठुकराया
और--------
किसी गैर की डायरी में रविवार लिखा.
मेरे ख्वाब की आँख में रेत भर आई,
मै किसी------
मछली सा तड़पता हूं,
ये छुट्टी नही,
मेरी दर्द का दिन है,
फाड़ देता हूं इस दिन मै,
अपने घर का कैलेंडर भी----
जहां पढ़ता हूं रविवार लिखा.
अब तो इतनी सी दुआ है रब,
कि मेरी तरह ना तड़पे कोई,
और किसी की जिंदगी में न आये,
फिर इस तरह------
डायरी में रविवार लिखा.

@@@रचयिता--रंगनाथ द्विवेदी.
Mo.no.7800824758
(औरत इस ज़मी की पहली गज़ल है)

आसमा पे-------------------------
किसी मकबूल शायर से लिखी गई,
औरत------------
इस ज़मी की पहली गज़ल है.

बहुत बाद में तक्सीम हुये है सभी महल,
औरत इस ज़मी पे-----------------
पहली तराशी गई ताज़महल है.

कोई कुछ लिखे या उड़ेल दे खुद को,
पर लिख न सकेगा,
औरत------------------
इस ज़मी के झील की पहली कवल है.

ना हिन्दू बनाया,ना मुसलमान उसने,
गर बनाता तो खता होती,
इसी से ऐ,रंग---औरत----------------
इस ज़मी पे मोहब्बत की पहली शकल है.

आसमा पे------------------
किसी मकबूल शायर से लिखी गई,
औरत-----------------
इस ज़मी की पहली गज़ल है.
(गीत गाता हूँ)
रोता हूँ शब्द-शब्द भीग जाता हूँ,,,,,,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----------
मै दर्द के मंजिरे पे गीत गाता हूँ।

@रंगनाथ द्विवेदी।

Thursday, 25 May 2023

(मेरे शहर में बरसात हो रही है)
जब से तुम्हें राग मल्हार लिखा है,
तब से मेरे शहर में बरसात हो रही है।
दिवाने हो गये है सारे स्याह बादल,
भूल गये है ये कुछ और शहर है,
जहां इनको बरसना है!
जब से तुम्हें राग मल्हार लिखा है,
तब से मेरे शहर में बरसात हो रही है।
कही तेरी खातिर यही न ठहर जायें,
भेज दे इन्हे ये बस तेरी सुनेंगे,
ये कैदी हो गये है------------
तब से तेरी रुप के,
जब से तुम्हें राग मल्हार लिखा है,
तब से मेरे शहर में बरसात हो रही है।
(ईदी मांगती है)

दो दिन से भूखी बच्ची---
कुछ दे दो,दीदी
मांगती है.

गरीबी वे शै है,---
जो हर रोज,
ईदी मांगती है.

उसके नन्हे-नन्हे पांव,
दूर निकल आते है,
उसकी थकन फिर चल पड़ना,
उफ!! कलेजा हिल जाता है,
जब किसी दरवाजे पे
अपनी चारपाई पे पड़ी,
बीमार मां के लिए,
एक फटी ,---
धोती मांगती है.
ऐ"रंग"-गरीबी वे शै है,---
जो हर रोज,
ईदी मांगती है.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है. 

रचनाकार---रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin.no.222002 (U P)
Mo.no. 7800824758

Wednesday, 24 May 2023

(नीलकमल )

तड़पता है,सिसकता है
बुलाता है कोई "नीलकमल"

सदियों चुनी दीवाल से
गाता है कोई "नीलकमल"

ए "रंग" किसी युग में
कोई पाता है कहां "नीलकमल"
(उमराव जान )

वही छत, वही छज्जे, वही दालान
लखनऊ में अब,
नहीं तो केवल
ए "रंग "----
रुसवा की "उमराव जान".
(स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है)
मै उसे छक के पिता हूँ-----------
पैक दर पैक बीना डर के,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
क्योकि ऐ,रंग--उसके बदन पे कही नही लिखा-----------!
कि वे स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है।
(नीला आसमा सो गया है)
वक्त के सानो पे सर रख नही पाई,
ऐ,रंग---------------
इस रेखा की चाहत और ख्व़ाहिशो का भी ,
नीला आसमा सो गया है।

Tuesday, 23 May 2023

(किस्सागोई करता हूँ)
अक्सर मेरा कत्ल इसलिये होता है,,,,,,,,,
कि मै झुठ और फरेब़ के शहर मे----
ऐ,रंग-------------
सच की किस्सागोई करता हूँ।
(अमेठी गई)

बाप - दादा की ,खेती गई ,
उनके आत्म-सम्मान की ,पेटी गई.
अब तो राजनीति से ----
सन्यास ले लो मियां ,
क्योंकि ,- रूझानों से लग रहा 
कि ,- तुम्हारे हाथ से अमेठी गई .

@@ रंगनाथ द्विवेदी
## 7800824758
(पगली बना दो)

नन्हे-नन्हे पाँव-----
छोटी-छोटी अँगूली बना दो.

ऐ,खुदा----------
मुझे फिर से बचपन की तितली बना दो.

मै तैरु गाँव के पोखर,
और तोडू फिर बाग से अंम्बिया,
मुझे माँ की डाँट-------
और बापू के दुलार की पगली बना दो.
(बादल आज रुठ गये है)
जो कभी हरसते थे,
खेत-खेत बरसते थे---------
वे बादल आज रुठ गये है।
माँ के आँचल मे छिप बच्चे डरते थे,
एक जमाना हुआ जब इस तरह-----
बादल गरजते थे।
वे बादल आज रुठ गये है।
वे लह-लहाते तालाब,पोखर खत्म हुये
जहां कभी हम बंसी लगा-----------
मछलियाँ पकड़ते थे।
वे बादल आज रुठ गये है।
वे दादुर,मोर,पपिहा,झिंगुर का गान
पंत,निराला अपनी कविताओ मे लिखते थे,
तब बादल हमारे देश में,
मन के अंदर भी बरसते थे,
ऐ,रंग----वे बादल आज रुठ गये है।

Monday, 22 May 2023

(मेंहदी लगाने के लिये)
जीसे ता-उम्र खुद की मेंहदी ने रुलाया,,,,,,,,,
ऐ,रंग---वही खातुन पुरे शहर मे------
मशहूर है,मेंहदी लगाने के लिये।
(इतवार जीते है)
हम नौकरीपेशा इतवार जीते है,
वे उस शहर,हम इस शहर
दूर रहके भी-------------
हम इतना प्यार जीते है।
हम नौकरीपेशा इतवार जीते है।
वे गीले बाल उनका कमरे में आना,
उतने ही पानी से हम--------------
तड़प के सावन की फुहार जीते है।
हम नौकरीपेशा इतवार जीते है।
छः दिन गुजारते है हम नागफनी के,
फिर लौटते है लेके उन्हे केवड़े का गजरा,
ऐ,रंग---------------
हम इतनी ही खुशी का त्यौहार जीते है।
हम नौकरीपेशा इतवार जीते है।
(कुछ खूबसूरत औरते)
हाँ मैने देखी है कुछ खूबसूरत औरतें,
नदी के किनारे स्याह वर्ण मल्लाहन का------
वे कसे बदन साड़ी खोसे,
जूठे बरतनो का तल्लीन हो माजना,
और उसके उसकनो से आती एक मधुर सी,
खुरचने या रगड़ने की आवाज़,
हाँ एैसी ही खूबसूरती को देख मै कहता हूँ,
कि हाँ मैने देखी है----------
कुछ खूबसूरत औरते।
इस चिलचिलाती धूप में खामोश और बंद,
शहर की खिड़कियो के मौनपन को तोड़ती,
वे कुछ बड़े पत्थरो को,
छोटी-छोटी गिट्टियो में बदलती,
पुरे लय से हथौड़ी की आवाज़,
और उसकी हर चोट पे पसीने से तर-बतर हिलते,
उसके वे दो उरोज़,
मुझे उस मशहूर खजूराहो से ज्यादा खूबसूरत लगे,
हाँ इसिलिये एै"रंग" मै अक्सर कहता हूँ----------
कि हाँ मैने देखी है,
कुछ खूबसूरत औरते।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758
(पेट्रोल सी लागे है)
धीरे-धीरे मुझको कब्ज़ाती जा रही है,,,,,,,
अपने रुप के जादु से।
एै "रंग" ---वे मुझे अब-------------
अच्छे दिन के धोखे में,पेट्रोल सी लागे है।

पेट्रोल की बढ़ी हुई किमत पे।
(बाँह मे मदिरा रही )

जब सभी ने छोड़ा मुझको-
तो हाथ मे मदिरा रही.

हम तड़प के रो उठे,
कोई नही,कोई नहीं-------
बस साथ मे मदिरा रही.

घर मेरा शमशान सा था,
और साँस मे मरघट मेरे ,
मै फिर भी जिंदा रह गया ,
क्योंकि बिस्तर पे भी मेरे---
रात में मदिरा रही.

रोजगाली ,रोज-नफरत 
है इसे जाने क्यों हासिल ?
ये वफा है,ये वफा है
बाकी दुनिया बेवफा है,
मै गिरा तो ये गिरी,
सब आते जाते रह गये,
उस राह मे भी साथ मेरे--
बाँह मे मदिरा रही.

रचनाकार--रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर (उत्तर-प्रदेश)

@@@एक अलहदा टेस्ट की अलहदा रचना जो शायद आपको भी रास आये।
चाँद उतरा है)

ईद हो गई है---
हम मोहब्बत के रोजेदारों की ,
क्योंकि, ऐ "रंग",-
हमारे मोहल्ले की छत पे---
दो चाँद उतरा है.

@@ रंगनाथ द्विवेदी
आप सभी को ईद मुबारक।
(चाय है साहब )

इसकी सोंधी महक--
लिप्टन और ताज़महल से भी,
मशहूर है साहब.

इसकी चुस्कियों के आशिक,
वाह! वाह! करते हैं,
ये हसीन शाम की, 
गुलबदन है,
और मुझ जैसे शायर की,
चाय है साहब.

@रंगनाथ द्विवेदी

Friday, 19 May 2023

(कई मर्तबा उजड़ा हूँ)
मेरे दिल को मकान मत लिख,,,,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----मै वे शख्श़ हूँ--------
जो कई मर्तबा उजड़ा हूँ।

@रंगनाथ द्विवेदी।

Thursday, 18 May 2023

(सिंदूर रोये)
तेरी परी तेरी हूर रोये-----------------
एै रात अय्याशियों मे बिताने वाले,
तेरे घर मे तड़पे है एक औरत,
उसकी भरी मांग मे---------------
तेरे नाम का सिंदूर रोये।
मेंहदी और व्याह के जोड़े को,
वे किस तरह तकती है मजलूम,
उफ़! छाले फूटते हो जैसे------------
जब वे रात को तन्हा अपने पिया से दूर रोये।
सारे किये श्रृंगार उसपे हँसती है सौत सी,
वे जी रही है जिंदगी,
जिंदा रहके भी मौत सी,
वे दरवाज़े पे छोड़ आती है आँख अपनी,
तेरे आने के इंतज़ार मे,
कभी लौटना वक्त़ से और देखना,
कि तेरे कंधे से लग,
किस तरह तेरा प्यार पाने को,
तेरे घर मे तेरी पत्नी का,
शर्म से लरजता,
पहले रात किसी छुवन लिये,
तुम्हे पाने की खुशी मे बिस्तर की हर एक सीलवट,
कुछ टूटी चूड़ी, बिखरे गजरे
इधर-उधर कही खोई बिंदियां,
उसके टूटते बदन से,
तुमसे मिले प्यार की खुशी मे---------
उसकी उम्र और यौवन का अब तलक की तड़प को भुला,
तृप्त आँखों मे------------
जहा का मिल चुका शुरूर रोये।
एै रात अय्याशियों मे बिताने वाले,
तेरे घर मे तड़पे है एक औरत,
उसकी भरी मांग मे------------
तेरे नाम का सिंदूर रोये।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर----222002 (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758
( बंगाल की लड़ाई है)

लोकसभा में ----
सह और मात के चाल की लड़ाई है.
सबसे खतरनाक ----
तो बंगाल की लड़ाई है.
इधर मोदी ,उधर ममता का 
माटी , मानुष ,रोटी 
यहां अच्छे ----
और बुरे हाल की लड़ाई है.
सबसे खतरनाक ----
तो बंगाल की लड़ाई है.
यहां मां दुर्गा ----
और राम दोयम हो गये है ,
आरती वाले अल्पसंख्यक ,
भाजपा दबे जुब़ान ,
भीतर खाने कह रही ,
कि ये अब लोकसभा नहीं ,बल्कि
डरे-सहमे हिंदूओं के ----
इकबाल की लड़ाई है.
सबसे खतरनाक ----
तो बंगाल की लड़ाई है.
बेमानी , सिर फुटौवल ,आगजनी के
किस्से है ,यहां आम ,
यानि ये टीएमसी या भाजपा नहीं ,
ये लोकतंत्र के ----
विक्रम और बैताल की लड़ाई है .
सबसे खतरनाक ----
तो बंगाल की लड़ाई है.

@@ रंगनाथ द्विवेदी ।
(अगले घर की रात)
मै देखता हूँ-------------
कभी इस शहर,कभी उस शहर की रात,,,,,
मै देखता हूँ-----------
एक अंजानि मंजील और लंम्बे सफर की रात।
करता हुँ गुफ्त़गु मै हर मील के पत्थर से,,, 
कभी उठते है कुहाँसे,कभी उठता है धुँआ,,,
मै जानता हूँ ऐ,रंग-------
क्या है?अगले घर की रात।
(1)
जहां से रईस की बिटिया ने----------
हटा रखा है दुपट्टा अपना,
ऐ,रंग----वही पे गरीब की बिटिया,
बदन को ढ़कने के लिये------------
अपने फटे दुपट्टे को रोज सिलती है।

                 (2)
जिन उरोजो को ढक-----------
वे मासूम देखती थी,
कभी वात्सल्य का सपना,
ऐ,रंग----उसके वही दोनो उरोज,
गरीबी के चलते दो घाव हो गये।
(मुमताज़ सोई है)
 ढक दो आज उसे------------
एै मेरी गज़लो के हर्फ,
वे कोई और नही मेरी महबूब है------
जो बेलिबास सोई है।
रख दो कुछ मिट्टी उसके सिरहाने,
एै मेरी गज़लो के हर्फ,
वे कोई और नही मुझ गरीब और मुफलिस की-------
मुमताज़ सोई है।
कितना खूबसूरत है नेपाल----

 (नेपाल)

नेपाल-----
तेरी आँखे किसी हिरनी सी,
आवाज कोयल की कूक
और बाँसुरी की तरह,
चेहरे पे तुम्हारी ये छुईमुई सी शर्म,
उफ! तु क्या जाने? कि तु--
कितनी खूबसूरत है.

नेपाल-----
उसपे तेरी ये सफेद सफ्फाक सी सलवार,
और सीने पे एक अल्लहड़ लड़की सी,
दुपट्टे का इधर-उधर फिसलना,
यूँँ लगता है कि जैसे तु----
किसी परी या अप्सरा की बेटी है.

नेपाल----
तु आज मेरे पूरे हो रहे इस नावेल की,
किताब के------
एक-एक शब्द में जिंदा रहोगी,
क्योंकि हमने तुम्हें देश की तरह नही,
अपनी मोहब्बत
और महबूबा की तरह देखा है.

यह कविता मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है.

रचनाकार---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758
(शाख़ो से मोहब्ब़त की है)

गर तुम काटोगे--
तो मै चिखुँगा,,
ऐ,'रंग'
हमने---
दरख्त़ो के शाखो से मोहब्ब़त की है.

Tuesday, 16 May 2023

(पेट्रोल सी लागे है)
धीरे-धीरे मुझको कब्ज़ाती जा रही है,,,,,,,
अपने रुप के जादु से।
ऐ,रंग----वे मुझे अब-------------
अच्छे दिन के धोखे में,पेट्रोल सी लागे है।

पेट्रोल की बढ़ी हुई किमत पे।
(कैंडिल नाईट)
बहुत उदास है---------------
आज हमारे तुम्हारे मोहब्बत की,
कैंडिल नाईट।
मै वही बैठी हूँ ठिक सामने,
बस वे जगह खाली है-
जहां तुम बैठते थे,
आज बहुत उदास है मेरे अंदर जिंदगी,
मै टुट रही हूँ!
मेरे संग बीत रही है,
बस तुम्हारे खूबसूरत यादो की-----
कैंडिल नाईट।
शायद कही चुक गये हम,
इसी से हमारे रिश्ते में गलतफ़हमी बढ़ती गई!
तुम अलग हो गये मै अलग हो गई,
अब तो अक्सर--------------
डिनर मेज पे ही रह जाता है,
और मै कुर्सी पे बैठी यु ही,
गुजार देती हू-------------
अपनी कैंडिल नाईट।
गर गुंजाइश हो तो लौट आओ,
एक मर्तबा ही सही मुआफ करने,
क्योंकि ऐ,रंग-----कही ऐसा न हो,
कि तेरा इंतजार करते-करते,
हमेशा के लिये बुझ जाये,
मेरी ये कैंडिल नाईट।

@@@आज मेरी इस रचना को अटुट बंधन पत्त्रिका व लखनऊ से प्रकाशित सच का हौसला की प्रधान संपादक श्रीमती वंदना वाजपेयी ने अपने दैनिक समाचार पत्र मे प्रकाशित कर हमे जिस स्नेह से नवाजा है,उसके लिये मै उनका तहेदिल से शुक्रगुजार हूँ।
काग्रेंस की एक और हार पर तिखा कटाक्ष -------------
                    (काग्रेंसी जनाजा निकला)
बे-आबरू हो गये-----------
जब कर्नाटक से भी काग्रेंसी जनाजा निकला।
हाय! साँप लोटा कलेजे पे एक मर्तबा फिर----
जब भाजपा की जीत का बाजा निकला।
शनी ,राहू ,साढ़े साती क्या कहूँ ?
मैं माँ हूँ राहुल की जानती हू,
मुँह लटकाये बेटे को तकने का दर्द,
उफ! लाख चाहा पर क्या करू ?
किस्मत ही एैसी है कि वे,
खानदानी चश्मोंचिराग,लख्त़ेजीगर-------
एक और राज्य से बीन बने राजा निकला।
ये मोदी और शाह का तिलिस्म क्या है ?
समझ से परे,
कि जब भी कोशिश की इन्हें मात देने की-------
तो हर बार गलत काग्रेंस का अंदाजा निकला।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर----222002 (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.----7800824758
(ताज़महल से चिटकने की आवाज आती है)

सुनो तो---------
ताज़महल से सिसकने की,
एक आवाज़ आती है.
ये आवाज़-----
उसके संगतराश की है,दर्द की है
कभी-कभी तो जैसे ऐ "रंग"
ताज़महल के किसी पत्थर से,
चिटकने की-------
एक आवाज़ आती है.

@@@रंगनाथ द्विवेदी.
7800824758
(रेप के घाव)
थाने पे---------
एक गरीब की बिटिया,
अपनी सलवार उतारे,
जगह-जगह हुये-------
रेप के घाव दिखा रही है.
दारोगा------
बार-बार थप-थपा के देख रहा,
दाँत और नाखून चुभे,
उसके उरोजो को,
लड़की सिहर उठी-----
उसी रेप के छुवन सा,
एहसास हुआ उसे,
वे समझ गई,
आँख भर-भरा आई उसकी,
कि अब एक रात और
चिखेगी थाने पे,
फिर हरे हो जायेंगे ना भरने के लिये,
उसकी उरोजो पे ताजिंदगी,
ऐ "रंग" ------
ये रेप के घाव.

@@@रचनाकार---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U.P.)
Mo.no.7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।
इसके बच्चे सब अमीर हो गये,
लेकिन देख लो--
ये बुढ़ा आज भी--------
उन्हे बीना कुछ कहे ऐ "रंग"
पहले सा ही चुरन बेचता है.
शायद,
औरंगजेब की रूह,
आज हमारी सनातन आस्था 
और संस्कृति से हार गई,

शिव
तमाम आक्रांताओं
के बाद भी 
हमारी अंतस में
जीवित रहे

और जीवित रही
हमारी वह काशी
जो कभी कबीर,
बिस्मिल्ला खान
ने देखी,
और जय शंकार प्रसाद,
और नसीर बनारसी ने परखी.

ज्ञानवापी
हमारे आस्था का लम्बा
वनवास था
जो
इतने विराट शिवलिंग के मिलते ही
खत्म होता दिखाईं पड़ रहा,

आइए
हम वैदिक
विजय की इस घड़ी में
संयम बरते
और अपनी काशी को
वही काशी रहने दे,
जो इस नगरी की
सनातन पहचान हैं
अर्थात 
काशी का फक्कड़पन.

हर हर महादेव 💐💐💐💐🙏🙏🙏🙏

Monday, 15 May 2023

(बिरान बहुत है)
भीड़ मे लोग बहका रहे है खुद को,,,,,,,,,,,,
वरना ऐ,रंग------------
इस शहर मे अंदर से बिरान बहुत है।
(इंदिरा थी)

वे दर्द थी, पीडा़ थी
वे प्रियंका नही इंदिरा थी.
वे दृढ थी, लौह थी
उसने मिथक गढ़े,
आपातकाल लगाया,
पाक को टुकड़े मे तोड़ दिया,
वे राजनीति की नपुंसक नही,
एक दहाड़ थी,
तुम प्रियंका हो वे इंदिरा थी.
वे बचपन की गूंगी गुडिया थी,
लेकिन-------
जब बोली तो लोग गूंगे हो गये,
प्रियंका तुम बस प्रियंका हो,
नकल करो,
कोयले को कोयला रहने दो,
वे हिरा थी.
दादी तलक तो ठीक है,
लेकिन वे तुम्हारी नही,
हमारे इस देश की इंदिरा थी.

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U.P.)
Mo.no.7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

Sunday, 14 May 2023

(हज़ किया है)
उसे टुट के चाहा है,,उससे लव किया है,,,,,,
ऐ,रंग----हमने अक्सर--------
उसकी गली में हज़ किया है।
(उठाओ फेक दो मुझको)
उठाओ फेक दो मुझको----------------
जरा सा दिल कड़ा करके,
भला कौन रखता है?
घर में आईना टुटा।
उठाओ----------
लौट जाना तुम किनारे से,
समंदर के!
भला कौन ले जाता है?
आखिर साथ अपने------
रेत का घर बना टुटा।
उठाओ--------------
मै मौसमे खिज़ा का मारा हूँ,
ना मुझसे दिल लगाना तुम!
ऐ,रंग------भला कौन ले जाता है?
अपना घर सजाने------------
पत्ता शाख से टुटा।
उठाओ फेकदो मुझको,
जरा सा दिल कड़ा करके,
भला कौन रखता है------
घर में आईना टुटा।
(रेप के घाव)
थाने पे--------
एक गरीब की बिटिया,
अपनी सलवार उतारे---------
जगह-जगह हुये रेप के घाव दिखा रही है।
दरोगा----------
बार-बार थप थपाके देख रहा,
दाँत और नाखून चुभे---------
उरोजो को बार-बार।
लड़की सिहर उठी---उसी रेप के छुअन कासा,
ऐहसास हुआ उसे!
वे समझ गई आँख भर-भरा आई उसकी,
कि अब एक रात और चीखेगी थाने पे,
फिर हरे हो जायेंगे---------------
ना भरने के लिये उसकी उरोजो पे ताजिंदगी,
एै,रंग-----------ये रेप के घाव. 

यह रचना मेरी स्व-रचित व अप्रकाशित है. 

रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
Mo. no. 7800824758
मुनव्वर राना के विवादित बयान पर चंद लाइन-------

         ( मुनव्वर माँ हिन्दू या मुसलमान हुई )

तुमने "माँ" पे ढ़ेरो लिखा मुनव्वर, 
लेकिन तुम मुक़म्मल-----
इस मिट्टी और मुल्क़ के हो नही पाये. 

ये दरख़्त, ये जुगनू, ये पीपल 
भी ना तुम्हें मुआफ करे मुनव्वर, 
तुमने जो लिखा-------
उस अदब के भी हो नही पाये. 

ये तुम्हारी जहालत है कि--
दोजख़ तेरी जुबान हुई, 
बता ऐ मुनव्वर---
आखिर कब से तेरी "माँ "
हिन्दू या मुसलमान हुई. 

यह रचना मेरी स्वरचित है. 

रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जौनपुर.
(अवैध संम्बंध है)

हाँ मुझे कुब़ूल है,
तेरे इल्ज़ाम से पहले,,,

ऐ,खुबसूरती--
कि मेरा
तेरी तारिफो से अवैध संम्बंध है.
(ड्रग्स लेता हूँ)

मेरे रोम-रोम में है,
उसके चुभने के निशानात--
ऐ,रंग----
मै उसकी मोहब्ब़त का ड्रग्स लेता हूँ।

Saturday, 13 May 2023

(पाँव रिक्शा)
चेहरे पे एक थकन------------
होठों पें सुलगती बीड़ी,
पेट भरने की खातिर--------
सीने से खिचने को पाँव रिक्शा,
बाबू यही है अपना किस्सा।
तपती डामर की सड़क पे,
हम रोज लिखते है अपनी भूख,
बाबू यही है हमारी जिंदगी,
पेट की खातिर-----------
सीने से खिचने को पाँव रिक्शा,
बाबू यही है अपना किस्सा।
कभी किसी पुलिसिये की बेजा गाली,
बीन किराये के उतरना,
चेहरे पे चंद थप्पड़,
और पसीने से भीगे तर-बतर चेहरे को,
मैले गमछे से पोंछना,
फिर आगे बढ़ जाना पिके गुस्सा,
पेट की खातिर--------------
सीने से खिचने को पाँव रिक्शा,
बाबू यही है अपना किस्सा।
छोटे बच्चे बीमार बीबी,टपकती छत
अपनी घर से दुर खुले आसमान तले,
सुलगती बीड़ी फूटपाथ,
और अपने दाहिने हाथ से,
लोहे की सिकड़ी से बांध लगा ताला,
फिर सिरहाने सारी रात खड़ा,
मेरी जिंदगी की तरह पाँव रिक्शा।
(जन्म से गुँगी है)
वे थिरकती है----------
तो उसके घुँघरु और पाँव बोलते है,,,,,,,,
ऐ,रंग----------
वे मासुम जन्म से गुँगी है।
(इंदिरा थी)

वे दर्द थी, पीडा़ थी
वे प्रियंका नही इंदिरा थी.
वे दृढ थी, लौह थी
उसने मिथक गढ़े,
आपातकाल लगाया,
पाक को टुकड़े मे तोड़ दिया,
वे राजनीति की नपुंसक नही,
एक दहाड़ थी,
तुम प्रियंका हो वे इंदिरा थी.
वे बचपन की गूंगी गुडिया थी,
लेकिन-------
जब बोली तो लोग गूंगे हो गये,
प्रियंका तुम बस प्रियंका हो,
नकल करो,
कोयले को कोयला रहने दो,
वे हिरा थी.
दादी तलक तो ठीक है,
लेकिन वे तुम्हारी नही,
हमारे इस देश की इंदिरा थी.

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U.P.)
Mo.no.7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

Friday, 12 May 2023

(आधा चाँद भी कुबूल है)
पुरे चाँद की ख्व़ाहिश को----------------
गर पुरी न कर सको,
तो सर पे दुपट्टा रखे आना!
ऐ,रंग------आधा चाँद भी हमे--------
तुम्हारी छत पे कुबूल है।
(बड़ा शायर था)

जिस शख्स को
भूख और मुफलिसी ने मारा 
ऐ,रंग--
अब उसी को लोग
कहते है कि----
वे बड़ा शायर था।

Thursday, 11 May 2023

(ईश्क़ लिखुँगा)
आओ मेरा सर कलम कर दो,,,,,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----------
गर मैं जिंदा रहा तो-ईश्क़ लिखुँगा।
(पानी बचाते है)
तेरे इंतकाल पे आबे जमजम,
तो हमारी मौत पे-----------
गंगा का पानी पीलाते है।
तुम्हे जन्नत मिलती है,
तो हम भी स्वर्ग जाते है!
तो फिर क्यू हम नदियो और कुँओ,
के पानी को रुलाते है।
आओ तुम्हें एक इंकलाब की खातिर,
हम मंदिर और मंस्ज़िद से बुलाते है।
पानी को वालिद समझ के तुम बचाओ,
और हम भी पानी को ऐ,रंग------------
एक माँ की तरह बचाते है।

@@@सेब द वाटर।
हिन्दी सिनेमा की दो तड़प मीना कुमारी और कमाल आमरोही------
                      (कमाल आमरोही निकले)
मीना दिल हार गई--------------
लेकिन तुम बेवफ़ा कमाल आमरोही निकले।
डुबना चाहा तेरी आगोश मे लेकिन डुब न सकी,
हाँ !ये मीना बेशक गमे शराब मे डुब गई,
लेकिन डुबती हर घुँट से मैने सुना है खुद--------
तेरे न रहने पे भी,
शराब की हर घुँट से मेरे बूँद-बूँद कमाल आमरोही निकले।
एक बसे घर की आह!लगी शायद,
तभी तो मुझको ये तबाहे लम्हात मिले,
और मै शम-मये मोम के छाले की तरह,
जल और फूट रही!
या खुदा! एैसी गमे बेवा सी जिंदगी,
मेरी तरह तड़प के----------
किसी बिस्तर पे सोई न मिले।
हाँ! ये इंतकाले मीना छोड़े जा रही,
एक तड़प होंठ पे अपनी,
शायद आँख भिगेगी और तुम रोओंगे,
मैने तुमसे मोहब्बत ही इतनी टुट के की है,
मेरे न रहने पे------
जब भी तुम अपनी इस अधुरी और तन्हा मीना को याद करोगे,
तो उस याद के होंठ पे भी तुम्ही आओगे,
हाँ!इतनी इनायत तुम जरूर करना------------
कि मेरी याद को सिने से लगा के,
कुछ देर बीते दिनो की तरह खड़े रहना,
और चुम लेना मेरी यादो के लरज़ते होंठ,
जब मेरे मेहबूब------
मेरी जु़बा से कमाल आमरोही निकले।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

Tuesday, 9 May 2023

माँ का एक रूप यह भी है कि वे अपनी युवा हों रही बिटिया को समय-समय पर समाज़ के तमाम ऊंच-नीच का ज्ञन भी कराती रहती है.

(ओढ़नी)

याद है बचपन---
मैं पहले कहाँ ओढ़ती थी ओढ़नी.
वे तो जब मैं तेरह की हुई,
तो अचानक-
"माँ" ने डाँटना शुरु किया,
और कहने लगी----
अब तुम अपने सीने पे
रंखा करो ओढ़नी।

मैं चौंकी--
कि ये अचानक "माँ" को क्या हुआ?
फिर लगा नही कुछ तो है,
यूँही नही माँ रखवाना चाहती होगी---
मेंरे सीने पे ओढ़नी.

फिर कमरे में बंद कर,
खुद को शीशे में टटोलने लगी,
तो अचानक कुछ शर्म सी आई,
कुछ बदला सा था,
जहाँ "माँ" ने कहा था-
मुझे रखने को ओढ़नी.

मै बाहर निकली---
तो देखा बचपन को खिसकते,
लगा "माँ " कितना सच कह रही थी,
कि तु सयानी हो रही है,
क्योंकि कुछ लोग तक रहे थे,
एै,रंग------
वही जहां "माँ "ने कहा था,
रख लो तुम ओढ़नी.

@@@रचयिता----रंगनाथ दूबे।
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला-जौनपुर पिन नं.222002 (उत्तर-प्रदेश)
mo. no----7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.
माँ का एक रूप यह भी है कि वे अपनी युवा हों रही बिटिया को समय-समय पर समाज़ के तमाम ऊंच-नीच का ज्ञन भी कराती रहती है.

(ओढ़नी)

याद है बचपन---
मैं पहले कहाँ ओढ़ती थी ओढ़नी.
वे तो जब मैं तेरह की हुई,
तो अचानक-
"माँ" ने डाँटना शुरु किया,
और कहने लगी----
अब तुम अपने सीने पे
रंखा करो ओढ़नी।

मैं चौंकी--
कि ये अचानक "माँ" को क्या हुआ?
फिर लगा नही कुछ तो है,
यूँही नही माँ रखवाना चाहती होगी---
मेंरे सीने पे ओढ़नी.

फिर कमरे में बंद कर,
खुद को शीशे में टटोलने लगी,
तो अचानक कुछ शर्म सी आई,
कुछ बदला सा था,
जहाँ "माँ" ने कहा था-
मुझे रखने को ओढ़नी.

मै बाहर निकली---
तो देखा बचपन को खिसकते,
लगा "माँ " कितना सच कह रही थी,
कि तु सयानी हो रही है,
क्योंकि कुछ लोग तक रहे थे,
एै,रंग------
वही जहां "माँ "ने कहा था,
रख लो तुम ओढ़नी.

@@@रचयिता----रंगनाथ दूबे।
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला-जौनपुर पिन नं.222002 (उत्तर-प्रदेश)
mo. no----7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

Monday, 8 May 2023

(शाख़ो से मोहब्ब़त की है)
गर तुम काटोगे--तो मै चिखुँगा,,,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग--------हमने---
दरख्त़ो के शाखो से मोहब्ब़त की है।

Sunday, 7 May 2023

(शाख़ो से मोहब्ब़त की है)
गर तुम काटोगे--तो मै चिखुँगा,,,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग--------हमने---
दरख्त़ो के शाखो से मोहब्ब़त की है।
(अवैध संम्बंध है)
हाँ मुझे कुब़ूल है,तेरे इल्ज़ाम से पहले,,,,,,,,
ऐ,खुबसूरती-----कि मेरा
तेरी तारिफो से अवैध संम्बंध है।

Friday, 5 May 2023

निर्भया के कातिलो को मिले फांसी से प्रेरित कुछ लाइन----------
                         (निर्भया को न्याय है)
ये महज़ फाँसी नहीं---------------
उस निर्भया को न्याय है।
जो चीखी,तड़पी,छटपटाई
तेरी विकृत कुंठा के डाले गये वे सरिये,
कितने घृणित थे!
काश तुम्हारी माँ ने कहा होता,
या तुमने-----------
अपनी सगी बहन के वे गुप्तांग याद किये होते,
तो तुम्हारा ज़मीर कहता कचोटता,
कि ये पाप है,अन्याय है
और तुम कांप जाते!
हां तुम्हारी पशुता व अमानवियता से,
वे कुछ ही दिनो मे मर गई,
लेकिन तुम तभी से मर रहे हो तील-तील,
सच गलिजो़--------------
आज निर्भया की रुह खुश होगी,
उसका गला रुंध आया होगा,
ये तुम्हें महज़ फाँसी नही बेगैरतो बल्कि------
उस मासुम और बेगुनाह लड़की,
निर्भया को न्याय है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758
(रोमांटिक वैगन बेलियाँ)

वे सायबान के पिछे---
शाम को छिपता हुआ सूरज,
और काम से लौटती पहाड़ि लड़कियाँ, 
ना कोई थकन,ना कोई सिकन,
अलमस्त,अल्हड़पन--------
बाते करती,खिल-खिलाती ऐ,रंग--------
मेरी कविता की 
वे रोमांटिक वैगन बेलियाँ।

Thursday, 4 May 2023

(नागफनी सा हो गया हूँ)

गमले में सजी-------------
मै नागफनी सा हो गया हूँ.
आम, महुवे और निम्मौड़ी नीम की,
बंद कमरे की खिड़की से नही दिखते,
मेरे गाँव के पोखर,
ढ़ेरो आवाजें और शोर-शराबा
अंदर से मुझे कचोट रहा
ये कान भी तरस रहे सुनने को,
बागो में राग कोयल,
आज सबकुछ बदल गया है,
मै और मेरी जिंदगी दोनो,
अब बस केवल इतना है कि,
गमले मे सजी--------
मै नागफनी सा हो गया हूँ.
गरमी की उमस है,
और इतना बड़ा ये कंक्रीट का घर,
पर वे प्यास वे पानी,नही
जो मेरे कुँए के महज एक लोटे मे था,
उफ! शहर मे नमकीन और
मिठाई की ढ़ेरोंं दुकाने है,
लेकिन मन की मिठास कड़वी हो गई,
वे देशी गुड की डली,
छोड आया,
मै बस केवल इस कंक्रीट के घर मे,
गमले मे सजी--------
नागफनी सा हो गया हूँ.
चारो तरफ मशीनी खड़-खड़ाहट है,
रात है रौशनी है,
गाड़ियों की ढ़ेरों आवा-जाही है सड़क पे,
पर मेरी आँख खुली की खुली है,
याद आ रहा मुझे गाँव,
वे दरवाजे पे बिछी चारपाई,
वे पीपल के रात की सुंदरता मे ढेरों
चमकते जुगनू
हाय! ये पैसे की हत्तक ने छिन लिया,
आज मै जिंदा रह के भी,
केवल इस घर के,
गमले मे सजी ऐ "रंग" 
मै नागफनी सा हो गया हूँ.

@@@रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U.P.)
Mo.no.7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।
श्वेत वर्णा प्रकाशन से शीघ्र प्रकाशित किन्नर विमर्श की लघुकथाओं का साझा संग्रह।

Wednesday, 3 May 2023

(ड्रग्स लेता हूँ)
मेरे रोम-रोम में है,उसके चुभने के निशानात--------
ऐ,रंग-------------
मै उसकी मोहब्ब़त का ड्रग्स लेता हूँ।
(वंदे मातरम गाये)
शहीद की लाश को जब गाँव दफनाये------
तो वंदे मातरम गाये।
ना बीबी तोड़े चुड़ी ना आँसू बहाये,
फक्र करे हमपे और खुल के मुस्कुराये,
और अपने शौहर की शहादत पे---------
वंदे मातरम गाये।
माँ ने गाई थी बचपन में लोरियां बहुत,
आखिरी इच्छा है कि रोना नही माँ,
गर हो सके तो तु भी मेरी लाश के सिरहाने,
अपने बचपन के लोरियो की तरह-------
वंदे मातरम गाये।
बापु देना कांधा कब्र तक मुझे,
और मिट्टी डालते बखत,
दिल कमजोर मत करना,
क्योंकि मेरी इच्छा है कि आपके लब पे बेटा नही बापु-------
वंदे मातरम आये।
शहीद की लाश को जब गाँव दफनाये-------
तो वंदे मातरम गाये।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758
इस लेख का आशय किसी को आहत करना नही है,ये मेरा महज व्यक्तिगत विचार भर है।
                        (जिन्ना व नेहरु)
जिन्ना व नेहरु-----------
इस मुल्क के दो घाव थे!
इनकी चाह थी दिल्ली-----
इनके इसी चाह की भूख ने,
लाखो-लाख जिंदगियाँ निगल ली।
मजलुम औरतो की आबरू लुटी गई,
स्तन काटे गये,
मासूम बच्चियो के गुप्तांगो मे खंजर उतारा गया।
जिन्ना के कायदे आजम बनने की नाजायज भूख ने ही,
पाक जैसे नामाकूल देश को जन्म दिया।
लेकिन वहा भी खुदा ने एक मुसलमान के तौर पे,
जिन्ना को कबूल नही किया।
कहते है कि इस्लाम मे-----------
एक मर्तबा दफन होने के बाद दोबारा कब्र खोदना हराम है,
पर सुना है कि पाकिस्तान के इस कायदे आजम की कब्र,
कईयों मर्तबा खोदी गई।
एसे गलिज शख्स की तस्वीर ----------
हमारे मुल्क के तालिमे मस्जिद मे टंगा होना,
सच्चे और राष्ट्रभक्त मुसलमानों की तौहीन नही तो क्या है?
सच तो ये है की इस शख्स की तस्वीर को,
हमारी वर्षों पुरानी कांग्रेस सरकार को,
बेईज्जत कर कही फिकवा देना चाहिये था,
जो शायद अपने वोट बैंक की खातिर काग्रेस कभी कर नही पाई।
फिलहाल हमारे मुल्क के किसी भी दिवाल पे अगर किसी को-----
टांगना है तो वहाँ जिन्ना नहीं कलाम टंगे हो।
और इस देश के एैसे तमाम राष्ट्र-विरोधी--------
गैग्रीन जैसे पाँव काट देने चाहिये।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर----222002 (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.----7800824758

Tuesday, 2 May 2023

(मलबे में दबा रहा)
वे किसी गैर को देती रही राहत,,,,,,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग---------------
मै,उसकी मोहब्ब़त के मलबे में दबा रहा।

Monday, 1 May 2023

वरिष्ठ! कहानीकार बड़े भाई राम नगीना मौर्य, जनपद कुशीनगर (उत्तर-प्रदेश) का प्रकाशित कहानी संग्रह " सॉफ्ट कॉर्नर" डाक से प्राप्त हुआ, इसके लिए बड़े भैया को हमारा प्रणाम. 

रचना व पुरस्कार---इनके कहानी संग्रह "आखिरी गेंद" के लिए एक लाख रूपये का "डॉ विद्या निवास मिश्र " पुरस्कार व इसी कहानी संग्रह के लिए "यशपाल पुरस्कार " उत्तर-प्रदेश साहित्य संस्थान से प्राप्त है. 

साथ ही विभिन्न राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित व पुरस्कृत.
एक, और उपलब्धि देश के 70 रचनाकारों में मेरी कविता जिसका शीर्षक है "मेरी गुलमोहर " की लेखकिय प्रति परसो डाक से प्राप्त हुई.

इसके संपादक, बिहार के बिभूति भूषण झा सर है, जो वर्तमान में गुवाहटी में सरकारी उच्च पद पर कार्यरत है. इनके बेहतरीन संपादन में अब तक,

"अवली","इन्नर ", "बारहबाना ",और काव्य-संकलन "प्रभाती " आ चुकी है.

इनके दो संकलन में मुझे भी शामिल होनें का सौभाग्य प्राप्त है, "इन्नर " में मेरी कविता के साथ ही एक लघुकथा भी शामिल थी. और अब "प्रभाती " में भी उपस्थित हूं.

"प्रभाती " काव्य संकलन अमेजॉन पर भी उपलब्ध है जिसे आप कोरियर चार्ज सहित महज़ 150/ रूपए में अगर चाहे तो आर्डर कर आसानी से प्राप्त कर सकते है.

एक बार पुनः संपादक बिभूति भूषण झा सर का आत्मीय आभार कि उन्होंने मुझे अपने एक और संकलन में शामिल होनें का अवसर दिया 🌹🌹🙏🙏
(पी.एच.ड़ी.कर ली)
मोहब्बत में---------
मै आज तलक स्नातक न हुआ,,,,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----उसने कईयो का दिल तोड़----
इस हूनर पे पी.एच.ड़ी.कर ली।
(बुखार में सोया है)
ऐ अमीरी कहाँ तेरी तरह--------
वे किसी तीज या त्योहार मे सोया है।
अपने मासूम बच्चो के दोज़ख के लिये,
ऐ,रंग----एक मज़दूर--------
पुरी रात बुख़ार में सोया है।

@@मज़दूर दिवस।