Saturday, 28 September 2019

(1965 की जंग और हाजी पीर)

(1965 की जंग और हाजी पीर)
आज भी उभर आती है बनके ताजी पीर,
हम कैसे भुले वे जंगे लम्हा,
जब एक-एक कर मर रहे थे------
हमारी बटालियन के बीर।
कैसे भुले हम उस अब्दुल को जो------
लहू से तरबतर कह रहा था,
अल फतह एै मादरे वतन------
तेरे लिये हाजी पीर।
वे जंग 65 की हम जीत तो गये,
पर हमारे घर के चंद सियासी गद्दारो ने,
गवा दिया अपने सुख के लिये मेज पे,
हम शहीदो के लहू से----------
जीता हुआ हाजी पीर।
वे घुसपैठिये या दहसतगर्द नही,
वे आर्मी थी दुश्मने पाक की-----
मेरे मूल्क ने मुआफ कर उन्हें,
झुका दिया सर हमारे हर बीर की।
आज भी चुभता है---------
मुझ रिटायर फौजी के सीने में,
जहां गोली लगी थी!
अब भी आवाज आती है मेरे कानो में एै,रंग---------
मेरे बटालियन के उस अमर शहीद अब्दुल की---------
जैसे कह रहा हो कि हम हार गये भाई,
अपने ही सरहद वालो से जो जीता था---
हमने इतनी शहादत से हाजी पीर।

@@@@1965 के पाकिस्तानी जंग में शहीद हुये तमाम शहीदो को मेरा सलाम।

Sunday, 1 September 2019

(एक जिंदा दिया हूँ)

(एक जिंदा दिया हूँ)
ताउम्र अपनी मै जल-जल के जिया हूं,
मै आदमी नही-----------
एक जिंदा दिया हूँ।
तमाम खराशे है,है तमाम सिलवटे
उधड़ा रहा मै----------
किसी मुफ़लिस के बिछौने सा,
हर जख्म जिंदगी का-------
मै खुद से सिया हूं।
मै आदमी नही--------
एक जिंदा दिया हूँ।
हु मै एक एैसा सजायाफ्ता,
जो रो नही सकता!
खौलते है आँसू मेरे दिल के अंदर,
मै कभी बहार में नही-------
खिजा़ में जिया हूं।
मै आदमी नही------
एक जिंदा दिया हूँ।

(बेगुनाह रावण जल रहा है)

(बेगुनाह रावण जल रहा है)
अब रावण का चरित्र---------
रामलीला में खल रहा है!
बेचारा------------
एक सीता के नाते प्रतिवर्ष जल रहा है।
एै दिल्ली--------------
जबकि तु लंका से गई बीती है,
क्योंकि रेप और बलात्कार,
तेरी सड़को पे चल रहा है,
और बेवजह---------
दशहरे में रावण जल रहा है।
अब वक्त आ गया है कि,
तेरी सदन में---------
रावण की समिक्षा होनी चाहिये!
क्योंकि अपनी सीता को,
अब रावण से कही ज्यादा,
उसका राम छल रहा है,
और दशहरे में एै,रंग------
बेगुनाह रावण जल रहा है।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.---7800824758
यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।
आप सभी को नौरात्र और दशहरे की ढ़ेर सारी बधाई।