Saturday, 31 December 2022

(कैनवास पे नया साल)
मेरा वजुद क्या है?मैने पुछा है नया साल,
क्या शिला यही है कि दर्द ही मिले,
मैने तो दिल के अपने कैनवस पे तुमको,
खिचा है नया साल------------
मेरा वजुद क्या है?मैने पुछा है नया साल।
मैने ख्वा़बो के घरौंदे को कितना सजाया,
पर वे भुले नही भुला,हमे जिनको भुलना था,
उन्ही की याद मे तो शायद,
अपनी अश्को से हमने यारो सिचा है नया साल----------
मेरा वजुद क्या है?मैने पुछा है नया साल।
मुझे मिली है दुरियाँ तोहफ़े मे इंतज़ार,
मै खड़ा हुं अजनबी सा हर कही,
मै जाऊं किधर,क्या पता,मंज़िल कहां,
लो नाम लेके उनका मैने चिखा है नया साल------
मेरा वजुद क्या है? मैने पुछा है नया साल।
पर गिला नही एै दुर के साथी,
मै तो कोसता हूं बस अपनी मुकद्दर को,
बस तुमको खुशी मिले एै शरिके हयात मेरी-----
और मुबारक हो नया साल।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

@@@धन्यवाद आपका सतिश जोशी भईया जो मध्य प्रदेश से प्रकाशित 6pmसांध्य दैनिक मे आपने मेरी कविता(कैनवास पे नया साल) को अपना प्यार और स्नेह दिया।
(कलेन्डर की विदाई)
कभी पहली तारीख थी-----
आज़ आखिरी तारीख हूँ,
लाओ टाँगो एक और कलेन्डर---
मै उफ!न करुँगी,बस ये ख्व़ाहिश है कि,
मुझे अपने घर की दिवाल से,
ऐ,रंग----उसी प्यार से उतारो------
जैसे कभी टाँगा था।

Friday, 30 December 2022

(नये साल मे----पपुवा की मम्मी डिजिटल हो गई)
नये साल मे मोबाइल खरीद---------
मेरे पपुवा की मम्मी डिजिटल हो गई।
पहले से ही क्या कम अक्ल थी उसमें,
अभी उसी से निजात न मिली थी,
कि हाय राम!
हमारे पपुवा की मम्मी-------
पहले से ज्यादा टेक्नीकल हो गई।
नये साल मे मोबाइल खरीद-----
मेरे पपुवा की मम्मी डिजिटल हो गई।
अब तो कुछ उसके शब्द भी सिनेमाई हो गये,
दिन भर झगड़ती है,
फिर सेल्फि लेते समय ये कहना-----
कि क्या मुँह बनाये बैठे हो चलो हँसो,
फिर अपने रंगे-पुते चेहरे को मेरे पास ला,
कई सेल्फि लेती है,
उफ! रे मोबाइल, चाहे जैसे थी,
थोड़ा बहुत ही सही,
प्यार तो करती थी पपुवा की मम्मी,
लेकिन वाह रे! नया साल,
कि मोबाइल खरीदते ही मेरे पपुवा की मम्मी---
कितना क्रिटिकल हो गई।
नये साल मे मोबाइल खरीद------
मेरे पपुवा की मम्मी डिजिटल हो गई।
उसे सजी-सँवरी होने पे भी,
छुने की हिम्मत न पड़ रही,
पता नही कब मुड़ आॅफ हो जाये,
थोड़ी बहुत संभावना भी साफ हो जाये,
इस डर से मै हिन्दी के स्टुडेंट की तरह,
डर रहा क्या करु,हाय राम!
इस नये साल---------
मेरे पपुवा की मम्मी ना समझ आने वाली,
कमेस्ट्री की केमिकल हो गई।
नये साल मे मोबाइल खरीद-------
मेरे पपुवा की मम्मी डिजिटल हो गई।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर।
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Thursday, 29 December 2022

(ऐ संगदिल)
ऐ संगदिल-
इतनी सी मु-रौवत कर दे।
बस आखिरी मर्तबा-
मेरी अश्क-ऐ-रूह की तरफ,
तु अपनी सुरत कर दे।
फिर शौक से ऐ,रंग-
तु सुपूर्द-ऐ-खाक मेरी मईयत कर दे।
ऐ संगदिल-
इतनी सी मु-रौवत कर दे।
(मूँह दिखाई दी है)
तु चाहे--------
जितना सज ले ऐ शहर-ए-दूल्हन,
मैने तो अपनी पुरानी दूल्हन को,
ऐ,रंग----ताज़िदगी-------
नये सुबह की मूँह दिखाई दी है।

@@@नये साल की कडी मे एक और रचना।
(उत्तर-प्रदेश का चुनाव यानी सियासत के छज्जे पे खड़ी द्रोपदी)
उत्तर-प्रदेश के आगामी चुनाव की अग्नि अब जल चुकी है,धुँये उठ रहे है,ये धुआँ संप्रदाय का है,जाति का है।तमाम दबी इच्छाये,अंतरकलह,अपनी जुबान से इस चुनावी समर मे ब्यक्त होंगी।चाचा,भतीजे,भाई,बाप,परिवार हासिये पे दिखेंगे!क्योंकि राजनीति के कौरवो और पांडवो को अब सियासत के छज्जे पे----अपने स्वार्थ की द्रोपदी,गिले बालो को खोल खड़ी दिखने लगी है।
ये द्रोपदी लखनऊ सी हस्तिनापुर को ढ़ेरो ताने मारेगी,तमाम दुर्योधनो के सीने चाक करेगी,जिसके फलस्वरूप आज का धृतराष्ट-गांधारी अंधे हो उठेंगे।लेकिन ये कलयुग की द्रोपदी अब केवल कुछ पाशो मात्र से नही जिती जायेगी और ना ही राजतंत्र के दूशासन की तरह अपनी रजस्वला काल मे भरी सभा मे साड़ी खिच नंगी की जायेगी।
क्योंकि ये द्रोपदी आज के लोकतन्त्र की स्वार्थ प्रिया है,ये अपने लिये किसी कृष्ण का आवाहन नही करेगी!हां इसे अगर आज के दुर्योधन या दूशासन इसके अनुकूल दिखे तो सत्ता सुख की खातिर,प्राचीन सिद्धांतो को छिन्न-भिन्न कर ये स्वयं दुर्योधन या दूशासन की जांघो पे जा बैठेगी।
हां कुछ तथाकथित लोगो के खुद और परिवार की लड़ाई ने,एक योग्य मुख्यमंत्री को बिचलित सा कर दिया है,क्योंकि वे अर्जून की तरह आज मात्र अपने लक्ष्य अर्थात मछली की आँख नही बल्कि उन आँखो से असहाय हो अपने चाचा और पिता को देख रहा है।एक योग्य युवा मुख्यमंत्री अपने पिता और चाचा के सियासी तीर से बुरी तरह बिंध गया है।
आज उसको पालने वाले,अपनी गोद मे खेलाने वाले चाचा एक-एक कर उसके द्वारा दी गई प्रत्याशीयो की सुची से वैसे ही नाम काट रहे है-----जैसे कभी महाभारत के युद्ध मे पालने-पोसने वाले अपने ही बच्चो को मार काट रहे थे।
लेकिन इस युद्ध के चक्रव्युह को आज के इस अर्जून को तोड़ना होगा!मोह माया का त्याग कर इस झंझावत से निकल एक नये समाजवादी युग की रचना करनी होगी।
तभी आज के सियासत की पांचाली अर्थात इस उत्तर-प्रदेश के छज्जे पे अपने बाल खोल खड़ी एकटक तक रही द्रोपदी अब स्वमेव किसी अर्जून को बहका तो सकती है----लेकिन वरण कर ये उसे ही सत्ता के सुहाग सेज तक ले जायेगी जो उसे पांचाल अर्थात स्वार्थ की बिसात पे बिछे शकुनी के मोहरो को बुरी तरह मात दे उसे पाँच सालो तलक विहंगम सत्ता सुख दे सके।
हे!पार्थ अखिलेश उठो साबित करो कि इस लोकतन्त्र की सामरिक गीता----वासासि जिर्णानी,यथा विहायः नही बल्कि जनमत और लोकतन्त्र के उन मतो से लिखी जायेगी जो यहां की जनमानस की चेतना के बौद्धिक इंकलाब से निकलेगा।
और आजकी ये कलुषित द्रोपदी फिर अगले चुनाव तक इस उत्तर-प्रदेश की सियासत के छज्जे पे एक आघात लिये अपने गिले स्वार्थ के बालो को खोले खड़ी रहे!इसी मे आज की हस्तिनापुर अर्थात उत्तर-प्रदेश की जनता व आवाम का संपुर्ण सुख निहित है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

Tuesday, 27 December 2022

जनवरी से लेकर दिसंबर तक के रोमांटिक प्यार की काब्य गाथा।
(दिसंबर बनके हमारे प्यार की ऐनवर्सरी आई थी)
कभी बन सँवर के दुल्हन सी---------
मेरे कमरे मे जनवरी आई थी।
सच वे गुलाब ही तो पकड़ा था तुमने,
जो इतने सालो से बेनुर था,
मेरी जिंदगी में-----------
वेलेनटाइन डे की रोमानियत लिये,
वे पहली फरवरी आई थी।
मार्च के महिने मे-----------
पहली बार खिले थे मेरी अरमान के गुलमुहर,
हमारे प्यार की डालियो पे कोयल कूकी थी,
वे मार्च ही था-----------
जब आम और महुवे पे मंजरी आई थी।
अप्रैल याद है---------
जब तुम मायके गई थी,
मै कितना उदास था-------
कई राते हमे नींद कहां आई थी।
फिर मई महिने ने ही उबारा था,
हमे तेरी विरह से!
इसी महिने इंतज़ार करते हुये मेरे कमरे मे---
कमरे की परी आई थी।
फिर जून की तपिस में--------
हम घंटो टहलने निकलते थे एक दुजे का हाथ पकड़े,
नदी के तट की तरफ,
वे शामे शरारत याद है और याद है वे कंपकपाते होंठ,
जब हमने अपनी अँगुलियो से छुआ था,
और तुम्हारी झील सी आँखो मे शर्म उतर आई थी।
फिर जुलाई की---------
वे घिरी बदलियां,
वे बारिश मे पहली बार तुम्हे छत पे भीगा देखना एकटक,
फिर बिजली की गरज सुन,
तुम एक हिरनी सी दौड़ी मेरी बाँहो मे चली आई थी,
मुझे भी तुम्हे छेड़ने की---------
इस बरसात मे मसखरी आई थी।
फिर पुरा अगस्त-----------
तुम्हारी बहन की चुहलबाजियो में गुजरा,
मौके कम मिले,
तब पहली बार तुम्हे चिढ़ाते आँखो से मुस्कुराते कनखियो से देखा,
मै मन ही मन कुढ़ता रहा क्या करता?
मेरे हारने और तेरी शरारतो के जितने की घड़ी आई थी।
फिर सितम्बर ने दिये मौके,
वे मौके जो मै भुलता नही,क्योंकि इसी महिने
तेरी कलाई की तमाम चुड़ियाँ टूटी,
और इसी महिने तेरे लिये,
मैने दर्जनो की तादात मे खरिदे,
तुम्हारी साड़ी से मैच करती तमाम चुड़ियाँ,
उन चुड़ियो मे तुमने कहा था---------
कि तुम्हे पसंद दिल से चुड़ी हरि आई थी।
फिर अक्टुबर के महिने मे,
हमने-तुमने अपनी जिंदगी के इस हनीमून को,
फिर टटोला!
लगा कि अभी भी तुम सुहागरात सी हो----
जैसे घूँघट किये आई थी।
फिर नवंबर---------
हमारी-तुम्हारी जिंदगी मे महिना नही था,
हम माँ-बाप बन गये थे,
हमारे आँगन में-----------
हँसने-खेलने एक गुड़िया चली आई थी।
इस दिसम्बर----------
जो हमारे कमरे मे कैलेंडर टंगा है,
उसमे एक छोटी सी बिटिया को,
छोटे-छोटे नन्हे पाँवो मे----------
घूँघरुओ की पायल पहने चलते दिखाया है,
हमारी बिटिया केवल बिटिया नही,
इस दिसम्बर बनके--------------
हमारे प्यार की ऐनवर्सरी आई थी।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

###अखबार मे छपी रचना को न पढ़ पाने वाले परम स्नेही लोगो की शिकायत को दुर करने का एक प्रयास।
(दिसंम्बर की आखिरी रात)
शकीना कलेन्डर मे लपेट के लाई है रोटी,
ऐ,रंग----इसके भूखे पेट का पागलपन देख-----
और देख हवस के खरोचो ने इसके पुरे बदन पे लिखा है------
दिसंम्बर की आखिरी रात।
(जनवरी लगती है)
मेरे पप्पु की मम्मी--------
है तो हिडिम्बा और पुतना सी,
पर कहता हूँ कि परी लगती है।
मै उससे इतना डरता व काँपता हूँ,
कि ऐ,रंग-----वे मुझे----
बारहो महिने जनवरी लगती है।
(पुस की रात)
कहाँ कटती है-
फटे कंम्बल से,ऐ शहर गाँव मे,
पुस की रात।
हाँड़ कंप-कपाती ठंड मे,
कहाँ देख पाता है-शहर
खेत के किनारे पडे किसी-
किसान की लाश।
अखबार की बे-शरमी है,रंग-
वरना गाँव मे आज भी है,वही ठंड
और वही प्रेमचंद के-
               पुस की रात।

Saturday, 24 December 2022

पूर्व-प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जैसे महान और हिमालय से विराट शख़्सियत के कल के जन्मदिन की एक काव्यात्मक बधाई,,,,,वे स्वयं और बड़े यशस्वी कवि भी है-----ईश्वर उन्हें दीर्घायु और चिरंजीव रंखे।
              
        (सदन है! लेकिन अटल कोई नही)
सदन है-------
लेकिन अटल कोई नही।
वे घंटो अपनी रौ मे बोलते,
कभी अपनी,कभी सब की गाँठ खोलते,
कहकहे,ठहाको के बीच वे उनका चुटिलापन,
कितना खाली हो गया है सदन-------
शायद!अब भी उनका हल कोई नही।
सदन है---------
लेकिन अटल कोई नही।
ना झुका, ना रुका पोखरण तक,
शायद! राष्ट्रभक्ति थी उनके अंतःकरण तक,
लेकिन वे पड़ोस को चाहते भी थे,
तभी तो बस ले लाहौर तक गये थे,
लेकिन छल किया मुशर्रफ़ ने,
और अटल के मन मे था महज़ प्यार----
एै "रंग" छल कोई नही।
सदन है----
लेकिन अटल कोई नही।
वे जिये शतायु हो ये कामना है,
सच सियासत मे उनके बाद बस टाट ही आये,
उनके जैसा------
रेशमी मखमल कोई नही।
सदन है------
लेकिन अटल कोई नही।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758
(मुल्क की याद आती है)
इस गैरे मुल्क में-----------------
बड़ी शिद्दत से मुझे अपने मुल्क की याद आती है।
खोल देता हूं खिड़कियाँ,
और घंटो टहलता हूं कमरे मे-------
जब रात आती है!
अपने मुल्क की याद आती है।
तकता हूं चाँद तो बीबी का चेहरा नुमाया होता है,
याद फिर उसकी हर बात आती है!
अपने मुल्क की याद आती है।
तारे जैसे हो मेरे मासूम बेटे,
उन तारो से गुफ्तगू करता हूं,
लेकिन उन्हे जब प्यार करने को बढ़ाता हूं हाथ,
तो बस खाली हाथ रहता है,
मेरे हिस्से यही इतनी सी सौगात आती है!
अपने मुल्क की याद आती है।
फिर खिड़की से---------------
अंदर आती है एक झीनी सी रौशनी,
जैसे मेरे अब्बु की दुआ!
फिर हवा की एक ठंडी छुवन मे अम्मी की मोहब्बत,
उफ!ये रोटी,ये दोज़ख की बेबसी
कि सहर होने तलक-------------
अपने घर के हर शख्स की जरुरत,
और बहन के निकाह की-----------
याद बस इमदाद आती है!
इस गैरे मुल्क मे------------
बड़ी शिद्दत से मुझे अपने मुल्क की याद आती है।
## # मुल्क से बाहर कमा रहे एक शख्स के अंतरमन की व्यथा।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

###धन्यवाद आपका हृदय से निर्मेश के त्यागी भईया जो आप मुझ छोटे अनुज पे अपना प्यार और दुलार बनाये हुये है,वर्तमान अंकुर दैनिक मे प्रकाशन के स्नेह से अभिभूत करने का जो आशीर्वाद आपसे मिला उसका सुख शब्द बया भी नही कर सकते!धन्यवाद।

Friday, 23 December 2022

(तवायफ़ की कब्र है)
यहाँ चराग नही जलते,कोई चादर नही चढ़ती,
ये शहर की-------
मशह़ूर तवायफ़ की कब्र है।
आज भी करती है ये रुह़े मूज़रा,
फिर फूट के रोती है।
ऐ,रंग--बस आ जाते है खिज़ा में----
दरख्त़ो के चंद पत्ते आवारगी करने।
ये शहर की------
मशह़ूर तवायफ़ की कब्र है।
(लोबान की खूशबु)
जी चाहता है उसको-------
मै अपनी साँस में भर लु,
क्यूकि ऐ,रंग-------आती है-
उसके बदन से लोबान की खूशबु।

Wednesday, 21 December 2022

(मुसलमान बना दो)
गर मासुमो का कत्ल इतने से-
थम जाये वहसियो,
तो हमे शौक से हिंन्दू या मुसलमान बना दो।
ढहा दो मेरे जेहन का मंदिर,
मै शायर हूँ,मुहब्बत मेरी भूख है,
गर मै तेरी पूजा ना बन सका तो,
अज़ान बना दो।
बेशक मेरे हाथो से तुम छिन लो गीता
ऐ रंग-ये ख्वाहिश है
कि मासुमो का कत्ल ना हो,
चाहो तो इसके लिये,
इस ब्राह्मन को मुसलमान बना दो।

पेशावर मे मासुमो की कत्ल पे।
(रोमानी खयाल को)
मुकम्मल नज्म़े यू ही नही लिखी हमने,
ऐ,रंग---------कागज़ पे-
मै सिल-सिलेवार उकेरता गया,
अपने रोमानी खयाल को।
आज हैदराबाद से प्रकाशित "डेली हिंदी मिलाप " में प्रकाशित मेरी रचना "गुलाबी शाल "

(गुलाबी शाल)

वे ठंड दिसंबर की----------
मै भुल नही पाती 
जब तुम आये थे छुट्टियां ले,
और मै इंतज़ार कर रही थी,
अपने कमरे मे तेरे आने का,
कमरे मे आते ही---------
तुमने पिछे से मेरी आँख मूँद,
फिर हौले से खोलने को कहा,
तो देखा तुम्हारी हाथो ने बड़े प्यार से पकड़ा था---------
एक गुलाबी शाल.

फिर उसे खोलकर तुमने कहा था,
बिल्कुल हूबहू तुम्हारी तरह है,
इसकी भी गुलाबी शर्म!
बस इसी से खरीद लाया कि जब तुम इसे ओढ़ोगी,
तो एक तरफ तुम्हारी शर्म होगी,
तो एक तरफ होगी-------
हमारी गुलाबी शाल.

फिर फौज की छुट्टी बिता तुम लौट गये,
इस दिसंबर तुम नही हो------------
तो तुम्हे अपने श्पर्श मे पाने की खातिर,
मैने दराज से निकाला है-------
गुलाबी शाल.

सच इसको छुना तुम्हे छुने सा लगता है,
जब इसे मै रखती हूं कंधे पे,
तो लगता है जैसे,
तुम्हारा लिया चुंबन है-------
गुलाबी शाल.

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला-जौनपुर पिन नं.222002 (उत्तर-प्रदेश)
Mo.no.--7800824758

Monday, 19 December 2022

(सिध्दांत सारे खोखले नीकले)
कैसे नयी पौध,नयी कोपले नीकले
मेरे अपने ही आस-पास कुछ दोगले नीकले।
क्या खुब सियासत है हँसते शख्श की,
ऐ ,रंग-
सिध्दांत बडे ऊँचे पर खोखले नीकले।
(मेरी रुह बोलेगी)
मेरा कत्ल इतना आसान नही,
मै सच का मुहाफिज़ हूँ ,
ऐ,रंग----गर दफ्ऩ भी हुआ-----
तो मेरी रुह बोलेगी।
(मै लिखता हूँ कोई गीत)
जब बेचैन कर देता है------------
मेरे अंदर का मरुस्थल मुझको,
तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत।
जब------------
शब्द के होंठ पे चुभती है कोई नागफनी,
तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत।
जब पथ की रेत पे-----------
चलता जाता हूँ दूर पथिक सा
और फूट जाते है पाँव के छाले,
तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत।
जब------------
बहुत सन्नाटा मेरे भीतर का,
उधेड़ता है मुझको---------
तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत।
बोता हूँ रेत पे कुछ शब्द,
पर कटिले वृक्ष के विरवे ही पनपते है,
उन्ही वृक्षो की------------
खरोंच जब आ जाती है बन के पीर,
तब मै लिखता हूँ कोई गीत।

###धन्यवाद आपका निर्मेश भईया मेरी रचना को आज के वर्तमान अंकुर मे जगह देने के लिये।

Saturday, 17 December 2022

(मै सयाना नही हुआ)
माँ बुढ़ि हो गई------------
मै सयाना नही हुआ।
चाहे जितना जहां से भी खाके लौटु,
फिर भी जब तलक अपने हाथ के,
दो निवाले न खिला ले---------
कहती है तब तलक माँ कि बेटा झूठ न बोल,
अभी तलक तेरा खाना नही हुआ।
माँ बुढ़ि हो गई----------
मै सयाना नही हुआ।
बीबी मेरी दरवाज़े पे खड़ी हो,
तकती है माँ का प्यार!
उसने गिली आँखो से कई मर्तबा कहां,
मै कितनी खुशनसीब हूं,आप सा पती पा
जिसका कभी कमरे में,
बीना माँ से मिले अपने------
कभी आना नही हुआ।
माँ बुढ़ि हो गई--------
मै सयाना नही हुआ।
सच मुझे भी लगता है उतनी देर,
माँ के पास-------
जब बाल सहला वे बचपन सा,
मुझे घंटो,अच्छा-बुरा समझाती है,
तो लगता है बस कुछ वक्त सरका है----
मै सयाना नही हुआ।
माँ बुढ़ि हो गई--------
मै सयाना नही हुआ।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758
(बाॅलीवुड----एक बेवा बिखराव है)
बाॅलीवुड----------
नरगिस और राज कपुर का अलगाव है,
गुरुदत्त की ख़ुदकुशी है,
तो घुट-घुट के दुनिया से विदा हुई------
मीना कुमारी के सीने का घाव है।
बाॅलीवुड----------
आँसू और ड्रामा है नही,
ये उस काका के आनंद का किरदार है,
जो बाबु मोशाय के बाद--------
एक तन्हा कोठरी में तड़पता और घुटता,
एक शराबी---------
की पिड़ाओ का गैंग्रीनी पाँव है।
बाॅलीवुड----------
वे परवीन बाॅबी है जिसे कई महेश भट्ट ने चाहा जरुर,
पर तन्हा छोड़ दिया!
वे डिप्रेस्ड बंद कमरे में छ दिनो तलक,
मरी पड़ी रही बीना किसी वारिस के,
सच तो ये है कि बाॅलीवुड-------
एक औरत की अधुरी ख्वा़हिशो का,
वही परवीन बाॅबी वाली सडी लाश की तरह,
अपने बिस्तर पर पड़ी----------
एक बेवा बिखराव है।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758
(दो घड़ी की रात)
जिंदगी है बस दो घड़ी की रात,
आओ गुज़ार ले लिहाफ में हम,
एक दुजे के संग---
दो घड़ी की रात।
आयेगी धूप कमरे में कल किसी और के लिये,
खुली खिड़की से फिर बाल सँवारेगी कोई दुल्हन,
फिर अँधेरा होगा!
वे भी गुजारेगी इसी तरह अपनी जिंदगी की-------------
ये दो घड़ी की रात।
भुल जायेंगे सभी एक दिन रफ्ता-रफ्ता,
जैसे हम भुले है औरो के जिंदगी की---
दो घड़ी की रात।
एै,रंग-----यहाँ से हमी फना होगे,
बाकी यही रह जायेगी औरो के लिये---
ये दो घड़ी की रात
(लड़कियो के ब्वायफ्रेंन्ड हो गये)
स्कूल के बस्ते----------------
बढ़ते-बढ़ते बैग हो गये!
खत लिखने वाले देश की संवेदना मर गई,
दिल में रहने वाले लोग------------
सब मोबाइल में टैग हो गये।
माँ यशोदा का आँचल बदला,
वे जिंस और टाप पहन के माम हो गई,
और जितने भी पिता थे वे रफ्ता-रफ्ता डैड हो गये।
दूध-घी खाने-पीने वाले देश ने गिलास रख दिया,
अब उन्ही गिलासो में---------------
बार बालाओ के ढ़ाले पैग हो गये।
अर्द्धनग्न सड़को पे--------------
यौवन उछालती कुछ माडर्न लड़कियाे
के अश्लील और भौड़े कपड़े,
शर्म आती है लिखते,
कि जिस देश में भाई होते थे,
एै,रंग-------आज उसी देश में लड़के,
होटलो के बंद कमरो में--------------
इन लड़कियो के ब्वायफ्रेंन्ड हो गये।
(अपने पापा की गुड़िया)
दो चुटिया बांधे और फ्रॉक पहने,
दरवाजे पे-खड़ी रहती थी---------
घंटो कभी अपने पापा की गुड़िया।
फिर समय खिसकता गया,
मै बड़ी होती गई!
मेरे ब्याह को जाने लगे वे देखने लड़के,
फिर ब्याह हुआ,
मै विदा हुई पापा रोये नही,
पर मैने उनके अंदर----------
के आँसूओ का गीलापन महसूस किया,
पीछे छोड़ आई सब कुछ
अपने पापा की गुड़िया।
सुना था बहुत दिनो तक,
पापा तकते रहे वे दरवाज़ा,
शायद ये सोच----------------
कि यही खड़ी रहती थी कभी,
उनके इंतज़ार में घंटो,
फ्रॉक पहने दो चुटिया बांधे
इस पापा की अपने गुड़िया।
फिर आखिरी मर्तबा उन्हे बीमारी मे देखा,
वे चल बसे!
अब यादो में है-------------------
कुछ फ्रॉक दो चुटिया
और तन्हा खड़ी-----------------
दरवाजे के उस तरफ,
आँखो में आँसू लिये----------------
अपने पापा की गुड़िया।
(पत्थर की हो गई)
मै जबसे---------------
उस बेवफ़ा सितमगर की हो गई,
सूख गये अरमान मैं पत्थर की हो गई।
क्या-क्या नही छोड़ा खातिर उसके,
वालिद का दिल तोड़ा!
बसने आई थी मैं बेघर की हो गई।
मै जबसे---------------
सुर्ख जोड़े,हिना,आईना सिसके
ये अज़ीब निकाह है देखो,
कुबूल कर भी ऐ,रंग----------
मै बीना शौहर की हो गई।
मै जबसे--------------
उस बेवफ़ा सितमगर की हो गई,
सूख गये अरमान मैं पत्थर की हो गई।
(दंगा याद है)
हमें पुराना शहर याद है,
एक-एक गली मुहल्ला याद है।
वे कुर्आनखानी का खुरमा,
मुँह पोछती अपने दुपट्टे से,
अब्दुल की अम्मा याद है।
हमें पुराना शहर याद है!
राखी सुनि थी एक ब्राह्मन के घर,
आँख मे खुशियो के आँसू---------
मेरी इस कलाई को सलमा याद है।
हमें पुराना शहर याद है!
इतने सालों बाद देखा जब जला घर,
पुछा कहां गये ये सब,
तो नये शहर के बाशिंदो ने बताया,
तो अफसोस हुआ,रंग---------------
कि अब नये शहर को,
पुराने शहर की मोहब्बत नही,
नफरत,लाशे और दंगा याद है।
हमें पुराना शहर याद है।
(ईट भट्ठे पे काम करती औरत की यथार्थ गाथा)
गरीबी वे औरत है-------------
जो किसी ठाकुर के ईट-भट्ठे पे काम करती है।
इसे अपने यौवन उभारो का कोई सौंदर्य बोध नही,
कौन तकता है?कौन नही,
वे इससे बेखबर-----------
अपने जंगली फूलो से आँचल हटा,
शाम की रोटी का इंतजाम करती है।
इसका पती बुधुवा ब्याह के लाया,
तभी से इसके नथुनो को आदत सी पड़ गई,
कच्ची देशी शराब के उबकाई वाले भभके की,
इसने भी अब आदत सी डाल ली है-------
अपने पती से बलात्कार की तरह से मिलने वाले प्यार की।
ये कमो-बेस हर भट्ठे की दास्ता है,
महिने मे कुछ राते भट्ठे का मुंशी,कुछ राते--
ठाकुर अपने बनाई कुटिया मे काटता है!
लेकिन काम करने वाली औरत कुछ नही कहती,
वे जानती है इसका परिणाम।
इसे तो अपने बच्चे की वे पहली डिलिवरी,
भट्ठे की याद है------------
जब ठाकुर की दरियादिली ने उसे,
बीना ईट पाथे भट्ठे पे काम किये------
महिने भर का राशन कुछ पैसे दिये थे!
सच तो ये है---------
कि इस बच्चे के जन्म के पहले की माहवारी में,
इसके साथ कुछ राते ठाकुर ही सोया था।
ईट-भट्ठे की चिमनी से निकलता धुआँ
और उस धुँये का कालापन----------
ने इसे धीरे-धीरे अपनी चपेट मे ले लिया,
अब ये भी होंठो पे बीड़ी सुलगा-------
कुछ धुँये उगलती है भट्ठे के चिमनी की तरह,
फिर उठ चल देती है।
मेरी कविता ने भी देखा है अक्सर उस गरीब औरत को,
जो पुरे देश मे किसी न किसी भट्ठे पे,
अपने जंगली दो खिले फूलो से आँचल गिरा के---------
ईट पाथने का काम करती है।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758
## # शायद हर किसी ईट भट्ठे पे कुछ एैसी औरते आपको अपने मे खोई जंगली फूलो से अपना आँचल गिरा ईट पाथती दिख जाये।
@@@धन्यवाद!आपका निर्मेश के त्यागी भईया जो आज के वर्तमान अंकुर मे आपने हमारी यथार्थ रचना को अपना प्यार व दुलार दिया।
(भूख जिंदा है)
पेट तो भर गया लेकिन भूख जिंदा है,
ऐ तरक्की---------------------
तेरी आड़ में हर झूठ जिंदा है।
हरिया की लाश आज भी है लहूलुहान,
कातिलो के हाथ में बंदूक जिंदा है।
लुट रही है आबरु हर एक स्याह रात,
पुरे बदन पे अबला के ये जूठ जिंदा है।
ख़ुदकुशी कर ली कल किसान ने,
ऐ,रंग-----आज अखबार में
उसकी कर्ज माफी और छुट जिंदा है।
पेट तो भर गया लेकिन भूख जिंदा है।
## # इस रचना को पुरा पढ़े ये अनुरोध है।

Thursday, 15 December 2022

(अपने मुल्क से बिछडी हूँ)
मुझे ना बताओ------------
मै तुमसे भी ज्यादा,दर्द से गुजरी हूँ।
तुमने तो कमाने के लिये,
बस घर छोड़ा है ऐ,रंग------
मै तो अपने मुल्क से बिछड़ी हूँ।
(मुझे टूट के चाहने वाले)
मुझे भुलना मत-----------
एै मुझे टूट के चाहने वाले।
मै फ़ना हो जाऊंगा तेरी लहरो मे शौक से,
बस मुझे अपने से अलग मत करना-------
एै मुझे टूट के चाहने वाले।
जलने देना मेरा मासूम चरागे दिल किसी कोने मे,
बेसक बुझ जाऊंगा सहर होने तक,
पर तु बेरुख़ी से ना बुझाना----------
एै मुझे टूट के चाहने वाले।
बेशक मेरी ख्व़ाहिशे मईयत गुजरे तेरे कुचे से,
पर आँख मे आँसू लिये ना आना अपनी छत पे,
मै तड़प उठुंगा मर के भी ,
क्योंकि तुम्हें इस हाल मे देखु एैसी हिम्मत नही मुझमें------------
एै मुझे टूट के चाहने वाले।
@@@एक बेहद उम्दा मोहब्बत करने वालो के नाम नज्म़।
सहर----सुबह।
रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

@@@धन्यवाद डेली वर्तमान अंकुर और निर्मेश के त्यागी भईया मेरी नज्म़ को अपना बेशकिमती प्यार देने के लिये।

Tuesday, 13 December 2022

(एक खूबसूरत एहसास है)
गुनगुनी धूप में------------------
खुले बाल तेरा छत पे टहलना,
एक खूबसूरत एहसास है।
मै तकता हू एकटक तुम्हे चोर नज़र,
पता ही नही चलता कि-------------
तेरे पाँव तले छत की ज़मी है,
याकि मखमली घास है।
गुनगुनी धूप में------------
खुले बाल तेरा छत पे टहलना,
एक खूबसूरत एहसास है।
ये उजले से दाँत,गुलाबी से होठ,आँखो मे शर्म
और हवा से बिखरे बालो का,
अपनी नर्म-नाज़ुक सी अँगुलियो से हटाना,
ये महज चेहरा नही----------
एक खूबसूरत चाँद है।
गुनगुनी धूप में---------
खुले बाल तेरा छत पे टहलना,
एक खूबसूरत एहसास है।
हर्फ-दर-हर्फ मेरे अंदर समा रही,
ये तेरी उजली ओढ़नी और सफेद सलवार,
महज तेरे बदन से लिपटी,
शरारत करती कोई सहेली नही,
बलकि मेरी गज़ल और उसके बहर की----
एक खूबसूरत लिबास है।
गुनगुनी धूप में-------------
खुले बाल तेरा छत पे टहलना,
एक खूबसूरत एहसास है।

@@@कलके रोमांटिक धूप की रोमांटिक याद जो शायद आप सबो को अच्छि लगे।

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

Saturday, 10 December 2022

(खुदा से गज़ल मांगा)
जब ज़मी पे------------
बिमारे दिल की तादात बढ़ने लगी,
तब ऐ,रंग-----------
हम मुहब्बत के फकिरो ने,
खुदा से गज़ल मांगा।
(मुझे टूट के चाहने वाले)
मुझे भुलना मत-----------
एै मुझे टूट के चाहने वाले।
मै फ़ना हो जाऊंगा तेरी लहरो मे शौक से,
बस मुझे अपने से अलग मत करना-------
एै मुझे टूट के चाहने वाले।
जलने देना मेरा मासूम चरागे दिल किसी कोने मे,
बेसक बुझ जाऊंगा सहर होने तक,
पर तु बेरुख़ी से ना बुझाना----------
एै मुझे टूट के चाहने वाले।
बेशक मेरी ख्व़ाहिशे मईयत गुजरे तेरे कुचे से,
पर आँख मे आँसू लिये ना आना अपनी छत पे,
मै तड़प उठुंगा मर के भी ,
क्योंकि तुम्हें इस हाल मे देखु एैसी हिम्मत नही मुझमें------------
एै मुझे टूट के चाहने वाले।

@@@एक बेहद उम्दा मोहब्बत करने वालो के नाम नज्म़।
सहर----सुबह।
रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758
ठंड के मौसम की संवेदना पे लिखा लेख---------
                  ( अलाव )
हमारे शहर,तहसील और बाजारों के फुटपाथों पे जब बीना किसी शाल के ठंड से अकड़ी 20-30 लाशे मिलती है तो पहली बार---" अखबारों को थोड़ी सी गर्मी प्राप्त होती है और अखबारी जमीर की वही गर्मी इनसे थोड़ा बहुत दो-तीन दिन सच लिखवा लेती है, फिर यही सच की गर्मी शहर के कुछ नामचीन लोगों व सरकारी लोगों तक पहुचती है".
ये गर्मी चंद चौराहे के जलते हुये अलाव मे परिवर्तित हो जाती है,इसे तमाम सरकारी अमले अपनी उपलब्धियो मे गिनाने मे लग जाते है. सर्वविदित है कि पुरी दुनिया मे कागज की लिफाफेबाजी मे मेरे इस देश का कोई जवाब नही. " और ठंड के मौसम मे भी ये लिफाफेबाजी उसी पुराने गोल्डेन लुक मे दिखती है". आप जब अखबार उठाके पढ़ेंगे तो--"फुटपाथ पे ठंड से मरे गरीब, असहाय लोग किसी भी प्रकार के ठंड से नही मरते ऐसा हमारे यहाँ के अलौकिक डाक्टरों का कथन है".
वैसे भी हमारा ये वृहद देश--"अपनी वेदना का चरम जीता है,उसी एक चरम वेदना का एक नाम है यहाँ की पड़ने वाली भयंकर ठंड़". और कुछ तथाकथित पहुंच वाले लोगों के चौराहे पे जलवाया गया ये अलाव, हां कुछ स्वयंसेवी संस्थायें या बड़े स्तर के अधिकारी बीच-बीच में कंबल वितरण कर कुछ तो इन गरीबो-असहायों की ठंड से बचने भर की एक अल्प ही सही व्यवस्था करा देते है.
चाहे कुछ भी हो पर चौराहे पे जलवाई गई ये लकड़ी--"जब शहर के लोग अपने-अपने सुसज्जित कमरो में जाके सो जाते है तो, चौराहे पे अलाव की यही लकड़ियां आवारा पशुओं और फुटपाथों पे अपनी नंगी आँखों से जी रहे इस ठंड व ठिठुरन को अपने से दुर कर आने वाले कल की सुबह का दर्शन कर पाते है. 
यही वे है जो हर मौसम का आहुत जीवन जीते है इनके लिये---"रैन-बसेरे और अलाव किसी भी सुखमय विश्वठहराव की तरह है". आइये हम अपने इस लेख से आपकी वेदना को एक आवाज़ लगाते है कि अगर मालिक ने आपको इस लायक किया है कि इस कपकंपाती ठंड मे कही आप अलाव जलवा सके तो छुट्टे व अवारा पशु, बीना किसी शाल स्वेटर के फुटपाथ पे टहल रहे चंद पागल को कुछ महिनो के अलाव की तपिश दे दो साहब"

@@@रचयिता--रंगनाथ द्वीवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर
जिला--जौनपुर pin no.222002 (उत्तर-प्रदेश)

Mo.no.7800824758

यह लेख मेरा स्वरचित व अप्रकाशित है.

Friday, 9 December 2022

(पगली बना दो)
नन्हे-नन्हे पाँव----------
छोटी-छोटी अँगूली बना दो,
ऐ,खुदा----------
मुझे फिर से बचपन की तितली बना दो।
मै तैरु गाँव के पोखर,
और तोडू फिर बाग से अंम्बिया,
मुझे माँ की डाँट-------
और बापू के दुलार की पगली बना दो।
(माँ की दुआ आती है)
मै घंटो बतियाता हूं माँ की कब्र से,
मुझे एैसा लगता है कि जैसे-------
इस कब्र से भी मेरी माँ की दुआ आती है।
नही करती मेरी सरिके हयात भी ये यकिने मोहब्बत,
कि इस बेटे से मोहब्बत के लिये,
कब्र से बाहर निकल----------
मेरे माँ की रुह यहां आती है।
जब कभी थकन भरे ये सर मै रखता हू,
कुछ पल को आ जाती है नींद,
किसी को क्या पता?-----------
कि मेरी माँ की कब्र से जन्नत की हवा आती है।
एै,रंग----ये महज एक कब्र भर नही मेरी माँ है,
जिससे इस बेटे के लिये अब भी दुआ आती है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

####माँ पे लिखी एक बेहतरीन नज्म़ आप सबो के हवाले।

Thursday, 8 December 2022

(माँ)
दिन भर भूख से बच्चा बिल-बिलाता है,
वे-कोशीश करके हार जाती है,
अँधेरी रात मे वही माँ-
एक कटोरे दूध की खातिर
ऐ रंग-
अपने सारे कपड़े खोल देती है।
(औरत बांझ है)
ये मेरी कलम-ए-तोहमत है,
ऐ,रंग---------
कि जिस औरत ने बेटी न जनी,
वे औरत बांझ है।
(बेटी के ब्याह का लिबास दिखाऊ)
आओ अय्याशियो मे डुबे हुये चौथे स्तंभ,
तुम्हे इस मुल्क मे रेप से इतर,
खेत के मेड़ पे पड़ी बीना कफ़न--------
किसान की लाश दिखाऊ।
बंद कमरे मे बरसता सावन,
तीतर-बीतर कपड़े पैमाने से छलकी शराब,
किसान की आँखो मे सुखा,
उसकी दुपट्टे के फंदे से मरी बेटी,
रुदाली सी बीबी,लंबा सन्नाटा
उसकी जंग खाई पेटी में,
एै,रंग------------
बेटी के ब्याह का लिबास दिखाऊ।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

Wednesday, 7 December 2022

(शहीद)
इस गाँव की औरत कभी बेवा नही होती।
इस गाँव मे कभी भी लाशे नही आती,
तिरंगे मे लिपटे शहीद आते है।
यहाँ की कोई भी बुढी माँ-
काशी या काबे नही जाती।
ऐ रंग-
वे फिर से शहीद बेटे की वर्दी का
धुल साफ कर
सरहद की हिफाजत के लिये-
पोते पालती है।
(ये रात गुजरने दो)
तुम संभलो मुझे गिरने दो-----------
मुझे शराबी लत है,कुछ गहरे उतरने दो।
तुम बधे हो,बधे रहो----------
अपने वक्ते नमाज़ और पूजा से!
मेरे रास्ते मे मंदिर-मस्जिद नही मैकदा पड़ता है,
हाथ धोने दो और मुझे शराब से वजू़ करने दो।
ये महज बोतल नहीं गंगा का पानी आबे जमजम है,
ये हमारी शरिकेहयात़ बीबी का बदन है,
तुम दुर रहो हम काफ़िरो से
और नशे में हम इश्क़े शौहरो की,
एै,रंग-------ये रात गुजरने दो।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

Tuesday, 6 December 2022

(इंतजार करके रोयी)
खुद को बाँहो मे भर के रोयी,
वे तवायफ थी-
हर रात सजके रोयी।
थिरके पाँव,टुटे घुघरू
ऐ रंग-
वे कितना इंतजार करके रोयी।
(पानी)
नही होने देता कभी हिन्दू-मुसलमान
हमे शराब का पानी।
वही छीन लेता है एक हसीन चेहरा,
जब कोई चाहने वाला-फेकता है----
चेहरे पे तेज़ाब का पानी।
हम भटकते गिरते चले जाते है,
जब उतरता है हमारे चेहरे से------
हमारी किरदार का पानी।
हमे जोड़ता है,धर्म और मज़हब से,
कभी दोआब---------
तो कभी हरिद्वार का पानी।
हमे फ़ना भी करता है,
चेन्नई की तरह,रंग--------
देख लो वहाँ तमाम लाशे,
और सैलाब का पानी।
( उत्तर-रेलवे )
उत्तर-रेलवे----------
के एक मुसाफ़िर खाने मे बैठी, 
एक चौबीस-पच्चीस साला पगली,
अपने गंदे बाल खुजला रही थी,
मैने देखा---------
उसके आसपास आठ-नौ आवारा बद्चलन,
पुरुष खड़े--------
अश्लील फब्तियां कस रहे थे,
वे इस सबसे बेखबर-----
अपने गंदे बाल खुजलाये जा रही थी,
तो अचानक मेरी नजर भी,
उनका अनुसरण कर,
पगली की गदराई हुई देहयष्टि से चिपक सी गई.
फिर वे सभी मेरी तरफ मुड़े--------
और खिलखिला के हँस पड़े.
मै झेपा---------
और सोचने लगा कि क्या ?
मेरा चरित्र भी अब गिरने लगा है,
शायद नही,
अगर ये सच है तो फिर.
न जाने कल आने वाली पीढ़ी का---
चरित्र क्या होगा.

@@@रचयिता---रंगनाथ द्वीवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर pin no.222002 (उत्तर-प्रदेश)

Mo.no.7800824758

यह कविता मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.
( गुनगुनी धूप )
मै टैरेस पे---------
कुर्सी निकाल गुनगुनी धूप मे घंटों बैठी,
वे तुम्हारी चाहत के एहसेसात को-----
अपने भीतर कही हौले-हौले टटोल रही.
लेकिन उस टटोलने मे न जाने कहां,
तुम्हारा श्पर्ष मुझे मिला नही,
सच अब तुम्हारे--------
चाहत का बासीपन अब टीस रहा.
याद है मुझे अच्छे से-------
ठंड की ये गुनगुनी धूप,
जब तुम्हारा छुना और श्पर्श करना,
मेरे प्यार के अंतरतक को गुनगुना जाता,
वे शायद युवापन था------
लेकिन आज जैसे टैरेस की गुनगुनी धूप,
एक सखी सी-------
मेरी युवावस्था से कह रही,
नही ऐसा कुछ नही,
ये जीवन के पलछिन की करवट भर है,
फिर यही टैरेस और कुर्सी के बगल-----
दोनों का गुनगुनी धूप मे बैठे,
काफी पीना होगा.
तभी एक झोका सा हवा का आता है,
और उन्हें मै थका मांदा,
आफिस से बैग लटकाये,
टैरेस पे पड़ी हुई एक खाली सी कुर्सी,
निढ़ाल सा पाती हूं,
तब मै-------
उनकी मजबूरियों की गुनगुनी धूप को,
अपने अंतर मे एक बार फिर महसूस कर पाती हूं.

@@@रचयिता---रंगनाथ द्वीवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला---जौनपुर pin no.222002
Mo.no.7800824758

यह कविता मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

Saturday, 3 December 2022

(मासुम लड़की)
तुम जीसे कहते हो गुँगी------
वे अक्सर मेरी गज़लो मे ढ़लती है,
वे थिरकती है------
जब पाँवो में बाँध के घूँघरु,
तो कितना बोलती है,
ऐ,रंग----वे गुँगी नही-------
एक मासुम लड़की है।

विश्व विकलांग दिवस पे।
(बातुनी लड़की)
मुस्लिम हो गई-----------
मुझ ब्राह्मण के गोद की वे बातुनी लड़की।
एक वालिद सा मेरा ख़याल रखती थी,
आज आई तो----------
पर दहलीज़ पे कुछ पल रुक,
फिर अपनी आँख में आँसू लिये लौट गई,
शायद वे समझ गई---------
कि अब वे पहले की तरह गले से नही लग सकती,
क्योंकि मुस्लिम हो गई समय के साथ--------
मुझ ब्राह्मण वालिद की वे बातुनी लड़की।
सर से पाँव तलक--------
बुरके से ढकी मुझे न जाने क्यू ,
आज एक मज़हब की कैद मे लगी एै "रंग"---
इस वालिदे ब्राह्मण की वे बातुनी लड़की।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758
कोलकाता से प्रकाशित राष्ट्रीय त्रैमासिक साहित्य की वैचारिक पत्रिका  "लहक" आज डाक से प्राप्त हुई . 
 इसमें मेरी दो कविताएं  1--सुलगती सिगरेट  2--कैंडिल नाइट को स्थान देने के लिए संपादक निर्भय  देवयांश सर का दिल से आभार. 
 निर्भय सर संपादक के साथ ही अदब के वे रोशन चिराग हैं, जिनके कलम की रोशनाई कभी-कभी दिल्ली की अय्याश  रातों के खिलाफ बगावत करती है.

Wednesday, 30 November 2022

(खनकती ये महबूब चुडियां)
मै अक्सर नमाज़ के वक़्त भी घुम जाता हूं,
मस्जिद के बगल से जो गुजरती है------
चंद चुडिहारो की गली!
तकता हु तमाम दुकानो की तरफ,
कि शायद किसी दुकान पे--------
फिर अपनी नर्म नाज़ुक सी कलाई में,
पहनती किसी चुडिहार से चुड़िया--वे दिख जाये,
जैसे दिखी थी अगले जुमें को!
नही दिखी,
शायद वे किसी और शहर से थी,
मै ज्यो घुमा------------
तो नज़र पड़ी वे आ रही थी कुछ सहेलियो के संग,
तभी उसकी चुड़ियो की खनक ने,
जैसे हमें आदाब कर कहा हो,
जनाब मै इसी शहर की हूं!
और इसी शहर की है मेरी कलाईयो मे-----
खनकती ये महबूब चुड़िया।

Sunday, 27 November 2022

(आसमानी किताब हो)
खुद को जरा सलिके से रंखो----
ऐ पारा-ऐ-हूश्ऩ,,
तुम कोई मामूली शख्स़ियत नही---
मेरी ख्व़ाहिशो की आसमानी किताब हो।
(इतवार केवल दिन नहीं मोहब्बत है)
कभी किसी शनिवार वे आते है,
कभी किसी शनिवार मै जाती हू।
ये भागमभाग,ये नौकरी,ये भीड़ 
कि उबन से दुर------------
कभी किसी इतवार वे मुझे पाते है,
कभी किसी इतवार मै उन्हें पाती हू।
फिर अगली सुबह लौटना होता है,
कभी दरवाजे़ पे वे मुझे छोड़ने आते है,
और कभी दरवाजे पे मै उन्हें छोड़ने जाती हू।
इसलिये एै,रंग---अब हमारी जिंदगी मे इतवार महज़ दिन नही,
मोहब्बत है जो हम एक दुसरे से कर पाते है।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

नौकरीपेशा लोगो का वे इतवार जिसका इंतज़ार वे बड़ी शिद्दत से एक दुसरे के लिये अलग-अलग शहरो में पुरे हफ्ते ट्रेन पे न बैठ पाने तलक करते है।

Wednesday, 23 November 2022

(काँच का ताज़महल था)
उस बेवफ़ा के हाथ से-----
गिरा और गिरके टुट गया,,,,,,,
ऐ,रंग----वे मेरा तोहफ़ा नही----
काँच का ताज़महल था।
(औरत के अंग)
हा मै औरत हू-----------
इसलिए तो तुम्हारे उन अंग विशेष,
को मै तकने भर से जान जाती हू,
कि तुम्हारी मंशा मेरे उन अंगो के-----
बस नोचने-खसोटने और मसलने से है।
जबकि एक औरत के वही अंग विशेष,
अपने पती के प्यार पाने के वक़्त भी,
शर्म ओढ़े रहते है,
क्योंकि उसमें किसी तरह की नोच-खसोट नही,
बल्कि एक-दुसरे के परम विश्वास का देव श्पर्श है।
हा!शायद तुम्हारा पुरुषपन अंदर से सध नही पाता,
किसी एक समर्पित अंग से बध नही पाता,
वरना तकते तो तुम्हें भी अपनी पत्नी का वे अंग,
उतना ही आकर्षित करता------------
जीतना की पर स्त्री या औरत का।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758
कानपुर में हुए ट्रेन हादसे की बरसी पर लिखा हुआ मेरी पीड़ाओं का एक मरसिया.

(एक दर्द कानपुर के नाम)

एै कानपुर------------
तेरे शहर में ये आँसुओ वाली ट्रेन,
हमे याद रहेगी।
ना भुलुंगा क्योकि---------
इस हादसे की मरसिया नीरज की तरह,
अब हमारे पास रहेगी।
मै जानता हु कि---------
तेरी फाइलो में गुम हो जायेगा ये दर्द,
तु सरकारी महकमा है!
पर जीना है उन घरो को ये हादसा,
उनके दिलो में आँसू रहेगा और-----
ता-उम्र ये चेहल्लुम की रात रहेगी।
एै कानपुर-----------
तेरी पटरियो से होके फिर गुजरेगी ट्रेन,
फिर उतरेंगे चढ़ेंगे मुसाफ़िर,
तेरी कानो मे---------
हर रोज एक नई आवाज़ रहेगी।
एै कानपुर----------
तेरे शहर में ये आँसुओ वाली ट्रेन,
हमें याद रहेगी।

@@@कानपुर ट्रेन हादसे पे लिखी एक गमज़दा रचना।

रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758
(बिटिया खुले मे शौच जाती है)

आखिर बाप और भाई की ये कैसी छाती है?
जो उसकी जवान बहु-बेटी----
खुले में शौच जाती है.

रास्ते भर फबत्ती और----
किसी की छेड़खानी का डर क्या होता है?
कभी देखना हो,
तो उसका वे चेहरा देखना
कि किस तरह वे चंद लम्बी साँसे लेती है,
जब सकुशल अपने घर लौट आती है.

अक्सर हम अखबार और टी.बी. मे ये पढ़ते व सुनते है,
कि अधिसंख्य----
खुले मे शौच गई महिला की,
रेप या बलात्कार के साथ नृशंस हत्या,
सारे रोंगटे खड़े हो जाते है,
जब सबसे ज्यादा----
एैसे ही बलात्कार की रिपोर्ट आती है.

आओ हम बदले अपनी बहु और बिटिया के लिये,
ये ना समझो कि पहले कौन?
तन्हा लड़ो क्योंकि हर अच्छे के लिये---
फिर फौज आती है.

एै "रंग" ये महज़ कविता नही एक दर्द है,
कि आजादी के इतने सालो बाद भी,
हमारे देश की बिटिया-----
खुले में शौच जाती है।

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Monday, 21 November 2022

(पत्थर तोड़ती है)
रोटी के लिये---------
वे सारा दिन खुद को निचोड़ती है,,,,,,,
ऐ,रंग----हमारी गज़ल--------
फूटपाथ पे पत्थर तोड़ती है।
(मै यहां रोने आता हूं)
तुम्हे पाने और खोने आता हूं,
अब हर शाम मै यहां रोने आता हु।
बनाता हु घरौदा फिर तोड़ देता हु,
मै यहां समंदर की लहरो मे,
खुद को हर शाम----------
डुबते सूरज की तरह डुबोने आता हु।
तु गई तेरी याद रह गई,
उसी याद की लाश को हर शाम-----
मै यहां धोने आता हु।
नींद और सुकून भी मेरी आँखो मे अब नही,
मै यहां कुछ लम्हे रेतीली कब्र पे--------
तेरी निशानियो के सिरहानें सोने आता हु।
मै तब भी पागल था और अब भी पागल हु,
तभी तो तेरी जुदाई के इतने सालो बाद भी,
मै यहां तेरा होने आता हु।
तुम्हें पाने और खोने आता हूं-------
अब हर शाम मै यहां रोने आता हु।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.--7800824758
हाय रे!टमाटर यानी की 80 रूपए किलो 😀😀😀😀

व्यंग्य-कविता------

(अनार से महंगा टमाटर खा रहा हूं )

आ गये अच्छे दिन---------
मै इलू-इलू गा रहा हूं,
अनार से महंगा टमाटर खा रहा हूं.

मार्केट से सभी सब्ज़ियाँ तो ले ली,
पर टमाटर को लेने मे लग गये घंटो,
क्योंकि सभी एक से भाव मे बेच रहे थे,
यहाँ तलक कि टमाटर को 
बीना मतलब छुने से रोक रहे थे,
थक-हार एक ठेले वाले को पटा रहा हूं------
बड़ी मुश्किल से घर टमाटर ला रहा हूं,
अनार से महंगा टमाटर खा रहा हूं.

बीबी भी सबसे पहले सब्ज़ियो के झोले से,
टमाटर टटोल कर निकालती है,
और पुछती है क्या भाव पाये,
कैसे कहु कि हे!भाग्यवान
 तुम अपने टमाटर खाने का शौक,
काश सस्ते होने तलक टाल पाती,
लेकिन नही,तुम नही टाल पाओगी,
तुम्हारे इसी न टालने के नाते,
अपनी एक महिने की सेलरी का
 तीस पर्सेंट खर्च कर,
बस मै तुम्हारे लिये टमाटर ला रहा हूं.

आ गये अच्छे दिन-----
मै इलू-इलू गा रहा हूं,
अनार से महंगा टमाटर खा रहा हूं।

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no,----7800824758

Sunday, 20 November 2022

(चिनार की शाखों पे)
बैठता है,आज भी
यादो का परिंदा 
चिनार की शाखो पे।
लगता है,आज भी हमे
कि,वे चुपके से 
मेरे पीछे खड़ी हो,
ऐ रंग,-रख देगी अपनी
नर्म अगुँलियाँ,
मेरी आँखो पे।
बैठता है,आज भी 
यादो का परिंदा 
चिनार की शाखो पे।

चिनार-एक पहाड़ी वृक्ष।
(लिव इन रिलेशन शीप)
ऐ दुनिया---------------
अब हम भी तरक्की कर रहे है,,,,,,,
एक घृणित सेक्स के साथ हम----
लिव इन रिलेशन शीप मे रह रहे है।
(एक दर्द कानपुर के नाम)
एै कानपुर------------
तेरे शहर में ये आँसुओ वाली ट्रेन,
हमे याद रहेगी।
ना भुलुंगा क्योकि---------
इस हादसे की मरसिया नीरज की तरह,
अब हमारे पास रहेगी।
मै जानता हु कि---------
तेरी फाइलो में गुम हो जायेगा ये दर्द,
तु सरकारी महकमा है!
पर जीना है उन घरो को ये हादसा,
उनके दिलो में आँसू रहेगा और-----
ता-उम्र ये चेहल्लुम की रात रहेगी।
एै कानपुर-----------
तेरी पटरियो से होके फिर गुजरेगी ट्रेन,
फिर उतरेंगे चढ़ेंगे मुसाफ़िर,
तेरी कानो मे---------
हर रोज एक नई आवाज़ रहेगी।
एै कानपुर----------
तेरे शहर में ये आँसुओ वाली ट्रेन,
हमें याद रहेगी।

@@@कानपुर ट्रेन हादसे पे लिखी एक गमज़दा रचना।

रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758
(ठंड की रात)
तुमसे दुर-------------
ये तन्हा गुलाबी ठंड की रात।
और तेरे बुने हुये मफ़लर का श्पर्ष,
एक तेरे प्रेम सुगंध की तरह,
कट जाती है,बीना तेरे रहे भी-----
अपने रिश्तो के संम्बंध की रात।

Saturday, 19 November 2022

(मरुस्थल हो गया)
जाने कब--------------
मेरी संवेदनाये मर गई,,,
दिल मे---------
नागफ़नी और कैक्टस उग आये!
ऐ,रंग---------
मै आदमी से मरुस्थल हो गया।

Tuesday, 15 November 2022

धन्यवाद! नयी दिल्ली से प्रकाशित राष्ट्रीय मासिक पत्रिका "प्रखर गूँज साहित्यनामा" व धन्यवाद प्रमुख संपादक नीलू सिन्हा और ब्यूरो चीफ लालचंद्र यादव जी का नवंबर अंक मे "मेरी कविता की बुढ़िया" को स्थान देने के लिये.

(मेरी कविता की बुढ़िया)

मेरी कविता की बुढ़िया उदास है,
विदेश मे रहते है इसके बेटे और बहु,
इसका पुरा मकान खाली है।
वे देखो आँगन और सुखी तुलसी,
और किनारे खड़ी----------------
बिल्कुल बुढ़िया के दिल की तरह,
टुटी चारपाई,
जिसपे वे ठंड के दिनो मे,
गुनगुनी धूप मे सरसो के तेल की,
घंटो बेटे की किया करती थी मालिश,
आज उसी तेल की कटोरी में,
उसके वात्सल्य का अरमान खाली है।
वे देख रही है एकटक------------
दिवाल पे टंगी अपने बेटे के बापु की,
वे धूल भरी फोटो!
फिर बुदबुदा के लौटती है बीना रोये,
जैसे पढ़ लेगे फोटो से ही,उसके बापु
उसका दर्द उसकी पिड़ा!
आँखो में उसके अब तुफान खाली है।
अभी पिछले ही दिनो,
मेरी कविता की ये बुढ़िया बिमार हुई है,
अब न बचेगी!
इसकी हिचकियाँ और बार-बार
दरवाजे की तरफ तकना,
वही हुआ बुढ़िया मर गई,
मेरी कविता तो पुरी हो गई,
पर उसके विदेशी बेटे और बहु नही आये,
जहाज़े आती और जाती रही,
एै,रंग------फिर भी हर ऐयरपोर्ट पे,
मेरी कविता की बुढ़िया उदास खड़ी है।

@@@रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर पिन नं.222002 (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.---7800824758

विदेशी मे रह रहे बेटे का इंतजार करती माँ की बुढ़ि आँखे।

Monday, 14 November 2022

पहली बार मैंने अपनी किसी लघुकथा में अपने जनपद जौनपुर का जिक्र किया है जो की दिनांक 14/11/21 यानी की "बाल दिवस" के दिन उत्तर-प्रदेश के चर्चित दैनिक समाचार पत्र जनवाणी के साप्ताहिक पृष्ठ "रविवाणी " और अजीत समाचारपत्र जालंधर के साप्ताहिक पृष्ठ में प्रकाशित है.

इसकी pdf भेजनें के लिए दैनिक जागरण के ऊर्जा कालम व साथ ही बिभिन्न हिंदी साहित्य विधा के चर्चित हस्ताक्षर प्रिय भाई पुष्पेंद्र दीक्षित का बहुत-बहुत धन्यवाद 🌹🌹🌹🌹

बाल दिवस लघुकथा----( गलती क्या थी? )

मुझे ट्रेन में बैठकर , जौनपुर से फैजाबाद जाना था, लेकिन प्लेटफार्म के लगे माइक से लगातार यह अनाउंस हो रहा था कि, आज जौनपुर से फैजाबाद जाने वाली ट्रेन अपने निर्धारित समय से एक घंटे लेट से आएगी. 

यह जानकर मैं प्लेटफार्म से बाहर निकल आया और यूं ही चाय पीने की नियत से एक चाय की दुकान पर जा बैठा, तभी उस दुकान में बैठे सात-आठ लोगों के बीच से एक आवाज आई कि - "ए चवन्नी तीन चाय लाना तो."

उनके बुलाने के तरीके से यह स्पष्ट लग रहा था कि, वे यहीं कहीं आसपास के रहने वाले थे. फिर तीनों सिगरेट जला कर आपस में बातें कर खूब खिलखिला कर हंसने लगे. तभी उन लोगों के हंसने के बीच एक 13 साल के लड़के जो कि मैले-कुचैले निक्कर के साथ एक दो जगह से फटी गंजी पहने था आया. 

उन लोगों के सिगरेट के धुंए की वजह से या कहीं पांव में ठोकर लग जाने की वजह से उस चवन्नी के हाथ से चाय की पकड़ी हुई गिलास छूटकर उन लोगों के साफ-सुथरे कपड़े पर गिर जाता है. जिसकी वजह से उस मासूम से दिखने वाले चवन्नी नाम के लड़के को ना सिर्फ ये मां बहन की गाली देते हैं, बल्कि उसके गाल पर तीन-चार तमाचे भी जड़ देते हैं. 

क्योंकि मैं भी उसी चाय की दुकान पर बैठा चाय पी रहा था. अतः मैंने साफ व स्पष्ट उस चवन्नी की आँखों में भर आये आँसुओं को देखा और मेरा मन खिन्न हो उठा, फिर मै चाय के पैसे दे, स्टेशन के प्लेटफार्म की तरफ चल पड़ा जहां मेरे जाने वाली ट्रेन के प्लेटफार्म नंबर 4 पर लगने का अनाउंस हो रहा था. लेकिन एक सवाल जो ट्रेन से मेरे गंतव्य तलक पहुंचने के बावजुद भी अनुत्तरित रह गया. वह था कि, -- "आखिर उस चवन्नी नाम के लड़के की गलती क्या थी?"

लेखक---रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758

Sunday, 13 November 2022

(औरत नही देखी)
माथे पे चुहचुहाता पसीना-----
कमर पे खुशी साड़ी-----
और सर पे सीमेंट की भदेली,,,,,,,,,,
श्रम की मादक चाल------
ऐ,रंग----मेरी कविता ने कभी----
इतनी खूबसुरत औरत नही देखी।
छत्तीसगढ़, से प्रकाशित साहित्य की सर्वोत्कृष्ट त्रैमासिक पत्रिका "बहुमत" के 101 अंक में मेरी लघुकथाओ को स्थान देने के लिए संपादक बड़े भैया विनोद मिश्रा जी के इस आशीर्वाद व स्नेह के लिए मेरा कोटिशः प्रणाम🙏🙏. 

■"बहुमत " का 101 वां अंक ■
================================
● लुइस ग्लक की 9 कविताएं ।। अनुवाद--मंगलेश डबराल, लीलाधर मंडलोई, विनोद दास, तिथि दानी,प्रभात रंजन,श्री बिलास सिंह ।।
■ 75वें वर्ष में कवि -राजेश जोशी की तीन कविताएं
● रचना की जरूरत:निर्मल वर्मा
■ कविता का प्रयोजन: राजाराम भादू
●महात्मा गांधी के छत्तीसगढ़ प्रवास की शताब्दी स्मृति: राहुल सिंह का विशेष लेख
■रामनगीना मौर्य और आलोक रंजन की कहानियां
●रोअल्ड डाहल की अंग्रेजी कहानी:खाल (अनुवाद-सुशांत सुप्रिय )
■शानी की कहानी:कफ़न चाहिए

● कविताएं:: लीलाधर जगूड़ी, वेणु गोपाल,रूपम मिश्र, जोशना बैनर्जी आडवाणी, संदीप निर्भय,रवि प्रकाश, सुलोचना वर्मा,विनय सौरभ, हर्ष भारद्वाज,रजत कृष्ण, योगेश ध्यानी,शिवम चौबे, फिरोज खान, उल्लास पाण्डे, अंकिता आनंद,विधान,निधि अग्रवाल, अंकिता शाम्भवी, कुबेर कुमावत, अनामिका चक्रवर्ती,कुंदन सिद्धार्थ, पल्लवी मुखर्जी, वन्दना गुप्ता,अनु चक्रवर्ती,सोनी पाण्डेय,ज्योति रीता,अमृता सिन्हा ।।।।

■लघुकथाएं: सुशांत सुप्रिय, रंगनाथ द्विवेदी
● गज़लें: अनिता सिंह,देववंश दुबे, फूलचंद गुप्ता ।
■पुस्तकें मिली-महेन्द्र मिश्र, अशोक शाह,उषा दशोरा, सुभाष चन्द्र कुशवाहा,राम नगीना मौर्य, रामकुमार तिवारी,गौरव गुप्ता,नीरज नीर, कुबेर सिंह साहू, अरविंद श्रीवास्तव, वन्दना गुप्ता, अजित कुमार राय, राजेश झरपुरे, कुबेर कुमावत ।।

#आवरण: अनिल वशिष्ठ
#रेखांकन: अनुभूति श्रीवास्तव

•संपादक: विनोद मिश्र
•प्रबंध संपादक: अरुण श्रीवास्तव
•परामर्श: राजीव चौबे
               : दिनेश वाजपेयी
-■---------------■----------------■-------------■
श्री चतुर्भुज मेमोरियल फाउंडेशन, भिलाई-दुर्ग(छत्तीसगढ़) एवं जनसंपर्क विभाग छत्तीसगढ़ शासन के सहयोग से प्रकाशित
-■---------------------------------------■----------■

Friday, 11 November 2022

गुजरात, से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका "नया साहित्य निबंध " के जनवरी-जून 2021 के संयुक्तांक में मेरी भी लघुकथा प्रकाशित है, इसकी जानकारी मुझे देश की बहुचर्चित कहानीकार डॉ रंजना जायसवाल जी ने कल दी. साथ ही मेरी इस लघुकथा को पत्रिका में स्थान देने के लिए संपादक बड़े भाई रजत सान्याल जी का बहुत-बहुत धन्यवाद.

Tuesday, 8 November 2022

(पति पत्नी कहां होते है)
हम कमरे में----------------
अब पति पत्नी कहां होते है?
बिस्तर तो वही है,
पर एैसा लगता है जैसे--------
अब उसपे दो अज़नबी सोते है।
टटोलना मुमकिन नही भीतर का सन्नाटा,
बस काम से लौटते थके कदम,
ही अब हमारे भीतर होते है।
फिर खिड़की से बाहर महानगर के,
न थमने वाली चुभती चिखती आवजे,
और हमारी शादी की सालगिरह पे,
वे गमले में लगाई,
बिल्कुल अपने जीवन की तरह,
कि नागफनी को एकटक देखते है,
फिर उदास टावल को उठा,
हम हाथ मुँह धोते है।
अब तो ये भी याद नही,
कि कब हम एक साथ बैठकर चाय पिये थे,
और किस बात पर हम साथ खिलखिलाये थे,
अब तो सामने है बस एक तन्हा खालि कप,
जिससे अब केवल होंठ भिगोते है,
और लेते है एक थकी साँस,
अब तो रिश्ते को जीते नही बस ढ़ोते है।
हम कमरे में------------
अब पति पत्नी कहां होते है?।
## # एक जिवंत रिश्ते के निरस हो जाने का आधुनिक दर्द।
(दंगा याद है)
हमें पुराना शहर याद है,
एक-एक गली मुहल्ला याद है।
वे कुर्आनखानी का खुरमा,
मुँह पोछती अपने दुपट्टे से,
अब्दुल की अम्मा याद है।
हमें पुराना शहर याद है!
राखी सुनि थी एक ब्राह्मन के घर,
आँख मे खुशियो के आँसू---------
मेरी इस कलाई को सलमा याद है।
हमें पुराना शहर याद है!
इतने सालों बाद देखा जब जला घर,
पुछा कहां गये ये सब,
तो नये शहर के बाशिंदो ने बताया,
तो अफसोस हुआ,रंग---------------
कि अब नये शहर को,
पुराने शहर की मोहब्बत नही,
नफरत,लाशे और दंगा याद है।
हमें पुराना शहर याद है।
बहुत उदास है—————
आज हमारे तुम्हारे मोहब्बत की,
कैंडिल नाईट।
मै वही बैठी हूँ ठिक सामने,
बस वे जगह खाली है-
जहां तुम बैठते थे,
आज बहुत उदास है मेरे अंदर जिंदगी,
मै टुट रही हूँ!
मेरे संग बीत रही है,
बस तुम्हारे खूबसूरत यादो की—–
कैंडिल नाईट।
शायद कही चुक गये हम,
इसी से हमारे रिश्ते में गलतफ़हमी बढ़ती गई!
तुम अलग हो गये मै अलग हो गई,
अब तो अक्सर————–
डिनर मेज पे ही रह जाता है,
और मै कुर्सी पे बैठी यु ही,
गुजार देती हू————-
अपनी कैंडिल नाईट।
गर गुंजाइश हो तो लौट आओ,
एक मर्तबा ही सही मुआफ करने,
क्योंकि ऐ,रंग—–कही ऐसा न हो,
कि तेरा इंतजार करते-करते,
हमेशा के लिये बुझ जाये,
मेरी ये कैंडिल नाईट।
(बाँसुरी का बचपन)
तलाश रही हूं-----------
वे गुब्बारे और बाँसुरी का बचपन।
तलाश रही हूं----------
उड़ती तितलियाँ इस फूल से उस फूल,
और उन फूलो की पाँखुरी का बचपन।
बहुत पिछे छुट गया उम्र के साथ------
माँ की बाधि चुटिया और फ्राक पहने स्कूल जाना,
वे रास्ते में बुढ़ि दाई की अमरुद,
और जुम्मन चाचा के चुरन!
कुछ सिक्के हथेली के कितने ज्यादा थे,
अब यादो में है जैसे---------
एक परी का बचपन।
तलाश रही हूं---------
आज फिर मायके से ससुराल जाते,
अचानक नजर थम गई कुछ पल उस मोड़ पे-----------
जहां से कभी खरीदा करती थी गुब्बारे और बाँसुरी,
आज वे फेरीवाला नही दिखा,
एक हूक उठी---------
और मेरे अंदर यादो की आँख भर आई,
अब ता उम्र कचोटेगा मेरी यादो में------
वे गुब्बारे और बाँसुरी का बचपन।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.7800824758
नगरपालिका चुनाव की घोषणा होते ही हमारे शहर की सरगर्मी बढ़ गई है और इस बार के चुनाव मे खुले तौर पे रजिस्टर्ड पार्टियो ने प्रत्याशियो को अपना सिंबल दिया है!यानी इस बार तथाकथित पार्टियो की अपनी मर्यादा भी फसी है इस चुनाव को आगामी लोकसभा का रिहर्सल भी कहाँ जा रहा है।
फिलहाल मैने एक चुनावी चक्कलस के माध्यम से अपने शहर की मशहूर अटाला मस्जिद की अड़ी को इंगित करते हुये इसकी शुरूआत कर दी है उसपे चार चाँद ये है कि हमारे जिले जौनपुर मे महिला सामान्य सीट है यानी पतियो को अपनी करवा चौथ,तीज और डाला छठ जो अभी ताजे-ताजे बीता है उसे अगली मर्तबा और खुशगवार बनाने के लिये बड़ी मेहनत करनी है।
फिलहाल पेश है एक चक्कलस--------------
   (अटाला मस्जिद राजनैतिक पतियो की सीतामढ़ी है)
अटाले पे सज गई एक बार फिर चुनाव की अड़ी-------
बहस-मुबाहसे में जात-कुजात गीने जा रहे,
कोई कह रहा कि पुराने वोटर मे कुछ नये जुड़ गये है,
इसी से फला-फला के होश उड़ गये है,
इस बार हर पार्टी ने सिंबल दिया है,
महिला सीट है,
इसी से अब लोकसभा भी सधना है,
जुम्मन चचा दुबारा बीड़ी दगा चाय की कुल्हड़ फेक,
गंभीर मुख-मुद्रा बना कहते है,
हम बेवकूफ है जगह-जगह लड़ते है और ये पार्टीवाले,
महज़ हमारी उसी उन्मादी आँच पे--------
हर पाँच साल बाद चुनाव लड़ते है,
देखना चुनाव तक मुसलमान नेता मंदिर पे,
मस्जिद की तरह अपना सिर नवायेंगे,
अपने आपको वहाँ हिन्दू बतायेंगे,
और हिन्दू प्रत्याशी--------------
अपनी पत्नियो के चुनाव प्रचार मे कहेगा,
क्या मंदिर? क्या मस्जिद सब एक है,
यानि बेटा चुनाव तक-----------
ये अटाला मस्जिद नही बल्कि सीतामढ़ी है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758
(माँ)

माँ-
    मै ढ़ेरो खाता हूँ,पर तेरी 
चुपड़ी रोटी की भूख-
रह जाती है.

आज सबकुछ है,
स्लीपवेल के गद्दे,एसी कमरे
पर नींद-
घण्टो नही आती है.

ऐ रंग यादो मे सिर्फ--
माँ की गोद,
और लोरी रह जाती है.

रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी.
(आखिरी सेल्फी)
तुम्हे-------------
कहा था कई मर्तबा,
पर तुम माने कहां,
रोज खिचते रहे-------
हमारी और अपनी निजी पलो की सेल्फी।
आज वे सभी शहर में वायरल हो गये,
मै नंगी गुजर रही हूँ सड़क से,
हर भूखी आँख देख रही है जैसे,
तुम्हारे द्वारा ली गई-------------
सहवास के पलो की वे सारी सेल्फी।
काश तुम मान गये होते!
तो आज ख़ुदकुशी न करती,
और न छोड़ती अपने सिरहाने,
तुम्हारे लिये मै-----------
अपनी आखिरी सेल्फी।
देखना ता उम्र-----------
अपनी डबडबाई आँखो से,
मै तुम्हारे बहुत पास रहुँगी,
कभी डिलिट नही होगी तुम्हारी जेहन से,
ये हमारी आखिरी सेल्फी।
## # आधुनिकता नितांत आवश्यक है पर आजकल कुछ घटनाये रोंगटे खड़ी कर दे रही है सेल्फी के द्वारा हमने एक भाव व्यक्त किया है,मेरा उद्देश्य किसी का समर्थन या विरोध नही है,धन्यवाद।

Monday, 7 November 2022

(कश्मीरी पंडित)
वे बांगा दी बुलबुल-------
वे डलझील वे शीकारे--------
हमारी मिट्टी-ए-मोहब्बत कश्म़ीर,,
हमे ख्वाबो मे पुकारे।
ये सियासत-ए-साजिश-ए-अलगाव,
कि हम कश्म़ीरी पंडित पड़े है-------
खानाबदोशो से बदतर ऐ दिल्ली,
तेरी सड़को के किनारे।
वे गुल,वे केशर,वे सेब के बगीचे,
उफ!नही आती वे खूशबु ना आती है--
वैसी यहाँ तक हवा रे।
ये लाशे मईयत,ये रुह-ए-तड़प है,
ऐ,रंग---हम कैसे होगे जन्नतनशी----
ऐ कश्म़ीर तेरी पाक-ए-मिट्टी के बीना रे।

Sunday, 6 November 2022

(गंगा)
कहाँ बता पायी-
कौन हिन्दू,कौन मुसलमान गंगा।
कहीं हर-हर गंगे,
तो कही-
नमाजे वजू का पानी,
आज हमसे मैली हो रही
सुबह-शाम गंगा।
हे!गंगा पुत्र मोदी तुमपे-
कर्ज-ए-बनारस है,
चुकता करो आके,
अपनी कौल,अपनी कसम
ताकि-ऐ रंग,-
अपने ही पानी से
खुद करे स्नान गंगा।

मोदी के द्वारा खुद को गंगा पुत्र कहने पर।
(यही धारावी)
मै रोज थकी मांदी,
काम से लौटती हूं जीने------
यही धारावी।
वे चारपाई पे लेटा है,धुत्त कच्ची पिये
गंदी गालियाँ दे रहा,
अभी जबरदस्ती खीचेगा,
मै अपनी ऊबकाईयां रोके,
बर्दाश्त करुंगी एक बलात्कार,
फिर उठुंगी वे सो जायेगा,
थका मांदा!
मै उल्टीयां कर,
पुरे बदन से अपने एै,रंग-------
छुड़ाऊँगी सारी रात मै यही धारवी।

Saturday, 5 November 2022

(ईश्क़)
ईश्क़ एक रुह़-ए-वफ़ा है------
इसका न कोई जिस्म़ न कोई बदन है।
ऐ,रंग-------------
ये एक मौत-ए-जश्ऩ है।
(पूजा का वक्त था या अजान का)
मंदिर और मस्जिद के बीच,
सड़क के किनारे झाड़ियो मे-------
हमने एक औरत की नग्न लाश देखी।
और उसके दोनो स्तनो पे
खुरचने के निशान देखे!
और वे दोनो स्तन----------
मंदिर और मस्जिद की तरफ लटके हुये थे,
कितने असहाय थे बताने में,
उस नग्न औरत के दोनो स्तन ऐ,रंग-----
कि वे पूजा का वक्त था या अजान का।
## # मेरी इस रचना को वलगेरेटी के लिहाज से न पढ़े,इस तरह की एक लाश शायद डेढ़ वर्ष पहले देखी थी ये उसी से प्रेरित है,फिर भी गर कही से भूलवश कोई आहत होता हो तो हम उससे माफी मागते है-----धन्यवाद।
(मै भी कुम्हार हूँ)
हा मै भी----------------
अपने गीतो की चाकी पे,
शब्दो की मिट्टी रख,
कुछ गीत------------
उसके दिवाली के दीये की तरह बनाता हूँ।
वे भी कुम्हार है मिट्टी के दियले का,
और मै भी कुम्हार हूँ-------
अपने गीतो का।
वे उपले की आँच में,
पकाता है दियलो को और मै--------
अपने हृदय के उपलो की आँच में,
गीतो के शब्द पकाता हूँ।
(शहनाज़ का मेकप नही करती)
हमारी गज़ल वे खूबसूरत औरत है,
जो कभी शहनाज़ का मेकप नही करती।
वे सादगी और सलिके की रस्म़ है,
वे जिधर से गुजरती है निगाहे पाकिज़ा,
अपने सर से दुपट्टे को ओझल नही करती।
हमारी गज़ल--------------------
ये जीनत है ज़मी की आयत है,
ये ज़न्नत से घर को कभी दोज़ख नही करती।
हमारी गज़ल-----------------------
ऐ,रंग----इसकी दुनिया फकत शौहर है,
ये हवस के मारो की तरह कभी ब्रेकप नही करती।
(ठंड की रात)
तुमसे दुर-------------
ये तन्हा गुलाबी ठंड की रात।
और तेरे बुने हुये मफ़लर का श्पर्ष,
एक तेरे प्रेम सुगंध की तरह,
कट जाती है,बीना तेरे रहे भी-----
अपने रिश्तो के संम्बंध की रात।

Friday, 4 November 2022

(प्रेम कस्तुरी)
उससे दुर हूँ-----------
फिर भी नही है उससे कोई दुरी।
मेरे कानो मे सुनाई देती है-----
उसकी वे संगीतमय चुड़ि।
मेरी प्रेयसी बस कहने को प्रेयसी है,,
वरना ऐ,रंग----वे है मेरे हृदय की----
प्रेम कस्तुरी।

Thursday, 3 November 2022

(गाँव के दिन)
यादो मे है,-
मेरे गाँव के दिन।
वे अल-सुबह किसानो का,
अपनी खेतो की तरफ जाना
क्या खुब थे?
वे उनके हल-बैल के दिन।
ऐ रंग,-साँसो मे
मिट्टी की सोंधी गंध,
वे मीठी नींद
और खपरैल के दिन।
यादो मे है,-
गाँव के दिन।

Wednesday, 2 November 2022

(पटना से मोतीहारी)
जब भी मै-------------
जाता हूँ पटना से मोतीहारी।
बार-बार मेरी नजर------
उस ताम्बई लड़की को तलाशती है,
जो ऐसे ही एक सफर मे--------
सामने बैठी थी,
पटना से मोतीहारी।
अब भी एक हूक सी उठती है,
दिल मे---------
जब बीना उसके बैठे,
चल पड़ती है--------
अगले स्टेशन के लिये गाड़ी,
पटना से मोतीहारी।
ऐ,रंग-------------
ये सफर एक किताब है मेरी,
पटना से मोतीहारी।
(शहर के लोग)

मुझे नंगी सुला गये मेरी शहर के लोग!
एै खिज़ा के पत्तो--------
तुम कभी मेरी कब्र पे गिरना.
कितनी मोहब्बत थी गुसलखाने से,
रहने नहीं दिये एक इंतकाले सब-----
बड़े बेमुरौवत निकले मेरी शहर के लोग.

मुझे नंगी सुला गये मेरी शहर के लोग.

एै मौसमें सावन--------
तुम कभी मेरी दफ़न-ऐ-बदन पे गिरना!
कभी शफ़क चाँदनी में टहलती थी,
घंटो जिस छत पे,
ले चले उसी छत वाली गली से-----
मेरा जनाज़ा मेरी शहर के लोग.

मुझे नंगी सुला गये मेरी शहर के लोग.

एै चाँद वैसे ही शफ़क रातो की तरह,
मेरी इस रुहे बदन पे पड़ना,
मेरी तड़प है कि अब भुले से नही आते,
शहर तो शहर मेरे अपने घर के लोग.

मुझे नंगी सुला गये मेरी शहर के लोग.

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758
(मिट्टी से जुदा मत करना)
बेटे मै बुढ़ि हो गई हूँ-------------
मुझे इस उम्र में अपने अब्बु से जुदा मत करना।
ना बेचना किसी को-------------
दरवाज़े पे जो उन्होनें लगाया है दरख्त़,
मै उसी से बतियाती हूँ अक्सर,
मुझे दर्द होगा------------
जब कोई काटेगा टंगारे से तेरी अब्बु की याद को।
बेटा बेशक तु मुझे हज़ ना कराना,
पर लेने देना मुझे आखिरी साँस इस मकान में,
मर जाऊँ तो तेरा हक है इस पर,
पर जीते जी मेरे बेटे,
अपनी इस अम्मी को अपने अब्बु के-----
इस मुकद्दस मिट्टी से जुदा मत करना।

Monday, 31 October 2022

अमृता प्रीतम की पुण्यतिथि पर मेरी श्रद्धांजलि 🌹🌹

( अमृता-प्रीतम और उसका अधूरा इमरोज )

मेरे इमरोज़---
मै तुम्हारे लिये छोड़े जा रही,
"एक तकिया तेरे नाम"।
काश ये गिलाफ-----
मै तुमपे चढ़ा पाती,
और बिछा पाती अपनी युवावस्था में---
एक बिस्तर तेरे नाम।

तुम मिले भी तो यु मुझसे,
कि जब जीवन की शाम--
के चंद धुंधलके ही मेरे पास बचे थे!
माफ!करना क्या करु?
बहुत जलाना चाहती हूँ---
तेरे अंदर रौशनी के लिये,
पर बुझ जाऊँगी-
मै बनके दिया एक शाम।

मेरे इमरोज़---
तुम मेरे और पास आओ,
टटोलो मुझको मैने बहुत कुछ लिखा है,
लेकिन---
इस अमृता प्रीतम का अधुरापन पढ़ो,
पढ़ पाये नही न!
जानती थी नही पढ़ पाओगे,
लो मेरी आखिरी साँस,
और आखिरी हिचकी,
खुद लिखे जा रही एक आखिरी किताब----
अमृता प्रितम और उसका
अधुरा इमरोज़।

रचयिता------रंगनाथ द्वीवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर pin no.222002 ( उत्तर-प्रदेेश)
mo.no-----7800824758

Saturday, 29 October 2022

(बदचलन आदत)

छुट नही रही मुझसे मेरी बदचलन आदत---
मंदिर-मस्जिद महज़ चंद दिवालो की इमारत,
लोग लड़ रहे राम और अल्लाह कह-------
इससे तो कही बेहतर है मेरी बदचलन आदत.

ये गली-मुहल्ले के शोर फिर खामोशी,
कोई मालिक---------
तो कोई बेरहमी से निकाल रहा,
 आधी रात जो है पेट से औरत,
जिंदगी के इस कसैलेपन से दुर-----------
मुझे मैखाने लिये जा रही--
 मेरी बदचलन आदत.

मै अक्सर लड़खड़ाते गुजरा हूं नशे मे,
और तका है मैने शहर का नंगापन,
कमरे मे सोये हुये शौहर को छोड़,
दबे पाँव पिछले दरवाज़े से जाते,
 देखा है उजाले की शरीफ़ को,
एै "रंग" इससे कही भली है----
मेरी तवायफ़ के बाँहो मे---
 सोने की बदचलन आदत।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758
(आईना तोड़ देती है)
पटकती है,बे-रहमी से
सिसकता-
छोड़ देती है।
ऐ रंग,-वे हुस्न-ए-बे-गैरत
हर महीने-
एक आईना तोड़ देती है।
(करवा चौथ,तीज हूँ मै)
तेरी खुशियो के लिये---------
कभी बांदी,तो कभी कनीज़ हूँ मै।
खड़ी हूँ तेरे घर लौट आने तलक------
तेरी चौखट तो कभी दहलिज़ हूँ मै।
मालिक भी हूँ,तेरे दिल की ऐ पी मेरे,,,,,,,,,,
तेरी खातिर---------
कभी करवा चौथ तो कभी तीज हूँ मै।

आप सभी को करवा चौथ की ढ़ेर सारी बधाई।

Thursday, 27 October 2022

(माँ)
माँ-
    मै ढ़ेरो खाता हूँ,पर तेरी 
चुपड़ी रोटी की भूख-
रह जाती है।
आज सबकुछ है,
स्लीपवेल के गद्दे,एसी कमरे
पर नींद-
घण्टो नही आती है।
ऐ रंग यादो मे-
माँ की गोद,
और लोरी रह जाती है।
(खुदा की सरहदे)
इन लाशो और मौतो से,,,,,,,,,,,,,,
शायद---------
वे बताना चाहता है हमारी हदे।
क्यूकि ऐ,रंग--------
अब हम लाँघना चाहते है शायद------
खुदा की सरहदे।

भुकंम्प मे मरे सभी की आत्मा की शांति को एक साहित्यिक मौन।
(दर्द के सीने मे जलुंगी)
ऐ दिवाली के दिये-----------
मै भी तेरे संग जलुंगी।
बस फर्क ये होगा कि------
तुम प्रीत की तीलि से जलोगे,,,
और मै विरह के तीलि से जलुंगी।
तुम मुँडेर,घर और दहलिज़ पे जलोगे--
रौशनी के लिये,
मै तो घुटुंगी,क्योकि मै वे दिया हूँ----
जो अपने ही दर्द के सीने मे जलुंगी।
(चाँद)
चाँद हमे गरीबो की,
चुनौती सा लगे है।
ऐ रंग,-ये अमीरो की 
अय्याशियाँ है,वरना
चाँद हमे-
किसी भूखे की,
रोटी सा लगे है।
(छठ मईया)
                     1-
जो कुछ हमको मिल रहा-
सब छठ मईया की देन,
ऐ रंग,-पकड़ मै घर चला
छपरा वाली ट्रेन।
                      2-
छठ मईया के पर्व मे,
है,कुशल और क्षेम
ऐ रंग,-ये ऐसी गांठरी
जिसमे केवल प्रेम।
                         3-
छठ मईया ना करे है,रंग-
इनमे-उनमे भेव,
बस होत सुबेर-
तु अर्ध्द दे
निकले सुरज देव।

छठ पर्व की मंगल कामनाओ के साथ।
(मुसलमान बना दो)
गर मासुमो का कत्ल इतने से-
थम जाये वहसियो,
तो हमे शौक से हिंन्दू या मुसलमान बना दो।
ढहा दो मेरे जेहन का मंदिर,
मै शायर हूँ,मुहब्बत मेरी भूख है,
गर मै तेरी पूजा ना बन सका तो,
अज़ान बना दो।

Wednesday, 26 October 2022

ठुमरी समाज्ञ्री गिरजा देवी को मेरी भावभिनी श्रद्धांजलि।
                 (ठुमरी को उदास छोड़े जा रही)
मै तो बस अपनी ये साँस तोड़े जा रही---------
एै बनारस मै फिर आऊँगी तेरी घाटो पे लौट रियाज़ करने,
मै इसलिये---------------
एक आखिरी ठुमरी छोड़े जा रही।
अनगिनत साज़-आवाज़ की महफिले,
और दिवान मे गिरजा का जिक्र होगा-------
मै अपनी गायकी का एक रंग छोड़े जा रही।
ना रो मुझे जाने दे एै मेरी सदके मोहब्बत,
तु तो मेरे बचपन की सहेली है,
वे देख कब से खड़ी है ले जाने को आज़,
जाने दे ना रोक सहेली,
देख तेरे नाते वे फरिश्त़े औरत भी गमज़दा है,
उसे भी पता है कि वे गिरज़ा की साँस के साथ------
हमेशा के लिये ठुमरी को उदास छोड़े जा रही।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758
(हिचकियो मे याद आऊँगा)
जाओ चाहे जितनी दूर तुम हमसे,,,,,,,,
ऐ मेरी मोहब्बत-------
मै तेरी हिचकियो मे याद आऊँगा।

Tuesday, 25 October 2022

(लोरियाँ चाँद की)
दूध-रोटी से--------
खाली हो गई कटोरियाँ आज की,,,,,,,,,,
ऐ,रंग------अब माँ को भी-----
कहाँ याद है वे लोरियाँ चाँद की।

Monday, 24 October 2022

(लोरियाँ चाँद की)
दूध-रोटी से--------
खाली हो गई कटोरियाँ आज की,,,,,,,,,,
ऐ,रंग------अब माँ को भी-----
कहाँ याद है वे लोरियाँ चाँद की।

Thursday, 20 October 2022

(तस्ब़ीर बोलती है)
कभी हँसी,तो कभी पीर बोलती है,,,,,,,,
ऐ,रंग----------
ये मिज़ाजे जिंदगी का जादु है,,,,,,,,,,,,,
कि वे चुप रहती है---------
तो उसकी तस्ब़ीर बोलती है।

Wednesday, 19 October 2022

(एक जिंदा दिया हूँ)
ताउम्र अपनी मै जल-जल के जिया हूं,
मै आदमी नही-----------
एक जिंदा दिया हूँ।
तमाम खराशे है,है तमाम सिलवटे
उधड़ा रहा मै----------
किसी मुफ़लिस के बिछौने सा,
हर जख्म जिंदगी का-------
मै खुद से सिया हूं।
मै आदमी नही--------
एक जिंदा दिया हूँ।
हु मै एक एैसा सजायाफ्ता,
जो रो नही सकता!
खौलते है आँसू मेरे दिल के अंदर,
मै कभी बहार में नही-------
खिजा़ में जिया हूं।
मै आदमी नही------
एक जिंदा दिया हूँ।
(नैपथ्य से आती है)
ना किसी कथन,ना कथ्य से आती है,,,,,,,,,,
ऐ,रंग-----------
भूख वे तवायफ है--------
जो खाली पेट-----
नैपथ्य से आती है।

Tuesday, 18 October 2022

(शीरी और फरहाद है दोस्त)
कहाँ मिले है मोहब्बत करने वाले---
ऐसा कोई वाकया,,,,,,,,,
तुम्हे याद है दोस्त।
मोहब्बत तो रेल की पटरियो पे कटी---
दो लाश है दोस्त।
सच तो ये है कि मोहब्बत आज भी----
शीरी और फरहाद है दोस्त।

Sunday, 16 October 2022

(गुलेल नीलोफर)
छुट रहे-
गुड्डे और गुडियो के,
खेल नीलोफर।
अब कैसे होगा,
तेरा अपनी सखियो से-
मेल नीलोफर।
रो रहा,रंग,-
अमिया को तोड़ने वाला,
तेरा छज्जे पे रखा-
गुलेल नीलोफर।
(कपड़ा)
तेरा यहाँ,वहाँ से-
कतरा हुआ कपड़ा।
बड़ा अजीब लगता है,
तेरा आधे बदन-
उतरा हुआ,कपड़ा।
मन यूँ ही नही करता,
तुमसे छेड़खानी को,
ऐ रंग,-
हमे चैलेंज करता है,
तेरा अंग विशेष की जगह-
जकड़ा हुआ,कपड़ा।

आज कल के अश्लिल पहनावे पे।
(एल.आई.सी की तरह करता है)
मै तंग आ गई हूँ उसकी किस्त से,,,,,,,,
ऐ,रंग----मेरा शौहर-----
मुझसे मोहब्बत भी---------
एल.आई.सी की तरह करता है।
ताज़महल पे हो रही सियासत से प्रेरित एक रचना-----------
                     (और एक ताज़महल)
मुहब्बत की निशानी की खातिर है याद महल-----
उफ!आज सियासत की ज़द में है ताज़महल।
मै नही कहता कि लड़ा जाये इस जगह------
लड़ने को और भी है इसके बाद महल।
कुछ जोड़े कसम खाते है न जुदा होने की--------
एैसा इसके सिवा दुनिया में नही है मुझे कोई याद महल।
रहने दो इसे मंदिर-मस्जिद मत कहो------
जैसे भी है रहने दो इस ज़मीने जन्नत मे ये आबाद महल।
क्योंकि जानता हूँ एै "रंग" कि बना नही सकती ये दुनिया---
इस ज़मी पे कोई एक और ताज़महल।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.----7800824758
(बन के फूल नीलोफर)
कर नही पाये,
बना के तुम्हे बेटी
ये कुबूल नीलोफर।
तबाह कर देगी,पुरा कुनबा
उनकी-
ये भूल नीलोफर।
ऐ रंग,-
ये दुनियावी चलन है
कि फिर-
किसी के आँगन मे खिलेगी-
बन के फूल नीलोफर।
(खपरैल के घर)
मिट्टी की सोंधी गंध,वे तितलियो के पर,,
वे खुला आसमान,वे पीपल की हवा---
सब कुछ टिसता है मेरी यादो मे।
ऐ,रंग--इस फ्लैट की घुटन से कही अच्छे थे-----------
मेरी गाँव मे खपरैल के घर।
(मै दर्दे दरख्त़ हूँ)
मै वे दर्दे दरख्त़ हूँ--------
जो चोट पे भी चुप रहती है शाख-शाख।
सब छोड़ जाते है--------
कुछ लम्हों के बाद मुझको,
मै सिसकती हु तन्हा अक्सर,
अपनी ही साँस-साँस।
मेरे बदन की ये लिबासे पत्तियां,
कर देती है खिज़ा में-------
बेपर्दा बदन मेरा!
मै जीती हूं किस तरह-------
शर्म को अपनी पलको से टांक-टांक।
मै वे दर्दे दरख्त़ हूँ-------
जो चोट पे भी चुप रहती है शाख-शाख।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

Friday, 14 October 2022

(फकीर हूँ)
ना शाह हूँ,ना वजीर हूँ।
सबकी भूख है,केवल
दो वक्त की रोटी-
मै उसी का मजूर हूँ।
खुद को बांधता हूँ,कसता हूँ।
सच कहूँ,गर मै तो रंग,-
एक गृहस्थ फकीर हूँ।
(गुनाह नीलोफर)
रखती थी-
सभी का खयाल नीलोफर।
फिर जलायी क्यूँ गयी?
अपने ससुराल नीलोफर।
ऐ रंग,-मेरी नज्म का -
वे गीरेबान झींझोड़े
पूछ रही हमसे-
अपनी गुनाह नीलोफर।

{आप बचा सकते है,
अपने आस-पास एक-
बेगुनाह नीलोफर।}
(बहस की ज़ूर्रत करेगी)
गीता-कूर्आन----------
की मौत का मुझे खौफ़ नही।
गर कोई माँ किसी दंगे मे मरेगी,,,,,,,
तो ऐ,रंग--मेरी नज़्म हर मर्तबा------
मंदिर-मस्ज़िद से बहस की ज़ूर्रत करेगी।
(लहरो मे फ़ना होना है)
मै तो फ़कत एक नदी हूँ-------
ऐ वालिदे दरिया,,,,,,,,,,
जिसे एक दिन---------
तेरी लहरो मे फ़ना होना है।

Thursday, 13 October 2022

(नीलोफर)
तु तो जानती है,-
इस दो जख के लिए ही है
हर बाजार नीलोफर।
इस अजनबी शहर मे,
हमे हौंसला देता है-
तेरा प्यार नीलोफर।
मै लौट के आऊँगा,
तेरा जाया नही जाऐगा-
इंतजार नीलोफर।

अपने शौहर का इंतजार करती एक नीलोफर।
(आदमी हूँ)

तेरे रूप के लावण्य से,
देवता दहके थे,
मै तो आदमी हूँ.

है इसमे पाप-पुण्य कुछ नही,
ये सुरा आचमन है,
इसमे देवता बहके थे,
मै तो आदमी हूँ.

रंगनाथ द्विवेदी. 
जौनपुर, उत्तर-प्रदेश 
Mo.no.--7800824758
(रिया )

रिया-----
दिल के विज्ञान के 
"गुरुत्वाकर्षण" का एक रोमांटिक नियम है, 

जो----
अपने लवर को, 
मोहब्बत के "न्यूटन" की तरह,  
पागल कर देती है, 

या-----
सुशांत की तरह किसी नाइट, 
धोखे से, 
ये जीने के सारे "आक्सीजन" खतम कर देती है. 

😀😄😄खतरा बढ़ गया है, सावधान जमानत पे है. 

@@रंगनाथ द्विवेदी. 
जौनपुर, उत्तर-प्रदेश 
Mo.no.7800824758

Monday, 10 October 2022

(लहरो मे फ़ना होना है)
मै तो फ़कत एक नदी हूँ-------
ऐ वालिदे दरिया,,,,,,,,,,
जिसे एक दिन---------
तेरी लहरो मे फ़ना होना है।
(मै औरत नही मरुस्थली रेत हूँ)
मै औरत नही-----------
मरुस्थली रेत हूं!
बस यूँही अक्सर उकेरती हूं,
ताकी मेरी पिड़ा--------
इन रेतिली कड़ो से ताजी रहे।
मैने तो खुद चुना है----------
अपने जीवन का ये रुदालीपन!
अगर रो दुंगी तो क्या बचेगा?
आँख से बह जायेगी वे पिड़ा भी!
मर जाऊँगी बिना तड़पे,
पाप का पश्चाताप मै जिना चाहती हूं!
अपने चारो तरफ रेत और यही रेत,
मै मुट्ठी-दर-मुट्ठी खाली होऊँ,
चुभे मेरे अंतरतक ये नागफनी,
मैने यही तो किया है---------
झुठे प्यार की खातिर!
तड़पता छोड़ आई थी माँ-बाप,
अगर औरत होती-----------
तो ससुराल होता,मायका होता
आज मै कुछ नही,
बस बिना किसी संवेदना की-----
बहुत दुर तलक फैली,
मरुस्थली रेत हूं।
मै औरत नही------
मरुस्थली रेत हूं।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

Thursday, 6 October 2022

(बाँसुरी रोयी)
फूल रोया,
फूल की पाँखुरी रोयी।
इतना दर्द था,उसके जाने का,
ऐ रंग,-
कि अधर पे रखा-
तो बाँसुरी रोयी।

Wednesday, 5 October 2022

(लाश ले चल)
ऐ भीड़ उठा,
ये लाश ले चल।
हमे उनकी गली,
उनके पास ले चल।
देखना वे अपने-
आँचल से ढ़केगी,
ऐ रंग,-इसलिए हमे वहा-
बे-लिबास ले चल।
(अनारकली बे-गुनाह थी)
ये गलत था कि,
वे सलीम की चाह थी।
पर मुगलिया सल्तनत
के खत्म होने मे-
उसकी आह थी।
ऐ रंग,-
वे कनीज का कत्ल था।
वरना अनारकली बिल्कुल-
बे-गुनाह थी।
      [कनीज-नौकरानी]
एक छोटा सा मगर तीखा सा व्यंग्य--------
   
       (राहुल गाँधी--एक राष्ट्रीय बकलोल है)
खानदानी बुद्धि से एकदम गोल है,
सच तो ये है कि--------
ये काग्रेंस जैसी पार्टी के एक राष्ट्रीय बकलोल है।
कब क्या कह दे?, क्या कर जाये? 
इन्हें पता नही------
ये अपनी पार्टी के नष्टकर्ता भूकंम्प और भुडोल है।
मैडम सोनिया के बिदेशी नस्ल का असर है शायद,
तभी तो बेटा ये तक नही जानता--------
कि क्या ?यहाँ का इतिहास और क्या ?भुगोल है।
मोदी--शाह से मजे घाघ को ये पता है,
जिसका ये लाभ ले रहे,
कि आज काग्रेंस पार्टी का नेता,
राहुल गाँधी जैसा--------
एक राष्ट्रीय बकलोल है।

इस रचना को केवल पढ़े दिल पे न ले ये महज कलम की बेबाकी है जो यूहीं लिखा गया है मै केवल मतदान करता हूं किसी पार्टी का समर्थन नही अतः आपका राजी होना न होना अपनी जगह है हा कही अनजाने मे आप आहत होते है तो उसके लिये मै अभी से क्षमा मांगता हूं।
(मस्ज़िद की जरुरत क्या है?)
गर हमे हिन्दु--------
और मूसलमां के नाम पे मरना है,,,,,,,,,,
तो फिर ऐ,रंग-------
मंदिर और मस्ज़िद की जरुरत क्या है।
कविता-वीथी & ग़ज़ल मंच
(ओढ़नी)
याद है बचपन---------
मैं पहले कहाँ ओढ़ती थी ओढ़नी।
वे तो जब मैं तेरह की हुई,
तो अचानक-माँ ने डाँटना शुरु किया,
और कहने लगी-----------
अब अपने सीने पे तुम रंखा करो ओढ़नी।
मैं चौंकी-----------------
कि ये अचानक माँ को क्या हुआ?
फिर लगा नही कुछ तो है,
यूँही नही माँ रखवाना चाहती होगी----
सीने पे ओढ़नी।
फिर कमरे में बंद कर,
खुद को शीशे में टटोलने लगी,
तो अचानक कुछ शर्म सी आई,
कुछ बदला सा था,
जहाँ माँ ने कहा था-रखने को ओढ़नी।
मै बाहर निकली----------
तो देखा बचपन को खिसकते,
लगा माँ कि कितना सच कह रही थी,
कि तु सयानी हो रही है,
क्योंकि कुछ लोग तक रहे थे,
एै,रंग------वही जहां माँ ने कहा था,
रख लो तुम ओढ़नी।
####एक सयानी होती हुई लड़की के वे तमाम चित्र इस रचना में है!गर सच लिखु तो इस कविता की ओढ़नी वाली वे तेरह साल की लड़की बन मैने--इस कविता को जिवंत लिखने की कोशिश की है,इसपे मै कितना खरा उतरा ये तो आप सभी सुधीजन पाठको पे है।
@@@शुक्रिया आपका कविता वीथी &गज़ल मंच जो इस स्नेह सहित मेरी रचना को मान दिया।

Tuesday, 4 October 2022

(वक्त बुढ़ा हो गया)
ऐ बेवफ़ा---------
तेरी लौटने का इंतजार करते-करते,,,,,
मेरी जिंदगी का------
वक्त बुढ़ा हो गया।

Monday, 3 October 2022

(निकाह कर ले)
कुछ सफेद,
कुछ स्याह कर ले।
इस दुनिया से
कुछ और निबाह कर ले।
ऐ रंग,-जब लेने आयेगी
मौत की दुल्हन,
टुटती साँसे कहेंगी-
तु निकाह कर ले।
(वृद्धा के है।राम)
सबकी भक्ति,
सबकी श्रद्धा के है।राम
कौन कहता है?
कि केवल अयोध्या के है।राम
ऐ रंग,-
जुठे बेर,जाति की छोटी
शबरी जैसी वृद्धा के है।राम
जय श्री राम।
(किसानो के अच्छे दिन आ गये)
लात-घूँसा और पुलिस के बर्बरता की,
लाठी तलक खा गये----------
किसानों के अच्छे दिन आ गये।
डीजल--पेट्रोल महगा होता गया,
बड़ी मुश्किल से इस मर्तबा खेत जोता गया,
इनके बिकास का सारा पैसा--------
नीरव मोदी और माल्या खा गये,
किसानों के अच्छे दिन आ गये।
पिछली सरकार दस साल रही,
क्या किया उसने ?
हा इतना जरुर किया की हमारे जख्मों पे---
हमसे भी ज्यादा रोने आ गये,
किसानों के अच्छे दिन आ गये।
हर सरकार इन किसानों पे सांडर्स की तरह,
जलियांवाला बाग सा दर्द देती है,
ये ऐसे ही कभी मौसम,
तो कभी हुकूमत से लड़ते--लड़ते हार गये,
ये तब बागी हुये जब सह न सके,
तभी तो ऐ दिल्ली तेरी दहलीज पे आके,
तेरे अच्छे दिन को नकार गये-----
किसानों के अच्छे दिन आ गये।
लेकिन राजनीति अब भी कह रही,
कि विपक्ष को ईधन चाहिये था चुनाव का,
और अब भी पक्ष का वही दावा,
कि किसानों का पहले से कही ज्यादा-----
हमारी सरकार मे अच्छे दिन आ गये।
( ब्रेकिंग न्यूज़--रेप)

उफ!
थम नहीं रहा, 
हमारे प्रदेश में
नेताओं का अपने शब्दों और भावों का
राजनीतिक रेप, 

किसी मजलूम लड़की
के घाव के निशान 
को ये 
कई बार छूकर देखते है 
क्योंकि इन्हे, 
लड़की के घावों में 
विधानसभा के जीत की कुर्सी
अपनी जीभ लप लपाती हुई दिखती है 
हर नेता-----
शायद इसीलिए चाहता है कि 
होता रहे, 
हर प्रदेश में मासूम और मजलूम, 
लड़कियो का रेप 

यही, 
कमोबेश मीडिया भी 
अपनी लोकप्रियता के, 
टी आर पी का कैमरा लिए, 
बार-बार ब्रेकिंग न्यूज़,  
का ढ़िढोरा पीट, 
उस लड़की का मसालेदार बयान, 
उसके फटे कपड़े, 
ब्रा और टेप, 
को धुंधला दिखाकर 
कर रहा
अपनी पत्रकारिता के नाम पर 
"रेप."

यह रचना मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है. 

रचनाकार----रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर (U P )
Mo.no.7800824758

Saturday, 1 October 2022

(हे!राम)
आज भी------
अहिंसा के सीने पे,
चला रहा है गोली-----
नाथूराम।
कब थमेगी ये हिंसा----
बन्दुको की ऐ,रंग----
आखिर कब निकलेगा,,,,,,,,
कातिल के होठो से---------
हे!राम।
(चाँद)
या तो शायर,
या तो फिर किसी कवि ने देखा।
ऐ रंग,-शर्म के घुँघट मे-
एक मुस्काता चाँद।
उनके बाद हमी ने देखा।
या तो शायर ,
या तो फिर किसी कवि ने देखा।
(हे! राम)
आज भी-
अहिंसा के सिने पे
चला रहा है,गोली,
नाथूराम।
कब थमेगी ये हिंसा-
बन्दुको की ऐ रंग,
आखिर कब निकलेगा,
कातिल के होंठो से-
हे!राम।
गांधी जयन्ति पर।
(लिंग काट लेती है)
आज घर मे अकेला पा--------------
उसका पिता ही उससे जबरदस्ती कर,
उसकी अस्मत लुट,
बीना किसी पछतावे के करवट ले-----
यूँही नंगा लेटा रहता है,
बिटिया मौन ओढ़े उठती है,
और उठाती है यहाँ-वहाँ पिता के हाथो फटे,
बिखरे अपने अधोवस्त्र और लिबास,
फिर जाने क्यू ?
उन वस्त्रो को फेक देती है घिन से,
क्या करती? आखिर क्यू पहनती?
और क्यू ढकती?
उस पिता से अपने अंग,
जिसने पुरे शरीर को अपने नाखूनो से खरोंचा,
और दाँतो से बेरहमी से काटा,
उन स्तनो को------------
जो नारी की सर्वोच्च सुंदरता और,
उसके वात्सल्य की प्रतिमूर्ति है।
वे पुन: अपने कामांध पिता को तक,
एक गहरी साँस लेती है,
और यूँही नंगी बढ़ चलती है किचन की तरफ,
वहाँ से चाकू उठा,
आँख मुदे अपने आनंदातिरेक में नंगे सोये पिता का,
सुसुप्तावस्था मे एक तरफ ढ़लके----------
लिंग को काट लेती है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

मेरी एकाध रचना आपको बिचलित कर सकती है लेकिन इस तरह कि रचना मे एक आंशिक सत्यता भी आप अपने ही सभ्य समाज के किसी न किसी कोने मे पा जायेंगे------ये इसी तरह की एक सत्य घटना का प्रारुप भर है।
(आईने तोड़ रही है)
जब से आईने ने--------
उसकी ढ़लती उम्र की हक़िकत कह दी,,,,
ऐ,रंग----तब से वे गुस्से मे-----
आईने तोड़ रही है।

Wednesday, 28 September 2022

(चन्दन का धुआँ थी)
जो लड़की अभी यहाँ थी,
वे पीरो-फकीरो की दुआ थी।
उफ!अभी तलक है-
सांसो मे उसकी खुशबू,
ऐ रंग,-वे लड़की-
चन्दन का धुआँ थी।
(भूख लिखता रहा)
तु रोटियाँ फेकती रही,अपनी हवेली से--
ऐ रंग--------
मै बगावत और भूख लिखता रहा।
हाथरस की घटना ने एक बार फिर हमे उस निर्भया की याद दिला दी, आप मेरे इस विचार या रचना से आहत हो सकते है, इसलिए इस रचना को पढ़े सहमत होना या ना होना आपके स्वविवेक पर है😢😢😢😢

(एक नई मासूम निर्भया )

निर्भया--------
जो चीखी,तड़पी,छटपटाई
उफ !------
तेरी विकृत कुंठा के 
डाले गये वे सरिये,
कितने घृणित थे!

काश तुम्हारी माँ ने कहा होता,
या तुमने-----------
अपनी सगी बहन के 
वे गुप्तांग याद किये होते,
तो तुम्हारा ज़मीर तुम्हें रोकता कचोटता,
कि ये पाप है,अन्याय है
और तुम कांप जाते!

हां ये जरूर हुआ कि 
तुम्हारी पशुता व अमानवियता से,
निर्भया-----
कुछ ही दिनो मे मर गई,
लेकिन तुम नही मरें, 

क्योंकि अगर तुम मरे होते, 
तो कतई नही, 
चीखती और तड़पती 
हाथरस में,
एक नई मासूम निर्भया. 

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

यह रचना मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है।

Tuesday, 27 September 2022

(पत्थर न हो सका)
ता उमर रहा बाहर
कभी अन्दर न हो सका।
कुछ प्यास ऐसी थी कि-
मै समन्दर न हो सका।
ऐ रंग,-
कुछ ऐसी मासुमीयत थी मेरी
कि मै कभी पत्थर न हो सका।
(हर शख्स़ अकेला है)
बड़ा हूज़ुम,बड़ा रेला है------
ये हर शहर का मेला है।
सभी लौट जायेगे दफ्ऩ कर मईयत,,,,,,,,,
ऐ,रंग----बारी-बारी यहाँ-----
हर शख्स़ अकेला है।
(सलमान खान की होंठ का धुँआ है )

जावेद अख्तर पहचानों, 
ये तुम्हारी------
जोया अख्तर के होंठ का धुँआ है. 

जया बच्चन पहचानो, 
ये दीपिका पादुकोण के 
जे. एन. यू में गईं गलीज़ 
और--------
काफिर होंठ का धुँआ है. 

नसीरुद्दीन, आमीर 
तुम्हें डर लगता है तो डरो, 
क्योंकि ये फुटपाथ पर सोये, 
तमाम मुफलिशो के कातिल----
सलमान खान की होंठ का धुँआ है. 

@@@ रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियापुर
जिला जौनपुर, उत्तर प्रदेश, 
मोबाइल नंबर 7800 824 758

Monday, 26 September 2022

(अज़नबी के साथ हूँ)
बिस्तर की सिलवटे---------
बिल्कुल खामोश है मेरी तरह।
वे जानती है कि मै-------
बस कहने को खाबिंद के साथ हूँ,,,,,,,,,
वरना ऐ,रंग----ये स्याह सच है---
कि मै एक बंद कमरे मे------
अज़नबी के साथ हूँ।

खाबिंद----पती।

Sunday, 25 September 2022

(अज़नबी के साथ हूँ)
बिस्तर की सिलवटे---------
बिल्कुल खामोश है मेरी तरह।
वे जानती है कि मै-------
बस कहने को खाबिंद के साथ हूँ,,,,,,,,,
वरना ऐ,रंग----ये स्याह सच है---
कि मै एक बंद कमरे मे------
अज़नबी के साथ हूँ।

खाबिंद----पती।
किसान, जिसकी लाश आज भी उसके उम्मीदों के खेत के किनारे बीना कफ़न के पड़ी है 😭😭
(जूड़े का गुलाब)
अब भी रखा है, हमने
अपने कमरे मे -
उनके जूड़े का गुलाब।
वही खुशबू, वही सुगन्ध, वही चाहत
ऐ रंग,-हमसे गुफ्तगू करता है-
उनके जूड़े का गुलाब।

Friday, 23 September 2022

(चाँद )
अच्छा है चाँद------------
कि तु अभी तलक किसी के कब्ज़े मे नही,
वरना तेरा भी किसी रईस से---------
ये शाम तलक सौदा कर देते,
तु भी तड़पता किसी कमरे से सारी रात,
तुझे पिंजरे में कैद--------------
ये परिंदा कर देते।
फिर गरीब और मज़लूम-----------
कैसे तकता तुम्हे अपने खाली पेट,
कैसे कोई माँ सुलाती----------
अपने भूखे बच्चे को ये धोखा दे,
कि बेटा वे देखो---------
तवे पे भगवान पका रहे है,
तुम्हारे लिये एक गोल सी रोटी,
सो जाओ!
चाँद तुम एक उम्मीद हो गर इनके हाथ
लग जाते---------
तो ये तुम्हे किसी रईस के आँगन तक का
एक ब्याज़ के कर्ज़ से बिंधा--------
न भर पाने वाला कारिंदा कर देते।

Thursday, 22 September 2022

(रेगमाल सी जिंदगी)
कौन नही बुनता-----------
जुलाहे के कालीन सी जिंदगी!
तरह-तरह के धागे में पिरो,
कौन नही देखना चाहता मुकम्मल अपना शाहकार,
पर हो नही पाता ज्यो का त्यो चाहा,
फंस के खत्म हो जाती है मछली सी----
किसी मछेरे के जाल सी जिंदगी।
सारी ख्व़ाहिशे धरी रह जाती है,
एक-एक कर खत्म होती जाती है,
एै रंग------------------
यहां पे सबकी है रेगमाल सी जिंदगी।
(जवां कातिल फरेब है)
वे इतनी खूबसुरत है कि--------
हर एक दिले कत्ल पे मूस्कुराती है।
ऐ,रंग----वे औरत नही-------
एक जवां कातिल फरेब़ है।
(khajuraho ke patthar)
bnaya hai ek klakar ne tap kar ,
kamuk nhi uski murtiya kewl ,
ek jaadu hai "rang" 
wrna hme apni trf bulaate hai,
khajuraho ke patthar.
(pyaasa ke guru dtt sa)
mai pdh ke bahut jaar-jaar roya,
ve uska aakhiri khat tha,
ae"rang" isk me ; mai bhi mra,
"pyaasa" ke guru dtt sa.
दीपिका पादुकोण के ड्रग्स मसले में फसने पर---

( दीपिका एक दिलरुबा सिगरेट है)

दीपिका------
तेरे आवारा होंठ की 
ये जुंबिश
ये कश, ये धुँआ, ये नशा 
और उसकी कशिश 
तेरी आँखों में उत्तर आना, 

उफ ! वाकई----
तु एक लाजवाब हीरोइन है, 
तुम्हें पाने और देखने की ये बेचैनी, 
ये चाहत, 
किसी ड्रग्स से कम नही, 

तु इतने इल्जामों के बाद भी, 
एक-----
दिलरुबा सिगरेट है. 

रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर
जौनपुर

Tuesday, 20 September 2022

(Bewa ki jmin)
hai bda muskil siyast pe ykin,
ye aise sanp hai , jin pe kar aamd,
nhi koi bin ,
ae "Rang" ye din me kat,te hai chek ,
aur raato ko hdpte hai ,
bewa ki jmin.
(Gulshan nanda ke kitab se)
jo ldki- kbhi lgti thi nalnda ke kitab si,
pyar paake wohi ldki -
ae"Rang" lgne lgi ,
Gulshan nanda ke kitab si.
(टुटी हुई गुड़िया)
गौर से देखती है,वे अक्सर बंद कमरे मे--
ऐ,रंग-------
वे टुटा हुआ गुड्डा और टुटी हुई गुड़िया।
( दो घाव हो गए)

जीन उरोजों को ढ़क, 
वे मासूम देखती थी, 
कभी वात्सल्य का सपना, 
 ए "रंग"-------

उसके वही दोनों उरोज, 
गरीबी के चलते, 
दो घाव हो गए. 

@@@ रंगनाथ द्विवेदी, 
जट कॉलोनी, मियापुर
जौनपुर उत्तर प्रदेश
मोबाइल नंबर--7800824758
(बुढ़े पिता का कंपकपाता हाथ)
कल शहीद की चीता जला रहा बाप---
रो रहा था!
तभी किसी ने कंधे पे रंखा हाथ,
तो वे चीख पड़ा-----------
कि रहने दो कंधे पे मत रंखो,
इस देश के ये नपुंसक हाथ!
जरुरत नही,
इतनी ही सहानुभूति है मेरे शहीद बेटे से,
तो कहो देश की सियासत से,
कि ला दे-------------
उस हाफिज़ सईद का कटा हाथ,
नही ला सकता ना जानता हूं,
इसी जगह फिर सजेगी,
कुछ फौजी बजायेंगे मातमी धुन,
और अपने शहीद बेटे की चीता को,
आग देगा--------------
किसी बुढ़े पिता का कंपकपाता हाथ।

@@@उरी के तमाम शहीदो को मेरा सलाम।

Monday, 19 September 2022

( बंजारन )

मेरी जिंदगी में आई थी कभी, 
एक खानाबदोश बंजारन.

उसकी कत्थई आंखों को याद कर, 
मैं लिखता गया, लिखता गया
ना जाने कब, 
एक मुकम्मल किताब बन गई, 
ए रंग-------
वे खानाबदोश बंजारन. 

@@@ रंगनाथ द्विवेदी 
 जिला जौनपुर, मोबाइल नंबर 7800824758
(Apne daur ka galib hu)
mai chdha nhi kbhi masjid ki sidhiya,
thi kafir-a-lt hme chhk ke pine ki ,
gr salike se likhu "Rang"
to mai apne daur ka galib hu.
(Apne daur ka galib hu)
mai chdha nhi kbhi masjid ki sidhiya,
thi kafir-a-lt hme chhk ke pine ki ,
gr salike se likhu "Rang"
to mai apne daur ka galib hu.

Sunday, 18 September 2022

(बे-नकाब हुई हूँ)
आओ मुझे लेने-------
ओ मेरी मौत के शौहर,,,,,,,,,,,,
तेरी खातिर मै-------
फिर बे-नकाब हुई हूँ।

Saturday, 17 September 2022

(अच्छे दिन आ गये)

चचा---
साठ की उम्र में
तीस वाली को पटा गये,,,

ए "रंग"
नौजवानो से कही ज्यादा,
तो बुज़ूर्गो के-----
अच्छे दिन आ गये।
(माँ की चुपड़ी हुई रोटी)
मै बच्चो के लंच मे---------
देखता हूँ टीफीन अक्सर,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग---इस उम्मीद मे---------
कि शायद किसी बच्चे के टीफीन से,,,,,,,,
माँ की चुपड़ी हुई रोटी निकल आये।
(taj ka patthar)
gaur se dekho siskta hai,
             taj ka patthar.
dard ki had hoti hai, chitkta hai,
             taj ka patthar.
shahanshahe hind pe, ek katl hai aayd,
               tbhi to kbra pe bnke aanshu ,
       ae "rang" tpkta hai ,
        taj ka patthar.
(तवायफ़ की कब्र है)

यहाँ चराग नही जलते,
कोई चादर नही चढ़ती!
ये शहर की मशह़ूर तवायफ़ की कब्र है.

आज भी करती है,ये रुहें मूज़रा,
फिर फूट के रोती है.

ऐ,रंग---
बस आ जाते है खिज़ा में,
दरख्त़ो के चंद पत्ते------
आवारगी करने।
ये शहर की मशह़ूर तवायफ़ की कब्र है. 

@@@ रंगनाथ द्विवेदी 
जज कालोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर (U P)
Mo. no. 7800824758
(अच्छे दिन आ गये)

चचा---
साठ की उम्र में
तीस वाली को पटा गये,,,

ए "रंग"
नौजवानो से कही ज्यादा,
तो बुज़ूर्गो के-----
अच्छे दिन आ गये।

Thursday, 15 September 2022

(chupke se bchpna)
tera alhadpan,chidiyo sa fudakna,
ye kya?
jhuki nazar , angudhe se mitti kurchna
ae "rang" nikl gya kitne chupke se bchpna.
(नील-कमल)
तड़पता है,सिसकता है,बुलाता है कोई नील-कमल-----
सदियो चुनी दिवाल से,गाता है कोई नील-कमल।
एै "रंग" किसी यूग में------------
कोई पाता है कहाँ नील-कमल।
(parindo ka ghar)
masini ho gya shahari basindo ka ghar,
nikl aata hu , kafi dur mai tnha ,
aur dekhta hu "rang" bnte parindo ka ghar.