Thursday, 6 December 2018

उत्तर-रेलवे

( उत्तर-रेलवे )
उत्तर-रेलवे----------
के एक मुसाफ़िर खाने मे बैठी,
एक चौबीस-पच्चीस साला पगली,
अपने गंदे बाल खुजला रही थी,
मैने देखा---------
उसके आसपास आठ-नौ आवारा बद्चलन,
पुरुष खड़े--------
अश्लील फब्तियां कस रहे थे,
वे इस सबसे बेखबर-----
अपने गंदे बाल खुजलाये जा रही थी,
तो अचानक मेरी नजर भी,
उनका अनुसरण कर,
पगली की गदराई हुई देहयष्टि से चिपक सी गई.
फिर वे सभी मेरी तरफ मुड़े--------
और खिलखिला के हँस पड़े.
मै झेपा---------
और सोचने लगा कि क्या ?
मेरा चरित्र भी अब गिरने लगा है,
शायद नही,
अगर ये सच है तो फिर.
न जाने कल आने वाली पीढ़ी का---
चरित्र क्या होगा.

@@@रचयिता---रंगनाथ द्वीवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर pin no.222002 (उत्तर-प्रदेश)

Mo.no.7800824758

यह कविता मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

इंतज़ार करके रोई

(इंतजार करके रोयी)
खुद को बाँहो मे भर के रोयी,
वे तवायफ थी-
हर रात सजके रोयी।
थिरके पाँव,टुटे घुघरू
ऐ रंग-
वे कितना इंतजार करके रोयी।

जनेऊधारी पंण्डित का एग्जिट पोल

(ग्रहों पे किया गया एक अनुमानित एग्जिट पोल)
आईये सुनिये---------
इस जनेऊधारी पंडित का,
ग्रहों पे किया गया-------
एक अनुमानित एग्जिट पोल.
ग्रह-गोत्रोंं की दशा भी नही रही----
कही से काग्रेंस के पक्ष मे बोल.
राहू और शनि की साढ़े साती लग रही,
उनकी जीत की कुंडली मे जैसे,
कोई बड़ी डायन-------
हँस रही अपने मुँह खोल.
आईये सुनिये-------
इस जनेऊधारी पंडित का,
ग्रहों पे किया गया------
एक अनुमानित एग्जिट पोल.
सत्तासुख के सारे ग्रहो मे,
एक महा उथल-पुथल,
एक दावानल सा महा-अँधियारा,
स्पष्ट दिख रहा,
मै इसे चुनावी भोजपत्र पे लिख तो रहा हूं,
बड़े तनाव में हैं मेरे जनेऊ,
लेकिन निरुपाय-असहाय,
शायद एक बार फिर हताश हो काग्रेंस,
ये स्पष्ट कह रहा,
इस जनेऊधारी पंडित का,
ग्रहो पे किया गया------
एक अनुमानित एग्जिट पोल.

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर pin no.222002 (उत्तर-प्रदेश)
Mo.no.7800824758

यह कविता मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

Wednesday, 5 December 2018

ये रात गुजरने दो

(ये रात गुजरने दो)
तुम संभलो मुझे गिरने दो-----------
मुझे शराबी लत है,कुछ गहरे उतरने दो।
तुम बधे हो,बधे रहो----------
अपने वक्ते नमाज़ और पूजा से!
मेरे रास्ते मे मंदिर-मस्जिद नही मैकदा पड़ता है,
हाथ धोने दो और मुझे शराब से वजू़ करने दो।
ये महज बोतल नहीं गंगा का पानी आबे जमजम है,
ये हमारी शरिकेहयात़ बीबी का बदन है,
तुम दुर रहो हम काफ़िरो से
और नशे में हम इश्क़े शौहरो की,
एै,रंग-------ये रात गुजरने दो।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

तस्वीर बनती रही

(तस्वीर बनती रही )
मै रोता रहा---------
मेरे आँसुओं से भी तेरी तस्वीर बनती रही.
जलती रही शमां,
लड़खड़ा-लड़खड़ा के रात भर,
मै करवटो को तड़पा-------
और तु मेरी हीर बनती रही.
तेरी यादे थी जो बहला देती थी कुछ पल,
वरना मै ऊब गया था इस शहर से,
खिड़कियां खुली रहने दी हमने,
कि शायद कही से,
लाये हवा तेरा संदेशा,
पर हाय री! बेबसी,
कुछ बनने की,
कि तुमसे दूर रहके-----
मेरी तकदीर बनती रही.
मै रोता रहा---------
मेरी आँसुओं से भी तेरी तस्वीर बनती रही.

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेद्वी.
जज कालोनी, मियाँपुर
जिला--जौनपुर pin no.222002 (उत्तर-प्रदेश)
Mo.no.7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

घूँघरु बांधती थी

(घूँघरु बांधती थी)
रईसो के दरमियाँ वे सलिके से आती थी,
कभी ठुमरी,कभी दादरा गाती थी।
ऐ,रंग-----------
वे पाक थी कोठे पे सुना है,
कि वे केवल पाँव मे घूँघरु बांधती थी।

Sunday, 2 December 2018

मधुशाला

(मधुशाला)
मेरे रूबरू खडी हुई है
बच्चन सर की मधुशाला।
रह-रह के अधर मेरे कांप रहे
नैनो मे जले मीठी ज्वाला
ऐ रंग-
जीवन ब्यर्थ चला जायेगा
गर जप न सका मै ये माला।
मेरे रूबरू खडी हुई है
बच्चन सर की मधुशाला।

पोलियो ग्रस्त लड़की

विश्व दिव्यांग दिवस पे लिखी कविता---------
        
             (पोलियो ग्रस्त लड़की )
वे लंगड़ी--------
पोलियो ग्रस्त लड़की,
तुम्हारी कुछ नही शायद,
पर मेरी बहुत कुछ है,
वे फूल है, कविता है मेरी
उसे छूता हूं, प्यार देता हूं
भावनाओं के कोरे कागज़ पे,
मेरे कही कोई रुपसी नही,
वही है----------
जिसे मै हुबहू उतार देता हूं.
कहा-अनकहा कुछ नही है तो बस,
उसकी मजबूरियों से नहाई आँखे,
मै उसके आँसुओं को------
शबनमी बूँदों की तरह पीता हूं,
उसे मै--------
अपना पहला और आखिरी,
प्यार देता हूँ.
मै अपने अंदर के कवि को उसपे---
और उसकी भावनाओं पे वार देता हूँ.

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर
जिला--जौनपुर पिन नं.222002 (उत्तर-प्रदेश).
Mo.no.---7800824758.

यह कविता मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

बातुनी लड़की

(बातुनी लड़की)
मुस्लिम हो गई-----------
मुझ ब्राह्मण के गोद की वे बातुनी लड़की।
एक वालिद सा मेरा ख़याल रखती थी,
आज आई तो----------
पर दहलीज़ पे कुछ पल रुक,
फिर अपनी आँख में आँसू लिये लौट गई,
शायद वे समझ गई---------
कि अब वे पहले की तरह गले से नही लग सकती,
क्योंकि मुस्लिम हो गई समय के साथ--------
मुझ ब्राह्मण वालिद की वे बातुनी लड़की।
सर से पाँव  तलक--------
बुरके से ढकी मुझे न जाने क्यू ,
आज एक मज़हब की कैद मे लगी एै "रंग"---
इस वालिदे ब्राह्मण की वे बातुनी लड़की।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

मासुम लड़की

(मासुम लड़की)
तुम जीसे कहते हो गुँगी------
वे अक्सर मेरी गज़लो मे ढ़लती है,
वे थिरकती है------
जब पाँवो में बाँध के घूँघरु,
तो कितना बोलती है,
ऐ,रंग----वे गुँगी नही-------
एक मासुम लड़की है।

विश्व विकलांग दिवस पे।