Wednesday, 31 January 2024

(हाथी की सवारी पा गए)

(हाथी की सवारी पा गये)
जब बसपा से टिकट अंसारी पा गये,
तो लगा जैसे कि शराफत का पद्मश्री------
इतने बड़े प्रदेश में बलात्कारी पा गये!
नीत-नियत बस कहने को रह गया,
एै"रंग" इस चुनाव में,
तभी तो सपा की साइकिल से उतरे-------
तो बहन जी के हाथी की सवारी पा गये।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

धन्यवाद!आज के दैनिक वर्तमान अंकुर का,निर्मेश के त्यागी भईया का और आज फिर एक चुनावी टिश लिये हुये मेरे लिखे चुनावी कटाक्ष का।

(मोहब्बत की कोई हद न थी)

(मोहब्बत की कोई हद न थी)
मोहब्बत की,कोई हद न थी,
सब कुछ था,कोई सरहद न थी।
उड़ता था दिले परिंदा दुर तक,
ऐ,रंग-
नियत किसी की बद न थी।

(बसंत)

(सारे बसंत मै सजु)
बीसो बसंत मै सजी---------
पोर-पोर गदराई खुद को देख-देख,
बीसो बसंत मै सजी।
कोयल हुई बाँवरी-------
बागो में कूक-कूक कर,
भँवरा हुआ पागल महुये को चुमकर,
मेरे अधर कुँवारे,
मै कुँवारी अंग-अंग--------
बीसो बसंत मै सजी।
यौवन कलश छलके बूँद-बूँद कर,
आँखे हुई बाँवरी,
मेरी पिया दरस को,
हे!बसंत सखी अब तुम-----
कोई एैसी बान मारो कि आये बाबुल के गाँव,
मेरे पिया की डोली,
और मै बैठ चलु उसमे अपने पिया के गाँव,
बीसो बसंत मै सजी।
वे घूँघट उलट के देखे मै शर्म से गडु,
और उनके छुवन की सिहरन,
से कांपे अधर मेरे,
और उस कंपकपी की रात को,
अपना कौमार्य सौप उनको,
फिर अपने प्यार और उनके प्रित की-----
सारे बसंत मै सजु।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-------7800824758

मादक बसंत।

Tuesday, 30 January 2024

(दर्द के हरम में है)

(दर्द के हरम मे है)
नहाने दे-
गीरने दे,ये अश्क़े गुलाब जल,
बढ़ेगी इससे तड़प की खूश़बु।
ऐ,रंग-
जानता है,उसकी याद अब भी,
मेरी दर्द के हरम मे है।

(रोटी गाती रही)

(रोटी गाती रही)
भूखी माँ सुबह तलक---------
भूख से बिल-बिलाती बेटी के लिये,
लोरी गाती रही।
पडोसियों ने कहा बेटी मर गई,
ऐ,रंग----वे इस सबसे बे-खबर-----
कहके चाँद को रोटी गाती रही।

Monday, 29 January 2024

(होंठो की कैद में है)

(होंठो की कैद मे है)
उसने पेंच दर पेंच पहना दी हथकड़ी हमको,
हम अब उनकी मस्त सी जूल्फों की कैद मे है।
जी भी नही करता कि वे रिहा कर दे,
डाल दे कोठरी मे वे सज़ा दे----------
हम तो उनकी आँखो की कैद मे है।
ये सुखन-ऐ-किस्मत है मेरी---------
कि मेरा ये बदन उनकी बाँहो की कैद मे है।
मेरी प्यासे तड़प बुझ जाती है रोज,
क्योंकि इंतजार के सहरा के उस तरफ़,
वे पिलाती है हमें झील का पानी,
जो केवल उसकी---------
दो खूबसूरत सी होंठो की कैद मे है।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

(मेरे जुड़े में गुलाब)

(मेरे जुड़े मे गुलाब)
मै आज भी----------
पहले छुवन सी सिहर उठती हूं!
जब आप टांकते हो मेरे जुड़े मे गुलाब।
सच मेरी इस खुशकिस्मती का अंदाज़ा,
शायद आप न करते हो,
पर मै अपनी शर्मिली आँख मुँदे,
जुड़े मे लगाते हुये इस गुलाब के फूल सी,
आपको अपने पुरे बदन पे महसुस करती हूं!
ये रोमानियत ही---------
हमारे और आपके प्यार के बीच,
कि वे घूँघट है----------
जिसे मै आधे निकले हुये चाँद की तरह,
अपने चेहरे पे डाले रखना चाहती हूं,
और नहाना चाहती हू----------
आपके मेरे जुड़े में लगाये हुये या टांके हुये,
इस गुलाब की तरह हर मौसम,
कि उस गुलाबी बूँद से,
जिससे निखर के खिलती है ये गुलाब------
और इस गुलाब की एक-एक पंखुड़ी।
बस यही इच्छा है कि-----------
मुझे एैसे ही चाहना ता-उम्र,
और एैसे ही टांकना मेरे जुड़े में गुलाब।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर-------उत्तर-प्रदेश।
mo.no.--------7800824758

(पुरानी कासगंज हूं)

कासगंज के दंगे का एक टिसता दर्द--------------
                     (पुरानी कासगंज हूँ)
मुझे तो सियासत ने जला दिया मेरे बेटो,
ठहरो------------
मै तुम्हारी माँ ,मौसी ,खाला और
वही पुरानी कासगंज हूँ।
मैने अपनी इन आँखो से ईद और होली देखि है,
लेकिन आज चौराहे पे खुशी नही,
बल्कि अपनो की लाश देख दंग हूँ-------
मै वही पुरानी कासगंज हूँ।
मुझे मेरी खुशी लौटा दो,
फेक दो ये असलहे,ये खंजर
खत्म हो जाये शहर और गली का ये सहमापन,
देखो मेरी सिहरन,
और नोच-खसोट के निशान,
मुझे भीख मे दे दो,
और लौटा दो मेरे बेटो मेरी खुशी,
क्योंकि मै सियासत नही----------
तुम्हारी वही वर्षो पुरानी कासगंज हूँ।
मुझे तो सियासत ने जला दिया मेरे बेटो,
ठहरो,
मै तुम्हारी माँ,मौसी,खाला---------
वही पुरानी कासगंज हूँ।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी,
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

(जोक)

फरवरी में किसी वाह्य स्त्री के फ्रेंड रिक्वेस्ट को स्वीकार ना करने का स्पष्ट मतलब हैं की आपके दिल का ♥️ प्लेटलेट काफी गिर गया हैं💘अतः समय रहते💘 आप आई लव यू जैसे अंग्रेजी शब्द का मंत्रोच्चार करे

Saturday, 27 January 2024

सोच रहा हूं
कि तुम फिर पहले की तरह मायके जाओ
और मैं तुम्हे लिफाफे में प्रेम पत्र भेजू,

(यूनानी दवा है)

(यूनानी दवा है)
अदब वे औरत है--------
जो सदियों और सालो से जवां है,
क्योकि ऐ,रंग--------ईश्क़,
इस औरत की यूनानी दवा है।

(रूप का आचमन करना)

(रुप का आचमन करना)
मै इस ज़मी पे--------------
किसी देवता के प्याले से छलक आई हूँ!
एै"रंग" जरा संभल के-------------
मेरी रुप का आचमन करना।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

(तवायफ की कब्र है)

(तवायफ की कब्र है)
  यहाँ चराग नही जलते,
  कोई चादर नही चढ़ती-
  ये शहर की मशहूर-तवायफ की कब्र है।
  आज भी करती है,ये रुहे मूज़रा-
  फिर फुट के रोती है।
ऐ,रंग-बस आ जाते है-
खिज़ा मे दरख्तो के चंद पत्ते-
आवारगी करने।
ये शहर के मशहूर,तवायफ की कब्र है।

खिज़ा-पतझड़
दरख्त़-वृक्ष।

Thursday, 25 January 2024

(छब्बीस जनवरी)

(26 जनवरी)
एक माँ-----------
अपने दुध-मुँहे बच्चे का पेट भरने के लिये,
लुट के आई है अस्त-व्यस्त,
पुरी रात इसकी बदन पे,
बेरहमी से इसके ग्राहक ने लिखा है,
अपने हवस के जंगली नाखूनो से-----
26 जनवरी।
वे देखो फिर रहा युवा--------
अपनी डिग्रीयो की लाश लिये कांधे पे,
माँ बहन की आबरु चंद चिथड़ो मे लिपटी है,
बाप टी.बी. से खाँस रहा,
कहाँ है इसका वंदे-मातरम कहाँ है इसकी--
26 जनवरी।
देश के रहनुमा वे है,
जिन्हें मादरे तमीज़ तक नही,
वे देखो फहरा के लौटे है तिरंगा,
और उसी जश्न मे खुली शराब की बोतल,
बगल सोफे पे गिरी गाँधी टोपी,
अस्त-व्यस्त खद्दर की धोती,
सच मे एै"रंग" देखो इस देश मे,
इस तरह से भी मनाई जाति है----
26 जनवरी।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

दिल्ली से प्रकाशित नेशनल ऐक्सप्रेस में मेरी कविता"छब्बीस जनवरी"को स्थान देने के लिये संपादक को मेरा हृदय से आभार।

(फांसी पर झूल गए)

(फाँसी पे झूल गये)
आजादी मिलते ही हम जिनको भूल गये,
ऐ,रंग----वे आजादी की खातिर,
विजयी विश्व़ तिरंगा गाके------
फाँसी पे झूल गये।

(पेट में ही कत्ल हुआ)

(पेट मे ही कत्ल हुआ)
     तमाम तालिमे बौनी हो गयी,
     हमारे अंदर-
     हैवानियत का दख्ल़ हुआ।
     ऐ,रंग-माँ-बाप शरिक हुये,
    और यु एक बेटी का-
      पेट मे ही कत्ल हुआ।

Wednesday, 24 January 2024

(मुल्क जिंदाबाद)

(मुल्क जिंदाबाद)

आने वाली सदियाँ करेंगी उसको याद,
उसने खून के कतरे से लिखा---
मुल्क जिंदाबाद.

ए हुश्ऩ आज इतनी 
कागज पे जगह छोड़,
लिखने दे हमे----
उसके कनपटी की आखिरी गोली, 
और मुल्क जिंदाबाद. 

चंद्रशेखर आजाद. 

इंकलाब जिंदाबाद.🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳

Monday, 22 January 2024

(मुल्क की याद आती हैं)

(मुल्क की याद आती है)
इस गैरे मुल्क में-----------------
बड़ी शिद्दत से मुझे अपने मुल्क की याद आती है।
खोल देता हूं खिड़कियाँ,
और घंटो टहलता हूं कमरे मे-------
जब रात आती है!
अपने मुल्क की याद आती है।
तकता हूं चाँद तो बीबी का चेहरा नुमाया होता है,
याद फिर उसकी हर बात आती है!
अपने मुल्क की याद आती है।
तारे जैसे हो मेरे मासूम बेटे,
उन तारो से गुफ्तगू करता हूं,
लेकिन उन्हे जब प्यार करने को बढ़ाता हूं हाथ,
तो बस खाली हाथ रहता है,
मेरे हिस्से यही इतनी सी सौगात आती है!
अपने मुल्क की याद आती है।
फिर खिड़की से---------------
अंदर आती है एक झीनी सी रौशनी,
जैसे मेरे अब्बु की दुआ!
फिर हवा की एक ठंडी छुवन मे अम्मी की मोहब्बत,
उफ!ये रोटी,ये दोज़ख की बेबसी
कि सहर होने तलक-------------
अपने घर के हर शख्स की जरुरत,
और बहन के निकाह की-----------
याद बस इमदाद आती है!
इस गैरे मुल्क मे------------
बड़ी शिद्दत से मुझे अपने मुल्क की याद आती है।
## # मुल्क से बाहर कमा रहे एक शख्स के अंतरमन की व्यथा।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

(26 जनवरी है)

(26 जनवरी है)
कीटनाशक पी के-----------
अभी ख़ुदकुशी किये किसान की लाश,
उसके खेत की मेड़ पे पड़ी है-----------
सुना है आज 26 जनवरी है।
एकटक तके जा रही उसकी बिटिया,
अपने बापु की लाश को,
क्या करे बेचारी रो भी तो नही सकती,
अपने भाई और बहनो मे सबसे बड़ी है,
तभी वे अपने जवान सिने से दुपट्टा उतार,
ढ़कती है अपने बापु की लाश,
उसकी पैबन्द लगी सलवार का यू नंगा होना,
साबित करता है कि----------
अभी बहुतो से दुर इस देश मे 26 जनवरी है।
बस कुछ देश लुटने वाले घंटो बोलेंगे भाषण देंगे,
इशारो पे तालियाँ बजाई जायेगी,
इन्ही के अगल- बगल किमती सोफे होगे,
पांव तले मसलने को दरी होगी,
शायद एै "रंग" इतने ही लोगो तलक पहुँची-----
हमारे इस देश की 26 जनवरी है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

(पद्दमावत क्यों है)

अभी-अभी पद्ममावत फिल्म पे आये सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पे मेरी भावाभिव्यक्ति,सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का संम्मान करता हूं।
मेरी इस रचना का ध्येय किसी जाति विशेष को आहत करना नही है,अगर एैसा भुल वस होता भी है तो आप हमे अपना छोटा अनुज समझ क्षमा करे।
                  (जोधा-अकबर और पद्ममावत क्यू है?)
बता एै सिनेमा------------------
आखिर तुम्हें हमारी इतिहास से,
इतनी अदावत क्यू है?
तेरे दामन मे----------
जोधा-अकबर और पद्ममावत क्यू है? ।
सवाल है मेरा तुझसे,
कि सिनेमा के वे सेंटीमेंटल सीन और अंतरंगता,
कोई मनोरंजन नही,
ये इतिहास की पद्ममिनी का,
सीने से खिचा आँचल है,
हद तो ये है कि,
इतने टुच्चे सिनेमाकारो के साथ आखिर----
हमारे यहाँ की अदालत क्यू है? ।
ठीक है माना कि,
पद्ममावत जायसी की है,
लेकिन एक तरफ "लव माई बुरका" पे रोक,
लगाने वाली अदालत बता,
कि पद्ममावती हर सिनेमाघर मे लगे,
आखिर ये तेरी--------
दोमुँही इजाज़त क्यू है? ।
तेरे दामन मे---------
जोधा-अकबर और पद्ममावत क्यू है? ।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

(अशफाक लिखा है)

(अशफ़ाक लिखा है)

हमने गीता और कुरआन से भी ज्यादा,
ऐ मादरे वतन-----------
तेरी मिट्टी को पाक लिखा है.

जो जला है उसे राम प्रसाद बिस्मिल,
और जो दफ़न है-------
उसको अशफ़ाक लिखा है.

(जोक)

जब कोई सर्विस करने वाला पति
अपनी पत्नी के पांव की अंगुली में 
इस तरह से 
"नेल पॉलिश" लगाता हुआ दिखाई पड़े
तो आप स्पष्ट समझ जाइए
कि आज सेकेंड सटरडे है 🧘🧘😀😀

♥️♥️♥️🥸🥸🥸🥸

रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियापुर
जौनपुर 222002 (U P)
mo.no.7800824758
rangnathdubey90@gmail.com

(वंदे मातरम)

(वंदे मातरम गाये)
शहीद की लाश को जब गाँव दफनाये,
तो वंदे मातरम गाये।
ना बीबी तोड़े चुड़ी,ना आँसू बहाये--
माँ भी हँसती हुई सबके सामने आये,
ऐ,रंग--इस शहीद की है आखिरी इच्छा,
सरहद पे मेरा बेटा भी-------
होके लहू-लुहान वंदे मातरम गाये।

(जोक)

✍️आज के तिल शास्त्र के अनुसार जिन खूबसूरत औरतों के होठों के पास तिल हैं,वे औरते अपने पति को आज शाम तक प्रसन्न रखे क्योंकि उन्हें अपने पति से आज♥️"बनारसी साड़ी मिलने का योग बन रहा हैं."😀

(जोक)

✍️✍️ सीबी सीआईडी जांच के तहत दूसरे के फेसबुक पर सर्वाधिक टैग करने वाली महिला या पुरुष को आतंकी गतिविधि के तहत सजा दी जाए क्योंकि यह सभी हमारी फेसबुक की सभ्यता के 😀😀बांग्लादेशी नागरिक की तरह है 🤠🤠

Sunday, 21 January 2024

(आतंकवाद)

(आतंकवाद और बेगुनाह लाशे)
मै मासुमो की लाशो पे मरसिया लिख रहा हूँ,
अभी कल बीता है लम्हे चेहल्लुम,
सीना फट गया हिन्दु का,कलम सदमे में है।
रोजा,नमाज,जकात,खैरात,हज़------
सब हराम है ऐ आतंकी मुसलमानो,,,,
आखिर तुम्ही बताओ इस,रंग को-------
आखिर मज़हब के नाम पे इतना कत्ल,
कुर्आन की किस आयत या पन्ने मे है।

@बेगुनाह लाशो को मुझ हकिर से शख्स़ का एक आँसु-ए-मरसिया।
मरसिया------शोकगीत।

Saturday, 20 January 2024

(अदब की लाश देखी है)

(अदब की लाश देखी है)
तु शौक से शामिल हो,रईसो के उर्स में,
हमने कई दिन से भूखि-
ऐ,रंग-शहर मे,
अदब की लाश देखी है।

अदब-साहित्य।

(आइनो पर गीत लिखे)

(आईनो पे गीत लिखे)
हमने टुटे हुये ख्व़ाबो पे गीत लिखे,
सारी रात तड़पे हुये चिरागो पे गीत लिखे।
लोग कहते रहे कि-------
उसके घर का आईना खुबसुरत है,
ऐ,रंग---हमने उसी के हाथो टुटे हुये,
कई आईनो पे गीत लिखे।

(रेपिस्ट विधायक)

(रेपिस्ट विधायक )

रेपिस्ट----
विधायक को टिकट मिलते ही,
ए "रंग"
हमारे शहर की एक 'द्रोपदी',
अपने पुराने जिस्मानी---
घावों पे रो उठी 😭😭😭😭

Friday, 19 January 2024

(पेट पढ़ना है)

(पेट पढ़ना है)
अखबारे पढ़ के सो गया है शहर,
ऐ,रंग---------
हमें तो अँधेरी रात मे,
किसी वेश्या का----------
पिचका हुआ पेट पढ़ना है।

Thursday, 18 January 2024

(पुराना खत)

(पुराना खत)
बड़ा संभाल के रंखा है,
तेरी याद की दराज़ में------
हमने पुराना ख़त।
तु बिछड़ी,जुदा हुई हमसे,
फिर भी ये शकु था कि,हमसे ना मांगा--
तुमने पुराना ख़त।
है ये ख्व़ाहिश कि गर----
आखिरी हिंचकी भी आये,
तो मेरी तकिये के नीचे से----
निकले पुराना ख़त।
ऐ,रंग----वे लाश-ए-दफ्ऩ पे भी,
नही आयेगी,
उसे उसकी मजबुरियाँ रोकेंगी,
पर गम नही,
बस मेरे कब्र-ए-सिरहाने कोई चराग नही,
जलाना पुराना ख़त।

(जोक)

✍️✍️ जो लड़का आपके घर में सर्वाधिक झूठ बोले,,उसका मुंह बीच-बीच में मीठा कराते रहे,,क्योंकि वह भविष्य में विधायक या मंत्री हो सकता है🤠🤠

Tuesday, 16 January 2024

(आवारा लत है)

(आवारा लत है)
तड़प-तड़प के,---------
मर जाऊँगा बेशक मै,,
पर नही छोड़ पाऊँगा तुझको------
तु मेरी आवारा लत है।

(चुड़िहार हो जाऊं)

(चुडिहार हो जाऊँ)
तेरी चाहत में-
सारी हदो से पार हो जाऊँ।
तुम्हे देखने की खातिर,टहलु तेरी गली,
बेशक ऐ,रंग मै-
ब्राह्मन से चुडिहार हो जाऊँ।

(पुराना खत)

(पुराना खत)
बड़ा संभाल के रंखा है,
तेरी याद की दराज़ में------
हमने पुराना ख़त।
तु बिछड़ी,जुदा हुई हमसे,
फिर भी ये शकु था कि,हमसे ना मांगा--
तुमने पुराना ख़त।
है ये ख्व़ाहिश कि गर----
आखिरी हिंचकी भी आये,
तो मेरी तकिये के नीचे से----
निकले पुराना ख़त।
ऐ,रंग----वे लाश-ए-दफ्ऩ पे भी,
नही आयेगी,
उसे उसकी मजबुरियाँ रोकेंगी,
पर गम नही,
बस मेरे कब्र-ए-सिरहाने कोई चराग नही,
जलाना पुराना ख़त।

Sunday, 14 January 2024

(खिचड़ी)

चुनावी कटाक्ष-----शनिवार
(चुनाव की खिचड़ी)
बड़ी गुलज़ार है दलित के गाँव की खिचड़ी,
चटखारे लेके खा रहे बेस्वाद-बेमन,
क्या करे मजबूरी है--------------
सामने है इनके चुनाव की खिचड़ी।
एै"रंग" दलित बहुत खुश है इनके आचरण से,
वे भी खिला रहा है इन्हे अपने तरिके से----
बेमन-बेभाव इस चुनाव की खिचड़ी।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

धन्यवाद!दैनिक वर्तमान-अंकुर,निर्मेश के त्यागी भइया,और आज के चुनावी कटाक्ष के साथ स्नान-दान पर्व खिचड़ी की ढ़ेर सारी बधाई।

(संगम पर स्नान करती है)

(संगम पर स्नान करती है)

हमारी आस्था सभी को,
हैरान करती है,
कभी पूजा,
कभी अजान करती है.

एक तरफ शायर करता है वजू,"रंग"-
तो एक तरफ हमारी कविता भी-
संगम पे स्नान करती है.

रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियापुर
जौनपुर 222002 (U P)
mo.no.7800824758
rangnathdubey90@gmail.com

(चिट्ठियां)

मैं भला
कैसे भूल सकती हू
जब हर रोज दरवाजे पर
मैं घंटो खड़ी रहती थी
डाकिए 
को सारे गांव की चिट्ठियों का गट्ठर
अपनी साइकिल पर टांगे
बाटने के लिए
आते हुए देखने के लिए इस उम्मीद से
की शायद
वह अपनी साइकिल खड़ी कर
अपने चिट्ठियों के गट्ठर से
तुम्हारे प्यार की चिट्ठी निकाल
मुझे थमा
जैसे ही जाने को होता
तो इच्छा होती की उससे कह दू
कि जरा उनकी लिखी चिट्ठियां
थोड़ी और जल्दी दे जाया करो
फिर खुद को तुम्हारे चिट्ठियों के
प्रेम की बावली
समझ, खुद को धत कहती
और उस चिट्ठी को लेकर
बिस्तर के तकिए को सीने से लगाकर
कुछ देर
तुम्हारी चिट्ठियों को देखती 

जब तुम्हारे प्रेम की चिट्ठियां डाक से आती थी,
सच उस चिट्ठी को खोलने से पहले मेरी नज़र
उस चिट्ठी से चिपके

Saturday, 13 January 2024

(चैन से सोने नही देगी)

(चैन से सोने नही देगी)
मेरा कत्ल-
तेरी जिंदगी का आखिरी होगा।
तडपोगे,ऐ रंग-जब मेरी चीख,
तुम्हे चैन से सोने नही देगी।

(तेरी कोख मां)

(तेरी कोख़ माँ)
कौन जाँचेगा तेरी कोख़ माँ,
लड़ खड़ी हो ज़माने से,
तु भी है एक बेटी ये सोच माँ।
कौन जाँचेगा तेरी कोख़ माँ।
दे प्यार,लोरियाँ गा,मेरा हक दे,
उठा!एक बेटे की तरह,
मुझको भी ले अपनी गोद माँ।
कौन जाँचेगा तेरी कोख़ माँ।
उगने दे ये चाँद,उतरने दे अपने आँगन,
मै यकीन दिलाती हूँ-----
कि तुम अपने बेटे से भी ज्यादा करोगी----
एक दिन इस बेटी पे नाज़ माँ।
कौन जाँचेगा तेरी कोख़ माँ।

सेब द चाइल्ड।

Friday, 12 January 2024

(मेरी कत्ल का निमंत्रण है)

(मेरी कत्ल का निमंत्रण है)
मेरी दिल फरेब चाहत से,
ऐ,रंग-कह दो
कि उसे मेरी-कत्ल का निमंत्रण है।

निमंत्रण शब्द का इस्तेमाल मैने बस एक प्रयोग के तौर पर किया है।

(कामायानी नही)

(कामायनी नही)
हाँ!-----------
मै भी पढ़ी जाती हूँ,
किसी बंद कमरे में नंगे बदन,
ऐ,रंग-----ये और बात है कि,
मै किसी जय शंकर प्रसाद की-----
कामायनी नही।

(जला अलाव देखा है)

ठंड मे सरकारी अलाव के क्या हाल है एक ठंड की रात ने स्पष्ट कर दिया
                              (जला अलाव देखा है)
ठंड मे---------
अकड़ के मरे हुये बुढ़े का हमने घाव देखा है!
बंद करो------
ये तवायफ़ी अखबारबाजी अपनी,
बस तुम्हारें पहले पेज पे ही हमने--------
शहर मे जला अलाव देखा है।

Thursday, 11 January 2024

(बांहों में गीत रोए)

(बाँहो मे गीत रोये)
गज़ल की बाँहो मे गीत रोये,
रोये शहनाई तेरी याद की,
तो बाँसुरी भी लबो से भीग रोये।
गज़ल की बाँहो मे गीत रोये।
एक तरफ तेरे इंतज़ार की श़मा,
तो दुसरी तरफ विरह के दीप रोये।
गज़ल की बाँहो मे गीत रोये।
लौट आ ऐ,रंग----फिर से मेरी दुनिया मे,
कि तेरी प्रीत रोये।
गज़ल की बाँहो मे गीत रोये।

(जैनब)

उफ! मासूम जैनब
                     (रेप से जैनब मरी है)
ये जो रेप से जैनब मरी है,
किसी वालिद की बिटिया,
किसी की जीऩत,किसी की परी है-------
ये जो रेप से जैनब मरी है।
जिस्मानी भूख और हवस की हद है,
वे मासूम कितनी चीख़ी होगी,
या अल्लाह! वे कौन? नमाज़ी था,
कि मरने के बाद भी लग रहा की,
जैसे जैनब बहुत डरी है---------
ये जो रेप से जैनब मरी है।
इंसाफ़ मांगे किससे,
खामोश है पाक मे तहरिक-ए-इंसाफ़,
गोलियां मिली शायद यही किस्मत है,
हर मुल्क के जैनब की,
लेकिन जैनब सी किसी मासूम की लाश,
शर्मिंदगी से सर झुका देती है,
क्योंकि किसी भी मुल्क की जैनब,
हमारे मज़हब और मज़हबी किताब से कही बड़ी है,
ये जो रेप से जैनब मरी है।

@@@पाकिस्तान मे एक मासूम जैनब को मेरी श्रद्धांजलि।

Monday, 8 January 2024

(वीरान थिएटर)

( वीरान थिएटर )

चला गया--
इस फानी दुनिया से
करके विरान थिएटर.

ये खालीपन न जाने कब भरेगा,
फिर कौन?
निभायेगा और डूब जायेगा,
सिनेमा के उस
"अर्धसत्य" के किरदार में,
शायद कोई नहीं!

वे खुरदरा सा चेहरा--
अब भी मेरी जेहन में घुमड़ रहा है,
जिसकी सीरत की खूबसूरती से,
बन जाया करता था--
उन दिनों बहुत महान थिएटर.

मुझे भली-भांति वे सीन याद है,
जब दंगे पे लिखे नाटक का दर्द,
उस चेहरे पे उभरा,
तो मैं एकटक तकता रहा,
जैसे जिंदा हो गया हो
हू–ब–हू वही दंगा,
मारकाट,लाशो की पीड़ा,
उफ!उस किरदार की
दोनो आँखो के आँसूओ से,
बन गया था, कुछ घंटो के लिये,
वही दंगाई शहर!
उफ!नही दे सकता
वरना देता--
ओमपुरी के लिये एक बयान थिएटर.

चला गया---
इस फानी दुनिया से
करके विरान थिएटर.

""""ओम पुरी जैसे एक महान कलाकार को मेरी श्रद्धांजलि"""""

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर.
mo.no.----7800824758

Sunday, 7 January 2024

(कोरोना वैक्सीन)

(कोरोना वैक्सीन )

यह है
शादी शुदा लोगों की "कोरोना वैक्सीन "
यह "मेड इन ससुराल" है
जो यह भलीभांति जानती है कि उसे
अपने पति को कब
और कहा
कितनी "डोज" देनी है 
यह पुरे वर्ष
बिना किसी "साइड इफेक्ट" के
अपने मनचाहे "टेम्परेचर" पर
रहती है,

ये "वैक्सीन",
अपने पति के यहां 
"तीज" से लेकर "करवा चौथ"
तक "सक्सेज" है

अतः
अगर आपने शादी ना की हो
तो तुरंत कर डालिए
ताकि आपको भी मयस्सर हो
यह शादीशुदा लोगों की
"कोरोना वैक्सीन".

@@@यह हास्य रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, जिला-जौनपुर 222002
(U P )
Mo. no.7800824758

(दो स्तन)

(दो स्तन)
कुछ भिड़ झुरमुट की तरफ देख,
अचानक मै भी रुक गया--------
और जैसे ही मेरी नज़र उस झुरमुट पे पड़ी,
उफ!मेरे रोंगटे खड़े हो गये,
एक पैत्तीस साल की औरत का-----------
विभत्स बलात्कार मेरे सामने था,
उसके गुप्तांग जख्मी थे,
और उससे भी कही ज्यादा जख्मी थे-----
उसके वे दो खुले स्तन।
जिसपे पशुता के तमाम निशान थे,
नोचने के,खसोटने के,दाँतो के
बहुत मौन थे,
लेकिन ये मौनता एक पिड़ा की थी,
क्या?इसिलिये ईश्वर ने दिया था,
इस औरत को----------
कि कोई अपनी पशुता से छिन ले,मसल दे
इसके दो स्तन।
जब पहली मर्तबा इसके बलात्कारी ने भी पिया होगा,
अपनी नर्म हाथो से बारी-बारी-------
अपनी माँ का दो स्तन!
तब इनमे दुध उतरा था,
क्यूं ?नहीं दिखा आखिर-----
मसलते,कुचलते,नोचते वक़्त,
शायद देखता तो कांप जाता,
क्योंकि इसकी अपनी माँ के भी थे-----
यही दो स्तन।
इतना ही नही गर कल्पना करता,
तो इसे दिखता------------
अपने ही घर मे अपनी बुआ,अपनी चाची
और सीने पे दुपट्टा रंखे अपनी बहन के--
इसी बलात्कार की गई औरत की तरह,
दुपट्टे के उस तरफ भी तो लटके है एै"रंग"-----
यही दो स्तन।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

धन्यवाद!आपका डेली वर्तमान-अंकुर और निर्मेश के त्यागी भइया मेरी रचना को प्रकाशन का बहुमूल्य स्नेह देने के लिये।

(रूह बोलेगी)

(रुह बोलेगी)
मेरा कत्ल इतना आसान नही,
मै सच का मुहाफिज़ हूँ।
ऐ,रंग-
गर दफ्ऩ भी हुआ,
तो मेरी रुह बोलेगी।

(कुरान सी लगती है)

(कुर्आन सी लगती है)
हाँ!ये काफ़िरी है--------
मै कुब़ूल करता हूँ,,
कि ऐ,रंग-------मुझे-------
गरीब की बिटियाँ कुर्आन सी लगती है।

Friday, 5 January 2024

(लाहौर तक जाती है)

(लाहौर तक जाती है)
बहन की राखी दुश्मनो से लड़ने,
करगिल और पठानकोट तक जाती है।
शहीद की माँ का कलेज़ा फटता है,
इसकी बेवा चिखती है,
फिर भी वंदे मातरम की आवाज़,
सुनो इसके बुढ़े बाप के-----
कप कपाते होठ से आती है।
ऐ,रंग--फिर भी हर मर्तबा कितने गर्व से-
हमारी छप्पन इंच की छाती-----
लाहौर तक जाती है।

(मंदिर और मस्जिद मकान सा लगता हैं)

(मंदिर और मस्जिद मकान सा लगता है)
हमने देखी है---------
दंगे मे अल्लाह और राम की लाशे,
ऐ,रंग----तब से हमे-----
ये मंदिर और मस्जिद एक मकान सा लगता है।

Thursday, 4 January 2024

(गुलाबी शाल)

(गुलाबी शाल)
वे ठंड दिसंबर की----------
मै भुल नही पाती जब तुम आये थे छुट्टियां ले,
और मै इंतज़ार कर रही थी,
अपने कमरे मे तेरे आने का,
कमरे मे आते ही---------
तुमने पिछे से मेरी आँख मूँद,
फिर हौले से खोलने को कहा,
तो देखा तुम्हारी हाथो ने बड़े प्यार से पकड़ा था---------
एक गुलाबी शाल।
फिर उसे खोलकर तुमने कहा था,
बिल्कुल हूबहू तुम्हारी तरह है,
इसकी भी गुलाबी शर्म!
बस इसी से खरीद लाया कि जब तुम इसे ओढ़ोगी,
तो एक तरफ तुम्हारी शर्म होगी,
तो एक तरफ होगी-------
हमारी गुलाबी शाल।
फिर फौज की छुट्टी बिता तुम लौट गये,
इस दिसंबर तुम नही हो------------
तो तुम्हे अपने श्पर्श मे पाने की खातिर,
मैने दराज से निकाला है-------
गुलाबी शाल।
सच इसको छुना तुम्हे छुने सा लगता है,
जब इसे मै रखती हूं कंधे पे,
तो लगता है जैसे,
तुम्हारा लिया चुंबन है-------
गुलाबी शाल।
## # दिसंबर की ठंड मे लिखी एक रोमांटिक कविता है गुलाबी शाल।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

Tuesday, 2 January 2024

(औरत)

(औरत और इस्लाम)
औरत इस्ल़ाम मे इतना भी हक नही रखती,
खुदा का दर भी है मर्दे मस्ज़िद,
ये वहाँ भी नमाज़-ए-सज़दा कर नही सकती।
औरत इस्ल़ाम मे इतना भी हक नही रखती।
पर्दा दर पर्दा घुटी जाती है ये बंदिशो की चारदिवारी में-------
ऐ,रंग-----ये अपने साँसो की कुर्आन भी------------
अपनी मरज़ी से पढ़ नही सकती।
औरत इस्लाम में इतना भी हक नही रखती।

(प्रीत का बिछुआ)

(प्रीत का बिछुआ)
उम्र ढ़ली---------------
मै ढला पर वे न ढली,
हाय!आज भी चुभे है आधी रात बीस्तर मे,
ऐ,रंग--वैसे ही उसकी प्रीत का बिछुआ।

(शनिवार के दिन)

बेवफाई पे आज एक लम्बे अरसे के बाद, कुछ अलग लिखने की कोशिश की है,जिसे पढ़कर शायद आपको भी किसी की याद आ जाये "शनिवार के दिन ".

(शनिवार के दिन )

 

उठा था एक जनाजा, इसी शहर में
शनिवार के दिन.

वे आशिक,पागल, दीवाना था
जिसका दिल
बड़ी बेरहमी से तोड़ा था,
एक बेवफा ने. इसी शहर में----
शनिवार के दिन.

सुना है कि----
उसआशिक और पागल की,
आह! लगी थी उस बेवफ़ा को
इसी शहर में.
शनिवार के दिन.

तभी तो 
वे जिस रइश के घर गई थी,
करके निकाह अपना,
उस रइश ने, उसे दिया तलाक
इसी शहर में-----
शनिवार के दिन.

वे बहुत तन्हा.
सिसकती रही महीनों.
फिर जाने क्या हुआ?
की उसने कर ली खुदकुशी,
अपने उसी दुपट्टे से,
जिस दुपट्टे में,
कभी देखा था
उसे उसके आशिक ने पहली मर्तबा
इसी शहर में-----
शनिवार के दिन.

@@यह रचना सर्वाधिकार सुरक्षित है अतः इसका बिना अनुमति लिए अंयन्त्र प्रयोग ना करें.

यह रचना अप्रकाशित है.

रचनाकार---रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जौनपुर (U P )
mo. no.7800824758