Wednesday, 17 June 2026

तुम चिट्ठी हो

मैं खत हूं 
तुम चिट्ठी हो 
कभी पढ़ा मैंने तुमको 
कभी पढ़ा तुमने मुझको 
चौबीस वर्ष का साथ हमारा 
पर लगे कि जैसे तुम मुझको 
जन्म-जन्म मिलती हो 
मैं खत हूं 
तुम चिट्ठी हो.

Tuesday, 16 June 2026

तुम हिंदुत्व की कोढ़ हो

(तुम हिंदुत्व की कोढ़ हो)

तुम 
हमारे हिंदुत्व की कोढ़ हो 
नीच हो,निकृष्ट हो 
पतित और घृणित हो.

तुम्हारी वजह से राम की मर्यादा 
अयोध्या में तार-तार हुई .
लोग हस रहे 
शबरी की भक्ति 
सीढ़ियों पर बैठी रो रही .

तुम पापी हो 
उसकी आस्था के जूठे बेर 
राम ने खाये थे 
तुम 
उसकी राम भक्ति की सीढ़ियों पर चढ़े 
पहले अछूत और दलित हो.

तुमसे 
और तुम्हारे संस्कार से श्रेष्ठ 
रावण था 
जिसने कुल उद्धार किया 
लेकिन तुम कुलनाशी हो
किसी वैश्या के धंधे से उठी खांसी हो .

तुम पहले ऐसे शख्स हो
जिस पर मेरी
थूकने की इच्छा हो रही 
लेकिन थूकूंगा नहीं 
क्योंकि प्रभु श्री राम की अयोध्या 
और सरयू पवित्र है.

लेकिन ओ मंदिर के दान 
और उसके चढ़ावे के चोर,चंपत 
मैं तुम्हारी लाश पर 
कुछ कुत्तों को 
पेशाब करते हुए 
किसी जटायु की तरह देख रहा हूं 
भगवान करे कि 
तुम्हारी इस राष्ट्रीय दुर्गति से 
लोग कुछ सीखे
और सरकार भी शिक्षित हो 😥😥

✍️✍️सादर क्षमा के साथ क्योंकि राम केवल हमारी आस्था का नाम मात्र ही नहीं बल्कि हमारा वह संस्कार हैं जो सृष्टि की आखिरी सांस की लाश के पीछे भी प्रतिध्वनित होगा कि "राम नाम सत्य है"🙏🙏

रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी,मियाँपुर 
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
rangnathdubey90@gmail.com

Saturday, 13 June 2026

नावेल सी हो गई है

(जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है)
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है,
जिसे मोड़कर कई दिनो से यूँही रख दिया है,
कि समय मिलते ही फिर उस पृष्ठ को खोल पढ़ुगा,
अपने जीवन के हूबहू घटनाओ की वे तमाम बाते,
यानी की गतांक से आगे---------------
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है।
तमाम उठा-पटक झंझावतो का जीवन,
कही कोई विदेशी रोमांटनिजम नही,
एक विछोह,एक दर्द,
हर पृष्ठ के कथनांक के आगे--------
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है।
इसी मोटी सी किताब को,
कुछ लोग लुगदी साहित्य कह,
यू छिटक जाते है जैसे मंटो की भूखी नायिका,
अपने से ज्यादा नंगो को देखती है,
अपनी काली सलवार और कपकंपाती टाँग के आगे-----
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है।
कुछ पन्ने और बचे है पढ़ने को,
कल खत्म कर लुंगा इसे भी,
और बिना मोड़े रख दुंगा,
फिर इच्छा ही नही बचेगी इसके पढ़ने की,
क्योंकि पता चल जायेगा कि क्या कुछ लिखा है,
एै"रंग" इस नावेल मे गतांक से आगे-------
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Thursday, 11 June 2026

पपीहा

पपीहा मुँआ


मेरी पीर बढ़ाये पपीहा मुँआ,
वे भी तो तड़पे है मेरी तरह,
वे पी पी करे और मै पी पी पिया।
मेरी पीर बढ़ाये पपीहा मुँआ।
वे रोये है आँखो से देखे है बादल,
मै रोऊँ तो आँखो से धुलता है काजल,
वे विरहा का मारा मै विरहा की मारी,
देखो दोनो का तड़पे है पल-पल जिया,
मेरी बढ़ाये पपीहा मुँआ।
हम दोनो की देखो मोहब्बत है कैसी?
वे पीपल पे बैठा मै आँगन में बैठी,
की भुल हमने शायद कही पे,
या कि भुल हमने जो दिल दे दिया,
मेरी पीर बढ़ाये पपीहा मुँआ।
चल रे पपीहे हुई शाम अब तो,
ना बरसेगा पानी ना आयेंगे ओ,
मांगो ना अब और रब से दुआ,
मेरी पीर बढ़ाये पपीहा मुँआ।

###दैनिक समाचार पत्र सच का हौसला मे इस रचना को स्थान देने के लिये वंदना दी का शुक्रिया ।

लव जिहाद

(लव जिहाद नहीं )

जिस 
लड़के और लड़की को
अपने वालिदो की मोहब्बत याद नही,
वे हवस है
लव जिहाद नही.

ये महज दो जिस्मों की,
इजाजत-ए-हम बिस्तरी है 
इसी से इस रिश्ते की,
कोई उम्र या कोई मयाद नही,
ये हवस है
लव जिहाद नही .

ये कत्ल
ये लाश के टुकड़े
इबलिश-ए-ख्वाहिश के अंजाम है 
इसमें,
किसी रिश्ते की मुहर नही
ये एक आह! है
मैय्यत है,मातम है
बेरहमी है
यहा, कोई फरियाद नही
ये हवस है
लव जिहाद नही.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियापुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P)

फेसबुक की प्रेम कविताएं

😀कुछ महिलाएं जो दिनभर अपनी सुंदर फोटो के साथ फेसबुक पर प्रेम कविताएं लिख रही है💘आप उनमें से,किसी एक के पति को देख ले तब आपको पता चलेगा कि "फेसबुक की प्रेम कविताएं मौलिक नहीं है" 😀😄

टिप्पणी

✍️✍️राजनीति बहुत ही पतित हैं इसका चाल चलन और चरित्र दोमुंहा हैं इसके लिए जाति और वोट महत्वपूर्ण हैं व्यक्ति का अपराध नहीं 😢😢

Wednesday, 10 June 2026

उफ जरा नहीं करते

(उफ!जरा नही करते)
मोहब्ब़त करने वाले मशवरा नही करते,,,,
ये अईसी आग है-जो लगी तो बस लगी-
ऐ,रंग--गर इसमें मौत भी आये------
तो उफ!जरा नही करते।

पूजा का वक्त था कि अजान का

(पूजा का वक्त था या अजान का)
मंदिर और मस्जिद के बीच,
सड़क के किनारे झाड़ियो मे-------
हमने एक औरत की नग्न लाश देखी।
और उसके दोनो स्तनो पे
खुरचने के निशान देखे!
और वे दोनो स्तन----------
मंदिर और मस्जिद की तरफ लटके हुये थे,
कितने असहाय थे बताने में,
उस नग्न औरत के दोनो स्तन ऐ,रंग-----
कि वे पूजा का वक्त था या अजान का।

###मेरी इस रचना को वलगेरेटी के लिहाज से न पढ़े,इस तरह की एक लाश शायद डेढ़ वर्ष पहले देखी थी ये उसी से प्रेरित है,फिर भी गर कही से भूलवश कोई आहत होता हो तो हम उससे माफी मागते है-----धन्यवाद।

Monday, 8 June 2026

आज रात

(आज रात)
ऐ बेवफ़ा सामने बैठ और सभल आज रात,
मै पढुँगी तेरे शहर में गज़ल आज रात।
लब पे हँसी होगी दिल में आँसू ,
रोशनी लुटाऊँगी-----------------
मै चराग की तरह जल आज रात।
तड़प उठेगी चाँदनी मेरी सदा से,
पछतायेगी वे भी निकल आज रात।
मै ये मुशायरा छोड़ जाऊँगी,
उस बेवफ़ा के दिल में--------
ऐ,रंग----रह जायेगी एक कसक आज रात।

मोहब्बत की कविता

✍️✍️ एक मोहतरमा दिनभर अपनी फेसबुक पर मोहब्बत की इतनी कविताएं लिखती है💘♥️कि मैं सोचता हूं कि हे!भगवान अगर फेसबुक ना होता तो बेचारे उनके पति के दिल की क्या हालत होती😀😀

केरल से लौट आई है

(केरल से लौट आई है)

शायद जल्द ही घिर जाए,
हमारे शहर में मानसून के बादल,
क्योकि ऐ,"रंग"
हमने सुना है
कि मेरी मोहब्बत,
केरल से लौट आई है.

पत्नी व्यंग्य

शादी के 25 वर्ष बाद भी अपनी सगी पत्नी को प्रेम कैसे करें? इसका एक ट्यूशन केंद्र खोलने के प्रयास में हूं

व्यंग्य

रविवासरीय मजाक--वैसे हर नेता या महिला नेत्री के पास न्यूनतम दो पति अथवा दो पत्नी होनी चाहिए,,, ताकि एक पक्ष में रहे और दूसरी विपक्ष में 😀😀

सर्विस प्रोवाइडर वाली पत्नी

हो सकता है कि,आने वाले कल में कुछ संपन्न पतियों के लिए पत्नियों की नियुक्ति संविदा के आधार पर या फिर किसी सर्विस प्रोवाइडर के माध्यम से हो.😀😀😀😀

अखबारी मौत

✍️✍️किसी हिंदी दैनिक समाचार पत्र में साहित्यिक,सामाजिक या राजनीतिक कॉलम का बंद होना,, एक तरह से गणेश शंकर विद्यार्थी, राम मनोहर लोहिया और दिनकर की अखबारी मौत के समान है 😢😢

Sunday, 7 June 2026

पेन किलर

(पेन किलर है)
हाँ!मेरी तबियत पहले से कही बेहतर है,,,,
क्योकि ऐ,रंग-----मेरे रुबरु-------
मेरे दिल की पेन किलर है।

गुरुत्वाकर्षण

(गुरुत्वाकर्षण है)

उसकी खुबसुरती को
एक टक देखना,
मेरी बद्चलनी नही,
बल्कि ये
उसके तराशे हुये बदन का,
एै,रंग---
गुरुत्वाकर्षण है!

वेवफा लिखने की रस्म

✍️✍️🌹🌹 तुम आज भी मेरी यादों में प्रतिध्वनित होती हो,,मैं तुम्हें आज भी अपनी कविता की प्रेयसी और प्रेमिका लिखता हूं,,क्योंकि मेरे प्रेम के चलन में बेवफा लिखने की कोई रस्म ही नहीं है 😢😢

Thursday, 4 June 2026

बेगम अख्तर

(बेगम अख्तर ना हुई)

ऐसा नहीं कि गजल फिर 
दुनिया को मयस्सर ना हुई,
पर कोई भी गाने वाली खातून 
ऐ,रंग----
बेगम अख्तर ना हुई.

सरस्वती पत्रिका

इतनी बेहतरीन साहित्यिक पत्रिका की लेखकीय प्रति का इंतजार तो बनता ही है और खासकर तब जब उसमे आपकी अपनी कहानी भी शामिल हो.

"छात्र जीवन मे इस पत्रिका को पढ़ने की बड़ी इच्छा थी जो अब जाकर परवान चढ़ने को है"

संपादक अनुपम परिहार सर का हार्दिक धन्यवाद मेरी कहानी को इस अंक में लेने के लिए साथ पता लेने के साथ ही उन्होंने लेखकीय प्रति शीघ्र भेजने को कहा ✍️✍️✍️✍️

अप्रकाशित

✍️✍️एक तो करेला दूजे नीम चढ़ा अर्थात लेखकीय प्रति ना देने वाली पत्रिकाओं और ईपत्रिकाओं को भी अब लेखकों से अप्रकाशित रचना चाहिए 😀😀

Wednesday, 3 June 2026

हां मैं भी बुनकर हूं

(हाँ!मै भी बुनकर हूँ)
हाँ!मै भी बुनकर हूँ------------
तुम तिनका-तिनका कालीन बुनते हो,,,,,,
और मै शब्द-शब्द गीत बुनता हूँ।
हाँ!मै भी बुनकर हूँ।

पत्थर की हो गई

(पत्थर की हो गई)
मै जबसे---------------
उस बेवफ़ा सितमगर की हो गई,
सूख गये अरमान मैं पत्थर की हो गई।
क्या-क्या नही छोड़ा खातिर उसके,
वालिद का दिल तोड़ा!
बसने आई थी मैं बेघर की हो गई।
मै जबसे---------------
सुर्ख जोड़े,हिना,आईना सिसके
ये अज़ीब निकाह है देखो,
कुबूल कर भी ऐ,रंग----------
मै बीना शौहर की हो गई।
मै जबसे--------------
उस बेवफ़ा सितमगर की हो गई,
सूख गये अरमान मैं पत्थर की हो गई।

शमीम रहती थी

शमीम रहती थी

कभी सामने नीम के———
एक घर था,
जिसमें मेंरी शमीम रहती थी।
वे महज़———
एक खूबसुरत लड़की नही,
मेंरी चाहत थी।
बढ़ते-बढ़ते ये मुहल्ला हो गया,
फिर काॅलोनी बन गई,
हाय!री कंक्रिट——–
तेरी खातिर नीम कटा,
वे घर ढ़हा——–
जिसमें मेरी शमीम रहती थी।
अब तो बीमार सा बस,
डब-डबाई आँखो से तकने की खातिर,
यहाँ आता हूँ!
शुकून मिल जाता है इतने से भी,
ऐ,रंग———–
कि यहाँ कभी,
मेरे दिल की हकिम रहती थी!
कभी सामने नीम के——–
एक घर था,
जिसमें मेरी शमीम रहती थी।

बिना शौहर की हो गई)

( बीना शौहर की हो गई)

मै जबसे----
उस बेवफ़ा सितमगर की हो गई,
मेंरे सूख गये अरमान
मैं पत्थर की हो गई.

क्या-क्या नही छोड़ा
खातिर उसके,
वालिद का दिल तोड़ा!
और अम्मी का यकीन

मैं कहां बसने आई थी---
भागकर घर से, 
देख लो आज मैं 
बिना घर की हो गई.

मै जबसे---
उस बेवफा सितमगर की हो गई.

सुर्ख जोड़े,हिना,आईना सिसके
अज़ीब निकाह किया मैंने 
कुबूल कर भी ऐ,"रंग"--
मै बीना "शौहर की हो गई".

पत्नी पर व्यंग्य

✍️✍️वैसे आप अपनी पत्नि के बेलन को रूस का आण्विक हथियार ना समझे,,बस आप उसके गुस्से को युक्रेन के जेलेस्की की तरह भड़काने की कोशिश ना करे 😀😀

उड़ीसा ट्रेन हादसा

(उड़ीसा के आंसुओं वाली ट्रेन)

ऐ उड़ीसा--
तेरी यह आंसुओं वाली ट्रेन 
हमे याद रहेगी,
ना भूलूंगा क्योंकि
इस हादसे की मरसिया 
नीरज की तरह 
अब हमारे पास रहेगी.

मैं जानता हूं कि
तेरी फाइलों में गुम हो जाएगा यह दर्द 
तू सरकारी महकमा है,
पर जीना है उन घरों को यह हादसा
उनके दिलों में आंसू रहेगा और
ता-उम्र चेहल्लुम की यह रात रहेगी.

ऐ उड़ीसा-
तेरी पटरियों से होकर फिर गुजरेगी ट्रेन
फिर उतरेंगे चढ़ेंगे मुसाफिर
तेरी कानों में
हर रोज एक नई आवाज रहेगी.

ऐ उड़ीसा--
तेरी यह आंसुओं वाली ट्रेन
हमें याद रहेगी.

✍️✍️वैसे इस भाव श्रद्धांजलि में एक जगह मैंने मरसिया शब्द का प्रयोग किया है जिसका अर्थ "शोक गीत" से है.
😢😢😢😢😢😢

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
mo.no.7800824758

साइकिल पर व्यंग्य

साइकिल दिवस---एक दौर था जब साइकिल सुपर स्प्लेंडर हुआ करती थी,,जिन लोगों की शादी में साइकिल नहीं मिलती थी,,उनका मुंह "महीनों मेले के फटे हुए गुब्बारे की तरह दिखता था"😀😀😀😀

Monday, 1 June 2026

शहनाज़ का मेकप नहीं करती

(शहनाज़ का मेकप नही करती)

हमारी गज़ल वे खूबसूरत औरत है,
जो कभी शहनाज़ का मेकप नही करती.

वे सादगी और सलिके की रस्म़ है,
वे जिधर से गुजरती है निगाहे पाकिज़ा,
अपने सर से दुपट्टे को ओझल नही करती.

हमारी गज़ल----
जीनत है ज़मी की आयत है,
ये ज़न्नत से घर को कभी दोज़ख नही करती.

ऐ,रंग---
इसकी दुनिया फकत शौहर है,
ये हवस के मारो की तरह कभी ब्रेकप नही करती.

हमारी गज़ल वे खूबसूरत औरत है,
जो कभी शहनाज़ का मेकप नही करती.

रचनाकार--रंगनाथ द्विवेदी
जिला-जौनपुर, (U P )
mo. no.7800824758

Sunday, 31 May 2026

स्तन सूदा औरतें

दिल्ली की एक पुरानी घटना जिसमें एक लड़की को चाकु और पत्थर से कुचकर मार दिया गया और उसकी इस सरे आम हो रही नृशंस हत्या को देखकर भी तमाम आते जाते हुए महिला और पुरुष उसकी बगल से ऐसे गुजर रहे थे कि जैसे उनकी बगल में कुछ हुआ ही ना हो, अगर कुछ हुआ भी हैं तो फालतू के पचड़े में क्या पड़ना या फिर इस सबसे उन्हें क्या मतलब?

लेकिन राजधानी दिल्ली के उस मुर्दापन को मैं बर्दाश्त नहीं कर पाया ✍️✍️

(कुछ औरते गुजर रही)
😢😢😢😢

वे नृशंस चाकुओं से मार रहा,
पत्थर से कुचल रहा,
वही बगल से उसके 
कुछ स्तन शुदा औरते 
गुजर रही.
निर्भया
के गुप्तांग के सरिए से फिर 
खून बह रहा
लेकिन इस बार
मोमबत्तियां जली नही
चलो ! अच्छा है
कि, दिल्ली
का अपना मुर्दापन बच गया.
आखिर राजधानी है
यही तो आना है
कुछ लोगो को 
सदन में घड़ियाली आसूं बहाने
कुछ वोट
टटोलने,
लव जेहाद, हिंदू मुसलमान,जाति
नही, नही
फिर किसी लड़की का कटा स्तन
उछल रहा
और उसके गुप्तांग से
खून की एक पतली धार 
बह रही.
पता नही की राजधानी की तरफ
या फिर, हमारी सूख चुके
आंख के पानी की तरफ
लेकिन हां! कुछ
स्तन शुदा औरते 
उसकी बगल से गुजर रही. 😢😢😢😢

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

लेखक--रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियापुर
जौनपुर (U P)
rangnathdubey90@gmail.com

Saturday, 30 May 2026

पत्रकार

जब पत्रकार 
सियासत की रेप पर पर्दा डाल दे 
तब समझ लेना 
अखबार का तेवर मर गया,

Friday, 29 May 2026

दंगा

(दंगा याद है)
हमें पुराना शहर याद है,
एक-एक गली मुहल्ला याद है।
वे कुर्आनखानी का खुरमा,
मुँह पोछती अपने दुपट्टे से,
अब्दुल की अम्मा याद है।
हमें पुराना शहर याद है!
राखी सुनि थी एक ब्राह्मन के घर,
आँख मे खुशियो के आँसू---------
मेरी इस कलाई को सलमा याद है।
हमें पुराना शहर याद है!
इतने सालों बाद देखा जब जला घर,
पुछा कहां गये ये सब,
तो नये शहर के बाशिंदो ने बताया,
तो अफसोस हुआ,रंग---------------
कि अब नये शहर को,
पुराने शहर की मोहब्बत नही,
नफरत,लाशे और दंगा याद है।
हमें पुराना शहर याद है।

Thursday, 28 May 2026

नक्सली हो गए

(नक्सली हो गये)
गुमराह रास्तो से गुजरे--------
हम जंगली हो गये,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग---अपनो का सीना चाक कर----
हम नक्सली हो गये।

रेखा

( रेखा )
रेखा---
शहरयार और रुसवा की,
किताब बनके रह गई.
वे घुंघरू,नजाकत के लिये मशहूर हुई,
लेकिन उसके अंदर की औरत,
हके मोहब्बत को तड़पती रही,
वे साँसे खुदकुशी,
और मोहब्बत के सिरहाने,
अपने ही कब्र का-------
एक चराग बनके रह गई.

@@@रंगनाथ द्विवेदी.
Mo.no.7800824758

ताबूत ना कहें

(ताबूत ना कहे)

अभी लोकतंत्र जिंदा है
इसे भूत ना कहे,
सदन मंदिर है,
इसे ताबूत ना कहे,

खूब करे मोदी का विरोध
ये विपक्ष की खूबसूरती है,
लेकिन हमारे अमृत को आप 
जहर का घूट ना कहे.

"शेंगोल" सदन में रखे "भरत के त्याग के 
खड़ाऊ की तरह है",
आप भी आएंगे यही जीतकर,
प्लीज,अपना सर झुकाइए यहां,
भले ही आप
भाजपा के राम को सांप्रदायिक,
ओर सदन के बाहर
अयोध्या को अयोध्या
या अपने मूंह से
"चित्रकूट" को "चित्रकूट" ना कहे

आज सत्ता इनकी है
कल आपकी होगी,
प्लीज,
अपनी राजनीति की नीचता से,
इसे नेश्ते नाबूत ना करे 
अभी लोकतंत्र जिंदा है,
इसे भूत ना कहे,
सदन मंदिर है 
इसे ताबूत ना कहे .✍️✍️🙏🙏🙏🙏

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियापुर
जौनपुर, उत्तर प्रदेश

रूह तलक जल गई

(रुह तलक जल गई)
रख दिया-----------------
दहलीज़ पे खुद को दिये की तरह,
ऐ,रंग-------------------------तुम नही आये
जबकि मेरी रुह तलक जल गई।

Wednesday, 27 May 2026

तलाक

(हमने औरत होने का हर हक़ अदा किया)
हमने औरत होने का हर हक अदा किया,
फिर भी तिलाक देके तुमने गमज़दा किया।
हमने औरत होने का हर हक अदा किया।
रोई,सिसकी तेरी बंदिशो मे चराग सी जली,
हाय!कभी उफ कहां किया।
हमने औरत होने का हर हक अदा किया।
तेरी मर्दे परस्ती को कहीं चोट ना आये,
मैने तुम्हे इस्लाम के इतर अपना खुदा किया।
हमने औरत होने का हर हक अदा किया।
ये तिलाक नही कत्ल है मेरा,
ऐ,रंग----चंद लोगो के इस्लाम ने,
बेगुनाह औरत को उसका हक
और उसकी वफा का सिला नही दिया।
हमने औरत होने का हर हक अदा किया।

स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है

(स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है)

मैं उसे छक के पीता हूं,
पैग दर पैग बिना डर के,
क्योकि ऐ,रंग--
उसके बदन पर कही नही लिखा,
कि वह,स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है.

(आशिकी-2 का रिंगटोन बजता रहा)

(आशिकी--2 का रिंगटोन बजता रहा)
वे तेरी बेवफ़ाई के बाद भी,
तुमसे मोहब्बत करता रहा।
तभी तो अपनी कलाई की नशे काट,
वे पुरे बिस्तर पे-----------
तुम्हें याद कर हँसता रहा।
देख ये वही मोबाइल है,
जिसपे तु कभी उससे घंटो बतियाती थी,
आज उसकी लाश के सिरहाने,
बिना किसी रिसीब के,
इसके नाकाम मोहब्बत की तरह,
रुंधे गले से एै"रंग"----------
आशिकी--2 का रिंगटोन बजता रहा।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

एक माडर्न नाकाम मोहब्बत।

Sunday, 24 May 2026

भारतीय राजनीति के नास्त्रेदमस

हमारी बड़ी दिली इच्छा है कि यह भारतीय राजनीति के नास्त्रेदमस भी एक बार प्रधानमंत्री बनें 

Saturday, 23 May 2026

किस्सागोई करता हूं

(किस्सागोई करता हूँ)
अक्सर मेरा कत्ल इसलिये होता है,,,,,,,,,
कि मै झुठ और फरेब़ के शहर मे----
ऐ,रंग-------------
सच की किस्सागोई करता हूँ।

बादल रूठ गए हो

(बादल आज रुठ गये है)
जो कभी हरसते थे,
खेत-खेत बरसते थे---------
वे बादल आज रुठ गये है।
माँ के आँचल मे छिप बच्चे डरते थे,
एक जमाना हुआ जब इस तरह-----
बादल गरजते थे।
वे बादल आज रुठ गये है।
वे लह-लहाते तालाब,पोखर खत्म हुये
जहां कभी हम बंसी लगा-----------
मछलियाँ पकड़ते थे।
वे बादल आज रुठ गये है।
वे दादुर,मोर,पपिहा,झिंगुर का गान
पंत,निराला अपनी कविताओ मे लिखते थे,
तब बादल हमारे देश में,
मन के अंदर भी बरसते थे,
ऐ,रंग----वे बादल आज रुठ गये है।

पगली बना दो

(पगली बना दो)

नन्हे-नन्हे पाँव-----
छोटी-छोटी अँगूली बना दो.

ऐ,खुदा----------
मुझे फिर से बचपन की तितली बना दो.

मै तैरु गाँव के पोखर,
और तोडू फिर बाग से अंम्बिया,
मुझे माँ की डाँट-------
और बापू के दुलार की पगली बना दो.

मेंहदी रचाने के लिए

(मेंहदी रचाने के लिये)

जिसे ता-उम्र 
खुद की मेहंदी ने रुलाया
ऐ,रंग-
वही खातुन कभी मशहूर थी 
पुरे शहर मे--
मेंहदी रचाने के लिये.

उत्तर कोरिया हूं

मैं तुम्हारी मोहब्बत का जापान हूं 
तो तुम्र हमारी मोहब्बत की उत्तर कोरिया 

Friday, 22 May 2026

व्यंग्य

✍️✍️शादी के बाद अगर आपके बाल 70% तक झड़ जाए,,तो समझ जाइए कि आपको बहुत योग्य पत्नी मिली है 😀😀😀😀

Thursday, 21 May 2026

एग्जिट पोल

2019 की लोकसभा चुनाव का-------
                        (एक्जिट पोल)

जैसा की सभी सर्वे मोदी को एक मर्तबा फिर सत्ता मे--"अगली सुनामी की तरह ही लौटता दिखा रहे है".अगर खुदा ना खास्ता इस एक्जिट पोल की सुनामी सच हुई तो मुझे ये कहते व लिखते हुये आश्चर्य नही कि--"मोदी अपने चिंतन की गुफा से बाहर तो आ जायेंगे लेकिन काग्रेंस व अपने-अपने राज्य की बड़ी पार्टियां अपनी हताशा की उस गुफा मे चला जायेगा, जहां से बाहर निकलने के लिये एक न खत्म होने वाली घड़ियों का इंतजार करना होगा". इस बोझिल इंतजार के बाद का प्रतिफल क्या होगा बाद की बात है ,लेकिन सभी चुनावी एक्जिट पोल इस समय भाजपा को अकेले सरकार बनाने की बहुमत का संदेशा दे रहा और पुरे N.D.A को 350 के कुछ कम या ज्यादा बता रहा,ये एक्जिट पोल---"औंधे मुंह गिरे तभी कुछ संभव है, ये आज की तारीख मे मुमकीन नही अगर ऐसा हुआ तो, ये भारत के लोकतंत्र मे हुऐ चमत्कारो मे से पहला चमत्कार होगा जिसके एक्जिट पोल को सदियां याद करेंगी". क्योंकि ऐसा एकाध नही बल्कि समस्त एक्जिट पोल कह रहे कि, रिटर्न आफ मोदी.
सातवे व अंतिम चरण के मतदान से पहले काग्रेंस ने अपने एक समर्थक से सत्ता मे मोदी को आने से रोकने के लिये राज्य की उन मजबूत पार्टियों से संपर्क साधना चालू कर दिया था,जो चुनाव से पहले ऐंठे-ऐंठे से थे.आज की काग्रेंस एक झुकी हुई, पूर्ण रुप से टूटी काग्रेंस है ,ये सभी पार्टियां भी बाखूबी जानती है.लेकिन काग्रेंस के साथ ही कमोबेश इनकी भी यही हालत है.इन सबो ने खासकर काग्रेंस ने इससे पार-पाने व उबरने के लिये एक मीटिंग आगे की रणनीति के लिये 23 को रखी थी,जिसे एक्जिट पोल ने इन्हें टालने के लिये विवश कर दिया, यानि एक्जिट पोल ने कुछ तो तुषारापात या वज्रपात इनपे कर ही दिया है.
भाजपा की जीत के चाणक्य या कौटिल्य कहे जाने वाले अमित शाह जैसे कुटनीतिकार आज की राजनीति मे एकलौते कहे जा सकते है.आज एक्जिट पोल का खाका जो चमकता या 23 मई को उदय होता दिख रहा है,वे इन्हीं अमित शाह के तहत हो पा रहा.अमित शाह की बुद्धि का माइनर इतना ससंक्त है कि इसे डिसफ्यूज करने के चक्कर में---"उन्ही के राज्य मे कई और सारे राजनीतिक माइनर फट जा रहे".बंगाल की ममता के समर्थकों का इस चुनाव मे नग्न नर्तन बहुत कुछ बताने के लिये पर्याप्त है.मोदी और शाह ने एक तरह से ममता के बंगाल को इतना शसक्त तरीकें से घेरा कि वे इसमें घिर गई,ममता का ये घिरापन ही एक्जिट पोल मे दिख रहा ये एक्जिट पोल अगर सच हुआ तो--" फिर ममता को बंगाल मे खुद को काग्रेंस हो जाने से रोकना होगा".
एक्जिट पोल ने 23 मई को आने वाले चुनाव परिणामों से पहले ही ये संकेत दे दिया है कि---"काग्रेंस के सत्ता की दुल्हन ने निमंत्रण बट जाने के बाद काग्रेंस से अपना विवाह न करने का एक घाती निर्णय ले लिया है,यानी काग्रेंस के राहुल को ये एक्जिट पोल उनके डबल कुवारे होने का सर्टिफिकेट देता दिख रहा".
23 मई तलक के लिये इति-सिद्धम् एक्जिट पोल.

(हरियाणा के आसान पास है दोस्त)

(हरियाणा के आस-पास है दोस्त)
आरक्षण-जातियो के आधार पे देना,
एक अभिशाप है साहब।
कुछ घर पंडितो और ठाकुरो के भी,
अब उदास है साहब।
कही बागी न बना दे-परदे के उस तरफ की भूख,
क्यूँकि उनकी जवान बिटियाँ के-----
तन पे भी अब आखिरी लिबास है साहब।
रहम!रहम!रहम!बख्श़िये,
हमारी वेदना भी अब----------
हरियाणा के आस-पास है साहब।

Monday, 18 May 2026

इंदिरा नगर

✍️✍️इंदिरा नगर,लखनऊ में प्रिय भाई व मित्र अंकुर सिंह के छोटे भाई अर्थात अनुज और अनुज वधु को उनके सफल वैवाहिक जीवन की मंगल कामना और आशीर्वाद देते हुए रामेश्वर प्रसाद सिंह और शिव कुमार सिंह चाचाजी के साथ 🎁🎁🎁🎁

नेपाल

कितना खूबसूरत है नेपाल----

 (नेपाल)

नेपाल,
तेरी आँखे किसी हिरनी सी,
आवाज कोयल की कूक
और बाँसुरी की तरह,
चेहरे पे तुम्हारी ये छुईमुई सी शर्म,
उफ! तु क्या जाने? कि तु--
कितनी खूबसूरत है.

नेपाल,
उसपे तेरी ये सफेद सफ्फाक सी सलवार,
और सीने पे 
एक अल्लहड़ लड़की सी,
दुपट्टे का इधर-उधर फिसलना,
यूँँ लगता है कि जैसे तु--
किसी परी या अप्सरा की बेटी है.

नेपाल,
तु आज मेरे पूरे हो रहे इस नावेल की,
किताब के,
एक-एक शब्द में जिंदा रहोगी,
क्योंकि हमने तुम्हें देश की तरह नही,
अपनी मोहब्बत
और महबूबा की तरह देखा है.

यह कविता मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है.

रचनाकार---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
rangnathdubey90@gmail.com

रंग

मेरे नाम में रंग है.इसलिए अपनी लेखनी में,मैंने कभी भी किसी और के रंग को,अपने नाम के रंग में चढ़ जाने या मिल जाने की इजाजत नहीं दी. मैं केवल अपने रंग और मिज़ाज के लिए लिखता हूं.

Sunday, 17 May 2026

दालमंडी

शहर इतना तोड़ा गया 
की मंदिर की सीढ़ियां
और मस्जिद का चबूतरा तक 
ना छोड़ा गया 
हाय! रे दालमंडी 
तुम्हारी यादें सिसकेंगी 

Friday, 15 May 2026

तरक्की

बड़ी तरक्की की 
हम घर बार छोड़ आए 
जब से हम हुए 
और हमारी फैमिली हुई 
तब से हम अपना परिवार छोड़ आए 

मां के ना रहने पर 
बड़ी भाभी 
अपने बेटे से ज्यादा मानती थी 
कभी शिकायत नहीं कि उसने 
कि लल्ला 
तुम अपनी भाभी की आंखों में इंतजार छोड़ आए 

भैया चुप रहे 
बस कर्ज लेते रहे 
खुद के बेटे का हिस्सा नहीं देखा 
मेरी काबिलियत 
कितनी बेवफा निकली 
कि हम उनकी उम्मीदों का 
हर उधार छोड़ आए.

हां फ्लैट में कैद हूं 
एक फोन आया था भाभी का 
कि लल्ला तेरे भैया नहीं रहे 
बड़ी इच्छा थी आ जाते
फिर दोनों तरफ 
एक मौन 
फ्लाइट पकड़ घर के बाहर खड़ा हुआ 
तो लगा कि भैया 
ने पूछा कैसे हो लल्ला 
फिर उनकी लाश से लिपट 
के बुदबुदा उठा 
देर कर दी भैया माफ करना 
अरे पगले 
माफी कैसी तू खुश हैं 
मैं खुश हूं 
क्या हुआ?












Thursday, 14 May 2026

उठाओ फेक दो मुझको

(उठाओ फेक दो मुझको)
उठाओ फेक दो मुझको----------------
जरा सा दिल कड़ा करके,
भला कौन रखता है?
घर में आईना टुटा।
उठाओ----------
लौट जाना तुम किनारे से,
समंदर के!
भला कौन ले जाता है?
आखिर साथ अपने------
रेत का घर बना टुटा।
उठाओ--------------
मै मौसमे खिज़ा का मारा हूँ,
ना मुझसे दिल लगाना तुम!
ऐ,रंग------भला कौन ले जाता है?
अपना घर सजाने------------
पत्ता शाख से टुटा।
उठाओ फेकदो मुझको,
जरा सा दिल कड़ा करके,
भला कौन रखता है------
घर में आईना टुटा।

ड्रग्स लेता हूं

(ड्रग्स लेता हूँ)

मेरे रोम-रोम में है,
उसके चुभने के निशानात--
ऐ,रंग----
मै उसकी मोहब्ब़त का ड्रग्स लेता हूँ।

शाखो॔ से मोहब्बत की है)

(शाख़ो से मोहब्ब़त की है)
गर तुम काटोगे तो मैं चीखूंगा
ऐ,"रंग" हमने 
दरख्त़ो की शाखो से मोहब्ब़त की है.

Sunday, 10 May 2026

मैं सोमनाथ हूं

मैं 
सोमनाथ हूं 
सत्रह बार लुटा टूटा 
फिर उठ खड़ा हुआ

हमदर्द की रूह-अफजा)

(हमदर्द की रूह-अफ्ज़ा)

तू मेरी, शरीक-ऐ-हयात है, कि-
हमदर्द की रूह-अफ्ज़ा.

ये तेरी----
नर्म-नाजूक सी कलाई की छुअन,
हाय !! तू मह़ज़ गिलास है ,
या--
हमदर्द की रूह-अफ्ज़ा.

ये शर्म से झुकी नज़र, 
उसपे सुर्खी ,तेरे गाल की,
बता तू ,गुलाब है,कि-
हमदर्द की रूह-अफ्ज़ा.

ये हवा की शरारत ,
ये उड़ती तेरी जुल्फें,
हाय !! 
तू खुबसूरत ढ़लती शाम है,या
हमदर्द की रूह-अफ्ज़ा.

टहलना ----
तेरा हौले-हौले यूं छत पे
और मेरा देखना तुमको ,
तू मेरी मुमताज़ है, या ----
हमदर्द की रूह-अफ्ज़ा.

यह रचना मेरी स्वरचित और अप्रकाशित है.

इस चित्र का प्रयोग हमने केवल प्रतीकात्मक रूप से किया है ✍️✍️✍️✍️

रचयिता--रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी,मियांपुर 
जौनपुर (U P).

Thursday, 7 May 2026

अवैध संबंध है

(अवैध संम्बंध है)
हाँ मुझे कुब़ूल है,तेरे इल्ज़ाम से पहले,,,,,,,,
ऐ,खुबसूरती-----कि मेरा
तेरी तारिफो से अवैध संम्बंध है।

(गुरुत्वाकर्षण है)

(गुरुत्वाकर्षण है)
उसकी खुबसुरती को एक टक देखना,,,,,,,,,
मेरी बद्चलनी नही,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
बल्कि ये उसके तराशे हुये बदन का-----
एै,रंग---गुरुत्वाकर्षण है।

Thursday, 30 April 2026

(आज तक)

अलविदा रोहित सरदाना 😢😢😢😢

(आज-तक )

अब कौन पुछेगा ?
आखिर सवाल,
इस दोगली सियासत से,
कि बताओ?
आखिर कब तक पहुंचेगी,
तुम्हारी वे सरकारी राहत,

गाँव के मंगरू
और 'मंगल "
की जलती चीता
और उसके पुरे घर में उड़ती,
हुई भूख कि----
"खाक तक".

लेकिन,
वे अब नहीं पुछेगा,
अपनी डिबेट के "दंगल" में
खामोश हो गया,
हमारा एंकर,
हमारा हीरो 

अब हमारी रिमोट भी,
नहीं ढूढ़ेगी,
शाम 5 बजे का "दंगल "

बस हम सहेजेंगे 
"रोहित सरदाना" को,
अपनी याद में,
और देख लिया करेंगे,
कभी-कभी,
महज़ तुम्हारी खातिर
एक चैनल की तरह
"आज-तक ".

रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
Mo. no.,7800824758

Thursday, 23 April 2026

लाल बत्ती

आदरणीय प्रधानमंत्री के निर्णय से पहले हमने एक कविता लिखी थी "लाल बत्ती" जो आज अचानक प्रासांगिक हो चुकी है,इस कविता को ले के बस इतना ही कहना है कि इसे बस औपचारिक भर पढ़ना है तो न पढ़े ये मेरे लेखन पे कृपा होगी अगर आप पुरा पढ़ेगे।

                             (लाल बत्ती )
हमसे पूछो कि कौन रही? लाल बत्ती,
एक दागी विधायक---------------
जब अपने फार्म हाऊस पे,
किसी अबला का रेप कर रहा था,
तो उसकी चीख और सिसकी सुन के,
किसी पत्थर का कलेजा भी पिघल जाता,
लेकिन बाहर------------------
इस होते हुये बलात्कार पर भी मौन रही लाल बत्ती।
दंगे हुये,मौते हुई 
सलमा,रजिया,गुड़िया,लक्ष्मी 
सभी तो मरी लेकिन इन्हें भी,
यादव,पंडित और मुसलमान कहा गया,
बहुत पीड़ा हुई,
जब एक वर्ग को बचाके स्याह रात को,
सरकारी दंगे हुये,
कान पे इसके जूँ तलक न रेंगी,
बल्कि ये जिस गाड़ी मे लगी थी उसी में बैठे मंत्री जी,
शराब के पैग छक रहे थे----------
और लखनऊ की तरफ जा रही थी लाल बत्ती।
थाने बिके,
न्याय गया तेल लेने,
शहर के होटलो मे महिना बंधा,
जूआ और जिस्मफ़रोशी हुई,
ऐस.पी.,डि.यम.,जज सभी तो थे,
लेकिन ये कही और बजा रहे थे------------
एक आम आदमी के न्याय और उसके उम्मीद की लाल बत्ती।
सच इसे अब उतर जाना चाहिये,
क्योंकि जब मै इसे तकता हूँ तो लगता है,
कि जैसे बहुत सारी बेगुनाह लाशो के खून से,
रंगी है एै"रंग"--------------
हमारे देश की हर लाल बत्ती।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
7800824758

Saturday, 18 April 2026

कश्मीरी पंडित

(कश्मीरी पंडित)

वे बांगा दी बुलबुल-
वे डलझील वे शीकारे.
हमारी मिट्टी-ए-मोहब्बत
कश्म़ीर,,
हमे ख्वाबो मे पुकारे.

ये सियासत-ए-साजिश
ये अलगाव,
कि हम कश्म़ीरी पंडित पड़े है-
खानाबदोशो से बदतर ऐ दिल्ली,
तेरी सड़को के किनारे.

वे गुल,वे केशर,वे सेब के बगीचे,
उफ!नही आती वे खूशबु
ना आती है--
वैसी यहाँ तक हवा रे!

ये लाशे मईयत,ये रुह-ए-तड़प है,
ऐ,"रंग"
हम कैसे होगे आखिर 
जन्नतनशी--
कश्मीर कि खाक-ए-मिट्टी
के बीना रे।

ये, बिस्थापित कश्मीरी पंडितो का एक दर्द है.

रंगनाथ द्विवेदी, जज कॉलोनी
मियांपुर, जौनपुर-222002 (U P )
Mo.no.7800824758

Wednesday, 15 April 2026

पायल

(पाँव के पायल की तरह है)
जिंदगी------------
मेरी प्रेमिका के पाँव के पायल की तरह है।
वे झुक कभी---------
जब अपनी नर्म सी अँगुलियो इसे बांधती है,
तो एैसा लगता है कि जैसे जिंदगी-----------
उसके यौवन से फिसले हुये आँचल की तरह है।
जिंदगी-------------
मेरी प्रेमिका के पाँव के पायल की तरह है।
वे शर्म और हया से लदी झुइमुई सी है,
जब मै देखता हूं एकटक---------
अपनी प्रेम हिरनी को,तो लगता है जैसे जिंदगी,
मेरी प्रेमिका के--------
आँख के काजल की तरह है।
जिंदगी-----------
मेरी प्रेमिका के पाँव के पायल की तरह है।
वे स्याह बाल उसके,
जब कभी खुलते है और खुल के बिखरते है,
तो लगता है जैसे जिंदगी,
मेरी प्रेमिका के बालो मे उतर आये एै"रंग"------
सावन के बादल की तरह है।
जिंदगी--------
मेरी प्रेमिका के पाँव के पायल की तरह है।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
mo.no.-----7800824758

पकौड़े तलते है

(पकौड़े तलते है)

नेता-----------
हमारी खुशहाली और तरक्की से जलते है.
वरना-------
इसमें गलत क्या है ?
की हम अपनी आत्मनिर्भरता के लिये,
गर किसी फूटपाथ पे,
कुछ घंटे पकौड़े तलते है.
ये हमारी दिवास्वप्न के,
वे जादुगर है,
जो अपनी राजनैतिक खुशहाली के लिये,
एक दूजे को पानी पी कोसते है,
वरना हकीकत है,
ये फैंसी रहनुमा हमारे,
अपने चुनाव की कडाही मे,
कही दिखावे के गेहूं काटते है,
तो कही देखावे के-----
पकौड़े तलते है.
आईये मिलके मतदान करे,
हम जाती नही,
एक अच्छी सरकार की पहचान करे,
खुद बारोजगार हो,
रही नौकरी,
गर मिलनी है तो मिले,
नही तो फिर शर्म कैसी,
आओ बेरोजगारी के खिलाफ,
हम ये पहल करते है,
किसी फूटपाथ पे----------
कुछ घंटे हम पकौड़े तलते है.

@@@रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर pin no.222002 (U P).
मो.नं.7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

Sunday, 12 April 2026

आनंद का किरदार

( आनंद का किरदार छोड़ जाऊंगा )

मैं जिंदगी के थिएटर को  
विरान छोड़ जाऊंगा,
फिर भी बाबू मोशाय,
मेरे साथ बीते हुए लम्हों की रील,
कभी खत्म नहीं होगी,
क्योंकि मैं आपकी जेहन में
आनंद का किरदार छोड़ जाऊंगा.

कुरकुरे और चिप्स

✍️✍️पत्नी के वैज्ञानिक व्यवहार से यदि आपका मन फीका रहता है तो ऐसे में आप अपनी जवान और खूबसूरत साली का गुप्त नाम कुरकुरे और चिप्स रख ले😀😀

टोपी

यह टोपी कभी हमारे इंकलाब की पहचान हुआ करती थी,, लेकिन बाद में नेताओं के लगाने की वजह से यह टोपी धीरे-धीरे विलुप्त हो गई.

Friday, 10 April 2026

आँखें रोटियां पढ़ती हैं

(आँखे रोटियाँ पढ़ती है)

तेरे स्कूल के दाखिले 
निशुल्क है लेकिन
ऐ,"रंग"
जब पेट हो खाली--
तो आँखे रोटियाँ पढ़ती है.

Thursday, 9 April 2026

डायरेक्ट गधा

✍️✍️आइए हम सभी लोग मिलकर यह सामूहिक कसम खाएं कि आज के बाद से हम किसी को डायरेक्ट गधा नहीं कहेंगे 😀😀

Tuesday, 7 April 2026

एतबार आए

सलमान की सज़ा फिर जमानत यानि कानून के मंदिर का ये जर्जरपन नही तो क्या है?
                          (ऐतबार आये)
आखिर कैसे?
किसी अपराधी और अपराध मे सुधार आये.
जब एक हिरन के मारने की सज़ा..........
बीस साल बाद आये.
वाह री! कानून की दहलीज़ तेरी जय हो
कल सज़ा आज़ ज़मानत..............
आखिर कैसे?
इस देश के आखिरी शख्स़ का......
तुझपे ऐतबार आये.

@@@रचयिता.....रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी.मियाँपुर
जौनपुर.

Sunday, 5 April 2026

नेताजी

(नेता जी)

चुनाव में----
हार के डर से,
बहुत घुट रहे---
नेता जी.
इसीलिए !
जरूरत से कहीं ज्यादा
झुक रहे----
नेता जी.
कल तलक बड़ी ऐठन थी,
दिखना मुहाल था,
आजकल----
गांव-गली, जवार मे,हर कहीं,
दिख रहे----
नेता जी.
खाने-पीने की सुध नहीं,
चिलचिलाती धूप में पसीने से तर-ब-तर हो,
अन्दर ही अन्दर, 
बहुत फूंक रहे----
नेता जी.
मन्दिर-मस्जिद में नवां रहे शीश,
कल तलक,
जिस दलित से चिढ़ते थे,
आजकल----
उसी की बस्ती
और घर मे भोजन कर,
कुछ देर रुक रहे----
नेता जी.

@ रचयिता--रंगनाथ द्विवेदी

Friday, 3 April 2026

व्यंग्य

वैसे अपनी काली-कलूटी पत्नी को--काली कहकर बुलाने से कही बेहतर है कि, आप उसे प्यार से "गुलाब जामुन" कहकर बुलायें 😀😀 क्योंकि प्यार की मिठास से हम भीतर तक गोरे हो सकते है.

बसंती गेहूं काट रही है)

(बसंती गेहूं काट रही हैं)

ए.सी.कमरो मे बैठ के--
जो इतनी सुघर और स्मार्ट रही है,
वही बसंती चुनाव में आज कल---
गेहूँ काट रही है.
गजब है लोकतंत्र,
कि ना कालिया, ना शाम्बा
और नाही गब्बर का डर,
इतनी बेखौफ हो गई है बसंती,
कि अपने सर पे,
दुपट्टे रखने वाली औरत को,
बेरहमी से डांट रही है----
बसंती गेहूं काट रही है.
ये अच्छे दिन है,मोदी के
कि सिनेमा की ड्रीमगर्ल,
कृष्ण की मथुरा मे,
शौचालय के पर्चे बांट रही है---
बसंती गेहूं काट रही है.

@Rangnath dubey

Thursday, 2 April 2026

प्यार की किताब

(प्यार की किताब)
हमारे और तुम्हारे प्यार की किताब,
पे महज़ जिम्मेदारियो कि धूल भर पड़ी है!
बाकी तुम वही हो और मै वही हूँ!
हाँ!कुछ पल मिल जाते है जब हम और तुम-----------
मिल के इस किताब की धूल को साफ करते है,
फिर पहले की तरह चमकने लगते है,
हमारे तुम्हारे प्यार के सारे हर्फ,
जिसे हमने-तुमने------
प्यार भरे उन दिनो मे लिखा था,
जब तुम-तुम थी और मै-मै था!
हाँ!याद करो जब घंटो हम,
एक दुसरे की शानो पर अपना सर रंखे,
शाम तलक सपने बुना करते थे,
आज उन्ही सपनो मे रंग भरने के लिये,
हम और तुम---------------
अपने दो मासूम जीवन फूलो की खातिर लगे है!
शायद या यकीनन हम फिर पढ़ेगे पहले की तरह ही----------
एक दूजे की शानो पर अपना सर रंखे,
पुराने दिनो की तरह ही-----------
अपने इस प्यार की किताब।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

Wednesday, 1 April 2026

वंदे मातरम्

(जाफ़रान वंदे मातरम)
क्यू नही गायेगा-------------
कोई हिन्दू या मुसलमान वंदे मातरम।
ये जेहनियत के बीमार है इन्हें क्या पता?
कि है हिन्दू के लिये गीता,
और मुसलमानो के लिये है-------
कुरान वंदे मातरम।
यकी न हो तो किसी भी कौम से पुछो,
यही कहेगा कि जिस मुल्क मे जन्मे,
आखिरी लम्हे वहीं की खाक मिले,
उसी ख्वा़हिश की है जुबान---वंदे मातरम।
आओ तरन्नूम मे गायें इसे हम तुम,
क्योंकि ये मुल्क मेरी माँ और तेरी अम्मी है,
एै"रंग" जिसके आँचल की दूध मे है बन के केसर------------
और जाफ़रान वंदे मातरम।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758
ये रचना आज वंदे मातरम को लेके छिड़े विवाद से प्रेरित है।

धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर और निर्मेश के त्यागी भईया मेरी इस रचना को स्नेह देने के लिये।

Saturday, 28 March 2026

कैंडल नाइट

(कैंडिल नाइट)
बहुत उदास है—————
आज हमारे तुम्हारे मोहब्बत की,
कैंडिल नाईट।
मै वही बैठी हूँ ठिक सामने,
बस वे जगह खाली है-
जहां तुम बैठते थे,
आज बहुत उदास है मेरे अंदर जिंदगी,
मै टुट रही हूँ!
मेरे संग बीत रही है,
बस तुम्हारे खूबसूरत यादो की—–
कैंडिल नाईट।
शायद कही चुक गये हम,
इसी से हमारे रिश्ते में गलतफ़हमी बढ़ती गई!
तुम अलग हो गये मै अलग हो गई,
अब तो अक्सर————–
डिनर मेज पे ही रह जाता है,
और मै कुर्सी पे बैठी यु ही,
गुजार देती हू————-
अपनी कैंडिल नाईट।
गर गुंजाइश हो तो लौट आओ,
एक मर्तबा ही सही मुआफ करने,
क्योंकि ऐ,रंग—–कही ऐसा न हो,
कि तेरा इंतजार करते-करते,
हमेशा के लिये बुझ जाये,
मेरी ये कैंडिल नाईट।

यही धारावी

(यही धारावी)
मै रोज थकी मांदी,
काम से लौटती हूं जीने------
यही धारावी।
वे चारपाई पे लेटा है,धुत्त कच्ची पिये
गंदी गालियाँ दे रहा,
अभी जबरदस्ती खीचेगा,
मै अपनी ऊबकाईयां रोके,
बर्दाश्त करुंगी एक बलात्कार,
फिर उठुंगी वे सो जायेगा,
थका मांदा!
मै उल्टीयां कर,
पुरे बदन से अपने एै,रंग-------
छुड़ाऊँगी सारी रात मै यही धारवी।

बेजा तलाक

(बेजा तलाक न दो)
ख्वा़हिशो को खाक न दो!
एै मेरे शौहर-----------
सरिया के नाम पे,
मुझे बेजा तलाक न दो।
बख्श दो---------
कहा जाऊँगी ले मासुम बच्चे,
मुझ बेगुनाह को-------
इतना भी शाॅक न दो,
बेजा तलाक न दो।
न उड़ेलो कान में पिघले हुये शीशे,
मुझ बांदी को सजा तुम--------
इतनी खौफ़नाक न दो,
बेजा तलाक न दो।
न छिनो छत,न लिबास
खुदा के वास्ते रहने दो,
मेरी बेगुनाही झुलस जाये-------
मुझे वे तेजाब न दो,
बेजा तलाक न दो।
सी लुंगी लब,रह लुंगी लाशे जिंदा,
लाके रहना तुम दु जी निकाहे औरत,
मै उफ न करुंगी!
बस मेरे बच्चो की खुशीयो को कोई बेजा,
इस्लामी हलाक न दो-------
बेजा तलाक न दो।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.7800824758
____तलाक एक दर्द है जो इसे भुगत रही कोई औरत ही समझ सकती है!अगर संभव है तो मेरी इस रचना के पढ़ने वालो से मेरी कलम अनुरोध करती है प्लीज कभी किसी भी औरत से बेजा तलाक न ले,शुक्रिया।

सुलगती सिगरेट

लगाये बैठा है—————-
होंठो पे अपनी वे सुलगती सिगरेट!
बगल में अनगिनत टुकड़े गिरे है,
धुआँ है!
उस कमरे में जिस कमरे में कभी तुम,
छिन के फेक दिया करती थी,
उसकी अधजली सिगरेट।
अब होंठ पे लगा भुल जाता है,
वे तो सुलगते-सुलगते,
जब होंठ के आखिरी सिरे पे पहुँचती है,
तो वे चौकता है!
फिर जला होंठो पे रख लेता है,
वे अपने एक नई सिगरेट।
और तकने लगता है दरवाजे की तरफ,
कि शायद तुम लौट के आओ,
छिन के फेकने इसके होंठो से,
अधजली सिगरेट।
एक सुबह———-
दरवाज़ा खुला था लोगो की भिड़ थी,
शायद कुछ देर पहले ही मरा है,
क्योंकि—————-
अभी भी उसकी होंठो पे एै,रंग
धीरे-धीरे आगे बढ़ रही बुझने के लिये,
बिल्कुल इसके जीवन की तरह——-
ये सुलगती सिगरेट।

ओढ़नी

(ओढ़नी)
याद है बचपन---------
मैं पहले कहाँ ओढ़ती थी ओढ़नी।
वे तो जब मैं तेरह की हुई,
तो अचानक-माँ ने डाँटना शुरु किया,
और कहने लगी-----------
अब अपने सीने पे तुम रंखा करो ओढ़नी।
मैं चौंकी-----------------
कि ये अचानक माँ को क्या हुआ?
फिर लगा नही कुछ तो है,
यूँही नही माँ रखवाना चाहती होगी----
सीने पे ओढ़नी।
फिर कमरे में बंद कर,
खुद को शीशे में टटोलने लगी,
तो अचानक कुछ शर्म सी आई,
कुछ बदला सा था,
जहाँ माँ ने कहा था-रखने को ओढ़नी।
मै बाहर निकली----------
तो देखा बचपन को खिसकते,
लगा माँ कि कितना सच कह रही थी,
कि तु सयानी हो रही है,
क्योंकि कुछ लोग तक रहे थे,
एै,रंग------वही जहां माँ ने कहा था,
रख लो तुम ओढ़नी।

सेब द चाइल्ड

(सेब द चाइल्ड लिखवा रही है)
किसी कन्या भ्रूण को कोई क्या मारेगा?
माँ खुद मरवा रही है।
हँसी-खुशी के साथ हजार दो हजार दे,
हर शहर के पैथालाॅजी मे रिपोर्ट ले,
किसी डाक्टर के टंगे नीले परदे के उस तरफ,
अपना एबार्शन करवा रही है।
आँख इसलिये भर आती है कि-------
इन तथाकथित माँओ ने कालेज मे पढ़ा है,
"इनके पथराये हृदयो ने--------
माँ शब्द की कोमलता खो दी है",
वही निरक्षर माँ----------
चार बेटिया जन पाप-पुण्य से डरती है,
सच तो ये है कि अपनी बेटियो के लिये-----
"उन पढ़ी-लिखि ढोंगी माँओ से ज्यादा,
अपनी इन बेटियो के लिये लड़ती है"।
सरकारी अमले की कारस्तानी तो और है,
जो महिला डाक्टर पैसे ले,
एबार्शन करवाने के लिये चर्चित है,
सुना है कि वही,
पुरे शहर की दिवालो पे-------------
"सेब द चाइल्ड लिखवा रही है"।

@@@भ्रूण हत्या को इंगित करती एक कविता।

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर----222002 (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

चूल्हा नहीं जलता

(चुल्हा नही जलता)

तुम तो
बात-बात मे शहर जलाना जानते हो,
तुम्हारे पास तो
कौमो को जलाने का ईधन है!
पर यहाँ फाँकाकशी सोने नही देती,
पेट तो जलता है
ऐ रंग---------
पर इस बस्ती मे अक्सर
चुल्हा नही जलता.

Thursday, 19 March 2026

तिलिस्म में होशरुबा

(तिलिस्म़-ऐ-होशरुबा)
कई रात जगा हूँ,नींद टुटी है,,,,
हर बार------
बार-बार तेरा चेहरा नुमाया हुआ है।
ऐ,रंग--कह दो-----
अब उतर आये मेरी कागज़ पे,,,,
मेरे ख्वाहिशो की-----
तिलिस्म़-ऐ-होशरुब़ा।

कुछ छोटी रचनाएं

(कुछ छोटी रचनाये)
               (1)
फुटपाथ पे अधनंगा--------
वे मासुम सुबह से ही बेच रहा,
आजादी का तिरंगा!
एै"रंग" उसके पेट का पिचकापन ही----
शायद उसके हिस्से का भारत है।

                  (2)
मै रोज देखती हूँ---------
खुली खिड़की से घंटो सड़क की तरफ,
एै"रंग" इस उम्मीद मे की शायद,
कभी दिख जाये--------------
वे मेरी बचपन का काबुलीवाला।

               (3)
कहाँ उसकी माँ ने उसके बाल सँवारे,
कहाँ उसकी माँ ने बनाई उसकी चुटिया!
वे स्कूल के सामने की सड़क पे-------
टिन बजा के करतब दिखाती रही,
फिर कटोरे के चंद सिक्के,
अपनी फटी झोली मे भर आगे बढ़ गई,
करतब दिखाने नट की बिटिया।

                (4)
आओ बाँटे तोहफे यतीमो में हम-------
किसी अपाहिज़ की बैशाखी,
या किसी गूँगे की मीठी जुबान हो जाये,
एै"रंग" आओ एक रात ही सही--------
हम सेंटा क्लाज हो जाये।

               (5)
मै घंटो बतियाता हूँ माँ की कब्र से,
एै"रंग" एैसा मुझे लगता है कि,
जैसे इस कब्र से भी---------
मेरी माँ की दुआ आती है।

                (6)
मै आज भी खाता हूँ---------
रेस्टोरेन्ट और बीबी का पकाया,
पर एै"रंग" भूख नही मिटती,
शायद वे मिला नही पाती खाने में-----
मेरी माँ के प्यार की रेसिपी।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

मकान से अच्छा

(मकान से अच्छा)
वे अपनी तोतली जुबान से बोलता है----
किसी भी हिन्दू या मुसलमान से अच्छा।
मुझे बहुत खूबसूरत लगता है----------
वे गली मे नंगा खेलता बच्चा ।
क्या?करुंगा जा के मै मंदिर या मस्जिद में,
मुझे पता है कि---------
तुम बांध दोगे बंदिशो मे एक दिन इसे भी,
ये भी समझ जायेगा जाती और मज़हब,
और बन जायेगा ये खो के अपना बचपना,
हमारी गीता और तुम्हारे कुरान का बच्चा।
तब तलक तो तक लु इस मासुम से बच्चे को,
जो खुद मे खो बना रहा मिट्टी से एै"रंग"----
एक घर इस शहर मे हर मकान से अच्छा।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

Wednesday, 18 March 2026

तवायफ की कब्र है

(तवायफ़ की कब्र है)
यहाँ चराग नही जलते,
कोई चादर नही चढ़ती!
ये शहर की मशह़ूर तवायफ़ की कब्र है।
आज भी करती है,ये रुहें मूज़रा,
फिर फूट के रोती है!
ऐ,रंग---बस आ जाते है खिज़ा में,
दरख्त़ो के चंद पत्ते------
आवारगी करने।
ये शहर की मशह़ूर तवायफ़ की कब्र है।

नित नया अग्निपथ है

(नित नया अग्निपथ है)
एै बीजेपी----------------
उत्तराखंड में तुम्हारी विजय का,
कल जो शपथ है!
वे महज शपथ ही नही,
बल्कि पहाड़ो की कठिनाईयो से भरी,
हर सड़क का------------
तुम्हारे लिये नित नया अग्निपथ है।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और मेरे चुनावी कटाक्ष।

मुसलमान है साहब

(मुसलमान है, साहब)

ना ही , पूजा 
ना ही , किसी मस्जिद की ,
अजान है , साहब.

ये लड़की ,
इस दौर-ए-ग़ालिब की,
दीवान है , साहब.

बड़़े सलीके और 
तमीज़ से ,
लिखा है , कई रात ,
ये एक रात , हिन्दू
तो एक रात मेरी ,
गज़लों की , ----
मुसलमान है , साहब.

@ रंगनाथ द्विवेदी

Tuesday, 17 March 2026

मजहब होकर रह गई

(मज़हब हो के रह गई)
हर रात लहू-लूहान सेज़ पे सोती है,,,
इसका शौहर----
इसकी ख्व़ाहिशो का कत्ल़ करता है।
ये मोहब्ब़त तलाशती है कतरा-कतरा,,,
वे मोहब्ब़त के लम्हो मे तकरिर करता है।
ऐ,रंग--वे यहाँ आई थी औरत होने-----
मज़हब होके रह गई।

तकरिर--धार्मिक भाषण।

आईना रो दे

(आईना रो दे)
मेरी आरज़ू का ऐ खूँ करने वाली,
खुदा करे!कल तेरे हाथो कि हिना रो दे।
तु जब सँवरने के लिये हो आईने के रुबरु,
मेरी वफ़ा का अक्स़ उभरे-----------
और तेरी कमीनगी पे आईना रो दे।

कालेधन वाले कैश की तरह

(कालेधन वाले कैश की तरह)
क्यू नही पकड़े गये मुज़रिम प्रदेश मे-----
आजम खाँ के भैंस की तरह।
क्यू नहीं किया कुछ आखिर--------
मोदी के उज्वला गैस की तरह।
मुआफ करना अब जनता देख रही है,
एै"रंग" सभी के करतूत---------
कालेधन वाले कैश की तरह।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

धन्यवाद!आपका निर्मेश के त्यागी भईया,दैनिक वर्तमान अंकुर और मेरे चुनावी कटाक्ष।

इश्क़

(ईश्क़ सल्फ़ास की गोली है)
ईश्क़ मे कहाँ मिलन,कहाँ डोली है।
करने वाले पहले से जानते है,
ऐ,रंग--ईश्क़----
सल्फ़ास की गोली है।

खूबसूरत औरत नहीं देखी

(खूबसूरत औरत नही देखी)

माथे से टपकता पसीना,
कमर में खोसी हुई साड़ी!
सर पर सीमेंट की भदेली,
और उस पर
श्रम की मादक चाल!
ऐ रंग---
मेरी कविता ने कभी--
इतनी खूबसूरत औरत नही देखी.

Monday, 16 March 2026

कलम तोड़ दी है

(कलम तोड़ दी है)
मोहब्बत के---
ताजिराते हिंद की दफा से,,
वे बचती रही है।
हमने पहली दफा ये,वहम तोड़ दी है,,
ऐ,रंग--उन्हे बेवफा लिखके कलम तोड़ दी है।

लोरियां होती

(लोरियाँ होती)
बचपन होता---------
बचपन की चोरियाँ होती!
माँ!मै शुकून से सोता,
इस पत्थर के शहर मे!
अगर तु होती--------
और तेरी लोरियाँ होती।

लिख दूं बनारस

(लिख दूं बनारस)

तेरी यह खूबसूरत आंखे है 
या की "भेलूपुर".

उस पर यह शर्म तेरी
जैसे "गिलट बाजार".

उफ! यह दिल की इंतहा है
या की पागलपन 
बता ए मेरी मोहब्बत
कि मैं तुम्हें 

"कचौड़ी गली" लिखूं 
या लिख दूं
बनारस.



✍️✍️ रंगनाथ द्विवेदी
जौनपुर,(उत्तर-प्रदेश)

Sunday, 15 March 2026

छापा था

(छापा था)
कल की होली में------------
कही गम तो कही सियापा था!
एक नेता रो रहे थे-----------
तक के अपनी तनहा कुर्सी,
जिसके आस-पास भीड़ थी,
पर हाय!रे चुनाव-----------
तुने बख्श़ा नही,जबकि घोषणापत्र में हमने
एै"रंग"--------------
सब कुछ कर डालेंगे एैसा छापा था।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

धन्यवाद!आपका निर्मेश के त्यागी भईया,दैनिक वर्तमान अंकुर और मेरे चुनावी कटाक्ष का।

घुंघरू बांधती थी

(घुँघरु बांधती थी)
रईसो के दरमियां वे सलिके से जाती थी,
कभी ठुमरी,कभी दादरा गाती थी।
ऐ,रंग--वे पाक थी कोठे पे सुना है-----
कि केवल!वे पाँव मे घुँघरु बांधती थी।

बंजारन

(बंजारन)

मेरी जिंदगी मे आई थी कभी--
एक खानाबदोश बंजारन.

उसकी कत्थई आँखो को यादकर,
मै लिखता गया,लिखता गया,
न जाने कब--
एक मुकम्मल किताब बन गई!
ऐ,रंग--
वे खानाबदोश बंजारन.

अपनी लटो को

(अपनी लटो को)

अपनी लटो को--
चेहरे पर आने ना दिया करो.
बड़ी जलन होती है,
जब यह तुम्हे चुमते है.

Saturday, 14 March 2026

सनी लियोन हुई

(सनी लियोन हुई )

मेरी ग़ज़ल,मेरी कविता मौन हुई,,
ऐ,रंग-
देखते-देखते 
हमारे साहित्य की शकुंतला--
सनी लियोन हुई.

Tuesday, 10 March 2026

गठबंधन

(गठबंधन का अहम रोल है)
सच्चाई साबित है याकि गोल है,
एक मर्तबा फिर से तिलिस्मी अपने प्रदेश का------------
ऐग्जिट पोल है।
सभी कह रहे अपनी रंगीन होली,
जबकि फाग वाले नेता जीत को आश्वस्त नही,
क्योंकि मिड़िया में लंगड़ी सरकार बनेगी,
यानि कि इस मर्तबा एै"रंग"-----------
गठबंधन का अहम रोल है।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और मेरे चुनावी कटाक्ष का।

Sunday, 8 March 2026

बच्चा पाल रही हूं मैं

(बच्चा पाल रही हूँ मै)
इस सुंदरतम सृष्टि को आहूति----
डाल रही हूँ मै,,
दोज़ख मे अपने नन्हा सा-----
एक बच्चा पाल रही हूँ मै।
देगा मुझको अपना ही कोई गाली,,
ये नाज़ायज फिर भी ,रंग----
कुम्हार की मिट्टी सा-----
इसको ढ़ाल रही हूँ मै।
इस सुंदरतम,सृष्टि को आहूति डाल रही हूँ मै----
दोज़ख मे अपने नन्हा सा----
एक बच्चा पाल रही हूँ मै।

महिला दिवस पे मेरी लंबी कविता की शुरुआती लाईने।

पति के हाथ से जली

(पती के हाथ से जली)
कभी मिट्टी के तेल तो कभी तेज़ाब से जली,
औरत सीता भी हुई तो आग से जली।
ये दुनिया मर्दें शहर है आज भी,
गर मासुम सजी-सँवरी भी तो ऐ,रंग-----
अपने पती के हाथ से जली।

महिला दिवस हूं

(महिला दिवस हूँ)
ना मज़लूम ना ही किसी से विवश हूँ,
मै खुद मे हू सक्षम,
और खुद मे जीवट हूँ।
मै भी खड़ी हूं------------
अब सदन से सड़क तक,
एै"रंग"बुथ पर मैं मतदान करती--------
इस लोकतंत्र की महिला दिवस हूँ।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

Saturday, 7 March 2026

नीलकंठ हूँ

(नीलकंठ हूँ)
छक के पिया है-------
हमने भी तमाम हालातो का ज़हर!
ऐ,रंग------------
मै भी अपने दौर का नीलकंठ हूँ।

@@@@हर हर महादेव।

वोट में रहा

(वोट में रहअ)
चाहे धोती-कुर्ता चाहे कोट मे रहअ,
ई बनारस हौ तनी लंगोट मे रहअ।
हमन त रोजै दंड पेली ला अखाड़े मे,
न ललकार हमन के ताव आई जाई,
तु नेता हऊव चुनाव लड़,
अऊर खाली अपने औकात------
अऊर वोट में रहअ।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और मेरे चुनावी कटाक्ष।

टूटी चुड़ी

(टुटी चुड़ी)
तेरे पहले छुअन से टुटी चुड़ी को,
मैने अब तलक संभाल रंखा है----
जब तु नही आता कई राते---
तो मै उसी से बात करती हूँ।

मैं महिला दिवस हूं

(मैं महिला दिवस हूँ।)
संसद से सड़क तक,
मैं अब भी विवश हूँ,
कहने को केवल------
मैं महिला दिवस हूँ।
अब भी हालात बदले नहीं हैं,
वहीं चुभते नाखून और चुभती आँखें,
 ऐसी ही पीड़ा की------
ऐ "रंग"मैं एक कशमकश हूँ।

खूबसूरत औरत नहीं देखी

(खूबसुरत औरत नही देखी)

माथे पे चुह-चुहाता पसीना,
कमर पे खुशी साड़ी!

और सर पे सीमेंट की भदेली,
श्रम की मादक चाल!

ऐ,रंग---
मेरी कविता ने कभी--
इतनी खूबसुरत औरत नही देखी।

Thursday, 5 March 2026

मेरी गज़ल

(तबसरा करती है)
मेरी गज़ल अक्सर तबसरा करती है,
किसी गरीब की भूख से मशवरा करती है।
सुना है एक हयात और एक जन्नत है शहर,
लेकिन इसी शहर में कुछ जन्नत,
माँ की कोख में मरा करती है--------
मेरी गज़ल अक्सर तबसरा करती है।
मजबूरियाँ बिकती है,खरिदो-फरोख्त़ होता है,
कुरआन पढ़ने वालो जरा सोचो,
किसी गली में हर रात अपने जख्म़-----
न चाह के भी कोई अमीना हरा करती है।
एै"रंग" इसी से न चाह के भी---------
मेरी गज़ल अक्सर तबसरा करती है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

Wednesday, 4 March 2026

आओ जिहाद करे

(आओ जिहाद करे)
बेटे और बेटियाँ-----
माँ-बाप की मोहब्ब़त को याद करे।
ना कत्ल हो,ना शहर जले,
ऐ,रंग--हम जिस्मानी हवस के खिलाफ--
आओ जिहाद करे।

शबे महफिल

(शबे भहफ़िल)
बेशक लौट जाना तुम सहर से पहले,
ऐ मेरे कातिल!
पर मै टुट के गाऊँगा कल के मुशायरे में,
है दिली ख्व़ाहिश कि तुम सामने रहना,
तुम नही मिली तो गम नही--
बस बीना आँसुओ के रोना चाहता हूँ,
कल मै शबे महफ़िल।

राम को अल्लाह कहता हूं

(राम को अल्लाह कहता हूँ)
फकिरी तबियत है--------
मै मस्ज़िद में नमाज पढ़ता हूँ!
बस फर्क ये है ऐ,रंग---------
मै राम को अल्लाह कहता हूँ।

जलील चुने जाएंगे

(जलील चुने जायेंगे)
कहाँ गरीब मुसहर,कौल या भील चुने जायेंगे,
ये विचित्र चुनाव है---------------
इसमें कौवे,गिद्ध और चील चुने जायेंगे।
एै"रंग" शरीफ़ और शराफ़त गई तेल लेने,
यहाँ तो बिहार के मंत्री की तरह------
कुछ हमारे भी प्रदेश से जलील चुने जायेंगे।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

धन्यवाद!आपका दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और मेरे चुनावी कटाक्ष का।

व्यंग्य

✍️✍️इस व्यंग्य को दिल से ना ले
कभी किसी बड़े माफिया या बड़े नेता के पीछे बंदूक लेकर चलने वाले व्यक्ति के चेहरे को आप देखिए,,तो ऐसा लगता है कि जैसे कोई स्वामी भक्त कुत्ता जहरीले रसमलाई की हिफाजत कर रहा हो 😃😄😃😄

Monday, 2 March 2026

प्यार को खतरा है

(प्यार को खतरा है)
ईद,होली त्योहार को खतरा है,
मंदिर-मस्जिद की मीनार को खतरा है!
लड़ जायेंगे------------
शहर के शहर गर इनकी चली तो,
एै"रंग" यहाँ मुसलमान की मोहब्बत और---
हम हिन्दूओ के प्यार को खतरा है।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

धन्यवाद!आपका दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और मेरे चुनावी कटाक्ष का।

बैजू बावरा

(बैजू बावरा)

ऐ शोहरते तानसेन,–
ये तेरा ऐंठना कैसा?

देखना! फिर हरा देगा तुम्हे,
किसी महफिल में 

ऐ रंग-
किसी छोटे से शहर का 
बैजू बावरा.

Sunday, 1 March 2026

सरकार भली नहीं आती

(सरकार भली नही आती)
धोखा है फोरलेन---------
हमारे शहर में तो बिना गंड्ढे के,
कोई गली नही आती।
गाँव तकता है आज भी पूछो किसान से---
सिंचाई के वक़्त उसके बिजली नही आती!
क्या अखिलेश?क्या मोदी?,
सब हमाम के नंगे है एै"रंग" वरना,
हमारी क़िस्मत मे सालो से अब------
कोई भी सरकार भली नही आती।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758
धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और मेरे चुनावी कटाक्ष का।

उम्र की किताब

(उम्र की किताब)
पूरे बदन में--झुरझुरी सी उठ रही,
हे सखी!बसंत पढ़े छेड़-छेड़,
मेरे उम्र की किताब.

Saturday, 28 February 2026

बिटिया की आजादी

(बिटियाँ की आजादी अच्छि नही लगती)
बचपन की आजाद चिड़ियाँ को,
बंदिशो मे बांध रहे है!
ऐ,रंग-----आज भी दुनियाँ को देखो----
बिटियाँ की आजादी अच्छि नही लगती।

ताव में डिंपल

(ताव में डिंम्पल)
लगी हुई है जैसे-----------
किसी डुबती नईया के बचाव में डिंम्पल!
तभी तो तुफानी दौरे कर रही-----
अब की चुनाव में डिंम्पल।
चाचा,भतीजा,बबुआ,बुआ तो थे ही,
अब तो मोदी को भी कोश रही-----
एै"रंग"बड़े ताव में डिंम्पल।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758
धन्यवाद!आपका दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और मेरे चुनावी कटाक्ष का।

अभिनंदन

( अभिनन्दन होगा)

ग़र तेरी कैद़ मे-----
ऐ पाक़ मेरा अभिनन्दन होगा,
तो क़सम वतन की खाते है,
लाहौर, करांची के हर घर मे-----
फिर भीषण क्रंदन होगा।
रूह कांप उठेगी हर शै़ की,
फिर गिद्ध-सियार ही बोलेंगे,
एक-एक बेटे के हिस्से----
कई-कई गर्दन होगा।
अगली आजादी का तिरंगा,
फहरेगा फिर ग़गन तेरे,
हम पैरो तले कुचल देंगे,
वहां तलक फिर. नक्शे मे ऐ"रंग'----
मेरा ये वतन होगा।
ग़र तेरी कै़द मे-----
ऐ पाक मेरा अभिनन्दन होगा।

Friday, 27 February 2026

भजन की बात

(भजन की बात)
अखिलेश कह रहे------------
मोदी की नोटबंदी और कालेधन की बात!
राहुल कह रहे-------------
ढकोसला और नौटंकी है,
प्रधानमंत्री के रेडियो पे मन की बात।
बंद कमरे की तवायफ़-------------
जब थिरकेगी नंगे बदन,
तो उससे बेमानी है एै"रंग" करना-----
कंठी,माला और भजन की बात।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758
धन्यवाद!आपका दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और मेरे चुनावी कटाक्ष का।

Thursday, 26 February 2026

मोहब्बत के फ्लेवर का महीना है

(मोहब्बत के फ्लेवर का महीना है)

यह गुनगुने मिजाज 
और तेवर का महीना है ,
वह देखो सज रही है,
घंटो दर्पण के सामने,
यह उसके पिया के दिए,
जेवर का महीना है.
भाभी टटोलती है 
ननद और देवर को,
ऐ,रंग--
इस देश मे फागुन--
मोहब्ब़त के फ्लेवर का महीना है.

(मिट्टी आ गई)

(मिट्टी आ गई)

फरिश्तों ने जो लिखी थी
वे चिट्ठी आ गई 
चल तेरे खाक में 
मिलने की मिट्टी आ गई.

ना रो दरख्तों पर,
ना शाख पर
यहां सबको टूटना है
बिछड़ना है
यही चलन है.

सभी ने देखा है 
कि खिजा के बाद
उन्ही महबूब 
दरख़्तों की शाख पर 
फिर से,
बहारों की 
नई पत्ती आ गई.

चल तेरे खाक में 
मिलने की मिट्टी आ गई.

Wednesday, 25 February 2026

उर्दू घुट घुट के परदे में रही

(उर्दू घुट-घुट के परदे मे रही)
मरदे तहज़ीब कत्ल करता रहा,
इसी से ऐ,रंग---सालो-साल,
हिन्दी अपनी पिड़ाओ के घुँघट मे,
और उर्दू----------
घुट-घुट के परदे मे रही।

अपनो के दिए गरल से

(अपनो के दिये गरल से)
जिसको कभी हम जानते थे,आड़वाणी और अटल से,
वे गायब हो गये-------------
आज की दोगली राजनीति के पटल से।
हाँ!भाजपा,मोदी,शाह सभी है
बस एक जोशी है,
जो तील-तील मर रहे भीष्म की तरह हर रोज,
एै"रंग"अपनो के दिये गरल से।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

धन्यवाद!आपका निर्मेश के त्यागी भईया,दैनिक वर्तमान अंकुर और मेरे चुनावी कटाक्ष का।

श्रीदेवी मर गई

अलविदा हम और हमारे दौर के कला की बेमिसाल मुरत यानी श्रीदेवी को।
                         (श्रीदेवी मर गई)
श्रीदेवी आज तु----------
लाइट,ऐक्सन,कैमरा यानी सबको तन्हा और,
विरान कर गई।
देखो हमारी भीगी नम आँखे------
हम कोई ऐक्टिंग नही करते,
इसमे आज तेरे निभाये हर किरदार की वे----
हर एक सुरत उतर गई।
तु क्या जाने कि तेरे जाने से,
हमारी मुहब्बत के दरख्त़ो के सारे महबूब पत्तो को,
तु दर-बदर-कर गई।
हो सकता है कि इन दरख़्तो पे लगे फिर नये पत्ते,
फिर पहले सी बहार आये,
लेकिन तु क्या जाने कि किस तरह तेरे जाने से,
हमारे दौरे शाख की बुलबुल,
हमेशा कि खातिर हमारे मुहब्बत के शाख से उड़ गई।
शायद आसमां पे भी खुदा को,
अपनी सिनेमा की खातिर तेरे जैसे किरदार की जरुरत थी,
शायद आज इसी से---------
तु हमसे और हमारे जैसे तमाम चाहने वालो से बिछड़ गई।
सच यकीन नही हो रहा एै "रंग" आज-----
की हमारे दिल और हमारे सिनेमा की श्रीदेवी मर गई।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर---222002(u p)।
mo.no.-----7800824758

दो घाव हो गए

(दो घाव हो गए )

जिन उरोजों को ढ़क,
वे मासूम देखती थी,
कभी वात्सल्य का सपना,
ए "रंग "
उसके वही दोनों उरोंज,
गरीबी के चलते-----
दो घाव हो गए.

कुछ पन्ने तो फटे होते

(कुछ पन्ने फटे होते)

सारा दिन
फुटपाथ पर बैठकर
एक भूखा शायर,
अपने लिखें दीवान को बेच नही पाया,

गर यही रात के अंधेरे में 
कोई औरत खड़ी होती,
तो ऐ "रंग"
उसकी जिस्म की दीवान के 
कुछ पन्ने फटे होते

Tuesday, 24 February 2026

बसंत हूं

( बसंत हूं )

मै रोज लद उठती हूँ"
आम के बौर सी,

गुलाबी शर्म ओढ़े!
ऐ,रंग--
मै अपने पिया के कमरे की
"बसंत हूं "

उम्र की किताब

(उम्र की किताब)

पुरे बदन में--
झुरझुरी सी उठ रही,

हे सखी!
बसंत पढ़े छेड़-छेड़,
मेरे उम्र की किताब.

Monday, 23 February 2026

कसाब की बात

(कसाब की बात)
गर्त में शिक्षा और किताब की बात,
चरित्रहीन भी करने लगे अब नकाब की बात!
पुरे साल फूकते रहे जो बागे गुलिस्ताँ-----
वे भी कर रहे अब गुलाब की बात।
थू कितनी गिर गयी है राजनीति,
कि चुनाव जितने के लिये एै"रंग",
करनी पड़ रही अमित शाह को भरे मंच से-
अब बरोजगारो के लिये जाब नही-------
बल्कि अर्थ बदल के एक आतंकी कसाब की बात।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और मेरे चुनावी कटाक्ष।

दर्द के हरम में है

(दर्द के हरम मे है)

नहाने दे-
गीरने दे,ये अश्क़े गुलाब जल,
बढ़ेगी इससे तड़प की खूश़बु।
ऐ,रंग-
जानता है,
उसकी याद अब भी,
मेरी दर्द के हरम मे है।

पेट्रोल सी लागे है

(पेट्रोल सी लागे है )

वे धीरे-धीरे मुझको कब्जाती जा रही है,
अपने रूप के जादू से,

ऐ "रंग" मुझे अब वे 
अच्छे दिन के धोखे में--
पेट्रोल सी लागे है.

(आवारा शाम हूं)

(एक आवारा शाम हूं )

धुँधला जाते है,ऐ "रंग"
मेरी आगोश मे चेहरे,मै शरीफ़ो के शहर की,एक आवारा शाम हूं.

पाक से मत हारना

(पाक से मत हारना)

पड़ोसी देश की 
उड़ी हुई खाक से मत हारना,
लड़ना उस हद तक,
जहां जीत हो 
तुम्हें कसम है हम प्रशंसकों की 
कि तुम 
हमारे क्रिकेट की नाक से मत हारना.

हारने को क्रिकेट में और भी देश है 
हम कुबूल लेंगे 
लेकिन तुम
चढ़ना तो फिर चढ़ते चले जाना 
तुम सूरज हो 
उनके धोखे की 
डूबती चांद से मत हारना 
तुम्हें कसम है
पाक से मत हारना.

✍️✍️आखिरकार भारत नहीं हारा 🇮🇳🇮🇳🙏🙏

@@रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी,मियाँपुर 
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
rangnathdubey90@gmail.com

Saturday, 21 February 2026

दैहिक रसखान

(दैहिक रसखान हो)
हे गायत्री प्रजापति-----------
तुम सच मे महान हो,
इस चुनाव के तुम श्रेष्ठ आइकॉन हो!
मोदी क्या? कहेंगे तुम्हे कुछ,
उन्हे मालूम नही कि तुम---------
उस रेप वाली महिला के दैहिक रसखान हो।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और मेरे चुनावी कटाक्ष का।

आवारा शाम हूं

(एक आवारा शाम हूं )
धुँधला जाते है एै "रंग"----------
मेरी आगोश मे चेहरे,
मै शरीफ़ो के शहर की----
एक आवारा शाम हूं ।

आवाज रख दे

ऐ वक्त––
अपनी शहनाई
और साज रख दे!

माथे पे इसके 
तू अपना हाथ रख दे !

इस रेडियो के "जफर" ने 
ताजिंदगी आवाज दी है
इसके सिरहाने
"गीतमाला" ना सही 
तो तू 
किसी के सिसकने कि
आवाज रख दे .

अलविदा अमीन सयानी 😢😢🙏🙏

Friday, 20 February 2026

गोद लिए बेटे

(दो गोद लिये बेटे)
एै सत्ता तेरी खातिर-----------
किसी ने अपनाया तो किसी ने छोड़ दिये बेटे!
देख लो दशरथ और कैकेयी के इस प्रदेश को,
कि एै"रंग" कह रहे है कि बदल देंगे,
खुशहाली से इसकी शक्लो-सुरत--------
गुजरात से दो गोद लिये बेटे।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और आज के हमारे चुनावी कटाक्ष का।

जुड़े का गुलाब

(जूड़े का गुलाब)👌👌💐
अब भी रखा है,हमनें अपने कमरे में,
उनके जूड़े का गुलाब।
वही ख़ुशबू, वही सुगंध, वही चाहत,
ऐ"रंग"हमसे गुफ़्तगू करता है,-------
उनके जूड़े का ग़ुलाब।।👸👨😍😍💟🌹🌹🌹🌹

हर साल खिलती है

(हर साल खिलती है।)💐💐
जो लगाई थी तुमने ------
कह के अपने मोहब्बत की निशानी,
वे गुलदावदी---------
तुम्हारी तरह हर साल खिलती है।।।🌺🌻💐🌸😍😍💟💟

दर्द की मीना कुमारी

(औरत दर्द की मीना कुमारी है)

औरत प्यार मे
इस कदर डुब जाती है,
कि वार देती है खुद को,
फरेब की बाँहो मे।
फिर रोती बहुत है--
तन्हाई-घुटन जीती है,
बनके सुलगती है गीली लकड़ी,
ऐ,रंग--
औरत दर्द की मीना कुमारी है।

रेखा हूं

(रेखा हूं)

मैं---
मुख्यमंत्री नहीं
अपनी पार्टी की निर्णय रेखा हूं .
 
मैं ––
तेज और अध्यात्म में जहां 
स्वामी विवेकानंद हूं 
तो वहीं 
राजनीति हुंकार में
मैं राम राज्य की प्रत्यंचा हूं .

लड़ना जानती हूं 
छात्र जीवन से, 
मुझे छेड़ना मत 
मैं गिनना जानती हूं सिंहों के दांत 
मैं––
इस भगवा बाने में
भारत में जन्मी स्त्री भरत के 
ललाट की रेखा हूं.

मैं ––
मोड़ दूंगी घोड़े का रुख 
कुचल दूंगी 
दिल्ली के दुश्मनों की छाती 
मैं भी 
राष्ट्र की खातिर 
अपने वात्सल्य को
पीठ पर बांध सकती हूं .

मैं ––
लांघ सकती हूं 
दिल्ली के हित के लिए सारी सीमाएं 
मैं लक्ष्मीबाई का प्रतिरूप 
तो 'सुषमा स्वराज' सी मेधा हूं. 

मैं ––
मुख्यमंत्री नहीं
अपनी पार्टी की निर्णय रेखा हूं.

✍️✍️"दिल्ली के फैसले को दिल से बधाई"🙏🙏

रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियाँपुर 
जौनपुर-222002 (U P)
rangnathdubey90@gmail.com

Wednesday, 18 February 2026

तुम कोई

तुम कोई कविता नहीं लिख सकते 
शेर नहीं लिख सकते 
गजल नहीं लिख सकते 
कोई बात नहीं 
बस कागज पर 
तुम मोहब्बत से 
जिसे चाहते हो उसी का नाम लिख दो

रोटियों के जलने के निशान

(रोटियो के से जलने के निशान मिलते है)
अँधेरी रात वे औरत है--------
जो सिसकती है फूटपाथ पे होंठ कुचलकर!
इसे पति की छुअन नही मिलती,
इसके पुरे बदन पे ऐ,रंग---------
बस रोटियो के से जलने के निशान मिलते है।

सावधान समाने चुनाव है

(सावधान!सामने चुनाव है)
सावधान!
सामने चुनाव है।
आपको अपना बताना------
इनका राजनीतिक दाव है!
सावधान !
सामने चुनाव है।
इतने दिन याद नही आये,
अब कहते है----------
ये इनके पुरखो का गाँव है!
सावधान!
सामने चुनाव है।
मुसहर बस्ती की दशा ज्यो की त्यो,
भूखो मरा बुनकर,
उसकी बेवा के सामने घड़ियाली आँसू,
कुछ करने के वादे--------
चेहरे पे ताव है!
सावधान!
सामने चुनाव है।
झोपड़ी की रोटी-चटनी छक रहे,
खाट पे बैठे हँस रहे-------
बढ़ा काका और काकी से इनका लगाव है!
सावधान!
सामने चुनाव है।
इनका चरित्र समझ से परे,
एै,रंग----ये लोकतंत्र की आड़ है,
वरना कोयल की कुक में-----
ये कौवो की काँव है!
सावधान!
सामने चुनाव है।
@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर----222002
mo.no.7800824758

धन्यवाद!दैनिक भारत संवाद के संपादक बड़े भईया अशोक सत्यवीर जी का जिन्होने आज के साहित्यिक परिशिष्ट मे मेरी कविता"सावधान!सामने चुनाव है"को अपना बहुमूल्य स्नेह दिया।

सपेरे की बिटिया

(सपेरे की बिटिया)
कभी पढ़ने आती थी हमारे स्कूल में,
सपेरो की बस्ती से---------------
एक सपेरे की बिटिया।
वे तमाम किस्से सुनाती थी साँपो के अक्सर,
वे खुद भी साँपो से खेलना जानती थी,
पर वे मासुम नही जानती थी,
इंसानी साँपो का जहर,
एक दिन-----------
उसी मासूम की नग्न लाश,
उसकी बस्ती से पहले--------
पड़ने वाले एक झुरमुट में पाई गई,
मै सिहर गया!
उस नग्न मासूम की लाश देख,
मै अब भी इतने सालो बाद भी-----
अपनी उस मासूम छात्रा को भूल नही पाता,
हर नाग पंचमी को वे मेरी जेहन मे
उभर आती है,
और पुछती है मुझसे कि बताईये न सर,
कि कैसे चुक गई,
अपने पुरे बदन पे रेंगे हुये नाखूनि साँपो से,
एक सपेरे की बिटिया।
@@@आप सभी को नाग पंचमी की बधाई।
## # रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
एडवोकेट कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।

सुलगती सिगरेट

लगाये बैठा है—————-
होंठो पे अपनी वे सुलगती सिगरेट!
बगल में अनगिनत टुकड़े गिरे है,
धुआँ है!
उस कमरे में जिस कमरे में कभी तुम,
छिन के फेक दिया करती थी,
उसकी अधजली सिगरेट।
अब होंठ पे लगा भुल जाता है,
वे तो सुलगते-सुलगते,
जब होंठ के आखिरी सिरे पे पहुँचती है,
तो वे चौकता है!
फिर जला होंठो पे रख लेता है,
वे अपने एक नई सिगरेट।
और तकने लगता है दरवाजे की तरफ,
कि शायद तुम लौट के आओ,
छिन के फेकने इसके होंठो से,
अधजली सिगरेट।
एक सुबह———-
दरवाज़ा खुला था लोगो की भिड़ थी,
शायद कुछ देर पहले ही मरा है,
क्योंकि—————-
अभी भी उसकी होंठो पे एै,रंग
धीरे-धीरे आगे बढ़ रही बुझने के लिये,
बिल्कुल इसके जीवन की तरह——-
ये सुलगती सिगरेट।

केंडिल नाइट

बहुत उदास है—————
आज हमारे तुम्हारे मोहब्बत की,
कैंडिल नाईट।
मै वही बैठी हूँ ठिक सामने,
बस वे जगह खाली है-
जहां तुम बैठते थे,
आज बहुत उदास है मेरे अंदर जिंदगी,
मै टुट रही हूँ!
मेरे संग बीत रही है,
बस तुम्हारे खूबसूरत यादो की—–
कैंडिल नाईट।
शायद कही चुक गये हम,
इसी से हमारे रिश्ते में गलतफ़हमी बढ़ती गई!
तुम अलग हो गये मै अलग हो गई,
अब तो अक्सर————–
डिनर मेज पे ही रह जाता है,
और मै कुर्सी पे बैठी यु ही,
गुजार देती हू————-
अपनी कैंडिल नाईट।
गर गुंजाइश हो तो लौट आओ,
एक मर्तबा ही सही मुआफ करने,
क्योंकि ऐ,रंग—–कही ऐसा न हो,
कि तेरा इंतजार करते-करते,
हमेशा के लिये बुझ जाये,
मेरी ये कैंडिल नाईट।

मुसलमान में बांटकर

(मुसलमान मे बांटकर)
मडरा रहे है------------
हमारी खुशियो के आसमान पर,
देखो गिद्ध से चुनावी हेलिकॉप्टर!
ये जितेंगे,हारेंगे तभी एै"रंग"------
जब ये हमारे शहर से उड़ेंगे,
हमें हिन्दू और आपको मुसलमान में बांटकर।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और आज के मेरे चुनावी कटाक्ष का।

(पूजा या अजान से ढकती है)

(पूजा या अजा़न से ढ़कती है)
मुझे उस मजबूर औरत की----------
टूटी चुड़ियो की आवाज़ ईधन की लगती है,
वे अपने ग्राहक की गर्म साँसो पे,
अपनी मजबूरीयो का-------------
कई दिनो से पड़ा हुआ ठंडा तवा रखती है।
उसकी चीख और पीड़ा में,
उसके भूखे बच्चो के खाली पेट भरने वाली रोटी-----------------
की खुशी दिखती है।
वे अपने कपड़े समेट ब्लाउज पहन,
जब अपनी उरोजो में ये रुपये रखती है,
तभी उसकी नज़र उसी कमरे मे--------
टंगे हुये एक माँ के नंंगे उरोज वाले,
कैलेंडर पर पड़ती है,
जो अपने मासूम बच्चे का पेट इसी उरोज से भरती है।
वे एक मर्तबा फिर-------------
इस कमरे मे से निकलने से पहले,
अपने बंद ब्लाउज में--------------
रंखे पैसो को अपने जख्मी उरोजो के बीच टटोलती है।
न जाने क्यू उसके वे दोनो उरोज,
हमारे दो किरदार से लगते है!
एै,रंग-----मुआफ करना
मैले हो जाते है फिर भी कभी-कभी ,
कुछ औरतो के यही उरोज,
चाहे वे इसे पूजा के आँचल या-------
किसी मस्जिद के अजान से ढ़कती है।

ओढ़नी

ओढ़नी
याद है बचपन---------
मैं पहले कहाँ ओढ़ती थी ओढ़नी।
वे तो जब मैं तेरह की हुई,
तो अचानक-माँ ने डाँटना शुरु किया,
और कहने लगी-----------
अब अपने सीने पे तुम रंखा करो ओढ़नी।
मैं चौंकी-----------------
कि ये अचानक माँ को क्या हुआ?
फिर लगा नही कुछ तो है,
यूँही नही माँ रखवाना चाहती होगी----
सीने पे ओढ़नी।
फिर कमरे में बंद कर,
खुद को शीशे में टटोलने लगी,
तो अचानक कुछ शर्म सी आई,
कुछ बदला सा था,
जहाँ माँ ने कहा था-रखने को ओढ़नी।
मै बाहर निकली----------
तो देखा बचपन को खिसकते,
लगा माँ कि कितना सच कह रही थी,
कि तु सयानी हो रही है,
क्योंकि कुछ लोग तक रहे थे,
एै,रंग------वही जहां माँ ने कहा था,
रख लो तुम ओढ़नी।
### # एक सयानी होती हुई लड़की के वे तमाम चित्र इस रचना में है!गर सच लिखु तो इस कविता की ओढ़नी वाली वे तेरह साल की लड़की बन मैने--इस कविता को जिवंत लिखने की कोशिश की है,इसपे मै कितना खरा उतरा ये तो आप सभी सुधीजन पाठको पे।

(औरत के अंग)

(औरत के अंग)

हा मै औरत हू-----------
इसलिए तो तुम्हारे उन अंग विशेष,
को मै तकने भर से जान जाती हू,
कि तुम्हारी मंशा मेरे उन अंगो के-----
बस नोचने-खसोटने और मसलने से है।
जबकि एक औरत के वही अंग विशेष,
अपने पती के प्यार पाने के वक़्त भी,
शर्म ओढ़े रहते है,
क्योंकि उसमें किसी तरह की नोच-खसोट नही,
बल्कि एक-दुसरे के परम विश्वास का देव श्पर्श है।
हा!शायद तुम्हारा पुरुषपन अंदर से सध नही पाता,
किसी एक समर्पित अंग से बध नही पाता,
वरना तकते तो तुम्हें भी अपनी पत्नी का वे अंग,
उतना ही आकर्षित करता------------
जीतना की पर स्त्री या औरत का।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

Tuesday, 17 February 2026

सरकार करती है

(सरकार करती है)
जो सिनेमा में-------------
पैसे लेकर हर व्यभिचार करती है,
वही नायिका-----------
हमारे शहर में चुनाव प्रचार करती है!
शायद किरदार-किरदार का फरक है,
वरना एै"रंग"-----------
वही काम हमारे यहाँ सरकार करती है।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758
धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और मेरे चुनावी कटाक्ष का।

जींस और टी शर्ट

(जींस और टी-शर्ट वालि औरते)
मुझे ये जींस और टी-शर्ट पहनी औरतो से,
ज्यादा खूबसूरत लगती है--------------
घर की गृहस्थ साड़ी पहनी औरते।
जिम्मेदारियो की इनके लोच और खम की रोमांटिकता,
मेरे अंदर एक सिहरन भर देती है,
उसके बालो का इधर-उधर का बिखरापन,
फिर उसकन लिये,
जूठे पड़े घर के बरतनो का माजना,
और उसपे हल्की-हल्की चुड़ियो की आवाज का संगीत,
ये संगीत क्या जाने?
क्लब मे भौंडे म्यूजिक पे थिरकती------
ये जींस और टी-शर्ट वाली औरते।
सेक्स अपील की विद्रुपता और अश्लील फिगर से,
कही ज्यादा खूबसूरत लगती है,
अपनी साड़ी खोसे,
उस गृहस्थ औरत का थकी-मादी उठ,
टाॅवल ले बाथरुम में,
शाॅवर के नीचे नहाना,
उसके नहाने की शालिनता का ये शास्त्रियपन,
को क्या जाने?
स्विमिंग-पुलो मे अर्धनग्न नहाती-------
ये जींस और टी-शर्ट वाली औरते।

@@@इस रचना का आशय किसी माडर्न या आधुनिक औरत को आहत करना कतई नही है ये महज़ एक रचना मात्र है।

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Monday, 16 February 2026

एक्सीडेंट वाला फुटपाथ दिया है

(एैक्सीडेंट वाला फुटपाथ दिया है)
अखिलेश कह रहे है कि हमने-----------
सौ,एक सौ दो और एक सौ आठ दिया है,
यानि की विकास मे सबका साथ दिया है!
देख लिजिये यमुना ऐक्सप्रेस वे,
लेकिन जनता तो ये भी पुछेगी मेरे सीयम(CM),
कि आपके चचा ने पुरे प्रदेश को हर कही खुदी सड़क---------
और ऐक्सीडेंट वाला फुटपाथ दिया है।
@@@रचयिता-------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और आज के मेरे चुनावी कटाक्ष का।

Saturday, 14 February 2026

चुनावी कटाक्ष--(चांदी का आकाश देंगे)

(चाँदी का आकाश देंगे)
हर गरीब को-----------------
एक नल,एक आवास देंगे!
विधवा को पेंशन,नंगे को लिबास देंगे,
गाँव मे बुनकर के फिर अच्छे दिन आयेंगे,
ये एैसा विश्वास देंगे।
यही तो नेता कि खूबी है एै"रंग"
कि ये चुनाव तलक अपने मुँह से-----
सबको सोने की धरती और चाँदी का आकाश देंगे।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758
धन्यवाद!निर्मेश के त्यागी भईया,दैनिक वर्तमान अंकुर और हमेशा की तरह मेरे चुनावी कटाक्ष का।

कारगिल रह गया

(करगिल रह गया)

सरहद से नही लौटा,
एक नई दुल्हन का वही दिल रह गया.
सीने पर थे, गोलियो के निशान,
उसकी खुली आँखो मे,
लहराता तिरंगा और करगिल रह गया.

माँ भुलती नही जार-जार रोती है,
उसे गम नही,
अपने एकलौते बेटे की शहादत का,
उसे गम है कि सरहद के उस तरफ,
तमाम साँप--
और उन साँपो का बील रह गया.

राखी के दिन बहन उसकी---
बंद कमरे मे सुनती है राष्ट्रगान,
और फक्र करती है 
अपने उस भाई पर 
ऐ "रंग"----
जिसकी वजह से 
हिंद के नक्शे में करगिल रह गया.

😢😢पुलवामा अटैक---पहले मुल्क शहिद उनकी शहादत फिर चौदह फरवरी यानि "मां तुझे सलाम"🙏🙏 

यह रचना मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित हैं.

रचनाकार--- रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियापुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
rangnathdubey90@gmail.com

Wednesday, 11 February 2026

(घिनौने अतीत रहे हैं)

(घिनौने और घृणित अतीत रहे है)
मथुरा के----------------
एक प्रत्याशी महिला को पीट रहे है!
निर्लज्जता उसपे भी-----------
कि वे चुनाव अत्यधिक मतो से जीत रहे है।
वाह!रे पार्टियो के चरित्र-----------
कि तुम्हारी पार्टियो से अब टिकट भी वही पा रहे,
जिनके जितने घिनौने और घृणित अतीत रहे है।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

धन्यवाद!डेली वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और मेरे चुनावी कटाक्ष का।

Monday, 9 February 2026

पत्रकारों पर एक टिप्पणी

✍️✍️हमारे समय के कुछ पत्रकार कॉलगर्ल सरीखे हो गए हैं जो अखबारों के बदन पर अपने पत्रकारिता की वेश्यावृत्ति लिख रहे हैं 😢😢

Saturday, 7 February 2026

अपनी घमंड का चुनाव

(अपनी घमंड का चुनाव)
झूठ,छल,फरेब और पाखंड का चुनाव
सभी इसी तरह लड़ रहे है-------------
उत्तर-प्रदेश और उत्तराखंड का चुनाव!
कुछ लोग कई मर्तबा जीते है,
उन्हे लग रहा कि अब नही हारेंगे,
अपने विधानसभा से-------------
एै"रंग" अपनी घमंड का चुनाव।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

धन्यवाद!आपका दैनिक वर्तमान-अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और मेरे इस चुनावी कटाक्ष का।

व्यंग्य

😃😄जो लड़का आपके घर में सर्वाधिक झूठ बोले,,उसका मुंह बीच-बीच में मीठा कराते रहे,,क्योंकि वह भविष्य में विधायक या मंत्री हो सकता है😃😄

नूतन

(साड़ी के आंचल को, दांतों से काटती है )

थोड़ी डरती,थोड़ी कांपती थी,
जब हमारी प्रेमिका 
कबूतर के गले में खत बांधती थी.

वह नूतन थी 
हमारे मोहब्बत की ,
जो बोलने से पहले 
शरमाती 
अपनी अंगूलियों से 
दुपट्टे को
लपेटती, छोड़ती 
और दांतों से काटती थी .

हमने शादी की है 
अपनी उसी नूतन से 
जो शादी के 
इतने सालों के बाद भी 
नहीं बदली ,
वह अब भी 
मेरी रोमांटिक बातों पर 
अपनी दांतों से दुपट्टे तो नही
लेकिन हां !
अब वह हौले-हौले 
अपनी साड़ी के आंचल को 
लपेटती, छोड़ती 
और दांतों से काटती है.♥️♥️

"आई लव यू मेरी नूतन" चित्र गुगल से साभार 

रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियाँपुर 
जौनपुर--222002 (U P)
rangnathdubey90@gmail.com

Friday, 6 February 2026

बेवकूफ मुसलमान नही

(बेवकूफ मुसलमान नही है)
सपा,बसपा किसी कि भी राह आसान नही है,
अपनी जीत पक्की बताओ लेकिन गौर करो-------
तो तुम्हारी चीख मे वे जान नही है!
बस मुसलमान-मुसलमान तुम सब रट रहे,
शायद अबकी उत्तर-प्रदेश,
तुम्हारी नज़र मे हिन्दुस्तान नही है!
एै"रंग" सारा मुलम्मा तेरे धोखे का उतर जायेगा------
क्योंकि इतना भी बेवकूफ मुसलमान नही है।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

धन्यवाद!आपका दैनिक वर्तमान-अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और हमारे चुनावी कटाक्ष का।

Thursday, 5 February 2026

खाली पोटली का बजट है

(खाली पोटली का बजट है)
कौन कह रहा----------
कि ये महज अरुण जेटली का बजट है!
अरे सच तो ये है कि---------------
ये एक चायवाले पीयम(P.M.),
की खौलती हुई केतली का बजट है।
किसी की जीभ जल रही,
तो कोई ले रहा मजा चुस्कियो के संग,
और बेचारे राहुल जी कह रहे,
कि एै"रंग" ये महज चुनाव की खातिर-----
एक खाली पोटली का बजट है।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-------7800824758

धन्यवाद!निर्मेश के त्यागी भईया,दैनिक वर्तमान अंकुर और मेरे इस चुनावी कटाक्ष का।

मंदिर और मस्जिद की बगल से

एक दिवाने की मईयत व लाश के कुछ चंद ख्व़ाहिसात-------------
     (मंदिर या मस्जिद के बगल से न ले जाना)
दोस्तो एक गुजारिश है कि,मेरी मईयत या लाश को-------
किसी भी मंदिर या मस्जिद के बगल से न ले जाना।
मै दिवाना हूँ,काफ़िर हूँ सुन लुंगा,
पर भगवान या अल्लाह के दर दोनो मे सर झुकाया है,
मुझे हिन्दू या मुसलमां बनके नही,
एै दोस्त आखिरी ख्व़ाहिश है,
कि मेरी मईयत को खुले मे रख देना,
चील,कौवे खायेंगे गम नही,
मगर एै दोस्त मेरी इस लाश को--------
एैसी किसी भी बस्ती से न ले जाना।
दोस्तोएक गुजारिश है कि मेरी मईयत या लाश को---
किसी भी मंदिर या मस्जिद के बगल से न ले जाना।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर (उत्तर--प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Wednesday, 4 February 2026

टिप्पणी

✍️✍️कुछ कवित्रियां जाने अनजाने कवि सम्मेलनों की सिल्क स्मिता बन गई है,,उनके दो अर्थी काव्य पाठ और चुटकुले ऐसे हैं कि जिनसे श्रोताओं को बी ग्रेड की अश्लील फिल्मों का सारा आनंद मिल रहा😢😢

Tuesday, 3 February 2026

व्यंग्य

हंसने और जबरदस्ती खीस निपोरने में बहुत अंतर है🥸हंसने से आप लंबे समय तक स्वस्थ्य रह सकती हैं और जबरदस्ती खीस निपोरने से आपके खूबसूरत गालों की मांसपेशियों में खिंचाव आ सकता है♥️✍️

चुनावी कटाक्ष

(बाढ़ के मेढक)
टर-टरा रहे है------------
हर गाँव,हर गली,हर घर
कुछ चुनावी अषाढ़ के मेढक!
सब पिअराये हुये कुद रहे है जहां-तहां,
रहने दो खुद ही लौट जायेंगे,
एक-एक वोट से हमारे,
फिर हमे ये दिखेंगे एै"रंग" अगले चुनाव में--
ये चुनावी बाढ़ के मेढक।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और हमेशा की तरह चुभने वाले चुनावी कटाक्ष का।

Sunday, 1 February 2026

चुनावी कटाक्ष

चुनावी कटाक्ष----बुधवार
(बनारस की मणकणिका घाट तक लायेंगे)
वाह री!राजनीति---------------
कि अब दो नाजायज़ संबंध,
संगम की घाट पे नहायेंगे!
इस उम्मीद मे कि मोदी और शाह को,
बिहार की तरह पराजित कर,
एै "रंग"उनकी सियासी लाश को उन्ही की--
बनारस के मणकणिका घाट तक लायेंगे।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-------7800824758
धन्यवाद!आपका निर्मेश के त्यागी भईया,दैनिक वर्तमान-अंकुर और मेरे चुभते हुये चुनावी कटाक्ष का।

बीसों बसंत मैं सजी

(बीसों बसंत मैं सजी)

बीसों बसंत मै सजी---
पोर-पोर गदराई खुद को देख-देख,
बीसों बसंत मै सजी.

कोयल हुई बाँवरी-
बागो में कूक-कूक कर,
भँवरा हुआ पागल महुवे को चुमकर,
मेरे अधर कुँवारे,
मै कुँवारी अंग-अंग---
बीसों बसंत मै सजी.

यौवन कलश छलके बूँद-बूँद कर,
आँखे हुई बाँवरी मेरी
 पिया दरस को,
हे!बसंत सखी अब तुम----
कोई ऐसी बान मारो
कि आये बाबुल के गाँव अब,
मेरे पिया की डोली,
और मै बैठ चलूं उसमे 
अपने पिया के गाँव,

फिर मैं छुईमुई सी बैठूं
सुहाग सेज पर 
वे घूंघट मेरी उठाए,
मै शर्म से सिमट जाऊं 
और मूंद जाएं मेरे 
मद भरे नयन 
और उनके छुवन की सिहरन,
से कांपे अधर मेरे,
और मैं 
इस कंपकपी की रात को,
जतन कर सहेजे,
अपने बीसों बसंत जीलूं.
बीसों बसंत मै सजी.

यह रचना मेरी स्वरचित और अप्रकाशित है.
चित्र गुगल से साभार.

रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर--222002 (U P)
rangnathdubey90@gmail.com

Friday, 30 January 2026

घोषणा

व्यंग्य लेख
(चुनावी घोषणापत्र)
मै आज कई वर्षो से हर पार्टी के चुनावी घोषणापत्र को---काफी भावुक तरीके से पढ़ता व सुनता हु लेकिन हर मर्तबा मेरे हिस्से "एक ना खत्म होने वाला विस्फोटक दुख हाथ आता है,और वे दुख मेरे लिये विश्व के प्रथम दुख की तरह है" अर्थात--घोषणापत्र के किसी भी क्रम मे वे लाइन आज तक नही दिखी कि इस देश अर्थात प्रदेश के कुँवारो के लिये,खासकर जो विषम आर्थिक तंगी की वजह से"स्त्री-पुरुष के अश्वमेध मिलन से वंचित है -उन पिड़ित कुँवारो को हमारी सरकार बनते ही,सर्वप्रथम उन्हे एक योग्य व सुशील कन्या की व्यवस्था कर वैवाहिक जीवन से आहलादित किया जायेगा"।
अगर एैसा संभव न हुआ तो जनपद स्तर पर किन्ही अन्य देशो से या यहां न मिलने की सुरत मे बाहरी गरीब देशो की कुँवारी लड़कियो का आयात कर उनकी गरीबी दुर करने के साथ ही समुचित सरकारी अनुदान की व्यवस्था के साथ ही एक हफ्ते का निःशुल्क हनिमून पैकेज दे उन्हे पती-पत्नी की मुख्यधारा मे लाने का अलौकिक प्रयास करेगी।
अब इस बार तो किसी तरह बस दुखी मन से मतदान कर फिर किसी अगले चुनाव में "ये राष्ट्रीय दुख लिये इंतजार करुंगा----शायद किसी पार्टी या नेता को हमारे इस बड़े विकराल और असह्य कुँवारेपन के दुख का आभास हो और वे इस क्रांतिकारी पिड़ा को अपने चुनावी घोषणापत्र में जगह दे हमारे इस विशाल बंजर हृदय में दुल्हन रुपी सुरत की हरितक्रांति ला इस पिड़ा का नैसर्गिक निदान करे"।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758
धन्यवाद!आपका निर्मेश के त्यागी भईया मेरे इस व्यंग्य लेख को दैनिक वर्तमान अंकुर में सस्नेह जगह देने के लिये।

बेटियां

(बेटियां)

वे देखो हंस रही हैं
आंख में आसूं लिए 
भ्रूण में मार डाली गई बेटियां,

कातिल मां भी 
पछता रही 
कि क्यों उसने मार दी 
आखिर 
बेटे की चाह में
अपनी पेट में पल रही 
कई बेटियां 

जिस खेल में
सर झुका आए थे 
तमाम बेटे
उसी खेल में जीती
और हमारी आइकान,
हुई बेटियां 🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳

रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियापुर
जौनपुर,(U P).

कोटा

मै किसी भी मां बाप को अपने बच्चों का कातिल नही लिख सकता,,,,,लेकिन कोटा में कोचिंग करने वाले बच्चों का इस तरह सुसाइड करना अघोषित रूप से हम सभी के द्वारा किया गया उन बच्चों का एक ऐसा कत्ल है जिसके हम आप सभी कातिल है,,,,

"मुझ मासूम का गला
आप सभी की महत्वाकांक्षाओं ने घोटा,
क्या प्रयाग,क्या कोटा,,,

बस खुदकुशी,लाश
और एक पन्ने के सुसाइड नोट्स में 
मै हार गया
सॉरी,मॉम और सॉरी पापा
फिर आंसू याद बेटा
और कोटा .

बस!
इतना करना 
पापा और मॉम 
अपनी महत्वाकांक्षा का बोझ लादे 
फिर मत भेजना
मेरे छोटे भाई बहन को
तैयारी करने 
या खुदकुशी करने 
प्रयाग या फिर
कोटा 😥😥😥😥😥

Thursday, 29 January 2026

डॉक्टर अजय शर्मा

Dr Ajay Sharma ----

पंजाब के एक ऐसे उपन्यासकार हैं जिनके लिखे उपन्यास पंजाब के विभिन्न विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम मे पढ़ाए जा रहे.

(1) एम. ए. के कोर्स में "बसरा की गलियां"--गुरू नानक देव विश्वविद्यालय अमृतसर व पंजाब विश्वविद्यालय पटियाला में.

(2) एम. ए. के कोर्स में "कुमुदिनी"--पंजाब सैंट्रल यूनिवर्सिटी बठिंडा.

(3) प्रभारक के कोर्स में शामिल "चेहरा और परछाई"--पंजाब विश्वविद्यालय पटियाला.

 "खेलै सगल जगत" यह महत्वपूर्ण उपन्यास उन तमाम मुसलमानों के नाम हैं जिनके पूर्वज कभी हिंदू थे. यह उपन्यास कोरियर से अभी-अभी मुझे प्राप्त हुआ है. लेकिन यह उनके लिए उपन्यास होगा, मेरे लिए तो यह "एक साहित्य ग्रंथ हैं" जिसे मैं अपने मस्तक रखता हूं. डॉक्टर अजय शर्मा मेरी और आने वाली पीढ़ी की एक जीवित साहित्य वसीयत है. वैसे पंजाब साहित्य में शिव कुमार "बटालवी", अमृता प्रीतम और खुशवंत सिंह जैसे नाम के बाद एक नाम और है, जिन्होंने अपने समय के पंजाब साहित्य को समृद्ध किया है. मैं ऐसी समृद्धता के बोधि वृक्ष का स्नेह पा सका. यह मेरा सौभाग्य नहीं तो और क्या है? खैर इस विषय की भूख मेरे पाठक और लेखक मन में बहुत पहले से थी अब तो यह उत्कंठा बन गई और तब तलक बनी रहेगी जब तक कि मैं इस उपन्यास को पूरा पढ़ नहीं लेता .

वैसे एक मजेदार बात मेरे लिखने से छूट रही थी लेकिन अचानक लगा कि, नहीं यह बात मेरे लिखने से छूटनी नहीं चाहिए. दरअसल शर्मा सर की उम्र मेरे पिता की उम्र के समकक्ष हैं लेकिन मेरा संबोधन हमेशा बड़े भैया ही रहा इससे मुझे उनके अनुज होने के सुख के साथ ही साहित्य छात्र होने का सुख भी मिल रहा.

साहित्य सिलसिला पब्लिकेशन,कपूरथला रोड, जालंधर से प्रकाशित इस उपन्यास का मूल्य 200/ रुपए रखना समस्त साहित्य पाठक के लिए उनका एक उपहार ही कहा जा सकता है.
सादर प्रणाम ✍️ ✍️ 🙏🙏

कैशलेश इलाज

कैशलेस इलाज 
के फैसले का हार्दिक स्वागत है 
बस एक सम्मान जनक राशि उन दस हजार,पंद्रह हजार संविदा और आउट सोर्सिंग मात्र ग्यारह माह तक पाने वाले 

Wednesday, 28 January 2026

UGC

याद रखना यूजीसी (UGC) पर खामोश रहने वालों, 
कल तुम हमारी बस्तियों में वोट मांगने आओगे,
 
हमारे लिए दलित मुद्दा नहीं, 
क्योंकि उत्पीड़न,उत्पीड़न है 
किसी छात्र की धर्म या जाति नहीं,


लेकिन तुम किस मुँह से 
कल इस अन्याय को 
न्याय की तरह समझाओगे,
लोकतंत्र है नेताजी 
एक बार नजर से उतरे 
तो तुम समझ लेना 
फिर तुम 
अपने इस सत्ता से उतर जाओगे 








चुनावी कटाक्ष विनय कटियार की भाषा

(विनय कटियार की भाषा)
भूल रहे है------------------
चुनावी शुरुवात मे ही,
सारे संस्कार की भाषा!
इससे निकृष्ट क्या?होगी------
व्यभिचार की भाषा!
कि एै"रंग" चुभ रही देखो,
प्रियंका को खूबसूरत कह रहे-------
भाजपा के विनय कटियार की भाषा।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758
धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और आज की एक नई चुभन लिये हुये मेरे चुनावी कटाक्ष का।

कुंभ में

कुंभ में 
सबरी और कुबडी में भेद नही है.

वाल्मीकि और रैदास 
डुबकी लगा रहे 
तुम भी नहा लो,
हमें कोई खेद नहीं है.

तुम्हें चीढ़ है 
विश्व कल्याण के मंत्र से 
क्या करोगे 
यह तुम्हारी गलती नही ?

तुम जिस पार्टी से जुड़े हो 
उस पार्टी में बेटे के अलावा 
कोई सिद्धांत 
कोई वेद नहीं हैं.

रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियाँपुर 
जौनपुर--222002 (U P)
rangnathdubey90@gmail.com

Monday, 26 January 2026

चुनावी कटाक्ष

(मतदान जरुरी है)
तिरंगे के नीचे-------------
बाअदब राष्ट्रगान जरुरी है!
ठिक वैसे ही जैसे-इस विविधता के देश में,
हमारी पूजा के साथ-साथ----------
तमाम मस्ज़िदो मे अज़ान जरुरी है।
आओ हम वोट करे,
क्योंकि हमारे मजबूत लोकतंत्र के लिये,
एै"रंग" हमारा एक-एक वोट----------
और मतदान जरुरी है।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758
धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और मेरे आज के चुनावी कटाक्ष का।

Sunday, 25 January 2026

चुनावी कटाक्ष

चुनावी कटाक्ष-----बुधवार
(वीजेपी भी सियारो के घाट आ गई)
टिकट बटवारे से-------------
तेरे भी फरेबी चेहरे से मुखौटे उतर गये,
अब तेरे यहाँ भी एै दुध के धुलो,
वही सपा की तरह परिवारवाद की बात आ गई।
यानि की एै"रंग"----------------
अब वीजेपी भी उन्ही सियारो के घाट आ गई।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758
धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भइया और प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा कर चुभ रहे मेरे चुनावी कटाक्ष का।

Saturday, 24 January 2026

मुल्क जिंदाबाद

(मुल्क जिंदाबाद)
आने वाली सदियाँ करेंगी उसको याद,
उसने खून के कतरे से लिखा------
मुल्क जिंदाबाद।
ऐ हुश्ऩ आज इतनी कागज पे जगह छोड़,
लिखने दे हमे----ऐ रंग,
उसके कनपटी की आखिरी गोली-----
और मुल्क जिंदाबाद।

रूदाली रह गई

(रुदाली रह गई)

पुरे घोषणापत्र में-----------
दर्शक और उनकी ताली रह गई.

वाह!री दिल्ली की सियासत----
कि लोग पांच वर्ष तकते रह गये,
और अन्ना-हजारे के सम्मान की कुर्सी, 
उनके ही चेले 
अरविन्द केजरीवाल की वजह से 
खाली रह गई.

एै"रंग" इस टिश और चुभन की पिड़ा,
कि वे रोये तो नहीं,
पर लगा जैसे-----------
रेत भरी आँखो में उनके कोई रुदाली रह गई.

वे भी दिल्ली थी और ये भी दिल्ली है. 

विधानसभा चुनाव ---2020.

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no-----7800824758

नंदन पंडित

✍️✍️ आज ही के दिन डाक से "श्वेतवर्णा" से प्रकाशित नंदन पंडित का बहुचर्चित उपन्यास "रेती की सौंह" मेरी हाथों को प्राप्त हुआ था----

आज साहित्य में नंदन पंडित किसी परिचय के मोहताज नहीं है,उन्हें किसी विधा विशेष में बांध पाना संभव नहीं वह जिस भी विधा में लिखते हैं वहीं उनकी विधा हो जाती है चाहे वह गीत हो,नवगीत हो,कहानी हो,लघुकथा हो या फिर संस्मरण हो.यू तो नंदन पंडित का जन्म गोंडा जनपद के गजाधरपुर गांव में हुआ है,वह बेसिक शिक्षा विभाग में कार्यरत हैं लेकिन उनके उपन्यास की यह प्रेम कथा हमे हमारे गांव की उस महुआ और मंजरी के निस्वार्थ प्रेम तक ले जाती है जिसे हम आप शायद कही किसी गांव में छोड़ आए हैं.

इसके अलावा भी उनकी दो प्रमुख काव्य कृतियां (1)अंखुआ (गीत संग्रह)
(2)बोल कबूतर (बाल काव्य संग्रह)
ने अपने पाठकों के हृदय को ऐसा स्पंदित किया है कि इनकी इन दोनों कृतियों के काव्य रस के आचमन का पाठकीय भाव ज्यों का त्यों बना हुआ है.

हमारे उपन्यासों से गांव ऐसा गायब हुआ कि जैसे हम अपने गांव के एनआरआई हो गए हो,लेकिन ऐसे में मुझे एक फिल्म के गीत का वह मुखड़ा याद आ रहा कि--"घर आजा परदेसी तेरा देश बुलाए रे".वैसे गांव को बहुतों ने लिखा लेकिन"प्रेमचंद" और "फणीश्वर नाथ रेणु" ने जो गांव लिखा बस वही गांव जिंदा रह गया, आज भी फणीश्वर नाथ रेणु के उपन्यास पर राजकपूर की "तीसरी कसम" और फिल्मों में "नदिया के पार" कि गुंजा और चंदन को भला कौन भुला सकता है.

गांव की मोहब्बत आज भी महानगरों के लिव इन रिलेशनशिप जैसा नहीं है, वहां की मोहब्बत में सौम्यता है ,शिष्टता है,शालीनता है,शर्म और संकोच हैं,जबकि वही महानगरी मोहब्बत में एक अजीब सी छटपटाहट है, धुंध है, धुआं है,आक्रोश है,जबकि गांव की मोहब्बत आज भी एक दूसरे के लिए आरती का दिया है.

ऐसे में मुझे यकीन है कि नंदन पंडित के इस उपन्यास की भाषा इसके पात्र इसके कथानक "रेती की सौंह" के साथ हमारे दिल के भावों को पत्थर और कंक्रीट से निकाल कर उस संवेदना तक ले जाएंगे जहां कभी हम आपने भी किसी से मोहब्बत की होगी या किसी की प्रेम गाथा किसी के मुंह से सुनी होगी,,,,,,,,

वैसे इस उपन्यास को हाथ में लेते ही ऐसा लग रहा है कि जैसे कोई मुझसे कह रहा हो---

"इसके हर पन्ने में मेरी सांस है,मेरी नब्ज़ है,
जरा सलीके से पढ़ना मेरे महबूब,
तुम्हें 'रेती की सौंह' है".