Wednesday, 28 November 2018

काबुलीवाला

(काबुली वाला)
मै रोज देखती हूँ--------
खुली खिड़की से घंटो सड़क की तरफ,
ऐ,रंग----इस उम्मीद मे कि शायद--
कभी दिख जाये--------
वे मेरी बचपन का काबुली वाला।

Thursday, 22 November 2018

काँच का ताजमहल था

(काँच का ताज़महल था)
उस बेवफ़ा के हाथ से-----
गिरा और गिरके टुट गया,,,,,,,
ऐ,रंग----वे मेरा तोहफ़ा नही----
काँच का ताज़महल था।

Wednesday, 21 November 2018

मदिरापान किया है

(मदिरापान किया है)
हाँ मैने भी-----------------
यौवन के बोतल से अक्सर,
थोड़ा सा मदिरापान किया है।
जहां-जहां से भी छलका है----
मैने पैग भरे है!
हाँ काफिर होकर भी मैने--------
ये पूजा और अजान किया है,
थोड़ा सा मदिरापान किया है।
सच तो ये है कि यौवन को थोड़े-थोड़े,
तकते सब ही है,
सबकी लालच अलग-अलग है छिपी-छिपी,
बस मेरी खता यही है यारो----------
कि मैने इसको मान लिया है,
थोड़ा सा मदिरापान किया है।
इस यौवन की मदिरा ने-------
कई संत मौलबी छिन लिये,
इसकी अँगड़ाई ही एैसी है कि क्या किजै?
एै,रंग-----ये मदिरा माया है
जो हिचकी-हिचकी कड़वी है,
मैनै इस कड़वाहट के बोतल से
थोड़ा सा मदिरापान किया है।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no----7800824758

Sunday, 18 November 2018

कुरान सी लगती है

(कुरान सी लगती है)
हाँ!ये काफ़िरी है,मै कुब़ूल करता हूँ,,,,,,,,
कि ऐ,रंग---------मुझे-------
गरीब की बिटियाँ कुरान सी लगती है।

खपरैल के घर

(खपरैल के घर)
मिट्टी की सोंधी गंध,वे तितलियो के पर,,
वे खुला आसमान,वे पीपल की हवा---
सब कुछ टिसता है मेरी यादो मे।
ऐ,रंग--इस फ्लैट की घुटन से कही अच्छे थे-----------
मेरी गाँव मे खपरैल के घर।

मरुस्थल हो गया

(मरुस्थल हो गया)
जाने कब--------------
मेरी संवेदनाये मर गई,,,
दिल मे---------
नागफ़नी और कैक्टस उग आये!
ऐ,रंग---------
मै आदमी से मरुस्थल हो गया।

औरत नही देखी

(औरत नही देखी)
माथे पे चुहचुहाता पसीना-----
कमर पे खुशी साड़ी-----
और सर पे सीमेंट की भदेली,,,,,,,,,,
श्रम की मादक चाल------
ऐ,रंग----मेरी कविता ने कभी----
इतनी खूबसुरत औरत नही देखी।

Thursday, 15 November 2018

मेरी गुलमुहर

एै परदेश के चाँद------------ बहुत उदास होगी इस महिने मेरी गुलमुहर! तड़प रही होगी------------ एक-एक पल उस खिड़की को खोले, जिस खिड़की से----------- अपने ब्याह की पहली सुबह उसने देखा था, बिल्कुल अपने गुलाबी साड़ी की तरह------- डालो पे खिली गुलमुहर। उस प्रेम के सुबह की वे रोमानियत, जब बड़े प्यार से कहां था उसे मैने-------- कि तुम लाख तको लेकिन मै न तकुंगा, खिड़की के उस तरफ क्योंकि, मेरे बहुत करीब खड़ी है------------- मेरी जिंदगी और मेरी गुलमुहर। ये फिर वही सिजन है------------ जब अपनी शाखो पे खिलती है गुलमुहर, उसने फिर खोली होगी वे खिड़की अलसुबह, और तक रही होगी अपनी नम और भीगी आँखो से, शायद उसकी टीस और विरह पे मुस्कुरा रही होगी--------- अबकी गुलमुहर। एै परदेश के चाँद उससे कहना, कि मेरी यादो में खिलती है और साँस-साँस जीती है----- मेरी गुलमुहर। @@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी। जज कालोनी,मियाँपुर जौनपुर। mo.no.-----7800824758

पति-पत्नी कहां होते है

(पति पत्नी कहां होते है) हम कमरे में---------------- अब पति पत्नी कहां होते है? बिस्तर तो वही है, पर एैसा लगता है जैसे-------- अब उसपे दो अज़नबी सोते है। टटोलना मुमकिन नही भीतर का सन्नाटा, बस काम से लौटते थके कदम, ही अब हमारे भीतर होते है। फिर खिड़की से बाहर महानगर के, न थमने वाली चुभती चिखती आवाजे, और हमारी शादी की सालगिरह पे, वे गमले में लगाई, बिल्कुल अपने जीवन की तरह, कि नागफनी को एकटक देखते है, फिर उदास टावल को उठा, हम हाथ मुँह धोते है। अब तो ये भी याद नही, कि कब हम एक साथ बैठकर चाय पिये थे, और किस बात पर हम साथ खिलखिलाये थे, अब तो सामने है बस एक तन्हा खालि कप, जिससे अब केवल होंठ भिगोते है, और लेते है एक थकी साँस, अब तो रिश्ते को जीते नही बस ढ़ोते है। हम कमरे में------------ अब पति पत्नी कहां होते है?। ###एक जिवंत रिश्ते के निरस हो जाने का आधुनिक दर्द। @@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी। जज कालोनी,मियाँपुर जौनपुर--222002 (उत्तर-प्रदेश)। mo.no.----7800824758

पाँव रिक्शा

मजदूर दिवस के उपलक्ष मे लिखी एक यथार्थ कविता। (पाँव रिक्शा) चेहरे पे एक थकन-------- होंठो पे सुलगती बीड़ी! पेट भरने की खातिर---------- सिने से खिचने को पाँव रिक्शा, बाबू यही है अपना किस्सा। तपती डामर की सड़क पे, हर रोज लिखते है अपनी भूख, बाबू यही है हमारी जिंदगी, और सिने से खिचने को पाँव रिक्शा, बाबू यही है अपना किस्सा। कभी किसी पुलिसिये की बेज़ा गाली, बीन किराये के उतरना, चेहरे पे चंद थप्पड़, और पसीने से भीगे तर-बतर चेहरे को, मैले गमछे से पोछना, फिर आगे बढ़ जाना पिके गुस्सा, पेट की खातिर--------- सीने से खिचने को पाँव रिक्शा, बाबू यही है अपना किस्सा। छोटे बच्चे,बीमार बीबी,टपकती छत, अपनी घर से दुर खुले आसमान तले, सुलगती बीड़ी फुटपाथ, और अपने दाहिने हाथ से, लोहे की सिकड़ी से बांध लगा ताला, ठिक सिरहाने सारी रात खड़ा, मेरी जिंदगी की तरह पाँव रिक्शा। @@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी। जज कालोनी,मियाँपुर जौनपुर---222002 (उत्तर-प्रदेश) mo.no.-----7800824758

अलबिदे की नमाज

(अलबिदे की नमाज़) ऐ खुदा कुबूल अता कर-------- एक शहीद की आखिरी हिचकी, और उसके अलबिदे की नमाज़। शरीक न होगा------------------- ना लौटने पे रोयेगी बिटिया, ईद तो मनेगी सारे मुल्क में, डुब रहा है देखो------------- ले के आखिरी हिचकी, अपने पुरे घर का चाँद। ढेरों भीड़ होगी ईदगाह पे, मिलेंगे जुम्मन,हमिद सब कुछ उसकी आँखो मे आया, फिर आई आखिरी हिचकी, और कानो में कही दुर से आई, मस्जिद में होती हुई, उसके जिंदगी की आखिरी अज़ान। सब भुल जायेंगे ये शहादत, कुछ ही दिनो मे, पर उसकी बेवा के आँसू नही भुलेंगे, उसकी आखिरी हिचकी------------- और उसके अलबिदे की नमाज़। @@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी । जज कालोनी, मियांपुर  जौनपुर----222002 (उत्तर--प्रदेश)। mo.no.---7800824758

अमृता प्रीतम और उसका अधुरा इमरोज

(अमृता प्रीतम और उसका अधुरा इमरोज) मेरे इमरोज़——— मै तुम्हारे लिये छोड़े जा रही, एक तकिया तेरे नाम। काश ये गिलाफ—– मै तुमपे चढ़ा पाती, और बिछा पाती अपनी युवावस्था में—- एक बिस्तर तेरे नाम। तुम मिले भी तो यु मुझसे, कि जब जीवन की शाम——- के चंद धुंधलके ही मेरे पास बचे थे! माफ!करना क्या करु? बहुत जलाना चाहती हूँ——– तेरे अंदर रौशनी के लिये, पर बुझ जाऊँगी———- मै बनके दिया एक शाम। मेरे इमरोज़———– तुम मेरे और पास आओ, टटोलो मुझको मैने बहुत कुछ लिखा है, लेकिन————– इस अमृता प्रितम का अधुरापन पढ़ो, पढ़ पाये नही न! जानती थी नही पढ़ पाओगे, लो मेरी आखिरी साँस, और आखिरी हिचकी, खुद लिखे जा रही एक आखिरी किताब—- अमृता प्रितम और उसका अधुरा इमरोज़। @@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी। जज कालोनी,मियाँपुर जौनपुर---222002 (उत्तर-प्रदेश)। mo.no.----7800824758

पायल----एक दर्द

(पायल------एक दर्द) अपने माँ-बाप के दुलार से बनाई गई पायल, सुना है कि----------- ससुराल मे जलाई गई पायल। माँ दहाड़े मारे रो रही और बाप गुँगा हो गया, न जाने कैसे उन पापियो का कलेजा नही कांपा, एक माँ को आखिरी बार---------- उसके मरती हुई बिटिया की ना सुनाई गई पायल। सोचा था भेजेगी इसके बापु को लाने, लेकिन हाय रे! निष्ठुर समय--------- कि एक माँ तड़प रही मछली की तरह, उसके आँख के पानी के एक-एक बुँद की तरह----- तोड़े गये घुँघरू और पुरे कमरे मे घुँघरू दर घुँघरू, बहुत तड़पाई गई पायल। जिससे ब्याहा था खुशी-खुशी वे भी था शामिल, उन कातिलो में, हे! भगवान तु भी चुप था बिटिया तड़प रही थी, उसकी तड़प मे चीख़ रही थी----------- पती के हाथो पहनाई गई पायल। सास का कलेजा क्यू  कांपा नही, क्यू पथरा गई, क्यू डायन हो गई, आखिर इसकी बिटिया का कसूर क्या था? जबकि हर काम की खातिर एक पैर पे------ पुरे घर मे दौड़ाई गई पायल। एक माँ-बाप का श्राप है, कि उतना तुम सब भी रोओगे-तड़पोगे, जितना तुम्हारे घर में------ हमारी रुलाई गई पायल। माँ-बाप के  दुलार से बनाई गई पायल, सुना कि---------- ससुराल में जलाई गई पायल। @@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी। जज कालोनी,मियाँपुर जौनपुर---222002 (उत्तर-प्रदेश)। mo.no.-----7800824758 शायद हम आप प्रयास करे तो कुछ पायल घर के मंदिर मे किसी सुमधुर संगीत की तरह बजती और खिलखिलाती रहे।

अपने पापा की गुड़िया

(अपने पापा की गुड़िया) दो चुटिया बांधे और फ्रॉक पहने, दरवाजे पे-खड़ी रहती थी--------- घंटो कभी अपने पापा की गुड़िया। फिर समय खिसकता गया, मै बड़ी होती गई! मेरे ब्याह को जाने लगे वे देखने लड़के, फिर ब्याह हुआ, मै विदा हुई पापा रोये नही, पर मैने उनके अंदर---------- के आँसूओ का गीलापन महसूस किया, पीछे छोड़ आई सब कुछ अपने पापा की गुड़िया। सुना था बहुत दिनो तक, पापा तकते रहे वे दरवाज़ा, शायद ये सोच---------------- कि यही खड़ी रहती थी कभी, उनके इंतज़ार में घंटो, फ्रॉक पहने दो चुटिया बांधे इस पापा की अपने गुड़िया। फिर आखिरी मर्तबा उन्हे बीमारी मे देखा, वे चल बसे! अब यादो में है------------------- कुछ फ्रॉक दो चुटिया  और तन्हा खड़ी----------------- दरवाजे के उस तरफ, आँखो में आँसू लिये---------------- अपने पापा की गुड़िया। ###फादर्स डे पे एक बेटी की अपने पापा की याद को समर्पित कविता। @@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी। जज कालोनी,मियाँपुर जौनपुर--222002 (उत्तर-प्रदेश)। mo.no.---7800824758

गाँव के बरगद की हिन्दी छोड़ आये

(गाँव के बरगद की हिन्दी छोड़ आये) शर्मिंदा हूं---------------- सुनुंगा घंटो कल किसी गोष्ठी में, उनसे मै हिन्दी की पिड़ा, जो खुद अपने गाँव मे, शहर की अय्याशी के लिये-------- अपने पनघट की हिन्दी छोड़ आये। गंभीर साँसे भर, नकली किरदार से अपने, भर भराई आवाज से अपने, गाँव की एक-एक रेखा खिचेंगे, जो खुद अपने बुढ़े बाप के दो जोड़ी बैल, और चलती हुई पुरवट की हिन्दी छोड़ आये। फिर गोष्ठी खत्म होगी, किसी एक बड़े वक्ता की पीठ थपथपा, एक-एक कर इस सभागार से निकल जायेंगे, हिन्दी के ये मूर्धन्य चिंतक, फिर अगले वर्ष हिन्दी दिवस मनायेंगे, ये हिन्दी के मुज़ाहिद है एै,रंग--------- जो शौक से गाँव के बरगद की हिन्दी छोड़ आये। @@@आप सभी को अंतरराष्ट्रीय हिन्दी दिवस की बधाई। रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी। जज कालोनी,मियाँपुर जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)। mo.no.----7800824758

कैंडिल नाइट

(कैंडिल नाइट) बहुत उदास है————— आज हमारे तुम्हारे मोहब्बत की, कैंडिल नाईट। मै वही बैठी हूँ ठिक सामने, बस वे जगह खाली है- जहां तुम बैठते थे, आज बहुत उदास है मेरे अंदर जिंदगी, मै टुट रही हूँ! मेरे संग बीत रही है, बस तुम्हारे खूबसूरत यादो की—– कैंडिल नाईट। शायद कही चुक गये हम, इसी से हमारे रिश्ते में गलतफ़हमी बढ़ती गई! तुम अलग हो गये मै अलग हो गई, अब तो अक्सर————– डिनर मेज पे ही रह जाता है, और मै कुर्सी पे बैठी यु ही, गुजार देती हू————- अपनी कैंडिल नाईट। गर गुंजाइश हो तो लौट आओ, एक मर्तबा ही सही मुआफ करने, क्योंकि ऐ,रंग—–कही ऐसा न हो, कि तेरा इंतजार करते-करते, हमेशा के लिये बुझ जाये, मेरी ये कैंडिल नाईट। @@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी। जज कालोनी,मियाँपुर जिला--जौनपुर pin.no.--222002 (उत्तर-प्रदेश) mo.no.-----7800824758

मै लिखता हूँ कोई गीत

(मै लिखता हूँ कोई गीत) जब बेचैन कर देता है------------ मेरे अंदर का मरुस्थल मुझको, तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत। जब------------ शब्द के होंठ पे चुभती है कोई नागफनी, तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत। जब पथ की रेत पे----------- चलता जाता हूँ दूर पथिक सा और फूट जाते है पाँव के छाले, तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत। जब------------ बहुत सन्नाटा मेरे भीतर का, उधेड़ता है मुझको--------- तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत। बोता हूँ रेत पे कुछ शब्द, पर कटिले वृक्ष के विरवे ही पनपते है, उन्ही वृक्षो की------------ खरोंच जब आ जाती है बन के पीर, तब मै लिखता हूँ कोई गीत। @@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी। जज कालोनी,मियाँपुर जौनपुर (उत्तर-प्रदेश)। mo.no.---7800824758

सावधान सामने चुनाव है

(सावधान!सामने चुनाव है)
सावधान!
सामने चुनाव है।
आपको अपना बताना------
इनका राजनीतिक दाव है!
सावधान !
सामने चुनाव है।
इतने दिन याद नही आये,
अब कहते है----------
ये इनके पुरखो का गाँव है!
सावधान!
सामने चुनाव है।
मुसहर बस्ती की दशा ज्यो की त्यो,
भूखो मरा बुनकर,
उसकी बेवा के सामने घड़ियाली आँसू,
कुछ करने के वादे--------
चेहरे पे ताव है!
सावधान!
सामने चुनाव है।
झोपड़ी की रोटी-चटनी छक रहे,
खाट पे बैठे हँस रहे-------
बढ़ा काका और काकी से इनका लगाव है!
सावधान!
सामने चुनाव है।
इनका चरित्र समझ से परे,
एै,रंग----ये लोकतंत्र की आड़ है,
वरना कोयल की कुक में-----
ये कौवो की काँव है!
सावधान!
सामने चुनाव है।
@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर----222002
mo.no.7800824758

जुलाहा हूँ

(जुलाहा हूँ)
मै पंडित नही------------
तेरी मस्जिद का अजा़न,
और तेरी बस्ती का जुलाहा हूँ।
देख लेता हूँ सारे कौमो का खुदा मै,
फिर बुनता हूं एक धागे से मुहब्बत की चादर,
मै कबीर सा हिन्दू ----------------
और उसकी मस्ती सा जुलाहा हूँ।
मुझे नापसंद है धुआँ अलग-अलग,
मुझे नापसंद है कुआँ अलग-अलग,
मुफ़लिस और रईस सब छके पानी,
आचमन और वज़ू सब एक से ही है,
ये सर जहां झुके---------
मै उस मिट्टी का जुलाहा हूँ।
हर मासूम हँसे खेले एक हो आँगन,
ना समझ सके वे राम और जुम्मन,
जिस गोद खुश हो जाये वे मासूम सी बच्ची,
एै "रंग" मै----------
एैसी हर उस बच्ची का जुलाहा हूँ।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

बिटिया खुले मे शौच जाती है

आदरणीय भारतीय प्रधानमंत्री की खुले मे शौच मुक्त भारत का एक काव्यात्मक समर्थन-------------
                       (बिटिया खुले मे शौच जाती है)
आखिर बाप और भाई की ये कैसी छाती है?
जो उसकी जवान बहु-बेटी---------------
खुले में शौच जाती है।
रास्ते भर फबत्ती और--------
किसी की छेड़खानी का डर क्या होता है?
कभी देखना हो,
तो उसका वे चेहरा देखना कि किस तरह वे चंद लम्बी साँसे लेती है,
जब सकुशल अपने घर लौट आती है।
अक्सर हम अखबार और टी.बी. मे ये पढ़ते व सुनते है,
कि अधिसंख्य--------------
खुले मे शौच गई महिला की,
रेप या बलात्कार के साथ नृशंस हत्या,
सारे रोंगटे खड़े हो जाते है,
जब सबसे ज्यादा------------
एैसे ही बलात्कार की रिपोर्ट आती है।
आओ हम बदले अपनी बहु और बिटिया के लिये,
ये ना समझो कि पहले कौन?
तन्हा लड़ो क्योंकि हर अच्छे के लिये---------
फिर फौज आती है।
एै "रंग" ये महज़ कविता नही एक दर्द है,
कि आजादी के इतने सालो बाद भी,
हमारे देश की बिटिया-----------
खुले में शौच जाती है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

बाल दिवस है

(बाल दिवस है)
चाय की दुकान पे----------
सुट-बूट वाले साहब के,
अधरो पे सुलगते सिगरेट का कश है,
उस फैले धुँऐ में तेरह साल का बच्चा,
जूठे कप-प्लेट उठाता है,
जरा सा उसके मैले हाथो का श्पर्श
और माँ की गाली!
मासूम गालो पर------
बाल पकड़कर चंद चाटे,
देख रोटी-------
इतनी कम उम्र में इस बच्चे की भूख,
तेरी खातिर कितना विवश है!
इस मासूम को---------
अपनी पिड़ाओ की दुनिया से बाहर,
ये भी पता नही कि---------
कल तमाम देश के बच्चो के चाचा नेहरु का जन्मदिन,
यानी की बाल दिवस है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.7800824758

हे! सुरुज देव

(हे!सुरुज देव)
क्या आरा,क्या छपरा,क्या बिहार हे!सुरुज देव,
सबपे लुटाना अपना प्यार हे!सुरुज देव।
नदिया के पानी में जब माँग भरे दुल्हन,
अँजुली से अरघ दे-----------
तो सुनियेगा सबकी पुकार हे!सुरुज देव!
क्या आरा,क्या छपरा,क्या बिहार हे!सुरुज देव।
गुँजे किलकारी घर और आँगन में------
हर आँचल में भरना ये दुलार हे!सुरुज देव।
भले पुरे साल नही लौटते है गाँव,
पर तेरी खातिर आते है लेके परदेश से-----
अपना पुरा का पुरा परिवार हे!सुरुज देव।
मांगते है कविता और गीत की नदी में हम,
दे शब्द अरघ आपसे-----------
कि रहे खुशहाल ये संसार हे!सुरुज देव,
और अमर रहे धरती पे--------
डाला छठ का ये त्यौहार हे सुरुज देव।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.7800824758

मिट्टी से जुदा मत करना

(मिट्टी से जुदा मत करना)
बेटे मै बुढ़ि हो गई हूँ-------------
मुझे इस उम्र में अपने अब्बु से जुदा मत करना।
ना बेचना किसी को-------------
दरवाज़े पे जो उन्होनें लगाया है दरख्त़,
मै उसी से बतियाती हूँ अक्सर,
मुझे दर्द होगा------------
जब कोई काटेगा टंगारे से तेरी अब्बु की याद को।
बेटा बेशक तु मुझे हज़ ना कराना,
पर लेने देना मुझे आखिरी साँस इस मकान में,
मर जाऊँ तो तेरा हक है इस पर,
पर जीते जी मेरे बेटे,
अपनी इस अम्मी को अपने अब्बु के-----
इस मुकद्दस मिट्टी से जुदा मत करना।

सपेरे की बिटिया

(सपेरे की बिटिया)
कभी पढ़ने आती थी हमारे स्कूल में,
सपेरो की बस्ती से---------------
एक सपेरे की बिटिया।
वे तमाम किस्से सुनाती थी साँपो के अक्सर,
वे खुद भी साँपो से खेलना जानती थी,
पर वे मासुम नही जानती थी,
इंसानी साँपो का जहर,
एक दिन-----------
उसी मासूम की नग्न लाश,
उसकी बस्ती से पहले--------
पड़ने वाले एक झुरमुट में पाई गई,
मै सिहर गया!
उस नग्न मासूम की लाश देख,
मै अब भी इतने सालो बाद भी-----
अपनी उस मासूम छात्रा को भूल नही पाता,
हर नाग पंचमी को वे मेरी जेहन मे
उभर आती है,
और पुछती है मुझसे कि बताईये न सर,
कि कैसे चुक गई,
अपने पुरे बदन पे रेंगे हुये नाखूनि साँपो से,
एक सपेरे की बिटिया।
@@@आप सभी को नाग पंचमी की बधाई।
## # रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
एडवोकेट कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।

अब तो दे दो कफ़न

कफ़न की ख्व़ाहिश लिये अपने महबूब की गलियो से गुजरती एक चाहने वाले की लाश है ये कफ़न------------------(अब तो दे दो कफन)
अब तो दे दो कफन,
अब तो दे दो कफन।
चला ना जाये,जनाजा मोहब्बत का
तेरी गलियो से नंगे बदन।
अब तो दे दो कफन।
ये खामोश है,लब सील से गये है,
दुश्मन भी मईयत मे मिल से गये है,
चली आओ छत पे मिटा दो,अगन।
अब तो दे दो कफन।
अश्को का आना रूक सा गया है,
देखो जमाना भी झुक सा गया है,
क्या खुब रंगत लिये है,लगन।
अब तो दे दो कफन।
शादी के जोड़े मे नागन छिपी है,
हिना से हथेली पे मातम लिखी है,
छिपा लो ये दौलत-
तुम आँचल से अपने
खुशियो को तरसोगी,तुम देख लेना,
होगा तुम्हारा भी ऐसा पतन
ऐ रंग,-थुकेगी तुम पे तब ये कफन।
अब तो दे दो कफन।
अब तो दे दो कफन।

प्लेटफार्म नं.3 का बुढ़ा

(प्लेटफार्म नं.3 का बुढ़ा)
रोज की तरह मै-----------
आज भी इंतजार कर रहा था आफिस के लिये,
प्लेटफार्म नं.3 पे खड़ा हो,
अपनी जानी-पहचानी सी वही ट्रेन,
लेकिन ट्रेन के आने से पहले,
मेरी आँखे उस मजलूम बुढ़े को ढुढ रही थी,
जो रोज बीना कुछ कहे या मांगे,
पास आ जाता था लेने एक दस की नोट।
जो मै रोज बस उसी के लिये अपनी जेब में रखता था,
छुट्टा न भी हो मेरे पास तब भी उसे थमा----
एक शुकून सा होता!
लेकिन आज वे बुढ़ा नही दिख रहा,
मेरी बेचैन अँगुलियाँ बार-बार,
जेब में उस जगह जा टटोल रही,
जहां से निकाल मै ये दस का नोट,
उसे हर रोज थमा दिया करता था।
अचानक से मेरी बेचैनी बढ़ी-------
तो मैने अपने बगल से गुजर रहे,
चायवाले से पुछा------
जो खुद इसी प्लेटफार्म नं.3 पे अपनी,
चाय हर रोज बेचा करता था।
उसने जैसे रुंधे गले से कहा हो,
कि बाबुजी कल आप शायद नही आये थे,
अपनी ट्रेन पकड़ने या आपकी छुट्टी रही होगी,
कल उस बुढ़े की लाश फटे कंबल में यही पड़ी थी,
तो रेलवे के कुछ सिपाही उसे उठा ले गये,
और किसी लावारिस की तरह कही फेक आये,
मेरे अंदर आँसू भर-भराके गिरे और एक टिस उठी,
जैसे मेरे उस बुढ़े से एक अंजान रिश्ता टुट गया,
और मेरे अंदर एक अंजाने वात्सल्य की डोर टुट गई।
अब फिर कभी बीना बोले वे मेरे पास नही आयेंगे लेने---------
इस प्लेटफार्म नं.3 पे मेरी जेब में रंखे हुये दस के नोट!
हमेशा कचोटेगा---------
एक बार उनसे उनके बेटो और बहुओ के बारे में पुछा था,
तो वे अपने भर-भराये गले से बोले थे,
वे बहुत ज्यादा पढ़ लिख गये साहब,
और विदेश चले गये!
वे बात उनकी हमें कील की तरह चुभी,
उफ!कितना बेगुनाह तड़पा,
अपने बेटो,बहुओ और पोतो के लिये------
इस प्लेटफार्म नं.3 का बुढ़ा।

@@@संवेदना की एक पीड़ाभरी साँस पे लिखी अपनी ये रचना मै आपको सोचने के लिये उस बुढ़े बुज़ुर्ग की ये असह्य पीड़ा मै आप सभी सुधी जनो के हवाले करता हूं।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.7800824758

मै यहाँ रोने आता हूँ

(मै यहां रोने आता हू)
तुम्हे पाने और खोने आता हू,
अब हर शाम मै यहां रोने आता हूं।
बनाता हू घरौदा फिर तोड़ देता हू,
मै यहां समंदर की लहरो मे,
खुद को हर शाम-----------
डुबते सूरज की तरह डुबोने आता हू।
तु गई तेरी याद रह गई,
उसी याद की लाश को हर शाम------
मै यहां धोने आता हू।
नींद और सुकून भी मेरी आँखो मे अब नही,
मै यहा कुछ लम्हे रेतीली कब्र पे-------
तेरी निशानियो के सिरहाने सोने आता हू।
मै तब भी पागल था और अब भी पागल हू,
तभी तो तेरी जुदाई के इतने सालो बाद भी-------
मै यहां तेरा होने आता हू।
तुम्हें पाने और खोने आता हू,
अब हर शाम मै यहां रोने आता हू।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

##एक लम्बे अर्से बाद कागज़ पे तड़पती मोहब्बत के कुछ आँसू हमारी कलम से गिरे है अखबार मे छपने पे कटिंग तो लगाई पर स्पष्ट न था सोचा कुछ दिलो की टिस हरि कर दी जाये,उम्मीद है कि ये दर्द आप सभी को रास आयेगा,शुक्रिया।

तु तबाह हो जाये

(तु तबाह हो जाये)
मोहब्बत में हमने क्या नही किया?
तु तबाह हो जाये----------
बस ये दुआ नही किया।
तोड़कर मेरा दिले आईना न हँस,
क्योंकि एै बेवफ़ा-------------
तुमने कुछ नया नही किया।
बुझा दिये तुमने चराग ख्वा़हिशो के,
एै बेवफ़ा पहली मर्तबा तुमने-------
मोहब्बत के कमरे मे ये धुआँ नहीं किया।
मेरा ये धोखा-ऐ-क़त्ल है लेकिन,
तु पछतायेगी बेवफ़ा,
क्योंकि वक़्त ने किसी को बख्श़ा नही-----
और किसी को इत्तिला नहीं किया।
मोहब्बत मे हमने क्या नहीं किया?
तु तबाह हो जाये-------------
बस ये दुआ नहीं किया।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

###एक और रचना मोहब्बत के नाम मै आप लोगो के सुपुर्द करता हूं,शायद किसी के जेहन में उभर आये एक एैसी ही कोई सुरत।

रेशमा

"रेशमा" महज़ एक लड़की नही बल्कि वे मुझ जैसे किसी शायर की मुहब्बत थी---------------
                                       (रेशमा)
तेरे शहर में-----------
आज रात मै फिर गा रहा हूँ रेशमा।
देख तुझसे किये अहद को---------
मै कितनी शिद्दत से निभा रहा हूँ रेशमा।
आज भी ये नज़र तलाश रही है,
वे किनारे कि महबूब कुर्सी,
जिसपे तुम बैठ कभी हमें सुना करती थी,
तेरी खातिर अब तलक मै खुद को-----
कितना तड़पा रहा हूँ रेशमा।
मेरी गज़लो के हर्फ महज़ हर्फ नही,
तेरे सहलाये भरे जख्म़ है,
लेकिन फिर वे ताजे हो टिस रहे है,
मान नही रहे न जाने क्यू आज़,
जबकि इन्हें मै-----------
तेरी खातिर न जाने कितनी देर से मना रहा हूँ रेशमा।
लोग कहते है कि मेरी गज़ल को वे सिरहाने रख के सोते है,
शायद उन्हें पता नही,
कि हम एक गज़ल को लिख फिर सारी रात रोते है,
ये दिवान मेरे है लेकिन-----------------
इस दिवान की कबर पे तुम्ही छपी हो रेशमा।
सच तुम हमारी मुहब्बत थी,मुहब्बत हो बेशक-----
तुम्हारे शहर से मै जा रहा हूँ रेशमा।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.------7800824758

पूस की रात

(पुस की रात)
कहाँ कटती है-
फटे कंम्बल से,ऐ शहर गाँव मे,
पुस की रात।
हाँड़ कंप-कपाती ठंड मे,
कहाँ देख पाता है-शहर
खेत के किनारे पडे किसी-
किसान की लाश।
अखबार की बे-शरमी है,रंग-
वरना गाँव मे आज भी है,वही ठंड
और वही प्रेमचंद के-
               पुस की रात।

खिचड़ी थी

(खिचड़ी थी)
जब पतंगे कटके मेरे छत पे उतरी थी,
वही उतना बचपन था,
और वही उतनी खिचड़ी थी।
आज तो बस उम्र का खाली बादल है,
ना परेती है,ना मंझे है,
बस जिंदगी की अनसुलझी पेंचे है,
जिसे मै लडा रहा हूँ ऐ,रंग----तन्हा!
ये जीवन है-वे खिचड़ी थी।

सारे बसंत मै सजु

(सारे बसंत मै सजु)
बीसो बसंत मै सजी---------
पोर-पोर गदराई खुद को देख-देख,
बीसो बसंत मै सजी।
कोयल हुई बाँवरी-------
बागो में कूक-कूक कर,
भँवरा हुआ पागल महुये को चुमकर,
मेरे अधर कुँवारे,
मै कुँवारी अंग-अंग--------
बीसो बसंत मै सजी।
यौवन कलश छलके बूँद-बूँद कर,
आँखे हुई बाँवरी,
मेरी पिया दरस को,
हे!बसंत सखी अब तुम-----
कोई एैसी बान मारो कि आये बाबुल के गाँव,
मेरे पिया की डोली,
और मै बैठ चलु उसमे अपने पिया के गाँव,
बीसो बसंत मै सजी।
वे घूँघट उलट के देखे मै शर्म से गडु,
और उनके छुवन की सिहरन,
से कांपे अधर मेरे,
और उस कंपकपी की रात को,
अपना कौमार्य सौप उनको,
फिर अपने प्यार और उनके प्रित की-----
सारे बसंत मै सजु।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-------7800824758

मेरी दुनिया लुटी जा रही

(मेरी दुनिया लुटी जा रही)
कुछ जली जा रही,कुछ बुझी जा रही,
मै चुप हूं-----------
मेरी दुनिया लुटी जा रही।
वे मेहंदी लगाये,शादी के जोड़े मे खुद को छिपाये----------
मेरी बेबसी पे हँसी जा रही।
कुछ जली...................
है उसकी विदाई अपने बाबुल के घर से,
वे नया घर बसाने-------------
मेरा घर जला के चली जा रही।
कुछ जली...................
रोको कोई दो वास्ता उसको मेरी वफा का,
हाय!ठुकराके मेरे अश्को की मेहर---------
वे बेवफ़ा क्यू चली जा रही।
कुछ जली.....................
मै जिऊँगा भला अब किसके सहारे,
मेरी साँस थमने लगी है ये देखो------
वे मेरी लाश छोड़े चली जा रही।
कुछ जली..................
एै"रंग" लिख दे तु अब गज़ल मे कफ़न,
क्योंकि वे कफ़न भी संगदिल लिये जा रही।
कुछ जली जा रही,कुछ बुझी जा रही,
मै चुप हूं-----------
मेरी दुनिया लुटी जा रही।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-------7800824758

मेरे जुड़े मे गुलाब

(मेरे जुड़े मे गुलाब)
मै आज भी----------
पहले छुवन सी सिहर उठती हूं!
जब आप टांकते हो मेरे जुड़े मे गुलाब।
सच मेरी इस खुशकिस्मती का अंदाज़ा,
शायद आप न करते हो,
पर मै अपनी शर्मिली आँख मुँदे,
जुड़े मे लगाते हुये इस गुलाब के फूल सी,
आपको अपने पुरे बदन पे महसुस करती हूं!
ये रोमानियत ही---------
हमारे और आपके प्यार के बीच,
कि वे घूँघट है----------
जिसे मै आधे निकले हुये चाँद की तरह,
अपने चेहरे पे डाले रखना चाहती हूं,
और नहाना चाहती हू----------
आपके मेरे जुड़े में लगाये हुये या टांके हुये,
इस गुलाब की तरह हर मौसम,
कि उस गुलाबी बूँद से,
जिससे निखर के खिलती है ये गुलाब------
और इस गुलाब की एक-एक पंखुड़ी।
बस यही इच्छा है कि-----------
मुझे एैसे ही चाहना ता-उम्र,
और एैसे ही टांकना मेरे जुड़े में गुलाब।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर-------उत्तर-प्रदेश।
Mo.no-7800824758

तबसरा करती है

(तबसरा करती है)
मेरी गज़ल अक्सर तबसरा करती है,
किसी गरीब की भूख से मशवरा करती है।
सुना है एक हयात और एक जन्नत है शहर,
लेकिन इसी शहर में कुछ जन्नत,
माँ की कोख में मरा करती है--------
मेरी गज़ल अक्सर तबसरा करती है।
मजबूरियाँ बिकती है,खरिदो-फरोख्त़ होता है,
कुरआन पढ़ने वालो जरा सोचो,
किसी गली में हर रात अपने जख्म़-----
न चाह के भी कोई अमीना हरा करती है।
एै"रंग" इसी से न चाह के भी---------
मेरी गज़ल अक्सर तबसरा करती है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

पिया आ जाओ

(पिया आ जाओ)
होली मे दुखे है अंग-अंग------
कि पिया आ जाओ!
भरो पिचकारी से रंगो अंग-अंग-------
कि पिया आ जाओ।
छेड़ो मै छिटकु,भागु फिर पकड़ो,
मै शर्माऊ तेरे सीने से लग,
जीऊँ मै होली के सारे उमंग,तेरे संग-----
कि पिया आ जाओ।
फिर हँसे अँगना और मोरा कंगना,
नथिया करे ननद सी शरारत,
मै हारु तुम जीतो,ये होली की जंग------
कि पिया आ जाओ।
नयनो मे सब कुछ,नयनो मे मदिरा,
आँचल मे महुवा,
और साँसो में महके अमवा की बौर,
कुके है चोली मे कोयल,
कि होली मे सिसके ना हमारी पलंग-----
कि पिया आ जाओ।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

बेजा तलाक न दो

(बेजा तलाक न दो)
ख्वा़हिशो को खाक न दो!
एै मेरे शौहर-----------
सरिया के नाम पे,
मुझे बेजा तलाक न दो।
बख्श दो---------
कहा जाऊँगी ले मासुम बच्चे,
मुझ बेगुनाह को-------
इतना भी शाॅक न दो,
बेजा तलाक न दो।
न उड़ेलो कान में पिघले हुये शीशे,
मुझ बांदी को सजा तुम--------
इतनी खौफ़नाक न दो,
बेजा तलाक न दो।
न छिनो छत,न लिबास
खुदा के वास्ते रहने दो,
मेरी बेगुनाही झुलस जाये-------
मुझे वे तेजाब न दो,
बेजा तलाक न दो।
सी लुंगी लब,रह लुंगी लाशे जिंदा,
लाके रहना तुम दु जी निकाहे औरत,
मै उफ न करुंगी!
बस मेरे बच्चो की खुशीयो को कोई बेजा,
इस्लामी हलाक न दो-------
बेजा तलाक न दो।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.7800824758
____तलाक एक दर्द है जो इसे भुगत रही कोई औरत ही समझ सकती है!अगर संभव है तो मेरी इस रचना के पढ़ने वालो से मेरी कलम अनुरोध करती है प्लीज कभी किसी भी औरत से बेजा तलाक न ले,शुक्रिया।

कंगन उदास है

(कंगन उदास है)
विरह की सेज है,सिलवट है
करवट उदास है-------------
कि चले आओ परदेश से--कंगन उदास है।
जब से तुम गये हो न सजी-सँवरी,
यहाँ तलक कि-----------
कमरे का दर्पन उदास है।
कि चले आओ परदेश से--कंगन उदास है।
पाँव से निकाल करके रख दिया,
आपके पसंद की वे घुँघरू वाली पायल,
मै फिर पहन के थिरकुँगी आपके हाथो,
अभी तो उस पायल की छन-छन उदास है।
कि चले आओ परदेश से कंगन उदास है।

दिया और चराग अलग है

(दिया और चराग अलग है)
इसका शुरुर,इसका मिज़ाज अलग है,
मुहब्बत का रिवाज़ अलग है।
यहां होते है सजदे महबूब के,
यहां की मस्जिद और नमाज़ अलग है।
है ये तन्हाई की चादरपोशी,
यहां की कब्र और मज़ार अलग है।
यहां हर रात उर्स है और धड़कने कौव्वाली,
ऐै "रंग"----यहां दिया और चराग अलग है।

पत्थर की हो गई

(पत्थर की हो गई)
मै जबसे---------------
उस बेवफ़ा सितमगर की हो गई,
सूख गये अरमान मैं पत्थर की हो गई।
क्या-क्या नही छोड़ा खातिर उसके,
वालिद का दिल तोड़ा!
बसने आई थी मैं बेघर की हो गई।
मै जबसे---------------
सुर्ख जोड़े,हिना,आईना सिसके
ये अज़ीब निकाह है देखो,
कुबूल कर भी ऐ,रंग----------
मै बीना शौहर की हो गई।
मै जबसे--------------
उस बेवफ़ा सितमगर की हो गई,
सूख गये अरमान मैं पत्थर की हो गई।

रेगमाल सी जिंदगी

(रेगमाल सी जिंदगी)
कौन नही बुनता-----------
जुलाहे के कालीन सी जिंदगी!
तरह-तरह के धागे में पिरो,
कौन नही देखना चाहता मुकम्मल अपना शाहकार,
पर हो नही पाता ज्यो का त्यो चाहा,
फंस के खत्म हो जाती है मछली सी----
किसी मछेरे के जाल सी जिंदगी।
सारी ख्व़ाहिशे धरी रह जाती है,
एक-एक कर खत्म होती जाती है,
एै रंग------------------
यहां पे सबकी है रेगमाल सी जिंदगी।

पतझड़ की तरह रोई

(पतझड़ की तरह रोई)
बहुत खूबसूरत थी मै लेकिन--------
रोशनी में तन्हा घर की तरह रोई।
कोई ना पढ़ सका कभी मेरा दर्द------
मै लहरो में अपने ही,समंदर की तरह रोई।
सब ठहरते गये----------------
अपनी अपनी मील के पत्थर तलक,
मै पीछे छुटते गये सफर की तरह रोई।
लोग सावन में भीग रहे थे,
ऐै "रंग"----मै अकेली अभागन थी
जो सावन में पतझड़ की तरह रोई।