Wednesday, 31 December 2025

अयोध्या आ रहे हैं

(अयोध्या आ रहे हैं)

सुना है कि
प्रभु श्री राम की नगरी अयोध्या में
विलुप्त हुए,गिद्ध आ रहें हैं.

लेकिन राजनीतिक गिद्ध
अभी भी अयोध्या आने से कतरा रहे हैं

देखना यह सभी गिद्ध
चुनाव हार जाएंगे 
क्योंकि यह सिर्फ
कुछ जातियों की डाल पर
मंडरा रहें हैं
 
इन सभी के राजनीतिक  
पंख जल जाएंगे
तब देखना
हे राम हे राम कहते हुए
यह गिद्ध भी
अयोध्या आएंगे.

लेकिन तब तलक समय का जटायू
अपने राम का हो चुका होगा
बस यह सरयू को देखेंगे
और इसके पानी को 
खून से लाल करने का पश्चाताप करेंगे.

और दिल्ली
के कुछ राजनीतिक गिद्ध
राम को काल्पनिक कह 
अपनें अयोध्या ना आ पाने
की पीड़ा से 
हे राम हे राम का विलाप कर 
अपने मन के पश्चाताप की अयोध्या में
एक असह्य पीड़ा से
तड़ पड़ाएंगे.

क्योंकि
अब उनके अवरोधों के राम का 
राजनीतिक रावण परास्त हुआ
और वह टेंट के लंबे वनवास से 
निकल,
एक बार फिर 
अपनी अयोध्या आ रहें हैं.

"इस रचना का आशय किसी को आहत या पीड़ा पहुंचाना नहीं है बस यह प्रभु श्री राम के प्रति मेरी स्वयं की अभिव्यक्ति है"

यह रचना मेरी स्वरचित और अप्रकाशित है.

रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी,मियांपुर
जिला--जौनपुर (U P).

हरित क्रांति

🌹🌹मोबाइल के प्रादुर्भाव की वजह से प्रेमी और प्रेमिकाओं के बीच पहली बार "प्रेम की हरित क्रांति आई थी"😀😀
@highlight

Saturday, 27 December 2025

(देवता हो जाऊंगा)

(देवता हो जाऊगाँ)
चंद होठों तक सिमट के,दास्ताँ हो जाऊगाँ।
आदमी रहने दे,खुद लापता हो जाऊगाँ।
न छेड ऐ दुनियाँ तु मेरे दिल के अहम को,
ऐ,रंग-
गर ठेस लगी दिल को,
तो देवता हो जाऊगाँ।

Sunday, 21 December 2025

मुसलमान बना दो

(मुसलमान बना दो)
गर मासुमो का कत्ल इतने से-
थम जाये वहसियो,
तो हमे शौक से हिंन्दू या मुसलमान बना दो।
ढहा दो मेरे जेहन का मंदिर,
मै शायर हूँ,मुहब्बत मेरी भूख है,
गर मै तेरी पूजा ना बन सका तो,
अज़ान बना दो।
बेशक मेरे हाथो से तुम छिन लो गीता
ऐ रंग-ये ख्वाहिश है
कि मासुमो का कत्ल ना हो,
चाहो तो इसके लिये,
इस ब्राह्मन को मुसलमान बना दो।

पेशावर मे मासुमो की कत्ल पे।

साड़ी दिवस

💞💕साड़ी दिवस के दिन जो पत्नियां अपनी साड़ी कमर में खोसकर,,गुस्से से लाल-पीली हो अपने पति की तरफ देखेंगी,उनके पति पूरे वर्ष किसी गैर महिला की साड़ी के पल्लू से दूर रहेंगे😀😀

Friday, 19 December 2025

(सिद्धांत सारे खोखले निकले)

(सिध्दांत सारे खोखले नीकले)
कैसे नयी पौध,नयी कोपले नीकले
मेरे अपने ही आस-पास कुछ दोगले नीकले।
क्या खुब सियासत है हँसते शख्श की,
ऐ ,रंग-
सिध्दांत बडे ऊँचे पर खोखले नीकले।

(मेरी रूह बोलेगी )

(मेरी रुह बोलेगी)
मेरा कत्ल इतना आसान नही,
मै सच का मुहाफिज़ हूँ ,
ऐ,रंग----गर दफ्ऩ भी हुआ-----
तो मेरी रुह बोलेगी।

मैं लिखता हूं कोई गीत

(मै लिखता हूँ कोई गीत)
जब बेचैन कर देता है------------
मेरे अंदर का मरुस्थल मुझको,
तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत।
जब------------
शब्द के होंठ पे चुभती है कोई नागफनी,
तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत।
जब पथ की रेत पे-----------
चलता जाता हूँ दूर पथिक सा
और फूट जाते है पाँव के छाले,
तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत।
जब------------
बहुत सन्नाटा मेरे भीतर का,
उधेड़ता है मुझको---------
तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत।
बोता हूँ रेत पे कुछ शब्द,
पर कटिले वृक्ष के विरवे ही पनपते है,
उन्ही वृक्षो की------------
खरोंच जब आ जाती है बन के पीर,
तब मै लिखता हूँ कोई गीत।

###धन्यवाद आपका निर्मेश भईया मेरी रचना को आज के वर्तमान अंकुर मे जगह देने के लिये।

Monday, 15 December 2025

मुझे टूट के चाहने वाले

(मुझे टूट के चाहने वाले)
मुझे भुलना मत-----------
एै मुझे टूट के चाहने वाले।
मै फ़ना हो जाऊंगा तेरी लहरो मे शौक से,
बस मुझे अपने से अलग मत करना-------
एै मुझे टूट के चाहने वाले।
जलने देना मेरा मासूम चरागे दिल किसी कोने मे,
बेसक बुझ जाऊंगा सहर होने तक,
पर तु बेरुख़ी से ना बुझाना----------
एै मुझे टूट के चाहने वाले।
बेशक मेरी ख्व़ाहिशे मईयत गुजरे तेरे कुचे से,
पर आँख मे आँसू लिये ना आना अपनी छत पे,
मै तड़प उठुंगा मर के भी ,
क्योंकि तुम्हें इस हाल मे देखु एैसी हिम्मत नही मुझमें------------
एै मुझे टूट के चाहने वाले।
@@@एक बेहद उम्दा मोहब्बत करने वालो के नाम नज्म़।
सहर----सुबह।
रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

@@@धन्यवाद डेली वर्तमान अंकुर और निर्मेश के त्यागी भईया मेरी नज्म़ को अपना बेशकिमती प्यार देने के लिये।

(गुजराती नीच से हारे)

(गुजराती नीच से हारे)
ना आधे और नाही बीच से हारे-----------
राहुल तो बस और बस गुजरात मे,
अपनी पार्टी के मणिशंकर अय्यर के कहे---
उस गुजराती नीच से हारे।
बड़ी मेहनत की मंदिर गये रैलियां की,
बताया भी की विकास पगला गया है,
लेकिन फिर भी वे--------
अपनी किस्मत के मोहर्रम का क्या करते?,
उफ!एक बार फिर,
राहुल गुजरात मे वहाँ के तीन बेटो के साथ---
अपनी इद से हारे।
यानी मणिशंकर अय्यर के--------
गुजराती नीच से हारे।
जीयसटी,नोटबंदी,विकास दर,बेरोजगारी
सारे बारुद थे फिर फटे क्यू नही,
आखिर क्या चूक रही ये बड़े समझे,
लेकिन मेरा दावा है कि------
काग्रेंस के राहुल किसी मुद्दे से नही,
बल्कि वे सिर्फ और सिर्फ पुरा चुनाव,
मणिशंकर अय्यर के कहे एक जुमले----
गुजराती नीच से हारे।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Wednesday, 10 December 2025

फेंकी गई सीता

(फेकी गयी सीता)
रावण के यहाँ-
कितनी सुरक्षित थी सीता।
यहाँ लक्ष्मण के हाथो पुरी रात,
नोची-खसोटी गयी सीता।
ऐ रंग-
कैसा बदलाव है देखो,
कि बलात्कार करके-
राम के पिछवारे फेकी गयी सीता।

दिल्ली में हुऐ बलात्कार पर।

टूट कर चाहने वाले

(मुझे टूट के चाहने वाले)
मुझे भुलना मत-----------
एै मुझे टूट के चाहने वाले।
मै फ़ना हो जाऊंगा तेरी लहरो मे शौक से,
बस मुझे अपने से अलग मत करना-------
एै मुझे टूट के चाहने वाले।
जलने देना मेरा मासूम चरागे दिल किसी कोने मे,
बेसक बुझ जाऊंगा सहर होने तक,
पर तु बेरुख़ी से ना बुझाना----------
एै मुझे टूट के चाहने वाले।
बेशक मेरी ख्व़ाहिशे मईयत गुजरे तेरे कुचे से,
पर आँख मे आँसू लिये ना आना अपनी छत पे,
मै तड़प उठुंगा मर के भी ,
क्योंकि तुम्हें इस हाल मे देखु एैसी हिम्मत नही मुझमें------------
एै मुझे टूट के चाहने वाले।

@@@एक बेहद उम्दा मोहब्बत करने वालो के नाम नज्म़।
सहर----सुबह।
रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

पगली बना दो

(पगली बना दो)

नन्हे-नन्हे पाँव,
छोटी-छोटी अँगूली बना दो,
ऐ,खुदा--
मुझे फिर से वही
बचपन की तितली बना दो.

मै तैरु गाँव के पोखर,
और तोडू बाग से अंम्बिया,
मुझे अम्मी की डाँट,
और अपने अब्बू के दुलार की 
वही फिर से पगली बना दो.

यह मेरी स्वरचित रचना हैं.

रंगनाथ द्विवेदी,,,
जौनपुर, उत्तर-प्रदेश

Sunday, 7 December 2025

दिसंबर लिखता हूं

(दिसंबर लिखता हूं)

तुम्हें---
धुंधली और गुनगुनी,,,
धूप का,अंबर लिखता हूं.
तुम्हे--
अपनी गीतो में 
मैं,,दिसंबर लिखता हूं.

अब भी तुम 
वैसे ही आती हो
छत पे
अपने गीले बालों को सुखाने

तुम्हारे होंठो पे 
पानी की,बूंदों के चंद कतरे 
जो तेरी इन
गीले बालो से होके 
तेरी इन खूबसूरत
होंठो पे गिरे हैं 
यूं लगे रहे हैं कि,,जैसे 
ओस से भीगे हो, 
तुम्हारी होंठो के ये 
 "गुलाब" सारी रात

उसपे ये ,ठंड की हवा 
जब चूमती है तेरा बदन 
और 
तुम सिहर उठती हो
तो जी करता हैं
कि मैं चला आऊं 
तेरी छत पे 
और हौले से थाम लूं
तुम्हारी वे कलाई
जिस कलाई को तेरे
मैं अपनी गीतों में
दिसंबर लिखता हूं.
 
मेरे गीतों की जब किताब 
पूरी होगी 
तो उसकी कवर पे
तुम ऐसे ही छपोगी
ताकि
ये शहर जान ले 
कि तू वही लड़की हैं 
जिसे मैं अपनी गीतों में 
दिसंबर लिखता हूं.

"क्या आप भी किसी को दिसंबर लिखते हैं अगर नही लिखते हैं तो लिखिए"

रचनाकार--रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियापुर
जौनपुर--222002 (U P)

Friday, 5 December 2025

शिवरानी देवी

शिवरानी देवी 

प्रेमचंद को समझना है तो शिवरानी देवी को पढ़ना ही पड़ेगा…….

‘अजी तुम्हारे साथ मेरी पहली शादी हुई होती तो मेरा जीवन इससे आगे होता’ @ मुंशी प्रेमचंद 

प्रेमचंद का नाम से शायद ही कोई अनभिज्ञ हो, पर शायद हर कोई यह नहीं जानता होगा कि उनकी पत्नी भी एक प्रतिभाशाली साहित्यकार थी जिनकी कृतियों में नारीवादी मुद्दों का बखूबी वर्णन है। क्यों ऐसे एक लेखिका को अपने पति की सफलता की परछाई में सीमित रहना पड़ा?? क्यों उन्हें अपने योग्य सम्मान नहीं मिल सका? 

“यह कहना मुनासिब है कि हिंदी समाज जितना प्रेमचंद को जानता है, उतना वह शिवरानी देवी को नहीं जानता।” वह उन्हें अधिक से अधिक प्रेमचंद की पत्नी या ‘प्रेमचंद घर में’ की लेखिका के रूप में ही जानता है। बहुत कम लोगों को मालूम है कि वे अपने समय की महत्वपूर्ण कहानीकार भी थीं। वे ऐसी बेबाक और साहसी कथाकार थीं, जो स्त्री मुक्ति के मुद्दे पर प्रेमचंद से आगे का सोचती थीं। सहित्य में इस बारे में उन्होंने अपने पति की तुलना में अधिक तीखे सवाल उठाए थे और समाज को बदलने के लिए स्त्री-पुरुष समानता स्थापित करने का पुरजोर आह्वान किया था। दुर्भाग्य से, हिंदी की दुनिया में उनकी कहानियों की चर्चा नहीं हुई। 

शिवरानी देवी के जन्म और जीवन के बारे में स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है। शिवरानी प्रेमचंद की दूसरी पत्नी थीं। शिवरानी के साथ प्रेमचंद का बरताव बड़ा दोस्ताना था। वह उनके लिए वह कोई भी काम कर देते, स्त्री-पुरुष का भेद न रखते। पत्नी के नाम ‘प्रिय रानी’ संबोधन से लिखे उनके पत्र बड़े सहज हैं। अंत में लिखते- तुम्हारा धनपत (या धनपतराय)। अक्सर दोनों के बीच अनेक विषयों पर बातें होतीं, जिनमें शिवरानी कहीं न दबतीं। उनके गुस्से का जवाब प्रेमचंद हंसी से देते। वह उन्हें भोंदू कहतीं तो प्रेमचंद कहते पागल, पागलराम या पगली। प्रेमचंद स्वीकार करते दिखते हैं कि ‘अजी तुम्हारे साथ मेरी पहली शादी हुई होती तो मेरा जीवन इससे आगे होता’। 

लेकिन 1905 में विवाह के बाद प्रेमचंद की सोहबत में साहित्य में उनकी दिलचस्पी विकसित हुई। प्रेमचंद ने उन्हें आगे बढ़ाया और 1924 में जब शिवरानी देवी की उम्र 35 वर्ष थी, तो उनकी पहली कहानी चांद पत्रिका में साहस शीर्षक से छपी थी। प्रेमचंद ने ‘सौत’ शीर्षक से एक कहानी लिखी थी। इसी शीर्षक से शिवरानी देवी ने भी एक कहानी लिखी थी। हालांकि उसका रचना काल और विषय वस्तु अलग हैं। शिवरानी देवी ने पांच ऐसी कहानियां लिखीं, जिनके शीर्षक प्रेमचंद की कहानियों से मिलते थे। इनमें पछतावा, विमाता, और बलिदान जैसी कहानियां हैं। पछतावा और विमाता तो कौमुदी (1937) में संकलित हैं। बलिदान कहानी अभी तक असंकलित है। यह कहानी 1937 में चांद में प्रकाशित हुई थी।

यह प्रेमचंद के संगत का ही असर था कि जो शिवरानी जैसी अशिक्षित महिला जिनकी साहित्य में कोई रुचि भी न थी, वे साहित्य की ओर अग्रसर हुईं। हिंदी का दुर्भाग्य है कि शिवरानी देवी के कहानी संग्रह वर्षों तक अनुपलब्ध रहे। पिछले दिनों नई किताब प्रकाशन ने शिवरानी देवी के दूसरे कहानी संग्रह कौमुदी को फिर प्रकाशित किया है।

प्रेमचंद पर अनगिनत शोध हुए होंगे, किंतु जितनी प्रामाणिक व सूत्र-शैली में शिवरानी की लेखनी ‘प्रेमचंद घर में’ चली है, वह अन्यत्र दुर्लभ है।

हिंदी के इतिहासकारों और आलोचकों ने शिवरानी देवी या उस दौर की महिला कथाकारों-साहित्यकारों की कोई विशेष चर्चा नहीं किया कि उस दौर में किस तरह अन्य महिलाएं, कथा के क्षेत्र में सक्रिय थीं। न ही कभी किसी ने इस पर रुचि दिखाई। यही वजह है कि वे इतिहास से ओझल हो गईं। आज उनका कोई नामलेवा भी नहीं है। वे सभी उपेक्षा का शिकार हुईं। शिवरानी देवी इसी त्रासदी की शिकार रहीं। 5 दिसंबर 1976 तक जीवित रहीं पर हिंदी साहित्य की मुख्यधारा में किसी ने उन पर ध्यान नहीं दिया।

49वीं पुण्यतिथि पर विस्मृत साहित्यकार शिवरानी देवी के सादर स्मरण

कामायनी

(जीवित कामायनी)
इंतजार करती है-----------
अपने कोठे पे बैठ हर शाम कोई ग्राहक।
न आने पे फिर वहीं से खोलती है,
जहा से उसने मोड़ रखा था--------
जय शंकर प्रसाद की कामायनी।
डबडबाई आँख मे मनू और इडा से ज्यादा,
भर आते है आँसू !
ये अथाह पिड़ा के फफोले का फूटना रोज सहती है,
इसी कोठे पे-----------
जब कोई आता दिखता है,
तो टुटी कुंडी वाले दरवाज़े की तरफ बढ़ चलती है,
ग्राहक की जल्दबाजी में------------
बंद करते दरवाज़े की टुटी कुंडी की आवाज़,
का मतलब वे समझ----------------
अपने एक-एक कपड़े को उतारती है,
और चारपाई पे--------------
उसका ग्राहक पैसे सुलता है!
फिर थकी मादी उठती है----------
मरहूम जय शंकर प्रसाद की ये जीवित कामायनी।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

मां

हिन्दी सिनेमा के महान सपुत शशी कपुर को मेरी अश्रुपूरित श्रद्धांजलि
          (शशी कपूर के पास उसकी माँ है)
एै हिन्दी सिनेमा------------
तु भी आँख नम कर शायद तुझे पता नही,
कि तेरे पर्दे पे----------
इस फानी दुनिया को छोड़े जा रहे,
शशी कपूर की माँ है।
इसके रुबरु दौलत और शोहरत सब बेजा है,
क्योंकि सबसे बड़ी दौलत--------
आज भी सिर्फ और सिर्फ माँ है।
हर बेटा शशी कपूर की तरह ये---
फख्र से कह सकता है कि,
देख एै दीवार के अमिताभ बच्चन
आज भी सब कुछ रहके भी तु हार गया,
क्योंकि सिनेमा में तु चाहे जितनी ऊँचाई पे खड़ा है,
पर एेक्टिंग मे सच है कि------
आज भी शशी कपूर के पास उसकी माँ है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियापुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Saturday, 29 November 2025

आईना तोड़ देती है

(आईना तोड देती है)
पटकती है बेरहमी से-
सिसकता छोड देती है,
ऐ रंग-
वे हुश्न-ऐ-बेगैरत,हर महिने 
एक आईना तोड देती है।

नंगे शरीर की रिश्वत

(नंगे शरीर की रिश्वत)
कालेधन का तो नहीं पता लेकिन,
कल एक मज़लूम औरत---------
सरकारी अस्पताल में अपने बीमार पती का इलाज कराने गई,
तो उसे डाॅक्टर व स्टाप ने नीचे से उपर तलक देखा,
शायद ये उम्मीद थी कि कुछ लाई होगी देगी,
लेकिन ये भापते ही--------------
कि वे कुछ दे नही पायेगी,
सभी उसे दुत्कारने लगे!
तभी उसने सबसे बड़े डाॅक्टर का पाँव पकड़,
गिड़गिड़ाई कि साहब ये मर जायेंगे,
उस नकली सहानुभूति के मसीहा ने कहा ठिक है,
अच्छा ये बताओ क्या तुम अपने पती के इलाज के नाम पे हमें कुछ दे सकती हो,
ये कहते समय डाॅक्टर की नज़र उस महिला की घबराहट में फिसले हुये आँचल,
के बीच ब्लाउज़ में कसे हुये उन्नत उरोज पर थी,
अचानक से उसने स्त्रीयोचित लज्जा से अपना आँचल झेप अपने सीने पे रखा,
लेकिन क्या करती----------
तब तलक एक अघोषित पिड़ा के लिये उस डाॅक्टर ने एक अश्लील थपकी दे,
ये कह की अगर पती की जान बचानी हो तो तुम समझ रही हो न,
डाॅक्टर अपने कामन रुम के दरवाजे की तरफ जा उसे जानबुझकर अधखुला छोड़ शायद अपने होठ पे सिगरेट सुलगा अपने शरीर की सुलगन को---------
सिगरेट बुझाने वाले मर्तबान में बिल्कुल सिगरेट के बचे भाग को-------
बुरी तरह मसल कर बुझाने की तरह ही अपनी कामुकता का सिगरेट भी उस अंग-विशेष में मसलकर बुझाने की खातिर उसने,
जिस दरवाजे को अधखुला छोड़ा है,
आज उस तरफ पती के जीवन के लिये सिटकनी चढ़नी है------------
सिटकनी चढ़ी और डाॅक्टर उस तरफ उसके शरीर से अपनी रिश्वत लेता रहा,
वे ज्यो रिश्वत दे बाहर आई----------
तो देखा की बड़ी तेजी से उसके पती का इलाज चालु था।
वे अपने शरीर की रिश्वत को अब तलक टटोल रही थी,
वे डाॅक्टर अब भी अपनी कनखियो से तक रहा था,
उसे लगा कि जैसे वे थूक लगा अब भी उसके शरीर के उन अंगो से चिपके कुछ फस गये नोटो की तरह,
दो-तीन मर्तबा रगड़ अपनी रिश्वत गिन रहा हो।

@@@रिश्वत की एक भयावह तस्बीर।

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

Friday, 28 November 2025

( मौत की सुरंग से निकले हैं)

(मौत की सुरंग से निकले हैं)

हम जिंदगी की जद्दोजहद
और जंग से निकले हैं
सांस आई गई,कमजोर हुई
लेकिन टूटी नहीं .
हमे उम्मीद थी जीने की 
और,जीतने की.
इसीलिए तो हम 
एक नए जीवन की 
गर्भ से निकले हैं.

उल्लास हैं,खुशी हैं,जश्न हैं
लेकिन शुक्रिया उनका,
सलाम उनको
जिनके हौसले लड़ते रहें
हर घड़ी , हर क्षण
हमारी सांस के लिए.
आज उन्ही की देन हैं
कि हम उसी मस्ती
और उसी उमंग से निकले हैं.

शुक्रिया धामी,
आपके हौसले का 
जो हमारी मुश्किलों में काम आए 
नही तो यही सुरंग 
हमारी कब्रगाह होती
लेकिन नही
हम जीत गए और मौत हार गई.

हे!उत्तरकाशी 
शायद !
तेरे कण–कण को प्रणाम,
करने की खातिर
हम सारे मजदूर 
मौत की सुरंग से निकले हैं.

✍️✍️आखिर ज़िंदगी जीत गई🌹🌹

रचना--रंगनाथ द्विवेदी
जिला--जौनपुर (U P)

Thursday, 27 November 2025

(इतवार केवल दिन नहीं)

(इतवार केवल दिन नहीं मोहब्बत है)
कभी किसी शनिवार वे आते है,
कभी किसी शनिवार मै जाती हू।
ये भागमभाग,ये नौकरी,ये भीड़ 
कि उबन से दुर------------
कभी किसी इतवार वे मुझे पाते है,
कभी किसी इतवार मै उन्हें पाती हू।
फिर अगली सुबह लौटना होता है,
कभी दरवाजे़ पे वे मुझे छोड़ने आते है,
और कभी दरवाजे पे मै उन्हें छोड़ने जाती हू।
इसलिये एै,रंग---अब हमारी जिंदगी मे इतवार महज़ दिन नही,
मोहब्बत है जो हम एक दुसरे से कर पाते है।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

नौकरीपेशा लोगो का वे इतवार जिसका इंतज़ार वे बड़ी शिद्दत से एक दुसरे के लिये अलग-अलग शहरो में पुरे हफ्ते ट्रेन पे न बैठ पाने तलक करते है।

Thursday, 13 November 2025

शेर

✍️✍️हमें बेरहम होने में कुछ वक्त लगेगा.क्योंकि ऐ "रंग" हम---"गांव की पगडंडी से शहर आए हैं "🙏🙏

Sunday, 9 November 2025

एक शेर

✍️✍️जिन्होंने गांव के खेत बेच दिए,ऐ "रंग" वही लोग शहर के गमलों में सब्जी उगा रहे है 😢😢

(साहित्य आज तक)

ना ब्लाउज,ना बटन,ना काज तक 
वाह रे! “साहित्य आज तक".
हिंदी के छ्न्द,उर्दू के‌ मिसरे
फट गए
खोले बैठी है सारे अंग, 
अब नई कविता 
लिखी जाएगी 
बिस्तर की सिलवट 
नायिका के चरम सुख 
और सहवास तक 
वाह रे! “साहित्य आज तक.”

रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियाँपुर 
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
rangnathdubey90@gmail.com

मंटो भूखा है)

(मन्टो भूखा है)
उसका सारा सौन्दर्य बोध
फिका है।
वे "काली सलवार","सरकन्डो के पीछे"
की मजबुरी,
उसकी वेश्या-
दो दिनो से भुखी है,
और खुद हफ्तो से-
सदाअत-हसन-मन्टो भुखा है।
ऐ रंग,-आज रायल्टी लाखो मिलती है
उसकी किताबो के
पर हमे लगता है कि आज भी
सदाअत-हसन-मंटो भुखा है।

विशेष-पाकिस्तान का बहु-चर्चित कलमकार,जो अपने जिन्दा रहते बदनाम रहा,मुकदमे लड़ता रहा,भुखा रहा,उसकी कहानियो को अश्लील कहा।पर इसी दुनिया ने उसके मरणोपरान्त उसे विश्व साहित्यकार कहा।

Saturday, 8 November 2025

Friday, 7 November 2025

टिप्पणी

✍️✍️कुछ लेखक या लेखिका पत्रिका से संपादकीय प्रेम पाने के लिए वह संपादक के लिए अलग से "तारीफ़ दो प्याजा" लिख रही हैं 😢😢

Thursday, 6 November 2025

व्यंग्य

अगर आपकी पत्नी आपकों उल्लू समझती हैं तो इसका स्पष्ट मतलब हैं कि वह अन्य पत्नियों की अपेक्षा आपको तीस प्रतिशत अधिक प्यार करती हैं अतः ऐसी पत्नियों को आप अपने दिल की फुलझड़ी समझे 😀

Tuesday, 4 November 2025

बेगुनाह कर्ण

कर्ण और कुंती दो पात्रो पे लिखी ये महज़ कविता नही अपितु बेगुनाह कर्ण के वे आँसू है जो बीना किसी अपराध के आज भी आँख से अपनी कुंती जैसी माँ से अपना अपराध जानना चाहता है?
                            (बेगुनाह कर्ण)
आज भी विवाह पूर्व जने बच्चे को-------
कुंती कचरे मे फेक रही है!
नियति का पहिया घुम रहा है,
कचरे का कर्ण--------
फिर बेइज़्ज़त और अपमानित होगा,
अपने दंम्भ और जाती का आँचल बचाने की खातिर,
आज की कुंती भी---------
कहाँ झेप रही है।
अट्टहास कर रहा कहकहे लगा रहा अमीरो का महल,
तमाम घिनौने कृत्यो को समेटे,
लेकिन मौन है?
कर्ण के उस कचरे के डिब्बे के रुदन से,
नही पिघल रही कुंती,
क्योंकि आज की कामांध कुंती के,
कामातुर मसले स्तन,
किसी कर्ण के होंठ से नही लगेंगे,
क्योंकि इस धरती पे हर कर्ण,
एक गाली था,गाली है और गाली रहेगा!
वे देखो घने अँधेरे मे चली आ रही फिर कोई कुंती,
कचरे के डिब्बे में फेकने-----
एक बेगुनाह कर्ण।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

Monday, 3 November 2025

(गांव के दिन)

(गाँव के दिन)
यादो मे है,-
मेरे गाँव के दिन।
वे अल-सुबह किसानो का,
अपनी खेतो की तरफ जाना
क्या खुब थे?
वे उनके हल-बैल के दिन।
ऐ रंग,-साँसो मे
मिट्टी की सोंधी गंध,
वे मीठी नींद
और खपरैल के दिन।
यादो मे है,-
गाँव के दिन।

(मुमताज़ की आँखें)

(मुमताज की आंखें )

है सबसे खूबसूरत
मेरी मुमताज की आंखें,

कितनी कशिश 
कितना नशा लिए है,
मेरी मुमताज की आँखें.

कभी यहां उठे, 
कभी वहां उठे,
है कैमरे से कहीं अच्छी,
ऐ "रंग"---
मेरी मुमताज की आँखे.

(हां! बौद्ध हिन्दू हूं)

(हां! मैं बौद्ध हिंदू हूं)

मुझे बरगलाओ मत 
मैं बौद्ध हिंदू हूं, 
बनारस हूं, प्रयाग हूं,
मैं इस घाट की बिटिया 
उस घाट की बहू हूं.
हां,मै बौद्ध हिंदू हूं.

मैं सफर हूं, संघर्ष हूं,
मै हिलोरे लूंगी 
बहुंगी दूर तक,
तुम महज घाट हो
सनातन के, पिघलोगे एक दिन 
मुझे यकीन है 
क्योंकि तुम केवल व्यक्ति हो 
और मै,
सिन्धु हूं, नदी हूं,
हां! मैं बौद्ध हिंदू हूं.

दुत्कार, दुलार सभी अपने हैं 
सह लूंगी 
स्त्री हूं,वात्सल्य हूं, 
लेकिन मुझे 
यह कहकर बरगलाओ मत 
कि, मैं अछूत हूं, दलित हूं 
हां! मैं बिना तुम्हारे बताए ही 
यह जानती हूं 
कि, मैं दलित हूं 
लेकिन,
मै तुम्हारे कहे धर्म क्यों बदलूं 
मुझे गर्व है 
कि, मै इस देश की अंबेडकर हूं, 
बौद्ध हिंदू हूं,

मुझे लड़ना आता है 
मैं अशिक्षा के अंधेरे में 
पली बढ़ी नही 
मै तोड़ना जानती हूं 
जाति और उसकी बेड़ियां 
मैं आज के शिक्षा की 
ज्योतिबा फुले हूं 
हां! मैं बौद्ध हिंदू हूं.

यह रचना मेरी स्वरचित और अप्रकाशित है.

रचनाकार--रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियाँपुर 
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
rangnathdubey90@gmail.com

Saturday, 1 November 2025

शहर के लोग

(शहर के लोग)
मुझे नंगी सुला गये शहर के लोग!
एै खिज़ा के पत्तो--------
तुम कभी मेरी कब्र पे गिरना।
कितनी मोहब्बत थी गुसलखाने से,
रहने नहीं दिये एक इंतकाले सब-----
बड़े बेमुरौवत निकले शहर के लोग।
मुझे नंगी सुला गये शहर के लोग।
एै मौसमें सावन--------
तुम कभी मेरी दफ़न-ऐ-बदन पे गिरना!
कभी शफ़क चाँदनी में टहलती थी,
घंटो जिस छत पे,
ले चले उसी छत वाली गली से-----
मेरा जनाज़ा मेरी शहर के लोग।
मुझे नंगी सुला गये शहर के लोग।
एै चाँद वैसे ही शफ़क रातो की तरह,
मेरी इस रुहे बदन पे पड़ना,
मेरी तड़प है कि अब भुले से नही आते,
शहर तो शहर मेरे अपने घर के लोग।
मुझे नंगी सुला गये मेरे शहर के लोग।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

Wednesday, 29 October 2025

व्यंग्य

💃💃🕺🕺अगर आपकी पत्नी,, आपकी पड़ोसन से हंसते हुए यह कहे कि मेरे इसके पापा तो "एकदम गोबर गणेश है",,,तो समझिए की आपकी पत्नी आपके पतियोचीत व्यवहार से संतुष्ट है😀😀🤓🤓

Monday, 27 October 2025

(मुसलमान बना दो)

(मुसलमान बना दो)
गर मासुमो का कत्ल इतने से-
थम जाये वहसियो,
तो हमे शौक से हिंन्दू या मुसलमान बना दो।
ढहा दो मेरे जेहन का मंदिर,
मै शायर हूँ,मुहब्बत मेरी भूख है,
गर मै तेरी पूजा ना बन सका तो,
अज़ान बना दो।

Saturday, 25 October 2025

(लोरिया चांद की)

(लोरियाँ चाँद की)
दूध-रोटी से--------
खाली हो गई कटोरियाँ आज की,,,,,,,,,,
ऐ,रंग------अब माँ को भी-----
कहाँ याद है वे लोरियाँ चाँद की।

Friday, 24 October 2025

लखनऊ कलयुग की अयोध्या

(लखनऊ--कलयुग की अयोध्या)
सियासत---------
हर युग में बुढ़े पिता को दशरथ बना देती है।
अचानक मांग बैठती है साधना सी कैकेई,
मुलायम जैसे असहाय दशरथ से पिता से लिया कोई वचन,
और लखनऊ जैसी वर्तमान अयोध्या से,
छिन अखिलेश से राम को!
अपने पुत्र मोह की खातिर,
वे प्रतिक को--------
अमर सी मंथरा के कारण,
कलयुग का भरत बना देती है।
सियासत--------
हर युग में बुढ़े पिता को दशरथ बना देती है।
लेकिन समय की रामायण का ये कलयुगी कालखंड़ है,
अब सियासत की अयोध्या लखनऊ की गद्दी पे----------
आसीन होता है वही राम,
जिसकी यहां की जनता-----
अपने वोटो से बहुमत बना देती है।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758
उत्तर-प्रदेश के वर्तमान राजनैतिक हालात पर।

(अवैध संबंध है)

(अवैध संम्बंध है)
हा!मुझे कुबूल है,तेरे इल्ज़ाम से पहले---
ऐ खूबसुरती-------
कि मेरा तेरी तारीफो से---------
अवैध संम्बंध है।

Sunday, 19 October 2025

अयोध्या उदास है

राम मंदिर का फैसला आने से पहले 2019 में हमने एक रचना लिखी थी-------

(अयोध्या उदास है)

इस दिवाली भी---
सरयू उदास है,अयोध्या उदास है
हमारी आस्था टेंट मे है, 
उफ! मेरे अंतस मे केवट,
और हे! राम कह रहा--
जटायु उदास है.

रामभक्ति में-----
तमाम शबरी की आँख पथरा रही,
वे देखो----
मंदिर के लिये तराशी गई,
लंबे समय से रखी,
किसी अहिल्या सी,
राम मंदिर की––
शीला उदास है.

ये वनवास----
उन्हीं की नगरी में उफ!
हम नपुंसक है,
शायद इसी से-----
हनुमान, लक्ष्मण,सीता ही नही,
बल्कि अपने राम के वात्सल्य की,
मां--
कौशल्या उदास है.

इस दिवाली भी---
सरयू उदास है,अयोध्या उदास है.

रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
7800824758

व्यंग्य

✍️✍️इस समय हार्ट अटैक की वजह से ज्यादा मौते हो रही है,,,इसलिए आई लव यू जैसे रासायनिक शब्दो का प्रयोग😀😀पति और पत्नी भी बहुत अनिवार्य होने पर ही करें🤓🤓

व्यंग्य

✍️✍️अगर कोई खूबसूरत महिला आपको वरिष्ठ कहे तो आप उसे तुरंत डाट दीजिए,, क्योंकि अब किसी व्यक्ति के वरिष्ठ होने की उम्र 75 प्लस है😃😃

Monday, 13 October 2025

आदमी हूं

(आदमी हूँ)

तेरे रूप के लावण्य से,
देवता दहके थे,
मै तो आदमी हूँ.

है इसमे पाप-पुण्य कुछ नही,
ये सुरा आचमन है,
इसमे देवता बहके थे,
मै तो आदमी हूँ.

रंगनाथ द्विवेदी. 
जौनपुर, उत्तर-प्रदेश 
Mo.no.--7800824758

Friday, 10 October 2025

राम एक कलाकार में

(राम एक कलाकार में खंडित हो गये)
इंतज़ार कर रही है करके मेकप,
किसी ग्राहक का!
पत्थर की नहीं------------
अपने भूखे पापी पेट की अहिल्या।
आज गुलज़ार भी तो है,
कोठे वाली गली!
क्योंकि आज------------
दशहरे के राम और रावण की झांकी निकलनी है,
उसे याद है,
कि अगले बीते वर्ष भी वे इसी तरह,
मेकप किये अपने कोठे के छज्जे पे खड़ी थी,
तो राम बने कलाकार ने किस तरह काम उन्मुक्त नजरो से,
उसके उन स्तनो को तका था!
पहली बार दशहरे की---------------
उसकी वे पिड़ा असह्य थी!
क्योंकि इस कोठे वाली अहिल्या ने,
जिस राम को अब तलक सुना था,
वे राम जैसे-------------
इस कलाकार में खुद खंडित खड़े थे।

लहरों में फना होना है

(लहरो मे फ़ना होना है)
मै तो फ़कत एक नदी हूँ-------
ऐ वालिदे दरिया,,,,,,,,,,
जिसे एक दिन---------
तेरी लहरो मे फ़ना होना है।

मैं औरत नहीं मरुस्थली रेत हूं

(मै औरत नही मरुस्थली रेत हूँ)
मै औरत नही-----------
मरुस्थली रेत हूं!
बस यूँही अक्सर उकेरती हूं,
ताकी मेरी पिड़ा--------
इन रेतिली कड़ो से ताजी रहे।
मैने तो खुद चुना है----------
अपने जीवन का ये रुदालीपन!
अगर रो दुंगी तो क्या बचेगा?
आँख से बह जायेगी वे पिड़ा भी!
मर जाऊँगी बिना तड़पे,
पाप का पश्चाताप मै जिना चाहती हूं!
अपने चारो तरफ रेत और यही रेत,
मै मुट्ठी-दर-मुट्ठी खाली होऊँ,
चुभे मेरे अंतरतक ये नागफनी,
मैने यही तो किया है---------
झुठे प्यार की खातिर!
तड़पता छोड़ आई थी माँ-बाप,
अगर औरत होती-----------
तो ससुराल होता,मायका होता
आज मै कुछ नही,
बस बिना किसी संवेदना की-----
बहुत दुर तलक फैली,
मरुस्थली रेत हूं।
मै औरत नही------
मरुस्थली रेत हूं।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

राहुल के हाल पत्र

(राहुल के हाल पे)
बहुत तरस आता है राहुल के हाल पे,
अधकचरी जानकारी ले,
बेचारे पीट रहे मोहर्रम सी छाती सुना है "रफाल" पे----
बहुत तरस आता है राहुल के हाल पे।
बकरे तक का पता नही इनको,
डींगें हाक रहे शेर की खाल पे-----
बहुत तरस आता है राहुल के हाल पे।
इनकी बेजा छिछोरी हरकते,
यू लग रहा जैसे आधुनिक कालीदास,
ले टंगारी बैठा है अपने खानदानी डाल पे------
बहुत तरस आता है राहुल के हाल पे।
पुत्र मोह मे अंधराई सोनिया गांधारी सी,
कुछ ना कर पा रही दुर्योधन से राहुल के लिये,
हाय! दिल दुख रहा उनका,
अपने राहुल से लाल पे--------
बहुत तरस आता है राहुल के हाल पे।
पार्टी मे ही सुलगन और अंदर धुँआ है,
क्या करे ?
इनकी मजबूरी है नाचना,
इस पागल मदारी के बीन सुर-लय-ताल पे-----
बहुत तरस आता है राहुल के हाल पे।
हे! भगवान लुटिया डुब रही,
राहुल रोज पीट रहे,
शाह और मोदी के शतरंजी चाल पे-----
बहुत तरस आत है राहुल के हाल पे।

@@@रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर।
जिला--जौनपुर (उत्तर-प्रदेश)।
Mo.no---7800824 758

इस लेख व रचना को दिल से ना ले इसे शुद्ध रुप से व्यंग्य की तरह पढ़े, इसपे राजी होना ना होना आप पे है----धन्यवाद।

Wednesday, 8 October 2025

अपनी उर्वशी पे

(अपनी उर्वशी पे)
वे अपना सबकुछ वार देती है,
मेरी एक खुशी पे।
इसलिए,ऐ रंग,-मै
रोज कुछ न कुछ लिखता हूँ,
अपनी उर्वशी पे।

चांद की पीड़ा

(चाँद की पीड़ा)
हर्ष नही,
ये है,बिषाद की पीड़ा।
रोते चकोर को है,
अपने चाँद की पीड़ा।
ऐ रंग,-
नीगल लेगा राहू सुना है,
आज इतनी असह्य होती है,
चाँद की पीड़ा।

नदी रो रही

(नदी रो रही)
रोज लहू-लुहान हो रही---
हमारे शहर मे नदी रो रही।
ये माँ थी-हम बेवफ़ा बेटो की-----
आज हमी से जलिल हो रही,,,,,,,
ऐ,रंग------
हमारे शहर मे नदी रो रही।

भूख लिखता रहा

(भूख लिखता रहा)

तू रोटियां फेंकती रही,
अपनी हवेली से--
ए "रंग"--
मै बगावत और भूख लिखता रहा.

पुरानी पेंशन

(पुरानी पेंशन)

पुरानी पेंशन बहाल कर दो,
नही तो फिर तुम्हें,
यह सत्ता नही मिलेगी.

तुम्हारे दंभ का ये अड़ियलपन
हमारे वोटो से है
कही हम,बदल गए
अपनी भीड़
और हुजूम के साथ
फिर कुर्सी तो होगी
लेकिन तुम्हारी उस कुर्सी को
कोई महत्ता नही मिलेगी.

पुरानी पेंशन बहाल कर दो
नही तो फिर तुम्हें,
यह सत्ता नही मिलेगी.

ये आंदोलन है
जे.पी. और लोहिया का 
इसे पहचानो
हमारे चालीस वर्षो की
निष्ठा को 
चौथे स्तंभ से
दबाने और कुचलने वालो.

यह बिगुल है इंकलाब का
इसे हवा ना दो 
नही तो तुम्हारे अन्याय का सूरज 
डूब जाएगा
तुम पछताओगे,
दिल्ली की तरफ मुंह करके
जब तुम्हारी
महज एक गलती से
तुम्हे यह तुम्हारी,सत्ता नही मिलेगी.

पुरानी पेंशन बहाल कर दो
नही तो फिर तुम्हें
यह सत्ता नही मिलेगी.

यह रचना मेरी स्वरचित और अप्रकाशित है.

रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी,मियांपुर
जौनपुर (U P)

Monday, 6 October 2025

व्यंग्य

पत्नी के सामने खिलखिला के हंसना,,हंसने की श्रेणी में नही आता,,,बल्कि यह खीस निपोरने की श्रेणी में आता है

एक शेर

खुद भूख से मर गया ऐ "रंग",,,,जो ता उम्र
औरों की अमीरी के ताबीज़ बेचता था 😥😥

Saturday, 4 October 2025

ठंड की धूप

( गुनगुनी धूप )
मै टैरेस पे---------
कुर्सी निकाल गुनगुनी धूप मे घंटों बैठी,
वे तुम्हारी चाहत के एहसेसात को-----
अपने भीतर कही हौले-हौले टटोल रही.
लेकिन उस टटोलने मे न जाने कहां,
तुम्हारा श्पर्ष मुझे मिला नही,
सच अब तुम्हारे--------
चाहत का बासीपन टीस रहा.
याद है मुझे अच्छे से-------
ठंड की ये गुनगुनी धूप,
जब तुम्हारा छुना और श्पर्श करना,
मेरे प्यार के अंतरतक को गुनगुना जाता,
वे शायद युवापन था------
लेकिन आज जैसे टैरेस की गुनगुनी धूप,
एक सखी सी-------
मेरी युवावस्था से कह रही,
नही ऐसा कुछ नही,
ये जीवन के पलछिन की करवट भर है,
फिर यही टैरेस और कुर्सी के बगल-----
दोनों का गुनगुनी धूप मे बैठे,
काफी पीना होगा.
तभी एक झोका सा हवा का आता है,
और उन्हें मै थका मांदा,
आफिस से बैग लटकाये,
टैरेस पे पड़ी हुई एक खाली सी कुर्सी,
निढ़ाल सा पाती हूं,
तब मै-------
उनकी मजबूरियों की गुनगुनी धूप को,
अपने अंतर मे एक बार फिर महसूस कर पाती हूं.

@@@रचयिता---रंगनाथ द्वीवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला---जौनपुर pin no.222002
Mo.no.7800824758

यह कविता मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

मैं औरत नहीं

(मै औरत नही मरुस्थली रेत हूँ)
मै औरत नही-----------
मरुस्थली रेत हूं!
बस यूँही अक्सर उकेरती हूं,
ताकी मेरी पिड़ा--------
इन रेतिली कड़ो से ताजी रहे।
मैने तो खुद चुना है----------
अपने जीवन का ये रुदालीपन!
अगर रो दुंगी तो क्या बचेगा?
आँख से बह जायेगी वे पिड़ा भी!
मर जाऊँगी बिना तड़पे,
पाप का पश्चाताप मै जिना चाहती हूं!
अपने चारो तरफ रेत और यही रेत,
मै मुट्ठी-दर-मुट्ठी खाली होऊँ,
चुभे मेरे अंतरतक ये नागफनी,
मैने यही तो किया है---------
झुठे प्यार की खातिर!
तड़पता छोड़ आई थी माँ-बाप,
अगर औरत होती-----------
तो ससुराल होता,मायका होता
आज मै कुछ नही,
बस बिना किसी संवेदना की-----
बहुत दुर तलक फैली,
मरुस्थली रेत हूं।
मै औरत नही------
मरुस्थली रेत हूं।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

वक्त बूढ़ा हो गया

(वक्त बुढ़ा हो गया)
ऐ बेवफ़ा---------
तेरी लौटने का इंतजार करते-करते,,,,,
मेरी जिंदगी का------
वक्त बुढ़ा हो गया।

पुलिस

हनीप्रित को न पकड़ पाने वाली हमारे देश की महान पुलिस पे लिखा एक तिखा मगर सम-सामयिक व्यंग्य-----------------
                (आपके बिस्तर तक पुलिस है)
ठेला,खोमचा और रेहड़ी वालो के लिये--------
बड़ी हिंसक पुलिस है।
पर हनीप्रीत ने ये साबित कर दिया,
कि कुछ टुकड़े डालो,
और अपनी पहुँच का इस्तेमाल करो फिर देखो-------
कि कितनी नपुंसक पुलिस है।
ये बाइज्जत सब करते है,
इनकी कुत्तो से अच्छि नस्ल है,
कब कितने मे काटना और भौकना है,
सब जानते है!
सही किमत हो मालिक को काट लेंगे,
ये बड़े समझदार----------
और बड़ी हित-चिंतक पुलिस है।
मालिश-मशाज़,
ये खुद करवाने मे सक्षम है,
इनकी जानकारी में ढ़ेरो प्रीत है,
क्या आशाराम?, क्या राम-रहिम?
पैसे खरचिये तो,
महज़ डेरे तक नही बल्कि एै "रंग"------
आपके बिस्तर तक पुलिस है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर (उत्तर-प्रदेश)।

mo.no.----7800824758

(काग्रेस की जलेबी)

तभी 
उनकी पार्टी के हाथ 
जीत की विक्ट्री लगेगी,
जब 
इस देश में 
वैज्ञानिक तरीके से 
जलेबी की फैक्ट्री लगेगी.

हॉवर्ड से पढ़े हैं 
मजाक थोड़ी है ,
अब जलेबी की दुकान भी 
इटली के स्तर की 
कोई कंट्री लगेगी.

ग्राहक 
बी एम डब्लू से उतरेंगे 
हलवाई की पत्नी भी 
अब जलेबी विभाग की 
कैबिनेट मंत्री लगेगी.

"यहां मेरा आशय विपक्ष के व्यवहारी ज्ञान के जर्जर और कमजोर होने से है"

रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी,मियाँपुर 
जौनपुर 222002 (उत्तर प्रदेश )

एक टिप्पणी

✍️✍️मासूम बच्चियों की रेप से बेहतर है,,,कि हमारे शहर में कुछ बस्तियां तवायफों की हों🥲🥲

Wednesday, 1 October 2025

(हे! राम)

(हे! राम)
आज भी-
अहिंसा के सिने पे
चला रहा है,गोली,
नाथूराम।
कब थमेगी ये हिंसा-
बन्दुको की ऐ रंग,
आखिर कब निकलेगा,
कातिल के होंठो से-
हे!राम।
गांधी जयन्ति पर।

Tuesday, 30 September 2025

खण्डित राम

(राम एक कलाकार में खंडित हो गये)
इंतज़ार कर रही है करके मेकप,
किसी ग्राहक का!
पत्थर की नहीं------------
अपने भूखे पापी पेट की अहिल्या।
आज गुलज़ार भी तो है,
कोठे वाली गली!
क्योंकि आज------------
दशहरे के राम और रावण की झांकी निकलनी है,
उसे याद है,
कि अगले बीते वर्ष भी वे इसी तरह,
मेकप किये अपने कोठे के छज्जे पे खड़ी थी,
तो राम बने कलाकार ने किस तरह काम उन्मुक्त नजरो से,
उसके उन स्तनो को तका था!
पहली बार दशहरे की---------------
उसकी वे पिड़ा असह्य थी!
क्योंकि इस कोठे वाली अहिल्या ने,
जिस राम को अब तलक सुना था,
वे राम जैसे-------------
इस कलाकार में खुद खंडित खड़े थे।

Saturday, 27 September 2025

कहानी

मुझे उस समय जिस तरह के शक्ल सूरत की लड़कियां पसंद थी उसमें से एक भी गुण मेरी कॉलोनी की सुनैना में नहीं थे, अब उस समय चाहे तो आप मेरी उम्र को भी एक दोष या कमी में शामिल कर सकते हैं.खैर सुनैना कुछ दूर के रिश्ते में भी थी इस लिए ना चाहकर भी कभी कभी थोड़ी बहुत व्यावहारिक बातचीत उससे कर लेनी पड़ती थी. अब मुझे तो नहीं पता पर हा मेरी उतनी बातचीत से भी जैसे सुनैना के चेहरे पर एक खुशी थोड़ी देर के लिए ही सही पर आ जाती थी लेकिन मैं उस खुशी को समझ नहीं पाता था.
वैसे मेरे घर में ले देकर तीन लोग ही थे मां पापा और मैं बाकी बड़ी दीदी थी लेकिन उनका ब्याह शादी हो गया था वह अपने बाल बच्चों और परिवार में खुश थी

बेगुनाह रावण

(बेगुनाह रावण जल रहा है)
अब रावण का चरित्र---------
रामलीला में खल रहा है!
बेचारा------------
एक सीता के नाते प्रतिवर्ष जल रहा है।
एै दिल्ली--------------
जबकि तु लंका से गई बीती है,
क्योंकि रेप और बलात्कार,
तेरी सड़को पे चल रहा है,
और बेवजह---------
दशहरे में रावण जल रहा है।
अब वक्त आ गया है कि,
तेरी सदन में---------
रावण की समिक्षा होनी चाहिये!
क्योंकि अपनी सीता को,
अब रावण से कही ज्यादा,
उसका राम छल रहा है,
और दशहरे में एै,रंग------
बेगुनाह रावण जल रहा है।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.---7800824758
यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।
आप सभी को नौरात्र और दशहरे की ढ़ेर सारी बधाई।

Friday, 26 September 2025

खुजली बहुत है 
कुछ खाज आने दे

मैं बड़ी बेसब्री से तेरी इंतजार में हूं 
ना डरा 
तू झूम के आ 
मैं भी तो देखूं 
लखनऊ की सड़कों पर 
मेरे सैलाब आने दे 

हमारी पुलिस 
ठीक करना जानती हैं 
दंगे बवाल को 


























Wednesday, 24 September 2025

(मदिरापान किया है)

(मदिरापान किया है)
हाँ मैने भी-----------------
यौवन के बोतल से अक्सर,
थोड़ा सा मदिरापान किया है।
जहां-जहां से भी छलका है----
मैने पैग भरे है!
हाँ काफिर होकर भी मैने--------
ये पूजा और अजान किया है,
थोड़ा सा मदिरापान किया है।
सच तो ये है कि यौवन को थोड़े-थोड़े,
तकते सब ही है,
सबकी लालच अलग-अलग है छिपी-छिपी,
बस मेरी खता यही है यारो----------
कि मैने इसको मान लिया है,
थोड़ा सा मदिरापान किया है।
इस यौवन की मदिरा ने-------
कई संत मौलबी छिन लिये,
इसकी अँगड़ाई ही एैसी है कि क्या किजै?
एै,रंग-----ये मदिरा माया है
जो हिचकी-हिचकी कड़वी है,
मैनै इस कड़वाहट के बोतल से 
थोड़ा सा मदिरापान किया है।

एक शेर

उससे
मेरा तलाक तो हो गया लेकिन
ऐ "रंग",
मैं उसकी मोहब्बत की मेहर के
पहले दुप्पटे को,लौटा नही पाई .

टिप्पणी

लगभग हर शहर मे तीन प्रमुख होर्डिंगो का कब्जा हैं एक है प्राइवेट अस्पताल,दूसरा हैं स्वर्ण आभूषण केंद्र और तीसरी होर्डिंग है नेताओं की और इन तीनों में एक बात कामन हैं कि यह आम आदमी के खून पसीने की गाढ़ी कमाई को मुस्कुराते हुए चट कर जाते हैं यह हमारे समाज के ड्रैकुला हैं 👺👺

Tuesday, 23 September 2025

एक टिप्पणी

✍️✍️आजम खान क्या राजनीतिक निर्णय लेते हैं यह बात की बात है,,लेकिन मेरे ख्याल से उन्हें बसपा ज्वाइन नहीं करना चाहिए,,क्योंकि बसपा हमारे उत्तर-प्रदेश की सबसे अविश्वसनीय राजनीतिक पार्टी है🙊

Monday, 22 September 2025

खजुराहो के पत्थर

(khajuraho ke patthar)
bnaya hai ek klakar ne tap kar ,
kamuk nhi uski murtiya kewl ,
ek jaadu hai "rang" 
wrna hme apni trf bulaate hai,
khajuraho ke patthar.

तुम लिखो

✍️✍️काफ़िया रदीफ़ में तुम लिखो,,हमें तो मोहब्बत लिखना था लिख दिया🌹🌹♥️♥️

एक रेगमाल सी जिंदगी

(एक रेगमाल सी जिंदगी)

कौन नही बुनता,
जुलाहे के कालीन सी जिंदगी!
तरह-तरह के धागे में पिरो,
कौन नही देखना चाहता मुकम्मल अपना शाहकार,
पर हो नही पाता ज्यो का त्यो चाहा,
फंस के खत्म हो जाती है मछली सी,
किसी मछेरे के जाल सी जिंदगी।
सारी ख्व़ाहिशे धरी रह जाती है,
एक-एक कर खत्म होती जाती है,
ऐ "रंग" यहां पर सभी जीते है 
एक रेगमाल सी जिंदगी.

Saturday, 20 September 2025

शहीद का पिता

(बुढ़े पिता का कंपकपाता हाथ)
कल शहीद की चीता जला रहा बाप---
रो रहा था!
तभी किसी ने कंधे पे रंखा हाथ,
तो वे चीख पड़ा-----------
कि रहने दो कंधे पे मत रंखो,
इस देश के ये नपुंसक हाथ!
जरुरत नही,
इतनी ही सहानुभूति है मेरे शहीद बेटे से,
तो कहो देश की सियासत से,
कि ला दे-------------
उस हाफिज़ सईद का कटा हाथ,
नही ला सकता ना जानता हूं,
इसी जगह फिर सजेगी,
कुछ फौजी बजायेंगे मातमी धुन,
और अपने शहीद बेटे की चीता को,
आग देगा--------------
किसी बुढ़े पिता का कंपकपाता हाथ।

@@@उरी के तमाम शहीदो को मेरा सलाम।

हेमा मालिनी के गाल लिखूं

(हेमा मालिनी के गाल कैसे लिखूं)

कोई बताए 
मैं अपने शहर की सड़क को
"हेमा मालिनी" के गाल कैसे लिखूं?

इस गड्ढे की खूबसूरती में
हम आने–जाने वालो की जवानी फंसी है
ठीक से महबूबा कैसे गुजरेगी ?
उसकी कमर के "आयोडेक्स"
की हालात को
मैं भला ,"जूही चावला" 
या फिर "माधुरी दीक्षित" की
बलखाती चाल कैसे लिखूं?

फिर!
इस सड़क से गुजरते हुए
अपनी महबूबा को देखना भी रिस्क है,
ना जानें कब कौन सा पांव टूट जाए?
ऐसे टूटी हुई
हड्डी के अस्पताल वाली सड़क को
"उर्मिला मातोंडकर",
के लहराते बाल कैसे लिखूं ?

कोई बताए 
मैं अपने शहर की सड़क को 
"हेमा मालिनी" के गाल कैसे लिखूं?

**मेरे शहर के सड़क की हालत पर मेरा एक रोमांटिक कटाक्ष,,,,इस शिकायत का अभिप्राय राजनीतिक नही बल्कि हमारे शहर के आम जनता की दर्द और पीड़ा से है**

रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी,मियांपुर
जौनपुर (U P) 222002

रचना

आज भी मुझे 
उसे प्रेम पत्र लिखने की इच्छा होती है,
सोचता हूं कि उसके 
उसी पुराने पते पर भेजूं
लेकिन पता नही कि वह 
अब वहा 
अपने पुराने पते पर 
रहती भी है की नही 
फिर पढ़ेगी कैसे 
उसका पति होगा 
घर होगा,बच्चे होंगे 
अब तो उम्र भी 
उसकी चालीस के आस पास हो गई होगी 
क्या बिना चश्में के वह पढ़ पाएगी 
वैसे कॉलेज के दिनों में 
उसके लिखे दो तीन प्रेम पत्र अब भी 
मेरी दराज में हैं 
इसे भी अब तलक मैं फाड़ के फेक चुका होता 
लेकिन

व्यंग्य

✍️✍️ हमारे शहर के व्यक्तियों के मुंह में पाए जाने वाले बत्तीस दांत में से कम से कम छ दांत अपनी युवावस्था में ही झड़ जाते हैं जिसमें से 🥸🥸तीन दांत हम पूरी ईमानदारी से रजनीगंधा और कमला पसंद को दे देते हैं और बाकि तीन दांत हम अपने यहां के दोहरा को दे देते हैं😢😢इसीलिए हमारे यहां लोग गुस्से में दांत नही पिसते उन्हे डर रहता है कि कहीं इसकी वजह से उनका सातवां दांत भी ना चला जाए 😃😃😃😃

Friday, 19 September 2025

ग़ालिब हूं

(अपने दौर का ग़ालिब हूं)

मैं चढ़ा नहीं कभी मस्जिद की सीढ़ियां
थी काफिर-ऐ-लत मुझे छक के पीने की,
गर सलीके से लिखूं
तो ऐ "रंग"
मैं अपने दौर का गालिब हूं.

Wednesday, 10 September 2025

शमा गायेगी

(शमा गायेगी)
तेरे निकाह की रात में--------
शमा गायेगी।
आँखे रोयेंगी मेरी,बीना आँसू 
अंदर एक ताजमहल टुटेगा-----
और शमा गायेगी।
तु अगर सोयेगा भी--------
अपनी सेजे मोहब्बत!
तो तेरी शरिके हयात की हर चुड़ी से---
शमा गायेगी।
तु तड़पेगा मेरी सदा से भागने वाले,
कभी बच न सकेगा!
क्योंकि इस कायनात के हर जर्रे से----
शमा गायेगी।

आईना बेचती थी

(आईना बेचती थी)

जो कभी खुद को 
ना देखती थी,,,
ए "रंग"
वही लड़की,

हमारे शहर मे--
"आईना बेचती थी".

विशेष---सभी सम्मानित लोगो से विशेष अनुरोध हैं कि मुझे टैग ना करे,अन्यथा मैं आपके टैग को रिमूव कर दूंगा ✍️✍️🙏🙏

(एक टिप्पणी)

जितनी तारीफ यह पीढ़ी डोमिनोज के पिज़्ज़ा की कर रही है,काश! उतनी ही तारीफ हम लोगों ने अपनी मां की चुपड़ी हुई रोटी की, की होती तो इतने दिनों का सड़ा गला पिज्जा हमारी यह पीढ़ी ना खा रही होती.😢😢

Friday, 5 September 2025

कान्हा

(ऐ कान्हा छोड़ ना)
ऐ कान्हा छोड़ना,गागरिया फोड़ ना
मै करती हूँ विनती,हाथो को जोड़ ना।
ऐ कान्हा छोड़ ना-----
मोहे जाना है जल्दि ओ मेरे साँवरे
गर्मी की धुप है,जलता है पाँव रे
ऐसे तु ऐ कान्हा मुख अपना मोड़ ना।
ऐ कान्हा छोड़ ना-----
घर आओगे मेरे तो,माखन खिलाऊँगी
चोरी से तुमको अलग से भी दुँगी
जाऊ मै घर को,ऐ कान्हा बोलना।
ऐ कान्हा छोड़ ना-------
फुटी जो गागरियाँ,डाटेगी मईया
मै कैसे सुनुगी रे हाय!मेरी दईया
अब तो तरस खाओ,यशुमति के भईया
अब कुछ भी ना सोचना।
ऐ कान्हा छोड़ ना।

आप सभी को कृष्ण जन्माष्टमी की बधाई।

Thursday, 4 September 2025

चूड़ियां तीज कहती हैं

(चुड़ियाँ तीज की)
पहली बार आपने ही तो पहनाई थी,
मेरी कलाई में ये चुड़ियाँ तीज की।
तब से अब तलक मेरी कलाई के साजन,
आपको ही बुलाती है सब के बीच से,
चुपके से----------------
खनक के ये चुड़ियाँ तीज की।
आप भी उठ आते है कर बहाना,
चुपके से पकड़ने हमें किसी तरह,
मै शर्मा जाती हूँ!
तो उस शर्म की घड़ी में,
बोलती है आपसे---------
ये चुड़ियाँ तीज की।
है मेरी इच्छा,है मेरी पूजा 
कि सलामत रहे आप मै सुहागन रहुं,
आप पहनाते रहे इस कलाई मे मेरे,
मै पहनती रहुं आपसे उम्र भर------
ये चुड़ियाँ तीज की।

टिप्पणी

✍️✍️हिंदी साहित्य को अपने ही देश के शेक्सपियर ने मार दिया😢😢

Tuesday, 2 September 2025

मर्सिया लिखना है

(मरसिया लिखना है)
अभी तो बस यादो के चराग जले है---
ऐ,रंग----अभी तो हमे सारी रात------
उस बेवफा पे मरसिया लिखना है।

Sunday, 31 August 2025

जिरह बाकी है

(जिरह बाकी है)
ऐ मेरी मोहब्बते जज---------
इतनी जल्दि कोई फैसला न दो,,,,,,,,,,
अभी दिल की अदालत मे-------
मेरी बेगुनाही का जिरह बाकी है।

यही धारावी

(यही धारावी)
मै रोज थकी मांदी,
काम से लौटती हूं जीने------
यही धारावी।
वे चारपाई पे लेटा है,धुत्त कच्ची पिये
गंदी गालियाँ दे रहा,
अभी जबरदस्ती खीचेगा,
मै अपनी ऊबकाईयां रोके,
बर्दाश्त करुंगी एक बलात्कार,
फिर उठुंगी वे सो जायेगा,
थका मांदा!
मै उल्टीयां कर,
पुरे बदन से अपने एै,रंग-------
छुड़ाऊँगी सारी रात मै यही धारवी।

Saturday, 30 August 2025

इश्क

हमारे इश्क़ के--------------
मस्जिद की अजा़न है वो,
मै शेख हुँ उसकी धड़कनो का,
मेरी साँसो की पठान है वो।
हम जीते है मुकद्दस सरियत,
मै उसका पाकिज़ा फतवा हुँ,
चुमता हुं उसे--------------
मेरी इन आँखो की कुरआन है वो।
इल्में चराग रौशन है उसमें भी,मुझमे भी 
मै उसका आसमानी गुफ्तगू हूँ,
सुनता हु उसे!
एै,रंग------वे महज एक लड़की नही,
मेरी मुकम्मल जुबान है वो।
रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo. no----7800824758

Friday, 22 August 2025

लड़कियों के ब्वॉयफ्रेंड हो गए

(लड़कियो के ब्वायफ्रेंन्ड हो गये)
स्कूल के बस्ते----------------
बढ़ते-बढ़ते बैग हो गये!
खत लिखने वाले देश की संवेदना मर गई,
दिल में रहने वाले लोग------------
सब मोबाइल में टैग हो गये।
माँ यशोदा का आँचल बदला,
वे जिंस और टाप पहन के माम हो गई,
और जितने भी पिता थे वे रफ्ता-रफ्ता डैड हो गये।
दूध-घी खाने-पीने वाले देश ने गिलास रख दिया,
अब उन्ही गिलासो में---------------
बार बालाओ के ढ़ाले पैग हो गये।
अर्द्धनग्न सड़को पे--------------
यौवन उछालती कुछ माडर्न लड़कियाे
के अश्लील और भौड़े कपड़े,
शर्म आती है लिखते,
कि जिस देश में भाई होते थे,
एै,रंग-------आज उसी देश में लड़के,
होटलो के बंद कमरो में--------------
इन लड़कियो के ब्वायफ्रेंन्ड हो गये।

###इस रचना को तर्क-वितर्क से दुर रख बस पढ़े क्योंकि ये जरुरी नही कि इससे सहमत ही हुआ जाय।

रईस की इमारत में दफन हूं

(रईस की ईमारत में दफ़न हूँ )

मै शहर के——————-
सबसे रईस की इमारत में दफ्ऩ हूँ।
मेरा शौहर कितना चाहता है मुझको,
कि महीनो से बेवा किये है बिस्तर,
मै उसी बिस्तर में दफ्ऩ हूँ।
मै शहर के—————
सबसे रईस की इमारत मे दफ्ऩ हूँ।
कालीन बिछे फर्श और इराने आईना,
वे अरब का चराग!
सब कुछ तो है लेकिन मै टूट गई झुमर सी,
बिखर के खत्म हूँ।
मै शहर के————
सबसे रईस की इमारत मे दफ्ऩ हूँ।
वे शीशमे दराज़ मै खोलती नही,
इतनी खामोश हो गई हु——–
की खुदी से बोलती नही!
वे देखो खिड़की के उस तरफ जैसे—–
अब भी खड़ा है मेरी चाहत का बेगुनाह,
मै बेवफ़ा थी उसकी,
ये आह है उसी की एै,रंग—–मै जो
शहर के सबसे रईस की इमारत में खत्म हूँ।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.------7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

Thursday, 21 August 2025

कत्ल होता है

(कत्ल होता है)
मै अपने अंदर---------
ढ़ेरो सच का गला घोट देता हूँ।
क्योकि इससे ऐ,रंग-------------
मेरे मासूम बच्चो की रोटी का-----,
कत्ल होता है।

एक शहंशाह का पत्थर

(एक शहंशाह का पत्थर)
तोड़ देती है हमें मुफ़लिसी----
वरना हम भी लाते कही से,
अपनी मूमताज़ का पत्थर।
और फिका कर देते हम अपनी चाह से---
एक शहंशाह का पत्थर।
संगतराशी देखने ज़मी पे-------
आते खुदा के फरिश्ते,
जब मै लगवाता इश्के़ इमारत में------
अपनी मुहब्बत के अल्लाह का पत्थर।
और फिका कर देते हम अपनी चाह से---
एक शहंशाह का पत्थर।
शोहरत,नुमाइश,चाँदनी रात यहाँ भी होती,
और शायर भी लिखता अपने तराशे हुये हर्फों से----------
इस कब्रगाह का पत्थर।
तोड़ देती है हमें मूफलिसी-------
वरना हम भी लाते कही से,
अपनी मूमताज़ का पत्थर।
और फिका कर देते हम अपनी चाह से,
एक शहंशाह का पत्थर।

Tuesday, 19 August 2025

गीत

(गीत)
गीत----------
केवल उर्वशी या शकुंतला नही!
ऐ,रंग----ये उस गरीब की पतीली भी है,
जिसमें कई रोज से-चावल पके नही।

पेट पढ़ना है

(पेट पढ़ना है)

अखबारे पढ़कर सो गया है शहर,
ऐ,"रंग"--
हमें तो अंधेरी रात में,
किसी वेश्या का,
पिचका हुआ पेट पढ़ना है.

खामोशी

मै खामोशी और सन्नाटा चाहता हूं,
ना जाने क्यूं
मेरे अंदर इतना शोर है,
कोलाहल है,
मै कही कुछ देर बैठ
इस भीड़ से सुस्ताना चाहता हूं,
लेकिन कहा? पता नही
अगल बगल
कोई पेड़ नही, कोई चिड़ियां नही
बस चल रहा हूं
लेकिन अपने इस चलने से
कुछ बतियाना चाहता हूं
लेकिन
वे बात करने को तैयार नही,
क्योंकि वे खुद मुझ 
कुढ़ मगज के इस दिमाग के कीड़े से 
वे खुद परेशान सी है
इसकी भी गलती नही,
शुरू शुरू में
इसने कहा तो था,
कि अरे बेवकूफ
चल मैं तेरे साथ चलने को तैयार हूं
इस कंक्रीट के जंगल की घुटन
से दूर,अपने गांव 
लेकिन मैंने ही नही सुना

Monday, 18 August 2025

व्यंग्य

पत्नी का शादी की शुरुआत का संबोधन "अजी सुनिए" और दो बच्चो की मम्मी का संबोधन "आप चुप रहिए",,,यह किसी भी भारतीय पत्नी का क्रमिक विकास है

सड़क की महारानी

(ममता बनर्जी सड़क फिल्म की महारानी है)

एक डॉक्टर 
जो इलाज करती 
वे खुद नृशंस रेप से मर गई !
कुछ 
पशुओं ने उसके स्त्री अंगों को 
नोचा, रौंदा,मसला 
वे तड़पी छटपटाई 
और पिशाच जांघो तले दब गई !
उसकी उस 
योनि से खून बहे 
जिस योनि की प्रसव पीड़ा 
इस पशु के मां को भी हुई होगी. 
शायद !
यह अघोषित 
उसकी खुद की मां की 
योनि से भी एक रेप है.
वहा एक स्तन शुदा स्त्री 
नही! नही! स्त्री नही !
बल्कि मुख्यमंत्री 
क्योंकि वह स्त्री होती 
तो उसके 
खुद के गुप्तांग और स्तन 
डॉक्टर बिटिया की 
रेप की पीड़ा से दुखते,दर्द करते 
आंखे भर आती,
यह डॉक्टर भी 
कोलकाता की निर्भया है .
मोमबत्तियां जलाओ, प्रोस्टेट करो,
इससे तुम्हारे 
माटी मानुष और सोनार बांग्ला 
का मुर्दापन बच जाएगा.
आखिर 
इस घटना पर सदन को भी तो 
थोड़ा बहुत 
घड़ियाली आंसू बहाना है,
कुछ वोट टटोलना है ,
इसके रेप की घावों से,
हिंदू मुसलमान,जाति
नही! नही!
उफ! हे भगवान 
आखिर इस डॉक्टर बिटिया का स्तन
मरने के बाद भी 
इस तरह सदन की सीढ़ियों पर 
उछल क्यूं रहा हैं ? 
शायद उसे अभी भी 
किसी की आंख में 
कुछ पानी दिख जाने की उम्मीद है 
मरने के बाद भी, 
यह डॉक्टर बिटिया कितनी पागल है 
जो नही जानती 
कि राजधानी हो या फिर कोलकाता 
इसके रेप के घाव 
कभी भरेंगे नही ,
क्योंकि उन रेप के घावों वाले अंगो को 
बार–बार दिखाकर 
एक स्त्री
वोट लेगी. 
कोलकाता की डॉक्टर बिटिया 
तुम्हारा रेप 
वहा कि मुख्यमंत्री के ,
खुद का किया रेप है 
वे स्त्री नही
बल्कि वह वहा के 
सड़क फिल्म की महारानी हैं.

यह रचना मेरी स्वरचित और अप्रकाशित है बिना अनुमति के मेरी इस रचना को शेयर ना करे.

रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी,मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
rangnathdubey90@gmail.com

Saturday, 16 August 2025

व्यंग्य

✍️एक महाशय को हमारे यहां की पुलिस ने छेड़खानी की आशंका में उन्हें 1घंटे तक चौकी पर बैठा लिया.तभी से उनकी पत्नी भी उनसे काफी डरी हुई है कि,कहीं यह उसके साथ भी कोई छेड़खानी ना कर दे😀

Tuesday, 12 August 2025

गोरखपुर

गोरखपुर के उन बह रहे तमाम आँसुओ को समर्पित एक पीड़ा-------
                                  (गोरखपुर)
चालीस बच्चो की मौत पे भी सीकन नही-------
बड़ी मोटी है तेरी सियासी खाल गोरखपुर।
आॅक्सीजन की सप्लाई रुक गई,
अभी तलक आजाद है सी.ऐम.ओ.(C.M.O.),
मुझे तो शक है कि,
इन बच्चो की मौत के है---------
यही दलाल गोरखपुर।
योगी यही के है इसी से मिट्टी डल रही है,
लेकिन जल गई है धुनी------
अब आयेंगे काग्रेंस,सपा,बसपा के लोग,
और बजायेंगे कुछ दिन नकली संवेदना लिये-----
अपने-अपने सियासी गाल गोरखपुर।
लेकिन वे आँखे भरी रहेंगी जिन आँखो में अभी तलक,
अपने बच्चे के खेलने,
और कानो को सुनने की किलकारियाँ थी,
शायद कभी नही भरेंगे,
उन बच्चो के खोने के ये घाव,
रुह कांप जायेगी इनकी ता उम्र,
और हमेशा इनकी जेहन मे रहेगा------
एक दर्द बनके तेरा अस्पताल गोरखपुर।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर--प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Monday, 11 August 2025

कोई मेले लगे

(कोई मेले लगे)
पन्द्रह अगस्त की आँखो से------
आँसू बहने लगे,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,.
क्योकि शहिदो की मज़ार पे ऐ,रंग-----
न तो चराग जला---------
और न ही कोई मेले लगे।

अशफाक लिखा था

(अशफ़ाक लिखा है)
हमने गीता और कुरआन से भी ज्यादा,
ऐ मादरे वतन-----------
तेरी मिट्टी को पाक लिखा है।
जो जला है उसे राम प्रसाद बिस्मिल,
और जो दफ़न है-------
उसको अशफ़ाक लिखा है।
###पन्द्रह अगस्त तक मै राष्ट्र को समर्पित रचनाओ और उनकी शहादत के संम्मान में अपनी भाव संवेदनाओ की श्रद्धांजलि के साथ मै मुसलसल इस फेसबुक पे आपके साथ एक सफर करता रहुंगा----जय हिन्द।

मां

(माँ)
तेरा हर बेटा मुल्क की खातिर-------
यूं शहीद और कुर्बान हो माँ!
ना बटने दे किसी को मजहब के नाम पे,
समय से पूजा समय से अजा़न हो माँ।
फक्र हो तुम्हे अपने आँचल और दूध पे,
तेरी लोरी में राष्ट्र हो और राष्ट्रगान हो माँ।
ना पंजाब,ना गुजरात,ना महाराष्ट्र निकले,
आखिरी लम्हें गर लब भी फड़फड़ाये,
तो लब पे तुम और हिन्दुस्तान हो माँ।
गर सुपुर्द-ऐ-खाक होने लगू,
तो मुट्ठी में मुल्क की मिट्टी-------
और डालने वाले के होंठो पे मुस्कान हो माँ।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
एडवोकेट कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
###आप सभी को हमारे मुल्क की ये आजाद सुबह मुबारक हो।

टिप्पणी

✍️✍️जब 18 से 30 वर्ष की उम्र के लड़के किसी माफिया या बाहुबली के जन्मदिन या फिर उनकी मैरिज एनिवर्सरी के बधाई देने की फोटो अपने फेसबुक पर सगर्व लगाने लगे तो समझ जाइए कि ऐसे लड़के के भविष्य का सत्यानाश तय है,,,,,,😢😢

Sunday, 10 August 2025

आ गया पंद्रह अगस्त

(आ गया पन्द्रह अगस्त)
इस साल भी---------------
बेरोजगार युवाओ का लिये कष्ट,
आ गया पन्द्रह अगस्त।
देखो जितने मे सीमेंट उतने मे ही बालू ,
कहां जाये मजूरा,
वे खाली पेट कैसे गायेगा विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
सच पुछिये तो सारी नीतियो से----------
देश का आखिरी व्यक्ति है पस्त,
आ गया पन्द्रह अगस्त।
सब्जियां आसमान छु रही टमाटर लग रहे अँग्रेज़ से,
जीयसटी भी केवल कागज़ी इंकलाब बन के रह गया,
कालाधन भी शिगुफे की तरह आया और चला गया,
और गढ्ढा युक्त सड़को से गुजरती प्रभात फेरी,
यानि---------------
वही पुराने हालात और पुराना वक़्त,
आ गया पन्द्रह अगस्त।
एै "रंग" कुछ नही बदलेगा,
क्योंकि हमारी नैतिकता हर रोज मरती है,
हम गुँगे हो जाते है जातियो मे बट,
तो कहां हो पायेगा दुर इस देश से,
शिक्षा,स्वास्थ्य,सुरक्षा जैसी महामारियो का कष्ट,
आ गया पन्द्रह अगस्त।
जरा सोचो-----------
उसी पुराने रुटीन की तरह फिर फहरेगा तिरंगा,
और फहरायेगा कौन----------
किसी विभाग का कोई मंत्री या उसी विभाग का,
कोई उससे बड़ा भ्रष्ट---------
आ गया पन्द्रह अगस्त।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
mo.no.--------7800824758

Saturday, 9 August 2025

असफाक लिखा है

(अश़फाक लिखा है)
हमने गीता और कूर्आन से भी ज्यादा--
ऐ मादरे वतन----------
तेरी मिट्टी को पाक लिखा है।
जो जला है उसे राम प्रसाद बिस्मील़---
और जो दफ्ऩ है उसको अशफ़ाक लिखा है।

Friday, 8 August 2025

भरपेट दूध मिलेगा

(भरपेट दूध मिलेगा)
झोपड़ी से-नरगिस के सिसकने की----
आवाज आ रही है!
ऐ,रंग--आज शायद उसके भूखे बेटे को-
भरपेट दूध मिलेगा।

नीला आसमा सो गया है

(नीला आसमा सो गया है)
वक्त के सानो पे सर रख नही पाई,
ऐै ",रंग "-------------
इस रेखा की चाहत और ख्व़ाहिशो का भी ,
नीला आसमा सो गया है।

वंदे मातरम गाए

(वंदे मातरम गाये)

शहीद की लाश को जब गाँव दफनाये, 
तो वंदे मातरम गाये.

ना बीबी तोड़े चुड़ी,ना आँसू बहाये, 
माँ भी हँसती हुई सबके,सामने आये, 
ऐ,"रंग"--
इस शहीद की है आखिरी इच्छा,,
कि सरहद पे मेरा बेटा भी, 
होके लहू-लूहान---
वंदे मातरम गाये.

वंदेमातरम वंदेमातरम।

ब्रा नहीं देखा

बांग्लादेश के आंदोलन की सबसे घृणित तस्वीर--
(ब्रा नही देखा)

कैसे मान लूं कि इसने 
छत पर सूखता हुआ 
अपनी बहन 
या मां का ब्रा नही देखा.

कैसे मान लूं कि, इस इंकलाबी ने 
कभी बंद दरवाजे की झिर्री से 
अपने अब्बू के हाथों 
अम्मी का खोलकर 
इधर–उधर फेकते 
ब्रा नही देखा.

कैसे मान लूं कि, 
दूसरो की बहनों के दोनों वे 
कैसे कसे है ब्रा में
ये खोलने 
पर कैसे दिखेंगे 
लार बहाता रहा 
लेकिन 
कभी खुद की बहन का
ब्रा से कसा हुआ वे 
कितना है छोटा  
या बड़ा नही देखा .

इसकी 
जम्हूरियत वहा से भाग आई 
लेकिन
हमारे यहां की दोगली सियासत 
इसके साथ है 
जबकि किसी आंदोलन में 
कभी मैंने 
किसी युवा को 
अपनी देश की औरतों के सीने का 
यूं बेहूदगी से लहराते हुए 
ब्रा नही देखा.

कितनी गूंगी हो गई है
स्त्री विमर्श की 
स्त्रियां 
जो बात–बात पर बड़ी स्वच्छंदता से 
इसे बांधती खोलती 
और इसके लिए लड़ती है
शायद! इन्होंने 
अभी किसी कहानी के लिहाज से 
इसके दोनों हाथों में
अपने खुद का 
ब्रा नही देखा.

यह रचना मेरी स्वरचित और अप्रकाशित है.

रचना--रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी,मियांपुर 
जिला--जौनपुर 222002 (U P)

Thursday, 7 August 2025

(सावन )

( सावन ! अट्ठारह साल की लड़की है) 

सावन-----------
सीधे-साधे गाँव की,
एक अट्ठारह साल की लड़की है.
भाभी की चुहल और शरारत,
बाँहों मे भरके कसना-छोड़ना,
एक सिहरन से भर उठी-------
वे सुर्ख से गाल की लड़की है.
सावन--------
सीधे-साधे गाँव की,
एक अट्ठारह साल की लड़की है.

वे उसका धान की खेतों से तर-बतर,
बारिश मे भीगते हुये,
घर की तरफ लौटना,
और उस लौटने मे उसके,
पाँव की सकुचाहट,
उफ! गाँव मे सावन--------
बहुत ही मादक और कमाल की लड़की है.
सावन---------
सीधे-साधे गाँव की,
एक अट्ठारह साल की लड़की है.

न शायर,न कवि, न नज़्म, न कविता
वे उर्दू और हिन्दी दोनो से कही ऊपर,
किसी देवता,फरिश्ते के हाथ से छुटी,
इस जमीं पे उनके--------
खयाल की लड़की है.
सावन----------
सीधे-साधे गाँव की,
एक अट्ठारह साल की लड़की है.

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर
जिला---जौनपुर--222002 (उत्तर-प्रदेश).
Mo.no.-----7800824758.

यह कविता मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

जुगनू बहुत रोए

(जुगनू बहुत रोए)
शहर की आमद में 
जब पीपल कटा 
तो ऐ,"रंग"--मेरे गाँव के जुगनू बहुत रोए.

बांग्लादेश के हालात पर एक रचना

बांग्लादेश के वर्तमान हालात पर लिखी एक रचना-------(मोहब्बत लिखूं)

मैं बांग्लादेश के 
किस जलती हुई लाश पर मोहब्बत लिखूं?
मेरे भारत के गूंगे लोग,, 
बोलो !
"जम्हूरियत वहां से जान बचा के आई है."
उसके खून के आंसू 
कैसे सूखेंगे ?
कौन सुनेगा वहा 
मैं किसकी "अरदास पर मोहब्बत लिखूं ?"
मैं मानता हूं कि –
यह मौत धर्म या मजहब की नहीं  
इंसान की है 
लेकिन मैं वहां किसकी 
"आखरी सांस पर मोहब्बत लिखूं ?"
एक मुल्क की 
जम्हूरियत 
सवालों के घेरे में है 
वहा दीन,ईमान,मस्जिद
सब पर 
एक डर काबिज है
आखिर मैं किस चोट 
"और किस खराश पर मोहब्बत लिखूं ?"

यह रचना मेरी स्वरचित और अप्रकाशित है बिना अनुमति के इस रचना को कही शेयर ना करे.

रचनाकार--रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी,मियांपुर 
जिला--जौनपुर 222002 (U P)

टिप्पणी

✍️✍️अमेरिका के सामने अब राजनीति को अटल और इंदिरा होने की जरूरत है यह मेरा व्यक्तिगत मानना है 🙏🙏

Monday, 4 August 2025

व्यंग्य

✍️✍️कुछ लोग तो इतना ज्यादा ऑन लाइन साहित्य सम्मान पा चुके है कि उनसे ज्यादा साहित्य सम्मान तो हिंदी के किसी पाठ्यक्रम में शामिल शायद ही किसी हिंदी लेखक को मिला हो🥸🥸

Thursday, 31 July 2025

कोई दीवाना रोया है

(दिवाना रोया है)
ये जो सारी रात------------
शहर मे बरसात हुई है,
कही किसी की याद मे----
कोई दिवाना रोया है।
ये बिजली,ये चमक--------
किसी बंद हवेली के जले चराग से,
लिपट------------------
आखरी लम्हे कोई परवाना रोया है।
कल सहर के बाद--------------
निकल के देखना तुम आलमे बारिश,
एक हमी है जो जानेगे,
कि कल सारी रात तड़प के----
किसी का अफसाना रोया है।
ये जो सारी रात--------------
शहर मे बरसात हुई है,
एै,रंग------किसी की याद मे,
कोई दिवाना रोया है।

Wednesday, 30 July 2025

(भाई के बांधे चिर पर)

(भाई के बांधे चीर पर)
जुये में द्रोपदी को हारकर-------
जब झुक गये पतियो के सर,
गुँगी हो गई सभा-------------
रो उठी फिर द्रोपदी,
अपने इस तकदीर पर।
वे भी जुआ खेल गई आखिरी लम्हे----
अपने कृष्ण जैसे बीर।
दौड़ पड़े नंगे पाँव कृष्ण भी-----
तब बहन की पीर पर।
गर न आते टूट जाती रस्म राखी की,
फिर कोई भाई ना आता मायके से,
ना फक्र करती एक बहन,
दूःख के दिनो में------------
अपने भाई को बांधे चीर पर।

###रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
एडवोकेट कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
@@@आप सभी को रक्षाबंधन पर्व की ढ़ेरो बधाई।

(बहन की राखी है)

(बहन की राखी है)
एक तरफ दुश्मन की गोलियां,
एक तरफ-----------------------
आज तेरे फौज वाले भाई की छाती है।
मुआफ करना बहन----------
शायद मै आ न सकुंगा!
मै जानता हु कि तुझसे किया-------
एक अहद एक वचन बाकी है।
गर हो सके तो फक्र करना,
अपने शहीद भाई पे!
सुना है शहीद की मौत पर भी,
हमारे मुल्क की बहन करके दिया,
बीना रोये घंटो आरती गाती है।
एै,रंग----------------------
तु भी देख लहराते तिरंगे की तरफ,
उसी में बंधी---------------------
हर बहन की राखी है।

####आप सभी को रक्षाबंधन पर्व की ढ़ेरो बधाई।

(पंद्रह अगस्त)

(पन्द्रह अगस्त)
अपनो के ही हाथो----
सरसैंया पे पिड़ाओ के तीर से विंधा,
भीष्म सा पड़ा है----
पन्द्रह अगस्त.

सड़को पे द्रोपदी के रेप के दृश्यो ने,
फिर भर दी है आजाद देश के
उन तमाम शहीदो की आँखे,
और उनकी रुह के सामने!
शर्म से खड़ा है----
पन्द्रह अगस्त.

बहुत बिरान है मजा़रे कही मेला नही लगता,
ये सच है-----
कि हम शहिदो की शहादत के दगाबाज है,
फिर भी एै,रंग-------------
ये लहराते तिरंगे कह रहे,
कि हमारी तुम्हारी सोच से भी कही ज्यादा,
विशाल और बड़ा है-----
पन्द्रह अगस्त. 

यह कविता मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है. 

रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin. no. 222002 (U P)
Mo. no. 7800824758

(मीनारों को बख्श दो)

✍️✍️तुम्हें मरना है तो मरो मजहब के नाम पर,
लेकिन ऐ "रंग" तुम इन 
 मंदिर और मस्जिद की मिनारों को बख्श दो.🥲🥲

Tuesday, 29 July 2025

रोटी गाती रही

(रोटी गाती रही)
भूखी माँ सूबह तलक---------
भूख से बिलबिलाती बेटी के लिये,,,,,,,,,
लोरी गाती रही।
पड़ोसियो ने कहा बेटी मर गई-------
ऐ,रंग----वे इस सबसे बेखबर-------
कहके चाँद को रोटी गाती रही।

(रेप के घाव)

(रेप के घाव)
थाने पे--------
एक गरीब की बिटिया,
अपनी सलवार उतारे---------
जगह-जगह हुये रेप के घाव दिखा रही है।
दरोगा----------
बार-बार थप थपाके देख रहा,
दाँत और नाखून चुभे---------
उरोजो को बार-बार।
लड़की सिहर उठी---उसी रेप के छुअन कासा,
ऐहसास हुआ उसे!
वे समझ गई आँख भर-भरा आई उसकी,
कि अब एक रात और चीखेगी थाने पे,
फिर हरे हो जायेंगे---------------
ना भरने के लिये उसकी उरोजो पे ताजिंदगी,
एै,रंग-----------ये रेप के घाव।

देवता कौन हैं

(देवता कौन है?)
अधर पे गलिज़गी है सबके---------
तो फिर इस शहर मे देवता कौन है?।
खामि अय्यासपन की तकती है जवान लड़की,
आखिर बताओ----------
तुम्हारे घर की जवान लड़की को तकता कौन है?।
अधर पे गलिज़गी है सबके--------
तो फिर इस शहर मे देवता कौन है?।
गरीब क्या जाने,हदीस,तकरीर,मज़हब,
वे रोटी की खातिर--------
मजदूरी मंदिर और मस्जिद दोनो मे कर रहा है,
आखिर इन्हें----------
हिन्दू और मुसलमान कहता कौन है?।
अधर पे गलिज़गी है सबके--------
तो फिर इस शहर मे देवता कौन है?।
हर दंगे मे जलते है घर तबाह होती है बस्तियाँ,
इन घरो मे तो जिंदा इंसान रहते है,
एै "रंग" बताओ तुम्हें गीता और कुरान की कसम,
कि आखिर-----------
इस मंदिर और मस्जिद मे रहता कौन है?।
अधर पे गलिज़गी है सबके---------
तो फिर इस शहर मे देवता कौन है?।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-------7800824758

सियासत मार दे मुझको

कलम के 
सिरहाने,मैं सफेद धागा बांध के लिखता हूं,
क्या पता ऐ "रंग"
कब सियासत मार दे मुझको .

Tuesday, 22 July 2025

(चूल्हा नहीं जलता)

(चूल्हा नही जलता)
तुम तो बात-बात मे शहर जलाना जानते हो------------------
तुम्हारे पास तो कौमो को जलाने का ईधन है।
पर यहाँ फाकाकश़ी सोने नही देती---
पेट तो जलता है ऐ,रंग--------
पर इस बस्ती में अक्सर चूल्हा नही जलता।

पीड़ा

✍️✍️पांचवी बेटी के पैदा होते ही पिता ने की खुदकुशी,,,,,ऐसे व्यक्ति को जब अखबार में पिता लिखा जाता है तो मुझे बड़ी पीड़ा होती है,,,,आखिर उन पांच बच्चियों की मां का क्या होगा? क्या वह पांचो बार अपनी स्वेच्छा से एक बेटे के लिए मां बनने को तैयार हुई होगी शायद नही?😢😢😢😢

विशेष---"मैं ऐसे नीच और अधम व्यक्तियों के पिता लिखे जाने के खिलाफ हूं"

Monday, 21 July 2025

धान की फसलें

(धान की फसले)
मैने इतनी खूबसूरती नही देखी------
ऐ,रंग------इससे पहले,,,,,,,,,,,,,,,
वे बलखाती हुई------------
रोप रही थी-धान की फसले।

व्यंग्य

✍️✍️हमारे देश में द्विवेदी से ज्यादा चतुर्वेदी व्यंग्य लिखते हैं,,क्योंकि हम द्विवेदियों के यहां, जहां पति बुद्धिमान होते है,वही चतुर्वेदियों के यहां उनकी पत्नियां.... 😃😃

Saturday, 19 July 2025

गुरु शिष्य का मान

(गुरु शिष्य का मान बढ़ा देता है)
कौन कहता है?
कि एकलब्य यु ही अपने गुरु को--
काट अँगूठा देता है।
अरे तासीर तो देखो-------
कि वे बुत से भी अपने शिष्य को,
कितना ज्ञान अनुठा देता है।
एक जुलाहा,कालीन का बुनकर 
गुरु की चाह में सो जाता है सीढ़ियो पर,
वही कबीर बन गुरु को दर्जा---------
मंदिर के भगवान से भी ऊँचा देता है।
देश के संकट की घड़ी में भी,
गुरु गोबिंद सिंह--------------
मुगलियाँ सल्तनत के सवा लाखो से,
अपने एक-एक बेटो को लड़ा देता है,
यु ही नही झुकाते हम सर गुरु पुर्णिमा को,
एै,रंग-----गुरु वे है जो देश और
शिष्य का मान बढ़ा देता है।

###इस रचना को पुरा पढ़ हमारे देश की इस महान परंम्परा पर गर्व करे।
आप सभी को गुरु पूर्णिमा की बधाई।
कृपया----पुर्णिमा को संशोधित कर पूर्णिमा पढ़े।

Wednesday, 16 July 2025

आर्केस्ट्रा पर नाचती रही

(आॅरकेस्टा पे नाचती रही)
मेकप से छिपा के अपने मासूम का दर्द,
एक माँ------------------
अर्धनग्न पुरी रात ऐ,रंग--------
आॅरकेस्टा पे नाचती रही।

व्यंग्य

✍️✍️कुछ पति-पत्नी ऐसे हंसते हैं कि,– जैसे दोनों की शादी "अपहरण पद्धति से हुई हो" 😃😃

Tuesday, 15 July 2025

(आज बादल)

(फिर घिरे आज बादल)
सारे शहर में फिरे आज बादल,
तुम्हे देखकर फिर घिरे आज बादल।
है तेरी हुस्न के ये बादल भी मारे,
ये जाना सनम--------------
जब तुम्हे चुमने की हसरत लिये,
आपस मे ही खुद भिड़े आज बादल।
सारे शहर में फिरे आज बादल,
तुम्हे देखकर फिर घिरे आज बादल।
मांगा सभी ने पानी मगर,
ना सुनी बादलो ने-------
किसी की दुआ!
वे तो तुम थी हमारे शहर में सनम,
जो बूँद बनकर ज़मी पे गिरे आज बादल।
सारे शहर में फिरे आज बादल,
तुम्हे देखकर फिर घिरे आज बादल।

###हमारे शहर में आज लगातार बादल घेरे हुये है अब बरसात कितनी होती है ये बात की बात है।

(शराब नहीं लेकिन)

(शराब नही लेकिन)
तेरी सरिया मे शराब नहीं लेकिन-----------
हम पीने वालो के लिये खराब नही लेकिन।
हम बाँट लेते है अक्सर नशे मे जूठन भी-----
यहाँ के पंडित और मियाँ का जवाब नही लेकिन,
तेरी सरिया मे शराब नही लेकिन।
ना वे गीता जानता है और न मै कुरान की आयत,
जबकि उसका घर मंदिर की तरफ है,
और मेरा घर मस्जिद की तरफ है,
हमारे लिये जुम़ा और मंगलवार एक सा है,
हम पीते है,किसी दिन का हमारे पास एै"रंग"-----
कोई हिसाब नही लेकिन।
तेरी सरिया मे शराब नही लेकिन,
हम पीने वालो के लिये खराब नही लेकिन----
तेरी सरिया मे शराब नही लेकिन।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.----7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

युवा सृजन

युवा सृजन
___________________________________
www.yuvasrijan.com
युवा सृजन मासिक वेब पत्रिका का जून अंक अब आपके सामने है । आपको इस अंक में बहुत सी प्यारी कविताएँ,कहानी,लेख अन्य पढ़ने को मिलेगा सभी रचनाएँ बहुत ही अच्छी और पठनीय हैं ,बतौर पाठक मुझे कविता कादंबरी didu, Ankita Shambhawi ,विशाखा मुलमुले, Rangnath Dubey स्नेहा सिंह ,पूजा शकुंतला शुक्ला,शिव कुशवाहा, रामनगीना मौर्य ,डॉ हंसा दीप जी की रचनायें ज्यादा पसन्द आयी बाकी आप पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया दें ।रचनाओं पर पाठकीय प्रतिक्रिया इसलिए भी जरूरी है क्योंकि इन्हीं प्रतिक्रियाओं को ध्यान में रखकर हम सृजनलोक प्रकाशन द्वारा दिया जाने वाला सृजनलोक सम्मान -2021 भी प्रदान करेंगें ।इसके अलावा एक और बात कहना चाहूंगा पत्रिका के आने के बाद आप सभी का जितना सहयोग और स्नेह हमें प्राप्त हुआ वो सच में हमारे लिए मायने रखता है उसके लिए मैं आप सबका आभारी हूँ, ये स्नेह यूँ ही बनाये रखिये ।

___________________________________

पत्रिका मासिक : 10 रु मात्र
वार्षिक शुल्क -120 रु (गूगल पे - 73582-93478)
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1- आपके दिए गए सहयोग राशि सिर्फ और सिर्फ हिंदी और साहित्य के प्रचार-प्रसार और पत्रिका से जुड़े युवा साथियों को प्रोत्साहित करने के लिए ही खर्च किये जायेंगे। 
2 - आगामी अंक के लिए आप सभी की रचनाएँ आमंत्रित हैं ,आप इस अंक के लिए 30 जुलाई तक हमें अपनी रचनाएँ भेज सकते हैं ।
उप सम्पादक 
आशीष जायसवाल
ashishjaiswal916@gmail.com
yuvasrijan.patrika@gmail.com

व्यंग्य

वैसे इस मौसम में पता नहीं क्यों मुझे खूबसूरत टमाटरों को देखकर उन्हें प्यार से साली कहने की इच्छा होती है,,,,शायद ऐसा इनके महंगे होने की वजह से होता है

व्यंग्य

✍️✍️ एक अप्रमाणित रिसर्च के अनुसार किसी बड़े पद पर आसीन "महिला उच्चाधिकारी के बेरोजगार पति की हालत बिना फिल्टर के बीड़ी की तरह होती है"😃😃

Monday, 14 July 2025

शिकारे वाली लड़की

(शीकारे वाली लड़की)
मुझे बार-बार याद आती है,
वे शीकारे वाली लड़की!
डलझील की मदमस्त लहरो को,
वे उसका एकटक देखना,
फिर जादुई हँसी,
हाय!जाने कहाँ खो गई,
वे अदभुत नजारे वाली लड़की,
मुझे बार-बार याद आती है,
वे शीकारे वाली लड़की।
वे उसका तिलिस्मी बदन,
और उसके जुड़े से निकलती वे गुलाब की खुशबू,
अब कही नही मिलती सुघने को,
और कही नही दिखती मुझे,
वे लश्कारे वाली लड़की,
मुझे बार-बार याद आती है,
वे शीकारे वाली लड़की।
पहाड़ो की वे ढ़लती शाम,
वे संगीतमय आवाजे,वे बाँसुरी के स्वर
कही कुछ नही!
बस तन्हाई मे यादो की चंद तस्बीर,
जो हवाओ के झोके से फड़फड़ाती है,
और मै निकल आता हु यादो से उसकी,
बस रह जाती है याद जेहन में,
वे शीकारे वाली लड़की।

###न जाने कब घाटियो मे अब अमन के दिन लौटेगे,न जाने फिर कब डलझील में दिखेगी हम शायरो और कवियो की वे शीकारे वाली लड़की।

एक सफल चंद्रयान

(एक सफल चंद्रयान)

आन,बान, शान 
बेटी है राष्ट्रगान,,
फौलादी हौसले है,इतने 
कि छूने उड़ चली है देखो--
वे सारा आसमान.

फक्र है तुम पर
कि तुमने,
चूल्हे,चौके,बर्तन
से इतर लिखी है
खुद की एक पहचान.,

तुम सिर्फ बेटी,बहु,पत्नी नहीं
बल्कि हो इसरो की
एक सफल चंद्रयान 

✍️✍️🇮🇷🇮🇷🇮🇷🎺🎺🎷🎷

रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी,मियांपुर
जौनपुर--220022 (U P)
mo.no.7800824758

मजाक

✍️✍️इसको इसके अंतरंग वस्त्रों में नचाकर अंबानी ने इसके घमंड रूपी शरीर के मोबाइल को,भारत के जीवो नेटवर्क से जोड़ दिया,,,अब यह कहीं भी नाचेगी तो हैंग करेगी इसलिए रिचार्ज पर मत जाइए बल्कि रिचार्ज की देशभक्ति पर जाइए😃😃😃😃

Saturday, 12 July 2025

गजलों का बदन बेच दिया

(गज़लो का बदन बेच दिया)

एक गरीब शायर को-
भूख ने कुछ इस कदर तोड़ा,
कि ए "रंग"

उसने रोटी के लिये,
एक रईस को---
अपनी गज़लो का बदन बेच दिया.

दर्जन भर बच्चे हैं

विश्व जनसंख्या दिवस पे एक व्यंग्यात्मक कविता ।
                    (दर्जन भर बच्चे है) 
हमारे शौहर बहुत अच्छे है, 
उन्हीं के फजल से---------
तो दर्जन भर बच्चे है ।
कोई सुखी खाता है, 
तो कोई चटनी से रोटियाँ,
हाय! मेरे बच्चों के अब्बू की मोहब्बत, 
कि मर जाऊ,
इतनी मेरे मेकप और बादाम के खर्चे है.
हमारे शौहर बहुत अच्छे है, 
उन्ही के फजल से--------
तो दर्जन भर बच्चे है. 
अभी कल ही आई थी अस्पताल से समझाने ,
एक कलमुही मैम, 
मै बिगड़ गई उसी पे कि तु क्या जाने, 
मेरे बच्चे के अब्बू ----------
अभी भी मर्द अब्बल दर्जे है. 
हमारे शौहर बहुत अच्छे है, 
उन्ही के फजल से---------
तो दर्जन भर बच्चे है. 
वे कटोरे भर तेल की मालिश, 
और सैकड़ों दंड बैठक या अल्लाह, 
फिर उनका मेरा कनखियों से देखना, 
यू लगता है कि जैसे, 
मेरे पेट मे कुछ और बच्चे है.
हमारे शौहर बहुत अच्छे है, 
उन्ही के फजल से--------
तो दर्जन भर बच्चे है. 

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी ।
जज कालोनी, मियाँपुर 
जौनपुर---222002 (उत्तर प्रदेश) ।
no. no. 7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है ।

खत नहीं था

(खत नही था)
जो दी थी उसने कभी लरज़ते हाथ से,
वे खत नही था।
थी उसके धड़कनो की गज़ल,
हर हर्फ में वे थी मेरे रुबरु,
पुरी रात जैसे थी रुबाई की,
चराग जल रहा था----------
उस रौशनी में मोहब्बत थी,
कोई खत नही था।
एक खुशबू थी भीनी सी हर साँस मे,
ये आँख ठहरी रह गई,
सहर होने तलक एै,रंग-------
मेरी अँगुलियो मे वे थी,
कोई खत नही था।
###सहर होने तलक--सुबह होने तलक।

व्यंग्य

😃😃 मेरे ख्याल से भूतपूर्व प्रेमियों के लिए एक "भूतपूर्व प्रेमिका" नाम की मासिक पत्रिका निकलनी चाहिए जिसके संपादन का सारा दायित्व किसी योग्य और अनुभवी भूतपूर्व प्रेमी से कराया जाए😃😃

Wednesday, 9 July 2025

(सावन चला गया)

(सावन चला गया)

झूले चले गये,कज़री चली गई,
मेहमान तो आते रहे गाँव मे लेकिन,
पर पहले जो आता था-
वे पाहून चला गया.

ऐ,"रंग"
धीरे-धीरे ये हादसा हुआ,
बारिश तो हुई लेकिन,
गाँव से मेरे सावन चला गया.

पाहून--मेहमान 

स्वरचित और अप्रकाशित है 

रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जौनपुर 222002 (U P)

Monday, 7 July 2025

(मौतें बड़ी विरान होती हैं)

(मौते बड़ी विरान होती है) 

बेशक----
सारे शहर का हुज़ूम उमड़ता है, 
शख्शे शोह़रत के जनाज़े मे.

पर ऐ,रंग----
ऐसी मौते बड़ी विरान होती है।

Thursday, 3 July 2025

(लाल किताब हो)

(लाल किताब हो)
तेरे दिदारे हूश्ऩ मे कोई कैसे कामियाब हो,,
तुम नकाब़ के बाद भी नकाब़ हो।
सच तो ये है कि तुम-----------
टोने-टोटके की लाल किताब हो।

(कुरान देख रहे हो)

(कुरान देख रहे हो)
माहे रमज़ान में--------------
जो तुम बेगुनाहो का गला रेत रहे हो,
बताओ इन लाशो में-------------
तुम कौन सा इस्लाम देख रहे हो।
कल मस्जिदे शर्मिंदा थी,
गला भरा था अजा़न का,
जैसे इन लाशो मे हो हर कोई अपना,
सारे मुसलमान का,
मोहब्बत आयत है हमारे मज़हब की,
तुम उसपे ही किचड़ फेक रहे हो।
तुमने छिन कर बेटा,
अमीना को रुलाया है,
पुरी दुनिया के मुसलमानो-------
के मदिना को रुलाया है,
खाक हो जाओगे----------
तुम उसी पत्थर से,
जिस पत्थर को तुम------
माँ के आँचल की तरफ फेक रहे हो।
थू है तुमपे एै इस्लामीके स्टेट,
कभी न कुबूलेगा दुनिया का मुसलमान,
वे जानता है,रंग----------------
कि किस नज़र से तुम कुरान देख रहे हो।

###बाग्लादेश मे गला रेत कर आतंकियो के द्वारा मारे गये सभी बेगुनाहो को मेरी एक श्रद्धांजलि।

व्यंग्य

😃😃शादी करने वाले ज्यादातर पुरुष अनुलोम विलोम करते हैं क्योंकि जब इनकी पत्नी मायके जाती है तब यह सांस लेते हैं और जब मायके से लौट आती है तब यह सांस छोड़ते हैं😃😃

Wednesday, 2 July 2025

(पहला सावन था)

(पहला सावन था)
जब तुम भीगे थे,मै भीगी थी
वे पहला सावन था।
सिहर के तेरे सीने से,
शर्मा के लिपटी थी
वे तेरी बाँहो का,मेरी बाँहो से-----
पहला सावन था।
तुमने होंठो पे रंखा था,होंठ मेरे
वे तेरी होंठो का,मेरी होंठो पे-----
पहला सावन था।
तुम बूँद-बूँद भीगे थे,
मै साँस-साँस भीगी थी----
वे तेरी साँसो का,मेरी साँसो से
पहला सावन था।
जब तुम भीगे थे,मै भीगी थी------
वे पहला सावन था।

###आज हमारे शहर के बरसात की रोमानियत है ये।

(रोटियां किस कौम की हैं)

(रोटियां किस कौम की है)

भरे पेट 
हिंदू मुसलमान होना आसान है,,
पर ऐ "रंग" 
किसी भूखे से पूछ
कि उसकी रोटियां किस कौम की है✍️✍️

व्यंग्य

😀😀 अगर विवाह के कई वर्षों के बाद पत्नियां ज्वालामुखी हो जाती है तो पति भी तब तलक इतने वर्षों में "अग्निशमन यंत्र हो चुके होते हैं"😀😀

Tuesday, 1 July 2025

व्यंग्य

😀😀कुछ लोगो के नाम के साथ जब मैं राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय व्यंग्यकार लिखा हुआ पढ़ता हूं,,,तो मुझे ऐसा लगता है कि जैसे "कोई फला व्यक्ति किसी का कालर पड़कर भाई साहब कह रहा हो" 😀😀

Monday, 30 June 2025

एक खूबसूरत फिल्म थी

(एक खूबसूरत फिल्म थी)
मेरी हर एक साँस,मेरे दिल में थी,,,,,,,
वे मेरी आँखो के कैमरे मे थी।
ऐ,रंग----बाद मे जाना कि वे बेवफा---
बस एक खूबसूरत फिल्म थी।

Sunday, 29 June 2025

राग मल्हार सा गया गाता हूं

(राग मल्हार सा गाता हूँ)
घीर आते है बादल,बरसात बहुत होती है,,
ऐ,रंग----------------
जब मै उसे,राग मल्हार सा गाता हूँ।

कामायनी की तरह पढ़ो

("कामायनी" की तरह पढ़ो)

धूल की एक मोटी परत सी जम गई है
तेरे जाने के बाद,

मैंने भी पलटे नहीं 
अपनी जिस्म के पन्ने,

आओ तुम मुझे 
दूर तलक ले चलो,
मेरे मनु---

और
अगले प्रलय तक
तुम मुझे 

"कामायनी" की तरह पढ़ो.

✍️✍️यह मेरे द्वारा स्व-रचित व अप्रकाशित है इसका बिना मेरी अनुमति के कही अन्य फेसबुक पर ना लगाए अगर शेयर भी करे तो पूर्णतः मेरे नाम और पते के साथ 🙏🙏

रचनाकार--रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी,मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)

Saturday, 28 June 2025

ज्यादा देवता मिलते हैं

(ज्यादा देवता मिलते है)
हाँ!मै तलाशता हूँ------------
अँधेरी रात में आवारा गज़ल,,,,,,,,,,,
क्योकि ऐ,रंग------------
उजाले में ज्यादा देवता मिलते है।

इस्लाम और मां

(इस्लाम और माँ)
ऐ इस्लाम़ के चंद काफ़िरो!
तुम्हारी बेज़ा फतवो से---
इसकी ईज्जत कम नही होती।
क्यूँकि ऐ,रंग--------
मूल्क़ वे मुकद्दस माँ है,
जो कभी मज़हब नही होती।

@@कुछ तथाकथित बेज़ा फतवे के खिलाफ ऐक सच।

(इश्क करके)

(इश्क़ करके)

ना पढ़ सकी कोई किताब, 
मै इश्क़ करके.

मै औरत सुफि हो गई 
इश्क़ करके.

मौलाना और तकरीरे मस्जिद, 
तुम्हे मुबारक!
मै खुद हो गई----
मुकम्मल मुसलमान 
इश्क़ करके.

ये हिज़ाब,ये परदे,ये चारदीवारी 
कैद है औरत की,

तुम क्या निकालोगे इस कैद से मुझको,
मै खुद ही छोड़े जा रही,
अपने जिस्म का मकान, 
ऐ,रंग-
इश्क़ करके. 

रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर (उत्तर-प्रदेश ).

व्यंग्य

😄😄बेचारे गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे है,,बस ले देकर किसी तरह उनके पास एक स्मार्ट फोन,एक फूल स्क्रीन टीबी, एक वाशिंग मशीन और एक मोटर साइकिल भर है बस 😃😃

Thursday, 26 June 2025

व्यंग्य

😀😀अगर आपके दिन की शुरुआत पत्नी के हंसने और मुस्कुराने से हुई है,,तो उस दिन आपको अपने राशिफल के बारे मे जानने की कोई विशेष आवश्यकता नहीं है😃😃

Wednesday, 25 June 2025

(रोटी किस कौम की है)

(रोटी किस कौम की है)
भरे पेट हिंन्दू-मूसलमां होना आसान है,,,,,
पर ऐ,रंग---किसी भूखे से पुछ------
कि उसकी रोटियाँ किस कौम की है।

(जुल्फों में बांध लेती है)

(जूल्फों में बांध लेती है)
उतरते है,घिरते है उसकी जूल्फों की तरफ बादल,
और वे इन बादलो को-------------
अपनी जूल्फों में बांध लेती है।
वे हुस्ऩ-ए-ज़ीनत है शहर की,
लोग तकते है उसके छत की तरफ,
वे उम्मीद-ए-बरसात है,
जो एक अदा से------------
अपनी जूल्फ़ो में सावन बांध लेती है।
है तैरने भर का पानी उसकी आँखो में,
ऐ,रंग-------------------
वे हम शायरो का सागर भी,
अपनी जूल्फ़ो में बांध लेती है।

(भूख ने अपना बदन बेचा है)

(भूख ने अपना बदन बेचा है)

✍️✍️स्याह अँधेरी रात में सन्नाटे को चीरती,
पुलिया के उस तरफ की चीख,
उफ!शायद ऐ,"रंग"
फिर भूख ने किसी को,
अपना बदन बेचा है😢😢

Monday, 23 June 2025

युद्ध

युद्ध 

भाविका मम्मी के साथ टीबी वाले कमरे में बैठी थी कि तभी न्यूज चैनल में एक हंसती मुस्कुराती हुई छोटी सी बच्ची दिखाई पड़ती हैं तभी कुछ देर बार अचानक से वहां बम गिरा और उस मासूम बच्ची के परखच्चे उड़

अखबार भी धंधे की तरह है

(अखबार भी धंधे की तरह है)
सच लिखने की कुबत न रही,,,,,,,,,,,,,
अब इस मूल्क में ऐ,रंग---------
अखबार भी धंधे की तरह है।

एक बांझ औरत

(एक बाँझ औरत)
एक बाँझ औरत---------------
किसी पीर की मज़ार पे बच्चे मांगने आ गई।
क्या करती----------
सास,ससुर,शौहर की उम्मीदे उसपे तलाक का डर,
वे भीगी आँख------------
इस दर पे अपना घर बचाने आ गई।
एक बाँझ औरत--------
किसी पीर की मज़ार पे बच्चे मांगने आ गई।
औरत को तो ये भी हक नही कि वे कह सके,
कि बाँझ वे नही!
एै! पीर उठ और जग इस मज़ार से,
और देख एक औरत----------
अपने शौहर का मज़हब बचाने आ गई।
एक बाँझ औरत--------
किसी पीर की मज़ार पे बच्चे मांगने आ गई।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

मोहब्बत को विज्ञान मान ले

(मोहब्बत को विज्ञान मान ले)

ए दुनिया 
मोहब्बत को विज्ञान मान ले,

क्योंकि चाहने वाले
ख्व़ाहिशो की लैब में,,,
ए,"रंग"--
खुद को मिटा कर के
प्रैक्टिकल देते हैं.✍️✍️

कथन

✍️✍️"कोठे पर सरकारी ताले तो लटक गए,,, लेकिन जिस्म के तवे पर खुदरी रोटियों की बेवा अपनी भूख को कौन सी सलवार पहनाए "🥲🥲

Wednesday, 18 June 2025

बनारस की चाची मर गई

कल एक माँ का घर टूटा है 
     चंचल 

चाची कि दुकान 

ख़बर है - लंका (बनारस ) में चाची की और पहलवान की दुकान तोड़ दी गई । सरकारी बुलडोजर और मजदूरों के चले हथौड़े चाची की दुकान पर नहीं , काशी विश्व विद्यालय के छात्रों की पीठ पर गिरे हैं । यह कोई युक्ति या तंज नहीं है , यही हकीकत है । चाची केवल कचौड़ी , तरकारी या जलेबी भर नहीं देती थी , साथ में जबरदस्त गालियाँ भी देती थी । शब्दों की तहक़ीक़ात की जाय तो कई दफ़े गालियों की तासीर जलेबी के सीरे से भी ज़्यादा मीठी मिलेगीं । गालियाँ बनारस की मान्यताप्राप्त कुटीर संस्कार है । चाची तो फिर भी एक संस्थान थी , जिस पर दैश के उस हर हिस्से में चाची की गालियां ज़ेरे बहस होती आ रही हैं जहाँ विश्व विद्यालय से पढ़ कर निकला एक भी छात्र होगा । इसी अनुपात में विदेशों में भी चाची चर्चित है । चाची का एक बेटा काशी विश्वविद्यालय में ओहदेदार है , उससे दरियाफ़्त करिए चाची के इस बेटे की पूरी तनख़्वाह विदेशों से आते ख़तों के जवाब देने में खर्च होते रहे । हम और हमारे जैसे अनगिनत लोग मिल जाएँगे जो नियमित रूप से चाची की गाली सुनने जाते थे । इनमें डॉ निर्मल , डॉ मलिक , महावीर , वगैरह ऐसे लोग रहे जो चाची की बनाई कचौड़ी और जलेबी उधार में तो खाते ही थे , सिगरेट का नकद पैसा भी लेकर हटते थे । हम कई बार चाची की गाली “झेले” हैं । दो एक की बानगी सुनिए । 78 का वाक्या है हम छात्र संघ अध्यक्ष पद से मुक्त हुए थे । हम विश्वविद्यालय के मल्टी फ़्लैट में रह रहे थे । हमारे बगल में एक स्काटिस लड़की रहती थी , मेव मुहिन । वह यूनेस्को और वर्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन की तरफ़ से - वह भारत के परिवार नियोजन की विफ़ताओं पर काम कर रही थी , एक दिन उसने प्रस्ताव रखा कि तुम हमारे प्रोजेक्ट के स्केचेज तैयार कर दो । हमसे अच्छी दोस्ती हो गई । एक दिन उसने प्रस्ताव रखा - चलो चाची की दुकान पर कचौड़ी खाया जाय ! 
    - चचिया गाली भी देती है जानती हो कि नहीं ? 
   - जानती हूँ इसी लिए तो कह रही हूँ 
  - तुम जानो तुम्हारा काम जाने ! चलो 
और हम रिक्शे पर बैठ कर सामने दुकान पर रुके ही थे कि चाची की निगाह पड़ गई । कचौड़ी बेलते - बेलते चाची ने पहला जुमला सुनाया - 
     - का रे ! ई अंग्रेज़ कहाँ से फँसाये ? 
हम कुछ बोलें इसके पहले ही मेव ने भोजपुरी में जवाब दिया - चाची ! ई हमे ना फँसाये , हम ही इन्हें फँसाये हैं । चाची हँसने लगी - ई त हिंदी बोले ला रे ! ले कचौड़ी खा । इस तरह चाची की दोस्ती मेव मुहिन से हो गई । लंदन वापस जाने के बाद भी चाची और मेव में खतो किताबत जारी रहा । 
    दूसरा वाक़या हुआ काका यानी राजेश खन्ना के साथ । एक साँझ हम काका के साथ बैठे थे कि अचानक काका ने कहा - साहिब बनारस घूमने का मन है , तैयारी होने लगी , पूरी फ़ेहरिस्त बनी कहाँ कहाँ और किस किस से मिलना है । बाबा विश्वनाथ दर्शन , चाची की कचौड़ी , केशव का पान , असलम ( हमारे दोस्त असलम परवेज ) के घर बिरयानी , डॉ नजीर बनारसी के घर उनसे मिलना वगैरह वगैरह । फिर विंध्याचल । पंडा कौन होगा वह भी तय हो गया हमारे मित्र रति शंकर जी की सारी जिम्मेदारी होगी । काशी की वह यात्रा बहुत बढ़िया हुई । झाम फँसा चाची की दुकान पर , जब हम चाची की दुकान पर पहुँचे तो अच्छी भीड़ थी , ज्यों हम गाड़ी से उतरे और चाची की तरफ़ बढ़े तो चाची ने एक नज़र से हम सब को देख लिया । कचौड़ी तलते - तलते ब आवाजे बुलंद बोली - का बे चंचल ! भोसड़ी के ! ई राजेश खन्ना के कहाँ घुमावत बाड़े ? भीड़ हल्का बक्का । काका को हम पहले ही बता चुके थे चाची के बारे में । सबसे बड़ी गाली काका को और उनके साथ आए नरेश जुनेजा को , । नरेश जी की गलती रही वे पेमेंट के लिए अपना बटुआ निकाल लिए थे । 
     - भो स के तोर औकात बा कचौड़ी के दाम देवे क ? किसी तरह हम वहाँ से निकले । चाची ने फिर रोका - केशव पान के हियाँ जात अहे ? राजेंदरवा ( केशव पान के मालिक राजेन्द्र ) भो के बड़ा कंजूस है ले पैसा देई दिहे । कहते हुए चाची ने दस रुपये गल्ले से निकाल कर काका के बढ़े हुए हाथ की गदोरी पर रख दिया । काका ने उसे माथे से लगाया - चाची यह दस रुपये अब हमारे साथ रहेगा ता उम्र । उन दोनों के अलावा कइयों की आँख नम हो गई थी । 
     चाची लाखों की माँ रही । आज जब प्रशासन का बुलडोजर दुकान तोड़ रहा होगा तो बनारस चुप क्यों रहा ?

(तमाशे करता रहा)

(तमाशे करता रहा)
मै--
अपने ही चेहरे पे तमाँचे करता रहा,,,,,,,
ऐ,भूख मै तेरी खातीर----------
पुरे शहर में तमाशे करता रहा।

Monday, 16 June 2025

(इज्जत कि है)

(औरत की इज्ज़त की है)
हाँ!इस ब्राह्मन ने-------------------
इस शहर की मशहूर फिरदौस से मोहब्बत की है,
कोई गुनाह नही-----------------
हमने तो बस एक औरत की इज्ज़त की है।
माँग भरा है-----------------
उसे निकाल कर इस गलिज़ गली से,
उसके नाम हमने----------
एक मकान और पुरी छत की है।
कोई गुनाह नही---------------
हमने तो बस एक औरत की इज्ज़त की है।
मै श्लोक पढ़ता हूँ----------------
वे नमाज़ पढ़ती है मेरे पूजे के कमरे में,
उसे ये इजाज़त ऐ,रंग----------------
मेरे मोहब्बत के शरियत की है,
कोई गुनाह नही--------------
हमने तो बस एक औरत की इज्ज़त की है।

(एक टिप्पणी)

जब तुम्हे अपनी मां और उसकी लोरी की बहुत याद आए ✍️✍️ तब अपनी यादों के कागज पर तुम "अमीर खुसरो" लिख देना🙏🙏

(वह अखबार कहा है)

(वह अखबार कहां है?)

हमारी बेरोजगारी, 
परीक्षा के निरस्त होने का समाचार कहां है?
मैंने पढ़ा नहीं,किसी पेज पर 
तैयारी करते हुए 
किसी बेटे के पिता की खुदकुशी,
अगर तुमने पढ़ा है,
तो मुझे बताओ कि 
उस तारीख का 
वह अखबार कहां है?

रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, जज कॉलोनी 
मियांपुर,जौनपुर 

✍️✍️यह रचना मेरी स्वरचित है बिना अनुमति के इसे शेयर ना करें🙏🙏

Sunday, 15 June 2025

(राग झूमर सुन रहा हूं)

(राग झुमर सुन रहा हूँ)
मै उसके कान की बाली का राग झुमर सुन रहा हूं,
कंगन,बिछुवे,चुड़ियां संगत कर रही,
कोई घराना नही दिल है-----------
जिससे मै राग चाहत सुन रहा हूं,
मै उसके कान की बाली का राग झुमर सुन रहा हूं।
उसका इस कमरे,उस कमरे आना-जाना,
एक सुर,लय,ताल का मिलन है
उस मिलन से उपजी-----------
मै राग पायल सुन रहा हूं,
मै उसके कानो की बाली का राग झुमर सुन रहा हूं।
कपकंपाते होंठ सुर्खी गाल की,
तील जैसे लग रही उसकी सखी,
और कर रही छेड़छाड़ भर बदन,
उफ!उसकी उम्र के उन्माद का------
मै राग काजल सुन रहा हूं,
मै उसकी कान की बाली का राग झुमर सुन रहा हूं।
घन-गरज है,बिजलियाँ है
काँधे पे वे श्वेत आँचल लग रहा कि मछलियाँ है,
उन मछलियो के प्रेम की--------
मै राग बादल सुन रहा हूं,
मै उसके कानो की बाली का राग झुमर सुन रहा हूं।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

(बिना शौहर के हो गई)

( बीना शौहर की हो गई)

मै जबसे--
उस बेवफ़ा सितमगर की हो गई,
मेंरे सूख गये अरमान
मैं पत्थर की हो गई.

क्या-क्या नही छोड़ा
खातिर उसके,
वालिद का दिल तोड़ा!
और अम्मी का यकीन

मैं कहां बसने आई थी---
भागकर घर से, 
देख लो आज मैं 
बिना घर की हो गई.

मै जबसे---
उस बेवफा सितमगर की हो गई.

सुर्ख जोड़े,हिना,आईना सिसके
अज़ीब निकाह किया मैंने 
कुबूल कर भी ए,"रंग"--
मै बीना "शौहर की हो गई".

Sunday, 8 June 2025

(आज रात)

(आज रात)
ऐ बेवफ़ा सामने बैठ और सभल आज रात,
मै पढुँगी तेरे शहर में गज़ल आज रात।
लब पे हँसी होगी दिल में आँसू ,
रोशनी लुटाऊँगी-----------------
मै चराग की तरह जल आज रात।
तड़प उठेगी चाँदनी मेरी सदा से,
पछतायेगी वे भी निकल आज रात।
मै ये मुशायरा छोड़ जाऊँगी,
उस बेवफ़ा के दिल में--------
ऐ,रंग----रह जायेगी एक कसक आज रात।

टिप्पणी

✍️✍️ एक मोहतरमा दिनभर अपनी फेसबुक पर मोहब्बत की इतनी कविताएं लिखती है💘♥️कि मैं सोचता हूं कि हे!भगवान अगर फेसबुक ना होता तो बेचारे उनके पति के दिल की क्या हालत होती😀😀

(केरल से लौट आई है)

(केरल से लौट आई है)

शायद जल्द ही घिर जाए,
हमारे शहर में मानसून के बादल,
क्योकि ऐ,"रंग"
हमने सुना है
कि मेरी मोहब्बत,
केरल से लौट आई है.

Saturday, 7 June 2025

पेन किलर है

(पेन किलर है)
हाँ!मेरी तबियत पहले से कही बेहतर है,,,,
क्योकि ऐ,रंग-----मेरे रुबरु-------
मेरे दिल की पेन किलर है।

टिप्पणी

✍️✍️🌹🌹 तुम आज भी मेरी यादों में प्रतिध्वनित होती हो,,मैं तुम्हें आज भी अपनी कविता की प्रेयसी और प्रेमिका लिखता हूं,,क्योंकि मेरे प्रेम के चलन में बेवफा लिखने की कोई रस्म ही नहीं है 😢😢

Friday, 6 June 2025

(हम शुकू से नहीं सोए)

(हम शुकू से नही सोये)
तड़पे सारी रात,हम चाँदनी मे रोये,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----जबसे टुटा दिल------
हम शुकू से नही सोये।

(सखी हे! रे बदरवा)

बारिश ने अचानक से रोमांटिक कर दिया----------
                     (सखी हे रे बदरवा)
तन-मन भिगोये सखी हे रे बदरवा,
करे छेड़खानी मोहे छेड़े बदरवा।
सिहर-सिहर जाऊँ शरमाऊँ इत-उत,
मोहे पिया की तरह सखी घेरे बदरवा----
तन-मन भिगोये सखी हे रे बदरवा।
चुंबन पे चुंबन की है झड़ी,
बूँद-बूँद चुंबन सखी ले रे बदरवा-----
तन-मन भिगोये सखी हे रे बदरवा।
अँखियो को खोलु,अँखियो को मुदू,
जैसे मेरी अँखियो मे कुछ सखी ढुढ़े बदरवा----
तन-मन भिगोये सखी हे रे बदरवा।
मेरी यौवन का आँचल छत पर गिरा,
मेरी रुप का पढ़े मेघदुतम सखी हे रे बदरवा-----
तन-मन भिगोये सखी हे रे बदरवा।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
mo.no.-----7800824758

(हास्य व्यंग्य)

विदेशों में जितना लोग पढ़ लिखकर ज्ञानी होते हैं,उतने बड़े ज्ञानी तो आपको हमारे देश के किसी भी देशी के ठीए पर मिल जाएंगे,,इसलिए अपने ज्ञान का घमंड ना करे बल्कि अंतिम ज्ञान के लिए देशी पिए😀

Thursday, 5 June 2025

(भूख जिंदा है)

(भूख जिंदा है)
पेट तो भर गया लेकिन भूख जिंदा है,
ऐ तरक्की---------------------
तेरी आड़ में हर झूठ जिंदा है।
हरिया की लाश आज भी है लहूलुहान,
कातिलो के हाथ में बंदूक जिंदा है।
लुट रही है आबरु हर एक स्याह रात,
पुरे बदन पे अबला के ये जूठ जिंदा है।
ख़ुदकुशी कर ली कल किसान ने,
ऐ,रंग-----आज अखबार में
उसकी कर्ज माफी और छुट जिंदा है।
पेट तो भर गया लेकिन भूख जिंदा है।

###इस रचना को पुरा पढ़े ये अनुरोध है।

(ईदी मांगती हैं)

(ईदी मांगती है)

दो दिन से भूखी बच्ची---
कुछ दे दो,दीदी
मांगती है.
गरीबी वे शै है,---
जो हर रोज,
ईदी मांगती है.
उसके नन्हे-नन्हे पांव,
दूर निकल आते है,
उसकी थकन फिर चल पड़ना,
उफ!! कलेजा हिल जाता है,
जब किसी दरवाजे पे
अपनी चारपाई पे पड़ी,
बीमार मां के लिए,
एक फटी ,---
धोती मांगती है.
ऐ"रंग"-गरीबी वे शै है,---
जो हर रोज,
ईदी मांगती है.

@@ रंगनाथ द्विवेदी
## 7800824758

(शकुनि मामा उर्फ गुफी पेंटल)

(शकुनी मामा उर्फ गुफी पेंटल)

महाभारत
के किरदार का शकुनी 
बेशक वक्त और समय के पासे से हार गया.
लेकिन 
उसके भांजे कहने की वे स्टाइल 
वह अदा
जेहन में जिंदा है.

वे सच मे
एक पूरी दौर का मामा था 
जिसने महाभारत में
अपने भांजो के हक में 
द्रोपदी को जुए में जितने 
के सारे पासे,फेके.

वह सिसकती फ़रियाद करती द्रोपदी
वे चीर खींचते दुशासन
वे मामा के होठों की तिर्यक मुस्कान
ओर भांजे कहने के 
दृश्य सामने आ गए .

लेकिन समय के साथ 
उसके भांजों के लिए फेके पासे 
मनहूस हो गए 
वे नाटक था
किरदार था,झूठ था उसका 
लेकिन गुफी पेंटल,
केवल गुफी पेंटल नही
वे हम भांजों की जूए फड़ का
उस्ताद था.

लेकिन उसकी जिंदगी के पासे  
को इस मर्तबा
ईश्वर के दूतो ने
उसकी फड़ के बाहर फेक दिया,
तुम्हे आखिरी विदाई
हम सभी के महबूब गुफी पेंटल.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियापुर
जौनपुर,222002 (U P)
mo.no.7800824758