Friday, 30 August 2024

(हमारी धडकनों की)

हमारे इश्क़ के--------------
मस्जिद की अजा़न है वो,
मै शेख हुँ उसकी धड़कनो का,
मेरी साँसो की पठान है वो।
हम जीते है मुकद्दस सरियत,
मै उसका पाकिज़ा फतवा हुँ,
चुमता हुं उसे--------------
मेरी इन आँखो की कुरआन है वो।
इल्में चराग रौशन है उसमें भी,मुझमे भी 
मै उसका आसमानी गुफ्तगू हूँ,
सुनता हु उसे!
एै,रंग------वे महज एक लड़की नही,
मेरी मुकम्मल जुबान है वो।
रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo. no----7800824758

Thursday, 29 August 2024

(ओढ़नी)

(ओढ़नी)
याद है बचपन---------
मैं पहले कहाँ ओढ़ती थी ओढ़नी।
वे तो जब मैं तेरह की हुई,
तो अचानक-माँ ने डाँटना शुरु किया,
और कहने लगी-----------
अब अपने सीने पे तुम रंखा करो ओढ़नी।
मैं चौंकी-----------------
कि ये अचानक माँ को क्या हुआ?
फिर लगा नही कुछ तो है,
यूँही नही माँ रखवाना चाहती होगी----
सीने पे ओढ़नी।
फिर कमरे में बंद कर,
खुद को शीशे में टटोलने लगी,
तो अचानक कुछ शर्म सी आई,
कुछ बदला सा था,
जहाँ माँ ने कहा था-रखने को ओढ़नी।
मै बाहर निकली----------
तो देखा बचपन को खिसकते,
लगा माँ कि कितना सच कह रही थी,
कि तु सयानी हो रही है,
क्योंकि कुछ लोग तक रहे थे,
एै,रंग------वही जहां माँ ने कहा था,
रख लो तुम ओढ़नी।

####एक सयानी होती हुई लड़की के वे तमाम चित्र इस रचना में है!गर सच लिखु तो इस कविता की ओढ़नी वाली वे तेरह साल की लड़की बन मैने--इस कविता को जिवंत लिखने की कोशिश की है,इसपे मै कितना खरा उतरा ये तो आप सभी सुधीजन पाठको पे है।

(इतना दर्द ना हो)

(इतना दर्द न हो)
मै गा तो रहा हूँ-----------
लेकिन एै खुदा मेरी तरह,
फिर किसी के गज़ल में-----
इतना दर्द न हो।
ना कोई टूट के बिखरे मेरी तरह,
फिर किसी को अपनी शाखे मुहब्बत से,
यू जुदा होने का एै खुदा----------
इतना न दर्द हो।
चुभे कमरे की खुली खिड़की से,
याद की हवा,
एै खुदा फिर किसी खुली खिड़की का मौसम------
इतना सर्द न हो।
चेहरे की सिलवटे चुभन न छिप सके,
एै खुदा किसी चेहरे पे-------
इतना गर्द न हो।
मेरी तरह न बुझ जाये सहर से पहले,
एै खुदा किसी और चराग को सब का----
इतना दर्द न हो।
मै गा तो रहा हूँ---------
लेकिन एै खुदा मेरी तरह,
फिर किसी के गज़ल में----
इतना दर्द न हो।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

इस रचना मे दो एैसे शब्द है जिनका अर्थ निम्नवत है-----
(1)----सहर----सुबह।
(2) सब----रात।

Tuesday, 27 August 2024

(दाना मांझी)

(दाना माझी)
दस किलोमीटर----------
अपने कांधे पे पत्नी की लाश लादे,
खुरदरे नंगे पाँव चला दाना माझी।
इस देश में झुठी संवेदना का फर्जिपन,
नंगा हो गया!
सच तेरी ये असीम पिड़ा मेरी कविता को,
बहुत खला दाना माझी।
कुछ दिन अखबारो में,टी बी में
तुमपे बहस और चर्चा होगी,
तुम्हे अपनी पत्नी की लाश लादे हुये दिखाया जायेगा-------------
कई-कई बार दाना माझी।
फिर विस्मृत कर दिया जायेगा हमेशा के लिये--------------
तेरा ये ना भरने वाला घाव दाना माझी।
क्योंकि यही विभत्स सच जीना,
अपनी बिटिया की अँगुलि पकड़े------
तेरी किस्मत है दाना माझी।
###एक भयावह सच जो कही-कही आज भी जिंदा है दाना माझी के रुप में,इस घटना ने हमारी संवेदना के नकली मुखौटे को नोच लिया है।
@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
एडवोकेट कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।

Monday, 26 August 2024

(देह व्यापार करती है)

(देह व्यापार करती है)

मजबूरी उसकी,
उसको,तार-तार करती है.

कोई उसे 
औरत नही कहता,

क्योंकि ऐ,"रंग"
वे शहर मे-
देह ब्यापार करती है.

(गीत)

(गीत)
गीत----------
केवल उर्वशी या शकुंतला नही!
ऐ,रंग----ये उस गरीब की पतीली भी है,
जिसमें कई रोज से-चावल पके नही।

(घर की पैंजनी रोती है)

(घर की पैंजनी रोती है)
बद्चलन-------------
रातो की आगोश मे सो तो लिया!
पर कभी सोचना ऐ,रंग-------
कि तुम्हारे इंतज़ार मे सारी रात,
घर की पैंजनी रोती है।

Sunday, 25 August 2024

(मेरे प्यार का हक है)

(मेरे प्यार का हक है)
चाँदनी रात मे भी हमे तेरी--रुह के दिदार का हक है।
ऐ मूमताज़ गर खुदा के घर भी-------
मै कैद हो जाऊँ,,,,,,,,,,,,,,,,,
तो पत्थर-ऐ-संगेमरमर को सदियो तलक तकना---------
ये मेरे प्यार का हक है।

Saturday, 24 August 2024

(उन्नीसवीं खुदकुशी है)

(उन्नीसवी खूदकुशी है)
कोई रोको उसे-------------
वे इस कदर दिल तोड़ने मे जुटी है,,,,,,,,
कि ऐ,रंग-------------
ये हमारे शहर की उन्नीसवी खूदकुशी है।

(करवा चौथ तीज हूं मैं)

(करवा चौथ,तीज हूँ मै)
तेरी खुशियो के लिये---------
कभी बांदी,तो कभी कनीज़ हूँ मै।
खड़ी हूँ तेरे घर लौट आने तलक------
तेरी चौखट तो कभी दहलिज़ हूँ मै।
मालिक भी हूँ,तेरे दिल की ऐ पी मेरे,,,,,,,,,,
तेरी खातिर---------
कभी करवा चौथ तो कभी तीज हूँ मै।

आप सभी महिलाओ को तीज व्रत की ढ़ेर सारी बधाई।

Friday, 23 August 2024

(बुत तराश रहा)

(बेवफ़ा के पास रहा है)
इस शहर में एक संगतराश--------
सालो से एक बुत तराश रहा है।
सुना है कि वे जान डालेगा अपने साँसो की,
वे अपने ही फन में-----------
कोई खामि तलाश रहा है।
कई दिन,कई राते बीत गई जगी आँखो--
और बढ़े बालो से बेखबर अपनी ही----
मोहब्बत में जाग रहा है।
एक सुबह की भीड़ से जाना कि उस संगतराश ने-------
मुकम्मल कर अपने शाहकार को,
छोड़ दी दुनिया!
एै,रंग-----वे बुते लड़की तो नही आई,
लेकिन ये मर के भी------------
उसी बेवफ़ा के पास रहा है।

Thursday, 22 August 2024

(प्याज काटा है)

(प्याज काटा है)
अब तक का---------
ये सबसे बड़ा वित्तीय घाटा है-----
क्युकि ऐ,रंग---पत्नी ने बड़े बेमन से,,,,,,
अपनी सब्जी की लिष्ट से------
प्याज काटा है।

(व्याय फ्रेंड हो गए)

(लड़कियो के ब्वायफ्रेंन्ड हो गये)
स्कूल के बस्ते----------------
बढ़ते-बढ़ते बैग हो गये!
खत लिखने वाले देश की संवेदना मर गई,
दिल में रहने वाले लोग------------
सब मोबाइल में टैग हो गये।
माँ यशोदा का आँचल बदला,
वे जिंस और टाप पहन के माम हो गई,
और जितने भी पिता थे वे रफ्ता-रफ्ता डैड हो गये।
दूध-घी खाने-पीने वाले देश ने गिलास रख दिया,
अब उन्ही गिलासो में---------------
बार बालाओ के ढ़ाले पैग हो गये।
अर्द्धनग्न सड़को पे--------------
यौवन उछालती कुछ माडर्न लड़कियाे
के अश्लील और भौड़े कपड़े,
शर्म आती है लिखते,
कि जिस देश में भाई होते थे,
एै,रंग-------आज उसी देश में लड़के,
होटलो के बंद कमरो में--------------
इन लड़कियो के ब्वायफ्रेंन्ड हो गये।

###इस रचना को तर्क-वितर्क से दुर रख बस पढ़े क्योंकि ये जरुरी नही कि इससे सहमत ही हुआ जाय।

(रईस की इमारत में दफ़न हूं)

(रईस की ईमारत में दफ़न हूँ )

मै शहर के——————-
सबसे रईस की इमारत में दफ्ऩ हूँ।
मेरा शौहर कितना चाहता है मुझको,
कि महीनो से बेवा किये है बिस्तर,
मै उसी बिस्तर में दफ्ऩ हूँ।
मै शहर के—————
सबसे रईस की इमारत मे दफ्ऩ हूँ।
कालीन बिछे फर्श और इराने आईना,
वे अरब का चराग!
सब कुछ तो है लेकिन मै टूट गई झुमर सी,
बिखर के खत्म हूँ।
मै शहर के————
सबसे रईस की इमारत मे दफ्ऩ हूँ।
वे शीशमे दराज़ मै खोलती नही,
इतनी खामोश हो गई हु——–
की खुदी से बोलती नही!
वे देखो खिड़की के उस तरफ जैसे—–
अब भी खड़ा है मेरी चाहत का बेगुनाह,
मै बेवफ़ा थी उसकी,
ये आह है उसी की एै,रंग—–मै जो
शहर के सबसे रईस की इमारत में खत्म हूँ।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.------7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

Wednesday, 21 August 2024

(कत्ल होता है)

(कत्ल होता है)
मै अपने अंदर---------
ढ़ेरो सच का गला घोट देता हूँ।
क्योकि इससे ऐ,रंग-------------
मेरे मासूम बच्चो की रोटी का-----,
कत्ल होता है।

(एक शनशाह का पत्थर)

(एक शहंशाह का पत्थर)
तोड़ देती है हमें मुफ़लिसी----
वरना हम भी लाते कही से,
अपनी मूमताज़ का पत्थर।
और फिका कर देते हम अपनी चाह से---
एक शहंशाह का पत्थर।
संगतराशी देखने ज़मी पे-------
आते खुदा के फरिश्ते,
जब मै लगवाता इश्के़ इमारत में------
अपनी मुहब्बत के अल्लाह का पत्थर।
और फिका कर देते हम अपनी चाह से---
एक शहंशाह का पत्थर।
शोहरत,नुमाइश,चाँदनी रात यहाँ भी होती,
और शायर भी लिखता अपने तराशे हुये हर्फों से----------
इस कब्रगाह का पत्थर।
तोड़ देती है हमें मूफलिसी-------
वरना हम भी लाते कही से,
अपनी मूमताज़ का पत्थर।
और फिका कर देते हम अपनी चाह से,
एक शहंशाह का पत्थर।

(होम वर्क करवाते हैं)

(होमवर्क करवाते है)
बहुत क्यूट है दादा मेरे--होमवर्क करवाते है-------
जब थक जाती हूं तो मुझको गोदी ले,
मेरे बाल सहलाते है,
बहुत क्यूट है दादा मेरे--होमवर्क करवाते है।
कैसे वे भी पढ़ते थे जब मेरी तरह वे बच्चे थे,
डाट पड़ी थी उनको भी अपने मैथ के टीचर से,
मजे और चटखारे ले वे सारी बात बताते है-----
बहुत क्यूट है दादा मेरे--होमवर्क करवाते है।
मेरी खातिर रखते है वे चाॅकलेट के डब्बे,
डेली मुझको दो देते है,
दो खुद मेरे साथ मे खाते है-----------
बहुत क्यूट है दादा मेरे--होमवर्क करवाते है।
फिर शाम को साथ मुझे ले करते है खरीदारी,
मेरे नन्हे पाँव थके तो कहते है,
बिटिया तुम ये सहना सीखो,
फिर रस्ते मे पंचतंत्र की एक कहानी सुना,
मुझे समझाते है---------------
बहुत क्यूट है दादा मेरे--होमवर्क करवाते है।
घर आते ही ट्यूशन वाले सर की बाईक देखी,
हाथ मुँह धूल बैठ गई फिर पढ़ने,
जैसे ही छुटी ट्यूशन से फिर भागी दादा जी के कमरे मे,
दादा मेरे उठा रिमोट फिर टीबी पे,
मेरी फेवरेट कार्टून डोरेमाॅन लगाते है------
बहुत क्यूट है दादा मेरे--होमवर्क करवाते है।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर--222002(उत्तर-प्रदेश)।

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।
मासिक बाल पत्रिका मे प्रकाशनार्थ भेजी हुई मेरी बाल कविता।

Sunday, 18 August 2024

(हिंदू और मुसलमान बनके)

(हिन्दू और मूसलमां बनके)
मंदिर और मस्ज़िद दोनो को रौशनी दी---
ऐ,रंग----------
चराग कभी नही ज़ला----------
हिन्दू और मूसलमां बनके।

(जोक)

पत्नी का शादी की शुरुआत का संबोधन "अजी सुनिए" और दो बच्चो की मम्मी का संबोधन "आप चुप रहिए",,,यह किसी भी भारतीय पत्नी का क्रमिक विकास है

Saturday, 17 August 2024

(अमीर खुसरो)

(अमीर खुसरो)
ऐ उर्दू--------------
तु शायद सिमट जाती चंद लबो तक,,,,,,,,,,
गर हिन्दवी मे न लिखता तुम्हे------
अमीर खुसरो।

(बहन की राखी)

(बहन की राखी है)
एक तरफ दुश्मन की गोलियां,
एक तरफ-----------------------
आज तेरे फौज वाले भाई की छाती है।
मुआफ करना बहन----------
शायद मै आ न सकुंगा!
मै जानता हु कि तुझसे किया-------
एक अहद एक वचन बाकी है।
गर हो सके तो फक्र करना,
अपने शहीद भाई पे!
सुना है शहीद की मौत पर भी,
हमारे मुल्क की बहन करके दिया,
बीना रोये घंटो आरती गाती है।
एै,रंग----------------------
तु भी देख लहराते तिरंगे की तरफ,
उसी में बंधी---------------------
हर बहन की राखी है।

####आप सभी को रक्षाबंधन पर्व की ढ़ेरो बधाई।

Friday, 16 August 2024

(पूजा या अजान से ढकती है)

(पूजा या अजा़न से ढ़कती है)
मुझे उस मजबूर औरत की----------
टूटी चुड़ियो की आवाज़ ईधन की लगती है,
वे अपने ग्राहक की गर्म साँसो पे,
अपनी मजबूरीयो का-------------
कई दिनो से पड़ा हुआ ठंडा तवा रखती है।
उसकी चीख और पीड़ा में,
उसके भूखे बच्चो के खाली पेट भरने वाली रोटी-----------------
की खुशी दिखती है।
वे अपने कपड़े समेट ब्लाउज पहन,
जब अपनी उरोजो में ये रुपये रखती है,
तभी उसकी नज़र उसी कमरे मे--------
टंगे हुये एक माँ के नंंगे उरोज वाले,
कैलेंडर पर पड़ती है,
जो अपने मासूम बच्चे का पेट इसी उरोज से भरती है।
वे एक मर्तबा फिर-------------
इस कमरे मे से निकलने से पहले,
अपने बंद ब्लाउज में--------------
रंखे पैसो को अपने जख्मी उरोजो के बीच टटोलती है।
न जाने क्यू उसके वे दोनो उरोज,
हमारे दो किरदार से लगते है!
एै,रंग-----मुआफ करना
मैले हो जाते है फिर भी कभी-कभी ,
कुछ औरतो के यही उरोज,
चाहे वे इसे पूजा के आँचल या-------
किसी मस्जिद के अजान से ढ़कती है।

(आइनो पर गीत लिखे)

(आईनो पर गीत लिखे)

हमने टूटे हुए ख्वाबों पर गीत लिखे,
सारी रात तड़पे हुए,चिरागों पर गीत लिखे
लोग कहते रहे कि-
उसके घर का आईना खूबसुरत है,
ऐ,रंग-हमने उसी के हाथों 
टूटे हुए,,,
आईनो पर गीत लिखे.

Monday, 12 August 2024

(गोरखपुर)

गोरखपुर के उन बह रहे तमाम आँसुओ को समर्पित एक पीड़ा-------
                                  (गोरखपुर)
चालीस बच्चो की मौत पे भी सीकन नही-------
बड़ी मोटी है तेरी सियासी खाल गोरखपुर।
आॅक्सीजन की सप्लाई रुक गई,
अभी तलक आजाद है सी.ऐम.ओ.(C.M.O.),
मुझे तो शक है कि,
इन बच्चो की मौत के है---------
यही दलाल गोरखपुर।
योगी यही के है इसी से मिट्टी डल रही है,
लेकिन जल गई है धुनी------
अब आयेंगे काग्रेंस,सपा,बसपा के लोग,
और बजायेंगे कुछ दिन नकली संवेदना लिये-----
अपने-अपने सियासी गाल गोरखपुर।
लेकिन वे आँखे भरी रहेंगी जिन आँखो में अभी तलक,
अपने बच्चे के खेलने,
और कानो को सुनने की किलकारियाँ थी,
शायद कभी नही भरेंगे,
उन बच्चो के खोने के ये घाव,
रुह कांप जायेगी इनकी ता उम्र,
और हमेशा इनकी जेहन मे रहेगा------
एक दर्द बनके तेरा अस्पताल गोरखपुर।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर--प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

(जोक)

✍️✍️ शहुर 
 और तरीका मालूम हो तो आप हमारे देश में गधे भी ऑनलाइन बेच सकते हैं😃😃😃😃

(मनु ले आई)

(आंगन कि मनु ले आई)

मैं ––
ओलंपिक में जुनू ले आई 
मुझे गर्भ में मारने वालों 
अब मत मारना. 
मैं ––
सिर्फ मेडल नही बल्कि 
हंसती खिलखिलाती
ना जाने कितनी "आंगन कि 
मनु ले आई."

अब 
नंबर तुम्हारा है
ऐ देश के बेटो !
उठो!आगे बढ़ो!
और इस बहन को उपहार दो ,
जो––
रक्षाबंधन से पहले
अनगिनत कलाइयों 
के लिए 
राखी 
मनु ले आई.

रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी,मियांपुर 
जौनपुर (U P)

(सियासत मार दे मुझको)

कलम के 
सिरहाने,मैं सफेद धागा बांध के लिखता हूं,
क्या पता ऐ "रंग"
कब सियासत मार दे मुझको .

(जोक)

✍️✍️बरसात में जब भी कोई पत्नी अपने पति के लिए प्यार से पकौड़े तलती है,,तो भगवान कसम उस समय वह किसी मिस वर्ल्ड से कम खूबसूरत नहीं लगती♥️♥️

(जोक)

✍️✍️वाह रे! विज्ञापन कि अब "पुरूष का अंडर वियर भी हिरोइनें बेच रही हैं."😃😃

(हमारे टीन एज की स्कूटर)

(हमारे टीन एज की स्कूटर)

ऐ वक्त ––
ये दोनो स्कूटर 
तुम जो मेरी गैराज में खड़े देख रहे हो ना 
उसमें से वे पीला वाला मैं हूं 
और स्काई ब्लू कलर वाली 
मेरी,वे है .
 
मुझे याद है उस समय 
वे कॉलेज और फ्रेंड के बहाने 
थिएटर के बाहर 
इसी स्कूटर से उतरी थी 
दुपट्टे से मूंह ढके 
मेरे संग 
"ऋषि और डिंपल कि 
बॉबी देखने."
 
फिर 
इस फिल्म के पोस्टर के उतरते ही 
सब कुछ बदल गया 
वह चली गई 
लेकिन मैने 
उसकी यह स्कूटर खरीद ली. 

मुझे आज भी लगता है कि जैसे 
स्काई ब्लू कलर में 
मेरे मोहब्बत की 
वही टीन एजर 
डिंपल खड़ी हैं.

यह रचना मेरी स्वरचित और अप्रकाशित है.

रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी,मियांपुर 
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
mo.no.7800824758

(नई हॉकी)

(नई हॉकी है)

इस ओलंपिक में 
लग रहा कि जैसे 
दौड़ रहे है 
फिर से मेजर "अपनी हॉकी 
और गेंद के साथ 
उस तरफ 
जहा कोई गोल बाकी है."

सावधान!
ऐ विश्व ओलंपिक 
तेरे अहम के जबड़े कसे है 
ढीला छोड़ 
अभी इंग्लैंड सिसका है 
रोया है 
यह तो कुछ नही 
सिर्फ,एक झांकी है 

अभी चक दे नही कहेंगे 
ये भारत के शेर 
क्योंकि इन्होंने अपनी खुशी 
शायद! गोल्ड तक नापी है 
मेरे खयाल से 
यह भारत की नई हाकी है

यह रचना मेरी स्वरचित और अप्रकाशित है 

रचयिता--रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी,मियापुर 
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
mo.no.7800824758

(जोक)

✍️✍️अगर आपकी पचास वर्षीय पत्नी आपसे प्यार करने में आना-कानी कर रही हो तो,,,,आप उसे "मलाइका अरोड़ा च्यवनप्राश खिलाएं"😀😀

(मोहब्बत लिखूं)

बांग्लादेश के वर्तमान हालात पर लिखी एक रचना-------(मोहब्बत लिखूं)

मैं बांग्लादेश के 
किस जलती हुई लाश पर मोहब्बत लिखूं?
मेरे भारत के गूंगे लोग,, 
बोलो !
"जम्हूरियत वहां से जान बचा के आई है."
उसके खून के आंसू 
कैसे सूखेंगे ?
कौन सुनेगा वहा 
मैं किसकी "अरदास पर मोहब्बत लिखूं ?"
मैं मानता हूं कि –
यह मौत धर्म या मजहब की नहीं  
इंसान की है 
लेकिन मैं वहां किसकी 
"आखरी सांस पर मोहब्बत लिखूं ?"
एक मुल्क की 
जम्हूरियत 
सवालों के घेरे में है 
वहा दीन,ईमान,मस्जिद
सब पर 
एक डर काबिज है
आखिर मैं किस चोट 
"और किस खराश पर मोहब्बत लिखूं ?"

यह रचना मेरी स्वरचित और अप्रकाशित है बिना अनुमति के इस रचना को कही शेयर ना करे.

रचनाकार--रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी,मियांपुर 
जिला--जौनपुर 222002 (U P)

(ब्रा नही देखा)

बांग्लादेश के आंदोलन की सबसे घृणित तस्वीर--
(ब्रा नही देखा)

कैसे मान लूं कि इसने 
छत पर सूखता हुआ 
अपनी बहन 
या मां का ब्रा नही देखा.

कैसे मान लूं कि, इस इंकलाबी ने 
कभी बंद दरवाजे की झिर्री से 
अपने अब्बू के हाथों 
अम्मी का खोलकर 
इधर–उधर फेकते 
ब्रा नही देखा.

कैसे मान लूं कि, 
दूसरो की बहनों के दोनों वे 
कैसे कसे है ब्रा में
ये खोलने 
पर कैसे दिखेंगे 
लार बहाता रहा 
लेकिन 
कभी खुद की बहन का
ब्रा से कसा हुआ वे 
कितना है छोटा  
या बड़ा नही देखा .

इसकी 
जम्हूरियत वहा से भाग आई 
लेकिन
हमारे यहां की दोगली सियासत 
इसके साथ है 
जबकि किसी आंदोलन में 
कभी मैंने 
किसी युवा को 
अपनी देश की औरतों के सीने का 
यूं बेहूदगी से लहराते हुए 
ब्रा नही देखा.

कितनी गूंगी हो गई है
स्त्री विमर्श की 
स्त्रियां 
जो बात–बात पर बड़ी स्वच्छंदता से 
इसे बांधती खोलती 
और इसके लिए लड़ती है
शायद! इन्होंने 
अभी किसी कहानी के लिहाज से 
इसके दोनों हाथों में
अपने खुद का 
ब्रा नही देखा.

यह रचना मेरी स्वरचित और अप्रकाशित है.

रचना--रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी,मियांपुर 
जिला--जौनपुर 222002 (U P)

(एक कफन सादी बुनती थी)

हथकरघा दिवस----

(एक कफन सादी बुनती थी)

वे चरखे से,,
खादी बुनती थी. 
कभी हसती थी,कभी गाती थी 
वे आधी-आधी रात 
गोरों के खिलाफ 
बंद कमरे में,सूत कातकर 
इंकलाब की 
मुनादी बुनती थी. 

वे चरखे से,,,,
खादी बुनती थी.

कई बार जेल गई 
वहां भी उसने चरखा मांगा 
लेकिन 
मना कर दिया गया उसे 
क्योंकि वे रात में "भगत सिंह 
और दिन में गांधी बुनती थी."

वे चरखे से,,,
खादी बुनती थी 

वे युवा थी 
उसने सेज कुंवारे रखे 
लेकिन पहचानती थी, 
वे पिया को खूब अपने 
जिसकी आंखों में
लाल डोरे नही 
आजादी थी.

वे उसकी और अपनी 
बारात के लिए
पगली "एक कफन 
अलग से सादी बुनती थी."

यह रचना मेरी स्व–रचित और प्रकाशित है. 

रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी,मियांपुर 
जौनपुर 222002 (U P)

Sunday, 11 August 2024

(अशफ़ाक लिखा है)
हमने गीता और कुरआन से भी ज्यादा,
ऐ मादरे वतन-----------
तेरी मिट्टी को पाक लिखा है।
जो जला है उसे राम प्रसाद बिस्मिल,
और जो दफ़न है-------
उसको अशफ़ाक लिखा है।
###पन्द्रह अगस्त तक मै राष्ट्र को समर्पित रचनाओ और उनकी शहादत के संम्मान में अपनी भाव संवेदनाओ की श्रद्धांजलि के साथ मै मुसलसल इस फेसबुक पे आपके साथ एक सफर करता रहुंगा----जय हिन्द।
( हमारे देश का परचम है )
यूँँहि नही फहर रहा आज लाल-किले से-----
हमारे देश का परचम है.
पुरे बदन पे कोड़े के निशान,टूटती और थमती साँसे
और उसपे भी आँसू नही इंकलाब जिंदाबाद------
तमाम-तमाम अग्रेजों के जुल्मों-सितम है.
यूँही नही फहर रहा आज लाल किले से------
हमारे देश का परचम है.
जेल मे आखिरी मर्तबा--------
अपने बेटे से मिलने आई भगत सिंह की माँ है,
जिसके होठ पे एक आजादी की हँसी है-------
और दिल मे इस शहीद बेटे के खोने का गम है.
यूँही नही फहर रहा आज लाल-किले से-----
हमारे देश का परचम है.
वे सामने है बाग जलियां का----
जहा बम,गोली,बारुद और लाशें है,
वे लाशों का बदला ले रहा कोई और नही "रंग"-----
भारत माँ का ऊधम है.
यूँही नही फहर रहा आज लाल-किले से-----
हमारे देश का परचम है.

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर.
जिला---जौनपुर, pin.no.---222002 (उत्तर-प्रदेश).
Mo.no.---7800824758.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.
(कोई मेले लगे)
पन्द्रह अगस्त की आँखो से------
आँसू बहने लगे,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,.
क्योकि शहिदो की मज़ार पे ऐ,रंग-----
न तो चराग जला---------
और न ही कोई मेले लगे।
(माँ)
तेरा हर बेटा मुल्क की खातिर-------
यूं शहीद और कुर्बान हो माँ!
ना बटने दे किसी को मजहब के नाम पे,
समय से पूजा समय से अजा़न हो माँ।
फक्र हो तुम्हे अपने आँचल और दूध पे,
तेरी लोरी में राष्ट्र हो और राष्ट्रगान हो माँ।
ना पंजाब,ना गुजरात,ना महाराष्ट्र निकले,
आखिरी लम्हें गर लब भी फड़फड़ाये,
तो लब पे तुम और हिन्दुस्तान हो माँ।
गर सुपुर्द-ऐ-खाक होने लगू,
तो मुट्ठी में मुल्क की मिट्टी-------
और डालने वाले के होंठो पे मुस्कान हो माँ।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
एडवोकेट कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
###आप सभी को हमारे मुल्क की ये आजाद सुबह मुबारक हो।

Saturday, 10 August 2024

(आ गया पंद्रह अगस्त)

(आ गया पन्द्रह अगस्त)
इस साल भी---------------
बेरोजगार युवाओ का लिये कष्ट,
आ गया पन्द्रह अगस्त।
देखो जितने मे सीमेंट उतने मे ही बालू ,
कहां जाये मजूरा,
वे खाली पेट कैसे गायेगा विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
सच पुछिये तो सारी नीतियो से----------
देश का आखिरी व्यक्ति है पस्त,
आ गया पन्द्रह अगस्त।
सब्जियां आसमान छु रही टमाटर लग रहे अँग्रेज़ से,
जीयसटी भी केवल कागज़ी इंकलाब बन के रह गया,
कालाधन भी शिगुफे की तरह आया और चला गया,
और गढ्ढा युक्त सड़को से गुजरती प्रभात फेरी,
यानि---------------
वही पुराने हालात और पुराना वक़्त,
आ गया पन्द्रह अगस्त।
एै "रंग" कुछ नही बदलेगा,
क्योंकि हमारी नैतिकता हर रोज मरती है,
हम गुँगे हो जाते है जातियो मे बट,
तो कहां हो पायेगा दुर इस देश से,
शिक्षा,स्वास्थ्य,सुरक्षा जैसी महामारियो का कष्ट,
आ गया पन्द्रह अगस्त।
जरा सोचो-----------
उसी पुराने रुटीन की तरह फिर फहरेगा तिरंगा,
और फहरायेगा कौन----------
किसी विभाग का कोई मंत्री या उसी विभाग का,
कोई उससे बड़ा भ्रष्ट---------
आ गया पन्द्रह अगस्त।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
mo.no.--------7800824758

(टूट गया)

(टूट गया)
दर्पण देखा टूट गया,सपना देखा टूट गया
जबसे आया धरती पे------------------
जीतना भी देखा टूट गया।
जिस गहने से ईश़्क किया,
ता उम्र ज़मी की औरत ने,
साँस जो टूटी उस औरत की,
सारा गहना टूट गया।
मशहूर इमारत के मालिक ने,
हर नक्काशी करवाली!
जब खाली हाथ मशान चला,
तो उसका उसी इमारत में फिर------
ठाट से रहना टूट गया।
मंदिर,मंस्जिद,गुरुद्वार,गिरजाघर सब यही रहे,
आये ब्राह्मन,मुस्लिम,सिक्ख,इसाई
राम,अल्लाह हो अकबर,वाहे गुरु,और जिसस--------------
यहाँ ये भी कहना टूट गया।
एै,रंग-----ये देखो ताजमहल,
और कब्रे गड़ी मोहब्बत की,
यहाँ बस इतना ही चलना था,
इतनी ही दुरी तय करने में सबका-----
चलना टूट गया।

(उसके हिस्से का भारत है)

(उसके हिस्से का भारत है)
फूटपाथ पे अधनंगा------
वे मासूम सुबह से ही बेच रहा-----
आजादी का तिरंगा,,,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----उसके पेट का पिचकापन ही--
उसके हिस्से का भारत है।

Friday, 9 August 2024

(चोटी काटने वाले से दुःखी हूं)

औरतो की कट रही चोटी पे एक लेखकीय सहानुभूति 
                      (चोटी काटने वाले से दुखी हूँ)
कुछ औरतो के चोटी कटने की खबर सुन------
मेरी लुगाई भी सदमे मे है।
वे सोये मे भी उठ जा रही बार-बार,
फिर चोटी टटोल सो जा रही,
अभी कल ही तो उसने-------
एक तांत्रिक के बताये कुछ सामान मंगवा के,
अपनी पुरी चोटी का तीन चक्कर लगा,
घर मे सुलगाई अंगीठी मे,
काला तील,लोबान,कपुर सब डाल कर,
आँख मुद अपनी चोटी के रक्षार्थ,
उस काले-कलुटे तांत्रिक के बताये,
उट-पटांग सा श्लोक पढ़,
फिर अपनी चोटी मे-------
15 से 20 मिनट तक नींबू और हरी मिर्च टांग,
अनमने मन से एक कप चाय लाती है।
उसके इस हाल पे हँसी और तरस दोनो आ रहा,
क्या करु पति हूँ--------------
इसलिये मै उस चोटी काटने वाले से दुःखी हूँ।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

(अशफाक लिखा है)

(अश़फाक लिखा है)
हमने गीता और कूर्आन से भी ज्यादा--
ऐ मादरे वतन----------
तेरी मिट्टी को पाक लिखा है।
जो जला है उसे राम प्रसाद बिस्मील़---
और जो दफ्ऩ है उसको अशफ़ाक लिखा है।

(शहीदों का गांव)

(शहीदो का गाँव)
इस गाँव की औरत कभी बेवा नही होती--
इस गाँव मे कभी लाशे नही आती-----
तिरंगे मे लिपटे शहीद आते है।
यहा की कोई भी बुढ़ी माँ-------
काशी या काबे नही जाती,,,,,,,,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----वे फिर से शहीद बेटे की----
वर्दी का धूल साफ कर--------
सरहद की हिफाजत के लिये------
पोते पालती है।

जय हिंद जय भारत

Thursday, 8 August 2024

(नीला आसमां सो गया है)

(नीला आसमा सो गया है)
वक्त के सानो पे सर रख नही पाई,
ऐै ",रंग "-------------
इस रेखा की चाहत और ख्व़ाहिशो का भी ,
नीला आसमा सो गया है।

(किसी और की बेहतरीन शायरी)

आलिंगन को तरस रहीं हैं चार मीनारें ताज की।
दो बाहें हैं शाहजहाँ की दो बाहें मुमताज की।।

(भरपेट दूध मिलेगा)

(भरपेट दूध मिलेगा)
झोपड़ी से-नरगिस के सिसकने की----
आवाज आ रही है!
ऐ,रंग--आज शायद उसके भूखे बेटे को-
भरपेट दूध मिलेगा।

(वंदे मातरम गाए)

(वंदे मातरम गाये)

शहीद की लाश को जब गाँव दफनाये, 
तो वंदे मातरम गाये.

ना बीबी तोड़े चुड़ी,ना आँसू बहाये, 
माँ भी हँसती हुई सबके,सामने आये, 
ऐ,"रंग"--
इस शहीद की है आखिरी इच्छा,,
कि सरहद पे मेरा बेटा भी, 
होके लहू-लूहान---
वंदे मातरम गाये.

वंदेमातरम वंदेमातरम।

Wednesday, 7 August 2024

(धर्म है या पोर्न मूवी)

(धर्म है या पोर्न मूवी)
खाने को स्वर्ण भस्म-----------
और हर रात बीस्तर पे एक नई रुबी,,,,,,,,
पहले तो केवल बापु थे--------
अब सजी-धजी माँ आ गई----------
ऐ,रंग---ये धर्म है या पोर्न मूवी।

Tuesday, 6 August 2024

(ओलंपिक नीरज चोपड़ा)

जिस तरह हिंदी साहित्य के मुरीद कभी " नीरज की पाती" को नहीं भूल सकते,ठीक वैसे ही ओलम्पिक के मुरीद कभी "नीरज के भाले" को भी नही भूल सकते .🇮🇳🇮🇳🙏🙏

(शामे अजान हूं)

(शामे अज़ान हूँ)

मै शब्दो का हिन्दू,
तो हर्फो का मूसलमान हूँ,,
मेरी कौम अलग है,
मै बट नही सकता-
कवि हूँ तो सुबहे आरती,
गर शायर हूँ तो-
ऐ,"रंग"
मै शामे अज़ान हूँ।

Saturday, 3 August 2024

(दीवाना रोया है)

(दिवाना रोया है)
ये जो सारी रात------------
शहर मे बरसात हुई है,
कही किसी की याद मे----
कोई दिवाना रोया है।
ये बिजली,ये चमक--------
किसी बंद हवेली के जले चराग से,
लिपट------------------
आखरी लम्हे कोई परवाना रोया है।
कल सहर के बाद--------------
निकल के देखना तुम आलमे बारिश,
एक हमी है जो जानेगे,
कि कल सारी रात तड़प के----
किसी का अफसाना रोया है।
ये जो सारी रात--------------
शहर मे बरसात हुई है,
एै,रंग------किसी की याद मे,
कोई दिवाना रोया है।

(भाई के बांधे चीर पर)

आप सभी भाई और बहनो को रक्षाबंधन की बहुत-बहुत बधाई. 

(भाई के बांधे चीर पर)

जुये में द्रोपदी को हारकर--
जब झुक गये पतियो के सर,
गुँगी हो गई सभा--
रो उठी फिर द्रोपदी,
अपने इस तकदीर पर.
वे भी जुआ खेल गई आखिरी लम्हे----
अपने कृष्ण जैसे बीर.

दौड़ पड़े नंगे पाँव कृष्ण भी---
तब बहन की पीर पर.
गर न आते टूट जाती रस्म राखी की,
फिर कोई भाई ना आता मायके से,
ना फक्र करती एक बहन,
दूःख के दिनो में-----
अपने भाई को बांधे चीर पर.

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर 
जिला--जौनपुर pin.no. 222002 (U P)
Mo. no. 7800824758

Friday, 2 August 2024

(हाइवे पर रेप)

(हाईवे पे रेप)
हमारे यहां---------------
रेप के बाद भी एक रेप होता है।
हाईवे से-----------------
एक नई निर्भया चिखती है!
हमारे यहां--------------
रेप के बाद भी एक रेप होता है।
बार-बार बिधान सभा का सत्र,
उसकी जननांगो के घावो का जिक्र करता है,
तो इस पुरे प्रदेश की औरत को-------
कितना क्षेप होता है।
हमारे यहां--------------
रेप के बाद भी एक रेप होता है।
टूटी चुड़ियाँ,टूटे बटन
भूखे भेड़ियो से नुचे स्तन,
उफ!न्याय माँग रही---------
एक और नग्न निर्भया की लाश!
एै,रंग------न्याय तो नही लेकिन,
कुछ महीनो के बाद,
फिर एक नये हाईवे पे इसी तरह,
किसी औरत या निर्भया का------
रेप होता है।
हमारे यहां--------------
रेप के बाद भी एक रेप होता है।

###हाईवे पे हुआ रेप किसी पे ठिकरा फोड़ राजनीति तो की जा सकती है,पर हमे अपने पशुवत चरित्र का भी कही न कही आकलन करना है,फिलहाल जो भी है इससे हमारे मर्म और हृदय को एक मर्मांतक पिड़ा हुई है,ये हादसा कही भी और किसी के साथ हो सकता है ईश्वर ऐसे घृणित पापियो को सदबुद्धि दे।

Thursday, 1 August 2024

(वे हमे सावन में मिली थी)

(वे हमे सावन मे मिली थी)
पहली मर्तबा हमे-वे सावन मे मिली थी,,
मै तर-ब-तर भीगा था,वे तर-ब-तर भीगी थी।
पहली मर्तबा हमे वे सावन मे मिली थी।
उफ!वे बरगद का पेड़ आज भी,,,,,,,,
मेरी ज़ेहन मे ज्यो का त्यो है-------
क्योकि मै भी वही खड़ा था और वे भी वही खड़ी थी।
पहली मर्तबा हमे वे सावन मे मिली थी।
मै खामोश न रहा,मेरे सामने गज़ल थी,,,,.
वे शर्म से सिमटी रही------
और मै बेधड़क कहता रहा,,,,,,,,,,,,,,,,,,
शायद मेरी ज़ूबां मे ही-----------
उसको अपनी ज़ूबा मिली थी।
पहली मर्तबा हमे वे सावन मे मिली थी।
ऐ,रंग------फिर थमी बारिश़--------
फिर अगले सावन मे हमे--------
वे पत्नी बन मिली थी।
पहली मर्तबा हमे वे सावन मे मिली थी।