Monday, 31 October 2022

अमृता प्रीतम की पुण्यतिथि पर मेरी श्रद्धांजलि 🌹🌹

( अमृता-प्रीतम और उसका अधूरा इमरोज )

मेरे इमरोज़---
मै तुम्हारे लिये छोड़े जा रही,
"एक तकिया तेरे नाम"।
काश ये गिलाफ-----
मै तुमपे चढ़ा पाती,
और बिछा पाती अपनी युवावस्था में---
एक बिस्तर तेरे नाम।

तुम मिले भी तो यु मुझसे,
कि जब जीवन की शाम--
के चंद धुंधलके ही मेरे पास बचे थे!
माफ!करना क्या करु?
बहुत जलाना चाहती हूँ---
तेरे अंदर रौशनी के लिये,
पर बुझ जाऊँगी-
मै बनके दिया एक शाम।

मेरे इमरोज़---
तुम मेरे और पास आओ,
टटोलो मुझको मैने बहुत कुछ लिखा है,
लेकिन---
इस अमृता प्रीतम का अधुरापन पढ़ो,
पढ़ पाये नही न!
जानती थी नही पढ़ पाओगे,
लो मेरी आखिरी साँस,
और आखिरी हिचकी,
खुद लिखे जा रही एक आखिरी किताब----
अमृता प्रितम और उसका
अधुरा इमरोज़।

रचयिता------रंगनाथ द्वीवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर pin no.222002 ( उत्तर-प्रदेेश)
mo.no-----7800824758

Saturday, 29 October 2022

(बदचलन आदत)

छुट नही रही मुझसे मेरी बदचलन आदत---
मंदिर-मस्जिद महज़ चंद दिवालो की इमारत,
लोग लड़ रहे राम और अल्लाह कह-------
इससे तो कही बेहतर है मेरी बदचलन आदत.

ये गली-मुहल्ले के शोर फिर खामोशी,
कोई मालिक---------
तो कोई बेरहमी से निकाल रहा,
 आधी रात जो है पेट से औरत,
जिंदगी के इस कसैलेपन से दुर-----------
मुझे मैखाने लिये जा रही--
 मेरी बदचलन आदत.

मै अक्सर लड़खड़ाते गुजरा हूं नशे मे,
और तका है मैने शहर का नंगापन,
कमरे मे सोये हुये शौहर को छोड़,
दबे पाँव पिछले दरवाज़े से जाते,
 देखा है उजाले की शरीफ़ को,
एै "रंग" इससे कही भली है----
मेरी तवायफ़ के बाँहो मे---
 सोने की बदचलन आदत।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758
(आईना तोड़ देती है)
पटकती है,बे-रहमी से
सिसकता-
छोड़ देती है।
ऐ रंग,-वे हुस्न-ए-बे-गैरत
हर महीने-
एक आईना तोड़ देती है।
(करवा चौथ,तीज हूँ मै)
तेरी खुशियो के लिये---------
कभी बांदी,तो कभी कनीज़ हूँ मै।
खड़ी हूँ तेरे घर लौट आने तलक------
तेरी चौखट तो कभी दहलिज़ हूँ मै।
मालिक भी हूँ,तेरे दिल की ऐ पी मेरे,,,,,,,,,,
तेरी खातिर---------
कभी करवा चौथ तो कभी तीज हूँ मै।

आप सभी को करवा चौथ की ढ़ेर सारी बधाई।

Thursday, 27 October 2022

(माँ)
माँ-
    मै ढ़ेरो खाता हूँ,पर तेरी 
चुपड़ी रोटी की भूख-
रह जाती है।
आज सबकुछ है,
स्लीपवेल के गद्दे,एसी कमरे
पर नींद-
घण्टो नही आती है।
ऐ रंग यादो मे-
माँ की गोद,
और लोरी रह जाती है।
(खुदा की सरहदे)
इन लाशो और मौतो से,,,,,,,,,,,,,,
शायद---------
वे बताना चाहता है हमारी हदे।
क्यूकि ऐ,रंग--------
अब हम लाँघना चाहते है शायद------
खुदा की सरहदे।

भुकंम्प मे मरे सभी की आत्मा की शांति को एक साहित्यिक मौन।
(दर्द के सीने मे जलुंगी)
ऐ दिवाली के दिये-----------
मै भी तेरे संग जलुंगी।
बस फर्क ये होगा कि------
तुम प्रीत की तीलि से जलोगे,,,
और मै विरह के तीलि से जलुंगी।
तुम मुँडेर,घर और दहलिज़ पे जलोगे--
रौशनी के लिये,
मै तो घुटुंगी,क्योकि मै वे दिया हूँ----
जो अपने ही दर्द के सीने मे जलुंगी।
(चाँद)
चाँद हमे गरीबो की,
चुनौती सा लगे है।
ऐ रंग,-ये अमीरो की 
अय्याशियाँ है,वरना
चाँद हमे-
किसी भूखे की,
रोटी सा लगे है।
(छठ मईया)
                     1-
जो कुछ हमको मिल रहा-
सब छठ मईया की देन,
ऐ रंग,-पकड़ मै घर चला
छपरा वाली ट्रेन।
                      2-
छठ मईया के पर्व मे,
है,कुशल और क्षेम
ऐ रंग,-ये ऐसी गांठरी
जिसमे केवल प्रेम।
                         3-
छठ मईया ना करे है,रंग-
इनमे-उनमे भेव,
बस होत सुबेर-
तु अर्ध्द दे
निकले सुरज देव।

छठ पर्व की मंगल कामनाओ के साथ।
(मुसलमान बना दो)
गर मासुमो का कत्ल इतने से-
थम जाये वहसियो,
तो हमे शौक से हिंन्दू या मुसलमान बना दो।
ढहा दो मेरे जेहन का मंदिर,
मै शायर हूँ,मुहब्बत मेरी भूख है,
गर मै तेरी पूजा ना बन सका तो,
अज़ान बना दो।

Wednesday, 26 October 2022

ठुमरी समाज्ञ्री गिरजा देवी को मेरी भावभिनी श्रद्धांजलि।
                 (ठुमरी को उदास छोड़े जा रही)
मै तो बस अपनी ये साँस तोड़े जा रही---------
एै बनारस मै फिर आऊँगी तेरी घाटो पे लौट रियाज़ करने,
मै इसलिये---------------
एक आखिरी ठुमरी छोड़े जा रही।
अनगिनत साज़-आवाज़ की महफिले,
और दिवान मे गिरजा का जिक्र होगा-------
मै अपनी गायकी का एक रंग छोड़े जा रही।
ना रो मुझे जाने दे एै मेरी सदके मोहब्बत,
तु तो मेरे बचपन की सहेली है,
वे देख कब से खड़ी है ले जाने को आज़,
जाने दे ना रोक सहेली,
देख तेरे नाते वे फरिश्त़े औरत भी गमज़दा है,
उसे भी पता है कि वे गिरज़ा की साँस के साथ------
हमेशा के लिये ठुमरी को उदास छोड़े जा रही।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758
(हिचकियो मे याद आऊँगा)
जाओ चाहे जितनी दूर तुम हमसे,,,,,,,,
ऐ मेरी मोहब्बत-------
मै तेरी हिचकियो मे याद आऊँगा।

Tuesday, 25 October 2022

(लोरियाँ चाँद की)
दूध-रोटी से--------
खाली हो गई कटोरियाँ आज की,,,,,,,,,,
ऐ,रंग------अब माँ को भी-----
कहाँ याद है वे लोरियाँ चाँद की।

Monday, 24 October 2022

(लोरियाँ चाँद की)
दूध-रोटी से--------
खाली हो गई कटोरियाँ आज की,,,,,,,,,,
ऐ,रंग------अब माँ को भी-----
कहाँ याद है वे लोरियाँ चाँद की।

Thursday, 20 October 2022

(तस्ब़ीर बोलती है)
कभी हँसी,तो कभी पीर बोलती है,,,,,,,,
ऐ,रंग----------
ये मिज़ाजे जिंदगी का जादु है,,,,,,,,,,,,,
कि वे चुप रहती है---------
तो उसकी तस्ब़ीर बोलती है।

Wednesday, 19 October 2022

(एक जिंदा दिया हूँ)
ताउम्र अपनी मै जल-जल के जिया हूं,
मै आदमी नही-----------
एक जिंदा दिया हूँ।
तमाम खराशे है,है तमाम सिलवटे
उधड़ा रहा मै----------
किसी मुफ़लिस के बिछौने सा,
हर जख्म जिंदगी का-------
मै खुद से सिया हूं।
मै आदमी नही--------
एक जिंदा दिया हूँ।
हु मै एक एैसा सजायाफ्ता,
जो रो नही सकता!
खौलते है आँसू मेरे दिल के अंदर,
मै कभी बहार में नही-------
खिजा़ में जिया हूं।
मै आदमी नही------
एक जिंदा दिया हूँ।
(नैपथ्य से आती है)
ना किसी कथन,ना कथ्य से आती है,,,,,,,,,,
ऐ,रंग-----------
भूख वे तवायफ है--------
जो खाली पेट-----
नैपथ्य से आती है।

Tuesday, 18 October 2022

(शीरी और फरहाद है दोस्त)
कहाँ मिले है मोहब्बत करने वाले---
ऐसा कोई वाकया,,,,,,,,,
तुम्हे याद है दोस्त।
मोहब्बत तो रेल की पटरियो पे कटी---
दो लाश है दोस्त।
सच तो ये है कि मोहब्बत आज भी----
शीरी और फरहाद है दोस्त।

Sunday, 16 October 2022

(गुलेल नीलोफर)
छुट रहे-
गुड्डे और गुडियो के,
खेल नीलोफर।
अब कैसे होगा,
तेरा अपनी सखियो से-
मेल नीलोफर।
रो रहा,रंग,-
अमिया को तोड़ने वाला,
तेरा छज्जे पे रखा-
गुलेल नीलोफर।
(कपड़ा)
तेरा यहाँ,वहाँ से-
कतरा हुआ कपड़ा।
बड़ा अजीब लगता है,
तेरा आधे बदन-
उतरा हुआ,कपड़ा।
मन यूँ ही नही करता,
तुमसे छेड़खानी को,
ऐ रंग,-
हमे चैलेंज करता है,
तेरा अंग विशेष की जगह-
जकड़ा हुआ,कपड़ा।

आज कल के अश्लिल पहनावे पे।
(एल.आई.सी की तरह करता है)
मै तंग आ गई हूँ उसकी किस्त से,,,,,,,,
ऐ,रंग----मेरा शौहर-----
मुझसे मोहब्बत भी---------
एल.आई.सी की तरह करता है।
ताज़महल पे हो रही सियासत से प्रेरित एक रचना-----------
                     (और एक ताज़महल)
मुहब्बत की निशानी की खातिर है याद महल-----
उफ!आज सियासत की ज़द में है ताज़महल।
मै नही कहता कि लड़ा जाये इस जगह------
लड़ने को और भी है इसके बाद महल।
कुछ जोड़े कसम खाते है न जुदा होने की--------
एैसा इसके सिवा दुनिया में नही है मुझे कोई याद महल।
रहने दो इसे मंदिर-मस्जिद मत कहो------
जैसे भी है रहने दो इस ज़मीने जन्नत मे ये आबाद महल।
क्योंकि जानता हूँ एै "रंग" कि बना नही सकती ये दुनिया---
इस ज़मी पे कोई एक और ताज़महल।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.----7800824758
(बन के फूल नीलोफर)
कर नही पाये,
बना के तुम्हे बेटी
ये कुबूल नीलोफर।
तबाह कर देगी,पुरा कुनबा
उनकी-
ये भूल नीलोफर।
ऐ रंग,-
ये दुनियावी चलन है
कि फिर-
किसी के आँगन मे खिलेगी-
बन के फूल नीलोफर।
(खपरैल के घर)
मिट्टी की सोंधी गंध,वे तितलियो के पर,,
वे खुला आसमान,वे पीपल की हवा---
सब कुछ टिसता है मेरी यादो मे।
ऐ,रंग--इस फ्लैट की घुटन से कही अच्छे थे-----------
मेरी गाँव मे खपरैल के घर।
(मै दर्दे दरख्त़ हूँ)
मै वे दर्दे दरख्त़ हूँ--------
जो चोट पे भी चुप रहती है शाख-शाख।
सब छोड़ जाते है--------
कुछ लम्हों के बाद मुझको,
मै सिसकती हु तन्हा अक्सर,
अपनी ही साँस-साँस।
मेरे बदन की ये लिबासे पत्तियां,
कर देती है खिज़ा में-------
बेपर्दा बदन मेरा!
मै जीती हूं किस तरह-------
शर्म को अपनी पलको से टांक-टांक।
मै वे दर्दे दरख्त़ हूँ-------
जो चोट पे भी चुप रहती है शाख-शाख।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

Friday, 14 October 2022

(फकीर हूँ)
ना शाह हूँ,ना वजीर हूँ।
सबकी भूख है,केवल
दो वक्त की रोटी-
मै उसी का मजूर हूँ।
खुद को बांधता हूँ,कसता हूँ।
सच कहूँ,गर मै तो रंग,-
एक गृहस्थ फकीर हूँ।
(गुनाह नीलोफर)
रखती थी-
सभी का खयाल नीलोफर।
फिर जलायी क्यूँ गयी?
अपने ससुराल नीलोफर।
ऐ रंग,-मेरी नज्म का -
वे गीरेबान झींझोड़े
पूछ रही हमसे-
अपनी गुनाह नीलोफर।

{आप बचा सकते है,
अपने आस-पास एक-
बेगुनाह नीलोफर।}
(बहस की ज़ूर्रत करेगी)
गीता-कूर्आन----------
की मौत का मुझे खौफ़ नही।
गर कोई माँ किसी दंगे मे मरेगी,,,,,,,
तो ऐ,रंग--मेरी नज़्म हर मर्तबा------
मंदिर-मस्ज़िद से बहस की ज़ूर्रत करेगी।
(लहरो मे फ़ना होना है)
मै तो फ़कत एक नदी हूँ-------
ऐ वालिदे दरिया,,,,,,,,,,
जिसे एक दिन---------
तेरी लहरो मे फ़ना होना है।

Thursday, 13 October 2022

(नीलोफर)
तु तो जानती है,-
इस दो जख के लिए ही है
हर बाजार नीलोफर।
इस अजनबी शहर मे,
हमे हौंसला देता है-
तेरा प्यार नीलोफर।
मै लौट के आऊँगा,
तेरा जाया नही जाऐगा-
इंतजार नीलोफर।

अपने शौहर का इंतजार करती एक नीलोफर।
(आदमी हूँ)

तेरे रूप के लावण्य से,
देवता दहके थे,
मै तो आदमी हूँ.

है इसमे पाप-पुण्य कुछ नही,
ये सुरा आचमन है,
इसमे देवता बहके थे,
मै तो आदमी हूँ.

रंगनाथ द्विवेदी. 
जौनपुर, उत्तर-प्रदेश 
Mo.no.--7800824758
(रिया )

रिया-----
दिल के विज्ञान के 
"गुरुत्वाकर्षण" का एक रोमांटिक नियम है, 

जो----
अपने लवर को, 
मोहब्बत के "न्यूटन" की तरह,  
पागल कर देती है, 

या-----
सुशांत की तरह किसी नाइट, 
धोखे से, 
ये जीने के सारे "आक्सीजन" खतम कर देती है. 

😀😄😄खतरा बढ़ गया है, सावधान जमानत पे है. 

@@रंगनाथ द्विवेदी. 
जौनपुर, उत्तर-प्रदेश 
Mo.no.7800824758

Monday, 10 October 2022

(लहरो मे फ़ना होना है)
मै तो फ़कत एक नदी हूँ-------
ऐ वालिदे दरिया,,,,,,,,,,
जिसे एक दिन---------
तेरी लहरो मे फ़ना होना है।
(मै औरत नही मरुस्थली रेत हूँ)
मै औरत नही-----------
मरुस्थली रेत हूं!
बस यूँही अक्सर उकेरती हूं,
ताकी मेरी पिड़ा--------
इन रेतिली कड़ो से ताजी रहे।
मैने तो खुद चुना है----------
अपने जीवन का ये रुदालीपन!
अगर रो दुंगी तो क्या बचेगा?
आँख से बह जायेगी वे पिड़ा भी!
मर जाऊँगी बिना तड़पे,
पाप का पश्चाताप मै जिना चाहती हूं!
अपने चारो तरफ रेत और यही रेत,
मै मुट्ठी-दर-मुट्ठी खाली होऊँ,
चुभे मेरे अंतरतक ये नागफनी,
मैने यही तो किया है---------
झुठे प्यार की खातिर!
तड़पता छोड़ आई थी माँ-बाप,
अगर औरत होती-----------
तो ससुराल होता,मायका होता
आज मै कुछ नही,
बस बिना किसी संवेदना की-----
बहुत दुर तलक फैली,
मरुस्थली रेत हूं।
मै औरत नही------
मरुस्थली रेत हूं।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

Thursday, 6 October 2022

(बाँसुरी रोयी)
फूल रोया,
फूल की पाँखुरी रोयी।
इतना दर्द था,उसके जाने का,
ऐ रंग,-
कि अधर पे रखा-
तो बाँसुरी रोयी।

Wednesday, 5 October 2022

(लाश ले चल)
ऐ भीड़ उठा,
ये लाश ले चल।
हमे उनकी गली,
उनके पास ले चल।
देखना वे अपने-
आँचल से ढ़केगी,
ऐ रंग,-इसलिए हमे वहा-
बे-लिबास ले चल।
(अनारकली बे-गुनाह थी)
ये गलत था कि,
वे सलीम की चाह थी।
पर मुगलिया सल्तनत
के खत्म होने मे-
उसकी आह थी।
ऐ रंग,-
वे कनीज का कत्ल था।
वरना अनारकली बिल्कुल-
बे-गुनाह थी।
      [कनीज-नौकरानी]
एक छोटा सा मगर तीखा सा व्यंग्य--------
   
       (राहुल गाँधी--एक राष्ट्रीय बकलोल है)
खानदानी बुद्धि से एकदम गोल है,
सच तो ये है कि--------
ये काग्रेंस जैसी पार्टी के एक राष्ट्रीय बकलोल है।
कब क्या कह दे?, क्या कर जाये? 
इन्हें पता नही------
ये अपनी पार्टी के नष्टकर्ता भूकंम्प और भुडोल है।
मैडम सोनिया के बिदेशी नस्ल का असर है शायद,
तभी तो बेटा ये तक नही जानता--------
कि क्या ?यहाँ का इतिहास और क्या ?भुगोल है।
मोदी--शाह से मजे घाघ को ये पता है,
जिसका ये लाभ ले रहे,
कि आज काग्रेंस पार्टी का नेता,
राहुल गाँधी जैसा--------
एक राष्ट्रीय बकलोल है।

इस रचना को केवल पढ़े दिल पे न ले ये महज कलम की बेबाकी है जो यूहीं लिखा गया है मै केवल मतदान करता हूं किसी पार्टी का समर्थन नही अतः आपका राजी होना न होना अपनी जगह है हा कही अनजाने मे आप आहत होते है तो उसके लिये मै अभी से क्षमा मांगता हूं।
(मस्ज़िद की जरुरत क्या है?)
गर हमे हिन्दु--------
और मूसलमां के नाम पे मरना है,,,,,,,,,,
तो फिर ऐ,रंग-------
मंदिर और मस्ज़िद की जरुरत क्या है।
कविता-वीथी & ग़ज़ल मंच
(ओढ़नी)
याद है बचपन---------
मैं पहले कहाँ ओढ़ती थी ओढ़नी।
वे तो जब मैं तेरह की हुई,
तो अचानक-माँ ने डाँटना शुरु किया,
और कहने लगी-----------
अब अपने सीने पे तुम रंखा करो ओढ़नी।
मैं चौंकी-----------------
कि ये अचानक माँ को क्या हुआ?
फिर लगा नही कुछ तो है,
यूँही नही माँ रखवाना चाहती होगी----
सीने पे ओढ़नी।
फिर कमरे में बंद कर,
खुद को शीशे में टटोलने लगी,
तो अचानक कुछ शर्म सी आई,
कुछ बदला सा था,
जहाँ माँ ने कहा था-रखने को ओढ़नी।
मै बाहर निकली----------
तो देखा बचपन को खिसकते,
लगा माँ कि कितना सच कह रही थी,
कि तु सयानी हो रही है,
क्योंकि कुछ लोग तक रहे थे,
एै,रंग------वही जहां माँ ने कहा था,
रख लो तुम ओढ़नी।
####एक सयानी होती हुई लड़की के वे तमाम चित्र इस रचना में है!गर सच लिखु तो इस कविता की ओढ़नी वाली वे तेरह साल की लड़की बन मैने--इस कविता को जिवंत लिखने की कोशिश की है,इसपे मै कितना खरा उतरा ये तो आप सभी सुधीजन पाठको पे है।
@@@शुक्रिया आपका कविता वीथी &गज़ल मंच जो इस स्नेह सहित मेरी रचना को मान दिया।

Tuesday, 4 October 2022

(वक्त बुढ़ा हो गया)
ऐ बेवफ़ा---------
तेरी लौटने का इंतजार करते-करते,,,,,
मेरी जिंदगी का------
वक्त बुढ़ा हो गया।

Monday, 3 October 2022

(निकाह कर ले)
कुछ सफेद,
कुछ स्याह कर ले।
इस दुनिया से
कुछ और निबाह कर ले।
ऐ रंग,-जब लेने आयेगी
मौत की दुल्हन,
टुटती साँसे कहेंगी-
तु निकाह कर ले।
(वृद्धा के है।राम)
सबकी भक्ति,
सबकी श्रद्धा के है।राम
कौन कहता है?
कि केवल अयोध्या के है।राम
ऐ रंग,-
जुठे बेर,जाति की छोटी
शबरी जैसी वृद्धा के है।राम
जय श्री राम।
(किसानो के अच्छे दिन आ गये)
लात-घूँसा और पुलिस के बर्बरता की,
लाठी तलक खा गये----------
किसानों के अच्छे दिन आ गये।
डीजल--पेट्रोल महगा होता गया,
बड़ी मुश्किल से इस मर्तबा खेत जोता गया,
इनके बिकास का सारा पैसा--------
नीरव मोदी और माल्या खा गये,
किसानों के अच्छे दिन आ गये।
पिछली सरकार दस साल रही,
क्या किया उसने ?
हा इतना जरुर किया की हमारे जख्मों पे---
हमसे भी ज्यादा रोने आ गये,
किसानों के अच्छे दिन आ गये।
हर सरकार इन किसानों पे सांडर्स की तरह,
जलियांवाला बाग सा दर्द देती है,
ये ऐसे ही कभी मौसम,
तो कभी हुकूमत से लड़ते--लड़ते हार गये,
ये तब बागी हुये जब सह न सके,
तभी तो ऐ दिल्ली तेरी दहलीज पे आके,
तेरे अच्छे दिन को नकार गये-----
किसानों के अच्छे दिन आ गये।
लेकिन राजनीति अब भी कह रही,
कि विपक्ष को ईधन चाहिये था चुनाव का,
और अब भी पक्ष का वही दावा,
कि किसानों का पहले से कही ज्यादा-----
हमारी सरकार मे अच्छे दिन आ गये।
( ब्रेकिंग न्यूज़--रेप)

उफ!
थम नहीं रहा, 
हमारे प्रदेश में
नेताओं का अपने शब्दों और भावों का
राजनीतिक रेप, 

किसी मजलूम लड़की
के घाव के निशान 
को ये 
कई बार छूकर देखते है 
क्योंकि इन्हे, 
लड़की के घावों में 
विधानसभा के जीत की कुर्सी
अपनी जीभ लप लपाती हुई दिखती है 
हर नेता-----
शायद इसीलिए चाहता है कि 
होता रहे, 
हर प्रदेश में मासूम और मजलूम, 
लड़कियो का रेप 

यही, 
कमोबेश मीडिया भी 
अपनी लोकप्रियता के, 
टी आर पी का कैमरा लिए, 
बार-बार ब्रेकिंग न्यूज़,  
का ढ़िढोरा पीट, 
उस लड़की का मसालेदार बयान, 
उसके फटे कपड़े, 
ब्रा और टेप, 
को धुंधला दिखाकर 
कर रहा
अपनी पत्रकारिता के नाम पर 
"रेप."

यह रचना मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है. 

रचनाकार----रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर (U P )
Mo.no.7800824758

Saturday, 1 October 2022

(हे!राम)
आज भी------
अहिंसा के सीने पे,
चला रहा है गोली-----
नाथूराम।
कब थमेगी ये हिंसा----
बन्दुको की ऐ,रंग----
आखिर कब निकलेगा,,,,,,,,
कातिल के होठो से---------
हे!राम।
(चाँद)
या तो शायर,
या तो फिर किसी कवि ने देखा।
ऐ रंग,-शर्म के घुँघट मे-
एक मुस्काता चाँद।
उनके बाद हमी ने देखा।
या तो शायर ,
या तो फिर किसी कवि ने देखा।
(हे! राम)
आज भी-
अहिंसा के सिने पे
चला रहा है,गोली,
नाथूराम।
कब थमेगी ये हिंसा-
बन्दुको की ऐ रंग,
आखिर कब निकलेगा,
कातिल के होंठो से-
हे!राम।
गांधी जयन्ति पर।
(लिंग काट लेती है)
आज घर मे अकेला पा--------------
उसका पिता ही उससे जबरदस्ती कर,
उसकी अस्मत लुट,
बीना किसी पछतावे के करवट ले-----
यूँही नंगा लेटा रहता है,
बिटिया मौन ओढ़े उठती है,
और उठाती है यहाँ-वहाँ पिता के हाथो फटे,
बिखरे अपने अधोवस्त्र और लिबास,
फिर जाने क्यू ?
उन वस्त्रो को फेक देती है घिन से,
क्या करती? आखिर क्यू पहनती?
और क्यू ढकती?
उस पिता से अपने अंग,
जिसने पुरे शरीर को अपने नाखूनो से खरोंचा,
और दाँतो से बेरहमी से काटा,
उन स्तनो को------------
जो नारी की सर्वोच्च सुंदरता और,
उसके वात्सल्य की प्रतिमूर्ति है।
वे पुन: अपने कामांध पिता को तक,
एक गहरी साँस लेती है,
और यूँही नंगी बढ़ चलती है किचन की तरफ,
वहाँ से चाकू उठा,
आँख मुदे अपने आनंदातिरेक में नंगे सोये पिता का,
सुसुप्तावस्था मे एक तरफ ढ़लके----------
लिंग को काट लेती है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

मेरी एकाध रचना आपको बिचलित कर सकती है लेकिन इस तरह कि रचना मे एक आंशिक सत्यता भी आप अपने ही सभ्य समाज के किसी न किसी कोने मे पा जायेंगे------ये इसी तरह की एक सत्य घटना का प्रारुप भर है।
(आईने तोड़ रही है)
जब से आईने ने--------
उसकी ढ़लती उम्र की हक़िकत कह दी,,,,
ऐ,रंग----तब से वे गुस्से मे-----
आईने तोड़ रही है।