Tuesday, 31 October 2017

(बदचलन आदत)

ज््् (बदचलन आदत) छुट नही रही मुझसे मेरी बदचलन आदत----- मंदिर-मस्जिद महज़ चंद दिवालो की इमारत, लोग लड़ रहे राम और अल्लाह कह--------------- इससे तो कही बेहतर है मेरी बदचलन आदत। ये गली-मुहल्ले के शोर फिर खामोशी, कोई मालिक--------- तो कोई बेरहमी से निकाल रहा आधी रात जो है पेट से औरत, जिंदगी के इस कसैलेपन से दुर----------- मुझे मैखाने लिये जा रही मेरी बदचलन आदत। मै अक्सर लड़खड़ाते गुजरा हूं नशे मे, और तका है मैने शहर का नंगापन, कमरे मे सोये हुये शौहर को छोड़, दबे पाँव पिछले दरवाज़े से जाते देखा है उजाले की शरीफ़ को, एै "रंग" इससे कही भली है------------ मेरी तवायफ़ के बाँहो मे सोने की बदचलन आदत। @@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी। जज कालोनी,मियाँपुर जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)। mo.no.-----7800824758

Wednesday, 13 September 2017

(गुलाबी शाल)

(गुलाबी शाल) वे ठंड दिसंबर की---------- मै भुल नही पाती जब तुम आये थे छुट्टियां ले, और मै इंतज़ार कर रही थी, अपने कमरे मे तेरे आने का, कमरे मे आते ही--------- तुमने पिछे से मेरी आँख मूँद, फिर हौले से खोलने को कहा, तो देखा तुम्हारी हाथो ने बड़े प्यार से पकड़ा था--------- एक गुलाबी शाल। फिर उसे खोलकर तुमने कहा था, बिल्कुल हूबहू तुम्हारी तरह है, इसकी भी गुलाबी शर्म! बस इसी से खरीद लाया कि जब तुम इसे ओढ़ोगी, तो एक तरफ तुम्हारी शर्म होगी, तो एक तरफ होगी------- हमारी गुलाबी शाल। फिर फौज की छुट्टी बिता तुम लौट गये, इस दिसंबर तुम नही हो------------ तो तुम्हे अपने श्पर्श मे पाने की खातिर, मैने दराज से निकाला है------- गुलाबी शाल। सच इसको छुना तुम्हे छुने सा लगता है, जब इसे मै रखती हूं कंधे पे, तो लगता है जैसे, तुम्हारा लिया चुंबन है------- गुलाबी शाल। ## # दिसंबर की ठंड मे लिखी एक रोमांटिक कविता है गुलाबी शाल। @@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी। जज कालोनी,मियाँपुर जौनपुर। mo.no.-----7800824758 यह कविता मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

Friday, 12 May 2017

(सुलगती सिगरेट)

(सुलगती सिगरेट) लगाये बैठा है—————- होंठो पे अपनी वे सुलगती सिगरेट! बगल में अनगिनत टुकड़े गिरे है, धुआँ है! उस कमरे में जिस कमरे में कभी तुम, छिन के फेक दिया करती थी, उसकी अधजली सिगरेट। अब होंठ पे लगा भुल जाता है, वे तो सुलगते-सुलगते, जब होंठ के आखिरी सिरे पे पहुँचती है, तो वे चौकता है! फिर जला होंठो पे रख लेता है, वे अपने एक नई सिगरेट। और तकने लगता है दरवाजे की तरफ, कि शायद तुम लौट के आओ, छिन के फेकने इसके होंठो से, अधजली सिगरेट। एक सुबह———- दरवाज़ा खुला था लोगो की भिड़ थी, शायद कुछ देर पहले ही मरा है, क्योंकि—————- अभी भी उसकी होंठो पे एै,रंग धीरे-धीरे आगे बढ़ रही बुझने के लिये, बिल्कुल इसके जीवन की तरह——- ये सुलगती सिगरेट। ******* परिचय-----रंगनाथ द्विवेदी। जज कालोनी,मियाँपुर जौनपुर(उत्तर-प्रदेश) mo.no.----7800824758 पेशेवर कुशलता----सर्वशिक्षा अभियान के अंतर्गत दिव्यांग बच्चो का अध्यापन। रचनात्मक परिचय-----देश के तमाम पत्र-पत्रिकाओ मे अनवरत प्रकाशन।

(कमाल आमरोही निकले)

हिन्दी सिनेमा की दो तड़प मीना कुमारी और कमाल आमरोही------ (कमाल आमरोही निकले) मीना दिल हार गई-------------- लेकिन तुम बेवफ़ा कमाल आमरोही निकले। डुबना चाहा तेरी आगोश मे लेकिन डुब न सकी, हाँ !ये मीना बेशक गमे शराब मे डुब गई, लेकिन डुबती हर घुँट से मैने सुना है खुद-------- तेरे न रहने पे भी, शराब की हर घुँट से मेरे बूँद-बूँद कमाल आमरोही निकले। एक बसे घर की आह!लगी शायद, तभी तो मुझको ये तबाहे लम्हात मिले, और मै शम-मये मोम के छाले की तरह, जल और फूट रही! या खुदा! एैसी गमे बेवा सी जिंदगी, मेरी तरह तड़प के---------- किसी बिस्तर पे सोई न मिले। हाँ! ये इंतकाले मीना छोड़े जा रही, एक तड़प होंठ पे अपनी, शायद आँख भिगेगी और तुम रोओंगे, मैने तुमसे मोहब्बत ही इतनी टुट के की है, मेरे न रहने पे------ जब भी तुम अपनी इस अधुरी और तन्हा मीना को याद करोगे, तो उस याद के होंठ पे भी तुम्ही आओगे, हाँ!इतनी इनायत तुम जरूर करना------------ कि मेरी याद को सिने से लगा के, कुछ देर बीते दिनो की तरह खड़े रहना, और चुम लेना मेरी यादो के लरज़ते होंठ, जब मेरे मेहबूब------ मेरी जु़बा से कमाल आमरोही निकले। *********** परिचय----रंगनाथ द्विवेदी, जज कालोनी,मियाँपुर, जौनपुर(उत्तर-प्रदेश) mo.no.----7800824758 पेशेवर कुशलता----सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत दिव्यांग बच्चो का अध्यापन। रचनात्मक कुशलता----देश के तमाम पत्र-पत्रिकाओ मे अनवरत लेखन व प्रकाशन।

Tuesday, 9 May 2017

योगी जी धीरे-धीरे ।

लगाये बैठा है।

राम अयोध्या और आडवाणी

(राम,अयोध्या और आड़वाणी) भाजपा जैसी पार्टी को प्रथमबार जिस व्यक्ति ने राष्ट्रीय फलक पे स्थापित व महिमा मंडित किया---आज वही विराट व्यक्ति किसी शापित सा प्रतिदिन यानि की महाभारत के उस भिष्म पितामह की तरह दर्द या पिड़ा के शतसैया पर पड़ा अपनो की गला काट प्रतिस्पर्धा के बीच जीवन की असह्य पिड़ा को,अपनी मौन कराह के साथ जिने को बाध्य लग रहा। शायद आड़वाणी ने राजनैतिक उदय होते भाजपा के यौवन काल की उस---"राजनैतिक सुंदरी का अपमान किया जो कभी महाभारत के भिष्म पितामह ने की थी"।काश आड़वाणी ने----"कुर्सी के उस प्रणय को स्वीकार कर लिया होता,तो आज कुर्सी उनसे अपमानित अपने यौवन उन्मादो का बदला न लेती"। और वैसे भी सदियो से यानि की युगो-युगो से तमाम विद्वत लोगो ने अपनी नीतियो मे ये कहा है कि---"सत्ता का सर्वोच्च कभी भी संवेदना के मोल नही जानती,ये निर्णय की वे पराकाष्ठा है जिसे लेते हुये व्यक्ति के चेहरे पे कंपन या सिकन नहीं होनी चाहिये"। आज भाजपा की मूर्छाकाल का ये सुखैन वैद्य सत्ता के लक्ष्मण को ठीक कर खुद इतना असहाय और बीमार हो गया है कि---खुद अयोध्या के राम इस कलयुग के वैद्य की कोई भी मदद करने मे असमर्थ है। याद करिये बाबरी बिध्वंस को तो दिल और दिमाग में एक-एक चित्र उभर आयेंगे,आज के विवाद की बाबरी ने तमाम को सत्ताशीन किया।इसी बाबरी को एक क्रांति का रुप देकर पुरे देश में मर्यादा पुरुसोत्तम भगवान श्री राम को--राष्ट्रीय चिंतन मे परिवर्तित कर उस धर्म की नगरी"अयोध्या के पवित्र सीने पे बाबर जैसे वाह्य आक्रांता के खड़े किये मस्जिद को ढ़हा दिया"। केवल उस भगवान श्री राम के लिये जो----महज राम नही अपितु शत-प्रतिशत भारतियो के लिये एक मर्यादा का वे मूर्तरुप है,जिसकी परिकल्पना आज भी रामराज्य के रुप मे की जाती है। और वैसे भी अगर हमारे धर्म और आस्था से"भगवान शिव,कृष्ण और राम निकाल दिये जाये तो करोड़ो हिंदू अनुआईयो के पास धर्म के नाम पे बचेगा ही क्या ?"। आज प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जिस तरह से---मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती और आडवाणी को दिखाया जा रहा वे अकिंचन उनके जीवनकाल के सबसे दुखद और पीड़ित चेहरे का आभास करा रहे जिस व्यक्ति ने एक हनुमान की तरह भारत रत्न श्री अटल बिहारी को सत्ता सौपी वे आज की प्रदुषित राजनीति मे अब शायद ही दिखे।आज उन्हीं के लगाये या रोपित किये विरवे"इतने विशाल और शक्तिशाली हो गये है कि इन्हें हाशिये पे कर इनकी अघोषित उपेक्षा कर रहे है"। तमाम झंझावतो के इतर एक उम्मीद थी कि ये दिया अपनी राजनीति के अवशान के दिनो मे शायद इस विशाल भारत के राष्ट्रपति की गरिमा को प्राप्त करअपने जीवन के बचे-खुचे युग को एक गरिमा के साथ जी कर अलविदा कहेगा। लेकिन अब हालात और परिस्थितियो ने कुछ एैसी करवट ले ली है जिसे देख लग रहा कि अब शायद इस उम्मीद के आखिरी चेहरे पे भी वे चादर पड़ गई है अर्थात "'जिसके बाद राजनीति के कमरे की वे झिर्री भी बंद हो जाती है और इच्छाओ के सारे पदचाप मौन हो जाते है"। मै अपने इस लेख की सारी वेदना को बस इतने शब्दो मे कह सकता हूँ कि जिस आडवाणी के साथ-----"जन-जन लोगो ने जय श्री राम कहा था आज सबकुछ ठीक उलट है!सभी चले गये बस आडवाणी रह गये और उनके होंठो पे भी जैसे महात्मा गाँधी के उस आखिरी अनूगुंज की तरह रह गया हे!राम"। @@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी। जज कालोनी,मियाँपुर जौनपुर(उत्तर-प्रदेश) mo.no.-----7800824758

पुराना खत

निर्भया का न्याय है।