Tuesday, 30 August 2022

(स्मारके मोहब्बत है)
तुम जीसे कब्र कहते हो ऐ शहर वालो----
वे इस रंग----की स्मारके मोहब्बत है।
हमारे इश्क़ के--------------
मस्जिद की अजा़न है वो,
मै शेख हुँ उसकी धड़कनो का,
मेरी साँसो की पठान है वो।
हम जीते है मुकद्दस सरियत,
मै उसका पाकिज़ा फतवा हुँ,
चुमता हुं उसे--------------
मेरी इन आँखो की कुरआन है वो।
इल्में चराग रौशन है उसमें भी,मुझमे भी 
मै उसका आसमानी गुफ्तगू हूँ,
सुनता हु उसे!
एै,रंग------वे महज एक लड़की नही,
मेरी मुकम्मल जुबान है वो।
रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo. no----7800824758

Sunday, 28 August 2022

(दो घड़ी की रात)
जिंदगी है बस दो घड़ी की रात,
आओ गुज़ार ले लिहाफ में हम,
एक दुजे के संग---
दो घड़ी की रात।
आयेगी धूप कमरे में कल किसी और के लिये,
खुली खिड़की से फिर बाल सँवारेगी कोई दुल्हन,
फिर अँधेरा होगा!
वे भी गुजारेगी इसी तरह अपनी जिंदगी की-------------
ये दो घड़ी की रात।
भुल जायेंगे सभी एक दिन रफ्ता-रफ्ता,
जैसे हम भुले है औरो के जिंदगी की---
दो घड़ी की रात।
एै,रंग-----यहाँ से हमी फना होगे,
बाकी यही रह जायेगी औरो के लिये---
ये दो घड़ी की रात।
अगस्त, 2019 में डाक से आज के ही दिन मासिक पत्रिका "लोकचिंतन' का यह अंक हमें प्राप्त हुआ था जिसमें मेरा भी एक लेख प्रकाशित था जिसके संपादक रविंद्र कुमार शर्मा सर है,एक बार फिर से धन्यवाद फेसबुक मेमोरी और शर्मा सर का 🌹🌹🌹🌹

Saturday, 27 August 2022

(दाना माझी)
दस किलोमीटर----------
अपने कांधे पे पत्नी की लाश लादे,
खुरदरे नंगे पाँव चला दाना माझी।
इस देश में झुठी संवेदना का फर्जिपन,
नंगा हो गया!
सच तेरी ये असीम पिड़ा मेरी कविता को,
बहुत खला दाना माझी।
कुछ दिन अखबारो में,टी बी में
तुमपे बहस और चर्चा होगी,
तुम्हे अपनी पत्नी की लाश लादे हुये दिखाया जायेगा-------------
कई-कई बार दाना माझी।
फिर विस्मृत कर दिया जायेगा हमेशा के लिये--------------
तेरा ये ना भरने वाला घाव दाना माझी।
क्योंकि यही विभत्स सच जीना,
अपनी बिटिया की अँगुलि पकड़े------
तेरी किस्मत है दाना माझी।
###एक भयावह सच जो कही-कही आज भी जिंदा है दाना माझी के रुप में,इस घटना ने हमारी संवेदना के नकली मुखौटे को नोच लिया है।
@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
एडवोकेट कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
(गीत)

गीत---
केवल उर्वशी या शकुंतला नही.
ए "रंग"
ये उस गरीब की पतीली भी है,
जिसमें कई रोज से-
चावल पके नही.
(बच्चा पेट भरता है)

तुम जिस अखबार को इंकलाब कहते हो,,,
उसी अखबार पर चंद रोटियाँ रख-----
ऐ,रंग-------------
स्लम ऐरिये का बच्चा पेट भरता है. 

### रंगनाथ द्विवेदी
 जिला जौनपुर उत्तर प्रदेश.

Friday, 26 August 2022

(देह ब्यापार करती है)
मजबुरी उसकी-----------
उसको तार-तार करती है।
कोई उसे औरत नही कहता,,,,,,,,,,,,,
क्यूकि ऐ,रंग----वे शहर मे-----
देह ब्यापार करती है।
(घर की पैंजनी रोती है)
बद्चलन-------------
रातो की आगोश मे सो तो लिया!
पर कभी सोचना ऐ,रंग-------
कि तुम्हारे इंतज़ार मे सारी रात,
घर की पैंजनी रोती है।
(गीत)
गीत----------
केवल उर्वशी या शकुंतला नही!
ऐ,रंग----ये उस गरीब की पतीली भी है,
जिसमें कई रोज से-चावल पके नही।

Thursday, 25 August 2022

(राम-रहीम से बलात्कारी बाबा बढ़ रहे)
बाबाओ को गदराई दैहिकता ललचा रही-----------
औरत इन्हें भी हमारी तरह भा रही।
सारे प्रवचन भुल रहे,
बिस्तर पर हर रात एक यौवन का सेवन,
तन्दुरुस्ती एैसी कि एक जवान से ज्यादा-------
औरत की जिस्म पे बाबा जी झूल रहे।
कामोत्तेजना के तमाम आसन कोई इनसे पुछे,
दाँतो तले पहरे पे खड़े सेवक अपनी अँगूली दबा रहे,
साठ के बाबा जी के क्या कहने कि बीना शिलाजीत खाये,
इनके कमरे की हर ईट से जैसे कामसूत्र चीखे।
सभी बाबा एक-एक कर फँस रहे,
जेल मे आशाराम बापू आह भर रहे,
सीडी किंग नित्यानंद,
जेल मे चोरी-चोरी अश्लील किताब मंगा,
अपना अंग विशेष पकड़े-----------
बड़ी समाधिस्त अवस्था मे मस्तराम को पढ़ रहे,
फिर भी इन चरित्रहीनो के भक्त है,
कि मानते नही,
पुलिस,पैरामिलट्री,कर्फ्यू तक लगाना पड़ रहा,
लेकिन वाह रे इन गलिजो के भक्त,
इतनी निकृष्ट गुरुता का अंधापन,
कि पंजाब और हरियाणा के बलात्कारी को बचाने के लिये,
अपने ही राज्य के बेटे लड़ रहे,
शायद इसी से एै "रंग",
अब हमारे देश मे राम-रहीम से----------
बलात्कारी बाबा बढ़ रहे।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर--प्रदेश)।
mo.no.------7800824758

तुम धन्य हो इस देश के तथाकथित बलात्कारी बाबाओ जो इतना इस देश की आस्था का श्री वर्द्धनकर आप चार चाँद लगा रहे।

Tuesday, 23 August 2022

(बेवफ़ा के पास रहा है)
इस शहर में एक संगतराश--------
सालो से एक बुत तराश रहा है।
सुना है कि वे जान डालेगा अपने साँसो की,
वे अपने ही फन में-----------
कोई खामि तलाश रहा है।
कई दिन,कई राते बीत गई जगी आँखो--
और बढ़े बालो से बेखबर अपनी ही----
मोहब्बत में जाग रहा है।
एक सुबह की भीड़ से जाना कि उस संगतराश ने-------
मुकम्मल कर अपने शाहकार को,
छोड़ दी दुनिया!
एै,रंग-----वे बुते लड़की तो नही आई,
लेकिन ये मर के भी------------
उसी बेवफ़ा के पास रहा है।

Sunday, 21 August 2022

(प्याज काटा है)
अब तक का---------
ये सबसे बड़ा वित्तीय घाटा है-----
क्युकि ऐ,रंग---पत्नी ने बड़े बेमन से,,,,,,
अपनी सब्जी की लिष्ट से------
प्याज काटा है।
(लड़कियो के ब्वायफ्रेंन्ड हो गये)
स्कूल के बस्ते----------------
बढ़ते-बढ़ते बैग हो गये!
खत लिखने वाले देश की संवेदना मर गई,
दिल में रहने वाले लोग------------
सब मोबाइल में टैग हो गये।
माँ यशोदा का आँचल बदला,
वे जिंस और टाप पहन के माम हो गई,
और जितने भी पिता थे वे रफ्ता-रफ्ता डैड हो गये।
दूध-घी खाने-पीने वाले देश ने गिलास रख दिया,
अब उन्ही गिलासो में---------------
बार बालाओ के ढ़ाले पैग हो गये।
अर्द्धनग्न सड़को पे--------------
यौवन उछालती कुछ माडर्न लड़कियाे
के अश्लील और भौड़े कपड़े,
शर्म आती है लिखते,
कि जिस देश में भाई होते थे,
एै,रंग-------आज उसी देश में लड़के,
होटलो के बंद कमरो में--------------
इन लड़कियो के ब्वायफ्रेंन्ड हो गये।

###इस रचना को तर्क-वितर्क से दुर रख बस पढ़े क्योंकि ये जरुरी नही कि इससे सहमत ही हुआ जाय।
(रईस की ईमारत में दफ़न हूँ )

मै शहर के——————-
सबसे रईस की इमारत में दफ्ऩ हूँ।
मेरा शौहर कितना चाहता है मुझको,
कि महीनो से बेवा किये है बिस्तर,
मै उसी बिस्तर में दफ्ऩ हूँ।
मै शहर के—————
सबसे रईस की इमारत मे दफ्ऩ हूँ।
कालीन बिछे फर्श और इराने आईना,
वे अरब का चराग!
सब कुछ तो है लेकिन मै टूट गई झुमर सी,
बिखर के खत्म हूँ।
मै शहर के————
सबसे रईस की इमारत मे दफ्ऩ हूँ।
वे शीशमे दराज़ मै खोलती नही,
इतनी खामोश हो गई हु——–
की खुदी से बोलती नही!
वे देखो खिड़की के उस तरफ जैसे—–
अब भी खड़ा है मेरी चाहत का बेगुनाह,
मै बेवफ़ा थी उसकी,
ये आह है उसी की एै,रंग—–मै जो
शहर के सबसे रईस की इमारत में खत्म हूँ।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.------7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।
(प्याज काटा है)
अब तक का---------
ये सबसे बड़ा वित्तीय घाटा है-----
क्युकि ऐ,रंग---पत्नी ने बड़े बेमन से,,,,,,
अपनी सब्जी की लिष्ट से------
प्याज काटा है।
देवघर, झारखण्ड से प्रकाशित मासिक पत्रिका "शहर परिक्रमा" का तीनो अंक आज प्राप्त हुआ जिसमें मेरे लेखो को प्रकाशक व संपादक बड़े भाई प्रमेश कुमार वर्मा जी ने स्नेह दिया,बीच मे अस्वस्थ थे,अब बाबा की दया से पूर्ण स्वस्थ है,हमे लगभग-लगभग हर अंको मे स्थान देते है
(कत्ल होता है)
मै अपने अंदर---------
ढ़ेरो सच का गला घोट देता हूँ।
क्योकि इससे ऐ,रंग-------------
मेरे मासूम बच्चो की रोटी का-----,
कत्ल होता है।
(एक शहंशाह का पत्थर)
तोड़ देती है हमें मुफ़लिसी----
वरना हम भी लाते कही से,
अपनी मूमताज़ का पत्थर।
और फिका कर देते हम अपनी चाह से---
एक शहंशाह का पत्थर।
संगतराशी देखने ज़मी पे-------
आते खुदा के फरिश्ते,
जब मै लगवाता इश्के़ इमारत में------
अपनी मुहब्बत के अल्लाह का पत्थर।
और फिका कर देते हम अपनी चाह से---
एक शहंशाह का पत्थर।
शोहरत,नुमाइश,चाँदनी रात यहाँ भी होती,
और शायर भी लिखता अपने तराशे हुये हर्फों से----------
इस कब्रगाह का पत्थर।
तोड़ देती है हमें मूफलिसी-------
वरना हम भी लाते कही से,
अपनी मूमताज़ का पत्थर।
और फिका कर देते हम अपनी चाह से,
एक शहंशाह का पत्थर।
(होमवर्क करवाते है)
बहुत क्यूट है दादा मेरे--होमवर्क करवाते है-------
जब थक जाती हूं तो मुझको गोदी ले,
मेरे बाल सहलाते है,
बहुत क्यूट है दादा मेरे--होमवर्क करवाते है।
कैसे वे भी पढ़ते थे जब मेरी तरह वे बच्चे थे,
डाट पड़ी थी उनको भी अपने मैथ के टीचर से,
मजे और चटखारे ले वे सारी बात बताते है-----
बहुत क्यूट है दादा मेरे--होमवर्क करवाते है।
मेरी खातिर रखते है वे चाॅकलेट के डब्बे,
डेली मुझको दो देते है,
दो खुद मेरे साथ मे खाते है-----------
बहुत क्यूट है दादा मेरे--होमवर्क करवाते है।
फिर शाम को साथ मुझे ले करते है खरीदारी,
मेरे नन्हे पाँव थके तो कहते है,
बिटिया तुम ये सहना सीखो,
फिर रस्ते मे पंचतंत्र की एक कहानी सुना,
मुझे समझाते है---------------
बहुत क्यूट है दादा मेरे--होमवर्क करवाते है।
घर आते ही ट्यूशन वाले सर की बाईक देखी,
हाथ मुँह धूल बैठ गई फिर पढ़ने,
जैसे ही छुटी ट्यूशन से फिर भागी दादा जी के कमरे मे,
दादा मेरे उठा रिमोट फिर टीबी पे,
मेरी फेवरेट कार्टून डोरेमाॅन लगाते है------
बहुत क्यूट है दादा मेरे--होमवर्क करवाते है।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर--222002(उत्तर-प्रदेश)।

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।
मासिक बाल पत्रिका मे प्रकाशनार्थ भेजी हुई मेरी बाल कविता।

Saturday, 20 August 2022

(मेरी किस्मत मे ये जागना आया)
उन्हे कहा कभी हमे चाहना आया-----
मेरी ख्व़ाहिशो को रौदा-------
बस उनकी समझ मे वासना आया।
मै घुटी बंद कमरे मे,वे चैन से सोये----
ऐ,रंग--मेरी किस्मत मे ये जागना आया।
(मै तेरा खत पढ़ता हूँ)
मै आज भी-------------------
तुम्हे उतनी ही मुहब्बत करता हूँ!
अक्सर रातो को जलाके चराग,
मै तेरा खत पढ़ता हूँ।
अजीब दिवाना हु मै---------
रात गुजर जाती है बैठे-बैठे,
कभी कहां------------
मै खत को पढ़के मुकम्मल करता हूँ।
मै आज भी-----------------
तुम्हे उतनी ही मुहब्बत करता हूँ!
अक्सर रातो को जला के चराग,
मै तेरा खत पढ़ता हूँ।
मै बेशक------------
छोड़ आया तेरा शहर फिर भी,
मै तेरे खत में सारी रात--------
तेरी गली और तेरा छत पढ़ता हूँ।
मैै आज भी-------------
तुम्हें उतनी ही मुहब्बत करता हूँ!
अक्सर रातो को जलाके चराग----
मै तेरा खत पढ़ता हूँ।

Friday, 19 August 2022

(गीत)
गीत----------
केवल उर्वशी या शकुंतला नही!
ऐ,रंग----ये उस गरीब की पतीली भी है,
जिसमें कई रोज से-चावल पके नही।
(पेट पढ़ना है)
अखबारे पढ़ के सो गया है शहर,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----हमे तो अँधेरी रात में
किसी वेश्या का--------
पिचका हुआ पेट पढ़ना है।

Tuesday, 16 August 2022

(आईनो पे गीत लिखे)
हमने टुटे हुये ख्व़ाबो पे गीत लिखे------
सारी रात तड़पे हुये,चरागो पे गीत लिखे।
लोग कहते रहे कि---------
उसके घर का आईना खूबसुरत है,,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----हमने उसी के हाथो टुटे हुये---
कई आईनो पे गीत लिखे।
(पूजा या अजा़न से ढ़कती है)
मुझे उस मजबूर औरत की----------
टूटी चुड़ियो की आवाज़ ईधन की लगती है,
वे अपने ग्राहक की गर्म साँसो पे,
अपनी मजबूरीयो का-------------
कई दिनो से पड़ा हुआ ठंडा तवा रखती है।
उसकी चीख और पीड़ा में,
उसके भूखे बच्चो के खाली पेट भरने वाली रोटी-----------------
की खुशी दिखती है।
वे अपने कपड़े समेट ब्लाउज पहन,
जब अपनी उरोजो में ये रुपये रखती है,
तभी उसकी नज़र उसी कमरे मे--------
टंगे हुये एक माँ के नंंगे उरोज वाले,
कैलेंडर पर पड़ती है,
जो अपने मासूम बच्चे का पेट इसी उरोज से भरती है।
वे एक मर्तबा फिर-------------
इस कमरे मे से निकलने से पहले,
अपने बंद ब्लाउज में--------------
रंखे पैसो को अपने जख्मी उरोजो के बीच टटोलती है।
न जाने क्यू उसके वे दोनो उरोज,
हमारे दो किरदार से लगते है!
एै,रंग-----मुआफ करना
मैले हो जाते है फिर भी कभी-कभी ,
कुछ औरतो के यही उरोज,
चाहे वे इसे पूजा के आँचल या-------
किसी मस्जिद के अजान से ढ़कती है।
मैने जबसे होश संभाला है तबसे लेकर अब तक हर सरकार और राजनेता को मैने किसान की पीड़ाओ पे बोलते सुना है,लेकिन किसी सरकार मे कभी इनकी बदहाली दुर होते नही देखी हाँ इनके नाम पे सरकारे आती-जाती बहुत देखी इस कविता मे एक एैसे ही हिन्दुतानी किसान की अथाह पीड़ा है।
                    (किसान)
किसान-------------
कभी सुखा तो कभी बाढ़ मे मरता है,
सावन की अय्याशी को क्या पता?
कि किसान कैसे----------
चढ़ती आषाढ़ मे मरता है।
वे अपने बँधे मवेशियो की रखवाली करता है रातदिन,
फिर भी कोई खुशी नही आती कभी इसके पास पलछिन,
फिर भी कर्ज से खरिदे----------
जब ना मालुम सी बीमारी से मरने लगते है,
इसके एक-एक कर मवेशी------------
तो ये तील-तील कर अपने मवेशियो की बाड़ मे मरता है।
किसान----------
कभी सुखा तो कभी बाढ़ में मरता है।
इसके तलक कभी नही पहुँचती कर्ज़माफी,
इसकी बीमार फसले इसे अंदर तक तोड़ देती है,
ये असहाय हो जाते है उस बेटे से,
जैसे कुंती सी कोई माँ अंधेरे मे पैदा कर,
कही कपड़े मे लपेट छोड़ देती है,
ये कर्ण---------
अपने कुरुक्षेत्र सी खेत की दाड़ पे मरता है।
किसान--------
कभी सुखा तो कभी बाढ़ मे मरता है।
लाश ही लाश है कोई शहादत नही,
एै सियासत देख ये कभी यु.पी,कभी ऐम.पी,कभी बिहार,
तो कभी एै"रंग"---------
मोदी के गुजरात की बलसाड़ मे मरता है।
किसान--------
कभी सुखा तो कभी बाढ़ मे मरता है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.------7800824758

किसान एक अंतहीन पीड़ा की हकीकत।

Wednesday, 10 August 2022

राष्ट्रीय समाचारपत्र "दैनिक भास्कर" के साप्ताहिक पत्रिका "अहा !जिंदगी " के एक पुराने अंक में प्रकाशित कविता "सौतन बांसुरी". 

(सौतन बाँसुरी)

रहती है, हर पल अधर पे,
हम गोपियों की------
सौतन बाँसुरी.

रह-रह के हँसती है,
हमारे दर्द पे जब,
तो हम गोपियों को लगती है,
सौतन बाँसुरी.

उफ! उनपे भी गुस्सा आ रहा,
पर क्या करें हम गोपियाँ??
हमें भुलकर,
कितने मजे से छू रहे है खुद,
हम गोपियों के-----
नारायन बाँसुरी.

काश! मिलती तो इसे हम तोड़ देती,
पर ये लग रहा, संभव नही,
बड़ी बेहया,निर्लज्ज है,
अधर तो अधर था,
कमर मे भी खुस के उनके,
हाय! कितनी खुश हैं,
ऐ "रंग" ---
ये डायन बाँसुरी.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

@@@रचयिता--रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758
(आ गया पन्द्रह अगस्त)
इस साल भी---------------
बेरोजगार युवाओ का लिये कष्ट,
आ गया पन्द्रह अगस्त।
देखो जितने मे सीमेंट उतने मे ही बालू ,
कहां जाये मजूरा,
वे खाली पेट कैसे गायेगा विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
सच पुछिये तो सारी नीतियो से----------
देश का आखिरी व्यक्ति है पस्त,
आ गया पन्द्रह अगस्त।
सब्जियां आसमान छु रही टमाटर लग रहे अँग्रेज़ से,
जीयसटी भी केवल कागज़ी इंकलाब बन के रह गया,
कालाधन भी शिगुफे की तरह आया और चला गया,
और गढ्ढा युक्त सड़को से गुजरती प्रभात फेरी,
यानि---------------
वही पुराने हालात और पुराना वक़्त,
आ गया पन्द्रह अगस्त।
एै "रंग" कुछ नही बदलेगा,
क्योंकि हमारी नैतिकता हर रोज मरती है,
हम गुँगे हो जाते है जातियो मे बट,
तो कहां हो पायेगा दुर इस देश से,
शिक्षा,स्वास्थ्य,सुरक्षा जैसी महामारियो का कष्ट,
आ गया पन्द्रह अगस्त।
जरा सोचो-----------
उसी पुराने रुटीन की तरह फिर फहरेगा तिरंगा,
और फहरायेगा कौन----------
किसी विभाग का कोई मंत्री या उसी विभाग का,
कोई उससे बड़ा भ्रष्ट---------
आ गया पन्द्रह अगस्त।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
mo.no.--------7800824758
(टूट गया)
दर्पण देखा टूट गया,सपना देखा टूट गया
जबसे आया धरती पे------------------
जीतना भी देखा टूट गया।
जिस गहने से ईश़्क किया,
ता उम्र ज़मी की औरत ने,
साँस जो टूटी उस औरत की,
सारा गहना टूट गया।
मशहूर इमारत के मालिक ने,
हर नक्काशी करवाली!
जब खाली हाथ मशान चला,
तो उसका उसी इमारत में फिर------
ठाट से रहना टूट गया।
मंदिर,मंस्जिद,गुरुद्वार,गिरजाघर सब यही रहे,
आये ब्राह्मन,मुस्लिम,सिक्ख,इसाई
राम,अल्लाह हो अकबर,वाहे गुरु,और जिसस--------------
यहाँ ये भी कहना टूट गया।
एै,रंग-----ये देखो ताजमहल,
और कब्रे गड़ी मोहब्बत की,
यहाँ बस इतना ही चलना था,
इतनी ही दुरी तय करने में सबका-----
चलना टूट गया।
(उसके हिस्से का भारत है)
फूटपाथ पे अधनंगा------
वे मासूम सुबह से ही बेच रहा-----
आजादी का तिरंगा,,,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----उसके पेट का पिचकापन ही--
उसके हिस्से का भारत है।

Monday, 8 August 2022

(अश़फाक लिखा है)
हमने गीता और कूर्आन से भी ज्यादा--
ऐ मादरे वतन----------
तेरी मिट्टी को पाक लिखा है।
जो जला है उसे राम प्रसाद बिस्मील़---
और जो दफ्ऩ है उसको अशफ़ाक लिखा है।
(शहीदो का गाँव)
इस गाँव की औरत कभी बेवा नही होती--
इस गाँव मे कभी लाशे नही आती-----
तिरंगे मे लिपटे शहीद आते है।
यहा की कोई भी बुढ़ी माँ-------
काशी या काबे नही जाती,,,,,,,,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----वे फिर से शहीद बेटे की----
वर्दी का धूल साफ कर--------
सरहद की हिफाजत के लिये------
पोते पालती है।

जय हिंद जय भारत
(भरपेट दूध मिलेगा)
झोपड़ी से-नरगिस के सिसकने की----
आवाज आ रही है!
ऐ,रंग--आज शायद उसके भूखे बेटे को-
भरपेट दूध मिलेगा।
(नीला आसमा सो गया है)
वक्त के सानो पे सर रख नही पाई,
ऐै ",रंग "-------------
इस रेखा की चाहत और ख्व़ाहिशो का भी ,
नीला आसमा सो गया है।
(वंदे मातरम गाये)

शहीद की लाश को जब गाँव दफनाये, 
तो वंदे मातरम गाये.

ना बीबी तोड़े चुड़ी,ना आँसू बहाये, 
माँ भी हँसती हुई सबके,सामने आये, 
ऐ,"रंग"--
इस शहीद की है आखिरी इच्छा,,
कि सरहद पे मेरा बेटा भी, 
होके लहू-लूहान---
वंदे मातरम गाये.

वंदेमातरम वंदेमातरम।

Saturday, 6 August 2022

(जुगनू बहुत रोये)
शहर की आमद मे,जब पीपल कटा,,,,,,,,,,,,,
तो ऐ,रंग------------
मेरे गाँव के जुगनू बहुत रोये।

Thursday, 4 August 2022

(शामे अज़ान हूँ)
मै शब्दो का हिन्दू,तो हर्फो का मूसलमान हूँ,,
मेरी कौम अलग है,मै बट नही सकता---
कवि हूँ तो सुबहे आरती,गर शायर हूँ तो-
ऐ,रंग----मै शामे अज़ान हूँ।

Tuesday, 2 August 2022

(हाईवे पे रेप)
हमारे यहां---------------
रेप के बाद भी एक रेप होता है।
हाईवे से-----------------
एक नई निर्भया चिखती है!
हमारे यहां--------------
रेप के बाद भी एक रेप होता है।
बार-बार बिधान सभा का सत्र,
उसकी जननांगो के घावो का जिक्र करता है,
तो इस पुरे प्रदेश की औरत को-------
कितना क्षेप होता है।
हमारे यहां--------------
रेप के बाद भी एक रेप होता है।
टूटी चुड़ियाँ,टूटे बटन
भूखे भेड़ियो से नुचे स्तन,
उफ!न्याय माँग रही---------
एक और नग्न निर्भया की लाश!
एै,रंग------न्याय तो नही लेकिन,
कुछ महीनो के बाद,
फिर एक नये हाईवे पे इसी तरह,
किसी औरत या निर्भया का------
रेप होता है।
हमारे यहां--------------
रेप के बाद भी एक रेप होता है।

###हाईवे पे हुआ रेप किसी पे ठिकरा फोड़ राजनीति तो की जा सकती है,पर हमे अपने पशुवत चरित्र का भी कही न कही आकलन करना है,फिलहाल जो भी है इससे हमारे मर्म और हृदय को एक मर्मांतक पिड़ा हुई है,ये हादसा कही भी और किसी के साथ हो सकता है ईश्वर ऐसे घृणित पापियो को सदबुद्धि दे।