Tuesday, 31 October 2023

(अधूरा इमरोज)

अमृता प्रीतम की पुण्यतिथि पर मेरी श्रद्धांजलि 🌹🌹

( अमृता-प्रीतम और उसका अधूरा इमरोज )

मेरे इमरोज़---
मै तुम्हारे लिये छोड़े जा रही,
"एक तकिया तेरे नाम"।
काश ये गिलाफ-----
मै तुमपे चढ़ा पाती,
और बिछा पाती अपनी युवावस्था में---
एक बिस्तर तेरे नाम।

तुम मिले भी तो यु मुझसे,
कि जब जीवन की शाम--
के चंद धुंधलके ही मेरे पास बचे थे!
माफ!करना क्या करु?
बहुत जलाना चाहती हूँ---
तेरे अंदर रौशनी के लिये,
पर बुझ जाऊँगी-
मै बनके दिया एक शाम।

मेरे इमरोज़---
तुम मेरे और पास आओ,
टटोलो मुझको मैने बहुत कुछ लिखा है,
लेकिन---
इस अमृता प्रीतम का अधुरापन पढ़ो,
पढ़ पाये नही न!
जानती थी नही पढ़ पाओगे,
लो मेरी आखिरी साँस,
और आखिरी हिचकी,
खुद लिखे जा रही एक आखिरी किताब----
अमृता प्रितम और उसका
अधुरा इमरोज़।

रचयिता------रंगनाथ द्वीवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर pin no.222002 ( उत्तर-प्रदेेश)
mo.no-----7800824758

Sunday, 29 October 2023

(आइना तोड़ देती हैं)

(आईना तोड़ देती है)
पटकती है,बे-रहमी से
सिसकता-
छोड़ देती है।
ऐ रंग,-वे हुस्न-ए-बे-गैरत
हर महीने-
एक आईना तोड़ देती है।

(बदचलन आदत)

(बदचलन आदत)

छुट नही रही मुझसे मेरी बदचलन आदत---
मंदिर-मस्जिद महज़ चंद दिवालो की इमारत,
लोग लड़ रहे राम और अल्लाह कह-------
इससे तो कही बेहतर है मेरी बदचलन आदत.

ये गली-मुहल्ले के शोर फिर खामोशी,
कोई मालिक---------
तो कोई बेरहमी से निकाल रहा,
 आधी रात जो है पेट से औरत,
जिंदगी के इस कसैलेपन से दुर-----------
मुझे मैखाने लिये जा रही--
 मेरी बदचलन आदत.

मै अक्सर लड़खड़ाते गुजरा हूं नशे मे,
और तका है मैने शहर का नंगापन,
कमरे मे सोये हुये शौहर को छोड़,
दबे पाँव पिछले दरवाज़े से जाते,
 देखा है उजाले की शरीफ़ को,
एै "रंग" इससे कही भली है----
मेरी तवायफ़ के बाँहो मे---
 सोने की बदचलन आदत।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Saturday, 28 October 2023

(माँ)
माँ-
    मै ढ़ेरो खाता हूँ,पर तेरी 
चुपड़ी रोटी की भूख-
रह जाती है।
आज सबकुछ है,
स्लीपवेल के गद्दे,एसी कमरे
पर नींद-
घण्टो नही आती है।
ऐ रंग यादो मे-
माँ की गोद,
और लोरी रह जाती है।

(गोवर्धन पूजते है)

(गोवर्धन पुजते है)
हम अपनी जड़ो को
कहाँ भुलते है।
आज भी लाखो कृष्ण
यही खेलते,
कुदते है।
ऐ रंग,-
हम प्रकृति प्रेमी है,
इसलिए,-
गोवर्धन पुजते है।
गोवर्धन पुजा की ढ़ेर सारी बधाई।

Thursday, 26 October 2023

(हे! सूरज देव)

(हे!सुरुज देव)
क्या आरा,क्या छपरा,क्या बिहार हे!सुरुज देव, सबपे लुटाना अपना प्यार हे!सुरुज देव। नदिया के पानी में जब माँग भरे दुल्हन, अँजुली से अरघ दे-----------
तो सुनियेगा सबकी पुकार हे!सुरुज देव! क्या आरा,क्या छपरा,क्या बिहार हे!सुरुज देव। गुँजे किलकारी घर और आँगन में------ हर आँचल में भरना ये दुलार हे!सुरुज देव। भले पुरे साल नही लौटते है गाँव, पर तेरी खातिर आते है लेके परदेश से----- अपना पुरा का पुरा परिवार हे!सुरुज देव। मांगते है कविता और गीत की नदी में हम, दे शब्द अरघ आपसे-----------
कि रहे खुशहाल ये संसार हे!सुरुज देव, और अमर रहे धरती पे--------
डाला छठ का ये त्यौहार हे सुरुज देव।

 @@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी जज कालोनी,मियाँपुर जौनपुर।
mo.no.7800824758
----सभी को डाला छठ पर्व की ढ़ेरो बधाई।

(इतवार का गम)

(इतवार का गम)
ऐ दुनिया-
तु इसपे बैन लगा देना,
जब छपे मेरी किताब-
इतवार का गम।
ये पता है-
बढ़ जायेंगे खुदकुशी वाले,
ऐ रंग,-
उन्हे भी ले डुबेगा
किसी बेवफा के-
इन्कार का गम।

ये रचना उन लोगो के साथ शेयर है,जिनके पास है,अपने-
इतवार का गम।

(हिचकियों में याद आऊंगा)

(हिचकियो मे याद आऊँगा)
जाओ चाहे जितनी दूर तुम हमसे,,,,,,,,
ऐ मेरी मोहब्बत-------
मै तेरी हिचकियो मे याद आऊँगा।

(ठुमरी)

ठुमरी समाज्ञ्री गिरजा देवी को मेरी भावभिनी श्रद्धांजलि।
                 (ठुमरी को उदास छोड़े जा रही)
मै तो बस अपनी ये साँस तोड़े जा रही---------
एै बनारस मै फिर आऊँगी तेरी घाटो पे लौट रियाज़ करने,
मै इसलिये---------------
एक आखिरी ठुमरी छोड़े जा रही।
अनगिनत साज़-आवाज़ की महफिले,
और दिवान मे गिरजा का जिक्र होगा-------
मै अपनी गायकी का एक रंग छोड़े जा रही।
ना रो मुझे जाने दे एै मेरी सदके मोहब्बत,
तु तो मेरे बचपन की सहेली है,
वे देख कब से खड़ी है ले जाने को आज़,
जाने दे ना रोक सहेली,
देख तेरे नाते वे फरिश्त़े औरत भी गमज़दा है,
उसे भी पता है कि वे गिरज़ा की साँस के साथ------
हमेशा के लिये ठुमरी को उदास छोड़े जा रही।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Tuesday, 24 October 2023

(कर्ण को)

(कर्ण को)
फिर किसी कुन्ती ने-
छोड़ा कर्ण को।
क्यूँ?नही मिल रहा
वात्सल्य थोड़ा कर्ण को।
कब तलक मानती रहेगी,
ये दुनिया-
रोड़ा कर्ण को।
ऐ रंग,-कब मिलेगा?
न्याय आखिर कर्ण को।

आज की कुन्ती ने फिर
खेत मे छोड़ा कर्ण को।

(लोरिया चांद की)

(लोरियाँ चाँद की)
दूध-रोटी से--------
खाली हो गई कटोरियाँ आज की,,,,,,,,,,
ऐ,रंग------अब माँ को भी-----
कहाँ याद है वे लोरियाँ चाँद की।

(लखनऊ--कलयुग की अयोध्या)

(लखनऊ--कलयुग की अयोध्या)
सियासत---------
हर युग में बुढ़े पिता को दशरथ बना देती है।
अचानक मांग बैठती है साधना सी कैकेई,
मुलायम जैसे असहाय दशरथ से पिता से लिया कोई वचन,
और लखनऊ जैसी वर्तमान अयोध्या से,
छिन अखिलेश से राम को!
अपने पुत्र मोह की खातिर,
वे प्रतिक को--------
अमर सी मंथरा के कारण,
कलयुग का भरत बना देती है।
सियासत--------
हर युग में बुढ़े पिता को दशरथ बना देती है।
लेकिन समय की रामायण का ये कलयुगी कालखंड़ है,
अब सियासत की अयोध्या लखनऊ की गद्दी पे----------
आसीन होता है वही राम,
जिसकी यहां की जनता-----
अपने वोटो से बहुमत बना देती है।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758
उत्तर-प्रदेश के वर्तमान राजनैतिक हालात पर।

(वंदे मातरम् कहना दिए)

( वंदेमातरम कहना दिये )
 इस दिवाली तु शहीद के घर,
फक्र से जलना दिये.
ना रोना उसकी शहादत पे कसम है तुम्हें,
गर हो सके तो हर छत के दिये से------
जन-गण-मन और वंदेमातरम कहना दिये.

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर
जिला--जौनपुर पिन नं.222002 (उत्तर-प्रदेश)
Mo.no.---7800824758.

यह मेरे स्वयं का लिखा व अप्रकाशित है.

(प्याज)

(प्याज़ )

प्याज़ ठेले की सभी सब्जियों में----
करीना कपूर और 
ऐश्वर्या राय लगने लगी है, 

अदा---
प्रियंका चौपड़ा की तरह, 
ठसक--
कंगना राणावत की तरह, 

हाय रे ! ठेले की किस्मत, 
कि प्याज़, सभी सब्जियों में
बिपाशा बसु
और कैटरीना कैफ लगने लगी है.

😀😀😀😀😄😄😄😄

रंगनाथ द्विवेदी. 
जौनपुर ( उत्तर-प्रदेश)

(अवैध संबंध)

(अवैध संम्बंध है)
हा!मुझे कुबूल है,तेरे इल्ज़ाम से पहले---
ऐ खूबसुरती-------
कि मेरा तेरी तारीफो से---------
अवैध संम्बंध है।

Monday, 23 October 2023

(खपरैल के घर)

(खपरैल के घर)

मिट्टी की सोंधी गंध,
वे तितलियो के पर,,
वे खुला आसमान,
वे पीपल की हवा---
सब कुछ टिसता है मेरी यादो मे
ऐ,रंग--
इस फ्लैट की घुटन से कही अच्छे थे
मेरी गाँव मे खपरैल के घर.

@@@रंगनाथ द्विवेदी. 
जौनपुर (उत्तर-प्रदेश )

Saturday, 21 October 2023

(बाल दिवस है)

(बाल दिवस है)
चाय की दुकान पे----------
सुट-बूट वाले साहब के,
अधरो पे सुलगते सिगरेट का कश है,
उस फैले धुँऐ में तेरह साल का बच्चा,
जूठे कप-प्लेट उठाता है,
जरा सा उसके मैले हाथो का श्पर्श
और माँ की गाली!
मासूम गालो पर------
बाल पकड़कर चंद चाटे,
देख रोटी-------
इतनी कम उम्र में इस बच्चे की भूख,
तेरी खातिर कितना विवश है!
इस मासूम को---------
अपनी पिड़ाओ की दुनिया से बाहर,
ये भी पता नही कि---------
कल तमाम देश के बच्चो के चाचा नेहरु का जन्मदिन,
यानी की बाल दिवस है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.7800824758

(बॉलीवुड--एक बेवा बिखराव है)

(बाॅलीवुड----एक बेवा बिखराव है)
बाॅलीवुड----------
नरगिस और राज कपुर का अलगाव है,
गुरुदत्त की ख़ुदकुशी है,
तो घुट-घुट के दुनिया से विदा हुई------
मीना कुमारी के सीने का घाव है।
बाॅलीवुड----------
आँसू और ड्रामा है ,
ये उस काका के आनंद का किरदार है,
जो बाबु मोशाय के बाद--------
एक तन्हा कोठरी में तड़पता और घुटता है,
सच बॉलीवुड-----------
एक शराबी
की पिड़ाओ का गैंग्रीनी पाँव है।
बाॅलीवुड----------
वे परवीन बाॅबी है जिसे कई महेश भट्ट ने चाहा मगर,
उसे तन्हा छोड़ दिया!
वे डिप्रेस्ड बंद कमरे में छ दिनो तलक,
मरी पड़ी रही बीना किसी वारिस के,
सच तो ये है कि बाॅलीवुड-------
 औरत की अधुरी ख्वा़हिशो की घुटन,
और एक बेवा बिखराव है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर पिन नं--222002 (उत्तर-प्रदेश).
mo.no.----7800824758.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

(चुनाव आ गया)

( चुनाव आ गया )
ठंडे नेताओं को-----------
चार साल बाद ताव आ गया,
इसका मतलब है चुनाव आ गया.

ये कांंइयाँ--------
फिर इतने वादे दिल-दिमाग मे झोक देगा,
कि हम कल्पनाओं मे खो जायेंगे,
और हमें लगेगा की जैसे हमारे यहाँ------
बहुत जल्द एक अमेरिकन गाँव आ गया,
इसका मतलब है चुनाव आ गया.

बाते चिकनी और चुपडी कर,
दिल और दिमाग मे उतर जायेगा,
लगेगा इसी का कहा ही सच,
कि अब तलक इस गाँव मे केवल चोर-डाकु आये थे,
ये पहली बार है कि उसके रुप मे-----
हमारे यहाँ भी कुछ करने भगवान के भेजे,
एक साव आ गया--------
इसका मतलब है चुनाव आ गया.

ठंडे नेताओं को--------
चार साल बाद ताव आ गया,
इसका मतलब है चुनाव आ गया.

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर
जिला--जौनपुर पिन नं.222002 (उत्तर-प्रदेश).
Mo.no.--7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

Tuesday, 17 October 2023

(नई संसद)

(नई संसद)

तुम पर गर्व है,फक्र है
ऐ नई संसद!

बहुत कुछ बदला समय के साथ
आखिर कब तलक पहनती
तू किसी और की दी हुई 
भीख में,मिर्जई संसद.

उतार दे!
आ चल! अब नए चोले में 
क्योंकि,ये कुनबा तेरा है,
संस्कार तेरे है
तू भारत है
और तेरी आत्मा है 
यह नई संसद. 

राजनीति 
और नेताओं के चरित्र का क्या है?
हम सभी जानते हैं 
कि ये सभी
अपनी शब्दो के 
चारित्रिक दुशाशन है 
ना जानें कब खीच दे 
तेरी मर्यादा के सीने से आंचल
और तू शर्म से सिसकने लगे
ऐ नई संसद.

फिर चुनाव में इन्हें अपनी 
राजनीतिक रोटियां भी सेकनी है 
इसलिए,
एक सुर,एक लय, एक ताल
में कह नही सकते 
कि तेरी जरूरत थी
इस देश को
ऐ नई संसद.


यह रचना मेरी स्वरचित और अप्रकाशित है.

रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी,मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
mo.no.7800824758

(शीरी और फरहाद है दोस्त)

(शीरी और फरहाद है दोस्त)
कहाँ मिले है मोहब्बत करने वाले---
ऐसा कोई वाकया,,,,,,,,,
तुम्हे याद है दोस्त।
मोहब्बत तो रेल की पटरियो पे कटी---
दो लाश है दोस्त।
सच तो ये है कि मोहब्बत आज भी----
शीरी और फरहाद है दोस्त।

(गुलेल नीलोफर)

(गुलेल नीलोफर)
छुट रहे-
गुड्डे और गुडियो के,
खेल नीलोफर।
अब कैसे होगा,
तेरा अपनी सखियो से-
मेल नीलोफर।
रो रहा,रंग,-
अमिया को तोड़ने वाला,
तेरा छज्जे पे रखा-
गुलेल नीलोफर।

(एल आई सी की तरह करता है)

(एल.आई.सी की तरह करता है)
मै तंग आ गई हूँ उसकी किस्त से,,,,,,,,
ऐ,रंग----मेरा शौहर-----
मुझसे मोहब्बत भी---------
एल.आई.सी की तरह करता है।

(बिटिया)

(बिटिया)
ई बिटिया हौ कहिके--------
पेटे में ऐकराके मार दिहल जाला।
गर पैदा भी भईल----------
तो बेटवा के आगे दुत्कार दिहल जाला।
नकली हौ कहना की बिटिया हौ गहना,
अगर इहै सच हौ!
तो काहे के केहु कर बिटिया,
दहेज के खातिर---------
बंद कमरा में एक दिन जराय दिहल जाला।
पेट में ऐकराके मार दिहल जाला।
ई दुनिया मरद क,खुशी भी मरद क
शादी वियाहे क शापित बा बेवा,
एक बेवा मरद के सारी खुशी में,
बोलाई लिहल जाला!
हौ जग क रिति---------
कि बेवा बिटियवन के खुशीयन क मैना,
बंद पिंजरा में कईके रोआई दिहल जाला।
ई बिटिया हौ कहिके-------
पेटे में ऐकराके मार दिहल जाला।

@@@भोजपुरी पत्रिका में प्रकाशनार्थ भेजी एक रचना आपके स्नेह की आदालत में प्रेषित है।

(और एक ताजमहल)

ताज़महल पे हो रही सियासत से प्रेरित एक रचना-----------
                     (और एक ताज़महल)
मुहब्बत की निशानी की खातिर है याद महल-----
उफ!आज सियासत की ज़द में है ताज़महल।
मै नही कहता कि लड़ा जाये इस जगह------
लड़ने को और भी है इसके बाद महल।
कुछ जोड़े कसम खाते है न जुदा होने की--------
एैसा इसके सिवा दुनिया में नही है मुझे कोई याद महल।
रहने दो इसे मंदिर-मस्जिद मत कहो------
जैसे भी है रहने दो इस ज़मीने जन्नत मे ये आबाद महल।
क्योंकि जानता हूँ एै "रंग" कि बना नही सकती ये दुनिया---
इस ज़मी पे कोई एक और ताज़महल।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.----7800824758

Monday, 16 October 2023

(कुत्ता स्टैंडर हो गया है)

(कुत्ता स्टैंडर हो गया है)
क्या खुब मंजर हो गया है,
मैडम के-
रोमांटिक मुड को भांप,
कुत्ता-
बेड पर हो गया है।
ऐ रंग,-
कीस पे कीस पा रहा,
कुत्ता-
पति से ज्यादा,
स्टैंडर हो गया है।

ऐसे प्रताड़ित पतियो को समर्पित एक रचना।

(खपरैल के घर)

(खपरैल के घर)
मिट्टी की सोंधी गंध,वे तितलियो के पर,,
वे खुला आसमान,वे पीपल की हवा---
सब कुछ टिसता है मेरी यादो मे।
ऐ,रंग--इस फ्लैट की घुटन से कही अच्छे थे-----------
मेरी गाँव मे खपरैल के घर।

(मैं दर्दे दरख़्त हूं)

(मै दर्दे दरख्त़ हूँ)
मै वे दर्दे दरख्त़ हूँ--------
जो चोट पे भी चुप रहती है शाख-शाख।
सब छोड़ जाते है--------
कुछ लम्हों के बाद मुझको,
मै सिसकती हु तन्हा अक्सर,
अपनी ही साँस-साँस।
मेरे बदन की ये लिबासे पत्तियां,
कर देती है खिज़ा में-------
बेपर्दा बदन मेरा!
मै जीती हूं किस तरह-------
शर्म को अपनी पलको से टांक-टांक।
मै वे दर्दे दरख्त़ हूँ-------
जो चोट पे भी चुप रहती है शाख-शाख।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

(रावण)

(रावण )
पुराने खल चरित्र का रावण ,
आज के माडर्न खल चरित्र के रावण से,
कही ज्यादा पवित्र व श्रेष्ठ था,
क्योंकि उस रावण पे,
आज के माडर्न रावण की तरह-----
"किसी मासूम आठ वर्ष की बच्ची के,
रेप का कोई इल्जाम न था" ।
पुराने रावण पे तो,
उस राम ने विजय पाली,
पर माडर्न रावण से,
आज के राम डर गये है,
उससे गली-गली, शहर-शहर,
बचते व छिपते फिर रहे,
और माडर्न रावण अट्हास कर रहा।
शायद ऐसा लग रहा कि जैसे,
उस महा-विद्वान पुराने रावण के----
 मारने के श्राप से राम पीड़ित हो गये है।
सच तो ये है कि आज के माडर्न रावण को जला पाना,
इस नपुंसक समाज के बस का नही,
तभी तो अब भी,
हर दशहरे मे उसी पुराने रावण को------
जलाया जा रहा।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला---जौनपुर Pin.no.222002
(उत्तर-प्रदेश)।
Mo.No.--7800824758.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

Friday, 13 October 2023

(जवान नीलोफर)

(जवान नीलोफर)
चहकती थी,फुदकती थी,हर कमरे
दालान नीलोफर।
आज विदा हो रही-
अपने बाबुल के गाँव से
उफ!बह रहे आँशू-
मेरे भी कलम के,
ऐ रंग,-
क्यों?इतनी जल्दी हो गयी
जवान नीलोफर।

एक सिल-सिलेवार एक नज्म नीलोफर।

(गूंजा का गांव)

(गुंजा का गाँव)
है,आज भी नदिया का पानी
है,आज भी पीपल की छाँव।
आज भी-
उतरे है,चन्दा पूरे आँगन
है,आज भी ऐ रंग,-
वही चन्दन
और है,वही उसकी-
गुंजा का गाँव।

(हिंदू और मुसलमान सुनना)

(हिन्दु और मूसलमान सुनना)
कभी भूख का वंदे मातरम-------
तो कभी रोटियो का राष्ट्रगान सुनना।
जो चंद रुपये मे खुद को बेच आई है---
ऐ,रंग---कभी उस औरत की ज़ुबां से,,,
हिन्दु और मूसलमान सुनना।

(बेजा तलाक ना दो)

(बेजा तलाक न दो)
ख्वा़हिशो को खाक न दो!
एै मेरे शौहर-----------
सरिया के नाम पे,
मुझे बेजा तलाक न दो।
बख्श दो---------
कहा जाऊँगी ले मासुम बच्चे,
मुझ बेगुनाह को-------
इतना भी शाॅक न दो,
बेजा तलाक न दो।
न उड़ेलो कान में पिघले हुये शीशे,
मुझ बांदी को सजा तुम--------
इतनी खौफ़नाक न दो,
बेजा तलाक न दो।
न छिनो छत,न लिबास
खुदा के वास्ते रहने दो,
मेरी बेगुनाही झुलस जाये-------
मुझे वे तेजाब न दो,
बेजा तलाक न दो।
सी लुंगी लब,रह लुंगी लाशे जिंदा,
लाके रहना तुम दु जी निकाहे औरत,
मै उफ न करुंगी!
बस मेरे बच्चो की खुशीयो को कोई बेजा,
इस्लामी हलाक न दो-------
बेजा तलाक न दो।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.7800824758
____तलाक एक दर्द है जो इसे भुगत रही कोई औरत ही समझ सकती है!अगर संभव है तो मेरी इस रचना के पढ़ने वालो से मेरी कलम अनुरोध करती है प्लीज कभी किसी भी औरत से बेजा तलाक न ले,शुक्रिया।

(काबुलीवाला)

( काबुलीवाला)

मैं रोज देखती हूं------
 खुली खिड़की से
 घंटों सड़क की तरफ, ए 'रंग '
 इस उम्मीद में कि शायद, 
 कभी दिख जाए, 
 वे मेरी बचपन का----
"काबुलीवाला "

@@रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जौनपुर, उत्तर-प्रदेश 
Mo.no.7800824758

(नीलोफर)

(नीलोफर)
तु तो जानती है,-
इस दो जख के लिए ही है
हर बाजार नीलोफर।
इस अजनबी शहर मे,
हमे हौंसला देता है-
तेरा प्यार नीलोफर।
मै लौट के आऊँगा,
तेरा जाया नही जाऐगा-
इंतजार नीलोफर।

अपने शौहर का इंतजार करती एक नीलोफर।

(पूर्णमासी का चांद हो)

आप सभी को अपने जीवन संगीनी रूपी पूर्ण मासी की चाँद के बधाई.

(पूर्णमासी की चाँद है)

तुझसे मेरी दुनिया आबाद है,
तू मह़ज पत्नी नहीं,
मेरी ----
पूर्णमासी की चाँद है.

ये हसी,
मेरे होंठ पे, यूँ ही नहीं आई,
ये सांस और धड़कन,
यूँ नहीं आई,
तू खींच लाई,
फिर-फिर मुझे आसमां से,
अपने तीज और करवे के लिए,
सच मे!! तुम मेरे गीतों की,
शीतल, निर्मल, निर्छल सी आवाज़ है.

तू मह़ज पत्नी नहीं---
मेरी पूर्णमासी की चाँद है.

ये रात और चाँद का संगम,
तेरे रहते शायद ही टुटे प्रिये,
तू मेरे प्राणों की मणि है,
और मेरे पूर्णमासी की चाँद है.

तू मह़ज पत्नी नहीं---
मेरी पूर्णमासी की चाँद है.

@रंगनाथ द्विवेदी

Thursday, 12 October 2023

(सजायाफ्ता हूं)

(सजा याफ्ता हूँ)
मै उनकी कैद से
रिहाई कहां मांगता हूँ।
ऐ रंग,-
क्या खुब है,मेरी किस्मत
कि मै उनकी जुल्फो का-
सजा याफ्ता हूँ।

(शहनाई कलाकार)

(शहनाई कलाकार)
खुशी मे-
वे हँसा देता था,कई बार।
गम मे-
वे रूला देता था,कई बार।
उसकी मौत-
शहनाई की मौत थी,
ऐ रंग,-
वैसा फिर ना हुआ,कोई शहर मे-
शहनाई कलाकार।

(मैं भी कुम्हार हूं)

(मै भी कुम्हार हूँ)
हा मै भी----------------
अपने गीतो की चाकी पे,
शब्दो की मिट्टी रख,
कुछ गीत------------
उसके दिवाली के दीये की तरह बनाता हूँ।
वे भी कुम्हार है मिट्टी के दियले का,
और मै भी कुम्हार हूँ-------
अपने गीतो का।
वे उपले की आँच में,
पकाता है दियलो को और मै--------
अपने हृदय के उपलो की आँच में,
गीतो के शब्द पकाता हूँ।

(लहरों मे फना होना है)

(लहरो मे फ़ना होना है)

मै तो फ़कत एक नदी हूँ, 
ऐ वालिदे दरिया, 
जिसे एक दिन---
तेरी लहरो मे फ़ना होना है.

रंगनाथ द्विवेदी. 
जौनपुर, उत्तर-प्रदेश 
Mo.no.7800824758

Wednesday, 11 October 2023

(एक जिंदा दिया हूं)

(एक जिंदा दिया हूँ)
ताउम्र अपनी मै जल-जल के जिया हूं,
मै आदमी नही-----------
एक जिंदा दिया हूँ।
तमाम खराशे है,है तमाम सिलवटे
उधड़ा रहा मै----------
किसी मुफ़लिस के बिछौने सा,
हर जख्म जिंदगी का-------
मै खुद से सिया हूं।
मै आदमी नही--------
एक जिंदा दिया हूँ।
हु मै एक एैसा सजायाफ्ता,
जो रो नही सकता!
खौलते है आँसू मेरे दिल के अंदर,
मै कभी बहार में नही-------
खिजा़ में जिया हूं।
मै आदमी नही------
एक जिंदा दिया हूँ।

Monday, 9 October 2023

(आदमी हूं)

(आदमी हूँ)
तेरे रूप के लावण्य से,
देवता दहके थे,
मै तो आदमी हूँ।
है इसमे पाप-पुण्य कुछ नही,
ये सुरा आचमन है,
ऐ रंग,-
इसमे देवता बहके थे,
मै तो आदमी हूँ।
[सुरा-शराब]

Sunday, 8 October 2023

(प्यार का चांद)

करवा चौथ की सभी व्रती महिलाओ के प्यार की एक खूबसूरत कविता----
                             (प्यार का चाँद)
हमने पाया है तुममे अपने प्यार का चाँद,
बेशक कल तुम तकोगी छत पे मुझे,
मेरे हाथो से पियोगी व्रत का पानी,
लेकिन मै नही तकुंगा तेरे सिवा मेरी सजनी,
क्योंकि दुनिया तकेगी उसे,
मै तो तकुंगा तुम्हें क्योंकि तुम्हि हो-----------
हमारी धड़कन और हमारे प्यार का चाँद।
मेंहदी,महावर,चुड़ियाँ,सिन्दूर,बिंदिया,
वही पहले करवे सी शर्म,
तुम बहुत अच्छि हो मेरी सजनी,
क्या करुंगा तक के मै,
बहुत फिका है तेरे आगे आज-----
इस पुरे संसार का चाँद।
मै तुम्हें पाऊ हर जनम,
कभी न छिने मेरी आँखो से मेरी सजनी,
क्योंकि पल-छिन नही है तुमसे मेरी सजनी,
तुम्हारे साजन के प्यार का चाँद------
हमने पाया है तुममे अपने प्यार का चाँद।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर (उत्तर--प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

(चांद की पीड़ा)

(चाँद की पीड़ा)
हर्ष नही,
ये है,बिषाद की पीड़ा।
रोते चकोर को है,
अपने चाँद की पीड़ा।
ऐ रंग,-
नीगल लेगा राहू सुना है,
आज इतनी असह्य होती है,
चाँद की पीड़ा।

(नदी रो रही)

(नदी रो रही)
रोज लहू-लुहान हो रही---
हमारे शहर मे नदी रो रही।
ये माँ थी-हम बेवफ़ा बेटो की-----
आज हमी से जलिल हो रही,,,,,,,
ऐ,रंग------
हमारे शहर मे नदी रो रही।

(अपनी उर्वशी पे)

(अपनी उर्वशी पे)
वे अपना सबकुछ वार देती है,
मेरी एक खुशी पे।
इसलिए,ऐ रंग,-मै
रोज कुछ न कुछ लिखता हूँ,
अपनी उर्वशी पे।

(भूख लिखता रहा)

(भूख लिखता रहा)

तू रोटियां फेंकती रही,
अपनी हवेली से--
ए "रंग"--
मै बगावत और भूख लिखता रहा.

Saturday, 7 October 2023

(कभी हज नही किया)

(कभी हज़ नही किया)
मेरी लाश को---------
उस बेवफ़ा की गली से ले जाना,,,,,,,,,,,,
क्यूकि इसी की खातिर ऐ,रंग----
इस काफ़िर-ए-मूसलमां ने----------
कभी हज़ नही किया।

(हाफिज सईद सा लगता है)

(एक नेता हाफिज़ सईद सा लगता है)
दशहरे के सिजन में-----------
वे पाकिस्तानी ईद सा लगता है!
हमारे मुल्क में एक नेता---------
हाफिज़ सईद सा लगता है।
माँग रहा मुल्क से वे शहीदे यलगार,
एक दोगला है जो-----------
पाकिस्तान के मुरीद सा लगता है।
हमें शक है उसकी पैदाइशे नस्ल पर,
वे हमें बेटा-----------
किसी आवारा तवायफ़ माँ के नींद सा लगता है।
आओ अब हम भी एक सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दे,
और हलाक कर दे एैसे नमक-हराम को,
जो उरी के शहीद सैनिको की शहादत का----
आतंकी चश्म़दिद सा लगता है।
दशहरे के सिजन में-------
वे पाकिस्तानी ईद सा लगता है!
हमारे मुल्क में एक नेता-------
हाफिज़ सईद सा लगता है।
रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758
🌹🌹🌹चुनावनामा--3🌹🌹🌹

(वरिष्ठ फला नेता )

इस समय शहर,तहसील और बाजार पुरी तरह से होर्डिंग से लतपथ है, इतना ही नही इस होर्डिंग की फोटो में एक से एक तुर्रम खां विभिन्न खम्बे में कुछ इस तरह टंगे है, जैसे कह रहे हो कि सजनी हमहू राजकुमार 😀😀😀😀

कुछ चेहरे तो ऐसे है जो कुकुरमुते से डायरेक्ट मशरूम होने की फिराक में है 😀😀😀😀

जिनका कभी दूर-दूर तक किसी पार्टी से कोई लेना देना नहीं था वे आजकल फला पार्टी के फला वरिष्ठ नेता लिखवा रहे हैं जैसे यह कोई बहुत बड़ी डिग्री हो, जबकि बेचारे जो वाकई किसी पार्टी के वरिष्ठ हैं उनकी नेता बनने की इच्छा की हालत बिल्कुल मनरेगा के मजदूर जैसी है, और पार्टी भी ऐसे ही लोगों को टिकट देती है, जो कि केवल सीजनल राजनीतिक तालाब के आषाढ़ रूपी मेढ़क है😀😀😀😀

जनहित में जारी आप ऐसे किसी भी चाइनीज प्रजाति के फला वरिष्ठ नेता को,वोट देकर खुद अपने वरिष्ठ होने का सत्यानाश ना करें 😀😀😀😀

Friday, 6 October 2023

(बांसुरी रोई)

(बाँसुरी रोयी)
फूल रोया,
फूल की पाँखुरी रोयी।
इतना दर्द था,उसके जाने का,
ऐ रंग,-
कि अधर पे रखा-
तो बाँसुरी रोयी।

Thursday, 5 October 2023

(ताबीज़ बेचता था)

खुद भूख से मर गया ऐ "रंग",,,,जो ता उम्र
औरों की अमीरी के ताबीज़ बेचता था 😥😥

(चिराग मजलूम की बस्ती में जलेगा)

ये कलम तेरे रियासत की तवायफ नहीं,
कि तेरी मसनद की अय्याशी के लिए 
अपने पांवों में घुंघरू बांध ले,,
ऐ "रंग" यह वह चिराग है जो,
किसी मजलूम की बस्ती में जलेगा ✍️✍️

(मंदिर और मस्जिद की जरूरत क्या है)

(मस्ज़िद की जरुरत क्या है?)
गर हमे हिन्दु--------
और मूसलमां के नाम पे मरना है,,,,,,,,,,
तो फिर ऐ,रंग-------
मंदिर और मस्ज़िद की जरुरत क्या है।

Wednesday, 4 October 2023

(वक्त बूढ़ा हो गया)

(वक्त बुढ़ा हो गया)
ऐ बेवफ़ा---------
तेरी लौटने का इंतजार करते-करते,,,,,
मेरी जिंदगी का------
वक्त बुढ़ा हो गया।

(मैं औरत नही मरुस्थली रेत है)

(मै औरत नही मरुस्थली रेत हूँ)
मै औरत नही-----------
मरुस्थली रेत हूं!
बस यूँही अक्सर उकेरती हूं,
ताकी मेरी पिड़ा--------
इन रेतिली कड़ो से ताजी रहे।
मैने तो खुद चुना है----------
अपने जीवन का ये रुदालीपन!
अगर रो दुंगी तो क्या बचेगा?
आँख से बह जायेगी वे पिड़ा भी!
मर जाऊँगी बिना तड़पे,
पाप का पश्चाताप मै जिना चाहती हूं!
अपने चारो तरफ रेत और यही रेत,
मै मुट्ठी-दर-मुट्ठी खाली होऊँ,
चुभे मेरे अंतरतक ये नागफनी,
मैने यही तो किया है---------
झुठे प्यार की खातिर!
तड़पता छोड़ आई थी माँ-बाप,
अगर औरत होती-----------
तो ससुराल होता,मायका होता
आज मै कुछ नही,
बस बिना किसी संवेदना की-----
बहुत दुर तलक फैली,
मरुस्थली रेत हूं।
मै औरत नही------
मरुस्थली रेत हूं।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

(बिटिया खुले मे शौच जाती है)

आदरणीय भारतीय प्रधानमंत्री की खुले मे शौच मुक्त भारत का एक काव्यात्मक समर्थन-------------
                       (बिटिया खुले मे शौच जाती है)
आखिर बाप और भाई की ये कैसी छाती है?
जो उसकी जवान बहु-बेटी---------------
खुले में शौच जाती है।
रास्ते भर फबत्ती और--------
किसी की छेड़खानी का डर क्या होता है?
कभी देखना हो,
तो उसका वे चेहरा देखना कि किस तरह वे चंद लम्बी साँसे लेती है,
जब सकुशल अपने घर लौट आती है।
अक्सर हम अखबार और टी.बी. मे ये पढ़ते व सुनते है,
कि अधिसंख्य--------------
खुले मे शौच गई महिला की,
रेप या बलात्कार के साथ नृशंस हत्या,
सारे रोंगटे खड़े हो जाते है,
जब सबसे ज्यादा------------
एैसे ही बलात्कार की रिपोर्ट आती है।
आओ हम बदले अपनी बहु और बिटिया के लिये,
ये ना समझो कि पहले कौन?
तन्हा लड़ो क्योंकि हर अच्छे के लिये---------
फिर फौज आती है।
एै "रंग" ये महज़ कविता नही एक दर्द है,
कि आजादी के इतने सालो बाद भी,
हमारे देश की बिटिया-----------
खुले में शौच जाती है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

(बिस्तर तक पुलिस है)

हनीप्रित को न पकड़ पाने वाली हमारे देश की महान पुलिस पे लिखा एक तिखा मगर सम-सामयिक व्यंग्य-----------------
                (आपके बिस्तर तक पुलिस है)
ठेला,खोमचा और रेहड़ी वालो के लिये--------
बड़ी हिंसक पुलिस है।
पर हनीप्रीत ने ये साबित कर दिया,
कि कुछ टुकड़े डालो,
और अपनी पहुँच का इस्तेमाल करो फिर देखो-------
कि कितनी नपुंसक पुलिस है।
ये बाइज्जत सब करते है,
इनकी कुत्तो से अच्छि नस्ल है,
कब कितने मे काटना और भौकना है,
सब जानते है!
सही किमत हो मालिक को काट लेंगे,
ये बड़े समझदार----------
और बड़ी हित-चिंतक पुलिस है।
मालिश-मशाज़,
ये खुद करवाने मे सक्षम है,
इनकी जानकारी में ढ़ेरो प्रीत है,
क्या आशाराम?, क्या राम-रहिम?
पैसे खरचिये तो,
महज़ डेरे तक नही बल्कि एै "रंग"------
आपके बिस्तर तक पुलिस है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर (उत्तर-प्रदेश)।

mo.no.----7800824758
भाई जीरो फिगर तक की संभावना है बस आंख मूंदकर दस बारह गोलगप्पे का प्रतिदिन सेवन करे 😀😀😀😀 ऐसा एक पहुचे हुए हकीम लुकमान का कहना है.

(हमारी आस्था पर शोध ना करे)

गीता प्रेस के विरोध करने पर----

(हमारी आस्था पर शोध ना करें)

राजनीति खूब करें
लेकिन सनातन 
या किसी धर्म के लिए
क्रोध ना करें.

गीता प्रेस
हमारा धार्मिक मन और शरीर है,
ये संस्कार है
इसका विरोध ना करे.

गांधी हो
या कलाम सब ने पढ़ा है
कृपया! बंद कर दे!
आप महज
अगले चुनाव के लिए
हमारी आस्था पर
शोध ना करें.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

रचनाकार--रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी,मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
mo.no.7800824758.

Tuesday, 3 October 2023

(निकाह कर ले)

(निकाह कर ले)
कुछ सफेद,
कुछ स्याह कर ले।
इस दुनिया से
कुछ और निबाह कर ले।
ऐ रंग,-जब लेने आयेगी
मौत की दुल्हन,
टुटती साँसे कहेंगी-
तु निकाह कर ले।

(वृद्धा के है राम)

(वृद्धा के है।राम)
सबकी भक्ति,
सबकी श्रद्धा के है।राम
कौन कहता है?
कि केवल अयोध्या के है।राम
ऐ रंग,-
जुठे बेर,जाति की छोटी
शबरी जैसी वृद्धा के है।राम
जय श्री राम।

(किसानों के अच्छे दिन आ गए)

(किसानो के अच्छे दिन आ गये)
लात-घूँसा और पुलिस के बर्बरता की,
लाठी तलक खा गये----------
किसानों के अच्छे दिन आ गये।
डीजल--पेट्रोल महगा होता गया,
बड़ी मुश्किल से इस मर्तबा खेत जोता गया,
इनके बिकास का सारा पैसा--------
नीरव मोदी और माल्या खा गये,
किसानों के अच्छे दिन आ गये।
पिछली सरकार दस साल रही,
क्या किया उसने ?
हा इतना जरुर किया की हमारे जख्मों पे---
हमसे भी ज्यादा रोने आ गये,
किसानों के अच्छे दिन आ गये।
हर सरकार इन किसानों पे सांडर्स की तरह,
जलियांवाला बाग सा दर्द देती है,
ये ऐसे ही कभी मौसम,
तो कभी हुकूमत से लड़ते--लड़ते हार गये,
ये तब बागी हुये जब सह न सके,
तभी तो ऐ दिल्ली तेरी दहलीज पे आके,
तेरे अच्छे दिन को नकार गये-----
किसानों के अच्छे दिन आ गये।
लेकिन राजनीति अब भी कह रही,
कि विपक्ष को ईधन चाहिये था चुनाव का,
और अब भी पक्ष का वही दावा,
कि किसानों का पहले से कही ज्यादा-----
हमारी सरकार मे अच्छे दिन आ गये।

(ब्रेकिंग न्यूज--रेप)

( ब्रेकिंग न्यूज़--रेप)

उफ!
थम नहीं रहा, 
हमारे प्रदेश में
नेताओं का अपने शब्दों और भावों का
राजनीतिक रेप, 

किसी मजलूम लड़की
के घाव के निशान 
को ये 
कई बार छूकर देखते है 
क्योंकि इन्हे, 
लड़की के घावों में 
विधानसभा के जीत की कुर्सी
अपनी जीभ लप लपाती हुई दिखती है 
हर नेता-----
शायद इसीलिए चाहता है कि 
होता रहे, 
हर प्रदेश में मासूम और मजलूम, 
लड़कियो का रेप 

यही, 
कमोबेश मीडिया भी 
अपनी लोकप्रियता के, 
टी आर पी का कैमरा लिए, 
बार-बार ब्रेकिंग न्यूज़,  
का ढ़िढोरा पीट, 
उस लड़की का मसालेदार बयान, 
उसके फटे कपड़े, 
ब्रा और टेप, 
को धुंधला दिखाकर 
कर रहा
अपनी पत्रकारिता के नाम पर 
"रेप."

यह रचना मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है. 

रचनाकार----रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर (U P )
Mo.no.7800824758

Sunday, 1 October 2023

(हे! राम)

(हे! राम)
आज भी-
अहिंसा के सिने पे
चला रहा है,गोली,
नाथूराम।
कब थमेगी ये हिंसा-
बन्दुको की ऐ रंग,
आखिर कब निकलेगा,
कातिल के होंठो से-
हे!राम।
गांधी जयन्ति पर।
(हे! राम)
आज भी-
अहिंसा के सिने पे
चला रहा है,गोली,
नाथूराम।
कब थमेगी ये हिंसा-
बन्दुको की ऐ रंग,
आखिर कब निकलेगा,
कातिल के होंठो से-
हे!राम।
गांधी जयन्ति पर।

(लिंग काट लेती हैं)

(लिंग काट लेती है)
आज घर मे अकेला पा--------------
उसका पिता ही उससे जबरदस्ती कर,
उसकी अस्मत लुट,
बीना किसी पछतावे के करवट ले-----
यूँही नंगा लेटा रहता है,
बिटिया मौन ओढ़े उठती है,
और उठाती है यहाँ-वहाँ पिता के हाथो फटे,
बिखरे अपने अधोवस्त्र और लिबास,
फिर जाने क्यू ?
उन वस्त्रो को फेक देती है घिन से,
क्या करती? आखिर क्यू पहनती?
और क्यू ढकती?
उस पिता से अपने अंग,
जिसने पुरे शरीर को अपने नाखूनो से खरोंचा,
और दाँतो से बेरहमी से काटा,
उन स्तनो को------------
जो नारी की सर्वोच्च सुंदरता और,
उसके वात्सल्य की प्रतिमूर्ति है।
वे पुन: अपने कामांध पिता को तक,
एक गहरी साँस लेती है,
और यूँही नंगी बढ़ चलती है किचन की तरफ,
वहाँ से चाकू उठा,
आँख मुदे अपने आनंदातिरेक में नंगे सोये पिता का,
सुसुप्तावस्था मे एक तरफ ढ़लके----------
लिंग को काट लेती है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

मेरी एकाध रचना आपको बिचलित कर सकती है लेकिन इस तरह कि रचना मे एक आंशिक सत्यता भी आप अपने ही सभ्य समाज के किसी न किसी कोने मे पा जायेंगे------ये इसी तरह की एक सत्य घटना का प्रारुप भर है।
"मेरे खयाल से लघुकथा इतनी भी लघु नहीं होनी चाहिए, जिसमें लघुता तो बनी रहे पर कथा गायब हो जाए"