Thursday, 29 May 2025

(चाय पीते थे)

( चाय पीते थे )

कभी हम-तुम तन्हा,
किनारे की टेबल पे ,घंटो बैठे
कैंटीन की चाय पीते थे.
वे दिन,वे कैंटीन, वे होठ
अब नही
बस यादो की टेबल पे,
खाली और ठंडा
काँच का गिलास रखा है,
जिसमें से कभी धुआं उठता था,
और उस धुएं को फुक,
हम-तुम किनारे की टेबल पे बैठ,
घंटो गुनगुनी चाय पीते थे.

@@@रंगनाथ द्विवेदी.
Mo.no.7800824758

(हुस्न का पारा)

(उनके हूश्ऩ का पारा)
शहर मे गरमि का रोज टुट रहा पारा,,,
जबकि ऐ,रंग---इसमे नही है शामिल--
उनके हूश्ऩ का पारा।

व्यंग्य

🌹पत्नी और प्रेमिका में मुख्य अंतर यही है कि,वह एक प्लेट गोलगप्पे में ही आपसे खुश हो सकती है और प्रेमिका सोने की सिकड़ी दिलाने के बावजूद भी गोलगप्पे की तरह अपना मुंह फुला सकती है😀😀

Wednesday, 28 May 2025

(दंगा)

(दंगा याद है)
हमें पुराना शहर याद है,
एक-एक गली मुहल्ला याद है।
वे कुर्आनखानी का खुरमा,
मुँह पोछती अपने दुपट्टे से,
अब्दुल की अम्मा याद है।
हमें पुराना शहर याद है!
राखी सुनि थी एक ब्राह्मन के घर,
आँख मे खुशियो के आँसू---------
मेरी इस कलाई को सलमा याद है।
हमें पुराना शहर याद है!
इतने सालों बाद देखा जब जला घर,
पुछा कहां गये ये सब,
तो नये शहर के बाशिंदो ने बताया,
तो अफसोस हुआ,रंग---------------
कि अब नये शहर को,
पुराने शहर की मोहब्बत नही,
नफरत,लाशे और दंगा याद है।
हमें पुराना शहर याद है।

(नक्सली हो गये)

(नक्सली हो गये)
गुमराह रास्तो से गुजरे--------
हम जंगली हो गये,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग---अपनो का सीना चाक कर----
हम नक्सली हो गये।

(रूह तलक जल गई)

(रुह तलक जल गई)
रख दिया-----------------
दहलीज़ पे खुद को दिये की तरह,
ऐ,रंग-------------------------तुम नही आये
जबकि मेरी रुह तलक जल गई।

(चरागो की रात)

(चरागो की रात)
लफ्ज़ो की नदी मे घिर गई है किश्ती,
मै कहा ढ़ुढू----------
है कहाँ किनारो की रात।
ना कोई दर,ना ठौर,ना ठिकाना 
कैसे लिखू कि---------
कहाँ गुजरी है मेरे बहारो की रात।
महकते फूलो की खुशबू ना रास आ रही,
कितनी मनहूस लग रही है---------
चमकते सितारो की रात।
एक सिलसिला लिये है गम जो ना खत्म हो रहा,
कैसे लिखू---------
बजती बाँसुरी और पहाड़ो की रात।
वे कहकशे,वे शायरो की महफ़िल छिन गई,
अब याद है बस----------
कुछ मुशायरे की रात।
तु लौट आ एै दिल उस आसमा से,
तेरे इंतज़ार में है-------
किसी के चरागो की रात।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

(खूबसूरत हो नहीं सकती)

(खूबसूरत हो नही सकती)
तु चाहे जितना भी मेकप कर ले एै अमीरजादी,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
पर तु किसी मजूरन से ज्यादा---------
खूबसूरत हो नही सकती।

(ताबूत ना कहे)

(ताबूत ना कहे)

अभी लोकतंत्र जिंदा है
इसे भूत ना कहे,
सदन मंदिर है,
इसे ताबूत ना कहे,

खूब करे मोदी का विरोध
ये विपक्ष की खूबसूरती है,
लेकिन हमारे अमृत को आप 
जहर का घूट ना कहे.

"शेंगोल" सदन में रखे "भरत के त्याग के 
खड़ाऊ की तरह है",
आप भी आएंगे यही जीतकर,
प्लीज,अपना सर झुकाइए यहां,
भले ही आप
भाजपा के राम को सांप्रदायिक,
ओर सदन के बाहर
अयोध्या को अयोध्या
या अपने मूंह से
"चित्रकूट" को "चित्रकूट" ना कहे

आज सत्ता इनकी है
कल आपकी होगी,
प्लीज,
अपनी राजनीति की नीचता से,
इसे नेश्ते नाबूत ना करे 
अभी लोकतंत्र जिंदा है,
इसे भूत ना कहे,
सदन मंदिर है 
इसे ताबूत ना कहे .✍️✍️🙏🙏🙏🙏

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियापुर
जौनपुर, उत्तर प्रदेश

Tuesday, 27 May 2025

(हमने औरत होने का हर हक अदा किया)

(हमने औरत होने का हर हक़ अदा किया)
हमने औरत होने का हर हक अदा किया,
फिर भी तिलाक देके तुमने गमज़दा किया।
हमने औरत होने का हर हक अदा किया।
रोई,सिसकी तेरी बंदिशो मे चराग सी जली,
हाय!कभी उफ कहां किया।
हमने औरत होने का हर हक अदा किया।
तेरी मर्दे परस्ती को कहीं चोट ना आये,
मैने तुम्हे इस्लाम के इतर अपना खुदा किया।
हमने औरत होने का हर हक अदा किया।
ये तिलाक नही कत्ल है मेरा,
ऐ,रंग----चंद लोगो के इस्लाम ने,
बेगुनाह औरत को उसका हक
और उसकी वफा का सिला नही दिया।
हमने औरत होने का हर हक अदा किया।

(आशिकी-2 का रिंगटोन बजता रहा)

(आशिकी--2 का रिंगटोन बजता रहा)
वे तेरी बेवफ़ाई के बाद भी,
तुमसे मोहब्बत करता रहा।
तभी तो अपनी कलाई की नशे काट,
वे पुरे बिस्तर पे-----------
तुम्हें याद कर हँसता रहा।
देख ये वही मोबाइल है,
जिसपे तु कभी उससे घंटो बतियाती थी,
आज उसकी लाश के सिरहाने,
बिना किसी रिसीब के,
इसके नाकाम मोहब्बत की तरह,
रुंधे गले से एै"रंग"----------
आशिकी--2 का रिंगटोन बजता रहा।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

एक माडर्न नाकाम मोहब्बत।

Monday, 26 May 2025

बिछड़े सभी बारी-बारी
(प्रिय मित्र डॉ. रत्नाकर के असामयिक निधन पर)

कल तक जिनके शब्दों में जीवन था,
जिनकी मुस्कान हर दर्द को हल्का कर देती थी,
वो डॉ. रत्नाकर,
आज हमारे बीच नहीं हैं।

कंधों पर हाथ रखकर
जो हर बार कहते थे,
“सब सम्भल जाएगा, हिम्मत रखो,”
आज वो खुद
हमें हिम्मत देकर चले गए।

किसे पता था कि
हमारी हँसी-ठिठोली,
चाय की प्यालियों के बीच
जिन बातों में दुनिया रंगीन लगती थी,
वो पल
इतनी जल्दी स्मृति बन जाएँगे?

रत्नाकर,
क्या तुम्हें पता था
तुम्हारी मौजूदगी हमारे लिए
कितनी अनमोल थी?
क्या तुम्हें अहसास था
कि तुम्हारी आवाज़
हमारे दिनों की रौशनी थी?

क्या तुम्हें पता था, मित्र?
कि तुम्हारी मुस्कुराहटें
एक दिन हमारे लिए
सिर्फ़ तस्वीरों में रह जाएँगी?
कि तुम्हारी हंसी
सिर्फ़ यादों में गूंजेगी?
हम तो बस यही सोचते थे –
जब सब बिछड़ेंगे,
तो उम्र, समय, और थकान के हाथों,
धीरे-धीरे,
बारी-बारी।

लेकिन तुम तो
बीच रास्ते में ही
हम सबको छोड़कर चले गए।
किससे शिकायत करें?
किसे दोष दें?
क्योंकि मौत का कोई हिसाब नहीं होता,
कोई समय तय नहीं होता।

अब हम सब यहाँ,
तुम्हारे नाम के आगे
"स्व." लगाकर
अधूरे से लगते हैं।
तुम्हारी हँसी,
तुम्हारी सलाहें,
तुम्हारा हाथ थामकर कहा गया
“मैं हूँ ना” —
सब अब बस यादों की धरोहर हैं।

हम जानते हैं,
जीवन की रेखा सीधी नहीं चलती,
कोई न कोई पहले बिछड़ता है,
कोई पीछे रह जाता है।
लेकिन रत्नाकर,
तुम्हारा जाना
हमारे लिए
सिर्फ एक विदा नहीं,
एक खाली जगह है
जो कोई भर नहीं सकता।

हम सब
एक दिन तुम्हारे पीछे चल पड़ेंगे,
बारी-बारी,
लेकिन जब तक साँस है,
तुम्हारी यादों को
अपनी हँसी और आँसुओं में सँजोए रखेंगे।
तुम्हारी याद में,

 नीरज कृष्ण
(नोएडा.... 26 मई 25)

Saturday, 24 May 2025

(नीला आसमा सो गया है)

(नीला आसमा सो गया है)
वक्त के सानो पे सर रख नही पाई,
ऐ,रंग---------------
इस रेखा की चाहत और ख्व़ाहिशो का भी ,
नीला आसमा सो गया है।

(स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है)

(स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है)
मै उसे छक के पिता हूँ-----------
पैक दर पैक बीना डर के,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
क्योकि ऐ,रंग--उसके बदन पे कही नही लिखा-----------!
कि वे स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है।

Friday, 23 May 2025

(किस्सागोई करता हूं)

(किस्सागोई करता हूँ)
अक्सर मेरा कत्ल इसलिये होता है,,,,,,,,,
कि मै झुठ और फरेब़ के शहर मे----
ऐ,रंग-------------
सच की किस्सागोई करता हूँ।

Thursday, 22 May 2025

(मेंहदी लगाने के लिए)

(मेंहदी लगाने के लिये)
जीसे ता-उम्र खुद की मेंहदी ने रुलाया,,,,,,,,,
ऐ,रंग---वही खातुन पुरे शहर मे------
मशहूर है,मेंहदी लगाने के लिये।

(इतवार जीते हैं)

(इतवार जीते है)
हम नौकरीपेशा इतवार जीते है,
वे उस शहर,हम इस शहर
दूर रहके भी-------------
हम इतना प्यार जीते है।
हम नौकरीपेशा इतवार जीते है।
वे गीले बाल उनका कमरे में आना,
उतने ही पानी से हम--------------
तड़प के सावन की फुहार जीते है।
हम नौकरीपेशा इतवार जीते है।
छः दिन गुजारते है हम नागफनी के,
फिर लौटते है लेके उन्हे केवड़े का गजरा,
ऐ,रंग---------------
हम इतनी ही खुशी का त्यौहार जीते है।
हम नौकरीपेशा इतवार जीते है।

(कुछ खूबसूरत औरतें)

(कुछ खूबसूरत औरते)
हाँ मैने देखी है कुछ खूबसूरत औरतें,
नदी के किनारे स्याह वर्ण मल्लाहन का------
वे कसे बदन साड़ी खोसे,
जूठे बरतनो का तल्लीन हो माजना,
और उसके उसकनो से आती एक मधुर सी,
खुरचने या रगड़ने की आवाज़,
हाँ एैसी ही खूबसूरती को देख मै कहता हूँ,
कि हाँ मैने देखी है----------
कुछ खूबसूरत औरते।
इस चिलचिलाती धूप में खामोश और बंद,
शहर की खिड़कियो के मौनपन को तोड़ती,
वे कुछ बड़े पत्थरो को,
छोटी-छोटी गिट्टियो में बदलती,
पुरे लय से हथौड़ी की आवाज़,
और उसकी हर चोट पे पसीने से तर-बतर हिलते,
उसके वे दो उरोज़,
मुझे उस मशहूर खजूराहो से ज्यादा खूबसूरत लगे,
हाँ इसिलिये एै"रंग" मै अक्सर कहता हूँ----------
कि हाँ मैने देखी है,
कुछ खूबसूरत औरते।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

(पेट्रोल सी लागे है)

(पेट्रोल सी लागे है)
धीरे-धीरे मुझको कब्ज़ाती जा रही है,,,,,,,
अपने रुप के जादु से।
एै "रंग" ---वे मुझे अब-------------
अच्छे दिन के धोखे में,पेट्रोल सी लागे है।

पेट्रोल की बढ़ी हुई किमत पे।

(बांह में मदिरा रही)

(बाँह मे मदिरा रही )

जब सभी ने छोड़ा मुझको-
तो हाथ मे मदिरा रही.

हम तड़प के रो उठे,
कोई नही,कोई नहीं-------
बस साथ मे मदिरा रही.

घर मेरा शमशान सा था,
और साँस मे मरघट मेरे ,
मै फिर भी जिंदा रह गया ,
क्योंकि बिस्तर पे भी मेरे---
रात में मदिरा रही.

रोजगाली ,रोज-नफरत 
है इसे जाने क्यों हासिल ?
ये वफा है,ये वफा है
बाकी दुनिया बेवफा है,
मै गिरा तो ये गिरी,
सब आते जाते रह गये,
उस राह मे भी साथ मेरे--
बाँह मे मदिरा रही.

रचनाकार--रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर (उत्तर-प्रदेश)

@@@एक अलहदा टेस्ट की अलहदा रचना जो शायद आपको भी रास आये।

व्यंग्य

✍️✍️शादी के बाद अगर आपके बाल 70% तक झड़ जाए,,तो समझ जाइए कि आपको बहुत योग्य पत्नी मिली है 😀😀😀😀

Tuesday, 20 May 2025

(खूबसूरत हो नहीं सकती)

(खूबसूरत हो नही सकती)
तु चाहे जितना भी मेकप कर ले ऐ अमीरजादी,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
पर तु किसी मजूरन से ज्यादा---------
खूबसूरत हो नही सकती।

(दिया और चराग़ अलग है)

(दिया और चराग अलग है)
इसका शुरुर,इसका मिज़ाज अलग है,
मुहब्बत का रिवाज़ अलग है।
यहां होते है सजदे महबूब के,
यहां की मस्जिद और नमाज़ अलग है।
है ये तन्हाई की चादरपोशी,
यहां की कब्र और मज़ार अलग है।
यहां हर रात उर्स है और धड़कने कौव्वाली,
ऐ,रंग----यहां दिया और चराग अलग है।

Monday, 19 May 2025

(कथन)

धीरे-धीरे गिद्ध की तरह हमारे देश से फेसबुक भी विलुप्त हो जाएगा,,,लाइक कम आने से नाराज एक "फेसबुक सुंदरी" का कथन

Sunday, 18 May 2025

(सिंदूर)

(सिंदूर रोये)
तेरी परी तेरी हूर रोये-----------------
एै रात अय्याशियों मे बिताने वाले,
तेरे घर मे तड़पे है एक औरत,
उसकी भरी मांग मे---------------
तेरे नाम का सिंदूर रोये।
मेंहदी और व्याह के जोड़े को,
वे किस तरह तकती है मजलूम,
उफ़! छाले फूटते हो जैसे------------
जब वे रात को तन्हा अपने पिया से दूर रोये।
सारे किये श्रृंगार उसपे हँसती है सौत सी,
वे जी रही है जिंदगी,
जिंदा रहके भी मौत सी,
वे दरवाज़े पे छोड़ आती है आँख अपनी,
तेरे आने के इंतज़ार मे,
कभी लौटना वक्त़ से और देखना,
कि तेरे कंधे से लग,
किस तरह तेरा प्यार पाने को,
तेरे घर मे तेरी पत्नी का,
शर्म से लरजता,
पहले रात किसी छुवन लिये,
तुम्हे पाने की खुशी मे बिस्तर की हर एक सीलवट,
कुछ टूटी चूड़ी, बिखरे गजरे
इधर-उधर कही खोई बिंदियां,
उसके टूटते बदन से,
तुमसे मिले प्यार की खुशी मे---------
उसकी उम्र और यौवन का अब तलक की तड़प को भुला,
तृप्त आँखों मे------------
जहा का मिल चुका शुरूर रोये।
एै रात अय्याशियों मे बिताने वाले,
तेरे घर मे तड़पे है एक औरत,
उसकी भरी मांग मे------------
तेरे नाम का सिंदूर रोये।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर----222002 (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758
(शाख़ो से मोहब्ब़त की है)

गर तुम काटोगे--
तो मै चिखुँगा,,
ऐ,'रंग'
हमने---
दरख्त़ो के शाखो से मोहब्ब़त की है.

Tuesday, 13 May 2025

(हमदर्द की रूहअफजा)

एक अलग ही टेस्ट की रचना-------

(हमदर्द की रूह-अफ्ज़ा)

तू मेरी ,
शरीक-ऐ-हयात है, कि--
हमदर्द की रूह-अफ्ज़ा.

ये तेरी----
नर्म-नाजूक सी कलाई की छुअन,
हाय !!
तू मह़ज़ गिलास है ,या ----
हमदर्द की रूह-अफ्ज़ा.

ये शर्म से झुकी नज़र, 
उसपे सुर्खी ,तेरे गाल की,
बता तू ,
गुलाब है, कि---
हमदर्द की रूह-अफ्ज़ा.

ये हवा की शरारत ,
ये उड़ती तेरी जुल्फें,
हाय !! 
तू खुबसूरत ढ़लती शाम है,या ----
हमदर्द की रूह-अफ्ज़ा.

टहलना ----
तेरा हौले-हौले यूं छत पे
और मेरा देखना तुमको ,
तू मेरी मुमताज़ है, या ----
हमदर्द की रूह-अफ्ज़ा.

यह मेरी स्वरचित व अप्रकाशित रचना है.

रचयिता-रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P )
Mo.no.--7800824758

Friday, 9 May 2025

(तिलाक लिखती है)

(तिलाक लिखती है)
जब शौहर ही तोड़ दे,काँच की चुड़ी--
तब ऐ,रंग--------औरत
ऐहसास के कागज़ पे तिलाक लिखती है।

टिप्पणी

✍️✍️मेरे खयाल से अगर व्यंग्य में व्यंजना नहीं है,तो वह व्यंग्य के नाम पर केवल एक नीरस लेख भर है,व्यंग्य नहीं.

(मां के कलेजे की याद आई थी)

कल के मदर्स डे के लिए बधाई-------

(माँ के कलेजे की याद आई थी)

तवायफ के लिये-----------------
एक बेटे ने निकाला था,कभी माँ का कलेजा
उसे राह मे ले जाते वक्त चोट आई थी,
तुम ठिक तो हो बेटे---
माँ के कलेजे से ये आवाज़ आई थी
ऐ,रंग-----तवायफ ने ठुकरा दिया उसे
और खिल-खिलाई थी।
तब कही बेटे को अपने------------
माँ के कलेजे की याद आई थी.

@@@माँ तुम धन्य हो।

रंगनाथ द्विवेदी, 
जौनपुर mo. no. 7800824758

Wednesday, 7 May 2025

(अवैघ संबंध हैं)+

(अवैध संम्बंध है)
हाँ मुझे कुब़ूल है,तेरे इल्ज़ाम से पहले,,,,,,,,
ऐ,खुबसूरती-----कि मेरा
तेरी तारिफो से अवैध । है।

(मीर तड़पता है)

(अंदर एक मीर तड़पता है)
जब भी शहर में कोई भूख से मरता है,
मेरी नज्म़ो का कूनबा उजड़ता है।
ऐ,रंग----मैं सीसक उठता हूँ लफ्ज़-लफ्ज़,
और मेरे अंदर एक मीर तड़पता है।

(गुरुत्वाकर्षण है)

(गुरुत्वाकर्षण है)
उसकी खुबसुरती को एक टक देखना,,,,,,,,,
मेरी बद्चलनी नही,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
बल्कि ये उसके तराशे हुये बदन का-----
एै,रंग---गुरुत्वाकर्षण है।

Monday, 5 May 2025

(बेरोजगार एक अनकहा दर्द)

(बेरोजगार _एक अनकहा दर्द)
मै रोज चढ़ता हूँ--------
इस महानगर मे देने इंटरव्यूव की सीढ़ियाँ!
पर;ऐ रंग ------------
मेरी हार की सलीब पे,
लटक जाती है,मेरी डिग्रियाँ।
ये बेरोजगारी का भयावहपन और घुटन !
फिर वही इंटरव्यू------------
और मेरे हताश लौटते कदमो पे,
कहकहे लगाती---------
महानगर के दफ्तरो की सीढ़ियाँ।

@@@रंगनाथ द्विवेदी।

(निर्भया को न्याय है)

निर्भया के कातिलो को मिले फांसी से प्रेरित कुछ लाइन----------
                         (निर्भया को न्याय है)
ये महज़ फाँसी नहीं---------------
उस निर्भया को न्याय है।
जो चीखी,तड़पी,छटपटाई
तेरी विकृत कुंठा के डाले गये वे सरिये,
कितने घृणित थे!
काश तुम्हारी माँ ने कहा होता,
या तुमने-----------
अपनी सगी बहन के वे गुप्तांग याद किये होते,
तो तुम्हारा ज़मीर कहता कचोटता,
कि ये पाप है,अन्याय है
और तुम कांप जाते!
हां तुम्हारी पशुता व अमानवियता से,
वे कुछ ही दिनो मे मर गई,
लेकिन तुम तभी से मर रहे हो तील-तील,
सच गलिजो़--------------
आज निर्भया की रुह खुश होगी,
उसका गला रुंध आया होगा,
ये तुम्हें महज़ फाँसी नही बेगैरतो बल्कि------
उस मासुम और बेगुनाह लड़की,
निर्भया को न्याय है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

(वैगन बेलिया)

(रोमांटिक वैगन बेलियाँ)

वे सायबान के पिछे---
शाम को छिपता हुआ सूरज,
और काम से लौटती पहाड़ि लड़कियाँ, 
ना कोई थकन,ना कोई सिकन,
अलमस्त,अल्हड़पन--------
बाते करती,खिल-खिलाती ऐ,रंग--------
मेरी कविता की 
वे रोमांटिक वैगन बेलियाँ।

Sunday, 4 May 2025

( नागफनी सा हो गया हूं)

(नागफनी सा हो गया हूँ)

गमले में सजी-------------
मै नागफनी सा हो गया हूँ.
आम, महुवे और निम्मौड़ी नीम की,
बंद कमरे की खिड़की से नही दिखते,
मेरे गाँव के पोखर,
ढ़ेरो आवाजें और शोर-शराबा
अंदर से मुझे कचोट रहा
ये कान भी तरस रहे सुनने को,
बागो में राग कोयल,
आज सबकुछ बदल गया है,
मै और मेरी जिंदगी दोनो,
अब बस केवल इतना है कि,
गमले मे सजी--------
मै नागफनी सा हो गया हूँ.
गरमी की उमस है,
और इतना बड़ा ये कंक्रीट का घर,
पर वे प्यास वे पानी,नही
जो मेरे कुँए के महज एक लोटे मे था,
उफ! शहर मे नमकीन और
मिठाई की ढ़ेरोंं दुकाने है,
लेकिन मन की मिठास कड़वी हो गई,
वे देशी गुड की डली,
छोड आया,
मै बस केवल इस कंक्रीट के घर मे,
गमले मे सजी--------
नागफनी सा हो गया हूँ.
चारो तरफ मशीनी खड़-खड़ाहट है,
रात है रौशनी है,
गाड़ियों की ढ़ेरों आवा-जाही है सड़क पे,
पर मेरी आँख खुली की खुली है,
याद आ रहा मुझे गाँव,
वे दरवाजे पे बिछी चारपाई,
वे पीपल के रात की सुंदरता मे ढेरों
चमकते जुगनू
हाय! ये पैसे की हत्तक ने छिन लिया,
आज मै जिंदा रह के भी,
केवल इस घर के,
गमले मे सजी ऐ "रंग" 
मै नागफनी सा हो गया हूँ.

@@@रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U.P.)
Mo.no.7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

(मैं खूबसूरत हूं)

मुझे अपनी खुबसूरती की रोमांटीकता
एहसास,
औरों के खुबसूरत कहने 
या फिर 
औरों के मूंह से सुनने पर नहीं होता
लेकिन जब तुम मुझे खूबसूरत कहते हो
तब एहसास होता हैं
कि वाकई मैं खूबसूरत हूं
क्योंकि रोमांटिक तरीके से
मुझे खूबसूरत कहने का अधिकार
सिर्फ़ और सिर्फ तुम्हें हैं 
मैं औरों की आंखों में
अधूरी खुबसूरत हू
क्योंकि उनकी सारी खुबसूरती
मेरी देह के इर्द गिर्द तक सीमित हैं
लेकिन तुम
मेरी इस खुबसूरत सी देह के
दूर तलक फैले एहसास
को उस अधिकार से छूते हो
जहा
मैं अकेली खुबसूरत नही रह जाती
बल्कि मैं केवल मैं रह जाती हूं
मेरी इस स्त्री देह में
तुम और सिर्फ तुम खुबसूरत रह जाते हो
यही खुबसूरती पाने और जीने की
मरीचिका ही
खुबसूरती के घाट

Saturday, 3 May 2025

(ड्रग्स लेता हूं)

(ड्रग्स लेता हूँ)
मेरे रोम-रोम में है,उसके चुभने के निशानात--------
ऐ,रंग-------------
मै उसकी मोहब्ब़त का ड्रग्स लेता हूँ।

Thursday, 1 May 2025

(पी एच डी कर ली)

(पी.एच.ड़ी.कर ली)
मोहब्बत में---------
मै आज तलक स्नातक न हुआ,,,,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----उसने कईयो का दिल तोड़----
इस हूनर पे पी.एच.ड़ी.कर ली।

(बुखार में सोया हैं)

(बुखार में सोया है)
ऐ अमीरी कहाँ तेरी तरह--------
वे किसी तीज या त्योहार मे सोया है।
अपने मासूम बच्चो के दोज़ख के लिये,
ऐ,रंग----एक मज़दूर--------
पुरी रात बुख़ार में सोया है।

@@मज़दूर दिवस।