Tuesday, 30 April 2024

(हिना)

आज ही के दिन ऋषि कपूर भी दुनिया छोड़ गये उफ़ !

(हिना )

उफ़ ! जा नहीं पाई 
इस फानी दुनिया से
तेरे संग "हिना ".

अब रोएगी सीसकेगी
तेरी याद में
हर लम्हें, हर रोज,
पर लिख नही पायेगी 
फिर से हथेली पे
तुम्हारा नाम----
ये तुम्हारी "हिना ".

देख तेरी नीतू--
नीतू ना रही, 
उफ़ ! बनके रह गयी,
एक औरत से---
बदरंग "हिना ".

रंगनाथ द्विवेदी 
जौनपुर (उत्तर-प्रदेश )
Mo.no.7800824758

Monday, 29 April 2024

(रूबाई बेच देना)

(रुबाई बेच देना)
गर किसी भूखे को रोटी मिल सके,
तो बड़े शौक से ऐ,रंग--------
किसी रईस को,
मेरी रुबाई बेच देना।

Sunday, 28 April 2024

(अलहदा जुबा है)

(एक अलहदा जुबां है)

भरी बज्म में बिना बोले 
दोनो ने बात कर ली.
ए,रंग-
खामोंशी भी मोहब्बत की
एक अलहदा जुबां है.

Saturday, 27 April 2024

(बूढ़े पिता का हाथ)

नक्सली हमले मे शहीद एक सिपाही के बुढ़े बाप की आँख नम करती पीड़ा।
                   (बुढ़े पिता का कंपकपाता हाथ)
कल शहीद----------
की चीता जला रहा बाप रो रहा था!
तभी किसी ने उसके कंधे पे हाथ रखा,
तो वे चीख पड़ा-----------
कि रहने दो मेरे कंधे पे मत रखो,
इस देश के ये नपुंसक हाथ जरुरत नही।
गर इतनी ही सहानुभूति है मेरे शहीद बेटे से,
तो कहो देश की सियासत से---------
कि ला दे उन तमाम नक्सलियो के कटे हाथ,
नही ला सकता न जानता हूँ।
इसी जगह फिर सजेगी---------
कुछ फौजी बज़ायेंगे मातमी धुन,
और अपने शहीद बेटे की चीता को आग देगा------
किसी बुढ़े पिता का कंपकपाता हाथ।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
7800824758

छतीसगढ़ मे शहीद सी आर पी यफ के उन जवानो को मेरी श्रद्धांजलि।

राही चाचा जी

कल मेरे पिताजी के संयोजन और संचालन में आयोजित अखिल भारतीय कवि सम्मेलन शाहगंज,जौनपुर मे जाने हेतु कुछ वरिष्ठ साहित्यकारों का मेरे घर आना हुआ.

ऐसे में पिताजी के परम मित्र कृष्णवतार त्रिपाठी "राही" चाचाजी ने अपनी प्रकाशित काव्य कृति "जीवन के चिथड़े पन्ने" को पीताजी के आशीर्वाद स्नेह और प्यार को शामिल करते हुए मुझे प्रदान की मैं आप सभी वरिष्ठ जनो के इस प्यार और आशीर्वाद से अभिभूत हूं ✍️✍️🙏🙏

Friday, 26 April 2024

बाल भारती

आज की डाक से बाल भारती मई-2023 अंक की लेखकीय प्रति मुझे प्राप्त हुई जिसमें मेरी बाल कहानी "खेतों की यात्रा" प्रकाशित हुई हैं,यह बाल पत्रिका सन 1948 से अनवरत प्रकाशित हो रही हैं यह बच्चो की सर्वाधिक चर्चित भारत सरकार की मासिक बाल पत्रिका है. इसके साथ मूल कहानी का स्क्रीन शॉट भी आप सभी के लिए प्रेषित हैं ✍️✍️🙏🙏

Wednesday, 24 April 2024

(आशिकी टू का रिंगटोन बजता रहा)

(आशिकी-2 का रिंगटोन बजता रहा)
वे अपनी कलाई की नशे काटकर हँसता रहा------------
उसकी आँखे मूँद गई और उसकी मोबाईल पे---------
ऐ,रंग--आशिकी-2 का रिंगटोन बजता रहा।

(पत्थर की अहिल्या)

(पत्थर की अहिल्या)
हाँ मैने देखी है इस शहर में------
एक पत्थर की अहिल्या।
बस फर्क ये है----------
उस दौर और इस दौर की अहिल्या में,
तब इसे राम ने उबारा था---------
और अब!
इसे राम ने ही छल लिया।

(भयावह जंगल)

बेटियो और बच्चियो के हर रोज हो रहे बलात्कार पे लिखी रचना.
                         (भयावह जंगल)
शहर की भीड़ मे भी हमने देखा है---------
कुछ आदमियो के अंदर का भयावह जंगल.
मासुम सा सीधा-साधा सा दिखने वाला-----
किसी बच्ची का अकेले मे जब रेप करता है,
और होठो पे कुत्सित हँसी दिखती है तो लगता है,
कि एक कमजोर सी चिड़ियाँ,तड़पेगी,चिचिआयेगी,
रहम की भीख मांगेगी,
मगर फिर भी निगल जायेगा उसे------------
इस शहर के कुछ आदमियो के अंदर का भयावह जंगल.
उसके पंख तितर-बितर हो जायेगे,
सबकुछ हा सबकुछ छिन लेगा,
चिड़ियाँ डरेगी,कापेगी,थरथरायेगी---------
फिर भी मजबुरी है जीना उसे भी ये भयावह जंगल.
उसकी डरी-सहमी खुली आँखो मे ये सवाल,
निरूत्तर सा रहेगा कि आखिर चिड़ियाँ,
किस नीड़,किस डाल,किस छाह जाये,
इस डर से वे रोज मरेगी,
बहुत घुटन है इस भीड़ मे,
बिटिया और चिड़ियाँ अब एक सी ही है,
न जाने दोनो को कब निगल जाये,
शहर के बाहर-----------------
और शहर के अंदर का भयावह जंगल.

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी, मियाँपुर
जौनपुर-----222002  (उत्तर-प्रदेश).
no.no.----7800824758

Tuesday, 23 April 2024

(तु मेरी आवारा लत हैं)

(तु मेरी आवारा लत है)
तड़प-तड़प के मर जाऊँगा,,बे-शक मै----
पर नही छोड़ पाऊँगा तुझको--------
तु मेरी आवारा लत है।

(मुमताज की आंखे)

(मुमताज़ की आँखे)
है सबसे खुबसुरत मेरी मुमताज़ की आँखे,
कितना कशीश,कितना नशा लिये है-----
मेरी मुमताज़ की आँखे!
कभी यहाॅ उठे,कभी वहाँ उठे,
है कैमरे से कही अच्छि--------
मेरी मुमताज़ की आँखे।
है मेरा दिले परिंदा परवाज़ को बेचैन,
ऐ,रंग---आसमाँ है मेरी मुमताज़ की आँखे।

(लाल बत्ती)

आदरणीय प्रधानमंत्री के निर्णय से पहले हमने एक कविता लिखी थी "लाल बत्ती" जो आज अचानक प्रासांगिक हो चुकी है,इस कविता को ले के बस इतना ही कहना है कि इसे बस औपचारिक भर पढ़ना है तो न पढ़े ये मेरे लेखन पे कृपा होगी अगर आप पुरा पढ़ेगे।

                             (लाल बत्ती )
हमसे पूछो कि कौन रही? लाल बत्ती,
एक दागी विधायक---------------
जब अपने फार्म हाऊस पे,
किसी अबला का रेप कर रहा था,
तो उसकी चीख और सिसकी सुन के,
किसी पत्थर का कलेजा भी पिघल जाता,
लेकिन बाहर------------------
इस होते हुये बलात्कार पर भी मौन रही लाल बत्ती।
दंगे हुये,मौते हुई 
सलमा,रजिया,गुड़िया,लक्ष्मी 
सभी तो मरी लेकिन इन्हें भी,
यादव,पंडित और मुसलमान कहा गया,
बहुत पीड़ा हुई,
जब एक वर्ग को बचाके स्याह रात को,
सरकारी दंगे हुये,
कान पे इसके जूँ तलक न रेंगी,
बल्कि ये जिस गाड़ी मे लगी थी उसी में बैठे मंत्री जी,
शराब के पैग छक रहे थे----------
और लखनऊ की तरफ जा रही थी लाल बत्ती।
थाने बिके,
न्याय गया तेल लेने,
शहर के होटलो मे महिना बंधा,
जूआ और जिस्मफ़रोशी हुई,
ऐस.पी.,डि.यम.,जज सभी तो थे,
लेकिन ये कही और बजा रहे थे------------
एक आम आदमी के न्याय और उसके उम्मीद की लाल बत्ती।
सच इसे अब उतर जाना चाहिये,
क्योंकि जब मै इसे तकता हूँ तो लगता है,
कि जैसे बहुत सारी बेगुनाह लाशो के खून से,
रंगी है एै"रंग"--------------
हमारे देश की हर लाल बत्ती।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
7800824758

Friday, 19 April 2024

(अनुगुंजन)

धन्यवाद,बरेली से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका "अनुगुंजन" व संपादक डॉ. लवलेश दत्त भाई जी का जिन्होंने मेरे दो लघु व्यंग्य को व्यंग्य-गुंजन में स्थान दिया. 
1---हमारी लोटा बिरादरी. 
2---लव की डायबिटीज. 

व्यंग्य-----
             (हमारी लोटा बिरादरी)

वे एक बित्ते की मोटी चुटिया और भर माथे ललाट पे-उगते सूर्य की तरह का चंदन लेप,वे खटर-पटर करता खड़ाऊँ, हष्टपुष्ट शरीर पे सुती जनेऊ, ये मनोहारी आकार-प्रकार किसी और का नही अपितु,हमारी ब्राह्मण बिरादरी का है,जिसे ब्राह्मण के अलावा लोग "लोटा बिरादरी के नाम से भी जानते है".

हमारे कुलवंश में पैदा हुआ बच्चा हमेशा से ही अपने--"लोटे का मजबूत माना जाता है". इस लोटे की तासीर ही कुछ ऐसी थी कि--"जितना लोग ब्राह्मण के ज्ञान से प्रभावित होते थे,उतने ही प्रभावित वे उसके लोटे से होते थे". कही कथा,प्रसाद,भोजन की बात होती थी तो यजमान मय-परिवार के ब्राह्मण के लोटे या अपने लोटे से उनका अलौकिक चरण-रज धोता था .एक तरह से ब्राह्मण के साथ ही लोटा भी इस संम्मान के आनंद को महसूस करता था.

"ब्राह्मण का लोटा भी कोई सामान्य लोटा नही होता था,ये पीतल का बना दो से ढाई किलो का होता था". ये लोटा काफी सारगर्भित व ब्राह्मण की ही तरह विद्वान दिखता था. अग्रेंजी मे एक कहावत भी है कि--"फस्ट इम्प्रेशन इज द लास्ट इम्प्रेशन" ऐसा ही कुछ काम काफी हद तक ब्राह्मण का चर्चित ये लोटा कर जाता था.

कई गाँव-गिराव मे आज भी बहुत सारे किस्से ब्राह्मण बिरादरी के इस ऐतिहासिक लोटे को लेकर बतायी व सुनाई जाती है. "जिसे लोग रासो काल के साहित्य की तरह सुनाते है". जिसे सुन मुझे ब्राह्मण होने के गर्व का आभास होता है. ऐसा ही एक किस्सा था-- कि एक ब्राह्मण राज-पुरोहित जो की उस समय ब्राह्मण ही होता था अपने अलौकिक लोटे के साथ मैदान निपटने गये थे,तो अचानक से एक शेर आ गया लेकिन वे इतने हिम्मती व साहसी थे कि उन्होंने--"अपने उसी लोटे से शेर को धराशायी कर दिया था".

ये ब्राह्मण या लोटा बिरादरी केवल दुसरी बिरादरी ही नही अपितु अपनी बिरादरी के कुमार्गी ब्राह्मण को भी "अपने समाज़ के लोटे से वंचित कर देते थे". फिर कोई ब्राह्मण उसके यहा खाना-पीना,आना-जाना तक छोड़ देता था ये सजा और दंड का एक तरीका भी था. आज की पीढ़ी भी लोकतंत्र के चुनाव मे हम ब्राह्मणो से ये जानने को बेचैन दिखती है कि ये--"बिरादरी इस बार अपना लोटा कहा बजायेगी अर्थात किस पार्टी के पक्ष मे मतदान करेगी".लोगो को ये विश्वास है कि "हमारी लोटा बिरादरी जिसके पक्ष मेंं मतदान करती है लगभग सरकार उसी की बनती है".

लेकिन आज हमारी ये लोटा-बिरादरी हासिये पे है,इसके दोषी भी हमारी अपनी लोटा-बिरादरी के ही लोग है,आज बिल्कुल अलग-थलग से हो गये है सच तो ये है कि--"हमने अपने लोटे की कद्र नही की" . गर हमने अपने लोटे का कद्र किया होता तो आज--"हमारी आपकी लोटा-बिरादरी यु विलुप्त-प्राय व नष्ट-प्राय न होती". आईये हम सब सामुहिक शपथ ले कि--"हम अपनी इस लोटा-बिरादरी के पुराने गौरव को फिर से हासिल करेंगे".

यह व्यंग्य लेख मेरा स्व-लिखित व अप्रकाशित है.

(नीलकंठ)

मुझे भी पढ़ेंगे
कुछ लोग किसी दिन
मेरी भी
अदब की झील में
नहाएगी कोई नीलकमल,

चांदनी रात में
सिसकेगी मोहब्बत मेरी
तुम्हें आना पड़ेगा
झील के इस पार
नाव में बैठकर
पुकारेगा
आखिरी सांस तक
तुम्हे,
यह तुम्हारा नीलकंठ.

ये घाट के पत्थर 
ये किनारे 
गवाही देंगे
की कभी यही मरा था
अपनी नीलकमल की याद में
एक नीलकंठ.

Thursday, 18 April 2024

(मोहब्बत मुसलमान थी)

(मोहब्ब़त मूसलमां थी)
मोहब्ब़त हम दोनो मे बे-पनाह थी,,,,,,,
फिर भी न मिल सके,,,,,,,
ऐ,मै ब्राह्मण था और-----------
मेरी मोहब्ब़त मूसलमां थी।

(कश्मीरी पंडित)

(कश्मीरी पंडित)

वे बांगा दी बुलबुल-
वे डलझील वे शीकारे.
हमारी मिट्टी-ए-मोहब्बत
कश्म़ीर,,
हमे ख्वाबो मे पुकारे.

ये सियासत-ए-साजिश
ये अलगाव,
कि हम कश्म़ीरी पंडित पड़े है-
खानाबदोशो से बदतर ऐ दिल्ली,
तेरी सड़को के किनारे.

वे गुल,वे केशर,वे सेब के बगीचे,
उफ!नही आती वे खूशबु
ना आती है--
वैसी यहाँ तक हवा रे!

ये लाशे मईयत,ये रुह-ए-तड़प है,
ऐ,"रंग"
हम कैसे होगे आखिर 
जन्नतनशी--
कश्मीर कि खाक-ए-मिट्टी
के बीना रे।

ये, बिस्थापित कश्मीरी पंडितो का एक दर्द है.

रंगनाथ द्विवेदी, जज कॉलोनी
मियांपुर, जौनपुर-222002 (U P )
Mo.no.7800824758

कथारंग

सृजन वार्षिकी 2022-23 "कथारंग" संपादक:हरीश बी.शर्मा बीकानेर से आज की डाक से घर पहुंच गई।इसमें 17 राज्य के 59 नगरों के बेहतरीन रचनाकारों की रचनाओं को शामिल किया गया है।480 पृष्ठों के इस वृहद अंक में अपनी एक संवेदनशील कहानी "कोरोना और सिमरन" शामिल है जो कि पृष्ठ संख्या 198 पर हैं ,इस अंक में मेरी इस कहानी को स्थान देने के लिए बड़े भैया हरीश बी. शर्मा का बहुत-बहुत धन्यवाद 💐💐🙏🙏

Wednesday, 17 April 2024

(बुलाती है शराब मुझको)

वाकई शराब एक हसीन लत है 

(बुलाती है शराब मुझको)

शाम होते ही----
बुलाती है शराब मुझको.
सोए हुए लोगों को,
मंदिर की आरती 
और अज़ान,
हमें तो----
जगाती है,शराब मुझको.

शाम होते ही,
बुलाती है,शराब मुझको

बंद कमरे में पीते हैं
बाइज्ज़त कुछ एक लोग
और मैं शहर की सड़कों पर
नंगा पिए फिरता हूं
इतनी---
चढ़ जाती है,शराब मुझको.

शाम होते ही---
बुलाती है, शराब मुझको.

काशी-काब़ा कुछ नहीं,
मेरे लिए तो----
ठीए ठीए पर स्वर्ग है
जब कहीं भी,
ए"रंग"----
नज़र आती है,शराब मुझको.

शाम होते ही
बुलाती है,शराब मुझको.

@@@ रंगनाथ द्विवेदी
Mo.no.7800824758

Tuesday, 16 April 2024

खूबसूरत मोड़

जिनकी कहानियों के पात्रों मे हर खासो आम की जिंदगी सांस लेती हो,ऐसे महबूब और बेहतरीन अफसाना निगार है राम नगीना मौर्य बड़े भैया,जिनकी "खूबसूरत मोड़" मेरे हाथों में है जो कि कल की डाक से मुझे प्राप्त हुई है,अब तो इस कहानी की किताब को मैं अगले "खूबसूरत मोड़" तक पढ़ना चाहता हूं ✍️✍️✍️✍️🙏🙏

Monday, 15 April 2024

(पांव के पायल की तरह है)

(पाँव के पायल की तरह है)
जिंदगी------------
मेरी प्रेमिका के पाँव के पायल की तरह है।
वे झुक कभी---------
जब अपनी नर्म सी अँगुलियो इसे बांधती है,
तो एैसा लगता है कि जैसे जिंदगी-----------
उसके यौवन से फिसले हुये आँचल की तरह है।
जिंदगी-------------
मेरी प्रेमिका के पाँव के पायल की तरह है।
वे शर्म और हया से लदी झुइमुई सी है,
जब मै देखता हूं एकटक---------
अपनी प्रेम हिरनी को,तो लगता है जैसे जिंदगी,
मेरी प्रेमिका के--------
आँख के काजल की तरह है।
जिंदगी-----------
मेरी प्रेमिका के पाँव के पायल की तरह है।
वे स्याह बाल उसके,
जब कभी खुलते है और खुल के बिखरते है,
तो लगता है जैसे जिंदगी,
मेरी प्रेमिका के बालो मे उतर आये एै"रंग"------
सावन के बादल की तरह है।
जिंदगी--------
मेरी प्रेमिका के पाँव के पायल की तरह है।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
mo.no.-----7800824758

Saturday, 13 April 2024

(ठुमरी की रात है)

(ठुमरी की रात है)
अजी बैठिये----------
मसनद से टेक लगाकर!
क्यूँकि आज-आपकी खिदमत मे--
इस शहर-ए-तवायफ़ के-----
ठुमरी की रात है।

Friday, 12 April 2024

(किरदार छोड़ जाऊंगा)

( आनंद का किरदार छोड़ जाऊंगा )

मैं जिंदगी के थिएटर को  
विरान छोड़ जाऊंगा,
फिर भी बाबू मोशाय,
मेरे साथ बीते हुए लम्हों की रील,
कभी खत्म नहीं होगी,
क्योंकि मैं आपकी जेहन में
आनंद का किरदार छोड़ जाऊंगा.

जोक

✍️✍️पत्नी के वैज्ञानिक व्यवहार से यदि आपका मन फीका रहता है तो ऐसे में आप अपनी जवान और खूबसूरत साली का गुप्त नाम कुरकुरे और चिप्स रख ले😀😀

Thursday, 11 April 2024

(कंगन उदास है)

(कंगन उदास है)

विरह की सेज है,सिलवट है 
करवट उदास है.
कि चले आओ परदेश से,
कंगन उदास है.

जब से तुम गए हो,
तब से मैं,
ना सजी,ना संवरी
यहां तलक कि कमरे का 
दर्पण उदास है.

कि चले आओ परदेश से,
कंगन उदास है.

पांव से निकाल कर के
रख दिया मैंने 
आपके पसंद की 
वे घुंघरूओ वाली पायल,
मै फिर से
पहन के थिरकूंगी 
अभी तो उस पायल की 
छन-छन उदास है.

कि चले आओ परदेश से
कंगन उदास है.

सर्वाधिकार सुरक्षित.

@@ Rangnath dwivedi
mo.no.7800824758

Wednesday, 10 April 2024

(याद तुम्हारी नही गई)

(याद तुम्हारी नही गई)
अभी तलक याद तुम्हारी नही गई,
वे पिंक से सूट मे तुम्हे देखना,
जैसे अभी कल की बात हो,
तुम गई तो बेशक---------
पर मेरी जेहन में ज्यो की त्यो तुम आज भी हो,
तुम्हारी कसम मौसम बदले,साल बदला
लेकिन तुम्हें चाहते रहने कि--------
मेरी खुमारी नही गई,
अभी तलक याद तुम्हारी नही गई।
वे पतझड़ की हवा,
और उनकी शाखो से गिरते पत्ते,
और तुम्हारे कालेज से छुटने का वे वक़्त,
जब तुम्हारे खुले बाल,
हवाओ से इधर-उधर बिखर जाते थे,
फिर उन्हे तुम अपनी नाज़ुक अँगुलियो से,
जब पिछे की तरफ करती थी,
वे मेरा तुम्हे देखने का खूबसूरत लम्हा था,
मै आज भी उसी लम्हें से मोहब्बत करता हूँ,
सच तो ये है कि----------
बिना तुम्हारी याद के हमसे,
कोई दिन या रात गुजारी नही गई!
अभी तलक याद तुम्हारी नही गई।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर निर्मेश के त्यागी भईया जो आपने आज के काव्य-संग्रह के कालम मे"याद तुम्हारी नही गई" को अपना स्नेह देने के लिये।

(यही धारावी)

(यही धारावी)
मै रोज थकी मांदी,
काम से लौटती हूं जीने------
यही धारावी।
वे चारपाई पे लेटा है,धुत्त कच्ची पिये
गंदी गालियाँ दे रहा,
अभी जबरदस्ती खीचेगा,
मै अपनी ऊबकाईयां रोके,
बर्दाश्त करुंगी एक बलात्कार,
फिर उठुंगी वे सो जायेगा,
थका मांदा!
मै उल्टीयां कर,
पुरे बदन से अपने एै,रंग-------
छुड़ाऊँगी सारी रात मै यही धारावी।

Tuesday, 9 April 2024

(भरपेट दूध मिलेगा)

(भरपेट दूध मिलेगा)
झोपड़ी से------------
नरगिस के सिसकने की,
आवाज़ आ रही है!
ऐ,रंग----आज शायद,
उसके भूखे बेटे को-----
भरपेट दूध मिलेगा।

Sunday, 7 April 2024

(बच्चा पाल रही हूं मैं)

(बच्चा पाल रही हूँ मै)
इस सुंदरतम सृष्टि को------
आहुती डाल रही हूँ मै!
दोज़ख में अपने-------
नन्हा सा एक बच्चा पाल रही हूँ मै।
देगा मुझको अपना ही कोई गाली,
ये नाज़ायज है फिर भी-------
कुम्हार की मिट्टी सा,
इसको ढ़ाल रही हूँ मै।
दोज़ख मे अपने-----
नन्हा सा एक बच्चा पाल रही हूँ मै।

@@मेरी एक कुछ लंबी कविता की चंद लाइन।

(ऐतबार आए)

सलमान की सज़ा फिर जमानत यानि कानून के मंदिर का ये जर्जरपन नही तो क्या है?
                          (ऐतबार आये)
आखिर कैसे?
किसी अपराधी और अपराध मे सुधार आये.
जब एक हिरन के मारने की सज़ा..........
बीस साल बाद आये.
वाह री! कानून की दहलीज़ तेरी जय हो
कल सज़ा आज़ ज़मानत..............
आखिर कैसे?
इस देश के आखिरी शख्स़ का......
तुझपे ऐतबार आये.

@@@रचयिता.....रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी.मियाँपुर
जौनपुर.

जोक

आइए हम सभी लोग मिलकर यह सामूहिक कसम खाएं कि आज के बाद से हम किसी को डायरेक्ट गधा नहीं कहेंगे 😀😀😀😀

पिछले वर्ष हास्य व्यंग्य वार्षिकी में प्रकाशित व्यंग्य "गधा"✍️✍️✍️✍️

Saturday, 6 April 2024

(शहर कत्ल हो जाए)

(आधा शहर कत्ल हो जाये)
उनके निगाहो की है,,,तासीर कुछ ऐसी,,,,
गर तबीयत से देख ले तो,,,,,,,,,,,
दावा है,ऐ,रंग--------
कि आधा शहर कत्ल हो जाये।

(मकान बेच आए)

(मकान बेच आये)
नीम बेच आये,उसकी छाँव बेच आये!
जीस कमरे मे हमें माँ की लोरी सुलाती थी,
ऐ शहर तेरी ज़वा आगोश की खातीर,
हम वे मकान बेच आये।

(आवारा भटकना चाहता हूं)

(शाम आवारा भटकना चाहता हूँ)
देवताओ से उबन होने लगी है---------
मै कुछ शाम आवारा भटकना चाहता हूँ।
हर एक के ख्व़ाहिश के फूल की तरह,
मै किसी मंदिर-मस्जिद या कब्र पे चढू----
ये गवारा नही,
हाँ मै किसी तवायफ़ के गजरे से लग-----
एक रात ही सही महकना चाहता हूँ।
ये दावते रईशी के निवाले बहुत हुये,
मै किसी फुटपाथ पे-------------
उस हरामी बच्चे की तरह,
अखबार पे सुखी रोटियां रख,
मै भी शहर के नाले की बजबजाती बू के पास,
उस सरकारी नल के पानी से----------
कुछ कौर निगलना चाहता हूँ।
देवताओ से उबन होने लगी है"रंग"-------
मै कुछ शाम आवारा भटकना चाहता हूँ।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

Thursday, 4 April 2024

(उपले जला रही थी)

(उपले जला रही थी)
कल जिस अखबार मे छपी थी-तिरंगे की तस्बीर,
ऐ,रंग----उसी अखबार से गरीबी,
अपने तीन दिनो से ठंड़े-----------
चूल्हे के उपले जला रही थी।

मोबाइल खराब होने के बाद हम पुनः आपसे मुखातिब हूं.

(दिल धड़का था)

(महबुब का दिल धड़का था)
ऐ शहर---------
मेरी जश्ऩ-ए-उर्स मे,
मेरी ही किताब के चंद शे,र पढ़ना!
क्यूँकि कभी इसकी हर्फों मे,
ऐ,रंग---------
मेरी महबुब का दिल धड़का था।

Wednesday, 3 April 2024

(भगवान यीशु)

(भगवान यीशू)
येरुशलम की सड़को पे-------
लहू के कतरे गीरते रहे,,,,,,,,,,,,,,
उफ!तलक न की भगवान के बेटे ने।
बस इबलिशो की नादानियत पे हँसे थे यीशू---------
मै फिर आऊँगा लौट के,,ये कहे थे यीशू।
ऐ,रंग--इंसानियत की खातीर--------
अपनी आखिरी साँस तक लड़े थे यीशू।

इबलिशो----शैतानो।
आप सभी को गुड़ फ्राईड़े की ढ़ेर सारी बधाई।

(बेजा तलाक न दो)

(बेजा तलाक न दो)
ख्वा़हिशो को खाक न दो!
एै मेरे शौहर-----------
सरिया के नाम पे,
मुझे बेजा तलाक न दो।
बख्श दो---------
कहा जाऊँगी ले मासुम बच्चे,
मुझ बेगुनाह को-------
इतना भी शाॅक न दो,
बेजा तलाक न दो।
न उड़ेलो कान में पिघले हुये शीशे,
मुझ बांदी को सजा तुम--------
इतनी खौफ़नाक न दो,
बेजा तलाक न दो।
न छिनो छत,न लिबास
खुदा के वास्ते रहने दो,
मेरी बेगुनाही झुलस जाये-------
मुझे वे तेजाब न दो,
बेजा तलाक न दो।
सी लुंगी लब,रह लुंगी लाशे जिंदा,
लाके रहना तुम दु जी निकाहे औरत,
मै उफ न करुंगी!
बस मेरे बच्चो की खुशीयो को कोई बेजा,
इस्लामी हलाक न दो-------
बेजा तलाक न दो।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.7800824758
____तलाक एक दर्द है जो इसे भुगत रही कोई औरत ही समझ सकती है!अगर संभव है तो मेरी इस रचना के पढ़ने वालो से मेरी कलम अनुरोध करती है प्लीज कभी किसी भी औरत से बेजा तलाक न ले,शुक्रिया।

@@@शुक्रिया!साप्ताहिक समाचारपत्र अकोदिया सम्राट(म.प्र.)मेरी इस कविता को अपना बेशकिमती स्नेह देने के लिये।

(मेड इन चाइना)

(मेड इन चाइना)
वे अक्सर तोड़ता है-----
हमारे मूल्क का दिल!
हम कितने देशभक्त है-----
उसी से खरिदते है,
हम अपना उतरा हुआ मूँह----
देखने को आईना!
ऐ,रंग---------
जिसपे लिखा होता है!
मेड इन चाइना।

@@चीन के एक मर्तबा फिर हमारे खिलाफ आतंक का समर्थन करने से प्रेरित चंद लाईन।

(बसंती गेंहू काट रही है)

(बसंती गेहूं काट रही हैं)

ए.सी.कमरो मे बैठ के--
जो इतनी सुघर और स्मार्ट रही है,
वही बसंती चुनाव में आज कल---
गेहूँ काट रही है.
गजब है लोकतंत्र,
कि ना कालिया, ना शाम्बा
और नाही गब्बर का डर,
इतनी बेखौफ हो गई है बसंती,
कि अपने सर पे,
दुपट्टे रखने वाली औरत को,
बेरहमी से डांट रही है----
बसंती गेहूं काट रही है.
ये अच्छे दिन है,मोदी के
कि सिनेमा की ड्रीमगर्ल,
कृष्ण की मथुरा मे,
शौचालय के पर्चे बांट रही है---
बसंती गेहूं काट रही है.

@Rangnath dubey

Tuesday, 2 April 2024

जोक

वैसे अपनी काली कलूटी पत्नी को--काली कहकर बुलाने से कही बेहतर हैं कि आप उसे प्यार से "गुलाब जामुन" कहकर बुलाए 😀😀😀😀

(इस्लाम और मां)

(इस्लाम और माँ)
ऐ इस्लाम़ के चंद काफ़िरो!
तुम्हारी बेज़ा फतवो से---
इसकी ईज्जत कम नही होती।
क्यूँकि ऐ,रंग--------
मूल्क़ वे मुकद्दस माँ है,
जो कभी मज़हब नही होती।

@@कुछ तथाकथित बेज़ा फतवे के खिलाफ ऐक सच।

(प्यार की किताब)

(प्यार की किताब)
हमारे और तुम्हारे प्यार की किताब,
पे महज़ जिम्मेदारियो कि धूल भर पड़ी है!
बाकी तुम वही हो और मै वही हूँ!
हाँ!कुछ पल मिल जाते है जब हम और तुम-----------
मिल के इस किताब की धूल को साफ करते है,
फिर पहले की तरह चमकने लगते है,
हमारे तुम्हारे प्यार के सारे हर्फ,
जिसे हमने-तुमने------
प्यार भरे उन दिनो मे लिखा था,
जब तुम-तुम थी और मै-मै था!
हाँ!याद करो जब घंटो हम,
एक दुसरे की शानो पर अपना सर रंखे,
शाम तलक सपने बुना करते थे,
आज उन्ही सपनो मे रंग भरने के लिये,
हम और तुम---------------
अपने दो मासूम जीवन फूलो की खातिर लगे है!
शायद या यकीनन हम फिर पढ़ेगे पहले की तरह ही----------
एक दूजे की शानो पर अपना सर रंखे,
पुराने दिनो की तरह ही-----------
अपने इस प्यार की किताब।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

(जोक)

देश की तरक्की का सबसे बड़ा उदाहरण हैं कि--"हमारे गांव से अब घुरहू और ढकेलू जैसे नाम गायब हो गए"😀😀😀😀😀