Wednesday, 30 March 2022

(घर की पैंजनी रोती है)
बद्चलन-------------
रातो की आगोश मे सो तो लिया!
पर कभी सोचना ऐ,रंग-------
कि तुम्हारे इंतज़ार मे सारी रात,
घर की पैंजनी रोती है।
(तलाक न दो)
ख्व़ाहिशो को खाक न दो,
ऐ मेरे शौहर!
शरिया के नाम पे--------
मुझे बेज़ा तलाक न दो।
बख्श़ दो--------
कहाँ जाऊँगी ले मासुम बच्चे,
मुझ बे-गुनाह को इतना भी शाॅक न दो!
बेज़ा तलाक न दो।

@@सुप्रीम कोर्ट के तीन बार तलाक देने के मसले से प्रेरित चंद लाइन।
(जाफ़रान वंदे मातरम)
क्यू नही गायेगा-------------
कोई हिन्दू या मुसलमान वंदे मातरम।
ये जेहनियत के बीमार है इन्हें क्या पता?
कि है हिन्दू के लिये गीता,
और मुसलमानो के लिये है-------
कुरान वंदे मातरम।
यकी न हो तो किसी भी कौम से पुछो,
यही कहेगा कि जिस मुल्क मे जन्मे,
आखिरी लम्हे वहीं की खाक मिले,
उसी ख्वा़हिश की है जुबान---वंदे मातरम।
आओ तरन्नूम मे गायें इसे हम तुम,
क्योंकि ये मुल्क मेरी माँ और तेरी अम्मी है,
एै"रंग" जिसके आँचल की दूध मे है बन के केसर------------
और जाफ़रान वंदे मातरम।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

ये रचना आज वंदे मातरम को लेके छिड़े विवाद से प्रेरित है।
(आईना रो दे)

ए मेंरी आरज़ू का खूँ करने वाली,
खुदा करे!
कि कल तेरे हाथो की हिना रो दे।
और जब तु
सँवरने के लिये हो आईने के रुबरु,
मेरी वफ़ा का अक्स़ उभरे---
और तेरी कमीनगी पे आईना रो दे।

@Rangnath dubey
बिहार और बंगाल के दंगे पे लिखि रचना।
                  (मकान जल जाता है)
जब राजनेता कोई घिनौनी चाल चल जाता है---------
तो उससे बिहार और बंगाल जल जाता है।
सब एक दूजे को मरते-मारते है और---------
हमारे खून-पसीने से बनाया मकान जल जाता है।
जिन्हें ठीक से श्लोक नही आता,
और जिन्हें ठीक से आयत नही आती,
उन्ही के हाथो----------
शहर की पूजा और अजान जल जाता है।
कर्फ्यू में--
रेहड़ी और खोमचे वाले मजदूरो के बच्चे,
आँख मे आँसू लिये,
तकते है तवे का सुनापन सच तो ये है कि,
शहर के दंगे मे-----------
गरीबो और मजदूरो की रोटी का सामान जल जाता है।
सब एकदूजे को मरते-मारते है और----------
हमारे खून-पसीने से बनाया मकान जल जाता है।

@@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर--222002 (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.----7800824758

Sunday, 27 March 2022

(चुल्हा नही जलता)
तुम तो बात-बात मे शहर जलाना जानते हो,
तुम्हारे पास तो कौमो को जलाने का ईधन है!
पर यहाँ फाँकाकशी सोने नही देती,
पेट तो जलता है ऐ,रंग---------
पर इस बस्ती मे अक्सर चुल्हा नही जलता।
आज फिर से मुहब्बत याद आई,
मौसम से पहले आँखो मे सावन सी बरसात आई,
लौट आ एै दिल फिर अपने शहर,
खिड़की,दरवाजे सब बिरान हुये कुछ इस तरह----
हमे आज तेरे छत की याद आई।

                     (मै शम्म-ऐ-चराग हूँ)
मै शम्म-ऐ-चराग हूँ खामोश हो जलुंगी!
ये घुटन है हासिल महज़ यहाँ शमा को,
बुझ जाऊँगी सहर से पहले,
वफा तो न मिली मुझको कही किसी महफ़िल
लेकिन फक्र है मुझे की बेवा हुई तो क्या ?
मैने शौहरे शहर को,
आखिरी लम्हे तक रौशनी तो दी,
बस इतनी खुशी लेके मै मौत से मिलुंगी,
हाँ! वादा रहा फिर भी मुझको जब भी जलाओगे,
हर एक सब पहले की तरह----------
मै हूबहू जलुंगी।
मै शम्म-ऐ-चराग हूं खामोश हो जलुंगी।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर----222001(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

कुछ रचना के शब्दो का अर्थ-------
सब------रात
सहर----सुबह।

Friday, 25 March 2022

(माँ की कोख़ आती है)
हमारे शहर मे-----------
जेहनी बेहयाई मुस्कुराती है!
क्यूँकि ऐ,रंग----------
अस्पतालो मे अब कत्ल करवाने,
माँ की कोख़ आती है।

@@सेब द चाइल्ड।

Thursday, 24 March 2022

(साँवली मछेरन)
मै दिवाना हो गया हूँ,,,शंतनु की तरह,,,,
मुझे हर जगह दिख रही,,,,,,
ऐ,रंग----वे जाल फेकती हुई----
                         साँवली मछेरन।
(रोटियो की मज़ार पे लिखता हूँ)

ऐ शरिफे शहर----
मै उसकी गदराई जवानी और,,,,
काली सलवार पे लिखता हूँ।

मै अपने दौर का मंटो हूँ,भूखा हूँ,,,,
ऐ,रंग----
इसलिये मै अक्सर विरान तवे---
और रोटियो की मज़ार पे लिखता हूँ।

Monday, 21 March 2022

बिभूति भूषण झा,सर के कुशल संपादन की एक और बड़ी उपलब्धि लोगों के बीच लगभग आने को तैयार है जी हां वे कृति है "प्रभाती " जिसमें देश 70 रचनाकारो की काव्य रचनाओं का वृहद चयन किया गया है.

उन्हीं रचनाकारो में से एक हमारी रचना का भी चयन हुआ है, जिसके लिए मै बिभूति भूषण झा सर का दिल से आभार व्यक्त करता हूं.🌹🌹🙏🙏
(ट्रेन हादसे)
हाई स्पीड़-बुलेट ट्रेन-अच्छे दिन,,,,,
सब ख्व़ाब से,,,,,
मै कैसे गुफ्त़गु करु हर लाश से,,,,,,
छुट गई कलम भी कंप-कपाके मेरे हाथ से।
आखिर कब तलक होते रहेगे,ऐ,रंग----
इस मूल्क़ मे ऐसे ट्रेन हादसे।

ट्रेन हादसे मे मरे हुये लोगो को मेरी श्रद्धांजली।

Sunday, 20 March 2022

(गीत)
गीत----------
केवल उर्वशी या शकुंतला नही!
ऐ,रंग----ये उस गरीब की पतीली भी है,
जिसमें कई रोज से-चावल पके नही।
(केदारनाथ सिंह-एक श्रद्धांजलि)
केदारनाथ------------
के साहित्य से यहां की मिट्टी बोलती थी,
शब्द-दर-शब्द का खाटीपन था,
पन्ने-दर-पन्ने उनकी किताबभर नही,
दोस्तो को लिखि उस दौर की-------
उनकी हर चिट्ठी बोलती थी।
लेकिन एक-एककर सब जाते गये,
और टुटता गया ये सिलसिला,
गाँव की उबड़-खाबड़ सड़के,
और उनके साथियो की तरह बिछड़े,
किनारे पड़े छिटके आँख नम किये-------
उस सड़क के यादो की गिट्टी बोलती थी।
लेकिन आज वे भी चले गये,
उनके जाने का रुंधापन और नम आँखे,
कह रही कि---------
उनके साहित्य का ये रितापन,
शायद फिर न भर सके।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर--222002 (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758
विश्व गौरैया दिवस

(गौरैया)
याद करो बचपन--------
वे फुदक के!चहक के!कितना बहलाती थी!
एक बेटे की तरह।
ऐ,रंग-------गौरैया
केवल हमारे छत की चिड़ियाँ नही,
आज रुठ गई!
जो कल हमारी माँ थी।
कल डाक से "इन्नर " पुस्तक प्राप्त हुई. जो पुरे देश में जनप्रियता के कीर्तिमान की तरफ बढ़ रही. हर राज्य से इसकी तारीफो के फ़ोन आ रहे. ये पुस्तक देश के 100 पुस्तकालयों में रखी जाएगी. इसमें देश के युवा व जनप्रिय साहित्यकारो की एक मुक़म्मल दुनिया है. 
इसमें देश के 125 रचनाकारों की रचनाये शामिल है. ये 296 पृष्ठ की पुस्तक है. 
इस पुस्तक में-----
15 कहानिया, 90 कविताएं
25 लघुकथाएं, 37 गजले शामिल है. 
इसे आप मात्र कोरियर सहित लागत मूल्य 200 रूपये में प्राप्त कर सकते है. इसे संपादक बिभूति भूषण झा या हमारे फेसबुक के मैसेंजर या फेसबुक के कमेंट बॉक्स में मैसेज कर सकते है. 

धन्यवाद, "इन्नर " और संपादक बिभूति भूषण झा सर का. 

जिन्होंने मेरी एक लघुकथा----

(1)भूख से मरे शायर का दिवान छपा 

व एक कविता----
(उन्नमुक्त होना चाहती हूँ )

एक भूखा शायर जो अपने जैसे भूखे शख्स की रोटियों की मजार पे लिख गया----------

                (भूख से मरे शायर का दिवान )

जी हाँँ! हमारे शहर मे फूटपाथ किनारे दिनभर वे बीड़ियाँ बनाता और उन्हें सेंकता था, तैयार हो जाने पर जब वे कुछ बीड़ियाँ बेच लेता तो उन्हि चंद पैसे से कुछ सुखी रोटियां व प्याज से अपने दोजख को किसी तरह भर बगल से गुजर रहे सप्लाई के काई लगी टोटी से पानी पी कई सालो पुराना मैला-कुचैला फटा कंबल निकाल वही अपनी बिड़ी बनाने और बेचने वाली फूटपाथ की जगह सो अपनी रात गुजार दी।
वही बिड़ियाँ बनाने और बेचने वाला शायर जिस दिन बिड़ियाँ न बेच पाता उस रात वे एकाध बिड़ि सुलगा अपनी होठों से लगा इधर-उधर से बीने हुये सादे कागज़ पे अपने दर्द के नग्में लिख उसे उसी बिड़ी वाले बाकडे के एक सुरक्षित जगह रख देता।
ऐसे ही एक दिन भूख मे सोये हुये उस शायर की मौत हो गई, काफी दिन निकल आने पे भी न उठा तो उसे पुलिस वालो ने उठाने की कोशिश की तो वे मरा पड़ा था,डाक्टर के बुलवाने पे पता चला कि इसकी मौत भूख से हुई है। उस शायर की जब सारी छान-बीन पुलिस वालो ने की तो उसकी नज्मों के वे सारे कागज़ बरामद हुये।
उस समय जो शहर कोतवाल आया हुआ था वे भी शेरो-शायरी और नज्मों का काफी शौकीन था,उसने अपनी मदत से और कुछ स्थानीय सेठ-साहुकारों की मदत से जब उस भूख से मरे शायर का दिवान छपवाया तो उस दिवान ने बिकने के सारे रिकार्ड तोड़ दिये। आज वे जिस शहर की फूटपाथ पे भूख से मरा था उसी शायर के नाम लाखों-लाख के मुशायरे होते है। लेकिन वे भूखा शायर "कभी किसी जश्न या त्यौहार पे नही लिखता था, वे अपनी तरह औरो के दोजख की भूख व उनकी रोटियों की मजार पे लिखता था" ।

@@@रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर पिन.नं.--222002(उत्तर-प्रदेश)।
Mo.no.---7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

Thursday, 17 March 2022

(मज़हब हो के रह गई)

हर रात लहु -लुहान  सेज़ पे सोती है,,,
इसका शौहर----
इसकी ख्व़ाहिशो का कत्ल़ करता है.

ये मोहब्ब़त तलाशती है कतरा-कतरा,,,
वे मोहब्ब़त के लम्हो मे तकरिर करता है.

ऐ,रंग--वे यहाँ आई थी औरत होने-----
मज़हब होके रह गई.

Tuesday, 15 March 2022

(अपनी लटो को)
अपनी लटो को----
चेहरे पे आने ना दिया करो,,,
बड़ी जलन होती है------
जब ये तुम्हे चुमते है।
(घुँघरु बांधती थी)

रईसो के दरमियां वे सलिके से जाती थी,
कभी ठुमरी,कभी दादरा गाती थी।

ऐ,रंग--वे पाक थी कोठे पे सुना है-----
कि केवल!वे पाँव मे घुँघरु बांधती थी।
(बंजारन)

मेरी जिंदगी मे आई थी कभी--
एक खानाबदोश बंजारन.

उसकी कत्थई आँखो को यादकर,
मै लिखता गया,लिखता गया,
न जाने कब--
एक मुकम्मल किताब बन गई!
ऐ,रंग--
वे खानाबदोश बंजारन.

Saturday, 12 March 2022

(सनी लियोन हुई)
मेरी गज़ल,मेरी कविता मौन हुई,,
ऐ,रंग----
देखते-देखते हमारे साहित्य की शकुंतला--
सनी लियोन हुई।
(आचमन करना)
मै इस ज़मी पे----------
किसी देवता के प्याले से छलक आई हूँ।
ऐ,रंग-------जरा संम्भल के-------
मेरी रुप का आचमन करना।
(ताजमहल )

उस बेवफ़ा के हाथ से---
गिरा और गिरके टूट गया,
ए "रंग "
वे मेरा तोहफ़ा नही---
कांच का ताजमहल था.

Tuesday, 8 March 2022

(पती के हाथ से जली)
कभी मिट्टी के तेल तो कभी तेज़ाब से जली,
औरत सीता भी हुई तो आग से जली।
ये दुनिया मर्दें शहर है आज भी,
गर मासुम सजी-सँवरी भी तो ऐ,रंग-----
अपने पती के हाथ से जली।

Sunday, 6 March 2022

(अब्बु ने लगाया था)
हर चोट पे------------
चिखेगी तुम्हारे माँ की मोहब्बत।
क्यूॅकि ऐ,रंग----इस बुढ़े दरख्त़ को------
तेरे अब्बु ने लगाया था।

Saturday, 5 March 2022

(फागुन है)
मदभरी गुन-गुनी धुप मे फागुन है,
आम की अमराई,कोयल के कूक मे फागुन है।
ढलती उम्र मे कोई पढ़ रहा दोहे,
कोई कह रहा गोरी,तुम्हारे रुप मे फागुन है।
प्रीत के,प्यार के,हर कही बरस रहे रंग,
फिर भी किसी विरहन के-हूक मे फागुन है।
कोई हथेली से मल रहा गुलाल,
तो कही किसी प्रेमी के चुक मे फागुन है।
ढोल की थाप पर,मेरा झुम रहा मन,
हाय!,रंग--कितने शुरुर मे फागुन है।

होली की ढेर सारी बधाई।
ये रचना अगले वर्ष दैनिक जागरण के,विथिका से प्रकाशित मेरी पसंदीदा रचना है।
(एक आवारा शाम हूँ)
धुँधला जाते है ऐ,रंग--------
मेरी आगोश मे चेहरे!
मै शरिफ़ो के शहर की-----
एक आवारा शाम हूँ।
(तबसरा करती है)
मेरी गज़ल अक्सर तबसरा करती है,
किसी गरीब की भूख से मशवरा करती है।
सुना है एक हयात और एक जन्नत है शहर,
लेकिन इसी शहर में कुछ जन्नत,
माँ की कोख में मरा करती है--------
मेरी गज़ल अक्सर तबसरा करती है।
मजबूरियाँ बिकती है,खरिदो-फरोख्त़ होता है,
कुरआन पढ़ने वालो जरा सोचो,
किसी गली में हर रात अपने जख्म़-----
न चाह के भी कोई अमीना हरा करती है।
एै"रंग" इसी से न चाह के भी---------
मेरी गज़ल अक्सर तबसरा करती है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

Friday, 4 March 2022

(शबे भहफ़िल)
बेशक लौट जाना तुम सहर से पहले,
ऐ मेरे कातिल!
पर मै टुट के गाऊँगा कल के मुशायरे में,
है दिली ख्व़ाहिश कि तुम सामने रहना,
तुम नही मिली तो गम नही--
बस बीना आँसुओ के रोना चाहता हूँ,
कल मै शबे महफ़िल।
(आओ जिहाद करे)
बेटे और बेटियाँ-----
माँ-बाप की मोहब्ब़त को याद करे।
ना कत्ल हो,ना शहर जले,
ऐ,रंग--हम जिस्मानी हवस के खिलाफ--
आओ जिहाद करे।
(राम को अल्लाह कहता हूँ)
फकिरी तबियत है--------
मै मस्ज़िद में नमाज पढ़ता हूँ!
बस फर्क ये है ऐ,रंग---------
मै राम को अल्लाह कहता हूँ।
(जलील चुने जायेंगे)
कहाँ गरीब मुसहर,कौल या भील चुने जायेंगे,
ये विचित्र चुनाव है---------------
इसमें कौवे,गिद्ध और चील चुने जायेंगे।
एै"रंग" शरीफ़ और शराफ़त गई तेल लेने,
यहाँ तो बिहार के मंत्री की तरह------
कुछ हमारे भी प्रदेश से जलील चुने जायेंगे।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

धन्यवाद!आपका दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और मेरे चुनावी कटाक्ष का।

Thursday, 3 March 2022

(जवान हुई)
कैसे निखरते------------
किसी मजदूर बाप की बिटिया के अंग,
इसके पेट और नाभी का पिचकापन,
गर पढ़ सके तो पढ़,
अरे ये वो पगली है------------
जो आधे से ज्यादा फाकाकसी मे जवान हुई।
रातभर खाँसती माँ के सिरहाने बैठी रही,
दवा की खाली शीशी का दर्द पूछ इससे,
एक झपकी का इसके झोंका भी टूट गया------
ये एैसी ही गुजरी रातो मे जवान हुई।
बापु के काम से लौटने के पदचाप की पीड़ा,
का असह्यपन जानती है!
फिर भी मूक और मौन है,
अंदर ही अंदर बेटी को न व्याह पाने का सुलगापन क्या है?
ये जानती है!
तभी तो कभी सजी-सँवरी नही ना आईना देखा,
एै "रंग" ----------
ये एैसे ही अभागेपन मे जवान हुई।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर---222002 (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758
(उपले जला रही थी)
कल जिस अखबार मे छपी थी-तिरंगे की तस्बीर,
ऐ,रंग----उसी अखबार से गरीबी,
अपने तीन दिनो से ठंड़े-----------
चूल्हे के उपले जला रही थी।
(सिलेंडर महंगा हो गया)
हमारा अच्छा दिन--------------
न जाने किस अँधेरे मे खो गया,
जिसको बनारस की गंगा माँ ने बुलाया था---
हाय!उसको न जाने क्या हो गया?
एै"रंग" दो चरण बाकी है चुनाव का,
समझ लो अभी से--------------
हमारी किचन का सिलेंडर महंगा हो गया।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758
धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और मेरे चुनावी कटाक्ष का।

Wednesday, 2 March 2022

(प्यार को खतरा है)
ईद,होली त्योहार को खतरा है,
मंदिर-मस्जिद की मीनार को खतरा है!
लड़ जायेंगे------------
शहर के शहर गर इनकी चली तो,
एै"रंग" यहाँ मुसलमान की मोहब्बत और---
हम हिन्दूओ के प्यार को खतरा है।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

धन्यवाद!आपका दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और मेरे चुनावी कटाक्ष का।