Sunday, 28 June 2020

व्यंग्य---(मै खूबसूरत व स्मार्ट हूँ )


व्यंग्य-----(मै खूबसूरत व स्मार्ट हूँ )

"मैं जन्म से ही वेस्टइंडीज के बच्चों और नागरिकों से ज्यादा खूबसूरत व स्मार्ट हूं". बचपन में तो कॉलोनी की कुछ एक चालाक माँये अपने रोते हुए बच्चे के सामने जब मेरा नाम ले लेती थी तो उनके रोते हुए बच्चो पे मेरे नाम का इतना--"काला जादू की तरह असर होता कि वे सक- पकाकर ना केवल चुप हो जाते थे अपितु यू थरथरा कर कांपने लगते थे जैसे किसी कमजोर दिल के आदमी ने राम से ब्रदर कि कोई बहुत ही डरावनी फिल्म देख ली हो". 

 इसी तरह की एक घटना से मेरी पत्नी भी दो-चार हुई थी जिसको याद करके आज भी मेरी पत्नी को--"हल्का-फुल्का फीवर आ जाता है और उसे एक आध गोली कॉलपाल की खानी पड़ती है". वह घटना हमारी और उसके सुहागरात की है. क्योंकि वे पूरी शादी में अपनी एक लंबा सा घूंघट काढ़े हुई थी इसलिए उस समय वे मेरी सोहनी-सूरत देख नहीं पाई थी और यह अच्छा ही था अगर वह मुझे शादी के वक्त ही देख लेती तो शायद--"शादी के मंडप में ही वे गश खाकर गिर जाती और मेरी सुंदरता इतनी मशहूर हो जाती कि उस गांव व शहर की जवान लड़कियां अपनी सखियों की शादी से पहले एक बार जरूर चुहलबाजी के चटखारे लेकर मेरा लजीज मजाक उड़ाती". 


 सुहागरात के दिन जब मेरी पत्नी ने मेरा यह रूप और लावण्य देखा तो मुझे ऐसा लगा कि जैसे वे अपने पति को नहीं बल्कि--"अपने अरमानों के नेपाल का भयंकर भूकंप देख रही हो". फिर खुद को किसी तरह उसने संयत किया और अपने कापते हाथों से उसने माचिस व मोमबत्ती पकड़ी जिसे सही से पकड़ने और जलाने  में उसे 15 मिनट लग गए. जब मैंने उससे पूछा तो उसने कहा कि मुझे आपको पूरी जिंदगी देखना है अंधेरे में देखने से अच्छा है की आपको उजाले में देखकर मैं अपनी--"सांसो के ब्लड प्रेशर को अभी से दुरुस्त कर लूं". 


यह व्यंग्य लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है. 


लेखक---रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin. no. 222002 (U P )
Mo. no. 7800824758

व्यंग्य---(रेडजोन में पत्नी का मेकप बॉक्स )

व्यंग्य--(रेड जोन में पत्नी का मेकप बॉक्स )

इस कोरोना वायरस के लॉकडाउन में--"मेरी पत्नी का मेकप बॉक्स रेड जोन में आ गया है.  उसकी सुंदरता को निखारने वाले सारे प्रोडक्ट एक-एक कर कोरोना पाजीटिव होते जा रहे हैं". उसका उतरा हुआ मुँह  अब तलक कोरोना के तमाम उतार-चढ़ाव को व्यक्त करने के लिए पर्याप्त है.

मैंने तो दो दिन से टीवी पर कोरोना से संबंधित समाचार ही देखना बंद कर दिया है.क्योंकि मुझे अच्छे से याद है,  जब मेरी पत्नी का मेकअप बॉक्स--"मेकअप के सामानों से भरा था,  तो वे ग्रीन जोन की तरह खुश थी.कुछ खाली हुआ तो वे ऑरेंज जोन की तरह खुश थी".  यहां तलक तो गनीमत थी, लेकिन जैसे ही मेरी पत्नी की--"खूबसूरती को निखारने वाली तमाम प्रोडक्ट खत्म हुए तो उसका मेकअप बॉक्स रेड जोन में आ गया". 

जिसके चलते आज मेरी पत्नी ना ढंग से मेकअप कर पाने के क्वॉरेंटाइन के दर्द से गुजर रही है. उसके मेकप की इस कोरोना वायरस जैसी बिपत्ती का असर अब उसके मन मस्तिष्क और हाव-भाव में भी पड़ने लगा है. वे पहले की तरह आईने के सामने खड़ी होकर अपने होठों को कुछ यू इधर-उधर करती है जैसे वे लिपस्टिक लगाने के बाद अक्सर किया करती थी, लेकिन आज जैसे ही उसने अपने होठों को इधर-उधर किया,  तो उसकी दोनों मासूम आँखों में आँसू भर आये.उफ! हे !भगवान काश मेरी पत्नी अपने--"मेकअप बॉक्स के इस रेड जोन से निकलकर पुनः अपनी सुंदरता के ग्रीन जोन में आ जाए".

मैंने अपनी पत्नी की सुंदरता व उसके मेकअप की कभी भी इतनी गिरी हुई इम्यूनिटी नहीं देखी. मुझे जहां तक याद है वे यह है कि किसी भी पत्नी के--"मेकप की गिरी हुई इम्यूनिटी को बढ़ा सकें,  ऐसी कोई दवा दुनिया में बनी ही नहीं". लेकिन मैं अपनी पत्नी के इस घटते हुए मेकअप के इम्यूनिटी कॉल में भी लगातार एक "पति रूपी कोरोना वारियर्स की तरह लगा हुआ हूं. निश्चित है कि हम बहुत जल्द अपनी पत्नी को उसकी मेकअप के रेड जोन  से निकाल कर ग्रीन जोन मे ला पाएंगे". 


यह व्यंग्य मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है. 

लेखक---रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin.no.222002 (U P)
Mo.no.7800824758

व्यंग्य---(ऑनलाइन गर्लफ्रेंड से बाते )

व्यंग्य-----(ऑनलाइन गर्लफ्रेंड से बाते )

 कोरोना-वायरस के चलते मेरे दिल की राष्ट्रीय छति हुई है. इसकी चपेट में आने से मेरी गर्लफ्रेंड किसी अन्य ब्वॉयफ्रेंड से ऑनलाइन हो मोहब्बत की गुफ्तगू कर रही. मैं लगातार तभी से अपने आंसुओं के सेनीटाइजर से आपने उदास व गमगीन चेहरे को सेनीटाइज कर रहा हूं. लेकिन फिर भी वे मेरी जेहन में मुस्कुराती हुई जब दिख जाती है तो मुझे लगता है कि--जैसे मैं उसके सामने कोरोना-वायरस से प्रताड़ित महाराष्ट्र की तरह खड़ा हूं. 


 अगर मुझ जैसे ब्वॉयफ्रेंडों की इस समय दिल टूटने की कोरोना जांच कराई जाए तो यह मेरा दावा है कि- इन गर्लफ्रेंडों के धोखा देने का वे आंकड़ा देश के सामने आएगा जिस आंकड़े को तोड़ पाना ना तो आज की पीढ़ी के ब्वॉयफ्रेंडो के बस की बात है और ना ही आने वाले कल की पीढ़ी के ब्वॉयफ्रेंड ही इस आंकड़े को तोड़ पाएंगे. 


 इतना ही नहीं अगर आप इन--"गर्लफ्रेंडों के ऑनलाइन खूबसूरत चेहरे को देखेंगे तो पाएंगे कि जैसे इस लॉक- डाउन में सब कुछ लॉक-डाउन  हुआ बस इन गर्लफ्रेंडो की सुंदरता के ब्यूटी-पार्लर कभी भी इस लॉक डाउन की जद में नहीं आए अर्थात इनकी सुंदरता रेड जोन में नहीं पाई गई. बल्कि इनके कई सारे बॉयफ्रेंड  रेड जोन में आए और इन सभी में मोहब्बत के कोरोनावायरस पॉजिटिव पाए गए जिसके बाद से  लगातार यह सारे बॉयफ्रेंड इन गर्लफ्रेंड की गम के क्वारंटाइन में है". 

 इतना धोखा देने के बाद भी इन गर्लफ्रेंडो ने सहानुभूति की एक हल्की सी मुस्कुराहट की बिरियानी भी इन बॉयफ्रेंडों को दया स्वरूप देना गवारा न समझा. उफ! इतना अन्याय. पत्थरबाजी अपने पुराने  ब्वॉयफ्रेंड पर अब तो यही इन पुराने बॉयफ्रेंडो  से मेरी अपील है कि वे अपनी-अपनी पुरानी गर्लफ्रेंडो को सामूहिक रूप से यह डिजिटल श्राप दे  कि जा तुझे अगर ब्वॉयफ्रेंड प्रजाति का पति मिले तो वे भी तुम्हें धोखा देकर किसी अन्य गर्लफ्रेंड से ऑनलाइन मोहब्बत की रोमांटिक बातें करें.


यह व्यंग्य लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है. 

लेखक-- रंगनाथ द्विवेदी  
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin. no. 222002 (U P )
Mo. no. 7800824758

लेख---(सफाईकर्मियों की अप्रतिम राष्ट्रभक्ति )

लेख---(सफाईकर्मियों की अप्रतिम राष्ट्रभक्ति )

 पूरे देश में कोरोना आपदा के समय सफाई कर्मियों ने जिस निष्ठा व सेवा भाव का प्रदर्शन किया वे उन्हें  वंदनीय व प्रशंसनीय बनाता है. सच्चे अर्थों में वे एक सजग--"राष्ट्रभक्त सिपाही की तरह अपनी जिम्मेदारियों की सरहद पर डटे रहे". उन्हें सफलता विफलता मिलती रही समाज के तमाम तंज और झंझावात को भूल उनके अंदर एक असीम मानव प्रेम व सेवा भाव का जो इस आपदा काल में प्रादुर्भाव हुआ वैसा ना मैंने कभी पढ़ा और ना ही अपनी इन जिंदा आंखों से देखा ही. 

 सच तो यह है कि उस देश को कभी कोई आपदा या युद्ध परेशान या पराजित नहीं कर सकता, जिस देश का-"आखरी व्यक्ति भी अपनी संपूर्ण मानव सेवा भाव  को निछावर करने को तैयार हो, वैसा ही कुछ हमारी तमाम सफाई कर्मियों ने विश्व आपदा के कालखंड में कर दिखाया है". वे किसी भी मोहल्ले. बस्ती या शहर मैं हिंदू मुसलमान सिक्ख, इसाई, बनकर अपने काम को अंजाम नहीं दिया. बल्कि उन्होंने पहले से भी कहीं ज्यादा श्रेष्ठ सेवा इस समय पूरे देश को दी. जब पूरा देश लॉक-डाउन की कैद में रहा, कोरोना वायरस की चपेट में आता रहा,  ये उस विषम परिस्थिति में भी अपने सफाई करने के धेय या लक्ष्य को पूरा करते  रहे. 

 प्रयाग या कुंभ के मेले में जब हमारे देश के प्रधानमंत्री ने इन सफाई कर्मियों का स्वयं पैर धुलकर गमछे से पोछा तो उस समय--"राजनीतिक हलके में उनका मजाक उड़ाया गया या इसको उनकी राजनीति कही गई लेकिन उन सफाई कर्मियों का पैर धुलना आज अपनी सार्थकता का प्रमाण स्वयं दे रहे हैं". वे मैले  पांव है जो हमारी गलियों, शहरों को साफ व स्वच्छ कर--"हमारी और कोरोना आपदा के बीच एक दीवार की तरह खड़े हैं", जीन पैरों को उस समय प्रधानमंत्री के द्वारा धुला गया वे पैर आज जन-जन को धोना चाहिए राजनीति चाहे जितनी घृणित हो लेकिन हमारे  और आपके दिल को घृणित नहीं होना चाहिए. 

 महात्मा गांधी ने स्वयं सफाई और सफाई कर्मियों के हक की  बात करते थे. वे हर व्यक्ति को--"एक सफाई कर्मी कहते थे, इतना ही नहीं इन सफाई कर्मियों की महत्वपूर्ण भूमिका भारत के स्वतंत्रता-संग्राम में भी थी" आज इस कोरोना महामारी में एक बार फिर सफाई कर्मियों ने अपनी सशक्त राष्ट्रभक्ति व सेवा का परिचय दिया है, हां यह भी एक सच रहा है कि चाटुकारिता पोषक लेखन ने तमाम ऐसे लोगों की-- "राष्ट्रभक्ति का पृष्ठ नष्ट कर दिया". हो सकता है कि कोरोना विपदा के  बाद भी इनके इस सेवा भाव के तथ्य का भी कत्ल कर दिया जाए लेकिन हम जैसे एक आध लेखक अपनी--"श्रद्धा भाव के तिरंगे से इन्हीं कभी महरूम नहीं होने देंगे". 

 ऐसा नहीं कि कोरोना आपदा काल में यह सफाई कर्मी इसकी चपेट में ना आए हो, यह भी चपेट में आए  इनकी भी मौतें हुई यह भी अपने परिवार को छोड़ गए. हम आप लॉक-डाउन और क्वारनटाइन रहे और यह सभी सफाई कर्मी कोरोना वायरस की परवाह किए बिना हमारी आपकी स्वच्छता को बनाए रखा आज मैं अपने इस लेख में उन तमाम--"सफाई कर्मियों की शहादत को, कोई सामान्य शहादत नहीं बल्कि सरहद के शहीद का दर्जा देता हूं और अपने शब्दों के तमाम श्रद्धा पुष्प उन्हें अर्पित करता हूं'. 


यह लेख मेरा स्व-लिखित व अप्रकाशित है. 

लेखक---रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin. no. 222002 (U P)
Mo. no. 7800824758

Saturday, 27 June 2020

(इश्क करके )

(इश्क़ करके)
ना पढ़ सकी कोई किताब मै इश्क़ करके,
मै औरत सुफि हो गई इश्क़ करके।
मौलाना और तकरीरे मस्जिद-------
तुम्हे मुबारक!
मै खुद हो गई----------------
मुकम्मल मुसलमान इश्क़ करके।
ये हिज़ाब,ये परदे,ये चारदीवारी 
कैद है औरत की,
तुम क्या निकालोगे इस कैद से मुझको,
मै खुद ही छोड़े जा रही,
अपने जिस्म का मकान-------
ऐ,रंग--------------इश्क़ करके।

कविता--(विधवा वीणा हूँ )

(बिधवा विणा हूँ)
मै पथरीली------------------
कंटक राहो की ब्यथा लिये,
जिये जा रही उस चिड़ियाँ सी,
जिसके निड़ का तिनका-तिनका,
हर आँधी ने नष्ट किया!
है क्षिण हृदय में पीड़ा मेरे,
मै जयशंकर प्रसाद की आँसू हूं।
ना बदली ना सावन आये,
मेरी यौवन के गाँव कभी,
तपती धूप में देह जले
और तड़पे अंतर घट मेरा,
मै तार-तार टूटी नारी,
जो बज न सकु जीवन तट पे----
मै एैसी बिधवा विणा हूँ।

Thursday, 25 June 2020

(जुल्फों में बांध लेती है )

(जूल्फों में बांध लेती है)
उतरते है,घिरते है उसकी जूल्फों की तरफ बादल,
और वे इन बादलो को-------------
अपनी जूल्फों में बांध लेती है।
वे हुस्ऩ-ए-ज़ीनत है शहर की,
लोग तकते है उसके छत की तरफ,
वे उम्मीद-ए-बरसात है,
जो एक अदा से------------
अपनी जूल्फ़ो में सावन बांध लेती है।
है तैरने भर का पानी उसकी आँखो में,
ऐ,रंग-------------------
वे हम शायरो का सागर भी,
अपनी जूल्फ़ो में बांध लेती है।

Wednesday, 24 June 2020

कविता---(एक बाँझ औरत )

(एक बाँझ औरत)
एक बाँझ औरत---------------
किसी पीर की मज़ार पे बच्चे मांगने आ गई।
क्या करती----------
सास,ससुर,शौहर की उम्मीदे उसपे तलाक का डर,
वे भीगी आँख------------
इस दर पे अपना घर बचाने आ गई।
एक बाँझ औरत--------
किसी पीर की मज़ार पे बच्चे मांगने आ गई।
औरत को तो ये भी हक नही कि वे कह सके,
कि बाँझ वे नही!
एै! पीर उठ और जग इस मज़ार से,
और देख एक औरत----------
अपने शौहर का मज़हब बचाने आ गई।
एक बाँझ औरत--------
किसी पीर की मज़ार पे बच्चे मांगने आ गई।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Monday, 22 June 2020

कविता---(हमपे हँसे है बदरवा सखी )

(हमपे हँसे है बदरवा सखी)
अँखिया मे लोरन के पानी बहे-----
ढुढ़े मीले ना कजरवा सखी,,,,,,,,,,
ड़से है मनवा के पोर-पोर हमरा----
हमपे हँसे है,बदरवा सखी।
नीक ना लागे घर अँगनईया------
सौतन लगे है ओसरवा सखी।
ऐ,रंग-----
हियरा के आह लग जातई,,,,,,,,,,,,
बस पीके कोठरियाँ सलामत रहत--
बाकी जरी जातई पुरा शहरवा सखी।
ड़से है मनवा के पोर-पोर हमरा----
हमपे हँसे है बदरवा सखी।

###हमारे यहा की स्थानिय भाषा की एक रचना।

Friday, 19 June 2020

कविता---(सावन के अंधे को बहार लगती हो )

(सावन के अंधो को बहार लगती हो)
हे!प्रिये------तुम मेकप में
सौन्दर्य प्रसाधन का------
इश्तहार लगती हो।
मै न्यूज चैनल सा लगता हूं------
और तुम चित्रहार लगती हो।
जब तुम्हे देखता है कोई गैर,
तो मै सलगता हु--------------
मजूरे की बीड़ी की तरह अंदर-अंदर,
मै उन्हें मोहर्रम का दर्द लगता हू,
और तुम उन्हे ईद का त्योहार लगती हो।
हे!प्रिये----------------
मेरे अच्छे दिन गये,
मै पतझड़ का पत्ता----------
तुम सावन के अंधो को बहार लगती हो।

Sunday, 14 June 2020

कविता---(जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है )

(जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है)
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है,
जिसे मोड़कर कई दिनो से यूँही रख दिया है,
कि समय मिलते ही फिर उस पृष्ठ को खोल पढ़ुगा,
अपने जीवन के हूबहू घटनाओ की वे तमाम बाते,
यानी की गतांक से आगे---------------
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है।
तमाम उठा-पटक झंझावतो का जीवन,
कही कोई विदेशी रोमांटनिजम नही,
एक विछोह,एक दर्द,
हर पृष्ठ के कथनांक के आगे--------
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है।
इसी मोटी सी किताब को,
कुछ लोग लुगदी साहित्य कह,
यू छिटक जाते है जैसे मंटो की भूखी नायिका,
अपने से ज्यादा नंगो को देखती है,
अपनी काली सलवार और कपकंपाती टाँग के आगे-----
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है।
कुछ पन्ने और बचे है पढ़ने को,
कल खत्म कर लुंगा इसे भी,
और बिना मोड़े रख दुंगा,
फिर इच्छा ही नही बचेगी इसके पढ़ने की,
क्योंकि पता चल जायेगा कि क्या कुछ लिखा है,
एै"रंग" इस नावेल मे गतांक से आगे-------
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

लेख---(तलाक )

(तलाक)
कभी-कभी जब किसी मासूम तलाकशुदा खातून को अपने सीने से लगाये हुये अपनी मासूम सी बच्ची के साथ किसी टेलीविजन के तलाक वाले कार्यक्रम में रोता हुआ देखता हूं,तो लगता है जैसे इस खूबसूरत से मज़हब को कुछ जेहन से बीमार मौलवियो ने इसे कहां से कहां पहुँचा दिया,आज एैसे ही चंद नामाकुलो के नाते---इस्लाम और कुरान की आयत भी अपनी ही अमीना की आँखो में उस आँसू को तकने को बाध्य है अर्थात इस्लाम आज मजलूम औरत की आँख का वे आँसू बन गया है जिसका कतरा कुरान की आयत के उस सीने पे गीर रहा है जिसे हर मुसलमान अपना दीन और इमान मानता है।
तलाक महज एक शब्द भर नही बल्कि एक औरत का इस्लाम की आड़ मे किया गया वे कत्ल है जिसकी सदा इस मरदे मजहब ने कभी अपनी चाहरदिवारी के बाहर नही आने दिया।
उफ!औरत को कितना लिजलिज़ा और कमजोर कर दिया है कुछ लोगो ने कि पुछिये मत----"जिस औरत को उसकी चाहत और मोहब्बत का ईद मिलना था उसे इन चंद इबलिसे मौलवियो ने जबरदस्ती इस्लाम और हदिस का नाम लेकर एक हँसती खेलती औरत की जिंदगी मे तलाक लाकर उसे ताउम्र के लिये न खत्म होने वाले आँसू और गम के मोहर्रम से जोड़ दिया"।
आज तलाक के खिलाफ उठ रही तमाम आवाज़ो से इन लोगो की वे दरो-दिवार व बुनियादे कांपने लगी है सिकन से वे चेहरे तमतमा गये है लेकिन अब शायद ये बगावत न थमेगी आज औरत के वही तमाम दर्द बारुद बन गये है मेरा दावा है कि ये उठा हुआ इंकलाब हमारे हिन्दुस्तान की मुस्लिम औरतो के हक और हुकूक की नज़ीर बनेगा,और फिर बेज़ा तलाक दे रहे हर शौहर की रुह कांप जायेगी।
अब इनके पाक कानो को नमाज़ सुनाई देगी,कुरान की आयत सुनाई देगी लेकिन तलाक और हलाला के वे शरियती फरमान न सुनाई देगे ये बागी इंकलाब ऐसी नीच जहनियत को अपने बदलाव की उस सैलाबे दरिया मे बहा ले जायेगे जिसके बाद मुकद्दस इस्लाम होगा।
औरत के अच्छे दिन आयेगे,इस्लाम के अच्छे दिन आयेंगे,न कत्ल होगा किसी वालिद और अम्मी के दिये हुये उस मेहर का जिसे वे ताजिंदगी अपने शौहर व उसके परिवार के सुपूर्द करती है-------या अल्लाह जल्द मयस्सर हो उन्हें वे कानून जो इस मुल्क मे हर औरत को मयस्सर है यानिं कानून के अच्छे दिन।
@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उ.प्र.)
mo.no.-----7800824758

धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर और निर्मेश के त्यागी भईया मेरे "तलाक" जैसे विषय पे लिखे संवेदनशील लेख को जो स्नेह दिया।