Tuesday, 31 March 2020

लघुकथा---(चूड़ीहार )

लघुकथा----(चूड़ीहार  )

 मेरे मोहल्ले की फरजाना नीली चूड़ियों की दीवानी थी और मैं फरजाना का. उससे मेरी इसी दीवानगी ने ना जाने कब--उसके उसी मोहल्ले में एक चूड़ियों की दुकान खोलने को मजबूर कर दिया. मैं अच्छा भला जाब छोड़कर एक तरह से उसके कारण--"चूड़ियों की दुकान खोलकर चूड़ीहार हो गया". 

 मुझे अपनी उस चूड़ी की दुकान पे--किसी ग्राहक या खातून का इंतजार ना रहता, मेरी तो जैसे नजर ही अपनी दुकान की नीली चूड़ियों में हमेशा लगी रहती और उन नीली चूड़ियों में मुझे अपनी फरजाना ही फरजाना दिखाई देती. इसके बाद जब भी मेरी नजरें कुछ देर के लिए  खाली होती तो मोहल्ले की सड़क की तरफ लगी रहती कि--ना जाने कब फरजाना खालिद के चूड़ियों की दुकान पर अपनी महबूब नीली चूड़ियां पहनने या खरीदने आएगी. 

 उस दिन भी खालिद जैसे नीली चूड़ियों में खोया फरजाना के बारे में सोच रहा था, जब अचानक से उसकी कानों में किसी की आवाज पड़ी और घूमते ही जो चेहरा खालिद को नुमाया हुआ--वे चेहरा कोई और नहीं फरजाना  का था. उसने नीली चूड़ियां दिखाने व पहनाने  को कहां. मैंने सबसे खूबसूरत नीली चूड़ी उसे दिखाई और पहनाई वह मुझे पैसे देने के लिए अपने पर्श से पैसे निकाल मेरी तरफ देने लगी तो इस दिल के चूड़ीहार खालिद के हाथ कांप  गए शायद फरजाना यह भांप गई. 

 फिर एक जुम्मे को वे नीली चूड़ियां लेने व पहनने दुकान पर आई लेकिन आज दिल के हाथों मजबूर खालिद ने नीली चूड़ियों को देखते हुए अपने दिल की सारी बात कह दी, जिसे फरजाना ने कुबूल लिया और फिर फरजना के साथ इस चूड़ीहार का निकाह हो गया लेकिन आज भी फरजाना जब अपनी नरम और नाजुक कलाइयों में नीली चूड़ियां पहनती है तो अपने इसी चूड़ीहार से. 

यह लघुकथा मेरी स्व-लिखित व अप्रकाशित है, इसके वाद-विवाद का मै स्वयं जिम्मेदार होऊंगा. 

लेखक---रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin. no. 222002 (U P )
Mo. no. 7800824758

Monday, 30 March 2020

कहानी--(मेरी मुमताज़ )

कहानी----(मेरी मुमताज़ )

 आज भूख और बीमारी से शाहजहां की मुमताज अपनी आखरी हिचकी ले रही. उफ़!  यह हालत है कि मैं अपनी मुमताज की आंखों में शिवा आंसुओ के और कुछ नहीं दे पा रहा. सुना है कि इसी आगरे में मोहब्बत की एक मीनार ताजमहल है जो अपने यहां लोगों को आने और मोहब्बत की कसम खाने के लिए  आवाज देती है और लोग उस सदा पर ताजमहल के आते भी हैं, और बड़ी मोहब्बत से अपनी मुमताज को गुलाब देते व उसके जुड़े में टाकते है. यहां इस शाहजहां खुदा ने दिया भी तो अपनी मुमताज को देने के लिए गुलाब नहीं बल्कि--उन्ही गुलाब के फूलों के वे तमाम कांटे दिए जो उम्र भर हमारी इस मर रही मुमताज के गले के निवाली बन गए. 

 मैं इस आगरा शहर में संगतराशी करता रहा लेकिन इस संगतराशी के काम को कभी इतने पैसे भी नहीं आए कि मैं अपनी गरीबी और मुफलिसी में मर रही मुमताज की खातिर कोई निशानी तराश या खरीद पाया हूं. सभी को अपनी बेगम के साथ हमने चांदनी रात में टहलते अक्सर  देखा है, लेकिन हमारी जिंदगी में चांदनी रात हमें कभी भी मयस्सर नहीं हुई इसी शहर में एक दौलत-ए-शहंशाह ने अपनी बेगम के लिए ताजमहल बनवा दिया वे ताजमहल जो मुझ जैसे तमाम शौहरो की मोहब्बत का मजाक उड़ाता है.

 सुना है कि जिस संगतराश ने अपनी सारी  कला इन बेजुबान संगमरमर के पत्थरों मैं डाल दी थी वे पत्थर आज भी जिंदा से लगते हैं. लेकिन उसी संगतराश की दोनों बांहें शाहजहां ने कटवा दी थी ताकि फिर कोई दुनिया में  दूसरा ताजमहल ना बना सके और ना बना पाए. इसके लिए शाहजहा ने संगतराश की हत्या भी करवा दी थी. यह शायद उसी संगतराश की आह ! थी  जो शाहजहां को भुगतनी पड़ी और अपनी मोहब्बत की उस निशानी को उसी की औलाद ने कैद के झरोखे से ताजिंदगी देखने के लिए मजबूर कर दिया. 

 एक यह शाहजहां है जो अपनी मुमताज को अपनी बांहो में लिए सिसक व तड़प रहा. उफ़! मालिक यह तूने हम जैसे गरीब शाहजहां और मुमताज को क्या जिंदगी दी. वे आखिरी लम्हे भी जैसे अपने इस शाहजहां से नाराज ना हो,  फिर वे कसकर मुझे और मेरी हथेलियों को पकड़ अपनी आखरी हिचकी लेती है. जैसे ही मेरी मुमताज़ अपनी आखिरी हिचकी  के साथ अपना दम तोड़ती है वैसे ही इस शाहजहां की सांसे भी जैसे हमेशा के लिए टूट गई हो. उसकी मुमताज़ का यूँ पकड़े रहना जैसे एक वादा हो कि मै फिर मिलूंगी अगले जन्म तुम्हारी शरिके हयात बनकर मेरे शहंशाह. 

कहानी--(कोरोना और सिमरन )

कहानी-----(कोरोना और सिमरन )

 सिमरन अपनी शादी की कुछ सालों तक कितनी खुश थी. सिद्धार्थ को अपने पति के तौर पर पाकर मानो उसने दुनिया पाली हो, लेकिन हमेशा जिंदगी का रंग एक सा नहीं रहता, उसके रंग भी बदलते रहते हैं. क्योंकि सिमरन की जिंदगी इस कायनात की आखिरी तस्वीर नहीं, इसकी और भी तस्वीरें हैं, इसके और भी रंग हैं, जो बदलते रहते हैं. कुछ ऐसा ही बदलाव उसकी जिंदगी में  कोरोना जैसी महामारी से आएगा, उसको इसकी कतई उम्मीद न थी. लेकिन किसी को दुनिया पूरी और मुकम्मल नहीं मिलती. ऐसा सिमरन के साथ भी हुआ. उसको भी उसकी दुनिया मुकम्मल नहीं मिली. कोरोना ने उसके तमाम वे  रंग छीन लिए, जो ना जाने कितनी सिमरन के रहे होंगे. 

 सिमरन की सारी खुशी, सारे सपने,  सारे अरमान कोरोना की भेंट चढ़ गए. उसके सारे अरमानों को कोरोना वायरस ने ना चाह कर भी हमेशा के लिए लॉकडाउन कर दिया. यह दुनिया कोरोना को परास्त कर लेगी,  लेकिन हां ना जाने मुझे जैसी कितनी सिमरन इस टीस पीड़ा और दर्द के वह जख्म हमेशा हरे रहेंगे जो कोरोना ने दिये है .अब तो  हमेशा के लिए उसके मन में अपने पति को खोने की ये  नागफनी दिल में चूभेगी और यह चुभन हमेशा सिमरन को कोरोना की याद दिलाते रहेगे और हमेशा सिमरन सिसकती रहेगी. 

 सिमरन उस पल को याद कर भावुक हो उठती है , जब वे मुंबई घर से कमाने के लिए जा रहे थे तो कुछ समय निकालकर वे कमरे में जब आये तो उन्होंने अपनी सिमरन को बाहों में भरकर उसके माथे का चुंबन लिया और बड़े ही प्यार से मेरी जान कहा था तो उसे क्या पता था कि यह सिमरन की माथे भाग लिया उसके सुहाग का आखिरी चुंबन होगा. अगर वे जानती तो कभी भी उन्हें कमाने के लिए मुंबई ना जाने देती किसी न किसी तरीके से उन्हें रोक लेती लेकिन अचानक चीन से फैले कोरोना ने बहुतों को अपनी चपेट में ले लिया. उसी चपेट में सिमरन की खुशियों की दुनिया भी आ गई. 

 कोरोना ने बस सिमरन का सुहाग ही नही बल्कि दो मासूम बच्चो के सर से उनके पिता  का असमय साया भी छीन लिया. उनके बुढ़े माँ-बाप के सहारे की एकलौती लाठी को हमेशा के लिये तोड़ दिया. इसके साथ ही जवान बहन की शादी के लाल जोड़े भी रो उठे. कोरोना वायरस का जब तक पता चलता तब तक सिमरन की दुनिया हमेशा के लिए तबाह व बर्बाद हो गई. सिमरन को ये तकलीफ रही की वे उस समय उनके पास न थी. 

अब सिमरन को अपने सुन्दर व खूबसूरत चेहरे को मेकप नही, बल्कि सिमरन को अपने पति के यादों के आंसू उसके पूरे चेहरे को सैनिटाइज कर रहे हैं. उसका अब अपने पति की यादों के कोरोना वायरस से बाहर निकल पाना या बच  पाना मुमकिन नहीं. 

 आने वाला कल सिमरन के हौसले वह उसके जिम्मेदारियों का है. उसे केवल कोरोना वायरस के यादों के अलावा एक हकीकत जीना है, अपने बच्चों के लिए, बुढ़े सास-ससुर के लिए, 
अपनी ननद के लिये, फिर एक लंबे अंतराल के बाद समस्त जिम्मेदारियों के इतर फिर वही याद, वही कोरोना वायरस और उसके पति का उसके माथे पर लिया हुआ आखरी चुंबन. उसके पास यही यादों की वे पूंजी होगी, जिसके सहारे वे--"अपने जिंदगी की आखिरी सांस लेगी".

लेखक---रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin.no. 222002 (U P )
Mo.no. 7800824758

Friday, 27 March 2020

व्यंग्य---(मूर्ख दिवस के मॉडर्न कालिदास )

व्यंग---(मूर्ख दिवस के मॉडर्न कालिदास)

 मैं दर्जनों ऐसे मूर्ख दिवस के कालिदास से मिल चुका हूं, जिनकी बुद्धि का सरवर या नेटवर्क उनकी डिजिटल पत्नी ने ध्वस्त कर रखा है. ये मूर्ख दिवस के कालिदास है इन्ही मुर्ख व महान कालिदास में से एक हम भी है.हमारी ये कलयुगी पत्नियां अपनी खूबसूरती के लैब को हमारी सेवा की थेरेपी से अति सुंदर रखने के लिए हम कालिदासो से वे नौकरो से भी ज्यादा निम्न स्तर के काम लेती है. बस कभी-कभार किसी त्यौहार विशेष के मौके पर अपनी दया की सुंदरता मेसे थोड़ा सा प्यार अपने कालिदास को देकर इन्हे पति होने का अहसास भर कराती है. अपने मूर्ख कालिदास को ये अंग्रेजी में आई लव यू, डियर,  माय लव कह कर इन्हें  मॉडर्न कालिदास होने के लिए फिर से यह रिचार्ज कर देती हैं. इस प्रकार के मॉडर्न कालिदास आपको हर दूसरी और तीसरी घर में मिल जाएंगे. 

 यह सभी मॉडर्न कालिदास पत्नी का पैर दबाते हुए, किचन संभालते हुए, डांट खाते हुए, अपनी-अपनी गृहस्थ का "अभिज्ञान शाकुंतलम्" जी रहे. मैरिज एनिवर्सरी, करवा चौथ, 14 फरवरी, जैसे त्यौहार और पत्नी के ब्यूटी पार्लर ग्रस्त सजावट इनकी बुद्धि के सारे बल्ब फयूज कर देती है.उस दिन इन कालिदासो की बुद्धि विश्व के किसी भी मूर्ख से बहुत कम रह जाती है अर्थात इस दिन इन मॉडर्न कालिदासो कि आई क्यू न्यूनतम जीरो पर  पहुंच जाती है. 

 यह अप्रैल मूर्खों का श्रेष्ठ महीना है, इसे पतझड़ के इर्द-गिर्द का महीना भी कह सकते हैं, जिन वृक्षों के पत्ते पतझड़ में गिर गए हो अगर उन्हें  ध्यान से आप--5 मिनट तलक देखेंगे तो पाएंगे कि यह वृक्ष कोई और नहीं मुंह लटकाए हुए अकेले सिसक रहा  मॉडर्न कालिदास है, जिसके सारी बाल बिल्कुल इन पत्तों की तरह झड़ गए हैं. 

 आइए इस अप्रैल हम तमाम  महान मूर्ख कालिदासो के नाम पर एक राष्ट्रीय शोक सभा का आयोजन करें, जिसमें हम सभी मूर्ख कालिदास एक सुर में 10 मिनट तलक अपना मुँह और सर को किसी शोक में झुकाए गये झंडे की तरह लटका कर फूट-फूटकर अपनी पत्नी के द्वारा प्रतिवर्ष बनाए गए मूर्ख होने के दर्द को तरोताजा करे और  इस अप्रैल से उस अप्रैल तक इस महान दुर्घटना के लिए चुने गये श्रेष्ठ कालिदास को हम सभी राष्ट्रीय कालिदास की गरिमा से बिभूषित करे.

यह व्यंग्य मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है. 

लेखक--रंगनाथ द्विवेदी 
जज कालोनी, मियांपुर 
जिला-जौनपुर pin. 222002 (U P)
Mo. No. 7800824758

Wednesday, 25 March 2020

लेख---(मेरा रंग दे बसंती चोला)

पन्द्रह अगस्त के लिये एक ऐसा हकीकतनामा जिसके हम आप  सभी गुनहगार है-------------

                     ( मेरा रंग दे बसंती चोला) 

सच तो ये है कि हम सभी अपने इस आजाद मुल्क के--बेवफा बेटे है. आजादी के बाद इसके अंतरमन को हमने अग्रेंजो से कही ज्यादा लहू-लुहान व ज़ख्मी किया है. उनकी परिकल्पना मे तो वे लहराता तिरंगा था जिसको  आजाद व स्वतंत्र हवा देने के लिये देश के तमाम-तमाम नौजवानो ने, हँसते  हुये सीने पे गोलियां खाई, फाँसी के फंदे को चूम लिया. किसी से मोहब्बत नही की, किसी के साथ विवाह के फेरे नही लिये----" बस एक-एक कर मरते और गाते रहे---मेरा रंग दे बसंती चोला".

उन्हें तो बस अपने भारत माँ की आजाद सिंदूरी शाम चाहिये थी--" वे सिन्दूरी शाम जो हजारों लाखो,करोड़ो की माँग और ललाट पे चमके , उनकी शहादत ने इस देश को वे सिन्दूरी शाम तो दी पर हम उस सिन्दूरी शाम को सहेज नही पाये". पन्द्रह अगस्त को बीना किसी वेदना-संवेदना के धूल फाकते उनकी मज़ारो और जली हुई चिताओ के आस-पास थोड़ी सी सफाई कर एक-दो मालाये पहना फिर हम उन्हें पुरे वर्ष ऐसे भूल जाते है जैसे--"विदेशो मे रह रहे ऐन. आर. आई. बेटे अपना देश व अपने माँ-बाप को भूल जाते है ".

पन्द्रह अगस्त आज एक आर्टीफिसियल और चंद लोगों तक सिमटा पर्व बनके रह गया है. अभी अगले ही वर्ष मैने आला-आफिसर की छोटी बिटिया को जब--कजरारे- कजरारे गाने पे थिरकते व नाचते देखा तो मन आहत व पीड़ित हुआ कि ये मासूम छोटी सी बच्ची जिसे जश्ने आजादी के तराने गाने चाहिये उसे उसी के अभिभावक कजरारे जैसे गाने पे थिरकवा रहे थे ये "व्यथित और अपनो के हाथो पीड़ित आजादी नही तो क्या है? ".

जगह-जगह लगाये गये शहर मे हम इन शहीद बेटो की मुर्तियो का हस्र खुद देख सकते हैं, ये यू लगते है कि जैसे---" इस देश के शहीद भीष्म-पितामह को उनके अपनो ने ही तीरो से बिंध दिया हो. वे मरणासन्न सर-सईया पे पड़े आज महाभारत के कालखंड से भी कही ज्यादा दुखी व पीड़ित हो ".

वे दुर बैठी हुई आजादी की चिड़िया बहुत डरी-सहमी है, न जाने क्यूँ  उसे लग रहा कि--" कही उसे भी किसी आठ-नौ साल की मासूम बच्ची की तरह निर्मम तरीके से बलात्कार कर मार न दी जाए". ये आजादी तो ना चाही थी इस चिड़िया ने, ये पहले पन्द्रह अगस्त को कितना खुश थी, पर ये आज फिर उस गुलामी के दिनो को याद कर रो रही सिसक रही, उसे अपने वे बेटे और भाई याद आ रहे जो अपनी इस चिड़िया के लिये क्या कुछ न सहा---" वे देखो उसकी भीगी आँखों मे विस्मिल, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू सब तो हैं लेकिन असहाय अब वे भी शायद अपनी इस चिड़िया के लिये अपने ही देश के लोगों को मार कर गा नही सकते-----कि मेरा रंग दे बसंती चोला ".

जय हिंद----जय भारत. 

यह क्रन्तिकारी लेख मेरा स्वलखित व अप्रकाशित है. 

@@@रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी. 
जज कालोनी, मियाँपुर 
जिला---जौनपुर पिन नं. 222002 (उत्तर-प्रदेश).
मो. नं ----7800824758.

Tuesday, 24 March 2020

लोकसभा चुनाव--(चुनावी मूर्खता का महापर्व )

लोकसभा चुनाव--2019
(चुनावी मूर्खता का महापर्व)

चुनाव आते ही हमें भांति-भांति के मूर्ख दिखाई देते है. हमे भी श्रेष्ठ व उत्कृष्ट राजनैतिक मूर्खो को ढुढने के लिये बहुत गहन माथापच्ची नही करनी पड़ती. ये स्वमेव इस चुनावी बरसात मे आषाढ के खूबसूरत मेढक की तरह इस राजनैतिक स्वयंवर मे पौराणिक कथनानुसार नारद सा---"अपने को महा-खूबसूरत मान बैठते है अर्थात ये लोकतंत्र के ऐसे मूर्ख है जो खुद कहने से बाज नही आते कि हे सजनी---हमहूँ राजकुमार.
अभी पिछले चुनाव मे हमने अपनी पडोस मे रह रहे एक ऐसे किम-कर्तव्य विमुढ मूर्ख पति का अलौकिक दर्शन किया. जिसकी किस्मत मे--"ये राष्ट्रीय मूर्खता को जीने के अलावे कोई विकल्प ही नही".इसकी विपदा का महा-घनघोर कारण इसकी पत्नी का विजयी सांसद होना है.
पहले हालात ठीक थे फिर पत्नी रफ्ता-रफ्ता कर इस मूर्खता के हाईवे पे बढती चली गई और मै प्यार पाने वाले पति की जगह एक सांसद पत्नी की प्यार पाने वाला संविदा प्रजाति का पति बनके रह गया. अर्थात पत्नी की इस राजनैतिक मूर्खता ने मुझे अब मेरा परमानेंट प्यार नही बल्कि कभी-कभी अपने दया का वे ऐक्सिडेंटल मानदेय भर देती है.
अभी त्वरित एक और राष्ट्रीय मूर्खता से दो-चार होने वाला समाचार   टीवी पे सुनते ही मै मानसिक रुप से जैसे प्यार न पाने की पैरालाइसिस से गुजरा होऊं. इसका कारण वे मिसाइल रुपी टीवी ऐंकर का शब्द है जिसे अभी-अभी मेरे इन मनहूस कानो ने सुना है. मै इस 2019 की लोकसभा का वे चौबीस कैरेट का मूर्ख पति हूँ, जिसकी पत्नी को पार्टी ने अपना स्टार प्रचारक बनाया है. मै अपनी पत्नी की इस राजनैतिक मूर्खता को तब तक जिने को बाध्य हूँ जबतक कि ये लोकसभा का चुनाव पूर्ण नही हो जाता यानी की मै उसकी पार्टी के शपथ ग्रहण तक का कन्फर्म मूर्ख हूं.
सच तो ये है कि जिसे हम 2019 की लोकसभा का चुनाव कह रहे है वे लोकसभा का चुनाव नही अपितु राष्ट्रीय मूर्खता का एक महापर्व है. जो इस समय अपने चरम पे है और सभी छटे-छटाये मूर्ख तुफानी दौरे पे है आईये हम आप भी इस लोकतंत्र को मूर्ख समझने वाले को अपनी मतो से, उनकी वास्तविकता का उन्हें भान कराये.

@@@लेखक---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर.pin no.222002(U P).
Mo.no.7800824758

यह लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.

Sunday, 22 March 2020

कविता--(आपके बिस्तर तक पुलिस है)

हनीप्रित को न पकड़ पाने वाली हमारे देश की महान पुलिस पे लिखा एक तिखा मगर सम-सामयिक व्यंग्य-----------------
                (आपके बिस्तर तक पुलिस है)
ठेला,खोमचा और रेहड़ी वालो के लिये--------
बड़ी हिंसक पुलिस है।
पर हनीप्रीत ने ये साबित कर दिया,
कि कुछ टुकड़े डालो,
और अपनी पहुँच का इस्तेमाल करो फिर देखो-------
कि कितनी नपुंसक पुलिस है।
ये बाइज्जत सब करते है,
इनकी कुत्तो से अच्छि नस्ल है,
कब कितने मे काटना और भौकना है,
सब जानते है!
सही किमत हो मालिक को काट लेंगे,
ये बड़े समझदार----------
और बड़ी हित-चिंतक पुलिस है।
मालिश-मशाज़,
ये खुद करवाने मे सक्षम है,
इनकी जानकारी में ढ़ेरो प्रीत है,
क्या आशाराम?, क्या राम-रहिम?
पैसे खरचिये तो,
महज़ डेरे तक नही बल्कि एै "रंग"------
आपके बिस्तर तक पुलिस है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर (उत्तर-प्रदेश)।

mo.no.----7800824758


यह रचना मेरी स्व-रचित व अप्रकाशित है।

लेख--(शादी और विवाह के निमंत्रण में छपे देवी-देवता का अपमान )

सामयिक व्यंग्य--------
(शादी और विवाह के निमंत्रण मे छपे देवी-देवता का अपमान)
इस शादी और विवाह के पुरे सीजन मे एक बात मेरे अंतर तक चुभती और कचोटती रही-----उस चुभन की वजह केवल इतनी सी थी कि जितने भी निमंत्रण आते रहे,उससे अगले की हैसियत का पता तो चलता ही था साथ ही उसके दंभ से तने----"पूँजीपति गर्दन के दर्शन का सौभाग्य तो अलग और अलौकिक था ही"।
ठीक वैसे ही चुभन और पिड़ा किसी गरीब के निमंत्रण से भी होती रही। लेकिन फिर वे विनम्र निवेदन के संग निमंत्रण देने वाले गरीब मेरे इस लेख मे क्षमा के पात्र दिखे! लेकिन जिस घटना ने मुझे सबसे ज्यादा आंदोलित और पिड़ित किया----"वे महान घटना इन विवाह के निमंत्रणो मे छपे उन तमाम हिन्दू देवी-देवताओ को देख कर हुई,जिन्हें तथाकथित धर्मावलंवी व आम गृहस्थ अपना ईश्वर कहता है"।
उसी भगवान,देवी-देवता के तस्वीर वाले कार्डो व निमंत्रणो में इन्हें हम छपवाकर जो अपमानित करने का गौरव प्राप्त करते है----"वे विश्व धर्म के किसी अन्य देश मे देखने को मिल नही सकता"।इन निमंत्रणो को पढ़ लोग इन्हें एैसी जगहो पे फेक आते है,जहां तमाम गंदगी इन्हें अपने मे आत्मसात कर हम इंसानो से कही ज्यादा स्नेह देते है।
हम हिन्दू जो कि खुद को सनातनी कह अपने छप्पन इंच के फर्जी सिने को पीट"रामलला,मथुरा,काशी का ढ़पोर शंख और चंदन पोते जगह-जगह धार्मिक परिचर्चा कर अपने महान ईश्वर,आराध्य को विश्व का विरला धर्म बता फर्जी विद्वता के मुँछो पे ताव देते है"।
कहते है कि कभी कार्ल मार्क्स ने कहा कि--"धर्म अफीम की गोली से ज्यादा खतरनाक है" ये सुक्ति कार्ल मार्क्स की आज भी उतनी ही जीवित और प्रासंगिक है।धर्म और मजहब की आड़ मे हमारा इतना बड़ा देश अक्सर जलने और सुलगने लगता है।
जबकि धर्म का शाब्दिक और एक मात्र अर्थ है अच्छि बातो और संस्कारो का धारण करना!लेकिन एैसा कुछ नही इसपे ज्यादातर मैने कुमार्गियो को ही चलते देखा है,इन्हें ही परिभाषित करते और शास्तार्थ करते देखा है।
मै किसी भी तरह के पचड़े मे नही पड़ता लेकिन एक लेखक होने के नाते"मै अपने समय की बुराई का धृतराष्ट्र नही हो सकता"।मै चैलेंज करता हूं वाकई आप अगर हिन्दू होने का---"राष्ट्रीय दंभ भरते है तो जलाइये एक अलख और जगाईये उन तमाम घरो और लोगो को! कौल और कसम खिलवाईये कि वे महंगा चाहे सस्ता----जैसा भी विवाह का कार्ड व निमंत्रण छपवाये पर उस निमंत्रण पे अपने आराध्य उन तमाम देवी-देवताओ का अपमान न करे"।
ये बुराई महज व्यक्ति की नही अपितु सारे हिन्दू समाज की है,और इस बुराई के खिलाफ एक ससक्त पहल की जरुरत है।सोचिये और खुद गौर करिये कि लगन या विवाह के सिजन में जब हम आप अपने घरो से किसी बेटी या बेटे के विवाह के लिये निकलते है तो----"तो उतनी ही दूरी मे हम तमाम देवी-देवताओ के यत्र-तंत्र पाँव से कुचलते,उड़ते और गंदगी मे पड़े कार्ड या निमंत्रण देखते है और बीना किसी धार्मिक संवेदना के हम आगे बढ़ जाते है"।
आईये हम सभी अपनी आस्था और धर्म की इस बुराई का समूल नाश करे और एक धार्मिक आंदोलन खड़ा कर हम अपने अराध्य देवी-देवताओ का अपमानित होना रोके।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
mo.no.-----7800824758

यह लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है।

(पूजा या अजान से ढ़कती है)

(पूजा या अजा़न से ढ़कती है)
मुझे उस मजबूर औरत की----------
टूटी चुड़ियो की आवाज़ ईधन की लगती है,
वे अपने ग्राहक की गर्म साँसो पे,
अपनी मजबूरीयो का-------------
कई दिनो से पड़ा हुआ ठंडा तवा रखती है।
उसकी चीख और पीड़ा में,
उसके भूखे बच्चो के खाली पेट भरने वाली रोटी-----------------
की खुशी दिखती है।
वे अपने कपड़े समेट ब्लाउज पहन,
जब अपनी उरोजो में ये रुपये रखती है,
तभी उसकी नज़र उसी कमरे मे--------
टंगे हुये एक माँ के नंंगे उरोज वाले,
कैलेंडर पर पड़ती है,
जो अपने मासूम बच्चे का पेट इसी उरोज से भरती है।
वे एक मर्तबा फिर-------------
इस कमरे मे से निकलने से पहले,
अपने बंद ब्लाउज में--------------
रंखे पैसो को अपने जख्मी उरोजो के बीच टटोलती है।
न जाने क्यू उसके वे दोनो उरोज,
हमारे दो किरदार से लगते है!
एै,रंग-----मुआफ करना
मैले हो जाते है फिर भी कभी-कभी ,
कुछ औरतो के यही उरोज,
चाहे वे इसे पूजा के आँचल या-------
किसी मस्जिद के अजान से ढ़कती है।



@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
mo.no.----7800824758

लेख---(अटल--सियासत के गलियारे का अलमस्त औघड़ )

(अटल--सियासत के गलियारे का अलमस्त औघड़)

भूतपूर्व प्रधानमंत्री माननीय अटल बिहारी वाजपेयी को मै सियासत के गलियारे का एक अलमस्त औघड़ समझता हूं।हालांकि हमारे देश मे औघड़ो की तमाम कहानियां किवंदतियो की तरह सुनि व सुनाई जाती है,लेकिन मेरे देश ने एकलौते क्लासिकल औघड़ को भारत की सदन ने अपने चुटिले अंदाज़ मे हँसते व बोलते सुना है।
वे धुनी रमाये बैठना,चिंतन करना और किसी भी हालात से बीना घबराये उठना घंटो बोलना,आज सदन मे लोग है लेकिन वे कुशल चितेरा वे अलमस्त औघड़ मौन है!शायद अगर सदन की दिवारे जिंदा हो जाये तो उनके भी संवेदना की दिवाल से एक ध्वनि आयेगी,एक अकुलाहट होगी इनमे अटल के न होने की।
पक्ष और विपक्ष सबो के बीच मे वे साहित्यमय भाषा की कसीदाकारी,पांचजन्य का संपादन और उसके बाद राजनीति,सच तो ये है कि वे इस विष के जंगल मे चंदन की तरह बने रहे,जबकि उनके समय के ना जाने कितने साँपो ने अपने अंदर के विष से इस चंदन की शीतलता को छिनने का प्रयास किया लेकिन फिर भी अपने समय के इस चंदन ने कभी अपने स्वभाव की शीतलता को खोने नही दिया।
आज के सदन का स्तर उस बी ग्रेड की सीनेमा की तरह हो गया है जिसे हम उत्तेजक नायिका के अंग-प्रत्यंग की तरह देख तो सकते है लेकिन आदर्श नही कह सकते,क्योंकि विपक्ष के अच्छे कार्यो की सराहना करने वाला औघड़ सदन की इस मंदिर से चला गया है।
भला उनका विपक्ष में बैठकर कहा गया वे कथन कौन भुला होगा-----जब उन्होनें इंदिरा को उनके साहसिक निर्णयो के लिये बीना किसी लाग लपेट के बीना कलुषित मन के उन्हे खचाखच भरे इसी सदन मे दूर्गा कहा था।आज एैसे स्वच्छ विपक्ष का सदन मे एक भयंकर सुखा है,एैसी ही घटनाये उनके एक योग्य औघड़ होने की संतुस्ती करते है।
हमारा पड़ोसी मुल्क बम-बारुद की ढ़ेर पे बैठा इस्लाम-इस्लाम की रट लगाये इंसानी जिंदगियो की खेती कर रहा था,लेकिन एैसे में कवि हृदय अटल जी उस धुँये और बारुद के इतर----एक जीवन ज्योति की स्वच्छ परिकल्पना लिये अपने प्यार और मोहब्बत की बस लिये सरहद के उस तरफ चल पड़े,
बेशक सफलता न मिली पर हार नही मानी उस समय के इस औघड़ ने।
तमाम बिसंगतिया खड़ी की गई राष्ट्रो-उत्थान से रोका गया,तब अचानक लगा की जैसे हम हांसिये पे हो और हमारा देश कुछ चुनिंदा बैसाखियो का मोहताज़ है,लेकिन एैसा न हुआ मेरे राष्ट्र ने एक मजबूत और दृढ़ संकल्प बंद्ध प्रधानमंत्री के निर्णय का अमेरकिय धमकियो को धत्ता बता सीधे पोखरण विस्फोट से उनके औघड़ और जिद्दी राष्ट्रभक्त होने का रसपान किया।
शायद अगर मै अटल पे लिखू तो अपने लेखन की सारी उम्र और गुणवत्ता उड़ेल दु फिर भी मेरी लेखन के शब्द इस औघड़ को हुबहू कागज़ के कैनवस पे उतार नही सकते!शायद उस औघड़ के कहे शब्द---कि मै कुंवारा हु ब्रह्मचारी नही,झींगा मछली विदेशी शराब ये उस शख़्सियत के औघड़पन की वे तस्वीरे है जो विश्व मे कही अनयंत्र दुर्लभ है।
सच तो ये है कि आजाद भारत के इतिहास में अब तलक जितने भी भारतरत्न दिये गये उनमे सबसे विरला और अलहदा भारतरत्न इस सियासत के गलियारे के औघड़ को दिया जाना है।
## # अटल एक महान स्मृति।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

व्यंग्य लेख---(चुनावी घोषणापत्र )

व्यंग्य लेख
(चुनावी घोषणापत्र)
मै आज कई वर्षो से हर पार्टी के चुनावी घोषणापत्र को---काफी भावुक तरीके से पढ़ता व सुनता हु लेकिन हर मर्तबा मेरे हिस्से "एक ना खत्म होने वाला विस्फोटक दुख हाथ आता है,और वे दुख मेरे लिये विश्व के प्रथम दुख की तरह है" अर्थात--घोषणापत्र के किसी भी क्रम मे वे लाइन आज तक नही दिखी कि इस देश अर्थात प्रदेश के कुँवारो के लिये,खासकर जो विषम आर्थिक तंगी की वजह से"स्त्री-पुरुष के अश्वमेध मिलन से वंचित है -उन पिड़ित कुँवारो को हमारी सरकार बनते ही,सर्वप्रथम उन्हे एक योग्य व सुशील कन्या की व्यवस्था कर वैवाहिक जीवन से आहलादित किया जायेगा"।
अगर एैसा संभव न हुआ तो जनपद स्तर पर किन्ही अन्य देशो से या यहां न मिलने की सुरत मे बाहरी गरीब देशो की कुँवारी लड़कियो का आयात कर उनकी गरीबी दुर करने के साथ ही समुचित सरकारी अनुदान की व्यवस्था के साथ ही एक हफ्ते का निःशुल्क हनिमून पैकेज दे उन्हे पती-पत्नी की मुख्यधारा मे लाने का अलौकिक प्रयास करेगी।
अब इस बार तो किसी तरह बस दुखी मन से मतदान कर फिर किसी अगले चुनाव में "ये राष्ट्रीय दुख लिये इंतजार करुंगा----शायद किसी पार्टी या नेता को हमारे इस बड़े विकराल और असह्य कुँवारेपन के दुख का आभास हो और वे इस क्रांतिकारी पिड़ा को अपने चुनावी घोषणापत्र में जगह दे हमारे इस विशाल बंजर हृदय में दुल्हन रुपी सुरत की हरितक्रांति ला इस पिड़ा का नैसर्गिक निदान करे"।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

Monday, 9 March 2020

व्यंग---(होली में मोहब्बत के ऐक्सीडेंट )

व्यंग्य----(होली में मोहब्बत के एक्सीडेंट )

भारत में होली अर्थात मार्च के लगने और बीतने तलक, अन्य महीने से कही ज्यादा-मोहब्बत के एक्सीडेंट देखने को मिलते है. अगर इस एक्सीडेंट को कोई--"अंग्रेजी या होम्योपैथिक तरीके से छिपाना चाहे तो नही छिपा सकता". क्योंकि पुरी दुनिया में भारत के इस होली महीने के-"एक्सीडेंट की दवा बनी ही नही ". इसकी चपेट से ग्रस्त व्यक्ति--युवा, वृद्ध, संत, नेता यहां तलक कि महिलाओ में भी इसका साइड इफेक्ट इतनी प्रचुर मात्रा में दीखता है कि कभी-कभी बुढ़िया भी अपने  बहु और पोते से घिरी रहने वाली इतनी रोमांटिक हो जाती है कि वे इन सभी से अपनी निगाहें बचाकर अपने बुढ़े को इस अदा से आँख मार बैठती है कि वे अपने बीते हुये कल की होली की मोहब्बत के एक्सीडेंट की चपेट मे आकरके वे--"अपनी रोमांटिक बुढ़िया का हिमेश रेशमिया और इमरान हाशमी हो जाता है ". 

होली के इस लाजबाब मोहब्बत के एक्सीडेंट का असर राजनीति मे भी दीखता है.इस एक्सीडेंट से पीड़ित हर उम्र और वय के है, ये चाहे राजनीति के कुंवारे हो या फिर शादीशुदा. होली के एक्सीडेंट का असर जब अपने चरम पर होता है तो अक्सर पक्ष और विपक्ष--"सदन और घर मे अंतर करना भूल जाता है. प्रधानमंत्री तलक को इसकी तरंग का एक्सीडेंट से ग्रसित व्यक्ति अपनी पुरी मस्ती मे भरे सदन मे आँख मारने का जादुई प्रयास 24 कैरेट की मोहब्बत के रिस्क वाले एक्सीडेंट के साथ कर सकता है". वैसे भी अन्य वर्षो की भांति इस वर्ष हमारे भारतीय लोकतंत्र की सदन सबसे अधिक इस होली रूपी मोहब्बत के एक्सीडेंट हुये. इस होली एक्सीडेंट मे सबसे अधिक लोकप्रियता पाने वाले महान लोगों मे कांग्रेस जैसी पार्टी के वे अखंड महान युवा है, जिन्हें अब शायद युवा कहना पार्टी की चाटुकारिता की खानापूर्ति भर है. अन्यथा वे अब युवा या होली जैसे मोहब्बत के होनहार एक्सीडेंट के पेसेंट नही रहे. अपितु वे अपनी पार्टी के होली रूपी त्योहार की मोहब्बत के एक एक्सीडेंट के--"वोलिनी-स्प्रे बनके रह गये ". 

होली मे मोहब्बत के एक्सीडेंट से बचने के लिये तमाम--"राष्ट्रीय सावधानियों की जरूरत पड़ती है". खासकर खूबसूरत व सुन्दर औरतों को होली मे बाबा लोगो के आश्रम मे जाने से बचना चाहिए, क्योंकि इस समय बाबा लोगों मे मोहब्बत के एक्सीडेंट की मारक छमता पांच गुना ज्यादा बढ़ जाती है. होली मे--"इनके रोमांटिक दिल की रफ्तार किसी भी विश्व के विदेशी कार से भी ज्यादा खतरनाक होती है"अतः होली मे बाबा लोगो से बचने के लिये इनकी, --"मोहब्बत के रासायनिक परिवर्तन से काफी दुर रहे अपने रूप और सुंदरता के हाइवे पर केवल और केवल अपने पति की मोहब्बत के मिसाइल को ही लैंड होने दे ".क्योंकि होली मे ये बाबा लोग--" आपकी गृहस्थ को तबाह करने वाले बड़े आतंकवादी है, जो आपके पति के हिस्से का दिल होली मे हाईजैक कर सकते है ". 

दिनांक-10/2/2020
यह व्यंग्य लेख मेरा स्व-लिखित व अप्रकाशित है. 

लेखक--रंगनाथ द्विवेदी 
पता--जज कालोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin. no. 222002 (U P)
Mo. no. 7800824758

Friday, 6 March 2020

व्यंग्य लेख---(होली )

व्यंग्य लेख---(होली)

वे होली का एक घनघोर रोमांटिक दिन था,जब 65 वर्ष का एक नौजवान बुढा---पुरी तरह भांग की चपेट मे होकर अपने फागुनी ज्ञान से तर-बतर हो अपने पास खडे होली के सावन मे भीगे तरह-तरह से रंगे चेहरे की सुघरता को वे--"65 वर्षीय ज्ञानी उन्हें कुछ यु तक कर बाते कर रहा था जैसे आशाराम बापु किसी खोड़सी बाला का चयन कर आज अपने पुरे ज्ञान का समंदर ही उडेल देगा. होली के दिन--" भांग यहा का राष्ट्रीय प्रसाद हो जाता है और इस बुढ़े कीसी हरकतो के संग थिरकना राष्ट्रीय नृत्य".

ये भांग रुपी प्रसाद का उन्माद नही तो क्या है, की वे जिन लोगो को अक्षत कुँवारी समझ रहा वे सबके सब लडके है जोअपनी जवानी के प्रथम पायदान पर है. लेकिन वे भी आज इस प्रसाद के उन्माद को पुरी मस्ती मे छके जा रहे. 

और वे नौजवान बुढा भी अपने प्रवचन का ये अलौकिक प्रभाव देख, आनंदातिरेक मे अपने--"स्पायरी डेट की जंघाओं को बड़े ही क्लासिकल तरिके से ठोक रहा था और शायद अपनी जंघाओं को इसने कभी आजीवन इस तरिके से अपने युवाकाल मे भी न ठोका होगा".

अपने सीने के अधपके बाल को तो आज इस नौजवान बुढे ने कुछ इस तरह हाथ रख सहलाया है जैसे किसी फिल्म मे--"इमरान हाशमी ने मल्लिका सेहरावत को अपने फागुनी बिस्तर पे सुला उसे अपने वियाग्रा सी जवानी का प्रमाण दिया हो".

होली यू तो प्रतिवर्ष आता-जाता है पर हर होली अपने कुछ मधुर व रोमांटिक एहसास छोड़े जाती है. हमारे इस वृहद देश मे तमाम तरह से होली खेली जाती है. इस तरह होली को पारंपरिक तरिके के अलावा भी आधुनिक तरिके से भी मनाया जाता है यानी कि---"एक आयुर्वेदिक तरीका है जो 50 वर्ष के ऊपर के महिला व पुरूष मनाते है और दुसरे तरीके की होली जो 2020का अग्रेंजी माडल है जिसमे फाग नही गाते, न होली जलती है बस दो दिल जलते है,और होली की ये आधुनिक कलात्मकता हमारे पवित्र होली की आँखे गीली कर देती है".
आईये अब हम कुछ वर्ष होली न मनाये बल्कि हम आप मिल पहले उस होली को ढुढ़े जो हमारे अपने ही देश मे कही खो गई है.

@@@रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर पिन नं.222002 (उत्तर-प्रदेश).
मो.नं.7800824758

ये लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है

व्यंग्य--(होली मीनिया वायरस )

व्यंग्य--
         ( होली मीनिया वायरस)

 भारत के मार्च महीने में लोगों को--"भीषण होली मीनिया नामक मोहब्बत की बीमारी अर्थात वायरस की चपेट में घिरा  हुआ पाया गया है".बड़े-बड़े साधु-संतों और बाबाओं तलक के सिद्ध-सिंहासन में लगातार फाल्ट या भीषण गिरावट देखी जा रही है और उनके आश्रम की गुप्त गुफाओं से--ध्यान और अध्यात्म की पुस्तकों की जगह होली में--"कामोत्तेजक दवाए व एक से एक सुंदरिया बरामद हो रही हैं, बाबाओं को भजन कम सरकाई लो खटिया और जलेबी बाई इतना पसंद आ रहा हैं कि--"इसी की धुन में 7-  8 बड़े बाबा या संत जेल में भी होली मीनिया वायरस से राहत के लिए किसी महिला डॉक्टर का इंतजार इतनी बेताबी व बेसब्री से कर रहे हैं कि जैसे कुछ और विलंब हुआ  तो यह 2020 मॉडल के होली मीनिया वायरस के एक  राष्ट्रीय डिजिटल संत या बाबा की मौत होगी". 

 "होली मीनिया वायरस के कुछ बेहतरीन पेशेंट इस समय राजनीति में भी बड़े धड़ल्ले से दिख रहे हैं". एक होली मीनिया के सबसे चर्चित व गंभीर पेशेंट तो हमारे देश की सर्वोत्कृष्ट राष्ट्रीय पार्टी के हैं जिनके सामान्य व्यवहार में भी होली मीनिया वायरस प्रवेश कर चुका है. इस उम्र और मार्च के महीने में इन्हें इस वायरस के  राष्ट्रीय इलाज की बड़ी जरूरत है. वह यह कर नहीं रहे. सच तो यह है कि-"इन्हें किसी खूबसूरत लड़की या औरत की मोहब्बत के आईसीयू में पूरे मार्च महीने तलक के लिये  भर्ती व उसकी रूप लावण्य की देखरेख में छोड़ देना चाहिए". नहीं तो इन्हें होली मीनिया वायरस नाम की ये रोमांटिक बीमारी कही इन्हें  अपनी उम्र के उस मुहाने पर  अपनी चपेट में ना ले ले जब इनके शरीर के- "सारे पार्ट अपनी  एक्सपायरी डेट के कगार पर ना  पहुंच जाए".

हम सभी भारतीय लोग मार्च महीने को-"होली मीनिया वायरस का--सबसे तीव्रता से वायरल होने वाले मोहब्बत के महीने के तौर पर जानते है". इसमें 40 वर्ष पार कर चुकी औरत भी अचानक से अपने 50 वर्ष के पति  की ऐसी दुल्हनिया बन जाती है कि--"पति फिर अपनी युवावस्था के 'साजन' फ़िल्म का 'सागर' व पत्नी 'दिलवाले' की 'सपना' लगने लगती है". होली मीनिया वायरस एक ऐसा भारतीय लव  वायरस है जिसमें जान-माल का कोई नुकसान नही होता,हालांकि हमारे देश में कुछ दुर्लभ स्त्री व पुरुष भी पाए जाते है जो--"मोहब्बत के मौसम में भी भयंकर रूप से सूखाग्रस्त पाये जाते है,ऐसे में उनका नाम इस होली मीनिया वायरस के वायरल होने के समय लिखना भारत के मार्च महीने की  दिल पर किया गया एक पोटैशियम सायनाइड अटैक है".


होली पर लिखा हुआ ये मेरा स्व-लिखित व अप्रकाशित व्यंग्य है. 

दिनांक-2/2/2020

लेखक--रंगनाथ द्विवेदी 
पता--जज कालोनी, मियांपुर 
जिला-जौनपुर pin.no.222002 (U P)
Mo.no.7800824758