(प्लेटफार्म नं.3 का बुढ़ा)
रोज की तरह मै-----------
आज भी इंतजार कर रहा था आफिस के लिये,
प्लेटफार्म नं.3 पे खड़ा हो,
अपनी जानी-पहचानी सी वही ट्रेन,
लेकिन ट्रेन के आने से पहले,
मेरी आँखे उस मजलूम बुढ़े को ढुढ रही थी,
जो रोज बीना कुछ कहे या मांगे,
पास आ जाता था लेने एक दस की नोट।
जो मै रोज बस उसी के लिये अपनी जेब में रखता था,
छुट्टा न भी हो मेरे पास तब भी उसे थमा----
एक शुकून सा होता!
लेकिन आज वे बुढ़ा नही दिख रहा,
मेरी बेचैन अँगुलियाँ बार-बार,
जेब में उस जगह जा टटोल रही,
जहां से निकाल मै ये दस का नोट,
उसे हर रोज थमा दिया करता था।
अचानक से मेरी बेचैनी बढ़ी-------
तो मैने अपने बगल से गुजर रहे,
चायवाले से पुछा------
जो खुद इसी प्लेटफार्म नं.3 पे अपनी,
चाय हर रोज बेचा करता था।
उसने जैसे रुंधे गले से कहा हो,
कि बाबुजी कल आप शायद नही आये थे,
अपनी ट्रेन पकड़ने या आपकी छुट्टी रही होगी,
कल उस बुढ़े की लाश फटे कंबल में यही पड़ी थी,
तो रेलवे के कुछ सिपाही उसे उठा ले गये,
और किसी लावारिस की तरह कही फेक आये,
मेरे अंदर आँसू भर-भराके गिरे और एक टिस उठी,
जैसे मेरे उस बुढ़े से एक अंजान रिश्ता टुट गया,
और मेरे अंदर एक अंजाने वात्सल्य की डोर टुट गई।
अब फिर कभी बीना बोले वे मेरे पास नही आयेंगे लेने---------
इस प्लेटफार्म नं.3 पे मेरी जेब में रंखे हुये दस के नोट!
हमेशा कचोटेगा---------
एक बार उनसे उनके बेटो और बहुओ के बारे में पुछा था,
तो वे अपने भर-भराये गले से बोले थे,
वे बहुत ज्यादा पढ़ लिख गये साहब,
और विदेश चले गये!
वे बात उनकी हमें कील की तरह चुभी,
उफ!कितना बेगुनाह तड़पा,
अपने बेटो,बहुओ और पोतो के लिये------
इस प्लेटफार्म नं.3 का बुढ़ा।
@@@संवेदना की एक पीड़ाभरी साँस पे लिखी अपनी ये रचना मै आपको सोचने के लिये उस बुढ़े बुज़ुर्ग की ये असह्य पीड़ा मै आप सभी सुधी जनो के हवाले करता हूं।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.7800824758