Saturday, 30 July 2022

हास्य-व्यंग्य ----------
                      (म्हारी लुगाई खो गई )
दरोगा साहब-------
म्हारी रिपोट लिख ल्यो, 
की म्हारी लुगाई खो गई. 
ससुरे दरोगा ने-------
म्हारी रिपोट लिखणे से मना कर दियो,
पट्ठे ने रिपोट न लिखणे का जैसे------
खुटा गाड दियो. 
मैणे कहा की आप म्हारी रिपोट, 
लिखते क्यू नही? 
तो उसणे अपणी थूथण लटका,
के म्हारे से पुछ्या,
कि ये बता थारी शादी हुये कितने साल भयो, 
तो मैणे कहा की चौदा साल, 
तो वे बोल्या चिंता न करो,
वे कुछ ही दिन मे खुद ही लौट आवेगी,
और थारी छाती पे ससुरी मूँग दल्येगी .
क्योकि ------
म्हारी भी लुगाई ऐसे ही थारी तरह खोई थी, 
मै बहुत खुश थ्या. 
लेकिन एक दिन घर पहुँचा तो देख्या,
कि वे ससुरी अपणे खूसट बाप के, 
दिये पलंग पे किसी डायण सी सोई थी. 
तबसे बीसो केस इस म्हारे थाणे पे आयो, 
वे सारे बेवकूफ मण-ही-मण बहुत खुश थे, 
कि उणकी लुगाई खो गई. 
बाद मे घर जाणे पे, 
वे म्हारे इस थाणे पे नही लौटे, 
इसका मतलब तु जाणे है, 
कि उणको भी म्हारी तरह खुद ही, 
 बिना खोजे लुगाई मिल गई, 
जा भाई--------
थारी लुगाई भी इसी तरह से मिल जावेगी.

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी. 
जज कालोनी, मियाँपुर 
जिला---जौनपुर पी. नं--222002 (उत्तर--प्रदेश). 
मो.नं.----7800824758.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

Friday, 29 July 2022

(रोटी गाती रही)
भूखी माँ सूबह तलक---------
भूख से बिलबिलाती बेटी के लिये,,,,,,,,,
लोरी गाती रही।
पड़ोसियो ने कहा बेटी मर गई-------
ऐ,रंग----वे इस सबसे बेखबर-------
कहके चाँद को रोटी गाती रही।
(रेप के घाव)
थाने पे--------
एक गरीब की बिटिया,
अपनी सलवार उतारे---------
जगह-जगह हुये रेप के घाव दिखा रही है।
दरोगा----------
बार-बार थप थपाके देख रहा,
दाँत और नाखून चुभे---------
उरोजो को बार-बार।
लड़की सिहर उठी---उसी रेप के छुअन कासा,
ऐहसास हुआ उसे!
वे समझ गई आँख भर-भरा आई उसकी,
कि अब एक रात और चीखेगी थाने पे,
फिर हरे हो जायेंगे---------------
ना भरने के लिये उसकी उरोजो पे ताजिंदगी,
एै,रंग-----------ये रेप के घाव।
(देवता कौन है?)
अधर पे गलिज़गी है सबके---------
तो फिर इस शहर मे देवता कौन है?।
खामि अय्यासपन की तकती है जवान लड़की,
आखिर बताओ----------
तुम्हारे घर की जवान लड़की को तकता कौन है?।
अधर पे गलिज़गी है सबके--------
तो फिर इस शहर मे देवता कौन है?।
गरीब क्या जाने,हदीस,तकरीर,मज़हब,
वे रोटी की खातिर--------
मजदूरी मंदिर और मस्जिद दोनो मे कर रहा है,
आखिर इन्हें----------
हिन्दू और मुसलमान कहता कौन है?।
अधर पे गलिज़गी है सबके--------
तो फिर इस शहर मे देवता कौन है?।
हर दंगे मे जलते है घर तबाह होती है बस्तियाँ,
इन घरो मे तो जिंदा इंसान रहते है,
एै "रंग" बताओ तुम्हें गीता और कुरान की कसम,
कि आखिर-----------
इस मंदिर और मस्जिद मे रहता कौन है?।
अधर पे गलिज़गी है सबके---------
तो फिर इस शहर मे देवता कौन है?।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-------7800824758

Saturday, 23 July 2022

(चूल्हा नही जलता)

तुम तो-----
बात-बात मे शहर जलाना जानते हो.

तुम्हारे पास---
तो कौमो को जलाने का ईधन है.

पर यहाँ फाकाकश़ी सोने नही देती, 
पेट तो जलता है ऐ,रंग------
पर इस बस्ती में अक्सर चूल्हा नही जलता. 

रंगनाथ द्विवेदी. 
जौनपुर.
(वे गुँगी नही)

तुम जीसे कहते हो गुँगी,
वे अक्सर---
मेरी गज़लो मे ढ़लती है.
वे थिरकती है
जब पाँव में बाँध के घूँघरु-
तो कितना बोलती है
ऐ,"रंग"
वे गुँगी नही---
एक मासूम लड़की है।

Wednesday, 20 July 2022

गज़ल--------(बरसने की जरुरत न पड़े)
या खुदा--------------
उसके रोने से धुल जाये मेरी लाश इतनी,
कि बदलियो को घिर-घिर के बरसने की जरुरत न पड़े।
वे तड़पे इतना जितना ना तड़पी थी मेरे जीते,
ताकि मेरी लाश पे किसी गैर के तड़पने की जरुरत न पड़े।
या खुदा----------
वे मेहंदी और चुड़ियो से इतनी रुठ जाये,
कि शहर मे उसको बन-सँवर के निकलने की जरुरत न पड़े।
एै हवा उड़ा ला उसके सीने से दुपट्टे को,
और ढक दे मेरी लाश को------------
ताकि मेरी लाश पे किसी गैर के कफ़न की जरुरत न पड़े।
या खुदा------------
वे जला के रखे एक चराग हर रात उस पत्थर पे,
जहाँ बैठते थे हम संग उसके,
ताकि एै"रंग"--------
मेरी रुह को भटकने की जरुरत न पड़े।
या खुदा---------
उसके रोने से धुल जाये मेरी लाश इतनी,
कि बदलियो को घिर-घिर के बरसने की जरुरत न पड़े।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758
(किसान)
किसान-------------
कभी सुखा तो कभी बाढ़ मे मरता है,
सावन की अय्याशी को क्या  पता?
कि किसान कैसे----------
चढ़ती आषाढ़ मे मरता है।
वे अपने बँधे मवेशियो की रखवाली करता है रातदिन,
फिर भी कोई खुशी नही आती कभी इसके पास पलछिन,
फिर भी कर्ज से खरिदे----------
जब ना मालुम सी बीमारी से मरने लगते है,
इसके एक-एक कर मवेशी------------
तो ये तील-तील कर अपने मवेशियो की बाड़ मे मरता है।
किसान----------
कभी सुखा तो कभी बाढ़ में मरता है।
इसके तलक कभी नही पहुँचती कर्ज़माफी,
इसकी बीमार फसले इसे अंदर तक तोड़ देती है,
ये असहाय हो जाते है उस बेटे से,
जैसे कुंती सी कोई माँ अंधेरे मे पैदा कर,
कही कपड़े मे लपेट छोड़ देती है,
ये कर्ण---------
अपने कुरुक्षेत्र सी खेत की दाड़ पे मरता है।
किसान--------
कभी सुखा तो कभी बाढ़ मे मरता है।
लाश ही लाश है कोई शहादत नही,
एै सियासत देख ये कभी यु.पी,कभी ऐम.पी,कभी बिहार,
तो कभी एै"रंग"---------
मोदी के गुजरात की बलसाड़ मे मरता है।
किसान--------
कभी सुखा तो कभी बाढ़ मे मरता है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.------7800824758

किसान एक अंतहीन पीड़ा की हकीकत।
(चरागो की रात)
लफ्ज़ो की नदी मे घिर गयी है किश्ती,
मै कहां ढुंढु!है कहां किनारो की रात।
ना कोई दर,ना ठौर,ना ठिकाना,
कैसे लिखूँ कि कहां गुजरी है मेरी बहारो की रात।
महकते फूलो की खुशबू ना राश आ रही,
कितनी मनहुस लग रही है-----
चमकते सितारे की रात।
एक सील-सीला लिये है गम जो,
ना खत्म हो रहा-------
कैसे लिखूँ बजती बाँसुरी और पहाड़ो की रात।
वे कहकशे,वे शायरो की महफ़िल छीन गयी,
अब याद है बस कुछ मुशायरे की रात।
तु लौट आ ऐ दिल उस आसमाँ से------
तेरे इंतज़ार मे है किसी के चरागो की रात।

@@मरहूम नीरज साहब को अपनी मौसकी का एक सलाम।

Thursday, 14 July 2022

(फिर घिरे आज बादल)
सारे शहर में फिरे आज बादल,
तुम्हे देखकर फिर घिरे आज बादल।
है तेरी हुस्न के ये बादल भी मारे,
ये जाना सनम--------------
जब तुम्हे चुमने की हसरत लिये,
आपस मे ही खुद भिड़े आज बादल।
सारे शहर में फिरे आज बादल,
तुम्हे देखकर फिर घिरे आज बादल।
मांगा सभी ने पानी मगर,
ना सुनी बादलो ने-------
किसी की दुआ!
वे तो तुम थी हमारे शहर में सनम,
जो बूँद बनकर ज़मी पे गिरे आज बादल।
सारे शहर में फिरे आज बादल,
तुम्हे देखकर फिर घिरे आज बादल।

###हमारे शहर में आज लगातार बादल घेरे हुये है अब बरसात कितनी होती है ये बात की बात है।
(आशनाई का इल्ज़ाम था)
आज कल तो वे भी विधायक हो गई है,,
ऐ,रंग--जिसपे कभी,मंत्री जी के साथ-
आशनाई का इल्ज़ाम था।

Wednesday, 13 July 2022

(पैजनी की धुन)
संगीत से बेहतर है--------
सीधे दिल मे उतर जाती है,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----इतनी क्लासिकल है-----
उसके पैजनी की धुन।
(शीकारे वाली लड़की)
मुझे बार-बार याद आती है,
वे शीकारे वाली लड़की!
डलझील की मदमस्त लहरो को,
वे उसका एकटक देखना,
फिर जादुई हँसी,
हाय!जाने कहाँ खो गई,
वे अदभुत नजारे वाली लड़की,
मुझे बार-बार याद आती है,
वे शीकारे वाली लड़की।
वे उसका तिलिस्मी बदन,
और उसके जुड़े से निकलती वे गुलाब की खुशबू,
अब कही नही मिलती सुघने को,
और कही नही दिखती मुझे,
वे लश्कारे वाली लड़की,
मुझे बार-बार याद आती है,
वे शीकारे वाली लड़की।
पहाड़ो की वे ढ़लती शाम,
वे संगीतमय आवाजे,वे बाँसुरी के स्वर
कही कुछ नही!
बस तन्हाई मे यादो की चंद तस्बीर,
जो हवाओ के झोके से फड़फड़ाती है,
और मै निकल आता हु यादो से उसकी,
बस रह जाती है याद जेहन में,
वे शीकारे वाली लड़की।

###न जाने कब घाटियो मे अब अमन के दिन लौटेगे,न जाने फिर कब डलझील में दिखेगी हम शायरो और कवियो की वे शीकारे वाली लड़की।

Tuesday, 12 July 2022

(खत नही था)
जो दी थी उसने कभी लरज़ते हाथ से,
वे खत नही था।
थी उसके धड़कनो की गज़ल,
हर हर्फ में वे थी मेरे रुबरु,
पुरी रात जैसे थी रुबाई की,
चराग जल रहा था----------
उस रौशनी में मोहब्बत थी,
कोई खत नही था।
एक खुशबू थी भीनी सी हर साँस मे,
ये आँख ठहरी रह गई,
सहर होने तलक एै,रंग-------
मेरी अँगुलियो मे वे थी,
कोई खत नही था।
###सहर होने तलक--सुबह होने तलक।

Monday, 11 July 2022

(बुरहान की खातिर)
घाटी जल क्यु रही है बुरहान की खातिर,
आखिर किया क्या है?
उसने वहां मुसलमान की खातिर।
घाटी जल क्यु रही है?बुरहान की खातिर।
लौट आओ-------------
खुदा के लिये बद्चलन बेटो,
है ये गुमराहियत तुम्हारी
कि दहशत-ऐ-कत्ल जो कर रहे हो तुम,
वे पाक है तुम्हारे कुरआन की खातिर।
घाटी जल क्यु रही है?बुरहान की खातिर।
मुआफ़ न करेगा तुमको कभी खुदा,
एै इंसानी इबलिसो-------------
गर काटोगे कभी किसी बेकसुर का गला,
अपनी अज़ान की खातिर।
घाटी जल क्यु रही है?बुरहान की खातिर।

###या अल्लाह मुकद्दस राह से भटके इन नाफरमानो को कुछ अक्ल तक्सीम कर।
(गज़लो का बदन बेच दिया)

एक गरीब शायर को-
भूख ने कुछ इस कदर तोड़ा,,
कि ऐै "रंग"

उसने रोटी के लिये,,,,,
एक रईस को---
अपनी गज़लो का बदन बेच दिया.

Sunday, 10 July 2022

(मदिरा तेरा सेवन किया है)
जब भी मेरा मन किया है------
ऐ मदिरा हमने तेरा सेवन किया है।
ये काफिरी है-मुझ ब्राह्मण की,,,,,,,,,,,,
कि लोग मंदिरो मे-------
चरणामृत का पान करते रहे,,,,,,,,,,
और हमने तेरा आचमन किया है.
(मुसलमान )
हमारी आस्तीन में कुछ शातिर रहते है,
कही अफज़ल गुरू,कही ज़ाकिर रहते है।
अजीब हालात है साहब----------
कि हमारे मूल्क में मुसलमान की आड़ में,
कुछ काफ़िर रहते है।
हमारी आस्तीन में कुछ शातिर रहते है।
उमड़ता है जब-------------
इनकी दफ़न को हूज़ुम सड़को पर,
मेरी कलम की आयत रोती है,
कि या अल्लाह मेरे मुल्क में इतने नमक हराम--------------
इन्ही की खातिर रहते है।
हमारी आस्तीन में कुछ शातिर रहते है।
बेजा की तकरीर-ऐ-मुखालफ़त
का वक्त आ गया है,
आओ दुनिया को बता दे,
कि एै,रंग----एैसे मुसलमान
हमारी कुरआन से बाहिर रहते है।
हमारी आस्तीन में कुछ शातिर रहते है।

Saturday, 9 July 2022

(ताज़ महल)
ताज़ महल----------
मूहब्ब़त की पाकीज़गी है,
यहाँ मूमताज़ लेटी है।
मत करो इन पत्थरो पे,तुम सियासी वार-
ये आबरु-ए-हिन्द है-------
ना कि मूसलमान।
ऐ,रंग----यहाँ मोहब्ब़त------
आज भी साँस लेती है।

Friday, 8 July 2022

कल के जयपुर से प्रकाशित डेली न्यूज मे मेरी कविता "मैं कुल्हड़ हूं" की सुचना देने के लिये पुखराज सोलंकी भाई का आभार।
(सावन चला गया)
झूले चले गये,कज़री चली गई------
मेहमान तो आते रहे गाँव मे लेकिन,,,,,,,
पर पहले जो आता था--------
वे पाहून चला गया।
ऐ,रंग----धीरे-धीरे ये हादसा हुआ,,,,,,,,
बारिश तो हुई लेकिन--------
गाँव से मेरे सावन चला गया।
(धान की यौवन शिखर पर)

इस बार की बरसात का पानी गिरा है,
धान की फसलो के यौवन शिखर पर।

वे देखो-------------
खेत में सिहरी खड़ी है एक बाला गाँव की,
उसका भीगा आँचल गिर गया है खेत में,
वे उठा के रख रही है जिस लोच से,
बरबस नयन थम जा रहे------------
धान की यौवन शिखर पर।

धान की ये बालियाँ खुद चाहती है,
कि खेत में आये पिया-------------
वे भी सुहागिन हो उठे बरसात में!

आँख मुँदे,साँस फूले,धान भीगे
दे बालियाँ!न्योता खुदी आँचल गिरा,
कि हे बादलो तुम खुब बरसो--------
अब मेरी यौवन शिखर पर।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला-जौनपुर 222002 (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.----7800824758

यह कविता मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

Tuesday, 5 July 2022

(वेदना की पगडंडी हूँ)
हाँ मै उसके जाने----------
और लौटने का दर्द जानती हूँ,,,,,,,
तुम उसे बस एक वेश्या जानते हो--
मै उसे एक औरत जानती हूँ।
ऐ,रंग----मै उसके घर की तरफ जाती हूई,
उसकी वेदना की पगडंडी हूँ।

Sunday, 3 July 2022

आज की डाक से,हमें हिंदी कहानियों के आधुनिक जादूगर बड़े भैया राम नगीना मौर्य की एक और कहानी संग्रह " मन बोहेमियन" की प्रति प्राप्त हुई. जो कि मुझ जैसे कलम के नन्हे विरवे के लिए किसी बड़े साहित्य पुरस्कार से कम नहीं.

बड़े भैया के कहानियों की कई पुस्तक मैंने पढ़ी है,वे सारी पुस्तक केवल एक कहानी की पुस्तक ही नहीं बल्कि हमारे आपके कहानियों का लिखा हुआ एक ऐसा दस्तावेज है जिसके शब्द और भाव सभी अपने से लगते है.

आज हमारे देश में हिंदी साहित्य की कोई भी ऐसी पत्र-पत्रिका नहीं,जो बिना बड़े भैया के किसी कहानी को प्रकाशित किए हुए पुरी होती हो.ऐसे में अगर हम आप इनको या इनकी किसी कहानी को नहीं पढ़ पाते,तो यह एक तरह से हमारे आपके कहानी साहित्य का अधूरापन ही कहा जाएगा.

 रश्मि प्रकाशन ने निश्चित ही इसे एक खूबसूरत कलेवर दिया है,इसके लिए मै रश्मि प्रकाशन की जितनी तारीफ करु कम है,,, धन्यवाद आपका बड़े भैया 🌹🌹🙏🙏
(कुरान देख रहे हो)
माहे रमज़ान में--------------
जो तुम बेगुनाहो का गला रेत रहे हो,
बताओ इन लाशो में-------------
तुम कौन सा इस्लाम देख रहे हो।
कल मस्जिदे शर्मिंदा थी,
गला भरा था अजा़न का,
जैसे इन लाशो मे हो हर कोई अपना,
सारे मुसलमान का,
मोहब्बत आयत है हमारे मज़हब की,
तुम उसपे ही किचड़ फेक रहे हो।
तुमने छिन कर बेटा,
अमीना को रुलाया है,
पुरी दुनिया के मुसलमानो-------
के मदिना को रुलाया है,
खाक हो जाओगे----------
तुम उसी पत्थर से,
जिस पत्थर को तुम------
माँ के आँचल की तरफ फेक रहे हो।
थू है तुमपे एै इस्लामीके स्टेट,
कभी न कुबूलेगा दुनिया का मुसलमान,
वे जानता है,रंग----------------
कि किस नज़र से तुम कुरान देख रहे हो।

###बाग्लादेश मे गला रेत कर आतंकियो के द्वारा मारे गये सभी बेगुनाहो को मेरी एक श्रद्धांजलि।