Tuesday, 30 July 2024

(दोस्ती कागज के नाव की थी)

कविता-----(दोस्ती कागज के नाव की थी )

उसकी और मेरी दोस्ती
कागज़ के नाव की थी.
आम-अमरुद,बरगद,पीपल और
दरवाजे पे लगे 
नीम के छाँव की थी.

उसकी और मेरी दोस्ती
कागज़ के नाव की थी.

साथ मे घुमना 
और घंटो टहलना,
खेत की पगडंडियो पे चलना,
सच ए शहर--
बीना स्वार्थ और मतलब के 
कितनी पाकिज़ा दोस्ती,
हम दोनो के गाँव की थी.

उसकी और मेरी दोस्ती
कागज़ के नाव की थी.

कितनी डांटे सही,
कितनी शिकायते सुनी,
माँ के चाटे खाये-
फिर भी चोरी से मिलते रहे दोनो,
क्योंकि वे दोस्ती
हम दोनो के बेइंतहा लगाव की थी.

उसकी और मेरी दोस्ती
कागज़ के नाव की थी.

कंचे खेले,
आम के बाग से अंबिया तोड़ी,
साथ पोखर नहाए 
दोस्ती के वे सारे मखमली दिन 
छिन गये,
रोटी की हत्तक मे 
कहाँ से कहाँ चले आए,
ए "रंग" 
याद इसलिए है जेहन को,
क्योंकि वे दोस्ती,
हम दोनो के
दो जिस्म 
मगर एक जान की थी.

उसकी और मेरी दोस्ती
कागज़ के नाव की थी.

यह कविता मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है  

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P )
mo.no.------7800824758

(भाई के बांधे चीर पर)

(भाई के बांधे चीर पर)
जुये में द्रोपदी को हारकर-------
जब झुक गये पतियो के सर,
गुँगी हो गई सभा-------------
रो उठी फिर द्रोपदी,
अपने इस तकदीर पर।
वे भी जुआ खेल गई आखिरी लम्हे----
अपने कृष्ण जैसे बीर।
दौड़ पड़े नंगे पाँव कृष्ण भी-----
तब बहन की पीर पर।
गर न आते टूट जाती रस्म राखी की,
फिर कोई भाई ना आता मायके से,
ना फक्र करती एक बहन,
दूःख के दिनो में------------
अपने भाई को बांधे चीर पर।

###रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
एडवोकेट कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
@@@आप सभी को रक्षाबंधन पर्व की ढ़ेरो बधाई।

(बहन की राखी है)

(बहन की राखी है)
एक तरफ दुश्मन की गोलियां,
एक तरफ-----------------------
आज तेरे फौज वाले भाई की छाती है।
मुआफ करना बहन----------
शायद मै आ न सकुंगा!
मै जानता हु कि तुझसे किया-------
एक अहद एक वचन बाकी है।
गर हो सके तो फक्र करना,
अपने शहीद भाई पे!
सुना है शहीद की मौत पर भी,
हमारे मुल्क की बहन करके दिया,
बीना रोये घंटो आरती गाती है।
एै,रंग----------------------
तु भी देख लहराते तिरंगे की तरफ,
उसी में बंधी---------------------
हर बहन की राखी है।

####आप सभी को रक्षाबंधन पर्व की ढ़ेरो बधाई।

(तलाक था)

देश की इतनी लम्बी आजादी के बाद पहली मर्तबा मुस्लिम बेगुनाह औरतों को एक जिल्लत और दोजख़ की जिन्दगी से निजात मिली है. बधाई🇮🇳🇮🇳🇮🇳✍️🙏

(तलाक़ था)

औरत अगर बगावत न करती,
तो क्या करती----
जिसने अपना सबकुछ दे दिया, तुम्हें,
उसके हिस्से----
केवल सादे कागज़ पे लिखा,
तीन मर्तबा तलाक़ था.
इस्लाम और सरिया की ,
इज्ज़त कब इसने नहीं की,
फिर क्यों ?आखिर ----
केवल मर्दों के चाहे तलाक़ था.
मैं हलाला से गुजरू और 
सोऊँ किसी गैर के पहलू,
फिर मुझे वो छोड़े----
उफ ! मेरे हिस्से में ,
ऐ खुदा ! ----
कितना घिनौना तल़ाक था.
महज मेहर के रकम से कैसे?
गुजारती जिन्दगी,
दो बच्चे मेरे हिस्से देना,
आखिर , मेरे शौहर का ,
ये कैसा इंसाफ़ था.
मैं पुछती हूँ, बताओ--
मस्जिदों और खुदा के आलिम़-हाज़िल,
कि आख़िर-----
मुझ बेगुनाह को छोड़ देना ,
कुरान की किस ----
आयत का तलाक़ था.

रचनाकार -- रंगनाथ द्विवेदी

(पंद्रह अगस्त)

(पन्द्रह अगस्त)
अपनो के ही हाथो----
सरसैंया पे पिड़ाओ के तीर से विंधा,
भीष्म सा पड़ा है----
पन्द्रह अगस्त.

सड़को पे द्रोपदी के रेप के दृश्यो ने,
फिर भर दी है आजाद देश के
उन तमाम शहीदो की आँखे,
और उनकी रुह के सामने!
शर्म से खड़ा है----
पन्द्रह अगस्त.

बहुत बिरान है मजा़रे कही मेला नही लगता,
ये सच है-----
कि हम शहिदो की शहादत के दगाबाज है,
फिर भी एै,रंग-------------
ये लहराते तिरंगे कह रहे,
कि हमारी तुम्हारी सोच से भी कही ज्यादा,
विशाल और बड़ा है-----
पन्द्रह अगस्त. 

यह कविता मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है. 

रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin. no. 222002 (U P)
Mo. no. 7800824758

Monday, 29 July 2024

(सखी हे रे! बदरवा)

बारिश ने अचानक से रोमांटिक कर दिया😎😎

       (सखी!हे रे बदरवा)

तन मन भिगोए सखी! हे रे बदरवा
करे छेड़खानी मोहे छेड़े बदरवा.

सिहर-सिहर जाऊँ शरमाऊँ इत-उत,
मोहे पिया की तरह सखी!घेरे बदरवा.

तन-मन भिगोए सखी! हे रे बदरवा.

चुंबन पर चुंबन की है झड़ी,
बूंद-बूंद चुंबन सखी!ले रे बदरवा.

तन-मन भिगोए सखी!हे रे बदरवा.

अंखियों को खोलू अंखियों को मूंदु
जैसे मेरी अंखियों में कुछ सखी! ढुढ़े बदरवा.

तन-मन भिगोए सखी! हे रे बदरवा.

मेरी यौवन का आंचल छत पर गिरा,
मेरी रुप का पढ़े मेघदुतम सखी! हे रे बदरवा.

तन-मन भिगोए सखी हे रे बदरवा.

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)

Sunday, 28 July 2024

(देवता कौन है)

(देवता कौन है?)
अधर पे गलिज़गी है सबके---------
तो फिर इस शहर मे देवता कौन है?।
खामि अय्यासपन की तकती है जवान लड़की,
आखिर बताओ----------
तुम्हारे घर की जवान लड़की को तकता कौन है?।
अधर पे गलिज़गी है सबके--------
तो फिर इस शहर मे देवता कौन है?।
गरीब क्या जाने,हदीस,तकरीर,मज़हब,
वे रोटी की खातिर--------
मजदूरी मंदिर और मस्जिद दोनो मे कर रहा है,
आखिर इन्हें----------
हिन्दू और मुसलमान कहता कौन है?।
अधर पे गलिज़गी है सबके--------
तो फिर इस शहर मे देवता कौन है?।
हर दंगे मे जलते है घर तबाह होती है बस्तियाँ,
इन घरो मे तो जिंदा इंसान रहते है,
एै "रंग" बताओ तुम्हें गीता और कुरान की कसम,
कि आखिर-----------
इस मंदिर और मस्जिद मे रहता कौन है?।
अधर पे गलिज़गी है सबके---------
तो फिर इस शहर मे देवता कौन है?।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-------7800824758

Saturday, 27 July 2024

(सावन 18 साल की लड़की)

( सावन अट्ठारह साल की लड़की है)
सावन-----------
सीधे-साधे गाँव की,
एक अट्ठारह साल की लड़की है.
भाभी की चुहल और शरारत,
बाँहों मे भरके कसना-छोड़ना,
एक सिहरन से भर उठी-------
वे सुर्ख से गाल की लड़की है.
सावन--------
सीधे-साधे गाँव की,
एक अट्ठारह साल की लड़की है.
वे उसका धान की खेतों से तर-बतर,
बारिश मे भीगते हुये,
घर की तरफ लौटना,
और उस लौटने मे उसके,
पाँव की सकुचाहट,
उफ! गाँव मे सावन--------
बहुत ही मादक और कमाल की लड़की है.
सावन---------
सीधे-साधे गाँव की,
एक अट्ठारह साल की लड़की है.
न शायर,न कवि, न नज़्म, न कविता
वे उर्दू और हिन्दी दोनो से कही ऊपर,
किसी देवता,फरिश्ते के हाथ से छुटी,
इस जमीं पे उनके--------
खयाल की लड़की है.
सावन----------
सीधे-साधे गाँव की,
एक अट्ठारह साल की लड़की है.

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर
जिला---जौनपुर--222002 (उत्तर-प्रदेश).
Mo.no.-----7800824758.

यह कविता मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

Friday, 26 July 2024

व्यंग्य

✍️कल एक शादीशुदा महिला अपने कुत्ते के जन्मदिन का केक काट रही थी और उसका पति-अपनी पत्नी और कुत्ते से काफी दूर खड़ा था,,मुझे लगा कि अभी बेचारे में "पति होने के कुछ लक्षण अवशेष बचे रह गए है"

जोक😃😃😃😃

शादी के 25 वर्ष बाद भी अपनी सगी पत्नी को प्रेम कैसे करें? इसका एक ट्यूशन केंद्र खोलने के प्रयास में हूं

व्यंग्य

😀कुछ महिलाएं जो दिनभर अपनी सुंदर फोटो के साथ फेसबुक पर प्रेम कविताएं लिख रही है💘आप उनमें से,किसी एक के पति को देख ले तब आपको पता चलेगा कि "फेसबुक की प्रेम कविताएं मौलिक नहीं है" 😀😄

जोक😃😃😃😃

😀😀फेसबुक पर सुंदर हीरोइनों की फोटो देखने से,,आपको सवा घंटा योग करने के बराबर स्वास्थ्य लाभ मिलता है😀😀

जोक😃😃😃😃

😃😃पराई स्त्री को कनखियों से टुकुर-टुकुर देखना "लोकतंत्र है", और ऐसे में रंगे हाथ पत्नी पकड़ ले और घर पहुंचते ही वह आप पर झाड़ू और बेलन से हमला कर दे तो समझिए "आपातकाल है"😃😃

जोक😃😃😃😃

😀😀अगर आपके दिन की शुरुआत पत्नी के हंसने और मुस्कुराने से हुई है,,तो उस दिन आपको अपने राशिफल के बारे मे जानने की कोई विशेष आवश्यकता नहीं है😃😃

जोक😃😃😃😃

😃😄अगर आपको शुगर है तो बीपी वाली प्रेमिका को देखें,,इससे दोनों का प्रेम मेंटेन रहेगा😃😄

जोक😃😃😃😃

😄😄बेचारे गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे है,,बस ले देकर किसी तरह उनके पास एक स्मार्ट फोन,एक फूल स्क्रीन टीबी, एक वाशिंग मशीन और एक मोटर साइकिल भर है बस 😃😃

जोक😃😃😃😃

😀😀कुछ लोगो के नाम के साथ जब मैं राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय व्यंग्यकार लिखा हुआ पढ़ता हूं,,,तो मुझे ऐसा लगता है कि जैसे "कोई फला व्यक्ति किसी का कालर पड़कर भाई साहब कह रहा हो" 😀😀

जोक😃😃😃😃

😀😀 अगर विवाह के कई वर्षों के बाद पत्नियां ज्वालामुखी हो जाती है तो पति भी तब तलक इतने वर्षों में "अग्निशमन यंत्र हो चुके होते हैं"😀😀

जोक😃😃😃😃

😃😃शादी करने वाले ज्यादातर पुरुष अनुलोम विलोम करते हैं क्योंकि जब इनकी पत्नी मायके जाती है तब यह सांस लेते हैं और जब मायके से लौट आती है तब यह सांस छोड़ते हैं😃😃

जोक😃😃😃😃

😃😃यू ही एक दिन मेरी 64 वर्ष के एक व्यक्ति से मुलाकात हुई तो उन्होंने मुझसे कहा कि उनके सात बच्चे है,और वह "जनसंख्या नियंत्रण विभाग से रिटायर हुए हैं" 😃😃

जोक😃😃

😄😀कुछ लोग किसी नेता या मंत्री के बगल में फंसी अपनी गर्दन और मूंह की फोटो फेसबुक पर ऐसे लगाते है,जैसे कि इन्हें राज्य सभा के लिए मंत्री जी की पार्टी ने अपना नामित प्रत्याशी घोषित कर दिया हो.😄😄

जोक😃😃😃😃

वैसे इस मौसम में पता नहीं क्यों मुझे खूबसूरत टमाटरों को देखकर उन्हें प्यार से साली कहने की इच्छा होती है,,,,शायद ऐसा इनके महंगे होने की वजह से होता है

जोक😃😃😃

✍️✍️ एक अप्रमाणित रिसर्च के अनुसार किसी बड़े पद पर आसीन "महिला उच्चाधिकारी के बेरोजगार पति की हालत बिना फिल्टर के बीड़ी की तरह होती है"😃😃

जोक😃😃😃😃

✍️✍️कुछ पति-पत्नी ऐसे हंसते हैं कि,– जैसे दोनों की शादी "अपहरण पद्धति से हुई हो" 😃😃

जोक😃😃

✍️✍️जो मां बाप या परिवार के लिए आप खर्चते हैं वह आपकी समस्त कमाई का कर है और जो पत्नी आपकी जेब से रुपए झटक कर "अपने गहने बनवाती है वह जीएसटी है"😃😃

जोक 😃😃😃😃

✍️✍️हमारे देश में द्विवेदी से ज्यादा चतुर्वेदी व्यंग्य लिखते हैं,,क्योंकि हम द्विवेदियों के यहां, जहां पति बुद्धिमान होते है,वही चतुर्वेदियों के यहां उनकी पत्नियां.... 😃😃

जोक

अगर महिलाओं के मेकप और उनकी ज्वेलरी का सामान महंगा नहीं हुआ तो मेरे ख्याल से वह बजट महिला और पुरुष दोनों के ही "स्वागत योग्य है"

जोक

♥️♥️गर्लफ्रेंड और बॉयफ्रेंड अपने पुराने से पुराने ब्रेकअप की समस्या से निजात पाने के लिए,,आई लव यू के परम सिद्ध श्री श्री 2024 के "चॉकलेट बाबा" से संपर्क करें🌹🌹😃😃

Thursday, 25 July 2024

(ब्राम्हण और तुर्क)

(ब्राह्मन और तुर्क)
लड़ गये थे-----------------
ज़मीने हिंद की खातिर,
कभी इस कबीले के बुज़ुर्ग।
बटे नही एक थाली थी खाने की,
साथ बैठे थे ब्राह्मन और तुर्क।
वे बुत और सुखा दरख्त,
एक किस्सा है!
चादर पोशी करो लगाओ तिलक,
ये मिट्टी शहीदो के लहू से---------
हुई थी सुर्ख।
ये नज्म़ नही------------
हर हर्फ है मेरा ऐहसासे बिस्मिल,
जगा रहा हु फिर कबीले को,
कि ना लड़े,ना जलाये कोई घर
ब्राह्मन की हिफ़ाज़त मे हो नमाज़,
और नौरात्र मे गले से मिले तुर्क।
लड़ गये थे-----------------
जमीने हिंद की खातिर एै,रंग
कभी इस कबीले के बुज़ुर्ग।

(मां)

(माँ)
तेरा हर बेटा मुल्क की खातिर-------
यूं शहीद और कुर्बान हो माँ!
ना बटने दे किसी को मजहब के नाम पे,
समय से पूजा समय से अजा़न हो माँ।
फक्र हो तुम्हे अपने आँचल और दूध पे,
तेरी लोरी में राष्ट्र हो और राष्ट्रगान हो माँ।
ना पंजाब,ना गुजरात,ना महाराष्ट्र निकले,
आखिरी लम्हें गर लब भी फड़फड़ाये,
तो लब पे तुम और हिन्दुस्तान हो माँ।
गर सुपुर्द-ऐ-खाक होने लगू,
तो मुट्ठी में मुल्क की मिट्टी-------
और डालने वाले के होंठो पे मुस्कान हो माँ।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
एडवोकेट कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
###आप सभी को हमारे मुल्क की ये आजाद सुबह मुबारक हो।

Wednesday, 24 July 2024

(करोड़ों की इमारत में घुट रही है)

(करोड़ो की इमारत मे घुट रही है)
मुझे रुला के गई थी,वे बेवफ़ा-------
वहाँ खुश रहने,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
पर उसकी हवस-ए-दौलत का ये सिला हुआ------------
कि वे आज ऐ,रंग---------
करोड़ो की इमारत मे घुट रही है।

(महबूब के मेहंदी की रस्म)

(महबूब के मेंहदी की रस्म है)
रोऊँगा नही मै-------------------
आज मेरी महबूब के मेंहदी की रस्म है।
भीच लुंगा होंठ को दाँतो से कुचलकर,
एै खुदा चढ़े-------------------
उसकी हथेली पे इतनी सुर्ख मेंहदी,
कि सारा शहर कहे-----------------
किसी भी हथेली पे आज तलक इतनी
मेंहदी नही चढ़ी।
रोऊँगा नही मै----------------
आज मेरी महबूब के मेंहदी की रस्म है।
वे शरमा के हथेली से जब ढ़के चेहरा,
एै आह!मेरी उसको न देना बददुआ,
वे महबूब थी मेरी और महबूब रहेगी,
मै मरके भी दुआ दुंगा--------
महबूब को अपने।
एै,रंग-------रोऊँगा नही मै
आज मेरी महबूब के मेंहदी की रस्म है।

Tuesday, 23 July 2024

(गूंगी)

(वे गुँगी नही)
तुम जीसे कहते हो गुँगी----------
वे अक्सर मेरी गज़लो मे ढ़लती है,,,,,,,,,,,
वे थिरकती है जब पाँव में बाँध के घूँघरु-
तो कितना बोलती है,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग---वे गुँगी नही------------
एक मासूम लड़की है।

Monday, 22 July 2024

(तन मन भिगोए सखी हे रे बदरवा)

तन मन भिगोये सखी हे रे बदरवा,
करे छेड़खानी सखी छेड़े बदरवा।

सिहर-सिहर जाऊँ शरमाऊँ इत-उत,
मोहे पिया की तरह सखी घेरे बदरवा,
तन मन भिगोये सखी हे रे बदरवा।

चुम्बन पे चुम्बन की है झड़ी,
बुँद-बुँद चुम्बन सखी ले रे बदरवा,
तन मन भिगोये सखी हे रे बदरवा।

अँखियो को खोलु अँखियो को मुँदू,
जैसे मेरी अँखियो में कुछ सखी हे रे बदरवा,
तन मन भिगोये सखी हे रे बदरवा।

मेरी यौवन का आँचल छत पे गिरा,
मेरी रुप का पढ़े मेघदुतम सखी हे रे बदरवा,
तन मन भिगोये सखी हे रे बदरवा।

###हिन्दी प्रतिलिपि में इस रचना को प्रकाशित 
करने के लिये मै विणा वत्सल सिंह जी का तहेदिल से शुक्रगुजार हूँ।

(अगर सावन ना आई)

आप लोगन खातिर एगो भोजपुरी सावन------------
                     (अगर सावन न आई)
हे!सखी पियरा जाई हमरे उमरियाँ क धान-------
अगर सावन न आई।
रहि-रहि के हुक उठे छतियाँ मे दुनौव,
लागत हऊ निकल जाई बिरहा में प्रान-------
अगर सावन न आई।
हे!सखी पियरा जाई हमरे उमरियाँ क धान------
अगर सावन न आई।
ऊ निरमोही का जाने कि कईसे रहत थौ,
बिस्तर क पीड़ा ई कईसे सहत थौ,
टड़पत थौ सगरौ उमर क मछरियाँ,
बाहर के घेरे न बरसे सखी!
जबले पिया से हमरे मिलन के न घेरे बदरियाँ,
तब ले न हरियर होये सखी! ई उमरियाँ क धान,
अगर सावन न आई।
हे!सखी पियरा जाई हमरे उमरियाँ क धान-----
अगर सावन न आई।
हे!सखी का होई रुपिया अऊ दौलात,
का होई गहना,
ई है सब रही कमायल-धयामल,
बस बीत जाई हमन के उमरियाँ-------
बाहर कई देईहै दुनऊ परानी के ले लेईही बेटवा,
मरी-मरी बनावल ई सारा मकान,
फिर बाहर खूब बरसे---------
लेकिन न भीगे तब तोहरे चहले ई शरिरियाँ बुढ़ान,
हे!सखी पियरा जाई हमरे उमरियाँ क धान-------
अगर सावन न आई।

Sunday, 21 July 2024

(शिकारे वाली लड़की)

(शीकारे वाली लड़की)
मुझे बार-बार याद आती है,
वे शीकारे वाली लड़की!
डलझील की मदमस्त लहरो को,
वे उसका एकटक देखना,
फिर जादुई हँसी,
हाय!जाने कहाँ खो गई,
वे अदभुत नजारे वाली लड़की,
मुझे बार-बार याद आती है,
वे शीकारे वाली लड़की।
वे उसका तिलिस्मी बदन,
और उसके जुड़े से निकलती वे गुलाब की खुशबू,
अब कही नही मिलती सुघने को,
और कही नही दिखती मुझे,
वे लश्कारे वाली लड़की,
मुझे बार-बार याद आती है,
वे शीकारे वाली लड़की।
पहाड़ो की वे ढ़लती शाम,
वे संगीतमय आवाजे,वे बाँसुरी के स्वर
कही कुछ नही!
बस तन्हाई मे यादो की चंद तस्बीर,
जो हवाओ के झोके से फड़फड़ाती है,
और मै निकल आता हु यादो से उसकी,
बस रह जाती है याद जेहन में,
वे शीकारे वाली लड़की।

###न जाने कब घाटियो मे अब अमन के दिन लौटेगे,न जाने फिर कब डलझील में दिखेगी हम शायरो और कवियो की वे शीकारे वाली लड़की।

(अयोध्या आंख में आंसू लिए खड़ी थी)

(अयोध्या आँख में आँसू लिये खड़ी थी)
कल बड़ी मनहूस घड़ी थी----------------
पुरी अयोध्या आँख में आँसू लिये खड़ी थी। 
ना राम मंदिर ना बाबरी मस्जिद,
सभी शरीक थे उस हूजुम में,
जैसे किसी छत पे------------
माँ सीता भी हाशिम के लिये खड़ी थी।
रामनवमी और दशहरे की रामलीला,
का किरदार था उनमें,
वे बस वादी थे-----------
वरना उनमें सरयू का वज़ु था,
ता उम्र उन्होनें-----------------
अपने ज़ुम्मे की नमाज़ एै,रंग
मुल्क की तरक्की,अमन और मोहब्बत के लिये पढ़ी थी।
कल बड़ी मनहूस घड़ी थी---------
पुरी अयोध्या आँख में आँसू लिये खड़ी थी।

###अयोध्या और बाबरी मस्जिद के वादी हाशिम अंसारी की इंतकाल पर मेरे गम के आँसू ।

(धान की फसले)

(धान की फसले)
मैने इतनी खूबसूरती नही देखी------
ऐ,रंग------इससे पहले,,,,,,,,,,,,,,,
वे बलखाती हुई------------
रोप रही थी-धान की फसले।

Saturday, 20 July 2024

(लिंग काट लेती है)

(लिंग काट लेती है)
आज घर मे अकेला पा--------------
उसका पिता ही उससे जबरदस्ती कर,
उसकी अस्मत लुट,
बीना किसी पछतावे के करवट ले-----
यूँही नंगा लेटा रहता है,
बिटिया मौन ओढ़े उठती है,
और उठाती है यहाँ-वहाँ पिता के हाथो फटे,
बिखरे अपने अधोवस्त्र और लिबास,
फिर जाने क्यू ?
उन वस्त्रो को फेक देती है घिन से,
क्या करती? आखिर क्यू पहनती?
और क्यू ढकती?
उस पिता से अपने अंग,
जिसने पुरे शरीर को अपने नाखूनो से खरोंचा,
और दाँतो से बेरहमी से काटा,
उन स्तनो को------------
जो नारी की सर्वोच्च सुंदरता और,
उसके वात्सल्य की प्रतिमूर्ति है।
वे पुन: अपने कामांध पिता को तक,
एक गहरी साँस लेती है,
और यूँही नंगी बढ़ चलती है किचन की तरफ,
वहाँ से चाकू उठा,
आँख मुदे अपने आनंदातिरेक में नंगे सोये पिता का,
सुसुप्तावस्था मे एक तरफ ढ़लके----------
लिंग को काट लेती है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

मेरी एकाध रचना आपको बिचलित कर सकती है लेकिन इस तरह कि रचना मे एक आंशिक सत्यता भी आप अपने ही सभ्य समाज के किसी न किसी कोने मे पा जायेंगे------ये इसी तरह की एक सत्य घटना का प्रारुप भर है।

(मुसलमान कह दिया)

(मूसलमान कह दिया)
मज़हबी नफरत को हमि ने सह दिया--
मालिक के घर को---------
मंदिर और मस्ज़िद कह दिया।
ऐ,रंग--जिस मासूम को हमे बच्चा कहना था-----------
उसे भी हमने हिंन्दू और मूसलमान कह दिया।

(शिवाला है बड़ी दूर)

(शिवाला बड़ी दुर)
सावन है शिव के लिये ही मशहूर,
चलो रे भक्तो उठाओ सभी काँवर---
ना थको की अभी है शिवाला बड़ी दुर।
अभी है अँधेरा तन-मन के भीतर,
अभी मोह-माया घेरे हुये है,
आयेगी हममें भी रौशनी,
अभी तो चलो अपना काँवर उठाये-----
कि हमसे अभी है उजाला बड़ी दुर।
सावन है शिव के लिये ही मशहूर,
चलो रे भक्तो उठाओ सभी काँवर-----
ना थको की अभी है शिवाला बड़ी दुर।

(ताज महल)

(ताज़ महल)

ताज़ महल---
मोहब्बत की पाकीज़गी है
यहां मुमताज लेटी है

मत करो इन पत्थरो पे,
तुम सियासी वार

ए "रंग"
ये आबरु-ए-हिन्द है,
ना कि मुसलमान

Wednesday, 17 July 2024

(बांहों में भर नही पाए)

(बाँहो मे भर नही पाये)
हमने साँस-साँस भर लिया उन्हे-----
वे इतने के बाद भी,मेरे हो नही पाये।
मै आँख में बसा के उन्हे देखती रही,
वे अपनी आँखो में हमे,
कभी भर नही पाये।
मै आयते कुरान की तरह,पढ़ती रही उन्हे
वे एक लफ्ज़ भी वफा़ का,
मेरी पढ़ नही पाये।
मै उतर गई उनमें कर शौहरे यकीन,
वे एक रात भी हमे हमारी हक से,
एै,रंग----अपनी बाँहो में भर नही पाये।

Tuesday, 16 July 2024

(आर्केस्टा पर नाचती रही)

(आॅरकेस्टा पे नाचती रही)
मेकप से छिपा के अपने मासूम का दर्द,
एक माँ------------------
अर्धनग्न पुरी रात ऐ,रंग--------
आॅरकेस्टा पे नाचती रही।

Sunday, 14 July 2024

(पैजनी की धुन)

(पैजनी की धुन)
संगीत से बेहतर है--------
सीधे दिल मे उतर जाती है,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----इतनी क्लासिकल है-----
उसके पैजनी की धुन।

(शिकारे वाली लड़की)

(शीकारे वाली लड़की)
मुझे बार-बार याद आती है,
वे शीकारे वाली लड़की!
डलझील की मदमस्त लहरो को,
वे उसका एकटक देखना,
फिर जादुई हँसी,
हाय!जाने कहाँ खो गई,
वे अदभुत नजारे वाली लड़की,
मुझे बार-बार याद आती है,
वे शीकारे वाली लड़की।
वे उसका तिलिस्मी बदन,
और उसके जुड़े से निकलती वे गुलाब की खुशबू,
अब कही नही मिलती सुघने को,
और कही नही दिखती मुझे,
वे लश्कारे वाली लड़की,
मुझे बार-बार याद आती है,
वे शीकारे वाली लड़की।
पहाड़ो की वे ढ़लती शाम,
वे संगीतमय आवाजे,वे बाँसुरी के स्वर
कही कुछ नही!
बस तन्हाई मे यादो की चंद तस्बीर,
जो हवाओ के झोके से फड़फड़ाती है,
और मै निकल आता हु यादो से उसकी,
बस रह जाती है याद जेहन में,
वे शीकारे वाली लड़की।

###न जाने कब घाटियो मे अब अमन के दिन लौटेगे,न जाने फिर कब डलझील में दिखेगी हम शायरो और कवियो की वे शीकारे वाली लड़की।

Saturday, 13 July 2024

(कश्मीर)

(कश्मीर)

वे बागां दी बुलबुल, वे डल झील,
वे शिकारें,
हमारी मिट्टी-ऐ-मोहब्बत कश्मीर,
हमें ख्वाबों में पुकारे.

ये सियासत, ये साजिश-ऐ-अलगाव,
कि हम कश्मीरी पंडित पड़े हैं,
खानाबदोशों से बदतर ऐ दिल्ली,
तेरी सड़कों के किनारे.

वे गुल, वे केशर ,
वे सेब के बगीचे,
उफ!! नहीं आती वे खुशबू
ना आती है, वैसी ---
यहां तक हवा रे.

ये लाश-ऐ-मईयत ,
ये रूह-ऐ-तड़प है,
ऐ "रंग"---
हम कैसे होगें, जन्नतनशीं ,
ऐ कश्मीर ----
तेरी पाक़ मिट्टी के बिना रे.

रचनकार -- रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी मियाँपुर 
जिला-जौनपुर 222002(U.P.)
Mo.N.7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

(सुकरात को भी ज़हर दे दो)

(सुकरात को भी ज़हर दे दो)

गर सच की ज़ुबां को 
खामोश़ करना है,
तो ए,"रंग"

इस कलम के 
"सुकरात" को भी---
ज़हर दे दो

Thursday, 11 July 2024

(बुरहान की खातिर)

(बुरहान की खातिर)
घाटी जल क्यु रही है बुरहान की खातिर,
आखिर किया क्या है?
उसने वहां मुसलमान की खातिर।
घाटी जल क्यु रही है?बुरहान की खातिर।
लौट आओ-------------
खुदा के लिये बद्चलन बेटो,
है ये गुमराहियत तुम्हारी
कि दहशत-ऐ-कत्ल जो कर रहे हो तुम,
वे पाक है तुम्हारे कुरआन की खातिर।
घाटी जल क्यु रही है?बुरहान की खातिर।
मुआफ़ न करेगा तुमको कभी खुदा,
एै इंसानी इबलिसो-------------
गर काटोगे कभी किसी बेकसुर का गला,
अपनी अज़ान की खातिर।
घाटी जल क्यु रही है?बुरहान की खातिर।

###या अल्लाह मुकद्दस राह से भटके इन नाफरमानो को कुछ अक्ल तक्सीम कर।

Wednesday, 10 July 2024

(मदिरा तेरा सेवन किया है)

(मदिरा तेरा सेवन किया है)
जब भी मेरा मन किया है------
ऐ मदिरा हमने तेरा सेवन किया है।
ये काफिरी है-मुझ ब्राह्मण की,,,,,,,,,,,,
कि लोग मंदिरो मे-------
चरणामृत का पान करते रहे,,,,,,,,,,
और हमने तेरा आचमन किया है।
जब भी मेरा मन किया है------
ऐ मदिरा हमने तेरा सेवन किया है।

(मुसलमान)

(मुसलमान )
हमारी आस्तीन में कुछ शातिर रहते है,
कही अफज़ल गुरू,कही ज़ाकिर रहते है।
अजीब हालात है साहब----------
कि हमारे मूल्क में मुसलमान की आड़ में,
कुछ काफ़िर रहते है।
हमारी आस्तीन में कुछ शातिर रहते है।
उमड़ता है जब-------------
इनकी दफ़न को हूज़ुम सड़को पर,
मेरी कलम की आयत रोती है,
कि या अल्लाह मेरे मुल्क में इतने नमक हराम--------------
इन्ही की खातिर रहते है।
हमारी आस्तीन में कुछ शातिर रहते है।
बेजा की तकरीर-ऐ-मुखालफ़त
का वक्त आ गया है,
आओ दुनिया को बता दे,
कि एै,रंग----एैसे मुसलमान
हमारी कुरआन से बाहिर रहते है।
हमारी आस्तीन में कुछ शातिर रहते है।

Tuesday, 9 July 2024

(ताज महल)

(ताज़ महल)
ताज़ महल----------
मूहब्ब़त की पाकीज़गी है,
यहाँ मूमताज़ लेटी है।
मत करो इन पत्थरो पे,तुम सियासी वार-
ये आबरु-ए-हिन्द है-------
ना कि मूसलमान।
ऐ,रंग----यहाँ मोहब्ब़त------
आज भी साँस लेती है।

Monday, 8 July 2024

(कबीर की तरह करना)

(कबीर की तरह करना)
ना किसी हिंन्दू,ना मूसलमां की तरह करना,,,,,,,,,,,,,,,,,,
ना काशी,ना काबा की तरह करना---
हाँ मेरी भी इच्छा है-मगहर की,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----अगर संम्भव हो-------
तो मेरा अंतिम संस्कार भी,,,,,,,,,,,,,,
कबीर की तरह करना।

(सावन चला गया)

(सावन चला गया)
झूले चले गये,कज़री चली गई------
मेहमान तो आते रहे गाँव मे लेकिन,,,,,,,
पर पहले जो आता था--------
वे पाहून चला गया।
ऐ,रंग----धीरे-धीरे ये हादसा हुआ,,,,,,,,
बारिश तो हुई लेकिन--------
गाँव से मेरे सावन चला गया।

(बाबा)

इस देश के नामी-गिरामी बाबाओ की नीचता को मूल्यांकित करती मेरी कुछ पंक्तियां ।
              (बाबाओ के नीच होने का कंम्पटिशन चल रहा है) 
सावधान---------
बाबाओ के सेक्स का सीजन चल रहा है, 
प्रवचन प्रदूषित हो गया है, 
महिला अंगो को तकने की लिप्सा मे, 
पगला गये है, 
उनकी आश्रम की गुफा मे वे देखो,
ब्लू फिल्मो का---------
पुरा टेलीविजन चल रहा है. 
तमाम कामुक आसनो की उठा-पटक, 
और सिरहाने तमाम कामोत्तेजक पुरूष होने के कैप्सूल, 
वे देखो पकड़े ला रही, 
जबरदस्ती गुफा मे-----------
इनके आश्रम की कोई हनीप्रित सी महिला, 
उफ! हे भगवान 
अब लग रहा कि जैसे हमारे देश मे, 
इन बाबाओ के ज्यादा से ज्यादा ------
नीच होने का कंम्पटिशन चल रहा है. 

@&@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी. 
जज कालोनी, मियाँपुर 
जौनपुर---222002 (उत्तर-प्रदेश). 
 no. no. ----7800824758.

 यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है ।

मोक्ष प्राप्ति

डायरेक्ट मोक्ष प्राप्ति की ओर भक्त ...
यह बेशर्मी की बागवानी करते हैं 
बड़े बड़े राजनीतिक मामले, ठीकेदारियां तक दिलवाने में इनकी चलती है.
सुख दुख के प्रकार की चर्चा
तुम क्या लाए थे क्या ले जाओगे.

Sunday, 7 July 2024

(साहित्यनामा)

मुंबई से प्रकाशित दि फेस ऑफ़ इंडिया के साहित्यनामा में मेरी रचना का चयन करने के लिये आभार आपका दिनेश वर्मा सर।

(मौत बड़ी वीरान होती हैं)

(मौते बड़ी विरान होती है) 

बेशक----
सारे शहर का हुज़ूम उमड़ता है, 
शख्शे शोह़रत के जनाज़े मे.

पर ऐ,रंग----
ऐसी मौते बड़ी विरान होती है।

Saturday, 6 July 2024

(हमारी मोहब्बत है)

(हमारी मोहब्बत है) 
ये पहाड़
और धुंधलि सी शाम, 
और ढेरो सायबान-----
हमारी मोहब्बत है. 
धिरे-धिरे हौले से चलती ठंडी हवा, 
तेरा शर्माना ,सकुचाना मेरी बाँह मे, 
और चारो तरफ फैला गुलाबी आसमान----
हमारी मोहब्बत है. 
हर तरफ एक संगीत, 
चरवाहो की बाँसुरी 
और अपने-अपने काम से लौटती ,
पहाड़ी लड़कियों की खिल-खिलाहट, 
अपने घोसलो की तरफ लौटते हुये परिंदे, 
के चह-चहाने की मीठी जुबान,
हमारी मोहब्बत है. 
आओ अब हम भी चले, 
एक-दुजे का हाथ थामे,
कुछ बतियाते, सपने बुनते
और घर आते-आते जो निकल आये चाँद, 
हमारी मोहब्बत है. 

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी. 
जज कालोनी, मियाँपुर 
जौनपुर----222002 (उत्तर-प्रदेश). 
 no. no. ----7800824758.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है ।

(जहर के विज्ञापन में)

(जहर के विज्ञापन में )

हम अभी वे वक्त भी देखेंगे 
जब tv पे 
एक अर्ध नग्न अभिनेत्री
मुस्कुराती हुई
किसी ज़हर बनाने वाली
कंम्पनी के 
विज्ञापन मे दिखेगी.

आप कब मरना चाहेंगे पूछेगी,
फिर विज्ञापन के अंत मे 
यह जुमला
कि फला ऑफर के साथ,
होम डिलवरी और 
कोरियर की सारी सुविधा 
आपको 
यहां से मिलेगी.

ए"रंग"----
अब बाजार मे 
आसान मौतों के लिए
ज़हर बनाने वाली कंम्पनियो की 
प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी.

(हां मैं किन्नर हूं)

आज पहली बार "किन्नर" पर एक लघुकथा और कहानी लिखी, सच मुझे लगा "किन्नर" के दर्द और पीड़ा के सामने, पुरे विश्व की पीड़ा भी बहुत गौण है. 
 
(हां मैं किन्नर हूं)

"मैं कहां दहलीज 
कहां घर हूं,
मैं दर्द हूं,पीड़ा हूं
आंसू हूं ,समंदर हूं
मैं कहां दहलीज
कहां घर हूं

कुछ उगा नहीं,
दिल से बांझ और बंजर हूं
हमारी जिंदगी है केवल
एक--
"चश्मे" पानी का धोखा
हमारी सांस तो चलती है 
पर अंदर से मरुस्थल हूं
"हां मैं किन्नर हूं,
हां मैं किन्नर हूं".

✍️✍️✍️✍️😥😥😥😥

Friday, 5 July 2024

(वेदना की पगडंडी हूं)

(वेदना की पगडंडी हूँ)
हाँ मै उसके जाने----------
और लौटने का दर्द जानती हूँ,,,,,,,
तुम उसे बस एक वेश्या जानते हो--
मै उसे एक औरत जानती हूँ।
ऐ,रंग----मै उसके घर की तरफ जाती हूई,
उसकी वेदना की पगडंडी हूँ।

Monday, 1 July 2024

(आखिरी सेल्फी)

(आखिरी सेल्फी)
तुम्हे-------------
कहा था कई मर्तबा,
पर तुम माने कहां,
रोज खिचते रहे-------
हमारी और अपनी निजी पलो की सेल्फी।
आज वे सभी शहर में वायरल हो गये,
मै नंगी गुजर रही हूँ सड़क से,
हर भूखी आँख देख रही है जैसे,
तुम्हारे द्वारा ली गई-------------
सहवास के पलो की वे सारी सेल्फी।
काश तुम मान गये होते!
तो आज ख़ुदकुशी न करती,
और न छोड़ती अपने सिरहाने,
तुम्हारे लिये मै-----------
अपनी आखिरी सेल्फी।
देखना ता उम्र-----------
अपनी डबडबाई आँखो से,
मै तुम्हारे बहुत पास रहुँगी,
कभी डिलिट नही होगी तुम्हारी जेहन से,
ये हमारी आखिरी सेल्फी।

###आधुनिकता नितांत आवश्यक है पर आजकल कुछ घटनाये रोंगटे खड़ी कर दे रही है सेल्फी के द्वारा हमने एक भाव व्यक्त किया है,मेरा उद्देश्य किसी का समर्थन या विरोध नही है,धन्यवाद।